सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 371–380
सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 371–380
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1 श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ७०८ | ७०७ ' या च इदानीं प्रागभिसम्बन्धात् पुंसा सह संप्रयोगं गच्छति, का तस्यां कन्याशब्दो वर्तते एव ' यह भाष्यकारका कथन तथा उसपर पूर्वके टका अर्थ व्यर्थ होता है; तब तो पहला ही वाक्य पर्याप्त था । ८।२२६ ) कार इससे स्पष्ट सिद्ध है कि - कन्यात्वके दूर करनेमें मुख्य कारण उसका नहीं बिवाह ही है । नहीं तो भाष्यकारका दूसरा वाक्य व्यर्थ होता है । के महा वह दूसरा वाक्य ही बता रहा है कि- विवाहसे ही कन्यात्व नष्ट - विवाह ) होता है, संयोगसे नहीं । इससे ' जिस लड़कीका विवाहमात्र स्वन्धात् हुआ है; और संयोग नहीं हुआ; उसका कन्यात्व नष्ट नहीं होता; दो वर्तते इससे अक्षतयोनि विधवाका विवाह शास्त्रीय है ' यह कहनेवालों पूर्व का पक्ष कट गया । विवाह- यदि यह माना जावे कि जब संयोगसे कन्यात्व दूर नहीं - होता, तो क्षतयोनि कन्याके विवाहमें क्या दोष है, उस पर उत्तर यह है कि क्या प्रश्नकर्ता यहां विवाहिता -क्षतयोनि कन्याका हटने में विवाह चाहता है, या अविवाहिता -क्षतयोनिका? यदि विवाहिता दि कहा क्षतयोनिका; तो उसका तो विवाह से कन्यात्व समाप्त हो गया, नाना है, अव कन्या न होनेसे उसका विवाह ही सिद्ध नहीं । यदि बादी सासह अविवाहिता - क्षतयोनिक । विवाह चाहता है; तो शास्त्रानुसार मन तथा उसका विवाह हो सकता है; पर वह अप्रशस्त - विवाह माना होनेपर गया है । इसमें ' पाणिग्रहणिका मन्त्राः ' ( ८२२६ ) इस मनुके संयोग श्लोक में कुल्लूकभट्टकी टीका देखनी चाहिये । ' नासौध यदि विवाहः । करने जिनके मत में विवाहमात्रसे कन्यात्व दूर नहीं होता; उनके तभी CC - 0. Ankur Joshi Collection विधवाविवाहकी उपपत्तियां तथा उनपर विचार [ ७०६ मत में विवाह होनेपर भी कन्यात्व रह जानेसे उससे संयोग करनेसे कन्यागमनका दोष भी होगा; उसकी सन्तानको फिर ' कानीन ' कहना पड़ेगा; क्योंकि कन्याके पुत्रको ही ' कानीन ' कहा जाता है । हमारे मतमें तो दोष नहीं, क्योंकि- ' पाणिग्रहणिका मन्त्रा नियतं दारलक्षणम् । तेषां निष्टा तु विज्ञेया विद्वद्भिः सप्तमे पदे ' ( मनु. ८२२७ ) इस मनुजीकी उक्तिसे सप्तपदीमें ही कन्यात्व हट जाता है । इस प्रकार विधवाविवाहका प्रश्न ही समाप्त हो गया; शास्त्रीयता तो उसकी हो ही कैसे? इसीलिए ' कन्यायाः कनीन च ' ( पा. ४ | १ | ११६ ) इस सूत्र में श्रीदीक्षितने भी ' कन्यायाः अनूढाया एव अपत्यम् ' यही अर्थ किया है । इसपर तत्त्वबोधिनीमें प्रश्न है - ' ननु कन्या हि अक्षत-योनिः, तस्याश्च अपत्यसम्भव एव नास्ति ' ( कन्या अक्षतयोनि हुआ करती है, उसकी सन्तान कैसे? ) इस पर उसने उत्तर दिलाया है – ' कन्यायाः - अविवाहिताया इत्यर्थः । वालमनोरमाने भी प्रश्न कराया है- ' ननु कन्याया अप्रादुभूतयौवनत्वात् पुं'संयोगाऽभावात् कथमपत्यसम्बन्धः? ( इसका भी वही भाव है ) इसका उत्तर दिया है— कन्यायाः - श्रलब्धविवाद्दाया इत्यर्थः, एतच्च भाष्ये स्पष्टम ' | लघुशब्देन्दुशेखर में श्रीनागेशभट्टने तो बहुत स्पष्ट कर डाला है — ' नत्वक्षतयोनित्वं कन्यात्वमिति भावः ' । अर्थात् - कन्यात्व अक्षतयोनित्वसे नहीं होता, किन्तु अविवाहिता-वसे होता है । इस प्रकार इन सभीने विवाहको ही कन्यात्व दूर करनेमें मुख्य माना है । तव विवाहिताओंके अकन्या हो Gujarat. An eGangotri Initiative
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७१० । श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) जानेसे, और वैवाहिक मन्त्रों में ' कन्या ' शब्द होनेसे उनका विवाह ही कैसे हो सकता है? इस प्रकार विधवाविवाहकी प्राप्ति ही न होनेसे उसका निराकरण होगया । कई विद्वान् कहते हैं कि - " चतुर्थी - होममन्त्रेण त्वङ्मांसहृदये-न्द्रियैः । भर्त्रा संयुज्यते नारी तद्गोत्रा तेन सा भवेत् ' यह बृहस्पतिका वचन है । ' विवाहे चैव निवृत्ते चतुर्थेऽहनि रात्रिषु । एकत्वं सा गता भर्तुः पिण्डे गोत्रे च सूतके ' । ' स्वगोत्राद् भ्रश्यते नारी उद्वाहात् सप्तमे पदे । भर्तृ गोत्रेण कर्तव्या दानपिण्डोदक-क्रिया ' यह ' लिखितस्मृति का वचन है । इससे विवाह के बाद संभोगसे ही स्त्री - पुरुषोंकी पूर्णता होती है । तभी विवाह की पूर्णता होती है, तभी स्त्रीका पैतृकगोत्र बदल कर पतिगोत्र बनता है, पहले नहीं । " यह पक्ष भी ठीक नहीं । उक्त पद्योंसे सप्तपदी और चतुर्थी-कर्मसे वधूके पैतृक गोत्रका परिवर्तन एवं पतिगोत्रकी प्राप्ति कही है, सम्भोगसे नहीं । और यह भी स्मर्तव्य है कि - चतुर्थीकर्ममें यदि वह विवाहसे चौथे दिनका कर्तव्य है, तो उसमें मैथुनकी अनिवार्यता भी नहीं, आज्ञा भी नहीं । नहीं तो पारस्करादि - प्रोक्त संवत्सरादि - ब्रह्मचर्यं व्यर्थं हो जावेंगे । इस विषय में प्रकाश भिन्न पुष्पमें डाला जावेगा । तब ' सम्भोग होनेपर ही विवाहकी पूर्णता होती है ' यह विधवाविवाहप्रेमी गोस्वामी - राधाचरण आदियोंका पक्ष निराकृत हो गया, क्योंकि इससे पारस्करादि प्रसिद्ध गृह्यसूत्रों तथा उनके भाष्योंका विरोध पड़ता है । सूत्र विधवाविवाहकी उपपत्तियां तथा उनपर विचार ७११ चतुर्थी - कर्मान्त विवाह द्वारा भार्यात्व माना है, सम्भोगसे नहीं । हाँ, उस चतुर्थी - कर्मसम्पन्नतासे उसके भार्यात्वक पूर्ति हो जाती है; उसके बाद मैथुनकी अभ्यनुज्ञा तो हो जाती है, पर अनिवार्यता नहीं, श्राज्ञा भी नहीं; क्योंकि-रागप्राप्त - व्यवहारकी आज्ञा नहीं हुआ करती, हाँ, चतुर्थीकर्म से पूर्व [ उसका निषेध तो होता है; क्योंकि उसका तब तक भार्यात्व पूर्खे श नहीं हो जाता । तब इससे स्पष्ट हुआ कि चतुर्थीकर्मान्त विवाहसे भार्यात्वकी पूर्ति हुई; मैथुनसे नहीं । चतुर्थी कर्मं विवाहका ही अङ्ग है, गर्भाधानात्मक संयोगका नहीं । यदि गर्भाधानात्मक संयोग विवाहका अङ्ग होता, तो विवाह संस्कार तथा गर्भाधान - संस्कार भिन्न - भिन्न न माने जाते । यदि विना सम्भोगके विवाह पूर्ण न माना जावे; तो जो कि - वादि - प्रतिवादिमान्य पारस्करादि - गृह्य-सूत्रोंने एक साल तक भी ब्रह्मचर्य माना है; तव वादीकी उक्त -कल्पनानुसार यदि किसीका सम्भोग नहीं हुआ हो; क्या उन दोनोंका पति - पत्नीत्व न माना जावेगा? क्या यही माना जावेगा, कि - इनका विवाह ही अभी पूर्ण नहीं हुआ । यदि ऐसा है; तो चतुर्थीकर्म हो जानेपर भी उनके परस्पर पति - पत्नी न होनेसे वर्ष वा १२ दिनोंके बाद भी सम्भोग निषिद्ध हो जायगा, क्योंकि जब तक पति - पत्नीत्व ही उनका पूर्ण नहीं; तब तक सम्भोगका उनको शास्त्रानुसार अधिकार ही क्या रह जाता है? इसलिए आजकलके उच्छृंखल ज़माने में कहीं यह चतुर्थी कर्मकी कर्तव्यता से पूर्व ही संयोग न कर बैठें कि वह संयोग व्यमिचार-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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७१२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) [ ७११ भोग कोटि में परिगणित हो जावे, इसलिए चतुर्थीकर्म भी आजकल से विवाह वाले दिन ही कर दिया जाता है । इस प्रकार मन्वादिके तातो अनुसार सप्तपदीसे, कइयोंके अनुसार चतुर्थीकर्मसे लड़कीका न्योंकि- पैतृकगोत्र बदलकर पति - पत्नीत्व हो जाता है; तव उसके संयोगमें से पूर्व [ यदि उसमें वैसी योग्यता है ] कोई दोष नहीं । हाँ, विवाह पूर्ण शास्त्रानुसार ऋतुकालकी वयसे पूर्व बारहवें वर्षमें कर्तव्य है; वाह उससे पूर्व नहीं । उससे पूर्व उस देशमें हो; जहां ऋतुकाल १२ ही पङ्ग वर्षसे पूर्व हो । हमारे शास्त्रोंमें ८ वर्षसे १२ वर्षं तकका, तथा संयोग कहीं १६ वर्षकी लड़कीका विवाह देखा जाता है; उसका मुख्य संस्कार कारण भिन्न - भिन्न देशकालमें भिन्न - भिन्न वयमें ऋतुकाल है । द - गृहा- सप्तपदी में पिता के गोत्रके हटजानेसे स्त्री पतिके गोत्रको उक्त प्राप्त हो जाती है - इसमें बहुत स्मृतिकारोंकी स्वीकृति है; यह न्या उन वादीसे दिये हुए लिखितस्मृतिके वचनमें भी प्रत्यक्ष है । मनु वेगा, मी ' विद्वद्भिः सप्तमे पदे ( ८२२७ ) इसमें दारलक्षण अर्थात् है; तो स्त्रीत्वकी पूर्णता सप्तपदीसे कही है । परन्तु ' संभोगके बगैर हो पतिगोत्रकी पूर्णता नहीं होती ' इस वादीके मतमें तो किसी यगा, भी स्मृतिकारकी साक्षी नहीं । यदि आक्षेप्ता गो - राधाचरण तक यह बताकर संभोगको प्राप्त हुई विवाहिताका पुनर्विवाह युक्त है? कर्मकी नहीं मानते, तो उसी अपनी पुस्तकमें उन्होंने प्रसूताका पुनर्विवाह कैसे माना है - इस प्रकार व्याघात होनेसे भी उनका खण्डन चार-हो गया । CC - 0. Ankur Joshi Collection विधवाविवाहकी उपपत्तियां तथा उनपर विचार [ ७१३ फलतः विवाहसे पहले उसके मैथुनमें भी उसका कन्यामात्र दूषित अवश्य होता है; पर वह कही ' कन्या ' ही जाती है । इसलिए ' यस्तु दोषवर्ती कन्याम ' ( ८२२१ ) यहां मनुजीने दूर्षिताका नाम भी ' कन्या ' कहा है । इससे विवाहसे ही सप्तपदी होनेपर कन्यात्वकी निवृत्ति होती है; तब उसका पुनर्विवाह शास्त्रसम्मत नहीं । ( २ ) ' जव पुरुष पुनर्विवाह कर सकते हैं; तव स्त्रियोंको ईश्वरीय न्यायानुसार पुनर्विवाह में अधिकार क्यों न दिया जाय? ' विचार — पुरुष केवल स्त्रीके मरनेमें ही पुनर्विवाह नहीं करते, बल्कि उसके सन्तान आदिके न होनेपर उसके जीनेमें मी पुन-विवाह कर लेते हैं, तब क्या प्रतिपक्षी स्त्रीको पतिके जीवनमें - भी सन्तान आदि न होनेपर उसको अन्य पतिके विधानकी - आज्ञा देंगे? क्या यहाँ ईश्वरीय न्याय भुला दिया जावेगा? एक पुरुष अनेक स्त्रियोंको एक मास में गर्भवती कर सकता है; पर एक स्त्री अनेक पुरुषोंसे सङ्गम करके भी एक मास वा वर्ष में एक ही गर्भ धारण कर सकती है? क्या प्रतिपक्षी इसमें ईश्वरका पुरुषविषयक पक्षपात नहीं देखते? जैसे यहां वे ईश्वरके अन्याय-को सह जाते हैं, वैसे यहां भी सह जाएं । वेदादिशास्त्रों में स्त्रीको एक ही पतिकी आज्ञा है, और पुरुपको कारणविशेष में बहुस्त्री - विवाहकी मी अभ्यनुज्ञा है । तब क्या वैसा कहनेवाला वेद प्रतिपक्षीके मतमें ईश्वर वाक्य नहीं? यदि है; तो क्या इसे प्रतिपक्षी ईश्वरका न्याय नहीं मानते? । अथवा अपनी इष्ट Gujarat. An eGangotri Initiative
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७१४ ] श्री सनातनधर्मालोक ( 5 ) बातको ईश्वरीय न्याय मानते हैं; और अपने मन्तव्यसे विरुद्धको अनीश्वरप्रोक्त मानते हैं! तब तो आप धन्य हैं! ( ३ ) ' विधवाका दम्पति - सुखमग्नपरिवार में विधवारूपसे रखना पाप है; विशेषतः सन्तानहीन विधवाका - जिसने दाम्पत्य-का सुख भी नहीं देखा; उसका विवाह क्यों न किया जावे? ' विचार – आप १४४ वार रजस्वला हुई भी अविवाहित, शिक्षित कुमारियों को इस प्रकार दम्पतिसुखमग्नपरिवारमें कैसे रखते हैं? क्या यह पाप नहीं? और फिर क्या आप ' गारंटी ' दे सकते हैं कि- जिन्होंने पहिले पति - सुख देख रखा है, और सन्तानवाली भी हैं- ऐसी विधवाएँ अपना पुनर्विवाह न कराएँगी? यदि इसमें आप गारण्टी नहीं दे सकते; तब इसमें ही आपका आग्रह कैसा? ' स्थविराणामपि स्त्रीणां बाधते मैथुन - ज्वरः ' ( महा. अनुशासन. २११५ ) इस कथनसे आप अपनी वृद्धा विधवा माताओंको भी उनके अमीष्ट युवकोंके साथ पुनर्विवाहका अधिकार दे देंगे - या नहीं? यदि नहीं; तो क्यों? क्या उन्हें उक्त महाभारतीय वचनवश उत्तेजना नहीं होती? कइयोंको वैसी आज्ञा दे देना और कइयोंको वह आज्ञा न देना- यह क्या आपकी स्वार्थसिद्धिको सूचित नहीं कर रहा? विधवाका दम्पति-सुखमग्नपरिवारमें रखनेमें कोई शास्त्रकी आज्ञा नहीं; न ही शास्त्र उन्हें उत्तेजनात्मक विशिष्ट खान - पानकी आज्ञा देता है । उन्हें तो संन्यासिनियोंकी भांति सम्मानित करके रखना चाहिये-और उनका विशेष प्रबन्ध करना चाहिये कि - जिससे न तो वे विधवाविवाहकी उपपत्तियां [ ७१५ अपना तिरस्कार समझे, और न उत्तेजित हों । उनकी उत्तेजना में जितना पुरुष समाज दोषी है; उतना वे नहीं । प ( ४ ) ‘ विधर्मियोंके आक्रमणोंमें, बलात्कारोंमें विधवाएँ ही लक्ष्य बनती हैं । इस प्रकार जहाँ शतशः विधवा स्त्रियाँ अपने सतीत्वको भ्रष्ट कर बैठती हैं; वहाँ अपने धर्मको भी । ऐसी स्थिति- त में क्यों न उनका पुनर्विवाह करके उन्हें अपने धर्ममें रखा जावे? विचार — इसमें कारण सनातनधर्मसम्मत अवगुण्ठन - प्रथाका अभाव है । उन्हें जब इधर - उधर भेजा जाता है, स्वतन्त्र किया जाता है; तब ऐसा होना तो अनिवार्य है । पहलेकी भांति क आवरण - प्रथाको रखिये; तब इस प्रकारकी हानियाँ नहीं होंगी । स विधर्मी लोग तो कुमारियों पर भी आक्रमण करते हैं; और विवाहिताओं को भी नहीं छोड़ते । यदि आपको बिधवाओंके उ विषयमें भय है; तो अपनी १७- २४ वर्षकी अवस्थावाली इधर- ए उधर घूमनेवाली कुमारियों तथा अवगुण्ठन - प्रथा छोड़ चुकी हुई अपनी विवाहिता - स्त्रियोंके विषयमें भय क्यों नहीं? यदि यापकी जाति में अपनी कुटुम्विनियोंकी रक्षा करने की शक्ति नहीं, और विधर्मियोंके आक्रमण रोकनेकी शक्ति नहीं; तो अपना विवाह ही बन्द कर दीजिये । धन आदिका संग्रह भी बन्द कर ध दीजिये; क्योंकि उसके भी चुराये जानेका भय है । तब तो अपनी प माताओं, वहिनों और लड़कियोंको भी न रखिये; जन्मसे ही उनको मार दीजिये; क्योंकि इनके भी अपहरणका भय है । घर ( ५ ) ' विधवाएँ गुप्तरीति से अपनी कामवासना पूर्ण करने के लिए CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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७१६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) [ ७१५ तेजना भ्रूणहत्या गर्भपात आदि पापको भी करती हैं; तब उनका में पुनर्विवाह करके इन पापोंसे उनकी रक्षा क्यों न की जावे? ' विचार – जिस मतमें शास्त्रविरुद्ध- विधवाविवाहके करनेमें प पाप नहीं; उनके मत में भ्रूणहत्या ही पाप कैसे है? आजकल स्थिति- तो विवाहिताएँ भी सन्तानके बोझसे अपने संरक्षणार्थं भ्रूण-जावे? ' हत्याएँ कराती हैं - क्या यह पाप आपके मतमें सह्य है? उनका -प्रथाका भी विवाह तोड़ दीजिये । वे विधवाएँ गर्मिणी स्वयं तो होती किया नहीं; उसमें कृपा होती है दुष्ट पुरुषोंकी; तव आप उन्हींका दमन भांति करें । इस प्रकार तो सधवाएँ भी अन्य पुरुषोंसे गुप्तरूपसे - होंगी । सम्बन्ध कर रही हुई सुनी जाती हैं; क्योंकि - ' ईप्सितो हि गुणः और स्त्रीणामेकस्या बहुभर्तृ'ता ' ( महा. आदिपर्व २०४८ ); तब आप राके उनका भी अन्य पतिविधान क्यों नहीं आदिष्ट कर देते? वस्तुतः इधर- एतदादिक व्यभिचारको रोकनेमें दण्ड ही उपाय है, विवाह न्ड़ चुकी नहीं । यदि आप विवाहमें हत्याएँ देखते हैं; तो विधवा-? यदि विवाह में बालहत्या, युवकहत्या तथा वृद्धहत्याको क्यों नहीं शक्ति देखते; जिनका विवरण हम पूर्व कर चुके हैं । - अपना वस्तुतः विधवाओंके इन दोषोंमें कारण है- उनमें विधवा-न्द कर धर्मका अप्रचार । उन विधवाओंके ब्रह्मचर्य एवं पातिव्रत्यधर्म-अपनी पालनमें जो पारलौकिक स्वर्गादि लाभ शास्त्रोंमें लिखे हैं; उनको उन्हें सुनाकर इस विषय में प्रोत्साहन देना चाहिये । है । धर्मभङ्गसे जो नरकादि - दुर्गति शास्त्रोंमें वर्णित है; उनकी निकेलिए विभीषिका भी उन्हें समझावें; उन्हें स्वयं उत्तेजित न करें; तो CC - 0. Ankur Joshi Collection विवाविवाहकी उपपत्तियां [ ७१७ विधवा जीवनपर्यन्त खरी सिद्ध होगी । प्रतिपक्षी भी विधवा-विवाहकी अपेक्षा विधवाओंका ब्रह्मचर्य उत्तम मानते हैं । तब वे वैसी पुस्तकें क्यों नहीं बनाते? क्यों इस विषयके लैक्चर नहीं देते? क्यों नहीं उन्हें ब्रह्मचर्यार्थ प्रोत्साहन देते? ऐसा न करनेपर ही वे धर्मसे पतित हो जाती हैं । जैसे वादियोंके मतसे २५ वर्षसे पूर्व ब्रह्मचर्य रखना कठिन होनेपर भी लड़कों वा लड़कियोंको उक्त ब्रह्मचर्यैकेलिए वे प्रेरित करते हैं, उत्साहित करते हैं, उपदेश देते हैं, वैसा न करनेपर उनको गुरुकुलादिमें दण्ड-विधान करते हैं; वैसे विधवाओं को भी ब्रह्मचर्यकेलिए उपदेश दीजिये, और वैसा उद्योग कीजिये - जिससे वे धर्मपतित न होवे । ( ६ ) ' आर्यजातिकी संख्या घट रही है, उसमें कारण है कि-विधवाओंके विवाहकी मनाही होनेसे वे सन्तान उत्पन्न नहीं कर सकतीं । अथवा वे विधमंमें प्रविष्ट होकर शत्रुओंकी वृद्धि करके आर्य जातिकी संख्या घटा रही हैं । इस ह्राससे जातिकी रक्षार्थ क्यों न उनका पुनर्विवाह करके जातिकी संख्या वढाई जावे? ” विचार – आप जातिकी संख्याके ह्रासका बहाना करते हैं, और आपके सहवर्गी कहते हैं कि हमारी स्त्रियाँ ' वूमन फ्रेण्ड'-का सेवन करें, जिससे सन्तानों की संख्या न बढ़े । शासक कहते हैं कि - उत्पत्ति संख्या जिस प्रकार बढ़ रही है, वैसे भय है कि-उनके निवासार्थ भूमि मी पर्याप्त न होगी । अन्न भी पर्याप्त नहीं होगा । तब कालके बढ़नेपर फिर भी बहुतों का नाश होजानेपर संख्या घट जायगी । अब खेतोंके स्थानोंको घर ले रहे हैं; तव Gujarat. An eGangotri Initiative -
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७१८ | श्रीसनातनधमोलांक ( ८ ) नदियोंके जलका पूर्ववत् उपयोग न होनेसे उनमें बाढ़ें होंगी । उससे बहुतसे लोगोंका नाश होनेसे फिर संख्या समान होजाएगी । उत्पत्तिक्रम बढ़ जानेपर उनमें बीमारियोंका प्रकोप भी स्वाभाविक है । तब कहीं प्लेग आदिसे, कहीं भूकम्प से, कहीं आगसे, कहीं महायुद्धसे जनसंख्याके नाश होनेपर फिर वही संख्या सम हो जायगी । तब आपकी बात मानी जावे, वा वैज्ञानिकोंकी? आप लोग हिन्दु - वेश्याओंको बहुत - उत्पत्तिकेलिए क्यों नहीं प्रेरित करते? क्या इससे आपकी संख्या नहीं बढ़ेगी? यदि इसमें पाप देखते हैं; तो वैसे विधवाओंकी सन्तानोत्पत्ति-नियोजनमें आप पाप क्यों नहीं समझते? दोनोंमें शास्त्राज्ञा न होनेसे समान ही पाप है । स्त्रियाँ वस्तुतः सन्ततिकी उत्पत्ति नहीं चाहतीं; किन्तु आनन्द चाहती हैं; क्योंकि - प्रसवमें उन्हें बड़े कष्ट होते हैं; तब क्या अपनी जातिकी वृद्धयर्थ आपका स्वार्थ नहीं? जोकि - विधवाओंका विधर्म में जाना कहा जाता है; उसमें कारण है आवरण - प्रथाका त्याग, और स्त्रियोंको स्वतन्त्रता और पर - पुरुषोंसे मिलनेका अवसर देना । जब आप लोग एतदादिक सनातन प्रथाओंका विरोध करते हैं; तब क्या उसका फल न मिलेगा? विधर्म में तो विवाहिता - स्त्रियोंको भी जाता हुआ देखा गया है; तब क्या वैसी स्त्रियोंकेलिए भी दूसरे पतिका आन्दोलन आप चलाना चाहेंगे । ( ७ ) ' हिन्दु - वीर अपनी मृत्युके बाद अपनी स्त्रियोंके वैधव्यमें विधवाविवाहकी उपपत्तियां [ ७१६ उनकी भावी दुर्दशाके भयसे वीर कार्यों में भाग नहीं विधवाविवाहका अधिकार देकर क्यों न पुरुषोंका बीर - कार्यों लेते में । भाग लेनेका उत्साह बढ़ाया जाय? " विचार- पापीसे पापी भी किसी पुरुषकी इच्छा नहीं होती कि - उसकी मृत्युके पश्चात् उसकी स्त्री दूसरेसे संगम करे विधवाविवाहके इच्छुकोंका यह केवल व्याज ही है । इस । तब तो लड़कियोंको पैदा ही न कीजिये; या पैदा हुई लड़कियोंको मार दीजिये; क्योंकि आपके जीवनमें भी उनका चुराये जानेका डर होगा; अथवा आपके द्वारा भी उनकी दुर्दशाका भय होगा । इस प्रकार तो आप अपने विवाह ही रोक दीजिये; जिससे निश्चिन्त होकर आपको वीरताका जौहर दिखानेका अवसर मिले । ( ८ ) ' विधवा - विवाह न होनेसे पत्नी हीन पुरुष अयोग्य-अवस्थामें भी कुमारियोंके साथ विवाह कर लिया करते हैं; ऐसी अवस्थामें विधवा - विवाहकी आज्ञा देकर उन विधुरोंका विवाह .. विधवाओं से कराना चाहिये; जिससे दोनों स्त्री - पुरुष भी बढ़ें, और कुमारोंका अधिकार कुमारोंको मिले - जिससे भविष्य में विधवावृद्धिका मार्ग रुक जावे ' । विचार - जो विधवा विधुर - विवाह न करना चाहें; तब आप क्या करेंगे? जिस स्त्री जातिकी कामपूर्ति के लिए आपने मार्ग खोल दिया है; वही अपनी प्रचण्ड - कामाग्निकी शान्तिकेलिए कुमारको चाहेगी, क्योंकि विधुरोंमें प्रायः शीघ्रपतनादि व्याधि-वाले होते हैं, जो कि प्रज्वलित - कामाग्नि वाली विधवाओंकी CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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७२० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) तृप्तिकेलिए समर्थ सिद्ध नहीं होते; तब क्या आप यहाँ डाक्टरी-परीक्षा को भी आवश्यक रखेंगे? अथवा विवाहसे पूर्व उस विधवाको विधुरके साथ समागमकी आज्ञा मी एक घंटे के लिए दे देंगे? अथवा वह विधवा उस विधुरसे सन्तुष्ट न हो; तो क्या उसे अन्य पतिके विधानकी आज्ञा दे देंगे? | यदि वे ऐसा स्वयं न कहेंगी - ऐसा आपका विश्वास है; तो विवाह न करनेपर विधवाएँ भी तो आपके पास आकर वैसा न कहेंगी; तब आपकी विधवा - विवाह में प्रवृत्ति कैसे? क्या अपनी कामपूर्ति के लिए; वा उसके प्रचार - द्वारा वेतन मिल जानेसे अपनी उदर - वृत्तिके लिए यह प्रवृत्ति है ॥ ( १ ) ' वैधव्य में स्त्रीकी स्वतन्त्रतामें जैसे आचारके पतनका मय होता है, वैसे पराधीनता में उतना भय नहीं होता; तव पुनर्विवाह द्वारा उसको दूसरे पतिके अधीन करके क्यों न उसे · स्वच्छन्दविहारजन्य पापसे बचाया जाय? । ' विचार – यदि परतन्त्रतामें रहनेसे उसके पतनका भय नहीं, तो उसे शास्त्राज्ञासे पिता आदिकी परतन्त्रतामें क्यों नहीं रखा जाता? हम भी स्त्रियोंकी स्वतन्त्रता नहीं चाहते, और आप भी । फिर क्यों विधवाविवाहका प्रचार करके उसे स्वच्छन्द-चारिणी किया जाता है? यह सदाचार है - यह अनाचार है-यह शास्त्र बताता हैं; तब शास्त्रविरुद्ध विधवाविवाह करना भी तो चारका पतन है; इससे वह आचारके पातित्यमें और भी साहसंवती हो जायगी । CC - 0. Ankur Joshi Collection विधवाविवाहकी उपपत्तियां [ ७२१ ( १० ) ' विधवाविवाह प्रशस्त उपाय है यह हम मानते हैं; परन्तु जैसे पुरुषका पुनर्विवाह अप्रशस्त है, वैसे स्त्रीका भी । जैसे पुरुपका द्वितीय विवाह आठ विवाहोंमें नहीं है, वैसे स्त्रीका भी । तभी याज्ञवल्क्य ' अविप्लुतब्रह्मचर्यो लक्षण्यां स्त्रियमुद्वहन् । अनन्यपूर्विकां कान्तामसपिण्डां यवीयसीम ' ( ३५२ ) यहाँ ब्रह्मचारीका अविवाहितपूर्वांके साथ विवाह कहा है; तब पूर्व-विवाहित अब्रह्मचारीका अनन्यपूर्विका कन्यासे विवाह कैसे हो? इस प्रकार यदि पुनर्विवाह में क्षता और ब्रह्मचारिणी ली जाय; तो क्या दोष है? विचार — उक्त याज्ञवल्क्यके वाक्य में ' ब्रह्मचर्य ' का अर्थ ' विवाह ' अभिप्रेत नहीं; किन्तु गुरुकुल में ब्रह्मचर्य व्रतके समयमें उसका व्रत - स्खलन न हुआ हो, यह भाव है । इसमें अपरा टीका देखिये - उसका यह आशय है कि त्रह्मचर्य स्खलन होने पर तो उसका प्रायश्चित्त होता है, विवाह - निषेध नहीं । स्नातक होनेसे पूर्व स्खलन होनेपर अवकीर्णी - प्रायश्चित्त होता है । उसके बाद साधारण प्रायश्चित्त होता है । विवाहित होनेपर तो पुरुषका स्त्रीकी मृत्युमें सन्तानादि न होनेपर पुनर्विवाह होता ही है । जैसे कि मनुने लिखा है- ' भार्यायै पूर्वमारिण्यै दत्त्वाऽग्नीन् अन्त्यकर्मणि । पुनर्दारक्रियां कुर्यात् पुनराधानमेव च ' ( ५।१६८ ) । इस कारण उक्त वचनमें ' अविप्लुत ब्रह्मचर्य ' शब्दका ' गुरुकुल में मैथुनादि - रहित ' अर्थ है, ' अविवाहितपूर्व ' नहीं यह स्पष्ट है । इसलिए याज्ञवल्क्यस्मृतिमें उक्त श्लोकसे पहले यह लोक मिलता Gujarat. Angalo ६० initiative
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७२२ ] श्रीसनातनधर्मालांक ( ८ ) है- ' गुरवे तु वरं दत्त्वा स्नायीत तदनुज्ञया । वेदव्रतानि वा पारं नीत्वा ह्युभयमेव वा ' ( ३।५१ ) यहाँ ब्रह्मचर्यव्रतका पार करके स्नातकत्वकी आज्ञा दी है । यहाँ ' अविवाहितत्व ' अर्थ नहीं घटता; क्योंकि यह वर्णन गुरुकुलसे आये हुए का है । उससे आगे पद्यमें भी यही अर्थ है । इस प्रकार मनुस्मृति में भी कहा है- ' वेदानधीत्य वेदौ वा वेदं वापि यथाक्रमम् । श्रविप्लुत-ब्रह्मचर्यो गृहस्थाश्रममाविशेत् ' ( ३।२ ) इसका अन्वय यह है कि-अविप्लुतब्रह्मचर्यो वेदान् वेदं वा अधीत्य गृहस्थाश्रममाविशेत् ' । तब यहाँ गुरुकुलबास - कालीन ब्रह्मचर्यकी ही अप्लुतता इष्ट है । यदि मनुको भी विवाहित पुरुषके पुनर्विवाहकी आज्ञा अनभीष्ट होती; तब वे ' पुनर्दारक्रियां कुर्यात् पुनराधानमेव च ' ( मनु. ५।१६८ ) ' वन्ध्याष्टमेऽधिवेद्याऽब्दे ' ( ६८१ ) इत्यादि आज्ञाएँ न देते । ‘ अन्योन्यस्याव्यमीचारो भवेदामरणान्तिकः ' ( ६।१०१ ) इस मनुपद्यकी टीकामें मेधातिथिने पूर्वपक्षको उपक्षिप्त करके समाधान किया है- ' स्त्रीवत्पुरुषस्य अनेकभार्यांपरिणयनं न स्यात्; तद् अयुक्तम्; अस्ति तत्कृते वचनम् - ' कामतस्तु प्रवृत्तानाम् ' ( मनु. ३।१२ ) ' वन्ध्याष्टमेऽधिवेत्तव्या ' ( ६१ ) इति, न तु स्त्रियाः । तथा च लिङ्गान्तरं स्याद् - ' एकस्य बढ्यो जाया भवन्ति नैकस्या वहवः सह पतयः ' इति । फलतः उक्त याज्ञवल्क्यके वचनमें यथावत् ब्रह्मचर्य व्रतके पालनेवाले पुरुषका अनन्यपूर्विकाके साथ विवाह कहा है । इससे पुरुषके पुनर्विवाह में तो वाधा नहीं आती, परन्तु स्त्रीके पुनर्विवाह-CC - 0. Ankur Joshi Collection विधवाविवाहकी उपपत्तियां [ ७२३ में तो स्पष्ट बाधा है; क्योंकि आक्षेप्ता गो ० राधाचरणने ' अनन्यपूर्विका ' का अर्थ ' जिस स्त्रीका पहले विवाह भी न हुआ हो ' यह अर्थ अपनी पुस्तक ‘ विधवाविवाह - विवरण ' में किया है । तब उसका पक्ष स्वयं ही खण्डित होगया । पुरुषका ' ब्रह्मचर्य ' शब्द ' गुरुकुलात में अक्षतवीर्यता ' बतलाता है, विवाह में अक्षत-वीर्यता नहीं बताता, नहीं तो पुरुषोंके पुनर्विवाह वचनोंका विरोध हो जाय । ( ११ ) जिसका हृदय विधवात्वको प्राप्त नहीं हुआ, जो हृदयसे विवाहेच्छुका है, उसके शरीरको व्यर्थ दिखलाकर जबर्दस्ती यन्त्रणामें क्यों रखा जाय? जैसेकि - बहुत सी स्त्रियाँ हिस्टीरिया, सिरदर्द, राजयक्ष्मा आदि रोगोंकी शिकार होकर कष्टसे मरती हैं । जिन्होंने कुलकी लज्जा छोड़ दी है, वे विधर्मियोंके शरण जाकर हमारी शत्रु - सन्तान पैदा कराके हमारे क्षयका कारण बनती हैं । विचार — हिस्टीरिया, सिरदर्द, राजयक्ष्मा आदि रोग तो सधवाओंको भी हुआ करते हैं; इसमें एकमात्र कारण वैधव्य ही कैसे हो? हिस्टीरियामें कारण आन्तरिक दुर्बलताका होता है । कुमारावस्था में, वा विवाह में वा वैधव्यमें वे समान रूपसे होते हैं । उनके हृदयकी बात तो क्या पूछनी । वे तो सधवात्वमें भी को चाह सकती हैं । तब क्या आप भी उनके लिए धर्म-मर्यादा तोड़कर वैसा नियम बना देंगे? यदि नहीं बनायेंगे; तव आप भी उनकी मनचाही सभी सुविधाएँ उन्हें क्यों नहीं देते? Gujarat. An eGangotri Initiative
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७२४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) क्या यह आपकी उनकी हितैषिताका आदर्श है? | यदि आप यहाँ उनका दमन करते हैं; इस प्रकार यदि सनातनधर्मी भी उनका दमन करते हैं; तब उनकी ही निन्दा क्यों? विधर्मियोंके पास उनके जानेका कारण भी प्रतिपक्षी ही हैं; वे वरणप्रथा ( पर्दा ) का खण्डन करते हैं, अक्षर- शिक्षा के बहाने उनमें शृङ्गार, विशेष- विशेष वेषका शौक, और अन्य कुसंस्कारों को भी डालते हैं, उनकी परतन्त्रताका विरोध करते हैं; उनके धर्मभावकी वृद्धि न करके उनकी उत्तेजनाके कारण बनाते हैं । दुष्ट शिष्य कठोर नियमका पालन न करना चाहे, उनकेलिए क्या आप अध्यापक होकर विद्यालयकी व्यवस्था तोड़ देंगे? रोगी आपका लड़का अपथ्य - सेवन करना चाहे, क्या आप उसका दमन न करेंगे? गन्दे फोड़ेवाला पुरुष उसके ऑपरेशनकी पीड़ा सहने में अपनी अनिच्छा दिखलावे, आँखका रोगी अपनी आँखमें सुई डालने में अपना दुःख प्रकाशित करे; तब क्या आप उनकी वार्ते मानकर वैसा ही कर लेंगे? जबकि शास्त्रमें विधवाविवाहका निषेध है; उसके अवलम्बन कर लेनेपर सती स्त्रियोंके भी दुश्चरित्रा हो जानेका भय है, अन्य बहुत सी धार्मिक - शृङ्खलाओंके टूटनेका भय है; तब क्या उस ( विधवा-विवाह ) का अवलम्बन कभी ठीक हो सकता है? जिससे सती और व्यभिचारिणीकी विशेषता न रहे; वह भी नियम क्या आपके मतमें ठीक है? फिर भी यदि प्रतिपक्षी इस विषय में दुराग्रह नहीं छोड़ना चाहते; तो यह उनकी अदूरदर्शिता ही है । CC - 0. Ankur Joshi Collection विधवाविवाहकी उपपत्तियां [ ७२५ या शास्त्रके उल्लङ्घनका साहस है, या प्राचीनतासे द्वेष है । वस्तुतः सतीत्व अन्य देशकी अपेक्षा भारतका गौरवास्पद है । यहीं सीता, सावित्री, अनसूया यदि पतिव्रता स्त्रियोंने जन्म लिया । यहींकी सतियाँ ही आत्मबल, चारित्र और श्रादर्श नारी - धर्म के अक्षुण्ण गौरवको प्रतिष्ठापित करनेवाली वनीं । क्या विधवाविवाहके प्रचलित करनेपर फिर यहाँ वैसी देवियाँ अवतीर्ण होंगी? पुनर्भू - स्त्रियोंका सतीत्व आकाशके पुष्पकी ही मांति होगा । हमारा देश स्वतन्त्र होता हुआ भी अंग्रेजी-सभ्यताके परतन्त्र है । शूरता इसमें नहीं है, न ही श्रात्मवल वचा हुआ है । अवशिष्ट महिलाओंका सतीत्व ही हमारे देशकी अतुल सम्पत्ति है, और वही हमारे देशको बचाये हुए है । अवशिष्ट इस हमारे देशगौरवरूप स्त्री - सतीत्वका विधवाविवाहके सिद्धान्तके मूल्यमें बेचना क्या ठीक है? क्या किसीके पास स्थित रत्नोंके वीचमें छः के चुराये जानेपर सातवें रत्नका भी समुद्रमें डाल देना क्या ठीक होगा? स्त्रियाँ अवला होती हैं-यह जानकर पुरुष उनके पास ठहरे हुए देदीप्यमान सतीत्व रत्न-को अपने स्वादार्थ छीनना चाहते हैं, जिसके प्रभाव से उन महिलाओंने अपने पतिको अमर कर दिया था । यदि पुरुष स्त्रियोंके शुभाभिलाषी हैं, तब स्वयं वे संयमी होकर विधवाओंको भी सुशिक्षा द्वारा सदाचार और हृढ - चित्तताकेलिए क्यों नहीं उपदेश देते? आजकल भी विधवाओं में देवीतुल्य सदाचार-वाली जो दीखती हैं, विधवा - विवाह प्रचालित कर देनेपर वे Gujarat. An eGangotri Initiative
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७२६ ] श्रीसनातनधर्मांलोक ( 5 ) भी सुनने में भी नहीं आवेगी, दर्शन तो उनका दूर रहा । पुराणों में जिनका चरित्र पढ़कर आज भी श्रद्धासे जिनके चरणोंमें गिरनेकी इच्छा होती है, विधवा - विवाहसे उनके चरित्रपर विश्वास भी क्या किसीका रह जाएगा? खेद, जो विधवाएँ प्रसन्न मुखकमल वाली मृतक पतिके शवको गोदमें रखकर जलती हुई चिताग्निको मलय - चन्दनकी भांति सुखप्रद मानकर उसका आलिङ्गन करती थीं; जो अपने सतीत्वकी रक्षार्थ जौहरव्रत के अनुष्ठानमें पृष्ठपद न होती थीं; इस क्षुद्र - युग में भी जहाँ - तहाँ अपने सतीत्वकी महिमाको दिखलाकर जो पाश्चात्य सभ्यताभिमानी पुरुषोंको भी चकित एवं स्तब्ध कर दिया करती हैं, उन्हींको परपुरुषसे आलिङ्गनको उपदेश देना कितना भीषण कार्य है, अपने विवाहके अवसरमें पतिसे अतिरिक्त पुरुषोंको पुत्र, भाई, पिता रूपसे देखनेकेलिए जो प्रतिज्ञा कर चुकी हैं, उन हिन्दु-ललनाओंको पतिकी मृत्युके बाद अपने भ्राता - पुत्र आदियोंको ही पति बनानेका विचार करवाना भी कितना पातकप्रद सिद्ध हो सकता है? तव वे विवाहिता विधवाएँ दूसरोंको भी भ्राता वा पुत्रकी दृष्टिसे कैसे देखेंगी? तब तो वे समझ सकेंगी कि-अब हमारा कोई भी भ्राता नहीं; जिसे चाहें मर्ता बनावें । वस्तुतः पाश्चात्यभोग- मृगमरीचिकासे उपहत- दृष्टिवाले ये वेचारे त्याग, संयमरूप धर्मको पाखण्ड समझते हैं; उनसे अन्य आशा क्या हो सकती है; अतः ऐसे पुरुषोंका ही दमन और - धिक्कार होना चाहिये । CC - 0. Ankur Joshi Collection विवाहोच्छेदपर विचार [ ७२७ ( २४ ) विवाहोच्छेद ( तलाक ) पर विचार । ' न निष्क्रय - विसर्गाभ्यां भर्तुर्भार्या विजानीमः प्रमुच्यते । एवं धर्मं प्राकू प्रजापति निर्मितम् ' ( मनु. ६१४६ ) विक्रय त्यागसे स्त्री पतिसे नहीं छूट सकती, ऐसा पूर्वसे वा रचा हुआ नित्य - धर्म हम जानते हैं, श्री तुलसीराम स्वामी प्रजापतिका ) ( १ ) विधवाओंसे की जाती हुई भ्र राहत्याओंको सुधारक लोग उनके बचावकेलिए शास्त्रोंकी पर्वाह विचार कर न करके उनकी कामपूर्तिकेलिए, अथवा यों समझना चाहिये कि - पुरुष समाजकी कामपूर्ति के लिए ' विधवाविवाह ' नियमित करते हैं । सनातन-धर्मियोंके विरोध करते हुए भी वह विधवा - विवाह आज - कल प्रायः चालू हो गया है, अब बुरा नहीं समझा जाता; विधवा-विवाह चालू करनेपर सुधारकोंको सधवा विवाह भी चलाना पड़ेगा । यदि वे उसे नहीं चलाएँगे; तो विधवाविवाह न चलाने-पर तो वे भ्रूणहत्याका हौवा दिखाकर विधवाविवाहके प्रचारमें सफल होगये, किन्तु सधवाविवाह के न चलानेपर तो बूढ़ोंकी, युवकोंकी तथा बच्चोंकी हत्या भी प्रारम्भ हो जाएगी ( इसे आगे स्पष्ट किया जाएगा ), उसीके समीकरणार्थ कि यह हत्याएं न हो जावें, सुधारकोंने विवाहोच्छेद जारी किया है । आजकलका विवाह - विच्छेद ( तलाक ) उसी विधवाविवाहका दुर्विपाक है, अथवा यह कुमारियोंकी अधिकवयस्कतामें विवाह करनेका दुष्परिणाम है; क्योंकि इन दोनों विधानोंका अभिप्राय है काम-पूर्ति | जब इस प्रकार स्पष्टतासे निर्लज्जता फैलाई जाती है, तब Gujarat. An eGangotri Initiative