सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 401–410
सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 401–410
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4 ७६८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) है । और देखिये-‘ उत्पाताः पार्थिवान्तरिक्षाः शं नो दिविचरा ग्रहाः ' ( अथर्व-१६६७ ) यहाँ प्रार्थना की गई है कि- पृथिवीके उपद्रव तथा अन्तरिक्षके उपद्रव शान्त रहें । द्युलोकमें चरने वाले ग्रह शान्त रहें । इससे वेदने स्पष्ट कर दिया है कि यह ग्रह तथा आकाशी उत्पात प्रजाकी हानि कर सकते हैं; श्रतः उनकी शान्त्यर्थं प्रार्थना की गई है । प्रार्थना यज्ञका एक अङ्ग हुआ करता है, क्योंकि - वेदका विषय भी शास्त्रानुसार यज्ञ ही होता है । हम हिन्दु लोग वेदके विश्वासी एवं वेदकी आज्ञा माननेवाले आस्तिक हैं । अतः वेदानुसार मानते हैं कि यह ग्रह उत्पात मचा सकते हैं; अतः उनकी शान्त्यर्थ वेदका संकेत देखकर यज्ञ - याग, जप - पाठ, पूजा-अर्चना आदि किये गये । अथर्ववेदसं की भूमिकामें आर्यसमाजी-विद्वान् पं ० राजाराम शास्त्रीजीने अथर्ववेदके कल्पसूत्र बताते हुए उसके प्रसिद्ध ' कौशिक- सूत्र ' ( संहिताविधि ) में ' धूमकेतु, चन्द्र, सूर्य आदि ग्रहोंके अनेक प्रकारके उत्पातोंकी शान्तियाँ ' भी एक - विषय बताया है; और उसके तीसरे ' नक्षत्रकल्प ' में भी ग्रह - नक्षत्रोंके उत्पातोंकी शान्तियाँ बताई हैं । उसके ७२ परिशिष्ट-प्रन्थोंमें ‘ नक्षत्रग्रहोत्पातलक्षणम्, ग्रहयुद्धम्, राहुचारः, केतुचारः, केतुलक्षणम्, उल्कालक्षणम्, यह ग्रन्थ भी हैं, जिनमें ग्रहोंके उत्पात तथा शान्तियोंके यज्ञ लिखे गये हैं । तब कौन कह सकता है कि यह सब बातें मनघड़न्त हैं, वा केवल प्रजाको डरानेकेलिए हैं? वेदका संकेत देखकर ही ग्रहोंके उस सम्भावित उत्पातको CC - 0. Ankur Joshi Collection अष्टग्रहीयोगका सन्देश । ७६६ शान्त करनेकेलिए मारतवर्षके विभिन्न प्रान्तोंके नगरोंमें जो हजारों यज्ञ हुए; उसीका परिणाम है कि कोई ग्रह का उत्पात उन दिनों नहीं हुआ । जैसे ग्रन्थके आरम्भ में सम्भावित विघ्नोंके दूर करने के लिए मङ्गलाचरण किया जाता है, यह क्यों? इसलिए कि- विघ्न शान्त हों; वैसे ही ग्रहों की शान्त्यर्थ भी यज्ञ याग एवं पूजा - पाठ तथा दान आदि किये जाते हैं । हिन्दु - जाति सदासे वेदमें विश्वास रखने वाली, धर्मप्राण तथा दान आदि द्वारा अपने धनका सदुपयोग करनेवाली रही है, इसीसे आजतक भारतवर्ष-की रक्षा हुई है । आजकल कई कम्युनिष्ट विचारों वाले अश्रद्धालु लोग वा कई राजनीतिक नेता वा सुधारक लोग इन बातोंको ढकोसला बताते हैं, और इस विषय में गलत प्रचार करते रहते हैं । न तो स्वयं कुछ करते हैं, न दूसरोंको कुछ करने देते हैं । बल्कि अपने राजनीतिक प्रभावका उपयोग करके धार्मिक कार्यों में भी टाँग अड़ाते रहते हैं, और अपने प्रभावका उपयोग करके धार्मिक कार्यों, यज्ञ - यागादिमें मारीच सुबाहु श्रादिकी भांति विविध बाधाएँ खड़ी करते रहते हैं, और धार्मिक - जनताकी श्रद्धा मिटाने वा घटानेका प्रयत्न करते रहते हैं । हमने इन्हें राजनीतिका नेता बनाया है, इसलिए इनका सम्मान करते हैं; पर यह हमारे धार्मिक नेता बनने की क्षमता नहीं रख सकते । उसमें नेता हमारे वेदशास्त्रोंके विद्वान् ब्राह्मण - गण ही हो सकते हैं, विदेशी भाषाओंके विद्वान् नहीं । स ० ध ० ४६ Gujarat. An eGangotri Initiative
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७७० 1 श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) जब राजाको प्राचीन समय में राज्यतिलक दिया जाता था; तब तिलक करने वाला विद्वान् ब्राह्मण एक मन्त्र पढ़ता था, जिसका अन्तिम अंश यह है कि- ' विश एष वोमी राजा, सोमो-ऽस्माकं ब्राह्मणाना ँ राजा ' ( यजुः ६।४० ) अर्थात् ऐ प्रजाओ! यह राजा - जिसका तिलक किया जा रहा है- यह तुम लोगोंका है, हम ब्राह्मणों पर अर्थात् धार्मिक नेताओं पर इसका थोड़ा भी आधिपत्य नहीं है । हम - ब्राह्मणोंका राजा तो सोम है, सोमसे यहाँ भाव यज्ञका है 1 । सो यज्ञोंपर, ब्राह्मणोंके धार्मिक कार्यों में राजा सम्भावित गड़बड़ी को हटानेकेलिए रक्षक तो बन सकता है, जैसे कि - प्राचीन समय में विश्वामित्र आदिके यज्ञों में महाराज श्रीरामचन्द्र, और कण्वमुनिके आश्रमके यज्ञोंमें राजा दुष्यन्त आदि रक्षक बने थे - पर उसमें राजा बाधक नहीं बन सकता । जो वेन आदि राजा न होतव्यं न दातव्यं न यष्टव्यं द्विजाः! कचित् ' इस घोषणा के करने वाले थे कि - ऐ ब्राह्मणो! तुम कुछ भी यज्ञ - याग. दान आदि मत करो कराओ । उस दुर्बुद्धि राजाको उस समयके तेजस्वी ब्राह्मणोंने अपने हुँकार मात्रसे नीचे गिरा दिया था । फलतः जो लोग इन शुभ - कर्मों में सुबाहु - मारीच आदि बनते हैं, उनकी शिक्षा - दीक्षा ही विदेशी हुई है, फिर वे देशिक धार्मिक कार्यों में क्यों न बिगड़ें? यह लोग नाममात्रसे ही पूर्व -जन्म - पुनर्जन्म मानते हैं । ईश्वरको भी आडम्बररूपसे मानते हैं । वस्तुतः यह लोग प्रच्छन्न - बौद्ध एवं आजकल के अनुसार कम्युनि अष्टग्रहीयोगका सन्देश ७ [ ७७१ हैं । इन्हीं लोगों की अश्रद्धाके उत्पादनके विविध उपद्रव हो रहे हैं । अतिवृष्टि फलस्वरूप भारतवर्ष में , अनावृष्टि, विनाशकारी जलप्रलय ( बा ), टिड़ियाँ, दुर्घटनाएँ, तूफान साम्प्रदायिक दंगे, बिस्फोट, गाड़ियोंकी, अलीगढ़ आदि में टक्करें आदिसे ज जन और शान्तिकी हानि हुई है, वा हो रही है; उसका लगाना कठिन है । इन्हीं लोगोंके कारण अनुमान मग्नतासे कृषिहानि कई एकड़ भूमियोंकी जल-, गोवंशका मीषरण ह्रास, भारतवर्षकी सीमा-का उत्तरोत्तर छोटा होते जाना, भारतवर्षके ही देशोंको शनैः दूसरों ( कम्युनिष्टों शनै: -एवं मुसलमानादि विधर्मियों ) द्वारा अपने उदरमें करते जाना, विधर्मियोंकी वृद्धि, देशभङ्ग गाँवोंकी जलमग्नता, सैकड़ों , धन जन - एवं हजारों पशुओं की दैनिक हानि, अपार सम्पत्तिका विनाश वा क्षतिग्रस्तता. नावोंके वा वसके डूबने से अनेक नर - नारी एवं बालकों का वह जाना, कई ऐक्सप्रेस वा माल - गाड़ियोंके दुर्घटनाग्रस्त होनेसे जन - धनकारा होना, विमान दुर्घटनाएँ, विस्फोटक बमके परीक्षणोंसेवाता-वरणके दूषित होनेसे अनेक रोग, कीटाणुओं की वृद्धिके साथ ही विश्वकी शान्तिके भङ्गका भी भय उपस्थित होना - आदि संकट उपस्थित हो रहे हैं । रामराज्यमें पिता के बैठे एक ब्राह्मण- उ बालक मरा था, उसमें राजाका ही दोष समझा गया था; व जिससे भगवान् श्रीरामको उसका प्रतीकार करना पड़ा; पर आज वैसे दोषोंको दूर करना तो दूर रहा, उलटा बढ़ावा दिया जा रहा है । परन्तु इस विषय में भारतीय जनताको राजनीतिक CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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७७२ | श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) [ ७७१ नेताओं पर विश्वास न करके अपने वेद - उपवेद, वेदाङ्ग, पुराण-रतवर्ष में इतिहास एवं धर्मशास्त्रों तथा उनके जानकार धार्मिक - विद्वानों नाशकारी पर विश्वास करके सत्कर्मोंके करने में ही लगे रहना चाहिये । आदिमें प्रजापति मनुजीने कहा है- ' जपतां जुह्वतां चैव विनिपातो न जो धन-विद्यते ' ( ४ | १४३ ) जो जप - पाठ तथा यज्ञ - हवन आदि करने-अनुमान कराने में लगे रहते हैं, उनका पतन कभी नहीं हुआ करता । की जल-सीमा- इसका कारण यह है कि - जप - तप, पूजा - पाठ, यज्ञ - याग - शनैः- आदि यह देवपूजा हुआ करती है । यज्ञ - शब्द व्याकरण-शास्त्रानुसार ' यज ' धातुसे बना है, यज धातुका अर्थ होता है-) द्वारा सैकड़ों देवपूजा, और देवताओंका सङ्गतिकरण तथा देवताओंके उद्देश्य-हानि, से दान | यज देवपूजासङ्गतिकरणदानेषु ( पाणिनीयधातुपाठ वसों के भ्वा. अनि. उभय- ) देवता भगवान्की एक महती शक्ति एवं अङ्ग क्सप्रेस हुआ करते हैं, और भगवान् है अङ्गी; यही अथर्ववेदसंहितामें कहा हानि है - ' यस्य त्रयस्त्रिंशद् देवा अङ्गे गात्रा विभेजिरे ' ( १०/७१२७ ) । वाता- अङ्गीकी पूजा अङ्गों द्वारा ही होती है । इन्हीं भगवान्की साथ महाशक्ति - देवताओंके हाथों जगत्का पालन एवं संहार होता है । - आदि यदि हम उन्हें पूर्वोक्त साधनोंसे स्निग्ध एवं प्रसन्न न रखेंगे; तब ब्राह्मण- उनकी रूक्षतासे हमारा भी संहार ही हो सकता है । उसी के था; बचावकेलिए भगवान् नन्दनन्दनने गीता में हमें यह उपाय ; पर सुझाया है कि - ' देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । दिया परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ' ( ३ | ११ ) अर्थात् तुम लोग तिक देवताओंको यज्ञोंसे प्रसन्न रखो; वे तुम्हें भी प्रसन्न रखेंगे । एक-CC - 0. Ankur Joshi Collection अष्टग्रहयोगका सन्देश [ ७७३ दूसरेके प्रसन्न रखनेसे तुम परम कल्याणको प्राप्त करोगे । देवस्वरूप ग्रह पञ्चभूतात्मक हुआ करते हैं. हमारे शरीर भी पञ्चभूतात्मक हैं । जब ग्रहोंका समुद्रपर प्रभाव पड़ता है, वृक्षों एवं जड़ी - बूटियों पर प्रभाव पड़ता है, तब हमारे पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश आदिपर और पचभूतात्मक हमारे शरीरों पर भी प्रभाव पड़ सकता है । हम उन ग्रहों की प्रतियोगिता में मच्छरके बराबर भी नहीं हैं; तब हमें उन्हें तुच्छ समझनेकी भूल कभी नहीं करनी चाहिये । अभिमानमें आकर हमें ही अपने - आपको सभी कुछ नहीं समझ लेना चाहिये । हमारे समाधि - सिद्ध ऋषि - मुनियोंने ग्रहोंका, देवताओंका हमपर प्रभाव पढ़ना ज्ञात करके ही अपनेसे उनके प्रतिकूल प्रभावको दूर करने के लिए बहुत अनुसन्धान करके ही यज्ञ - याग एवं पूजा - पाठ आदिकी सृष्टि की थी । ऐसा करनेसे वे ग्रहदेवता हमारी पृथिवी, जल, वायु आदिको शुद्ध रखते हैं । हमारे अन्दर सुबुद्धि देते है; अन्यथा तो वे प्रजाके जल वायुको दूषित करके और उसके अन्दर कुबुद्धि उत्पन्न करके महायुद्धोंक कारणोंको उत्पन्न कर देते हैं, और भूमिमें ऐसी भाप उत्पन्न कर देते हैं, जिससे भूकम्प आदि हो जाते हैं । जैसे ग्रन्थकी आदिमें विघ्न न होनेपर भी उसकी शङ्का होनेसे उनके प्रतीकारकेलिए किया जाता हुआ मङ्गलाचरण व्यर्थ नहीं माना जात; वैसे यज्ञादि भी देवताओंके शान्त्यर्थ होते हैं, वे मला व्यर्थ क्यों जावें? यज्ञोंमें अग्निमें घी डालना Gujarat. An eGangotri Initiative
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७७४ | श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) भी व्यर्थ नहीं होता । वह देवताओंको प्राप्त होता है । इससे देवता शान्त होते हैं; क्योंकि घी देवताओंका भोजन हुआ करता है । जब देव - अप्सरा उर्वशी हमारे इस लोकमें राजा पुरूरवाके पास आई थी; तो राजाने उससे पूछा कि - तुम्हारा भोजन क्या होगा? उर्वशीका उत्तर था कि- ' घृतं मे वीर! भक्ष्यं स्यात् ' ( श्रीमद्भागवत ६।१४।२२ ) यह पुराणका कथन है कि- मेरा ( देवता - उर्वशीका ) भोजन घृत होगा । केवल पुराण नहीं, किन्तु ब्राह्मणभागात्मक - वेदमें भी यही कहा है- ' घृतस्य स्तोक ँ सकृद् अह्न आरनाम्, तादेव इदं तावृपाणा चरामि ' ( शतपथ- ११ | ५ | १ | १० ) यह यहाँपर उर्वशी -पुरूरवाके संवादमें कहा गया है । केवल ब्राह्मणभागात्मक वेदमें ही नहीं; किन्तु मन्त्रभागात्मक- वेदमें भी यही कहा है- ' घृतस्य स्तोकं सकृदह्न आइनाम्, तादेव तातृपाणा चरामि ' ( ऋसं. १० । ६५।१६ ) यहाँ देवता एवं ऋषि पुरूरवा और उर्वशी हैं । इससे सिद्ध हुआ कि - देवताओंका मोजन घृत होता है । इसलिए देव - यज्ञ भी घृतसे होते हैं । इसलिए अथर्ववेदसं. में कहा है- ' इध्मेनाऽग्ने! इच्छमानो घृतेन जुहोमि हव्यं तरसे बलाय ' ( ३ | १५३ ) इससे यह सिद्ध होता है कि यज्ञमें घृत डालने से सूक्ष्म हुई विद्युत् शक्ति देवगणको प्रसन्न करती हुई हमारे शरीर में भी प्रविष्ट होकर हमारी प्राणशक्तिकी वृद्धि भी करके हमारी जीवन - शक्तिको भी बढ़ाती है । घृत देवताओंको ' प्राप्त होता रहे; तो उनमें रूक्षता नहीं रहती । यज्ञ - याग न करने से CC - 0. Ankur Joshi Collection अष्टग्रहीयोगका सन्देश [ ७७५ उनमें रूक्षतारूप अप्रसन्नताके रह जानेके कारण ही अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूकम्प, अकाल - मृत्यु आदि उपद्रव वे करते हैं । इसीका संकेत वायुपुराणमें आया है - ' यज्ञे नष्टे देवनाशः ततः सर्वं प्रणश्यति ' ( ६०।६ ) । जैसे राजशक्तिके अनिवार्य टैक्स आदि ठीक - ठीक न मिलनेपर राजशक्तिका ठीक - ठीक प्रयोग न होनेसे चोरी - डाका आदि घटनाओं से प्रजा जव - तब संत्रस्त रहती है, वैसे ही परमात्माकी अङ्गभूत - शक्ति देवशक्तिके समुप-बृ'हक यज्ञ - याग आदि न होनेपर जल वायु आदि भूतों पर देवशक्तिके ठीक - ठीक नियन्त्रण न रहनेसे अतिवृष्टि, अनावृष्टि, जलप्लावन, अग्नि - उपद्रव आदि भीषण ईतियाँ हुआ करती हैं । उन्हें दूर करनेकेलिए हमें उपवेद भी यज्ञ - यागादि करनेका संकेत देते हैं, और कहते हैं- ' जप- होमोपहार - इज्याऽञ्जलि -नमस्कार - तपोनियम - दया- दान, दीक्षाभ्युपगम- देवता - ब्राह्मण - गुरुपरं-र्भवितव्यम् ' ( सुश्रुतसंहिता सूत्रस्थान ६।२१ ) । महाभारतमें गायत्रीयज्ञसे ग्रहोंका शान्त होना बताया है-' ये चास्य दारुणाः केचिद् ग्रहाः सूर्यादयो दिवि । ते चास्य सौम्या जायन्ते शिवाः शिवतराः सदा ' ( वनपर्व २०० ८५ ) इससे स्पष्ट है कि - यह हमारी कपोल - कल्पना नहीं, किन्तु इसमें शास्त्रीय-आधार है । सो यह देवकमे है । इस देवकर्मको करने वाला चराचर जगत्को लाभ पहुँचाता है । यही वादि - प्रतिवादिमान्य मनुस्मृतिमें कहा है- ' दैवे कर्मणि युक्तो हि बिभर्तीदें चराचरम् ' ( ३।७५ ) । Gujarat. An eGangotri Initiative
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७७६ ] श्रीसनातनधर्मांलोक ( ८ ) जैसे किसान खेतकी मट्टी में गेहूँ डाल रहा हो; तो कोई अज्ञानी कह उठे, कि - हा! यह गेहूँ मट्टीमें झोंक रहा है । इससे अच्छा था कि- किसी गरीबको खिला देता ' । जैसे यह कथन आक्षेप्ताकी मूर्खताका प्रमाण है, वैसे घीका अग्निमें झोंकनेका आक्षेप भी क्षेप्ताकी अदूरदर्शिताका प्रमाण है । आक्षेप्ता नहीं जानता कि - यज्ञाग्निमें शुद्ध वेदमन्त्रविशेषके पढ़नेके द्वारा विधिपूर्वक डाला हुआ घृत कभी व्यर्थ नहीं जाता । वह सूक्ष्म होकर बहुत शक्तिशाली ' परमाणु वम ' बनकर जहाँ ग्रह - नक्षत्रों-की रूक्षता हटाकर उन्हें स्निग्ध करता है, जिससे वे अतिवृष्टि-अनावृष्टि आदि नहीं करते, शान्त रहते हैं, हमारे पृथिवी, जल, वायु आदिको शुद्ध रखते हैं, वहाँ हम सबके शरीरों तथा खेतीकी भूमि भी उक्त घृतके सूक्ष्म शक्तिशाली परमाणु पहुँचते हैं । हमें भी उसका लाभ होता है । आजकल जो अग्निमें पैट्रोलकी आहुतियाँ दी जा रही हैं, गन्दी गैस वाले पत्थरी - कोयलोंकी आहुतियाँ हो रही हैं, गन्दे परमाणु बमों, हाईड्रोजन वर्मोके परीक्षणोंकी गन्दी एवं रोगा-पादक धूलें उड़ रही हैं, उनसे जो गन्दे धुएँ निकल रहे हैं, वे हमारी बहुत बड़ी हानियाँ कर रहे हैं । उनके मुकाबिलेमें जब अभिमन्त्रित यज्ञाग्नियोंके घृताक्त एवं स्निग्ध धुएँ निकलेंगे, तभी वे कारखानोंकी चिमनियोंके गन्दे धुएँ दवेंगे । तभी यहाँ सबके स्वास्थ्य रहेंगे । कहनेका निष्कर्ष यह है कि जो इस अष्टग्रहयोगके समय CC - 0. Ankur Joshi Collection ग्रहीयोगका सन्देश [ ७७७ यज्ञ - यागादि हुए हैं, जो उनमें घृतकी आहुतियाँ व्यर्थ नहीं गईं । उन सबका भाग पड़ी हैं, वे केवल एक हमें भी प्राप्त हुआ है । स्थूल घृत व्यक्तिको लाम पहुँचाता है, परन्तु मन्त्रद्वारा अग्निमें हुत घृत यत्र - तत्र फैलकर देवताओंके आश्रयसे होकर प्रजाको लाभ पहुँचाता है । उस किसानका बलवान् हुआ वा मट्टीमें डाला हुआ, पानीसे मट्टी में मोंका गलाया गया बीज मूर्खकी दृष्टिमें नष्ट होगया, गल गया, पर विद्वानकी, दूरदर्शीकी ऐसा नहीं हुआ । वह चीज सूक्ष्म होगया, परमाणुरूप दृष्टिमें उसके बदले में हमें एक दानेकी जगह गेहूँ के सौ होगया । वैसे ही यज्ञों द्वारा वेदमन्त्रपाठपूर्वक दाने मिले । अग्निमें डाला गया भी बीजरूप होकर, सूक्ष्म परमाणुरूप होकर आगेके घीको बढ़ाने वाला है । यह आगमें घी मोंकना नहीं, यह वीजका खेतीकी भूमिमें वोना है । जैसे यज्ञके उस घीका सवको प्रसाद प्राप्त हुआ; वैसे ही यज्ञका धन भी सबको प्रसादरूपसे प्राप्त हुआ । इससे किसीकी कोई हानि नहीं हुई । देशका रुपया देशमें ही रहा । यह विदेशोंमें नहीं गया | इससे जहाँ देशके विद्वानों एवं प्रजा हितैषी-ब्राह्मणोंकी रक्षा हुई, उन्होंने वेदादि पढ़ने में तन - मन लगाया; और आगेकेलिए भी उन्हें वा उनकी सन्तानोंको प्रोत्साहन प्राप्त हुआ । वही द्रव्य केवल ब्राह्मणोंके पेटमें गया ऐसा कथन भी अदूरदर्शितापूर्ण ही है । उस धनका माग सबको मिला । देखिये, याद रखिये । Gujarat. An eGangotri Initiative
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७७८ J श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) यज्ञभूमिकी सफाई हुई, वह ब्राह्मणोंने नहीं की । उसकी रकम अन्त्यजोंके पास गई, जिन्हें आज ' हरिजन ' कहते हैं । पानी कौन लाया, उस भूमिकी शुद्धि किसने की? ब्राह्मण पानी नहीं लाये, कहार पानी लाये, उनको उसकी वृत्ति मिली । भूमिके समीकरण के लिए श्रमिक - मज़दूरों, यज्ञमण्डपके निर्माणार्थ ईंटें बनाने वाले, उन्हें ढोने वाले, मिट्टी खोदने वाले, वेदी - कुण्ड आदिके निर्माणार्थ बढ़ई - लोहार आदि, मण्डपके आच्छादनार्थ चटाइयाँ बुनने वालों, कुटियाएँ बनानेकेलिए घास - फूस लाने वालोंको लाया गया; उन - उनको अपनी वृत्ति मिली, यह ब्राह्मणोंको नहीं मिली । फिर तम्बू लाये गये, कनातें शामियाने लाये गये । उनका धन किसे मिला? उन - उन कम्पनियोंको? फिर चावल लाये गये, जौ लाये गये, तिल लाये गये, घी लाया गया, चीनी एवं मधु लाई गई । समिधाएँ लाई गई । खाने के लिए पत्तले लाई गई, अन्न लाया गया, पकानेके पात्र लाये गये । नमक, मिर्च, मसाले, खटाई, दाल एवं सब्ज़ियाँ लाई गई । यह सब मूल्यसे ही तो आया, ब्राह्मणोंके घरसे नहीं आया । इन सबके पैसे दुकानदारों एवं वनियोंको पहुँचे । गरीबों को भी उसमें भोजन मिला । अब बोलिये, यह सब क्या ब्राह्मणोंके पास गया? ब्राह्मणोंने सारा दिन तपस्या की, अपने दूसरे काम - काज छोड़े, बन्धनमें रहे, कड़ी सर्दीमें रहे, डवल-निमोनियाकी भी परवाह नहीं की । प्रजाके कल्याणार्थ यह सब कष्ट सहन किये । वेदमन्त्र बोले, पाठ किये, प्रार्थनाएँ कीं । CC - 0. Ankur Joshi Collection अष्टग्रहीयोगका सन्देश ७ [ ७७ ९ हवन किया । अग्निके धुएको सहा । एक मज़दूर भी चार - पाँच रुपये रोज़के ले जाता है, उस हिसावसे ब्राह्मणोंको बहु भाग मिला । एक ब्राह्मणके घर तो सारा द्रव्य गया भी नहीं, सबको बंटकर गया । यज्ञसामग्री निर्माणार्थं एवं यज्ञमण्डपकी सजावटकेलिए विविध व्यक्तियोंको, हलवाई, जुलाहे, कुम्हार, कसेरे, सुनार, दर्जी आदिको तथा यज्ञोंमें प्रबन्ध करनेकेलिए 7 प्रबन्धकों, पहरा देने वालों, बाहर से आये हुए अतिथियों के लिए नाई, रसोइये, पानी पिलाने वाले, बिजली फिट करने वाले आदि बहुतों को उस यज्ञके धनका भाग मिलता है । तात्पर्य यह है कि - यज्ञोंका भाग ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों, त शुद्रों, अन्त्यजों आदि सभीको मिला, बल्कि पशुओं को भी मिला, पक्षियों तथा कीड़े चींटों को भी मिला । सरकारको भी मिला, बिजली कम्पनियों, रेल कम्पनियोंको भी मिला । केवल ब्राह्मणोंके पेटमें कहाँ गया? ब्राह्मणोंने भी जो लिया, वह मुफ्तका नहीं लिया । वेदोंमें, शास्त्रोंमें, कर्मकाण्डमें जो उन्होंने श्रम किया हुआ था, मन्त्र बोले, सारा दिन आरामको भी हरामकर डटे रहे, यज्ञ किये, उसके फलस्वरूप धुनका बहुत थोड़ा सा अंश उन्हें मिला; क्योंकि और सब चीजें मंहगीं, सव पुरुष मंहगे, सबका समय कीमती, पर धर्म सस्ता, और ब्राह्मण सस्ते, और उनका समय भी सस्ता माना जाता है । किसी ब्राह्मणने ज़रा थोड़ी - दक्षिणा में मनमुटाव दिखलाया; तो उसे रा यह कहकर शान्त कर दिया जाता है कि - ' अजी पण्डित जी! Gujarat. An eGangotri Initiative
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७८० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 5 ) [ ७७ ९ चार आपके हाथ में तो सोनेका कटोरा है, आपको हम दे ही क्या - पाँच सकते हैं, आप तो त्यागके धनी एवं परोपकारी हैं ' । बहुत कम बड़ी - बड़ी योजनाओंके निर्माता लोग जनताका हज़ारों रुपया भी नहीं, डकार जाते हैं, वोटोंसे अफसर बनकर दूसरेके काम करानेके-लिए, दूसरोंको सर्विस देनेके लिए घुसें ले लेते हैं, बल्कि कुम्हार, रने के लिए दूसरोंकी बहू - बेटियोंकी इज्ज़त ले लेनेका संकेत भी कर देते हैं, योंके लिए वोटोंके नामसे हजारों रुपये सिगरेट चाय आदिमें फूँक दिये करने वाले जाते हैं; फिर मेम्बर बनकर उसी खर्चको सूद - समेत जनतासे ही निःशङ्क होकर ले लिया करते हैं, फिर अधिकारी बनकर वैश्यों, लोगोंको विविध वस्तुओंके परमिट दिलाकर प्राप्त हुए बहुत-भारी रुपये से अपनी कोठियाँ बनवा ली जाती हैं; उनपर तो को भी रको भी उङ्गली तक नहीं उठाई जाती; परन्तु धार्मिक कार्यों में श्राक्षेप्ता-नेताओंको व्यर्थ व्यय मालूम होने लग पड़ता है, यह कहाँका न्याय है? | क्या यह आप्ताओं की अपनी अनभिज्ञता वा नया, वह तो उन्होंने पक्षपातका नग्न प्रदर्शन करना नहीं? वस्तुतः यह हिन्दुधर्मपर कोसी सीधा आक्षेप है । अन्य धर्मोके सिद्धान्तोंपर आक्रमण करते नका बहुत हुए तो वे डरते हैं; क्योंकि वे आँखें दिखलाते हैं, उपद्रव करते ग, ब हैं; पर सहिष्णु हिन्दुधर्म वा हिन्दुधर्मियोंपर आक्षेप वा ब्राह्मण आक्रमण निःशङ्करूपसे किये जाते हैं । ठीक ही है- ' अकृतोपद्रवः । किसी कश्चिन्महानपि न पूज्यते । अर्चयन्ति नरा नागं, ना तो उसे गजादिकम् ' जब तक कोई उपद्रव नहीं करता; तब तक उसकी जी! पूजा नहीं होती । लोग नागकी तो पूजा करते हैं, पर उपद्रव न अष्टग्रहयोगका सन्देश । ७८१ करने वाले गरुड़ एवं हाथी की पूजा नहीं होती । जब वेदने वीजरूपसे ग्रहोंका तथा अन्तरिक्षका उत्पात बता दिया, उसीको वेदाङ्ग ज्योतिषने स्पष्ट कर दिया; इससे स्पष्ट होगया कि प्रहोंके उत्पात हो सकते हैं । कई बार हो मी चुके । सं ० १६६० वि ० में सात ग्रहोंके मेलसे विहारका प्रसिद्ध भूकम्प हुआ था, जिससे जन - धनकी अपार क्षति हुई थी । धूमकेतुओंके उपद्रव विदेशों में भी कई बार हो चुके । सो एक राशिमें ग्रहोंके इकट्ठे हो जानेसे कभी आकर्षण - विकर्षण में विषमता हो जानेपर उत्पातोंकी आशङ्का सम्भव हो सकती है; तब ब्राह्मणोंने यदि पहलेसे चेतावनी दे दी, तो क्या बुरा किया? उसका उपाय भी बता दिया; उसमें शत - प्रतिशत सफलता मी प्राप्त होगई; फिर आक्षेप क्यों? इसका सुफल भी हुआ । ' भय बिनु होत न प्रीत ' । जो लक्ष्मीमें प्रतिक्षण नाचा करते थे, जिनको परमात्मा के विषय में सोचनेकी फुर्सत भी नहीं मिलती थी; उन्होंने भी डरकर परमात्माको याद किया । पूजा-पाठ किया, स्नान - ध्यान किया, दान दिया । वैसे मला यह सव कौन करता? नास्तिक - लोगोंने भी इस भयावह समयका विचार करके ईशके आगे अपना शीश झुकाया । बमके जो परीक्षण हुए थे, इनकी खराव वायुने प्रजाकी हानि करनी थी, सो यह जो सारा वातावरण शान्त रहा, यह इन यज्ञोंका, पूजा-पाठका पुण्य - प्रताप हुआ । इससे सभीको, राजा प्रजाको, देश - विदेशको फल मिला । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat, An eGangotri Initiative
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७८२ । श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) और फिर जो जनताने दान दिया; तो दान कभी व्यर्थ नहीं जाता । आप पृथिवीको एक गेहूँके दानेका दान देते हैं, इसके बदले में वह आपको अपनी एक बालमें २५ दाने देती है । फिर जब उसे अभिमन्त्रित याज्ञिक वायु प्राप्त होती है, तब वे ही दाने बलवान बनकर सौ दाने बन जाते हैं । आप सूर्यक तीन अञ्जलि का अभिमन्त्रित जल देते हैं; इसके बदले में सूर्य आपको कई हज़ार बूँदें देता है, इसी प्रकार दाताओंने जिसे जितना दिया, वह ' कोटिगुणितं दिवि दायि ' ( नैषधचरित, पञ्चम सर्ग ) लोक - परलोकमें दाताओं को कई गुना फल देगा । भारतवर्ष में किया हुआ यज्ञ - याग विदेशों में भी कुछ फल देता ही है, कारण यह है कि - भारतवर्ष दुनिया का सैण्टर हैं, केन्द्र है, नामि । इसमें किये हुए कर्म अन्यत्र भी फलीभूत होते हैं । प्रजाके यज्ञयागादिका फल राजा वा राजप्रतिनिधियोंको भी प्राप्त हो जाता है । इसी उद्देश्यसे हिन्दुधर्म विश्वासी प्रजाने यह सब कार्य वैयक्तिक - हितके उद्देश्यसे नहीं, बल्कि — संसारभर के हितके उद्देश्यसे किया । फिर उसपर आक्षेप करना अपनी सर्वतोमुखीन दृष्टिका परिचय देना है । प्रतिकूल - कालचक्र लोगोंको अवश्य पीस दिया करता है, उससे कोई नहीं बच पाता । कहते हैं- एक बार भक्त - कबीरने किसी स्त्रीको चक्की चलाते देखा । दाने पिसे जा रहे थे । कवीरजीको इसमें कुछ सूझ आगई, और वे रोने लगे । पास खड़े हुए उनके लड़के - कमालने इसमें कोई रहस्य समझकर रोनेका CC - 0. Ankur Joshi Collection अष्टग्रहीयोगका सन्देश [ ७८३ कारण उनसे पूछा । तो वे कहने लगे-' चलती चक्की देखकर दिया कवीरा रोय । दो पाटोंके बीच में साबित वचा न कोय ॥ ' अर्थात् - कालरूपी चक्की के दो पाटोंके बीचमें जो प्रारूप अन्नका दाना पड़ता है, वह पिस ही जाता है, वह बच नहीं सकता । उस लड़के ने भी इस बातपर गहरा विचार किया; तो उसे बड़े जोरकी हँसी आगई । कबीरजीने इस रोनेके समय अकारण हँसनेका कारण उससे पूछा । तब उसने उत्तर दिया-' चलती चक्की देखकर हँसे कमाल ठठाय । जो किल्लीके निकट हैं, उनपर श्रांच न आय ॥ ' ( भावीसंकट पृ. १५-१६ ) अर्थात् यह ठीक है कि कालरूपी चक्कीके दोनों पाके बीच में आया हुआ प्रजारूप दाना अवश्य ही पिस जाता है, पर उस कालरूप - चक्कीके पाटोंके बीचों - बीचमें अचल ठहरी हुई U और उस चक्कीको चलानेवाली किल्लीरूप दैवीशक्ति है । जो G दाने उस किल्लीके पास - पास रहेंगे; चाहे चक्की सालभर मी द चलती रहे - फिर भी वे अखण्डित पड़े रहेंगे । उन्हें अकालमृत्यु कभी भी पीस न सकेगी । वे सुरक्षित पड़े रहेंगे । यह बात ठीक है, और स्वाभाविक है । इसी बातको लक्ष्य करके प्रजाने किल्लीरूप दैवी शक्तिकी निकटताकेलिए यज्ञ - याग आदि किये । इससे राजा प्रजा समीको फल मिलना था । उस स कालकी चक्कीका घूमना ही बन्द होगया । तव यज्ञों - द्वारा क्या प्र Gujarat. An eGangotri Initiative
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७८४ J श्रीसनातन धर्मोलोक ( ८ ) ७८३ बुराई हुई? तथापि अष्टग्रहयोग भी व्यर्थ नहीं गया । इस समय एक बड़ा भारी आतङ्कमय मृत्युभय उपस्थित होगया था; इसकी नजारूप चिन्तारूप चितामें ' चिन्ता चिता समाख्याता ' प्रजा झुलस गई । च नहीं यह भय कोई साधारण भय नहीं था । बहुतसे व्यापारका काम या; तो ठप्प होगया । लोगोंका लेन - देन ही बन्द होगया । एक हलका समय भूकम्प भी चेतावनीकेलिए आया । रेल गाड़ियाँ खाली गईं, या- रिज़र्वेशन बहुत थोड़ी हुई । कपड़े आदि वस्तुओंकी बिक्री बन्द होगई, इस प्रकार सर्कारको भी हानि हुई । कई लोगोंने अपनी सारी पूँजी बैंकसे निकलवा ली; और वह चोरी चली गई । ८-१९ ) ऐसी कड़ी सर्दीकी लहर कभी नहीं पड़ी थी; उससे कितना पाटोंके जनसंहार हुआ? कलकत्ता - चम्बई में कभी सर्दी नहीं पड़ती थी, है, उसमें भी पड़ी । पेरू ( विदेश ) में एक बर्फका पहाड़ गिरनेसे हुई पाँच हज़ारके लगभग पुरुष मर गये । वृक्षपर फल लगने और जो पकने और फिर उसके उपयोग करनेमें आगे - पीछे कुछ समय भर मी लगता ही है । प्रस्तावमें उपक्रम तथा उपसंहार भी विषयसे लमृत्यु पूर्व तथा पश्चात् हुआ करता है । सो इस योगसे छः मास पूर्वं कितनी दुर्घटनाएँ हुई; यह समाचारपत्रोंके पाठकोंसे अप्रकट • लक्ष्य नहीं । इसके वर्ष वा छः मास बाद तक भी दुष्प्रभाव हो सकता ज्ञ - याग है - यह स्वाभाविक बात है । जब साधारण ग्रहणका फल भी छः । उस मास तक माना जाता है; तव अष्टग्रहयोगका फल तो छः मास 7 क्या पूर्व और एक वर्ष पीछे तक हो सकता है । उन्हीं दिनों सुना CC - 0. Ankur Joshi Collection अष्टप्रहीयोगका सन्देश [ ७८५ गया कि - १४-१५ फर्वरीको स्केण्डेनेविया से ब्रिटेन तक बड़ा ज़बर्दस्त तूफान १७५ मीलकी रफ्तारसे आया, उससे समुद्री पानी तट पर चढ़ आया, जिससे बहुतसे पुरुषोंकी मृत्यु होगई, और हज़ारों पुरुष वे - घरबाहर होगये; रेलवे लाइन उखड़ गई । कई जहाज खोगये । ज्योतिषियोंकी प्रयोगके छः मास वा वर्षे बाद तक की मी अवधि थी । अभी तो फर्बरी मी ( जिसमें अष्टग्रहयोग था ) पूरा वीत नहीं पाया । अमी भी ५ ग्रह मकर-राशिमें इकट्ठे हैं । आजकल तो अष्टप्रयोगको मुश्किलसे छः मास बीते हैं कि- इटली में २२ अगस्तको तथा ईरानमें अगस्तके अन्त में भीषण भूकम्प हुआ है, जिसमें हजारों व्यक्तियोंकी मृत्यु होगई है । इन्हीं दिनों बाढ़ोंसे बड़ी हानियाँ हो रही हैं, यह सव उन्हीं अष्टग्रहोंका परिणाम है । यदि भारतवर्षकी भी यही विदेशों वाली दुर्दशा होती, तभी क्या आक्षेप्ता लोग प्रसन्न होते? वस्तुतः इन्हीं यज्ञों एवं पूजा - पाठसे भारतवर्षकी रक्षा हुई । सो यदि ज्योतिषियोंने सावधानतार्थ पहलेसे सूचना दे दी; इससे ज्योतिषियोंपर बिगड़नेकी मी क्या आवश्यकता है? आज २६-१-६२ को भी भूकम्पका झटका रातके ११ वजे लगा है । अभी अगला वर्ष और भी भयानक है जिसमें एक मास गुम है, और दो मलमास हैं । वस्तुतः यह सब दोषारोप व्यर्थ हैं । सभीको मनुजीका यह वचन याद रखना चाहिये कि- ' जपतां जुह्वतां चैव विनिपातो न विद्यते ' ( ४ | १४३ ) अर्थात् जो जपमें वा देवयज्ञ हवन आदिमें लगे रहते हैं; उनका कमी पतन वा अनिष्ट नहीं होता । सो Gujarat. An pogodnitiative
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७८६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) वेदादि - शास्त्रानुसार कहने वाले विद्वानोंके कथनानुसार पूजा-पाठ यदि अश्रद्धालु लोग खर्चके डरसे अथवा ब्राह्मणोंके लैटरबक्स - पेटमें पड़नेके भयसे उनसे नहीं कराना चाहते, तो वे मत करावें । स्वयं वे कर लें, इससे उस व्यक्तिका तो अनिष्ट न होगा । इस प्रकार सारी जनता करना शुरू करे, तब वह भी सकुशल रहेगी; तब किसी प्रकारके आक्षेप करनेकी आवश्यकता भी न पड़ेगी । यही है हमारा आपको शास्त्रीय ' अष्टग्रहीयोगका सन्देश ' | यदि आप इस विषय में अधिक ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं; तो हमारी ' आलोक ' ग्रन्थमालाके पञ्चमपुष्पमें ' यज्ञोंका वैज्ञानिक महत्त्व ' और चतुर्थपुष्पमें ' नवग्रहोंके मन्त्र ' आदि विषय देखिये; इससे आपकी सभी प्रकारकी शङ्काएँ मिटेंगी । हाँ, भय हृदयसे हटा दीजिये, ' मृत्योर्विभेषि किं बाल! न स मीतं विमुञ्चति ' मृत्यु डरे हुएको भी नहीं छोड़ती । तब ' नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि ' इस ' भगवद्गीता'का पाठ पढ़े हुओं को डर छोड़कर ' तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते ' शास्त्रानुसार चलनेका प्रयत्न प्रारम्भ कर देना चाहिये । याद रखना चाहिये यह भगवान्का वाक्य-यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषैः । भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥ ( ३।१३ ) यज्ञका शेष खाने वाले पुरुष सम्पूर्ण दुःखोंसे छूट जाते हैं पर जो केवल अपना ही पेट भरते हैं; वे दुःखोंको प्राप्त करते हैं । ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् । सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥ ( ३।३२ ) ' जो मेरा यह शास्त्रीय मत नहीं मानते; वे मूढ समयपर नष्ट होंगे ' । यह भगवान्का वाक्य उन लोगोंको नहीं भूलना चाहिये । नमस्ते पर विचार [ ७८७ ७ ( २७ ) ' नमस्ते ' पर विचार | वा ' नमस्ते ' प्रचार पर विचार हम ' श्रीसनातनधर्मालोक ' के इ १-२ पुष्पों ( द्वितीय संस्करण ) में रख चुके हैं, उसपर हमने सिद्ध किया था कि - ' नमस्ते ' यह एक पद नहीं, और यह प्रत्य- ज भिवादनार्थक ( आशीर्वादार्थक ) नहीं: छोटे - बड़े दोनोंके प्रयोग- क योग्य नहीं, और यह वैदिक शब्द भी नहीं । यह एक साम्प्रदा- स्म यिकशब्द है । आर्यसमाज इसका प्रचालक है । इसका प्रयोग सर्वत्र नहीं हो सकता । इसका बहुवचनादिमें प्रयोग करनेसे ' अशुद्धि हो जाती है, बड़ेको ' त्वं त्वया, तुभ्यम् - आदि कहना-लोक - व्यवहारके व्यवस्थापक धर्मशास्त्रसे विरुद्ध है ' । इन वार्तोके समर्थनार्थ आर्यसमाजी- व्यक्ति जो युक्ति - प्रमाण दिया करते हैं, हमने उनका सम्यक समाधान उसीमें कर दिया था । अ अब हमारा ध्यान ' टङ्कारा ' पत्रिकाके ' नमस्ते ' ( मार्च १६६२ उभ पृ. ३८-४१ ) निवन्ध पर दिलाया गया है । यद्यपि उसमें कोई नई बात तो नहीं है, सभी इन युक्तियोंका १-२ पुष्प में प्रत्युत्तर दिया जा चुका है, तथापि कुछ यहांपर भी पृथक् निर्देश कर दिया जाता है । इस निबन्धके लेखक महोदयने. आजकलके पर ' नमस्ते ' विषयक -ट्रैक्टों से सामग्री ली मालूम होती है; इसमें प्रत कोई उनका नया अपना अनुसन्धान मालूम नहीं होता । अ १ उसमें पहले - पहल राम - राम, राधेश्याम आदि शब्दको जा अभिवादनार्थक मानकर उनपर आक्षेप किया गया है, पर ऐसा १४ नहीं है । यह शब्द तो अपने इष्टदेवके स्मरणवाचक हैं, अभि- स्मर CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative