सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 381–390
सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 381–390
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७२८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) जो कामुकी विवाहित स्त्रियाँ उन अपने वृद्ध पतियोंसे अथवा शीघ्रपतन वाले युवक पतियोंसे अपनी कामपूर्ति होती नहीं देखेंगी; तब वे उन पतियोंको विष - प्रयोगसे अपनेसे पृथक् कर दिया करेंगी कि — हम जीते जी तो उन वृद्ध वा शीघ्रपतन वाले युवक पत्तियोंको छोड़ नहीं सकतीं; अतः उन्हें गुप्तरूपसे मार दें; जिससे हम विधवा होजाएं; और हमें अन्य पतिसे विधवा-विवाहका अधिकार प्राप्त हो जाए । अथवा यदि वे सन्तानवती भी होती हैं; तो उस शीघ्रपतनवाले पतिसे सन्तुष्ट न होकर वे सोचेंगी; कि - पतिको मारकर भी हम सन्तान होनेसे अन्यसे विवाह न कर सकेंगी; अतः हम उन सन्तानों को भी मार दें! जिससे सन्तानके लिए पुनर्विवाहका बहाना बन सके | अथवा वे फिर स्वयं ही उस अपने पतिके घरसे किसी अन्य प्रेमीके साथ भाग जाया करेंगी? इस हानिके सुधारार्थ सुधारकोंने निर्लज्जता-जिसका दूसरा नाम कहा जा सकता है - ऐसा विवाहविच्छेद नियम बनाया, या बनवाया । इस नियमके प्रचालनका मूल-कारण विधवाविवाह है; जैसे कि हम पहले सूचित कर चुके हैं; और दूसरा कारण है विवाह - संस्कारकी परिभाषाको ढीला कर देना । सनातनधर्म की दृढ़ विवाहकी परिभाषाकी शृङ्गखलाको जब सुधारकोंने विधवा विवाह आदि द्वारा ढीला कर दिया; तब उस शृङ्खलाका यत्र - तत्र टूट जाना स्वाभाविक ही था । उसीका परिणाम यह विवाह विच्छेद है! अब हम उसकी अशास्त्रीयता संक्षेपसे दिखलाकर उसकी लौकिक हानियां भी दिखावेंगे । CC - 0. Ankur Joshi Collection विवाहोच्छेदपर विचार [ ७२ ९ ( २ ) ऊपर हमने पहले - पहल सकलस्मृतिमूर्धन्य प्रमाण इस विषय में दिया है कि - स्त्रीका तलाक मनुस्मृतिका इसीका मूल वेदका एक मन्त्र नहीं हो सकता । मायुर्व्यश्नुतम् मी हे ' इहेव स्तं मा वियोष्टं विश्व-। क्रीडन्तौ पुत्रैर्नप्तृभिर्मोदमानौ १०८५४२, अथर्व स्वे गृहे ' ( ऋ. सं ० आपसमें १४ | ११२२ ) ( ऐ पति - पत्नियो, तुम लोग इकट्ठे रहो; परस्पर विच्छिन्न न हो जाओ; सारी ( जितनी उसमें नियत है ) इस आश्रम में श्रायु पौत्रोंसे खेलते हुए अपने इकट्टी बिताओ । पुत्र-यदि इसमें इसी घरमें रहो । यह वेदकी आज्ञा है । प्रतिकूलता की गई; और विवाहकी शृङखलाको विच्छिन्न कर दिया गया; तो स्त्री जाति उच्छृखल स्त्रीजाति विशेषतः उच्छृङ्खलताप्रिय हो जाएगी । है- ' पौश्चल्याच्ञ्चलचित्ताच्च है; जैसे कि मनुजीने कहा नैःस्नेह्याच्च स्वभावतः । रक्षिता यत्नतोपीह भर्तृष्वेता विकुर्वते ' ( ६।१५ ) शय्यासनमलङ्कारं मनार्जवम् | द्रोह्रभावं कुचर्यां च स्त्रीभ्यो कामं क्रोध-यत् । ( ६।१७ ) ' नैता रूपं परीक्षन्ते मनु- ( प्रजापति- ) रकल्प-नाऽऽसां वयसि संस्थितिः । सुरूपं वा विरूपं वा पुमान् इत्येव भुञ्जते ( १४ ) । इनके अर्थकी आवश्यकता नहीं । यह सुगम पद्य हैं । ( ३ ) यही वात कौटलीय अर्थशास्त्रमें भी सूचित है - ' न समाधिः ( चित्तस्थैर्यं ) स्त्रीपु, लोकज्ञता की गई च ' ( चाणक्यसूत्र ३६१ ) । स्त्रीणां मनः क्षणिकम् ' ४७६ ) अर्थात् स्त्रियोंका चित्त स्थिर नहीं होता, इस प्रकारके वहुतसे उद्धारण दिये जा सकते हैं । इनके मूलभूत ' स्त्रिया अशास्यं मनः ' ( ऋ. ८ । ३३ । १७ ) ' न वै Gujarat. An eGangotri Initiative
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७३० ] श्रीसनातनधर्मांलोक ( ८ ) सख्यानि सन्ति, सालावृकारणां हृदयान्येता ' ( ऋ. १० । स्त्रैणानि ६५ । १ ) इत्यादि वेदके वचनोंका अनुशीलन कर लेना चाहिये । सर डा ० राधाकृष्णन्ने ' धर्म और समाज ' में पृ. १७१ की टिप्पणी में इनकी यह व्याख्या की है- ' स्त्रियोंके साथ प्रीति नहीं हो सकती । इनके हृदय बघेरोंके हृदयोंके समान होते हैं " ' स्त्रीके मनको संयममें नहीं रखा जा सकता ' । इस प्रकार अन्य बहुत वचन मिलते हैं - ' योषा जारमिव प्रियम् ' ( ऋ. १ । ३२ । भी ५ ) ' जारं न कन्या ' ( ऋ. ६५६ ३ ) इत्यादि । जब ऐसा है; तो स्त्री जाति पर कुछ बन्धन रखना ही पड़ता है, उन्हें पर - तन्त्र रखना ही चाहिये । जैसे रुग्ण मनुष्यको वैद्य पध्यके अनुसरणका आदेश दे; यदि वह उसपर पूरा निरीक्षण न करे; तो रोगीका मन अपथ्यके खानेकेलिए लालायित रहा करता है, वैसे ही नारी समाज भी अपने नियत धार्मिक नियमोंको बन्धन अनुभूत करता हुआ उन वन्धनोंको तोड़नेकेलिए चेष्टा करता है । आजका नारीभक्त पुरुष-समाज भी उनसे सहानुभूत्यर्थ राजकीय - विधानसभाओंमें नारियोंके अभीष्ट विधानोंको अपने सहवर्गियोंके वोटोंके बलसे उपस्थित करता है बिना ही जनताकी सम्मति, तथा बिना ही धर्मशास्त्रमर्मज्ञ विद्वानोंकी व्यवस्था प्राप्त किये, और बिना ही भविष्यका विचार किये, उन नियमोंको वह सुधारकसमाज पास करानेकेलिए बहुत प्रयत्न करता है, उससे अपनी बहुत बहादुरी वा नामप्रसिद्धि समझता है । CC - 0. Ankur Joshi Collection विवाहोच्छेदपर विचार | ७३१ ( ४ ) अब नारियोंको स्वतन्त्रता प्राप्त होजानेपर अत्याचार बढ़ेंगे, यह समझ लेना चाहिये । — गृहस्थाश्रममें क्या - क्या जब कि पिताका पुत्रसे, वा माताका पुत्रसे विवाद जब कभी करता है जो आत्मज है, तब पति - पत्नी में कभी विवाद होजाया सम्भव नहीं । प्रणयमें कलह भी सम्भव हो न हो - यह दम्पतियोंमें परस्पर मान भी हो जाया जाया करता है, करता है । शिक्षार्थ अपव्यय हटवाने के लिए, सम्बन्धियोंके असमय में भी भोजनादि, द्वारा मानसत्कारार्थ, और अपनी सेवाकेलिए स्त्रीको वा करना पड़ जाता है, -लौकिक और सामाजिक कुरीतियोंमें स उसका दमन भी करना पड़ जाता है परपुरुषके पास आने - जानेसे, स्वतन्त्रगमनसे तथा स्वेच्छाचारसे भी स्त्रीको रोकना पड़ता है, जैसा कि सनातन काल से यह होता था रहा है । उस समय स्त्री उस प्राचीनकाल में उसे शास्त्रीय परतन्त्रताके कारण वा धर्ममय से सहन कर जाती थी; परन्तु आज स्त्री सुधारकोंसे दिये हुए स्वा-तन्त्र्यको प्राप्त करके, नर - रक्त के आस्वादको पाकर शेरनीकी भान्ति मस्त होकर इन नियन्त्रणोंको कैसे सहे? नियन्त्रण करने पर तो वह गर्जती है । रोकने पर वह शीघ्र विवाहोच्छेद करके पतिसे पृथक् हो जाएगी, और अपने पति पर अपने मन चाहे दोष लगा सकेगी कि- ' मेरा पति परस्त्रीगामी है, वेश्यासे सम्बन्ध रखता है, शराबी है, ज्वारी वा अत्याचारी है, नपुंसक है, वा शीघ्रपतनके दोषवाला है ' - इत्यादि इसे गतनिबन्धमें देखें । कोई भी सुधार Gujarat. An eGangotri Initiative
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७३२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) समिति वा अदालत आजकल पाश्चात्य संस्कृति के मानसिक दास्यके कारण अथवा सुधारकोंके मोहक वचनोंके प्रभावसे स्त्रीके विरुद्ध नहीं चल सकती; क्योंकि स्त्री है मोहक वस्तु । मोहक वस्तु होने से ही उनकी सुविधार्थ शास्त्रोंसे अननुशिष्ट ( निषिद्ध ) सुविधाएं उन्हें दी जाती हैं; वा देनेका प्रयत्न किया जाता है; उन मानुषियोंको ' देवी ' शब्दसे भी कहा जाता है । उक्त आरोपित दोषोंकी प्रत्यक्ष परीक्षा ही कैसे की जा सकती है? तीन - चार वर्ष तक स्त्रीको यदि सन्तान न हो; तो - वह नपुंसक न होता हुआ भी नपुंसकताके सर्टिफिकेटको प्राप्त कर ही लेगा । शीघ्रपतनकी तो परीक्षा ही कैसे की जा सकती है? तब अन्य पुरुपको चाहने वाली स्त्री उस अन्य पुरुषकी सिख-लाहट से अपने पतिपर इन दोषोंमें कोई दोष लगाकर उससे अपना विवाह विच्छेद कर लेगी । ( ५ ) इधर प्रत्येक सुन्दर पुरुष दूसरे साधारणरूप वाले पुरुषकी सुन्दर स्त्रीको कई प्रकारके प्रलोभन देकर उससे तलाक दिलाकर उसे अपने काबू कर लेगा । तब उसे भोगकर ' नयेके नौ दिन ' इस न्यायसे उसके आनन्दके समाप्त होनेपर उसमें कोई दोष लगाकर उससे विवाहविच्छेद कर लेगा । इस प्रकार स्त्रियां अपने पतिके जीते जी परपुरुषोंके साथ स्वच्छन्दतासे घूम - फिर भी सकेंगी; अथवा उनके घर बेरोकटोक आ - जा भी सकेंगी । यदि पति उनको न रोके, तो समाजमें लाञ्छनका भय रहता है, और ' व्यभिचारेण वर्णानामवेद्यावेदनेन च । स्वकर्मणां CC - 0. Ankur Joshi Collection विवाहोच्छेदपर विचार [ ७३३ च त्यागेन जायन्ते वर्णसङ्कराः ' ( मनु. १०।२४ ) ' संकरो नरकायैव ' ( गीता - ११४२ ) इस प्रकार वर्णसङ्कर - सन्तान उत्पन्न होने की आशंका रहती है । यदि उन स्त्रियोंको उधरसे रोका जाए तब उन्हें यदि यह नापसन्द हो; तो विवाहविच्छेदका भय उपस्थित रहेगा । ऐसा होनेपर शोचनीय बहुतसे हत्याकाण्ड होजाएंगे स्त्री - पुरुषोंकी प्रतिदिन हत्या होजाया करेगी ॥ शतशः 1 जव स्त्री असत्य दोषारोप करके अपने पतिसे विवाहोच्छेद करके दूसरेकी होजावेगी; तब उसके पहलेके पति उस स्त्रीके वा उसके वर्तमान दूसरे पतिकी हत्याकेलिए प्रयत्न करेंगे । इस प्रकार गृह कलह वा मरणमय उग्ररूप धारण करेगा । यदि पिता अपने पुत्रको पढ़ानेकेलिए उसे अध्यापककी ताड़नासे स्वतन्त्र न करके उसे मूर्ख नहीं बनाया चाहता, बल्कि उसे दण्डित करवाके उसे योग्य करना चाहता है; वैसे ही यदि कोई पुरुष अपनी स्त्रीके दोषोंको दूर करनेकेलिए उसे दण्ड दे; तो इसमें क्या दोष है? उसमें विवाह विच्छेदका काम ही क्या? इस प्रकार विच्छेद करनेपर तो बड़ी हानियां घटेंगी । जैसेकि - यूरोपमें सुना जाता है कि किसी स्त्रीने बिना आज्ञाके चुम्बन करने वाले अपने पतिसे विवाहविच्छेद कर लिया । किसी स्त्रीका पति इञ्जन- ड्राइवर था । खीने कहा- मुझे इसके शरीरसे कोयलेकी दुर्गन्ध आती है, जिससे मुझे सिरदर्द हो जाता है, और स्वास्थ्य में हानि पड़ती है । उसका विवाहविच्छेद भी स्वीकृत होगया । इस प्रकार स्त्रीसमाजकेलिए विधवाविवाह-Gujarat. An eGangotri Initiative
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७३४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) की भान्ति ' तलाक ' की प्रथाका निर्माण भी उनका व्यभिचार बढ़ानेवाला ही है । भगवान् श्रीरामचन्द्रने कौशल्याके व्याजसे स्त्रियोंको शिक्षा दी थी कि - ' भर्तुः पुनः परित्यागो नृशंसः केवलः स्त्रियाः । स भवत्या न कर्तव्यो मनसापि विगर्हितः ' ( वाल्मी-२ | २४ | १२ ) यावज्जीवति काकुत्स्थः पिता मे जगतीपतिः । शुश्रूषा क्रियतां तावत् स हि धर्मः सनातनः ' ( २ | २४ | १३ ) ( भर्ताको छोड़ देना स्त्रीकेलिए बहुत निर्दयतापूर्ण व्यवहार है । वह निन्दित होता है, उसे मनसे भी नहीं करना चाहिये । जब तक मेरे पिता ( तुम्हारे पति ) जीते हैं, तब तक उनकी सेवा करो । यह सनातन-धर्म है ) । ( ६ ) जिस - जिस देशमें तलाकप्रथा जारी हुई, उस - उस देशमें, वा जातिमें व्यभिचार वा अत्याचार वा भीषण हत्याओं, वा मुकदमोंका बाज़ार गर्म हुआ; यह यूरोप - अमेरिकादिमें देखा - सुना जा सकता है । शान्ति वा मुकदमाबाज़ी बढ़ जानेसे अपना धन वकीलों वा राज्याधिकारियोंके पास जाता है । यदि स्त्रियां तलाक करेंगी; तो पुरुष उनसे भी बाज़ी मार ले जाएंगे । यदि किसीकी स्त्री वन्ध्या हो, वा दुराचारिणी या अन्धी हो, तो पति उससे विवाहविच्छेद करके अन्य स्त्रीको क्या न कर लेगा? जब सुधारक लोग अपने धार्मिक क्षेत्रकी व्यवस्था ही नहीं जानते; तब क्यों इस विषय में अपनी चोंच डालते हैं? बिच्छूके मन्त्र तकको न जानते हुए भी वे सांपके बिलमें हाथ डालना चाहते हैं । यदि पुरुष समाज ही तलाक वाली स्त्रियोंके ग्रहण में अपनी विवाहोच्छेदपर विचार ७ [ ७३५ प्रतिष्ठा जानकर उनसे घृणा करने लग जाए, तब स्त्रियोंकी ज क्या - क्या दुर्गति नहीं होगी? यदि स्त्रियाँ ही विवाहविच्छेद करेंगी; तो क्या उनके पति म भी तरह - तरह के बहाने बनाकर उनसे विवाहविच्छेद करके उनको निराश्रय न कर डालेंगे क्या? तब तो वे अन्धी, बांग, ख कुछ समयसे रोगी, कुरूप, शीतला आदिसे विकृताकार हो गई हुईं स्त्रियोंसे विवाहविच्छेद कर ही डालेंगे; तब उन्हें कौन लेगा? न इस प्रकार अनेक स्त्रियां आश्रयहीन हो जाएंगी । तब क्या वे वेश्यावृत्तिको स्वीकार नहीं करेंगी? तब क्या वे विधर्मियोंके जा चंगुल में फंसकर हमारी जातिके क्षयमें कारण नहीं बनेंगी? इ ( ७ ) विवाहविच्छेद होनेपर स्त्रीका पर पुरुषसे वा पुरुषका परस्त्रीसे पुनर्विवाह होजानेपर पहलेके शिशु अनाथ हो जाएंगे! जा मातृभाव और पितृभाव क्रमशः नष्ट होगा । ऐसा होनेपर शिशु- स की दुर्दशा हो जाएगी । विवाहविच्छेदके कानून होजानेपर स वह केवल स्त्रियोंकेलिए नहीं; पुरुषोंकेलिए भी होगा । इस प्रकार ज अधिक हानि स्त्रीजातिकी ही होगी; क्योंकि भारतमें आज मी धर्मबन्धनवश स्त्रीजातिका पुरुषजातिकी अपेक्षा बहुत न्यून पतन क हुआ है । तब वे स्त्रियाँ पतियोंसे विवाहविच्छेद कम करेंगी; ज परन्तु पुरुष बहुत करेंगे । इस प्रकार स्त्रियोंकी हानि होनेपर सबकी हानि होगी । ज यदि आरम्भसे ही पति - पत्नींके मनमें यह धारणा बद्धमूल य जाएगी कि - जब हम चाहेंगे; तब हमारा सम्वन्ध विच्छिन्न हो CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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७३६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) जाएगा, तब देह और मनकी शुद्धता रखना श्रतिकठिन हो जायगा । तब कौन किसके शिशुओंको पालेगा? तब प्रेम वा ममता नाममात्रको भी नहीं रहेगी । प्रेममें त्याग होता है; उत्सर्ग होता है, बलिदान होता है, परन्तु काममें विषयविलास लुब्धता, स्वार्थ - परायणता, तथा निर्दयता हुआ करती है । जहाँ अपने इन्द्रियोंकी सुखकी लालसा है, जहाँ कामुकता है, वहां प्रेमका नाम कैसे हो सकता है? पशु - पक्षियों में इसीलिए प्रेम नहीं होता कि उनमें दाम्पत्य क्षणिक - भोगलालसाकी पूर्ति में समाप्त हो जाता है । कबूतर कबूतरीसे संयोगके बाद उड़ ही तो जाता है । इसलिए कामको पाशविक वृत्ति कहा जाता है । मनुष्यमें प्रेम है, विवाह प्रेमका मूर्तिमान् स्वरूप है । परन्तु जहां विवाह विच्छेदकी बात है; वहां तो मनुष्यके पशु बनने की सूचना है । विवाहमें जहाँ विच्छेदकी भावना आ जाती है, उस समय नर - नारीका पवित्र एवं मधुर सम्बन्ध जघन्य एवं कटु हो जाता है । तब मनुष्य और पशुमें कोई भेद नहीं रह जाता । विवाह विच्छेदकी प्रथाका चलाना मानवताको मारकर उसको कुत्ते कुतिया के रूप में परिवर्तित कर देना है । हिन्दु - विवाहसंस्कारमें पति - पत्नीकी यह निश्चित धारणा हो जाती है कि हमारा यह सम्बन्ध सर्वथा अविच्छेद्य है, इसका जन्म - जन्मान्तरमें भी विच्छेद नहीं हो सकता, अतएव कारणवश यदि कभी आपस में मतभेदवश कलह भी हो जाता है; तब वह चिरकाल तक नहीं रहता । त्याग, क्षमा, सहिष्णुता, धैर्य आदि CC - 0. Ankur Joshi Collection, विवाहोच्छेदपर विचार [ ७३७ विशेषरूपसे धार्मिक चित्तवृत्ति दोनोंके कलहको शीघ्र कर दिया करती है; इस प्रकार प्रेम अक्षुण्ण शान्त थोड़ा - सा कलह रविवारके अवकाशकी रहता है । वह मांति प्रेमको और भी बढ़ाने वाला हो जाता है । जीवनमें दुःखके दिन अधिक काल नहीं रहते; क्योंकि कुछ समय बाद पति - पत्नीको चापसमें मिलनेकी इच्छा उत्पन्न हो जाती है । यदि सच कहा जावे, यही थोड़े समयका मनमुटाव वा विघटन उन दोनोंके प्रेम वा संघटन-को दृढ करने वाला होता है । जैसे कभी - कभी होगया हुआ बुखार स्वास्थ्यको और भी बढ़ा देता है । इसे साप्ताहिक वा पाक्षिक अवकाशकी मान्ति समझना चाहिये, उसमें पुरुष आराम कर लेता है । हम दोनों जीवन सङ्गी हैं, इस धारणाकी दृढतावश दोनोंका आपसमें प्रेम फिर सुदृढ हो जाता है । अवकाश प्राप्त होनेपर क्रोध आदि का वह आवेग शान्त हो जाता है; परन्तु यदि विच्छेदका द्वार खुला रहेगा; तब आवेश आनेपर फट सम्बन्ध विच्छिन्न हो जावेगा । उस समय जैसे तीर छूट चुका हो, फिर उसका वापिस लौटाना नहीं हो सकता; वैसे यहाँपर भी केवल पश्चात्ताप ही शेष रह जावेगा । इस कारण सुधारकोंको इसमें आग्रह छोड़ ही देना चाहिये । जहाँ - जहाँ विवाहका विच्छेद शुरू हुआ; वहाँ चहाँ समाजमें उससे सुखशान्ति प्राप्त नहीं हुई । इसका मूल कारण लड़कियोंका वड़ी आयुमें विवाह भी है, जिसमें कामकी दृष्टि रहती है । Gujarat. Acg & Initiative
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७३८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) ऐ अदूरदर्शी सुधारकगण; आपको एक समस्याके सुलझाने-केलिए जो नये - नये सुधार करने पड़ जाते हैं; उसमें कारण यह है कि आपने प्राचीन नियमकी शृङ्खलाको जहाँ तहाँ - तोड़ डाला है; उसका फिर स्वयं कृत्रिम सन्धान करते हैं, उसके फलस्वरूप वह शृङ्खला अन्य स्थानसे टूट जाती है । उसके समीकरण करनेपर फिर वही हाल होता है; अन्तमें आप सारी प्राचीन शृङ्खलाको ही ढीली करके सारीको ही व्यर्थ कर देंगे, इस अपनी जाति तथा अपने धर्मका क्षय कर देंगे । अब भी आप लोग समझ जाएँ; तो अच्छा हो । अन्यथा आप लोगोंकी इन दुश्चेष्टाओंका फल समूचे समाज, वल्कि सारे देशको भोगना पड़ेगा; अतः सावधान हो जाइये । ( ८ ) जो कि कई लोग कहते हैं कि - ' श्रीरामने भी तो सीता-को तलाक दिया था; अतः यह प्राचीन व्यवहार है, ' ऐसा कहनेवाले धृष्ट हैं । यदि ऐसा होता, तो श्रीराम सीतासे हुए हुए विवाहको विच्छिन्न कर देते । परन्तु नहीं किया । तभी तो अन्य विवाह भी नहीं किया, और अश्वमेधयज्ञमें भी सीताकी सुवर्ण-की प्रतिमा ही रखी, अन्य स्त्रीको यज्ञमें अपनी सहधर्मिणी नहीं बनाया । केवल लोकापवादवश सीताको अलग किया था, हृदयसे नहीं । प्रजारंजक राजाके लिए बहुत कठिनाइयाँ उपस्थित हुआ करती हैं । लोकापवादकी समाप्तिके बाद श्रीराम सीताको अपने पास रखा चाहते थे; उसने पातालमें प्रवेश कर लिया-यह और बात है । उत्तररामचरित तथा कुन्दमाला आदिमें तो-विवाहोच्छेदपर विचार ७४ [ GIT सीता रामके पास ही अन्त तक रही है । तब प्रतिपक्षियोंका भी आक्षेप निराधार ही है | ‘ कौटलीय अर्थशास्त्र ' में भी कहा है कि-‘ अमोक्षो धर्मविवाहानाम् ’ ( ३।३।२२ ) ' अमोक्ष ' शब्दसे ' तलाक ' का निषेध है । जिस - जिस देश में ' विवाहोच्छेद ' जारी हुआ, वहाँ समाजमें सुखशान्ति नहीं रही, इसमें यूरोप उदाहरण है । ( १ ) विवाहसंस्कारमें एक मन्त्र सुप्रसिद्ध है - ' ममेयमस्तु है पोष्या मह्य ं त्वादाद् बृहस्पतिः । मया पत्या प्रजावती संजीव शरदः शतम् ' ( अथर्व- १४ | १ | ५२ ) यह मन्त्र स्त्रीका पैतृक सम्पत्ति में त्व अधिकार तथा विवाह विच्छेदको खण्डित कर रहा है । मन्त्र- कर द्वारा वर अपनेसे विवाहित हो रही हुई कुमारीकेलिए कहता है कि इस स्त्रीको मैंने ही पालना है । यदि वह लड़की अपने क्य पिताकी सम्पत्ति में भी पुत्र इतने भागको प्राप्त होती; तव वह हव पतिसे पोष्य न होती । तब वह स्वयं अपनेको पाल सकती । पर उसे अपने पोषणार्थ फिर पतिके मुख देखनेकी आवश्यकता अ नहीं थी । परन्तु जब वेद पत्नीको पति द्वारा ' पोष्या ' बताता है, अ शास्त्र भी उसे एतदर्थ पतिकी भार्या ( भर्तव्या पोषणीया ) कहता है; इससे स्पष्ट है कि- स्त्री निर्धन है, पतिके अधीन है । तभी मनुस्मृतिने भी कहा है – ' भार्या पुत्रश्च दास ( शूद्र ) श्च त्रय एवां-ऽघनास्तथा । यत् ते समधिगच्छन्ति यस्य ते तस्य तद् धनम् ' ( ८४१६ ) यही बात मीमांसादर्शनके ६ | १ | १४ सूत्रकी व्याख्या करते हुए श्रीशवरस्वामीने भी कही है- ' तस्मात् [ स्त्रिया निर्धन-त्वस्मरणेन तस्याः ] अस्वातन्त्र्यमनेन प्रकारेण उच्यते ' । शुक्रनीति में CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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७४० ] श्रीमनातनधर्मालोक ( ८ ) [ ७३ ९ भी ऐसा ही कहा है । क्षियोंका जब स्त्री इस प्रकार पतिके अधीन कही गई है, इससे स्पष्ट है कि-नाक ' है कि वह पिता की सम्पत्तिकी अधिकारिणी नहीं । अग्रिम-का अंशसे सिद्ध होता है कि उसे विवाहोच्छेदका भी अधिकार T, वहाँ नहीं । देखिये- ' मह्य ं त्वादाद् बृहस्पतिः ' । यह भी वर कह रहा है कि- मुझे तू बृहस्पति द्वारा दी गई है । ' मां ' में सम्प्रदानमें मियमस्तु संजीव चतुर्थी है । दानका लक्षण यह है - ' स्वस्वत्वनिवृत्तिपूर्वकं परस्व-त्वोत्पादनं दानम् ' अपना स्वत्व हटाकर दूसरेका स्वत्व पैदा पत्ति में करनेका नाम दान कहा जाता है । उसीमें चतुर्थी होती है । मन्त्र- ' रजकस्य वस्त्रं ददाति ' में चतुर्थी इसलिए नहीं की जाती; हता है अपने क्योंकि - धोवीको धोनेकेलिए दिये गये कपड़ोंसे अपना स्वत्व हटाया नहीं जाता । सो सम्प्रदान न होनेसे चतुर्थी नहीं होती । तब वह कती । परन्तु ‘ मह्य ं त्वादाद् ' में चतुर्थी है । यहाँ बृहस्पति अथवा अग्नि एवं पिता अपना स्वत्व छोड़कर उस लड़की में वरका श्यकता अधिकार कर देता है; अब उसमें उस वरके अतिरिक्त किसीका भी अधिकार नहीं रहता । सो यहाँ विधवाविवाह तथा कहता तभी विवाहोच्छेद दोनोंका निराकरण प्रतिफलित हुआ; क्योंकि-एवां- उसका उस पतिसे अतिरिक्त चाहे वह जीवित हो, वा मर गया धनम् ' हो; अन्य कोई स्वत्वाधिकारी नहीं । इसलिए बृहत्पराशरस्मृति में चाख्या भी कहा है- ' जीवन वापि मृतो वापि पतिरेव प्रभुः स्त्रियाम् ' निर्धन- ( ४ । ४८ ) । कन्याका प्रथम प्रदान ही विवाह हुआ करता जोति में है । कन्याका अपनेपर आधिपत्य तो होता नहीं; क्योंकि – बह CC - 0. Ankur Joshi Collection विवाहोच्छेदपर विचार [ ७४१ दानक्रियाकी कर्ता नहीं है, किन्तु कर्म है । कर्ता ही स्वतन्त्र हुआ है, कर्म सदा परतन्त्र होता है । फिर कर्ता भी दान देकर करता उससे अपना स्वत्व हटा बैठता है । जब ऐसा है, तब कन्याका दान दे चुकने पर पिताका भी स्वत्व न रद्दा, दी हुई कन्याका अपना स्वत्व भी न रहा; तब उसका अन्य स्थान पर विवाह न हो सकनेसे यह विवाह विच्छिन्न नहीं हो सकता । तभी इस मन्त्रके उत्तरार्धमें कहा है- ' मया पत्या प्रजावती संजीव शरदः शतम ' ( मुझ पतिसे प्रजावाली वनकर तू सौ वर्ष जी ) यहाँ पतिका भी यावज्जीवन स्त्रीको त्यागना नहीं कहा । तव पतिका भी उससे विवाहोच्छेदका अधिकार न रहा । ' मया पत्या प्रजावती ' से उस पतिसे अतिरिक्त अन्यसे सन्तानके उत्पादनका अधिकार अवैदिक सिद्ध हो जानेसे उसका विधवा-विवाह, नियोग वा विवाहविच्छेदका खण्डन होगया । जबकि वेद ' त्वा सह पत्या दधामि ', ( ऋ. १०५/२४ ) ' प्र - इतो ( कन्यां पितृगृहाद् ) मुञ्चामि नाऽमुतः ' ( न पतिगृहाद् ) ' ( ऋ. १०६५/२५ ) ' मया पत्या जरदष्टिर् ( वृद्धा ) यथाऽसः । " मह्य ं त्याऽदुर्गार्हपत्याय देवाः ' ( १०१८५३६ ) ' रथिं च पुत्रश्चादाद् अग्निर्मह्यमथो इमाम् ' ( १२०/८५/४१ ) ' साम अहमस्मि ऋक् त्वम्: रहं पृथिवीत्वम्; तावेव विवहावहै, सह रेतो दधावहै, प्रजां प्रजनयावहै, पुत्रान् विन्दावहै बहून् ' ( पारस्करगृ. ११६३ ) यहाँ पर ऋक्साम, द्यलोक तथा पृथिवीके दृष्टान्त द्वारा पति - पत्नीके सम्बन्धको दृढ करा रहा है; तव तो उसने विवाहोच्छेदका ही Gujarat. An eGangotri Initiative
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७४२ | श्रीसनातनघलोक ) ८ ) उच्छेद कर दिया । तब फिर जो सुधारक इसके पक्ष में हैं; वे वैदिकधर्मके पाटञ्चर तथा हिन्दुजातिमें भी यूरोपियन जातियोंकी तरह प्रतिवर्ष तलाकोंकी संख्या बढ़ानेमें गौरव समझते हुए हिन्दुधर्मके सर्वथा उच्छेदक हैं । ( १० ) यह भी बात याद रखनेकी है कि - स्त्री जातिका अन्त हमारे ऋषि - मुनि खूब पा गये हैं । वे जानते थे कि -स्त्री - जातिका हृदय अधिकता प्रिय है । उनके मृदु हृदयोंपर विलासिता तथा स्वेच्छाचारिता अतिशयित - प्रभाव डालने वाली बन जाती हैं । आर्यसमाजके संचालक स्वाद जीने भी स्त्रियोंके लिए कहा है-' प्रायः स्त्रियोंका स्वभाव तीक्ष्ण और मृदु होता है ' ( स.प्र. ४ पृ. ४७ ) ' स्त्री - पुरुषकी कामचेष्टा तुल्य अथवा पुरुषसे स्त्रीकी [ कामचेष्टा ] अधिक होती है ' ( स. प्र. ११ समु. पू. २३६ ) ' स्त्रियों-को प्रिय वह होता है, जो स्त्रैण अर्थात् स्त्री - भोगमें फँसा है ' ( स. प्र. ११ पृ. २३४ ) । यह भी याद रखना चाहिये - ' आहारो मैथुनं निद्रा सेवनात्तु विवर्धते ' । यदि स्त्री- जातिको धर्मशृङ्खलामें न रखा गया, और वह उच्छृङ्खल होगई; तो फिर कुछ भी करते-घरते नहीं बनेगा । सारी भारतीयता नष्ट हो जायगी । जिस सती - धर्मसे मारतका मुख उज्ज्वल था, वही अब ' तलाक ' की कालिखसे काला हो जायगा । उस जीवनमें न हृदयकी शान्ति होगी, न आत्मिक आनन्द | वह अत्यन्त अशान्त, स्वार्थपूर्ण, विलासयुक्त वातावरण होगा । न उसमें नीति होगी, न धर्म । न उसमें सहानुभूति होगी; न सहृदयता । CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या तलाक शास्त्रीय है । [ ७४३ ( २५ ) क्या तलाक शास्त्रीय है? प्रतिपक्षी - श्रीधर्मदेवजीने हिन्दुकोडके समयमें ' वीर - अर्जुन ' में वा डा ० अम्बेदकरसे छपवाई हुई राजकीय पुस्तिका कोड बिल तथा उसका उद्देश्य ' में स्मृतियोंसे ' ' हिन्दू-तलाक ' सिद्ध करना चाहा था । वे तलाकको वैदिक आदर्शसे तो विरुद्ध मानते हैं; तब अपने अनुसार वेदविरुद्ध उनसे दिये स्मृतिवचन ऐक-देशिक होनेसे प्रतिपक्षीसे भी अमाननीय सिद्ध होगये । तब आश्चर्य है कि उन्हीं वेदविरुद्ध स्मृति वचनोंको स्वतः - प्रमाण मानकर प्रतिपक्षीने विवाहोच्छेदका अनुमोदन कैसे किया? क्या वह उनका तथाकथित वैदिकधर्म जिसकेलिए उनके सम्प्रदायने भारतीयोंके करोड़ों रुपये खर्च करवा दिये - उठ गया, जिसे छोड़कर वे स्मार्तधर्मके अनुयायी उनके अपने शब्दों में ' पौराणिक ' बनना चाहते हैं? । ( १ ) गृह्यसूत्रोंमें विवाहसंस्कार में ' अर्यमणं नु देवं कन्या अग्निमयक्षत । स नो अर्यमा देवः प्रइतो ( पितृकुलात् ) मुचतु मापतेः ' ( पारस्कर गृ. ११६ स्वा. द जीकी . संस्कारविधि पृ. १५८ ) इस मन्त्रद्वारा कन्याको पितृकुलका छोड़ना तो कहा है, पतिकुलका छोड़ना नहीं । जहाँ शास्त्र पतिद्वारा उसे ' अश्मेव त्वं स्थिरा भव ' ( पारस्कर. १।७१, संस्कारविधि पृ. १५७ ) पतिकुलमें पत्थरकी तरह स्थिर रहनेकेलिए आदेश दे रहा है, ' ध्रुवा स्त्री कु भूयासम् ' ( गोभिलगृ. २३८, संस्कारविधि पृ. १६५ ) यहाँपर पत्नी ध्रुवकी साक्षी देकर पतिगृहमें स्थिर रहनेकेलिए अपनेको ६ Gujarat. An eGangotri Initiative
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७४४ ] श्रीसनातनंधर्मालोक ( ८ ) कहती है । जहाँपर विवाहमें प्रतिपक्षी श्रीधर्मदेवजीके शब्दोंमें-' काठकगृह्यसूत्र ( २५।३० ) में ' सोस्मान देवो अर्यमा प्रेतो मुञ्चतु माऽमुष्य गृहेभ्यः ' यह पाठ है, जिसका कन्या उच्चारण करती हुई ' अमुष्य ' के स्थानमें पतिका नाम लेती है ' ( सार्वदेशिक-अगस्त १६४६ पृ. २७१ ) उस नामवाले भी पतिका त्याग कराना इष्ट नहीं है । इस प्रकार सौत्र - शाखाओंकी तथा ' इहैव स्तंभा वियौष्टं विश्वमायुर्व्यश्नुतम् । मोदमानौ स्वे गृहे ' ( ऋ. १०।८५ । ५२, अथर्व. १४।१।२२ ) यह वेदशास्त्रोंकी आज्ञा है । जहाँपर ' दुश्शीलो दुर्भगो वृद्धो जडो रोग्यधमोपि वा । पतिः स्त्रीभिनं हातव्यो - ' ( श्रीमद्भागवत १०।२६।२५ ) ' सकृत् कन्या प्रदीयते ' ( मनु. ६।४७ ) ( न दत्त्वा कस्यचित् कन्यां पुनर्दद्याद् विचक्षणः ' ( ६७१ ) ' न निष्क्रय विसर्गाभ्यां भर्तुर्भार्या विमुच्यते ' ( मनु. ६ | ४६ ) ' न स्त्री न पुत्रस्त्यागमर्हति ' ( मनु. ८३८१ ) ' न त्यागोस्ति द्विषन्त्याश्च ' ( मनु. ६१७ ९ ) इस प्रकार स्मृतियोंकी आज्ञा है, वहाँ तलाक कभी स्मार्त भी नहीं हो सकता । वस्तुतः प्रतिपक्षी स्मृतियोंको ' तलाक ' का समर्थक बताकर उनपर अन्याय कर रहा है । हम उसके स्मार्त - प्रमाणों पर विचार करते हैं । ( २ ) पूर्वपक्ष - पराशर स्मृतिमें ' नष्टे मृते प्रब्रजिते क्लीबे च पति पत । पञ्चस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते ' ( ४ । ३० ) यह पद्य है । परारशरस्मृतिको ' कलौ पाराशरस्मृतिः ' के अनुसार कलियुग में हमारे पौराणिक भाई सबसे अधिक प्रमाण मानते CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या तलाक शास्त्रीय है? [ ७४५ हैं, इसमें विशेष आपत्तियोंमें पूर्व पतिको छोड़कर अन्य पति लेनेका विधान किया गया है । इसी प्रकारका पद्य नारदीयमनु-संहिता ( १२२६६ ) भी है । अग्निपुराण में भी है । अन्य भी मनु आदिमें तथा कौटलीय अर्थशास्त्रमें वचन हैं ( जो आगे उद्धृत किये जायेंगे ) इसमें ' नष्टे मृते ' का उत्तरपक्ष ' आलोक ' के इसी पुष्प ( पृ. ६४१ से ६८८ तक ) में हमने दे दिया है पाठक उसे वहीं देख ले | ( ३ ) पूर्वपक्ष - मनुजीका यह पद्य है- ' विधिवत् प्रतिगृह्यापि त्यजेत् कन्यां विगर्हिताम् । व्याधितां विप्रदुष्टां वा छद्मना चोप-पादिताम् ' ( ६१७३ ) इस पद्यमें विधिपूर्वक विवाही लड़कीका मी तलाक कहा गया है । उत्तरपक्ष - तलाक विवाहित हो चुकी हुई स्त्रीका माना जाता है, पर वह मनुसे विरुद्ध है, जैसेकि - ' न निष्क्रयविसर्गाभ्यां भर्तुर्भार्या विमुच्यते ' ( ६४६ ) । तव प्रतिपक्षिदत्त प्रमाणमें तलाक कैसे आदिष्ट हो सकता है? सो उक्त पद्य सप्तपदीसे पूर्वताका है । तभी श्रीकुल्लूकभट्टने स्पष्ट लिखा है- ' अद्भिरेव द्विजाग्र्याणाम् इत्येवमादि विधिना प्रतिगृह्यापि कन्यां नैरुज्यलक्षणोपेतां रोगिणीं, क्षतयोनित्वाद्यभिशापवतीम अधिकाङ्गादिगोपनच्छ-द्मनोपपादितां सप्तपदीकरणात् प्राग् ज्ञातां त्यजेत् । ततश्च तत्त्यागे दोषाभाव इत्येतदर्थम्, न तु त्यागार्थम् ' । इसी प्रकार अन्य टीकाकार भी कहते हैं । इससे यह स्पष्ट हो रहा है कि यह पद्य Gujarat. An eGangotri Initiative
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७४६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) सप्तपदीसे पूर्वताका बोधक है तलाकका नहीं । विवाह हो जाने पर तो वह जैसी है - भर्तव्या भरण - पोषणयोग्य हो जाती है । यद्यपि इससे पूर्व ' न दत्त्वा कस्यचित् कन्यां पुनर्दद्यात् विचक्षणः ( ६।७१ ) इस पद्य में सप्तपदीसे पूर्व भी त्यागका निषेध किया है, जैसाकि इस पद्य की व्याख्यामें श्रीकुल्लूकभट्टने लिखा है - ' सप्तपदीकरणस्य अजातत्वाद् भार्यात्वाऽनिष्पत्तेः पुनर्दाना-शङ्कायामिदं वचनम् ' तथापि इससे यह सिद्ध तो हो जाता है । कि- विवाहकी पूर्णता सम्पन्न हो जानेके बाद त्याग नहीं है, जिसे प्रतिपक्षीने बतानेकी चेष्टा की है । श्रीमनुने तलाकका स्पष्ट निषेध किया है ( ६४६ ) । यह पद्य हम आदिमें लिख चुके हैं । जब पतिका पतित्व उस भार्यासे हट नहीं सकता; तब तलाक कैसा? ऊपरका व्यवहार धोखादेहीका उत्तरमात्र है, इसका नाम तलाक नहीं । विवाहके बाद तो वह भार्या हो जानेसे त्यक्तव्या नहीं हो जाती । ( ४ ) जो कि - ' यस्तु दोषवतीं कन्यामनाख्याय प्रयच्छति । दोषे तु सति नागः स्यादन्योन्यं त्यजतोस्तयोः ' ( १२/३२ ) यह नारदप्रोक्त मनुसंहिताका वचन ' तलाक ' की सिद्धिकेलिए दिया जाता है, उसकी व्यवस्था भी भृगुप्रोक्त - मनुस्मृतिके वचनकी भांति समझनी चाहिये, क्योंकि दोनों मनुस्मृतियां मनुजीकी हैं; केवल प्रवक्ताके भेदसे कुछ भेद है । देखिये भृगुप्रोक्त मनुस्मृति-का इसप्रकारका वचन - ' यस्तु दोषवतीं कन्यामनाख्यायोप-पादयेत् । तस्य तद् वितथं कुर्यात् कन्यादातुर्दुरात्मनः ' ( ६७३ ) क्या तलाक शास्त्रीय है? [ ७४७ इसका श्रीकुल्लूकभट्टने इस प्रकार अर्थ लिखा है- ' एतदपि ( सप्तपदीकरणात् प्राग् ज्ञातायाः ) त्यागे दोषाभावदर्शनार्थम्, ( नतु तत्त्यागार्थम् ) ' तब इससे सप्तपदीसे पूर्व भी त्याग सिद्धान्तित न हुआ, किन्तु जान - बूझकर दी हुई बीमार आदि लड़कीको सप्तपदीसे पूर्व छोड़ देना यहाँ कहा है, तलाक इसका घ नाम नहीं होता । तलाक तो ' विवाह विच्छेद ' का नाम है । वह तो पूर्ण - विवाह हो जानेपर पति वा स्त्रीके छोड़नेपर होता है, पर यहाँ ऐसा कहीं नहीं माना गया । ह्र ( ५ ) प्रतिपक्षीने जो अन्य पद्य उपस्थित किया है - ' प्रोषितो धर्मकामार्थं प्रतीक्ष्योऽष्टौ नरः समाः । विद्यार्थं षड् यशो वा कामार्थं त्रींस्तु वत्सरान् ' ( मनु. ६७६ ) इससे प्रतिपक्षी जो कि स्त्रीको पतिका ७८ वर्षके बाद छोड़ देना सिद्ध करता है, यह भी ठीक नहीं । इस पद्य में त्याग लिखा ही कहाँ है? मनुजीका ऐसा सिद्धान्त नहीं । वे तो कहते हैं- ' न निष्क्रयविसर्गाभ्यां भर्तुर्भार्यां विमुच्यते ' ( ६ | ४६ ) यह पद्य आदिमें लिखा जा चुका है । अन्य भी देखिये- ' कामं तु क्षपयेद् देहं पुष्पमूलफलैः शुभैः । न तु नामापि गृह्णीयात् पत्यौ प्रेते परस्य तु ' ( ५ १५७ ) आक्षिप्त पद्यके लिए मनुस्मृतिमें लिखा है- ' जब पुरुष वृत्ति आदि के लिए रा विदेशमें जाने लगे; तो अपनी स्त्रीकी वृत्ति बनाकर जावे । वह स्त्री भी अनिन्दित शिल्प दिसे वृत्ति करती रहे-' विधाय वृत्तिं भार्यायाः प्रवसेत् कार्यवान्नरः । अवृत्तिकर्शिता यह हि स्त्री प्रदुष्येत् स्थितिमत्यपि ' ( ६७४ ) अर्थात् पुरुष यदि नह CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative