सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 391–400

सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 391–400

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७४८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) ७४७ स्त्रीकी वृत्ति न बनाकर जावे, तो बड़ी से बड़ी पतिव्रता भी एतदपि नार्थम् पेटके लिए बिगड़ सकती है । ? ' विधाय प्रोषिते वृत्तिं जीवेन्नियममास्थिता । प्रोषिते त्व-त्याग आदि विधायैव जीवेत् शिल्पैरगर्हितै: ( ६७५ ) वृत्ति देकर पतिके इसका बाहर चले जानेपर स्त्री अपने शरीरकी सजावट, परगृहगमन । वह आदि न करती हुई कपड़ोंकी काढ़ काढ़ने आदिसे अपना है निर्वाह करती रहे । धर्म - कार्यके लिए पति बाहर गया हो; तो स्त्री आठ वर्ष तक पतिकी प्रतीक्षा करे । विद्या केलिए वा यशके-नोषितो लिए गया हो तो छः वर्ष, कामार्थं गया हो तो तीन वर्ष तक वा उसकी प्रतीक्षा करे । उसके बाद स्त्री क्या करे - इसपर मनुजीने जो कि कुछ भी नहीं लिखा, पर प्रतिपक्षी के सम्प्रदायप्रवर्तक स्वा.द. यह जी देरी क्यों करें? उन्होंने उसे नियोगसे सन्तानोत्पत्ति कर लेनेकेलिए आज्ञा दे दी । पर मनुजीका यह हृदय नहीं है, न ही कोई नियोगका प्रकरण है, और न कोई इसमें नियोगका संकेत चुका है । तव इसमें मनुस्मृतिके टीकाकारोंकी सम्मति देखनी पड़ेगी । शुभैः । उसमें नारायण कहता है— ' तदूर्ध्वं पत्युः संनिकर्षमेव गच्छेत् ' । क्षिप्त श्रीकुल्लूकने लिखा है- ' ऊर्ध्वं पति - सन्निधिमेव गच्छेत् ' । के लिए राघवाचार्यंने लिखा है - ' तदूर्ध्वं पतिसमीपं गच्छेत् ' । अर्थात् जावे । उक्त समयके बाद पत्नी अपने पतिके पास चलीं जावे । रहे टीकाकारोंके सामने मनु के ६ ५६ पद्यका ' योषितां धर्ममापदि ' कर्शिता यह वाक्य भी सामने था, तब टीकाकारोंने नियोग अर्थ क्यों यदि नहीं किया? इसलिए कि विवाहिता - विधवाका नियोग तो ५६ वें क्या तलाक शास्त्रीय है? 1 ७४६ पद्यसे चालू था, वह ६३ पद्य तक समाप्त होगया । फिर ६४ मनुपद्यसे नियोगका खण्डन शुरू हुआ, ६८ पद्य तक वह भी समाप्त होगया; तब वाग्दत्ता- विधवाकेलिए ६६-७० पद्योंमें मनुजीने विशेषता बताई । इसके आगे नियोगका कहीं गन्ध मी नहीं । देखिये-७२ पद्यमें कन्याका एकको देकर पुनः दूसरेको देना निषिद्ध किया गया है । यहाँ कुछ भी नियोगकी चर्चा नहीं । इससे विधवाका किसीके भी द्वारा किसी अन्यको दान खण्डित हो जाता है । फिर आगे ( ७२ ) पद्यमें सप्तपदीसे पूर्व छद्म ( कपट ) दिसे दी हुई बीमार स्त्रियोंके त्यागमें भी प्रदोष कहा है! इसमें भी नियोगकी गन्ध नहीं । आगे ( ७३ पद्यमें ) बिना सूचना दी हुई दुष्ट - कन्या दाताके प्रयत्नकी व्यर्थताकेलिए कहा गया है, यहाँ भी नियोगक छ भी चर्चा नहीं । इस प्रकार ७४-७५-७६ पद्योंमें भी नहीं है । इस प्रकार आगे भी नहीं । तव स्वाद जीने निर्मूल नियोग अर्थ कैसे कर डाला? । तब जहाँ सन्देह हो; उसकी पूर्ति अन्य धर्मशास्त्रोंकी सहायतासे की जाती है । इसलिए जो कि टीकाकारोंने उस प्रोषितभर्तृका का ( जिसका पति परदेशमें है ), उक्त पद्यके अर्थके अवसरपर अपने पतिके पास चला जाना कहा है । वहाँपर टीकाकारोंने वसिष्ठधर्मसूत्रका आश्रय लिया है । वसिष्ठधर्मसूत्रके यह शब्द हैं- ' प्रोषितपत्नी पञ्च वर्षाण्युपासीत, ऊर्ध्वं पञ्चभ्यो वर्षेभ्यो भर्तृ सकाशं गच्छेत् ' ( १७१६७ ) अर्थात् अपने उस पतिके CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative.

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७५० ] श्रीसनातनघमालाक ( ८ ) पास चली जावे । यही बात टीकाकारोंने लिखी है, पर स्वा.द. जीने अपनी निरंकुश इच्छानुसार उसे नियोग कर लेना लिख दिया । पर यह किसी भी धर्मशास्त्रका अभिप्राय नहीं । यदि वह पति उस स्थानमें न मिले, वा वह स्त्री ही वहाँ न जाना चाहे, तब वसिष्ठजी उसकी कर्तव्यता कहते हैं— ' यदि धर्मकामाभ्यां प्रवासं प्रति अनुकामा न स्याद्, यथाप्रेत इत्येवं वर्तितव्यं स्यात् ' ( १७७६८ ) अर्थात् वह स्त्री उस प्राप्त पतिकेलिए यह समझे कि उसकी मृत्यु हो चुकी है, तब अपने - आपको विधवा जैसी मानकर विधवाके धर्मोंको ( मनु. ५१५८-१६१-१६३ ) पूरा करे । स्पष्ट है कि यहाँ नियोग वा तलाककी बात नहीं हैं । इधर वह स्त्री पतिके जीवन मरणके विषयमें पूर्ण निश्चय न होनेसे पूर्ण विधवा भी नहीं कही जा सकती । कदाचित् उसका पति फिर वापिस आजावे, तव उसके पतिके नियोग ( आदेश ) न होनेसे यहां स्वेच्छासे नियोगका अर्थ बताना यह स्वा. द. जीका दुस्साहस है । क्या इस अवधिसे पूर्व उसे काम न सतावेगा? यदि सतावे; तव वह स्त्री क्या करे यह बात यहां प्रतिपक्षी नहीं बताते? यदि तब वह संयम करे, तो आगे भी उसका संयम हो सकता है । विवाहके बाद भी प्रतिपक्षसे अभिमत उक्त - मनुपद्यानुसार पतिके विद्या पढ़नेके विषयमें जब पूछा जाता है कि- विवाहके बाद-भला विद्या कैसे? तो आर्यसमाजके नेता श्रीदेहलवीजी बताते हैं कि - ' यह विद्याकी बात ब्राह्मणकेलिए है । यदि ब्राह्मणको क्या तलाक शास्त्रीय है? [ ७५१ १६ बर्ष तक विद्या पढ़नेका अवसर नहीं मिला; तो १६ बर्ष से पीछे ८ वर्षे तक विद्या पढ़े । तब क्या प्रतिपक्षी देहलवी आदि , ब्राह्मणका विवाह १६ वें वर्ष में कराते हैं? और स्त्रीकी ८ वर्ष तक जो प्रतीक्षा लिखी है, तो उसकी पत्नी भी क्या विवाहके समय ८-१० वर्ष की होगी? तब क्या प्रतिपक्षी ८-१० वर्ष लड़की का विवाह भी शास्त्रीय मानते हैं? यदि ऐसा हो; तो क आर्यसमाजाभिमत इस मनुपद्यसे आर्यसमाजाभिमत लड़का-स लड़कीकी विवाहायुःका सिद्धान्त खण्डित होगया । इसके अतिरिक्त प्रतिपक्षियोंसे अभिमत उक्त - मनुपद्यानुसार ब्राह्मण भी जन्मसे सिद्ध हुआ । जब कि उसने १६ वर्ष तक विद्या नहीं पढ़ी, तो प्रतिपक्षके अनुसार ब्राह्मण ही कहां रहा? १६ वर्ष तक विद्या न पढ़ने पर भी ब्राह्मणको व्रात्य कहा जाता हैं । तब वह व्रात्य भी ब्राह्मण सिद्ध हो गया । ( ६ ) आगे प्रतिपक्षी ' हिन्दुकोड़ बिलका उद्देश्य ' पुस्तक न ( पृ. ७२ ) में ' वन्ध्याष्टमेऽधिवेद्याऽब्दे दशमे तु मृतप्रजा । एकादशे स्त्र स्त्रीजननी सद्यस्त्वप्रियवादिनी ' ( ६८२ ) यह मनुका पद्य स उद्धृत कर उसपर अपने तथाकथित महर्षि ( स्वा.द. ) का अर्थ लिखता है - ' पुरुषकेलिए भी नियम है कि वन्ध्या हो तो पवें, सन्तान होकर मर जाय, तो १० वें, जब - जब हो; तब - तब कन्या ही हों, पुत्र, न हो, तो ११ वें वर्ष तक, और अप्रिय बोलने वाली हो तो सद्यः उस स्त्रीको छोड़कर दूसरी स्त्रीसे नियोग करके सन्तानोत्पत्ति कर लेवे ' । उर CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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[ ७५१ ७५२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) वर्ष से प्रतिपक्षी के स्वामीने इस पद्यमें नियोग अर्थ माना है, पर आदि, यह मनुस्मृति तथा अन्य धर्मशास्त्रोंसे विरुद्ध अर्थ है । ‘ अधि-वर्ष वेद्या'का ' नियोग ' अर्थ कहीं माना नहीं गया; न ही प्रतिपक्षीका विवाह के इष्ट यहाँ तलाक ही है, और फिर ' छोड़कर ' यह अर्थ करना तो वर्षकी स्वा. द. जीकी निजी कल्पना है, शास्त्रीय नहीं, क्योंकि - ' अधिवेद्य । ’ होतो का सर्वसम्मत अर्थ यही है कि- ' तस्यां स्त्रियां सत्याम् अन्यया लड़का- सह विवाहः ' जैसाकि ६।८० में कुल्लूकभट्टने लिखा है । मेघा-इसके तिथि भी कहता है - ' तस्या उपरि अन्या विवाहः ' । नारायण भी लिखता है - ' अधिवेदनं द्वितीयभार्यासम्बन्धः । राघवाचार्यने नहीं लिखा है - ' सत्यामपि सत्यां तस्या उपरि स्त्र्यन्तरस्य परिग्रहः ' । नन्दन लिखता है - ' अपरा वोढव्या ' । रामचन्द्र लिखता है— ब वह ' आसामुपरि अन्या विवाहयितुं योग्या ' । यह अर्थ ठीक भी है-' अधि - उपरि अन्या वेद्या - विवाह्या ' । इससे पूर्व स्त्रीका छोड़ना पुस्तक नहीं आता; वल्कि अन्य स्त्रीसे विवाह करनेमें अपनी रोगिणी काद स्त्रीसे भी पूछना लिखा है । जैसेकि - ' या रोगिणी स्यात्तु हिता पद्य सम्पन्ना चैव शीलतः । सानुज्ञाप्याधिवेत्तव्या नावमान्या च कर्हि-अर्थ चित् ' ( ६।८२ ) यह प्रतिपक्षीसे दिये हुए मनुपद्यसे आगेका पद्य 75 वें, है । यदि रोगिणी स्त्रीको छोड़ना श्रीमनुको इष्ट होता, तो फिर कन्या पूछा किससे जाता? शेष रही अप्रियवादिनी; सो उसका छोड़ना भी मनुजींको करके इष्ट नहीं, किन्तु उसको अपने घरमें रोक रखना वा कई दिन तक उसे उसके मायके भेज देना ही इष्ट है, जब तक कि उसका CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या तलाक शास्त्रीय है? [ ७५३ कोप शान्त नहीं होता । जैसेकि इसमें श्रीमनुका उसीसे अग्रिम पद्य प्रमाण है – ' अधिविन्ना तु या नारी निर्गच्छेद् रुषिता गृहात् । सा सद्यः संनिरोद्धव्या त्याच्या वा कुलसन्निधौ ' ( ३ ) इन पद्योंमें प्रयोजनवश पुरुपका पुनर्विवाह माना है, पहलीको छोड़ना नहीं बताया | तब पुरुषका पूर्व स्त्रीकी विद्यमानता में पुनर्विवाह निषिद्ध कर रहा हुआ हिन्दुकोड कानून मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्रों तथा पुरुषकी पुरुष सन्तान अवश्य होना बताने वाले वेदादिसे विरुद्ध है, अतः प्रतिपक्षीके अनुसार हिन्दुत्व-रक्षक भी नहीं । ' सद्यस्त्वप्रियवादिनी ' में अप्रियवादिनीका जो अधिवेदन लिखा है, वह मी सन्तान न होनेकी दशामें ही है, सन्तान होने की दशामें नहीं; जैसाकि कुल्लूकमट्टने स्पष्ट किया है-' अप्रियवादिनी सद्य एव ( अधिवेदनीया ), यदि अपुत्रा भवति । पुत्रवत्यां तु तस्यां ' धर्मप्रजासम्पन्ने दारे नान्यां कुर्वीत ' इति आपस्तम्ब - प्रतिषेधाद् अधिवेदनं न कार्यम '; तव ' छोड़कर ' यह अर्थ तथा ' नियोग ' अर्थं करना स्वाद जीका अशुद्ध तथा मनुसे विरुद्ध ही है । उसके उत्तरदायी वे हैं, हम नहीं । स्वा. द. जीने वन्ध्यायादिके पतिको जो नियोगार्थ लिखा है, इसपर प्रश्न यह है कि - वन्ध्याकी पतिसे और पतिकी बन्ध्यासे कामपूर्ति तो हो रही है; तब पति अन्यसे नियोग क्यों करे? इस प्रकार मृतसन्तानवाला भी? जब लड़कियां हुई हुई हैं, तब लड़केके-लिए नियोग क्यों? इससे स्वाद जी लड़का - लड़कीका समाना-Gujarat. An artritiative

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७५४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) धिकार काट रहे हैं; यह क्या स्त्रियोंके वकील उनके सम्प्रदाय कभी सोचा है? अप्रियवादिनीके पतिको प्रतिपक्षी जोकि अन्यसे नियोग कराते हैं, तो पुरुष अप्रियवादिनीसे सन्तान क्यों न पैदा करे? यदि देहलवीजीके अनुसार उसकी सन्तान राष्ट्रद्रोही होगी, इसलिए उससे सन्तान न करे; तब फिर वूमन - फ्रेण्डकी ओषधि खिलाकर क्या पति उससे संयोग करे, जिससे सन्तान उसकी पैदा न हो? यदि पति उससे संयोग नहीं करेगा; तब वह प्रियवादिनी यदि कामुक होजावे, तो वह क्या करे? नियोग करे, वा ब्रह्मचर्य वा व्यभिचार? यदि नियोग; तब क्या वह नियोगी पुरुषसे अप्रियवादिनी न रहेगी? क्या नियोगी उसे प्रिय होगा? उस नियोग में आज्ञा कौन देगा? क्या पति देगा? वह भला अप्रियवादिनीको अन्य पुरुषका कामास्वाद क्यों कराने देने लगा? और उसकी आज्ञाके बिना अन्य कौन उसके घरमें प्रवेश कर सकेगा? तब क्या वह व्यभिचार करे? क्या व्यभि-चार आर्यसमाजको अभिमत है? यदि उसे ब्रह्मचर्य कराया जाय; तब क्या वह ब्रह्मचारिणी रह सकेगी? देहलवीजीकी अभिमत व्यभिचार - सम्भावना क्या उसमें न रहेगी? यदि नहीं रहेगी; तो देहलवीजीकी उक्त सम्भावनाका मत ( जिसका हमने इस पुष्पके ३७३-३८६ पृष्ठों में निर्देश किया है ) कट गया । यदि प्रतिपक्षी उस सधवाको बिना पति - संयोगके ब्रह्मचर्य करा सकते हैं; तब विधवाओंको भी ब्रह्मचर्य करा सकते हैं; तो CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या तलाक शास्त्रीय है? ७ [ ७५५ फिर विधवाविवाह वा नियोग कैसा? इनको भी बन्द कर दिया जाय! अतः स्पष्ट है कि - इन पद्योंमें नियोगकी अनुवृत्ति नहीं । नियोगका वर्णन तथा खण्डन ७० पद्य तक मनुस्मृतिमें होगया । ७१ से ७६ पद्यों तक उनकी अनुवृत्ति नहीं; तव ७६ समाप्त पद्यमें इतने व्यवधानमें नियोगकी अनुवृत्ति आ ही कैसे सकती है? फिर ७७ से ७६ पद्यमें भी नियोगकी अनुवृत्ति नहीं । ८० से ८३ में ‘ अधिवेत्तव्या ' है - यह स्त्रीलिङ्गान्त है, तब उसका नियोग अर्थ हो नहीं सकता; क्योंकि यहां स्वामी उन स्त्रियोंको नियोग न व कराकर उनके पतियोंको कराते हैं; अतः यहां ' तस्या उपरि अन्यया स्त्रिया सह विवाह: ' यह पुरुषके अन्य विवाहका ही अर्थ व है, नियोगका नहीं; अप्रियवादिनीके दण्डार्थ उसके पतिको अन्याधिवेदन कहा गया, रोगिणी के लिए ' अनुज्ञाप्याधिवेत्तव्या ’ प्र उसकी अनुमति लेकर पुरुषका पुनर्विवाह कहा है । वन्ध्या, मृत-प्रजा, कन्याजननी होनेपर पतिका अधिवेदन सनातनधर्मांनुसार पुन्नामक नरकसे परित्रारणार्थ किया जाता है, आर्यसमाज उसे मानता नहीं ॥ पति इन सबका त्याग नहीं करेगा, ऋतुगमन भी करेगा; अतः यहां ' तलाक ' सिद्ध न हुआ । क ( ७ ) जो कि आगे प्रतिपक्षीने लिखा है- ' उन्मत्तं पतितं क क्लीबम् अबीजं पापरोगिणम् । न त्यागोस्ति द्विषवन्त्याश्च न च दायापवर्तनम् ' ( मनु. ε | ७ ९ ) इसका भावार्थ उसने यह लिखा है-' यदि स्त्री ऐसे पति से द्वेष करती है, जो उन्मत्त है, धर्मका त्याग करके पतित होगया है, नपुंसक तथा कोढ आदि भयंकर रोग -Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 395

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७५६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ग्रस्त है, तो उसको विशेष दोष या दण्ड नहीं दिया जा सकता ' । इसमें प्रतिपक्षीने ' तलाक ' कैसे निकाल लिया, जबकि मूल - श्लोक ही स्वयं कहता है — ' न त्यागोस्ति, न च दायापवर्तनम् ' तब ' तलाक ' की सिद्धि में इस लोकको भी गिन लेना एक अक्षम्य अपराध है, अथवा अपने पक्षकी निर्बलता बताना है । ( ८ ) आगे प्रतिपक्षी ' कौटिल्य अर्थशास्त्र ' के कई प्रमाण ' तलाक ' के सम्बन्ध में उपस्थित करता है । वे यह हैं - ' नीचत्वं - वा परदेशं वा प्रस्थितो राजकिल्विषी । प्रारणाभिहन्ता पतित-स्त्याज्यः क्लीवोपि वा पतिः ' ( २२ ) ' परस्परं द्वेषान्मोक्षः ' इन वचनों में स्त्री द्वारा पतित वा नपुंसक पतिको तलाक देना कहा है ' । प्रतिपक्षियोंमें सदासे यह प्रकृति रही है कि- पूर्वोत्तर-प्रकरणको छिपाकर बीचके बचन लिख देना । इससे बेचारी, शास्त्रोंका देख - भाल न करने वाली, साधारण जनता बहुत भ्रान्त हो जाती है । यदि इन लोगोंसे हमारा इस प्रकार शास्त्रार्थ -सम्बन्ध रहा; तो वे प्रतिपक्षियोंसे छिपाये हुए वचन कई सैकड़ों-की संख्या में पहुँच जाएँगे । इन प्रतिपक्षियोंने आज तक यही करके अनुसन्धान - विरहित जनताके आगे रेतीली दीवारें खड़ी कर दी हैं, जिनकी धूलि उड़कर जनताकी आँखोंको कुछ देखने नहीं देती । यह कार्य इन लोगोंका तब तक जारी रहेगा; जब तक कि जनता स्वयं इस प्रकारके अनुसन्धानोंको नहीं करती । जब-जनता स्वयं इस प्रकारके अनुसन्धानोंमें लगेगी; तब प्रति-पक्षियोंकी रेतीली दीवारें ढह जाएँगी । CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या तलाक शास्त्रीय है? [ ७५७ प्रतिपक्षी जान ले कि- कौटिल्यके यह वचन सिद्धान्तपक्ष नहीं, किन्तु पूर्वपक्ष हैं । यदि यहीं तरीका ( उत्तरपक्ष छिपाकर पूर्वपक्षको जनताके आगे रख देना ) ठीक माना जाए तो ' यह नियोगकी चात व्यभिचारके समान दीखती हैं ', ' यह नियोग वेश्याकर्मके समान दीखता है ' ' हमको नियोगकी वानमें पाप मालूम पड़ता है ' ( स.प्र. ४ पृ. ७० ) ये स्वाद जीके नियोगविषयक पूर्वपक्ष भी स्वा. द. जीका सिद्धान्त हो जाएँगे । फिर आपके सहवर्गी ‘ वन्ध्याष्टमेधिवेद्याब्दे ' इस प्रतिपक्षीसे कहे हुए नियोगको कैसे कर सकेंगे? | अब ' कौटिल्य अर्थशास्त्र पर हमारा किया समाधान प्रति-पक्षी देखें – किसी भी ग्रन्थकी व्यवस्था, बिना पूर्वापर - प्रकरण देखे नहीं जानी जा सकती । उन - उन ग्रन्थोंमें कई पूर्वपक्ष भी हुआ करते हैं, सिद्धान्तपक्ष भी, कई अपवादवचन मी, उनकी व्यवस्थासे उस - उस ग्रन्थसे उस उस विषयकी कर्तव्यता अकर्तव्यता -समर्थित होती है, अन्य ढंगसे नहीं । इधर यह भी स्मरण रखना चाहिये कि कौटिल्य अर्थशाब नीतिशास्त्र है, धर्मशास्त्र नहीं । लोकव्यवहारकी व्यवस्था धर्म-शास्त्रसे ही हुआ करती है, नीतिशास्त्रसे नहीं; जैसाकि न्याय-दर्शनके ४ | १ | ६२ सूत्रके वात्स्यायनभाष्य में कहा है- ' लोक-व्यवहार - व्यवस्थापनं धर्मशास्त्रस्य विषयः ' अर्थात् लोकव्यवहारकी व्यवस्था धर्मशास्त्रका विषय है, अन्यका नहीं । श्रीयाज्ञवल्क्य-ऋषिने अपनी स्मृतिमें धर्मशास्त्र तथा अर्थशास्त्रके विरोध में Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 396

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७५८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) धर्मशास्त्रका ही प्राबल्य बताया है । जैसे कि-‘ अर्थशास्त्रात्तु बलवद् - धर्मशास्त्रमिति स्थितिः ' ( व्यवहाराध्याय २१ ) तब राजनीतिशास्त्र ' कौटिल्य अर्थशास्त्र से व्यवस्था नहीं हो सकती । राजनीति में राजतन्त्र चलाना पड़ता है, उसमें धर्मका अतिक्रमण भी कभी - कभी हो जाता है । देखिये उसी प्रकरणमें-' ब्राह्मणमधीयानं दश वर्षारिण अप्रजाता, द्वादश प्रजाता, राज-पुरुषम् आ - आयुःक्षयाद् आकाङ्क्षेत् ' ( ३ | ४ ) यहां पढ़ते हुए ब्राह्मणकी तो १०-१२ वर्ष प्रतीक्षा कही है, पर राजपुरुषकी आयु-की समाप्ति तक प्रतीक्षा करना कहा है । क्या इससे स्पष्ट नहीं कि यह राजनीति है, धार्मिकता नहीं । कौटिल्यको एक बड़े भारी राजतन्त्रका संचालन करना था । ऐतिहासिक लोग कौटिल्यकी स्थिति बौद्धधर्मके प्रचारयुगमें मानते हैं । उस समय धार्मिक श्रद्धा शिथिल होगई थी । अर्थ-कामपरता बहुत बढ़ गई थी । उन्हीं अर्थकामप्रसक्त पुरुषोंकी व्यवस्थाकेलिए और इधर अशास्त्रीयतासे विवाहित स्त्री - पुरुषों-के लिए उसने ऐसी अभ्यनुज्ञा कर दी है, पर धर्मशास्त्रीय पहले चार विवाहोंसे विवाहितोंकेलिए ऐसी व्यवस्था उसे सम्मत नहीं । स्मृतियोंमें चाण्डाल आदिका निरूपण भी आता है, उनके कार्य आदिका वर्णन भी आता है । चाण्डालकी उत्पत्ति शूद्रसे ब्राह्मणीमें वर्णसङ्कररूपमें होती है, पर स्मृतियोंमें चाण्डालोंका निरूपण करने से स्मृतिकारों को प्रतिलोम - सम्बन्ध अनुमत नहीं होजाता; वैसे ही यहां पर भी जान लेना चाहिये | इससे स्पष्ट क्या तलाक शास्त्रीय है? [ ७५ ९ है कि- प्रतिपक्षीसे उद्धृत वचन कौटल्यका सिद्धान्तपक्ष तब उससे व्यवस्था भी कैसे हो सकती है? । नहीं । वहीं कौटल्य अपना सिद्धान्त इस प्रकार कहते हैं - ' स्वधर्मः स्वर्गाय आनन्त्याय च ' ( १ | ३ | १४ ) यहां पर कौटल्यने अपने धर्म श्राचरणपर - बहुत बल दिया है । कौटलीय अर्थशास्त्रान्तर्गत चाणक्य - सूत्रोंमें पहला सूत्र ही यही है - ' सुखस्य मूलं धर्मः ' । धर्मको सुखका मूल बताया गया है । धर्मके अतिक्रमणमें क्या होता है — यह कौटल्यके शब्दोंमें ही देखिये- ' तस्य ( धर्मस्य ) अतिक्रमे लोकः सङ्कराद् उच्छिद्येत ' ( १ | ३ | १५ ) यह वचन स्पष्ट है, अर्थात् - धर्मका उल्लंघन करनेपर संकरता, तथा सङ्करतासे लोकोच्छेद हो जाता है । यह ठीक भी है; जैसेकि - ' संकरो नरकायैव ' ( गीता १।४२ ) यह प्रसिद्ध वचन है । फिर वही कौटल्य देशके वर्णाश्रम तथा वेदधर्मके पालन तथा आर्य - मर्यादाके अव-लम्बनमें ही लोकरक्षा मानते हैं - ' व्यवस्थितार्यमर्यादः कृतवर्णां-श्रम स्थितिः । त्रय्या हि रक्षितो देशः प्रसीदति न सीदति ' ( १।३।१७ ) इससे कौटल्यने आर्यमर्यादाको छोड़ने तथा वर्णाश्रम - धर्मके पालन एवं वेदधर्मकी उपेक्षासे देशकी हानि मानी है । विवाहोच्छेद आदि नियम वर्णाश्रमधर्म तथा आर्यमर्यादा एवं वेदवचनोंसे विरुद्ध हैं- यह हम पूर्व बता आये हैं । श्रीकौटल्य राजाको भी वर्णाश्रमके आचारके अनुसार चलता हुआ तथा धर्मानुसार ही प्रजाका पालन करता हुआ देखना ० चाहते हैं । तभी तो उन्होंने कहा है- ' चतुर्वर्णाश्रमस्याऽयं लोक-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 397

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[ ७५ ७६० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) नहीं । स्याचार - रक्षणात् । नश्यतां सर्वधर्माणां राजा धर्मप्रवर्तकः ' ( ३ | १ | ५० ) सात्त्विक लोग तो धर्मभङ्गभीरु अतः स्वयं ही धर्मप्रवण - ' स्वधर्मः होते हैं, परन्तु राजसत्तामसोंको धर्म में चलानेकेलिए राजनियम ने धर्म के बनाये जाते हैं । राजनियम भी वहां धर्मशास्त्रसे विरुद्ध पड़े, स्त्रान्तर्गत तो बाधित हो जाते हैं । जैसे कि - ' संस्थया ( महाजनोंके आचरणोंसे ) धर्मः ' । धर्मशास्त्रेण शास्त्रं वा व्यावहारिकम् ( राजशासनम् ) । यस्मिन्नर्थे क्या विरुध्येत, धर्मेणार्थं विनिर्णयेत् ' ( ६१ ) धर्मस्य ) इससे स्पष्ट है कि - प्रतिपक्षीसे उद्धृत कौटिल्यके वचन धर्म-न्न स्पष्ट शास्त्रविरुद्ध होनेसे सिद्धान्तपक्ष नहीं, किन्तु एकदेशी हैं । कौटल्य स्वयं लिखते हैं- ' पितृप्रमाणाश्चत्वारः पूर्वे ( ब्राह्म - प्राजापत्य-- ' संकरो आर्ष - दवाः ) धर्म्याः ' ( ३ २ १० ) यहां कौटल्य आदिम चार विवाहों को ही धार्मिक मानते हैं, जो आजकल भी हमारे देशमें अव प्रचलित हैं । अव श्रीकौटल्य इन विवाहोंके विषयमें अपना वर्णा- सिद्धान्तपक्ष बताते हैं— ' प्रमोक्षो धर्मविवाहानाम् ' ( ३।३।२२ ) इससे ३ ( १७ ) स्पष्ट है कि - धर्मविवाहों में तलाक नहीं हो सकता । तव प्रतिपक्षीसे - धर्मके दिये हुए कौटिल्यके वचन पैशाच आदि अधर्म - विवाहों के लिए है । चरितार्थ होते हैं । अपना स्तर सदा उच्च रखना पड़ता है । निम्न दा एवं आदर्श करनेपर तो सर्वसाधारणजनोंकी प्रवृत्ति निम्नगामिनी होने से व्यवस्था वा मर्यादा टूट सकती है । चलता इस प्रकार प्रतिपक्षि द्वारा दिये हुए वचन कौटल्यका सिद्धान्त-देखना पक्ष सिद्ध न हुआ, बल्कि धर्मकामा स्त्रीके भर्ताके मरनेपर पति-लोक- शय्याकी पालना करनेपर अर्थात् अन्य पुरुषसे सम्बन्ध न CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या तलाक शास्त्रीय है । [ ७६१ करनेपर पतिके सारे धन वा आभूषण आदिमें अधिकार बताया गया है । जैसे कि - ' मृते मर्तरि धर्मकामा तदानीमेव अवस्थाप्य आमरणं शुल्कशेषं वा लमते ' ( कौट. ३।२।२५ ) । वहीं स्पष्ट कहा है— ' अपुत्रा पतिशयनं पालयन्ती श्र श्रायुःक्षयाद् भुञ्जीत, आपदर्थं हि स्त्रीधनम्, ऊर्ध्वं दायादं गच्छेत् ' ( ३२ ) । इसपर म.म. पं ० गणपतिशास्त्रीने अपनी टीकामें कहा है- ' पुत्रहीना पतिशयनं पालयन्ती - पतिव्रता, गुरुसमीपे स्त्रीधनं यावज्जीवं भुञ्जीत मूलम-विनाशयन्ती । वृद्ध्यादिकं संजातमात्रमुपयुञ्जीत इत्यर्थः । कुतः? आपदर्थं हि स्त्रीधनम्, वृत्तिकृच्छ्रपरिहार- मात्रविनियोज्यं हि स्त्रीधनं नाम । न पुनः कामचारव्यवायार्थम् । तया तथा रक्षितं स्त्रीधनं तस्यामुपरतायां भर्तृ सपिण्डं गच्छेत् ' । इस प्रकार कौटिल्यने स्त्रीको पूर्ण स्वतन्त्रता नहीं दी । यही बात नारदस्मृतिमें भी लिखी है- ' अपुत्रा शयनं मर्तुः पालयन्ती गुरौ स्थिता । भुञ्जीतामरणात् क्षान्ता दायादा ऊर्ध्वमाप्नुयुः ' ( २।१४४ ) परन्तु यदि वह मृतभर्तृ का स्त्री परपुरुषको प्राप्त करती है, तब उसे कौटल्य के अनुसार वह धन सूदसमेत वापिस लौटाना पड़ता है । जैसेकि - ' लब्ध्वा वा विन्दमाना सवृद्धिकमुभयं दाप्येत ' ( ३।२।२६ ) इससे विधवाविवाह कौटल्यके अनुसार भी अधार्मिक सिद्ध हुआ । तभी पूर्वसूत्रमें धर्मकामाको भर्ताकी मृत्युमें उसके धनमें अधिकार बताया गया है । परपुरुषसंलग्ना स्त्रीसे उसका धन छीनने और पूर्वसूत्रसे विरुद्धता के कारण विधवाविवाह स्वयं ही अधर्म सिद्ध हुआ । तव वीचवाले विधवाविवाहाभास वचन Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 398

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७६२ ] श्रीसनातनमघलोक ) ८ ) उपस्थापित करते हुए प्रतिपक्षीका मत कट गया; क्योंकि -भारतीय-आदर्श पातिव्रत्यका है, पतिके अतिक्रमणका नहीं, वह तो यूरोपका आदर्श है । ' पतिदायं विन्दमाना जीयेत, धर्मकामा भुञ्जीत ' ( ३२ ) ( यहां म.म. गणपति शास्त्री अर्थ करते हैं— ' पत्या दत्तं वस्त्रामरणादिकं विन्दमाना भर्त्रन्तरपरिग्राहिणी जीयेत - दाप्येत श्वशुरकुलाय । अविन्दमाना संयता - संयमवती ( धर्मकामा ) चेत्, पतिदायं भुञ्जीत ) इत्यादि कौटल्यके वचन हमारे पक्षके साधक हैं । वहीं कौटल्यने स्त्रीके पुत्र न होनेपर पुत्रकेलिए पतिका अन्य विवाह सिद्धान्तित किया है, परन्तु पूर्व स्त्रीका त्याग नहीं कहा, किन्तु उसका भी मरण - पोषण कहा है । देखिये- ' वर्षाणि अष्टौ अप्रजायमानाम्, अपुत्रां, वन्ध्यां च आकाङ्क्षेत् ( प्रतीक्षेत ), दश बिन्दु ं द्वादश कन्याप्रसविनींम् । ततः पुत्रार्थी द्वितीयां विन्देत ' ( ३ | २ | ४७-४८-४९ ) यहांपर पुत्रकेलिए पुरुषका दूसरी स्त्रीसे विवाह सिद्धान्ति किया है, कामकेलिए नहीं । इसलिए आगे कहा है- ' आधिवेदनिकमनुरूपां च वृत्तिं दत्त्वा बह्वीरपि विन्देत, पुत्रार्थी हि स्त्रियः ' ( ३ २ ५२-५३ ) इससे प्रतिपक्षीसे निषिद्ध बहुस्त्रीविवाह, तथा तलाक प्रतिपक्षीके अपने ही प्रमाणित कौटल्यसे विरुद्ध सिद्ध हुआ । यहां अधिवेदनका अर्थ पूर्वोक्त मनुटीकाकारोंकी भान्ति म.म.पं. गणपतिशास्त्रीने भी प्रकृत-सूत्रकी टीकामें लिखा है- ' परिणीताया उपरि अन्यस्याः परिण-यनम् - अधिवेदनम् ' । अमरकोषमें भी कहा.. है- ' सापत्निका विवाहोच्छेदपर विचार ७६ [ ७६३ अध्यूढा अधिविन्ना ' ( २२७१७ ) । मनुटीकाकार रामचन्द्र लिखा है — ‘ अधिवेद्या - अन्या विवाह्या ' ( मनु. ६८१ ) | नन्दन कहां नि है — ‘ यस्यां विद्यमानायामेव अधिकम् अपरा विवाहिता भवति ' । जा मेधातिथि लिखता है - ' तस्या उपरि अन्या विवाहः ' ( ६।८० ) । दि नारायण लिखता है - ' अधिवेदनम् - द्वितीयभार्यासम्बन्धः ' । उन कुल्लूकका अर्थ है - ' तस्यां सत्यामन्यो विवाहः कार्यः ' । राघवा- ना नन्द कहता है — ' सत्यामपि तस्यामधिवेदनम् – पूर्वांमधि तस्या दें, उपरि स्त्र्यन्तरपरिग्रहः ' । इससे स्पष्ट है कि पूर्व स्त्रीसे तलाक इस सिद्ध नहीं होता; किन्तु अनुरूप वृत्तिसे उसका पालन कहा है, तब तलाक कहां रहा? पौ फलतः गान्धर्व, आसुर, पैशाच, राक्षस आदि अधर्म-विवाहों में - जिनकी शास्त्रों में निन्दा है, जो आज - कलके गये -गुज़रे ज़माने में भी प्रचलित नहीं हैं, कहीं कहीं त्यागके वचन दीख सकते हैं, उसमें भी अर्थ - कामपरायण रागिजनोंको कुछ अंशोंमें अभ्यनुज्ञामात्र है, वैसी विधि नहीं । उसमें अनेक प्रति · प्रथ बन्ध हैं । कामविवाहोंमें भी सवर्ण सम्बन्ध निषिद्ध किये गये ( हैं । तब यहांपर स्पष्ट ऐकदेशिकता हुई । ऐकदेशिकता कभी क्ष सिद्धान्त नहीं हुआ करती । पहलेके चार धर्मविवाहोंमें तो तलाक १५ सर्वथा ही निषिद्ध किया गया है; तब प्रतिपक्षीका इष्ट तलाक पा खण्डित होगया । आगे प्रतिपक्षीने यमस्मृति, कात्यायन आदिका ६ नाम - भर लिख डाला है; उनके वचन उद्धृत नहीं किये; उनका ६ उत्तर भी पूर्व की भान्ति समझ लेना चाहिये । ७ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 399

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७६४ | श्रीसनातनधर्मांलोक ( 5 ) [ III लिखता इन निबन्धों द्वारा प्रतिपक्षियोंसे बहुत अभिमत ने कहा नियोग, विधवाविवाह तथा तलाक आदिके जो वचन उद्धृत किये भवति जाते थे; शास्त्रका उनका वैसा तात्पर्य नहीं - यह हमने सिद्ध कर ' । ( 2150 ) । दिया । प्रतिपक्षी भले ही विधवाविवाह - नियोग करें - करावें; हम स्वन्धः ' । उन्हें निषेध नहीं करेंगे; पर शास्त्रका नाम लेकर वे पतिव्रतधर्मके राघवा- सहायक मत बनें, और मोली - भाली जनताको धोखा मत धि तस्या दें, क्योंकि - शास्त्रका इनमें अभिनिवेश नहीं । यह कहकर हम तलाक इस निबन्धको समाप्त करते हैं I । अव परिशिष्टमें कुछ बचे हुए अष्टग्रही सन्देश तथा ' नमस्ते ' विषयको दिखलाकर फिर प्रत्यक्ष पौराणिक - विषयोंको उपस्थित करके इस अष्टम पुष्पको पूर्ण धर्म- करेंगे । फिर अन्य विषयोंको परमात्माकी कृपा से नवम पुष्पमें देंगे । के गये-के वचन को कुछ संशोधन एवं परिवर्धन पू. पं. २८८-६ यह प्रकार ( पंचमी - प्रथमें क प्रति • प्रथमाका प्रयोग ) वेदको भी सम्मत है । निरुक्तकारने ‘ आशुशुक्षरिण: ’ किये गये ( ऋ. २1१1१ ) में ' पञ्चम्यर्थे प्रथमा ' ( ६ | १ | १ ) मानी है । ३१२-२० कभी क्षत्रियत्व । ३४७ - १८ तं । ३५५-१५ मिलेंगे । ४५८ - २ निष्पापाः । तलाक १५ संकल्पाद् । ४७८-१३ कर्मण्यभि । ४८६-६ उच्छृङ्खल । ५२३–२ तलाक पाणिग्राहस्य । ५४५–१४ एकान्त । ५७७-२१ त्वं । ५७६-८ वाग्दान । प्रादिका ६५२-१ पतौ । ६५६ - ७ परतन्त्रा । ६७३ - २२ नहीं जा सकता । उनका ६७६ - १६ विदित । ७३५-१७ स्त्री । ७५५-१६ द्विषन्त्याश्च । ७६०-११ देवाः । परिशिष्ट-२६. ' अष्टग्रहीयोग'का सन्देश । अष्टग्रहीयोग आया, और बिना कोई हानि किये निकल गया । अष्टग्रहीयोगके आने तक तो अविश्वासी एवं विरोधी लोग भी जनता द्वारा होते हुए यज्ञ, जप, पाठोंको गम्भीरतासे देखते रहे, पर जब वह योग सकुशल बीत गया; तब विरोधियोंने सिर उठाया, और उन यज्ञोंको ब्राह्मणोंका ढोंग और उनकी अपनी उदरपूर्तिका साधन सिद्ध करते हुए वे कहने लगे कि - ' इसी अष्टग्रहीयोगकेलिए बड़े - बड़े यज्ञ किये गये, पूजा - पाठ किये गये; पर सब व्यर्थ । मालूम होता है कि ब्राह्मणोंने यह सब साधन अपने पेट भरनेका, अपने खाने - पीनेका बना रखा है । जिन ज्योतिषी लोगोंने प्रजाको बहुत डराया, उससे बहुतसा धन निकलवाया, और हुआ कुछ नहीं, उन ज्योतिषियोंको तो कड़ी सजा देनी चाहिये थी ' । यह था उस समय आजके युगका शङ्काप्रवाह; इससे कई ब्राह्मणोंको पीटा भी गया, ऐसा सुना गया है; और यज्ञोंमें घीके प्रयोगको व्यर्थ - व्यय, वल्कि मूर्खतापूर्ण भी बताया गया । इससे कई श्रद्धालुओंके हृदयपर ठेस पहुँची और इस विषय में वास्तविकता जाननेकेलिए हमें पूछा गया । हमने इस विषय में ' अष्टग्रहीयोगका सन्देश ' लिखा । यद्यपि उस समय इस निबन्धके प्रकाशनका विचार तो हुआ था; पर कारणवश रुक गया । यह सामयिक वस्तु नहीं, किन्तु सदा की है यह सोचकर इसे CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 400

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७६६ | श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) परिशिष्ट में प्रकाशित किया जा रहा है । ' आलोक ' - पाठकगरण भी इधर अवधान दें - । हम तो यह समझते हैं कि इस अवसरमें जिन्होंने दानादि दिया, वे तो शान्त रहे । जिन्होंने कुछ भी दान नहीं दिया; न कभी दान दिया करते हैं; वे ही बढ़ - चढ़कर बातें करने वाले एवं हो - हल्ला मचाने वाले थे । हम उन आक्षेपकर्ताओं से पूछते हैं कि यह यज्ञ - याग आदि उन दिनों क्यों किये गये? इसका यही तो उत्तर दिया जायगा कि — ‘ ग्रहोंकी शान्तिकेलिए ' । तब यदि ग्रहोंने हमारी आपकी पूजा स्वीकार कर ली, वे शान्त रहे, तब उन यज्ञोंकी, पूजा - पाठकी सफलता तो होगई । वे शान्त रहे; तब उसपर आक्षेप क्या? हाँ, यदि यज्ञ आदि खूब किये जाते; और ग्रह - मूलक कोई उपद्रव हो जाता; तो आक्षेपकर्ता फिर भी कहते कि - ' ग्रहोंकी शान्तिकेलिए यज्ञ किये गये; पर हुआ तो कुछ नहीं । हमारा धन व्यर्थ गया! ' तब यह आक्षेप कुछ सीमा तक सङ्गत भी होता; पर अब जबकि सव शान्ति रही है, तब फिर आक्षेप क्या? एक प्रश्न यह भी हुआ था कि- ' घी व्यर्थ आगमें झोंका गया । किन्हीं गरीवोंको खिला दिया जाता, कितना अच्छा होता । गरीवोंका पेट तो खाली रहा । अब घी भी मंहगा हो जायगा ' । तात्पर्य यह है कि सबको प्रसन्न रखना तो असम्भव होता है, और प्रश्नोंका अन्त कमी होता नहीं; पर यदि विचारदृष्टि रखी जावे, तो सब समझमें आ जाता है, पर यदि विचारदृष्टि न रखी ग्रहीयोगका सन्देश [ ७६७ जावे; तब फिर एतदादिक व्यर्थकी बातें निकल पड़ती हैं । वेदमें लिखा है- ' यानि नक्षत्राणि दिवि अन्तरिक्षे " प्रकल्पयन् चन्द्रमा यानि एति, सर्वाणि ममैतानि शिवानि सन्तु ' ( अथर्ववेद-सं. १६८ | १ ) ( जिन द्युलोक वा अन्तरिक्ष - लोकमें स्थित नक्षत्रोंको चन्द्रमा पार करता है, वे नक्षत्र हमारेलिए कल्याणकारी हों । यहाँपर नक्षत्रोंसे कल्याणकी प्रार्थना है । ' शं नः सूर्यं उरुचक्षा उदेतु ' ( १६।१०।८ ) यहाँपर सूर्यग्रहका कल्याणकारी होना प्रार्थित किया गया है । ‘ शं नो द्यावापृथिवी पूर्वहूते, शमन्तरिक्षं ' ( अथर्व. १६।१०१५ ) यहाँ लोक तथा अन्तरिक्षलोकसे कल्याण माँगा गया है । ' नक्षत्रमुल्काभिहतं शमस्तु नः ' ( १६६६ ) यहाँ उल्कासे ग्रस्त नक्षत्रसे शान्ति माँगी गई है । ' शमुल्का देशोपसर्गाः शमु नो भवन्तु ' ( अ. १६।६।६ ) यहाँ उल्काओंकी शान्ति तथा देशोप-द्रवोंका शान्त होना प्रार्थित किया गया है । वेदके इन निर्देशोंसे स्पष्ट प्रतीत होता है कि इन ग्रहों आदिसे जनताको भय प्राप्त हो सकता है, अतः इनके शान्त रहनेकी प्रार्थना की गई है । अव वेदमें ज्योतिषशास्त्रका स्पष्ट मूल देखिये - ' शं नो ग्रहा-श्चान्द्रमसाः शमादित्यश्च राहुरणा । शं नो मृत्युर्धूमकेतुः शं रुद्रा-स्तिग्मतेजसः ' ( अथर्व • १६ / ६ । १० ) यहाँ सूर्य, चन्द्रमा, राहु, केतु आदि महोंसे तथा धूमकेतु आदिसे कल्याणकी प्रार्थना की गई है । इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि यह ग्रह कभी बड़ी हानि भी दे सकते हैं । धूमकेतुको तो यहाँ मृत्युजनक भी स्पष्ट शब्दों में कह दिया गया है । अतः वेदने इनसे कल्याणकी प्रार्थना क CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative