सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 51–60
सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 51–60
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७४ 1 श्रीसनातनधर्मांलोक ( ८ ) वेदस्वरूपनिरूपण [ ७५ का पाठ क्या पूर्वका पर्यायवाचक है? - वैदर इस प्रकार किसी शाखा में वालखिल्यसूक्तोंका होना, किसी में - १८३३ शा न होना, क्या आपस में व्याख्यान - व्याख्येयता है? कहीं सूक्तों की हरितं मी न्यूनाधिकता और मन्त्रोंका भेद क्या व्याख्यान- व्याख्येयता है? ८ ) इ थोड़े भेदमें शाखाभेद तथा अवेदत्व माननेपर ' स दाधार च पृथिवीमु॒त द्याम् ' ( अथर्व ४/२/७ ) और ' स दाधार पृथिवीं आपो द्यामुतेमाम् ' ( ऋ.सं. १०/१२१११ ) यहाँ भी थोड़ा भेद होनेसे पि क्या एक अमूलता वा अवेदता मान ली जावेगी? इस प्रकार व्याख शुक्ल एवं कृष्णयजुः में बड़ा भेद है; तब क्या यह व्याख्यान-नं. १४२३ व्याख्येयता है? दोनों संहिताओं के प्रथम मन्त्रमें ही पाठ - भेद को देखा देखिये - इसमें व्याख्यान - व्याख्येयता कुछ भी नहीं । बाष्कल-नकर शाखा में अनुवाकानुक्रमणी के अनुसार शाकल शाखासे ८ मन्त्र होगा, अधिक हैं । तब बाष्कलशाखा शाकलशाखाकी ही व्याख्या म कैसे? इतिहास के अनुसार तैत्तिरीय संहिता की भाषा तथा उसकी रचना वाजसनेयी संहितासे बहुत प्राचीन है; तब तैत्तिरीय संहिता वाजसनेयी संहिताकी व्याख्या कैसे? - 1१८ ) । वस्तुतः एष पश्चा करती । तब ( यजुःका विनिगमना जा ' ( एतदादिकता में व्याख्या व्याख्येयता नहीं हुआ कौन - सी शाखा मूल है, कौनसी व्याख्या है - यह भी ( एकपक्षकी युक्ति ) न होनेसे निर्णीत नहीं हो सकता? इससे प्रतिपक्षियोंका यह मत निर्मूल ही है । स्वा. द. जीने काण्व-वाचका शाखाकी ईशोपनिषद्को वेद माना है; तब उनके मतमें अन्य " यजुः वा शाखाएँ भी वेद सिद्ध हुईं । बृहदारण्यक उपनिषद् भी काण्व-जुः कारवा CC - 0. Ankur Joshi यजुः संहिता के शतपथका अन्तिम भाग है । ब्राह्मणभागको आर्यसमाजी वेदका व्याख्यान मानते हैं; तब क्या वे ब्राह्मणग्रन्थों को वेदकी शाखाएँ मानते हैं, क्योंकि वे शाखाका अर्थ वेदका व्याख्यान करते हैं । श्रीभगवद्दत्तजीने ' सचिविदं सखायं ' ( ऋ. १०: ७१/६ ) का व्याख्यान ' सखिविद सखार्य ' ( १ | ३ | १, २ १५१ ) इस प्रकार तैत्तिरीयारण्यकमें माना है । तो क्या वे आरण्यकको भी वेदोंकी शाखा मानते हैं? वास्तव में स्वा.द. के निर्मूल पक्षके समर्थनार्थ ही यह उनका प्रयत्न है; पर वह निष्फल है । ( 5 ) अब प्रकरणपर चलिये - शास्त्री अथवा अवयवी अथवा मूल वेद ही हैं । वह ( वेद ) एक ही होता है । मूल बहुत संख्या वाला नहीं होता । श्रथवा श्रवयवी भी बहुत संख्या वाला नहीं होता । न्यायदर्शनमें लिखा है- ' नानास्थानश्च सन् एकोऽवयवी ' ( ३ | १ | ५१ ) अर्थात् अवयवी अपने अनेक अवयवरूप अनेक स्थानों में होनेपर भी एक ही होता है । उस अवयवीके स्थूल अवयव ऋक् आदि चार होते हैं । उन चार अवयवोंकी सभी संहिता ११३१ होती हैं । भिन्न होनेपर लोक व्यवहारवश इन्हें शाखाएँ कहा जावे; पर यह सारा समुदाय मिलकर वेद कहा जाता है । शाखाओं से भिन्न शाखी कहीं नहीं होता । अवयवोंसे भिन्न श्रवयवी कहीं नहीं मिलता । इसमें न्यायदर्शनका प्रमाण देखिए-" यस्य ( अवयवीका ) यतः ( अवयवसमुदाय से ) अन्यत्र ( भिन्न, स्वतन्त्रतासे ) आत्मलाभानुपपत्तिः ( अपना स्वरूप नहीं मिलता ), Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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७६ ] श्रीसनातनधर्मांलोक ( ८ ) तस्य ( अवयवीका ) सः ( श्रवयवसमुदाय ) आश्रयः ( आधार होता है ) । न कारणद्रव्येभ्यः ( अवयवों से ) अन्यत्र ( भिन्न, स्वतन्त्रता-से ) कार्यद्रव्यम् अवयवी ( ) आत्मानं लभते ( अपनी सत्ता नहीं रखता ) कारणद्रव्य अवयव आधार होते हैं; और कार्यद्रव्य-अवयवी आधेय होता है, उनका आधार- श्रघेयभाव सम्बन्ध होता है । ( ४/२/१२ ) न्यायदर्शन में अन्यत्र भी इस विषयमें कहा है- ' तस्य ( अवयवीका ) अवयवस्थानस्य ( अवयव आश्रय हुआ करते हैं ) ( २।१।३२ ) ' नहि अस्य ( अवयवी वेदके ) कारणेभ्यः अवयवभूत ( शाखारूप कारणोंसे ) अन्ये एकदेशा भवन्ति ( भिन्न अवयव नहीं मिलते, किन्तु अवयव शाखा ही अवयवी वेदके एकदेश होते हैं ) ( २।१।३२ ) । इस प्रकार सिद्ध हुआ कि सभी अवयव मिलकर ही अवयवी होता है । अवयव ११३१ शाखाएँ तथा ब्राह्मण हैं, वे मिलकर ही श्रवयवी वेद बनता है । यह हम कह ही चुके हैं कि अवयवोंसे अलग अवयवी, शाखाओंसे भिन्न वृक्ष कहीं नहीं मिलता । इस प्रकार वेद - वृक्ष भी अपनी शाखाओंसे भिन्न कहीं अलग नहीं मिलता । जो कि आर्यसमाजी मूल वेदोंको चार मानते हैं, तो क्या वृक्षके मूल बहुत होते हैं? नहीं, मूल एक ही होता है । तब वादी उस मूल वेदको जो ऋगादि अपने अवान्तर भेदसे अलग हो; क्या कहीं दिखला सकते हैं? यदि नहीं; तब स्पष्ट है कि वृक्ष वा मूल वेद ही हैं, वह एक ही है । उसके स्थूलरूपसे दो स्कन्ध हैं -१ CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदस्वरूपनिरूपण ७८ मन्त्रभाग और २ ब्राह्मणभाग । इनमें मन्त्रभागकी स्थूलशाखाएँ ऋक्, यजुः, साम, १ शा भेदसे चार हैं । तब उन चारोंकी अवान्तर शाखाएँ ११३१ इस प्रकार ब्राह्मणभागके भी वही चार भेद हैं; उनके अथ ११३१ भेद हैं । जैसे साहित्य में ध्वनिके भेद ५१ माने जाते सा परन्तु ' ध्वनि ' उनसे पृथक् कोई नहीं होती वा मिलती; उसके भेदों का समुच्चय ही ध्वनि हुआ करती है । अथवा: शा सभ देहली है, वह अपनी सीमा के घर भूमि आदि से भिन्न रूपमें नहीं मिलती । पुरुष जा रहा होता है देहली के एकदे पर पूछने पर कहता है कि मैं देहली जा रहा हूँ । पुनः शा पूछने पर कहता है कि मैं देहलीके दरयागंज में वा पहाड़ने जा रहा हूँ, उसके भी लाजपतनगरमें, उसके भी फर्स्ट बी. अ मैं । इस प्रकार वेदके विषय में भी जानना चाहिये । में वेद भी अपने भेदोंसे, ऋग्वेदादि भी अपने भेदोंसे, अ मन्त्रभाग भी अपने भेदोंसे, ब्राह्मणभाग भी अपने में श भिन्न, स्वतन्त्र, ग्रन्थरूपमें नहीं मिलता; किन्तु सभी कह ब्राह्मणोंका समुच्चय ही मन्त्रभाग- ब्राह्मणभागरूप वेद हुआ सी है । फलतः वेद ११३१ शाखा रूप ही हुआ करता है; ऐसा बा कि- वेद तो चार अलग मिलें, और ११२७ शाखाएँ प्रव मिलें, किन्तु ११३१ शाखाएँ ही चारों वेद हैं; इन अपनी शाखाचोंसे भिन्न चार मूल वेद कहीं नहीं मिलते । यह निष्कर्ष वैस जिनको प्रतिपक्षी चार वेद कहते हैं; वे भी चारों वेदोंकी एक कि Gujarat. An eGangotri Initiative
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७८ ] श्रीसनातन धर्मालोक ( 5 ) वेदस्वरूपनिरूपण [ ७६ शाखा हैं । नाम, इसका प्रमाण यही है कि- श्रापको ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, ११३ अथर्ववेद कहीं भी नहीं मिलेंगे, किन्तु ऋग्वेद संहिता, यजुर्वेद संहिता, सामवेद - संहिता और अथर्ववेद संहिता हो मिलेंगी । इन चार पोथियों-जा को अर्वाचीन लोग जो चार वेद कहते हैं, अन्य संहिताओंको जती; । शाखा मानते हैं, इसका कारण वस्तुस्थिति से अनभिज्ञता ही है । अथवा सभी ११३१ संहिताएँ ही उतने ही ब्राह्मणोंसे मिलकर चार भन्न स्व वेद बनते हैं । एकदेर यह जो प्रसिद्ध वेदकी चार पोथियाँ मिलती हैं, यह भी पुनः शाखा ही हैं । जिसे आजकल ' ऋग्वेद ' कहा जाता है, वह पहाड़ग ऋग्वेदकी २१ शाखाओं में एक ' शाकल्य - संहिता ' है । जिसे कर्ट वी. आजकल ' यजुर्वेद ' कहा जाता है, वह यजुर्वेदकी १०१ शाखाओं-में एक वाजसनेयी अथवा ' माध्यन्दिनी संहिता ' है । जिसे दोंसे, आजकल ' सामवेद ' कहा जाता है; वह सामवेदकी १००० पने शाखाओं में एक ' कौथुमी संहिता ' है । जिसे आजकल ' अथर्ववेद ' सभी श कहा जाता है, वह अथर्ववेदकी ६ शाखाओं में एक ' शौनकी-हुआ संहिता ' है । ' आलोक ' पाठकोंको द्विज होनेके नाते इन सब ; ऐसा बातोंका ज्ञान अवश्य रखना चाहिये । धीरे - धीरे इस विषय में खाएँ प्रवृत्ति करनी चाहिये । अपनी जैसे ' वेद ' चार वेदोंसे पृथक् कोई स्वतन्त्र पुस्तक नहीं मिलती, निष्कर्ष वैसे चार वेद भी ११३१ संहिताओं से भिन्न पुस्तक छपे नहीं मिलते । की एक किसी भी प्रेस में छपे हुए, किसी भी घर में लिखे हुए, स्वतन्त्रं CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. चार वेद कहीं भी नहीं मिलते । जहाँ मिलेगी, ' ऋग्वेद संहिता ' मिलेगी, ऋग्वेद नहीं मिलेगा । ' यजुर्वेद संहिता ' मिलेगी, यजुर्वेद नहीं मिलेगा । ' सामवेद संहिता ' मिलेगी, सामवेद नहीं मिलेगा । ' अथर्ववेद संहिता ' मिलेगी, अथर्ववेद कहीं भी नहीं मिलेगा । यह बात अच्छी तरह याद रख लेनी चाहिये । ' ऋग्वेद संहिता ' का अर्थ होगा कि यह ऋग्वेद की संहिता है । फिर प्रश्न होगा कि यह ऋग्वेद की कौनसी संहिता वा किस ऋषिकी संहिता है, इसपर उत्तर मिलेगा कि यह ' शाकल्य-संहिता ' है, अथवा बाष्कल - संहिता है. अथवा आश्वलायन-संहिता है । ' यजुर्वेद संहिता ' का अर्थ होगा कि यह यजुर्वेद की संहिता है । यजुर्वेदकी कौन - सी वा किस ऋषिकी संहिता है - ऐसा प्रश्न होने पर उत्तर होगा कि यह यजुर्वेदकी वाजसनेयी - संहिता है, वा काण्वसंहिता है । वा यह यजुर्वेद की तैत्तिरीयसंहिता है, वा मैत्रायणी -संहिता है, वा काठक - संहिता है वा कठकपिष्ठल-संहिता है । यजुर्वेदकी सभी शाखाओंका नाम सामान्यतया ' यजुर्वेद संहिता ' होगा | विशेषता बतानेकेलिए ' वाजसनेय-शुक्लयजुर्वेद संहिता ' अथवा ' काएवशुक्लयजुर्वेद संहिता ' तैत्ति-रीय कृष्णयजुर्वेद संहिता, मैत्रायणी कृष्णयजुर्वेद संहिता आदि नाम कहा जावेगा । इसी प्रकार ' सामवेद - संहिता का अर्थ होगा- सामवेदकी संहिता | कौनसी, इस प्रश्न पर कहा जावेगा- ' कौथुमी- सामवेद-संहिता ', जैमिनीय सामवेदसंहिता । ' अथर्ववेद संहिताका अर्थ An eGangotri Initiative
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८० ] श्रीसनातन धर्मालोक ( ८ ) होगा कि - अथर्ववेद की संहिता । कौन - सी? इसपर कहा जावेगा कि - पैप्पलादी - अथर्ववेद संहिता, शौनकी - अथर्ववेदसंहिता । इस प्रकार वेदकी सभी संहिताओंके लिए समझ लेना चाहिये । यह अवश्य याद रखना चाहिये कि मूल ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद आपको कहीं भी नहीं मिलेंगे । फिर प्रश्न होगा कि - मूल ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद कहाँ हैं? इसका उत्तर है कि परमात्मा के पास । वृक्षका मूल कभी दीखता ही नहीं; वह भूमिमें धँसा हुआ होता है । तब आपको भी मूल ऋग्वेद आदि कैसे दीखें? हाँ, यहाँ इतनी विशेषता है कि यह ' ऊर्ध्वमूलमधः - शाखम् ' है । इन वेदोंका मूल ऊर्ध्व - परमात्मा के पास है, और शाखाएँ नीचे, इस लोक-में । फिर जिन - जिन भिन्न ऋषियोंने समाधि लगाई, उन - उनको तत्तद्वेद की संहिता प्राप्त हुई । माध्यम के भेदसे उस - उस संहिता-में कुछ - कुछ शब्दभेद रहा; अर्थभेद तो प्रायः नहीं । इसलिए उन - उन ऋषियोंका नाम उनको प्राप्त हुई संहिता के नामके साथ परम्परासे चला आता रहा है । मध्यम समय में यह ऋषि-नामोल्लेखकी शैली कुछ लुप्त रही; चाहे वह वेदके प्रथम मुद्रक मैक्समूलर के समय से हो, चाहे भारत में मुद्रक स्वा. दयानन्द के 1 । इन लोगोंका वश नहीं चला; नहीं तो ' ऋग्वेद संहिता ' आदि शब्द भी हटाकर ' ऋग्वेद ' आदि रख लेते; तब किसी को कुछ भी पता न रहता; पर उस समय से ही रहे, ' वेद - संहिता ' के ' संहिता ' शब्दने वेदों की स्थिति स्पष्ट कर दी । CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदस्वरूपनिरूपण te फिर विद्वानोंके अनुसन्धान से ' शाखाओं - संहिताओ ऋषियोंके नामका पता चला । इसलिए कई लोग उन ऋषियो उन संहिताओंका कर्ता मान लेते हैं; पर हमारे सनातन - हिन् धर्मके पारम्परिक विश्वास के अनुसार तपोयोगसे प्राप्त शब्द कृतक नहीं, किन्तु समाधि से दृष्ट तथा प्रोक्त हैं । शब्दोत थोड़ा - बहुत भेद होनेसे, अर्थभेद न होनेसे महाभाष्यकार • शब्दों में इस शैली में कहा गया कि - ' यद्यपि अर्थो नित्यः [ नियतः " या तु असौ वर्णानुपूर्वी, सा अनित्या [ अनियता ], तदभेदा एतद् भवति - काठकम, कालापकमित्यादि ' । यह उदाहरण ' प्रधानेन हि व्यपदेशा भवन्ति ' इस न्यायो ' प्रसिद्धिवश कहे गये हैं; यह अन्य सभी संहिताओंके निदर्शना हैं । उनमें आजकलकी वेदसंहिता नामसे प्रसिद्ध चार पोथियोंकी वर्षा नुपूष भी छन्द होने के नाते महाभाष्यानुसार श्रनित्य वर्णानुपूर्वी वा है । ' अनित्य'का अर्थ ' अनियत ' है, जैसाकि हम पूर्व ब चुके हैं । महादेवसे पाणिनिको समाधि द्वारा प्राप्त अइउण आ १४ सूत्र अनादि होने से अक्षर- समाम्नाय ( अक्षर - वेद ) कहे जाते हैं; पर महाभाष्यकार, जैसे ऋषियोंसे समाधि द्वारा ' दृष्ट ' होते पर भी वेद संहिताओं को उपचारसे ' कृत ' मान लेते हैं, वैसे उन्होंने अक्षर - समाम्नाय ( अक्षर - वेद ) अइउणको भी उपचार । कहीं पाणिनिकृत सूचित किया है । वस्तुतः महाभाष्यकारी प्रतिपादित यह मत वेदमीमांसक - मीमांसाशास्त्रसे विरुद्ध होने स ० ध ० ६ Gujarat. An eGangotri Initiative
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८२ ] श्री सनातन धर्मालोक ( ८ ) वेदस्वरूपनिरूपण [ ८३ हेताओ ऐकदेशिक ही है । इसी कारण वे प्रोक्त भी प्रन्थको ' कृत ' अर्थ में ऋषियों मान लेते हैं । इस प्रकार कई सभी संहिताओं को ऋषिकृत मान तन हिन्दू - हैं, पर वहां वस्तुतः दृष्ट वा प्रोक्त ही अर्थ है । जैसे एक प्राप्त संहिता के शब्द एक होनेपर भी माध्यम - व्याख्याताओंके भेदसे शब्दव उन शब्दोंके भिन्न - भिन्न व्याख्यान हो जाते हैं; वैसे समाधि-ष्यकारी योजक माध्यमरूप तपस्वी ऋषियोंकी भिन्न - भिन्नता से कहीं - कहीं [ नियत शब्दभेद भी हो जाता है । यह ऋषियोंकी भी एक जाति होती तद्भेदा है - ' गोत्रं च चरणैः सह ' ( वा ४ | १ | ६३ ) | यह भी वेदके साथ नित्य हुआ करते हैं, अथवा वे भी अवतारकी भांति होते हैं । न्याय जैसे - विष्णु आदि देव किसी मनुष्य के माध्यम में अवतीर्ण होते निदर्शना हैं, वैसे ही सृष्टिकी आदिमें ऋषि भी वेदके प्राकट्या अवतीर्ण नोंकी व होते हैं । वेदके अर्थकी समानतावश फिर भिन्न - भिन्न शब्दोंकी व्यर्थता पूर्वी बा हो जानेसे वह भिन्नता ' स्वस्य च प्रियमात्मनः ' इस न्यायके पूर्वबत अनुसार अपनी कुलपरम्परा वा गुरुपरम्परा वा ऋषिपरम्पराकी स्वीकृति से चरितार्थ हो जाती है; अर्थात् हमारे पूर्वज लोगों ने चारों वेदोंकी जो एक - एक संहिता स्वीकृत कर ली हमें भी का उसीका अनुसरण श्रेयस्कर होता है; पर दूसरी संहिता अवेद डष्ट ' होने नहीं हो जाती । कहीं यदि अन्य संहिताका मानुषत्द बताया वैसे गया हो, वहां ' नहि निन्दा निन्द्यं निन्दितुं प्रवर्तते, किन्तु विधेयं उपचारो ' स्तोतुम् ' इस न्याय से अपनी संहिता की स्तुत्यर्थ होता है । व्यंकार इस विषयमें विद्वानोंको विचार कर लेना चाहिये, क्योंकि-होने CC - 0. Ankur Joshi Collection यह गम्भीर विषय है । रहा प्रत्येक मन्त्र वा सूक्तोंके पृथक - पृथक ऋषियोंकी सत्ताका प्रश्न, सो जैसे अग्नि, वायु, रवि और अथर्वाङ्गिरासे प्राप्त भी वेद - संहिताओंके सूक्तों वा मन्त्रके भिन्न - भिन्न ऋषि भी माने ही जाते हैं; वैसे यहाँ पर भी समझ लेना चाहिये । उन्हें कविनिबद्ध वक्तृ रूपसे समझना चाहिये । फिर इन - इन संहिताओंके पृथक् - पृथक् ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद् भी इन्हीं में अन्तर्भूत हो जाते हैं; क्योंकि शब्द और अर्थका नित्य सम्बन्ध होता है । यही सनातनधर्मका पक्ष है, और यही वास्तविकता है । आजकलका मिलनेवाला इससे विरुद्ध मत भ्रान्त है, और अनुपादेय है, अज्ञानमूलक है । तब वेदी ' शाखा'का ' व्याख्यान ' अर्थ करना गलत है । ( E ) इस विषय में आर्यसमाजी अपने सम्प्रदायके विद्वानों की सम्मति भी सुनें । अपने समयके योग्य आर्यसमाजी विद्वान् स्वा. हरिप्रसाद ' वैदिक - मुनि ' ने अपने बनाये ' वेद - सर्वस्व ' के प्रथमभाग में ४० पृष्ठसे ४२ पृष्ठ तक यह लिखा है— ' स्वा. दयानन्दने ' शाखा ' पदका अर्थ ' वेद - व्याख्यान ' लिखा है । ' ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ' के प्रामाण्याप्रामाण्य विषय-प्रकरण में लेखका श्राकार इस प्रकार है- ' एकादशशतानि सप्त-विंशतिश्च वेदशाखा वेदार्थव्याख्याना श्रपि वेदानुकूलतयैव प्रमाणमर्हन्ति ' ( ग्यारहसौ सत्ताईस चार वेदोंकी शाखा वेदोंका व्याख्यान होनेसे परतः प्रमाण हैं ) इस लेखका खण्डन करते हुए श्रीसत्यत्रत- सामश्रमीने ऐतरेया लोचन ' के शाखा निर्णय-Gujarat. An eGangotri Initiative
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८४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) वैदस्वरूपनिरूपण प्रकरणमें बड़ा उपहास किया है । ' दन्त! का नाम संहिता शाखेति व्यपदेशशून्या तेन महात्मना उररीकृता; यस्या मूल-वेदत्वं मत्वा शाखेति प्रसिद्धानामन्यासां तद् - व्याख्यानग्रन्थत्वं मन्तव्यं भवेदिति तु अस्माकमज्ञेयमेव ' । इस उपहासका आशय स्पष्ट है कि जितनी वेद - संहिता हैं वे सब शाखानामसे कही जाती हैं । ऐसी एक भी संहिता नहीं, जो शाखानामसे न कही जाती हो । जिस यजुर्वेद संहिता पर स्वा. दयानन्दने भाष्य किया है, वह भी ' माध्यन्दिनी शाखा ' सुप्रसिद्ध है । फिर उनका यह कथन कि- ' ११२७ शाखा जो वेदोंके व्याख्यानग्रन्थ हैं- परतः प्रमाण मानता हूँ ' सर्वथा त्याज्य है । [ या सभी संहिता- शाखा, व्याख्यानमन्थ वा परतःप्रमाण होंगी, या सभी संहिता - शाखा मूलग्रन्थ ( वेद ) वा स्वतःप्रमाण होंगी ] । इस उपहासके अनन्तर प. सत्यव्रतने उसका समाधान किया है, वह भी द्रष्टव्य है । वह यह है कि- ' अपि वा शाखातत्त्वान-भिज्ञेन केनचित् तच्छिष्येण तत्रैवं स्याद् विनिवेशितम् ' । इस समाधानको चाहे कोई अदूरदर्शी समाधान समझे, वस्तुत: यह भी उपहास है । प्रथम उपहास स्वामीकी व्यक्तिपर है । यह दूसरा उनके अनुयायिओं पर है । प्रायः श्रद्धा जड़, विद्याविमुख, श्रज्ञानमत्त पुरुष स्वामी दयानन्दके ग्रन्थोंमें लिखी गई प्रमाण - विरुद्ध, शास्त्र - विरुद्ध बातोंको दूसरोंकी मिलाई हुई कह देते हैं, जो अत्यन्त निन्दनीय है; क्योंकि- स्वा. दयानन्दने एक ऋग्वेदादिभाष्य-भूमिका में ही नहीं, स्वमन्तव्यामन्तव्यमें भी लिखा है- ' ११२७ वेदोंकी शाखा जो वेदोंका व्याख्यान हैं; परतः प्रमाण मानता Sane मिलाना एक पुस्तक में हो सकता है, सब पुस्तकों में नहीं । हूँ ब्रव • मैंने [ वैदिकमुनिने ] बहुत चाहा कि पण्डित सत्यव्रत के प्रथम यह उपहासका जो स्वा. द. की व्यक्तिपर किया गया है, किसी प्रतीकार किया जावे; क्योंकि - स्वामी में मेरी भी श्रद्ध ेय - बुद्धि है, पस सूच ' त फोई षश नहीं चला । स्वामीका अर्थ सर्वथा निराधार होनेसे स पा निर्बल है । ( १० ) यहाँपर आजकलके आर्यसमाजियों की दृष्टि में वेद ' ध योग्य पण्डित श्रीसत्यव्रतसामश्रमीका तथा वैदिकमुनिका सु सन्दर्भ हमारे पक्षको स्पष्ट कर रहा है । महाभाष्यकारने श्र शाखा - विषयक - वचनमें यजुर्वेदकी १०१ शाखाएँ दिखलाई है । उनमें शुक्ल कृष्ण दोनों ही शाखाएँ मिलाकर लिखी हैं - यह हा पहले लिख चुके हैं । वहां शुक्ल कृष्ण दोनों शाखाएँ वेद ही है । ' ऋ यह भाष्यकारके उक्त - वचनसे स्पष्ट ही है । स्वा. द. ने कृष्णयजुर्वेद- गय को वेद स्पष्टरूपसे नहीं माना; परन्तु स्वामीके ही मान्य महा पुर भाष्यकार पतञ्जलिने ३ | ११७ सूत्रके भाष्य में कहा है- ' ऋषिः पठति शृणोत ग्रावाणः ' । यहां पर ' ऋषि ' का अर्थ ' वेद ' है । जैसे कि - ( क ) ' सम्बुद्ध प्रद ' शाकल्यस्येतावनार्षे ' ( पा. १ | १ | १६ ) यहां ऋषि ' ' शब्दको अ मन प्रत्यय करने पर ' आ ' बनता है । उसका अर्थ है ' वैदिक ' । श्रा फिर न- समास है । इसलिए इस सूत्र की पदमञ्जरी में श्री हरदत यज मिश्र ने कहा है - ' ऋषिर्वेदः ' । इसलिए ' एता गा ब्रह्मबन्धवित्य उस CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) मानवा ब्रवीत् ' इस ऋषि ( वेद ) के वाक्यमें प्रगृह्य - संज्ञा नहीं की गई । यह वाक्य भी काठकसंहिताका है; तब शाखाओंकी वेदता सिद्ध नके प्रथ हुई । ( ख ) ' कर्तरि चर्षिदेवतयोः ' ( पा. ३ २ १८६ ) इस पूर्वकृदन्तके सी प्रकार सूत्रकी व्याख्या में श्रीभट्टोजिदीक्षितने कहा है- ' ऋषिर्वेदमन्त्रः, है, प ' तदुक्तमृषिणा ' इतिदर्शनात् ' । ( ग ) ' बन्धने चर्षो ' ( ४ । ४ । ६६ ) इस प पाणिनिसूत्रमें भी ' ऋषि ' का अर्थ ' वेद ' है । ( घ ) ' आर्ष धर्मोपदेशं च ' ( १२।१०६ ) इस मनुके वचन में भी ' आर्ष ' का अर्थ ' वेद ' है,. में वेद ' धर्मोपदेश ' का अर्थ ' स्मृति ' है । ( ङ ) भोजराजकृत उणादिसूत्र नका या ( २ ११५६ ) की वृत्तिमें दण्डनाथनारायणने भी कहा है - ' ऋषि: -नेप वेदः ' । ( च ) वैजयन्तीकोषमें यादव- प्रकाशने कहा है- ' ऋषिस्तु लाई है । वेदे ' । ( छ ) मनु ( १।१ ) पद्यके भाष्य में श्रीमेधातिथिने भी लिखा - यह हम है - ' ऋषिर्वेद: ' । ( ज ) शाश्वतकोषके ७१६ पद्यमें भी कहा है-ही है । ' ऋषिर्वेद: ' | ( m ) निरुक्तमें भी ' ऋषि ' शब्द वेद अर्थवाला देखा यजुर्वेद गया है । जैसे कि - ' अथोत कर्मभिॠषिर्देवताः स्तौति, वृत्रहा, न्य महा पुरन्दर इति ' ( ७ । १३ । ११ ) । नः पठति तब ३ | १ | ७ सूत्रके भाष्यमें ' ऋषिः पठति - शृणोत प्राचाणः ' में भी ' ऋषि ' शब्दका अर्थ ' वेद ' है । इसलिए इस भाष्य के प्रदीपमें श्रीकैयटने भी कहा है- ' ऋषिर्वेद: ' । यह ' शृणोत प्रावाणः ' को मन्त्र कृष्णयजुर्वेदकी शाखा तैत्तिरीय - संहिता ( १ | ३ | १३ | १ ) में है, वैदिक ' | आर्यसमाजसे माने हुए चारों वेदोंमें कहीं नहीं, उसके माने हुए श्री हरद यजुर्वेद ( वा.सं. ) में तो ' श्रोता ग्रावाणः ' ( ६।२६ ) इस रूपसे है, न्धवित्य उस रूपसे नहीं | तब महाभाष्यकारको कृष्णयजुर्वेद की तैत्तिरीय-वेदस्वरूपनिरूपणं II III संहिता भी वेद इष्ट सिद्ध हुई । ( ख ) इस प्रकार मीमांसादर्शनमें - ' वेदाश्चैके संनिकर्ष पुरु-पाख्या ' ( १ | १ | २७ ) ' अनित्यदर्शनाच्च ' ( ११११२६ ) इस वेदोंकी पौरुषेयता के पूर्वपक्ष में ' ववरः प्रावाहरिणरकामयत ' ( ७ | १ | १०१२ ) ' कुसुरुविन्द औद्दालकिरकामयत ' ( २ २ १ ) इत्यादि जो वेदमन्त्र दिये हैं, वे कृष्णयजुर्वेद तै.सं.के हैं, शुक्लयजुर्वेद वा.सं.के नहीं । तब शुक्लयजुर्वेदकी शाखाओंकी भांति कृष्णयजुर्वेद की शाखाएँ भवेद सिद्ध हुई । महाभाष्यकार श्रीपतञ्जलिने केवल कृष्ण-यजुर्वेदकी ही शाखाओं को वेद नहीं माना, बल्कि सभी शाखाओं-फो बेद माना है - यह पूर्वकी भांति आगे भी बताया जायगा । सायणाचार्य सर्ववेदभाष्यकार कहे जाते हैं; पर उन्होंने शुक्लयजुर्वेद वा.सं. पर भाष्य नहीं किया; जिसे आर्यसमाज वेद मानता है, पर शुक्लयजुर्वेद काण्वसं. पर तथा कृष्णयजुर्वेद तैप्ति.सं. पर भाष्य किया है । यदि इन्हें वेद न माना जावे, तो उसे आर्यसमाजी भी सर्ववेदभाष्यकार कैसे मानते हैं? ( ११ ) जोकि - श्री. द. जिज्ञासुजीने स्वा.द.के यजुःसं. के भाष्य-पर टिप्पण करते हुए उसकी भूमिका ( प्र.सं. ) के ३७ पृष्टमें लिखा है कि - ' शतपथब्रा का कर्ता याज्ञवल्क्य लिखता है - ' तदु हैकेऽन्वाहुः ' होता यो विश्ववेदसः इति नेदरमिति आत्मानं त्रवाणीति, तदु तथा न ब्रूयाद्, मानुषं द्द ते यज्ञे कुर्वन्ति । तस्माद् यथैव ऋचा अनूक्तमेव अनुनयाद ' होतारं विश्ववेदसमिति ' ( १ | ४ | १ | ३५ ) इसका भाव यह है कि किसी शाखा वाले ' होता यो विश्ववेदसः ' CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ८ ] ऐसा पाठ पढ़ते हैं; सो पढ़ना ठीक नहीं; वह मनुष्यकृत पाठ है, वे यज्ञमें मानुष पाठ करते हैं; इसकेलिए जैसा ऋचाका पाठ है, वैसा ही बोलें, ' होतारं विश्ववेदसम् ' ( ऋ. १।१२।१ ) । इस प्रमाणसे दो बातें सिद्ध होती हैं । प्रथम शाखाएँ जितनी हैं, वे सब मानुष हैं । दूसरा- कोई ऋक्पाठ ऐसा है, जिसमें मनुष्यका कोई सम्बन्ध नहीं, और वही मनुष्य - सम्बन्धसे रहित मूल - वेद है ' । इस प्रकार श्रीभगवद्द्त्तादि भी कहते हैं कि - ' उपायव स्थ ' इत्यु इ एके [ तैत्तिरीयाः ] आहुः, तदु तथा न ब्रूयात् ( शत.. १/७/१/३ ) इससे वे कृ.य. तैत्तिरीयसं. को वेद नहीं मानते । यह ठीक नहीं है । इस विषय में हम छठे सुमनमें स्पष्टता कर चुके हैं । संक्षेप यह है कि जो अपनी - अपनी शाखाका पाठ युक्त तथा शाखान्तर-का पाठ ‘ मानुष ' माना जाता है, उसका तात्पर्य उनकी मनुष्यता बताकर उनकी निन्दार्थ नहीं है, किन्तु अपने यज्ञोंमें अपनी-अपनी शाखामें निष्ठास्थापनार्थ उसके मन्त्र बोलने में तात्पर्य हुआ करता है । क्योंकि यह एक न्याय प्रसिद्ध है कि- ' नहि निन्दा निन्द्यं निन्दितुं प्रवर्तते अपितु विधेयं स्तोतुम् ' । किसी अन्यकी निन्दा उसके निन्दनार्थ नहीं होती, किन्तु अपनी अभिमत वस्तुकी स्तुतिकेलिए हुआ करती है । उससे यह वात्पर्य प्रतिफलित होता है कि सभीको बहुत सी संहिताओंके मध्य में अपनी चार संहिताओंमें ही निष्ठा करनी चाहिये । जैसे- देवता बहुत होने से भक्तको अपने इष्टदेवमें निष्ठा करनी पड़ती है । जैसे वैद्योंके वैदस्वरूपनिरूपण हे ० बहुत होने से बीमार को अपने अभिमत वैद्य में निष्ठा करनी है, वैसे ही वाजसनेयी - शाखाके दर्श - पौर्णमासादियज्ञके साथि शाख मन्त्रोंमें ' होतारं विश्ववेदसम् ' इस शाकलशाखाकी ऋचाके निन्द को ही बोलना चाहिये, अन्य पाठको नहीं । देव इसी कारण ' गृह्या संग्रह ' में कहा है- ' य: स्वशाखोक्तमुत सिद्ध किन्त परशाखोक्तमाचरेत् । अप्रमाणमृषिं कृत्वा सोन्घे तमसि म वैसे ( २/६३ ) ' ऊनो वाप्यतिरिक्तो वा य: स्वशाखोक्तमाचरेत् । चाहि सन्तनुयाद् यज्ञं न कुर्यात् पारतन्त्रिकम् ' ( २/६३ ) । इसी वेदाध्ययनका नाम ' स्वाध्याय ' है । वीरमित्रोदय के संख मूल प्रकाशके वेदाध्ययनप्रकरणमें ५०५ पृष्ठमें इसकी स्पष्टता की मनुष तदुत्त ‘ स्वाध्यायोध्येतव्यः ’ । अधीयते इति अध्यायो वेदः [ इसी ( ऋ. निरुक्तमें भी ' अन्वध्यायम् ' में ' अध्याय ' शब्द वेदार्थ में पठित ऋच स्वस्य अध्यायः - स्वाध्यायः, स्वपरम्परागता शाखा - इत्या वादी ततश्व न यत्किञ्चिच्छाखाध्ययने विधिचारितार्थ्यम्, कि न रह स्वशाखाध्ययने एव । उक्तं च भट्टपादैः - ' पारम्पर्यागतां मु यह स्वां समाख्यानिबन्धिनीम् । शाखां, शाखान्तरं युक्तं ना सदृशे श्रमे ' । यत्तु ' वेदः कृत्स्नोधिगन्तव्यः ' इति मनुना ऋषिय इति वेदविशेषणमुपात्तम्, तदपि वेदशब्दस्य लिखितम्, शा वेदक परत्वेन तस्या एव कृत्स्नत्वमभिधत्ते, नैकवेदीया ने कशा खास कम् मिति न विरोधः । ततश्च यस्य या पित्रादिक्रमागता शा मुवाच तच्छाखीयेन कर्मणा संस्कृतः प्रथमं तां शाखामधीयीत ' । शतप बात साफ होगई कि अपने यज्ञमें अपनी पितृपरम्परा मनस CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) करनी के सामि शाखाको प्रयुक्त करना चाहिये । एकमें निष्ठा रखने के लिए दूसरे की ऋचाके निन्दा भी हो जाती है, जैसे कि- विशेष - देव के पुराणों में भिन्न देवकी निन्दा मिलती है, उसमें न पुराणोंकी अनेककर्तृकता सिद्ध होती है, न ही अन्य देवकी निन्दनीयता ही इष्ट होती है, चोक्तमु सिम किन्तु अपने इष्टदेवकी उपासनामें ही तात्पये हुआ करता है; वैसे ही यहाँ अन्य शाखाके पाठकी निन्दा में भी जान लेना चरेत् । चाहिये । यदि वादी शतपथसे स्वीकृत पाठ वाली ऋग्वेदसंहिताको । इसी मूलवेद मानता है, और उससे भिन्न पाठ वाली ऋग्वेदसंहिताको मनुष्य - प्रणीत मानता है; तो ' शतपथ ' ( ११ | ५ | १ | १० ) में ' इत्ये-ष्टता की तदुक्तप्रत्युक्तं पञ्चदशर्च बह्वृचाः प्राहुः ' यहाँ उर्वशी तथा पुरूरवाका : [ इस ( ऋ.सं. १०६५ ) सूक्त पन्द्रह ऋचाका कहा गया है, तो १५ नं पठित ऋचावाले ही ऋग्वेदको उसे मूल ऋग्वेद मानना पड़ेगा, परन्तु इत्यवादीसे अभिमत ॠ सं. में वह १८ ऋचाका है, वह फिर मूलवेद चम्, कि न रहेगा । वादीने यह भी नहीं बताया कि- ' होता यो विश्ववेदसः ' मु यह किस संहिताका है? तं वादी यह भी जानता होगा कि - शतपथब्रा. ' तस्मादेतद्-ननुना कृ ऋषिणा अभ्यनूक्तम् ' कहकर मन्त्रभागका, वादीके अनुसार म् शा वेदका प्रमाण बतलाता है । जैसे कि - ' तस्मादेतद् ऋषिणा श्रभ्य-शाखा नूक्तम् -'दध्यङ् ह यन्मधु श्रथर्वणो वाम् अश्वस्य शीर्ष्णा प्र यदी-ताशा मुबाच ' [ ऋ १ | ११६।१२ ] ( शत. १४ । १ । १ । २५ ) । इस प्रकार शतपथने कहा है- ' तदाहुः - मनो देवा मनुष्यस्य आजानन्तीति त ' । परम्परा मनसा सङ्कल्पयति, तत् प्राणमभिपद्यते, प्राणो बासं, बातो वेदस्वरूपनिरूपणं देवेभ्य श्राचष्टे, यथा पुरुषस्य मनः ' ( ३ । ४ । २ । ६ ) । तस्माद् एतद् ऋषिणा श्रभ्यन्तम्- ' मनसा सङ्कल्पयति, तद् वातमभिगच्छति । वातो देवेभ्य आचष्टे यथा पुरुष! ते मनः ' इति ( ३/४/२/७ ) यह मन्त्र किस वेद में है, यह वादीको बताना पड़ेगा । यदि ' मनसा सङ्कल्पयति तद् देवाँ अपि गच्छति ' ( १२/४/३१ ) यह अथर्ववेदसंहिताका मन्त्र ही वादीको वहाँ इष्ट हो; तो देखिये-दोनोंमें महान भेद है । शतपथ में पूर्वार्ध में ' वातमभिगच्छति ' है; पर अथर्व. में ' देवान् अपि गच्छति ' शतपथ में तो ' वातो देवेभ्य श्राचष्टे ' है, ब्रह्माणो वशाम् ' है । सो शतपथोक्त वह होगा, वही शतपथके मतमें वेदका होना अभिमत संहिताओं में शतपथोक्त ऋषि स्पष्ट है कि वह किसी अन्य संहिता में वेद - संहिताएँ ( केवल वादि - सम्मत नहीं ) कुल- परम्पराके अनुसार अपनी संहिता है; और उत्तरार्ध में पर अथर्व में - ' ततो ह मन्त्र जिस संहिता में चाहिये; पर वादीकी ( वेद ) मन्त्र न मिलने से पाठ है । इससे सभी वेद सिद्ध हैं । अपनी ही वेदत्वमें मुख्य है । यदि ' तस्मादेतद् ऋषिणा श्रभ्यनूक्तम् ' इस शतपथके सभी पाठों में ' ऋषि ' से ' मन्त्रद्रष्टा ऋषि ' विवक्षित हो; तो मन्त्रभाग भी ऋषि - प्रोत सिद्ध होने से वादीके अभिमत महाभाष्यके कथना-नुसार ऋषिकृत ही सिद्ध होगा; तब वादीके मत में ऋषिकृत आनुपूर्वी वाला होनेसे वह भी वेद सिद्ध न होगा । अथवा यदि शतपथने ही उस अथर्व के मन्त्र में ' हेर - फेर ' किया है; तो उसने ' आर्ष ' पाठको स्वयं ही ' मानुष ' क्यों किया? इससे वादीसे CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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६२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) वेदस्वरूपनिरूपण अभिमत सब आपत्तियाँ निरस्त होगईं । बल्कि शतपथ - प्रोक्त बद्द मन्त्र पूर्वापरसे सम्बद्ध है, अथर्व - प्रोक्त मन्त्रके पूर्वार्ध-उत्तरार्ध में सामञ्जस्य नहीं । तो यहाँ यह रहस्य प्रतिफलित हुआ कि सभी को अपनी कुल- परम्परा वाली शाखा ( संहिता ) को ही मूल मानना पड़ता है । इसलिए कृष्णयजुर्वेद ( तैत्तिरीय ) संहिता में भी सूक्तवाकके मन्त्रमें अन्य पाठको निराकृत करते हुए कहा है- ' यद् ब्रूयात् सूपावसाना च स्वध्यवसाना च इति प्रमायुको ( पागल ) यजमानः स्यात् ' ( २ | ६ ६ ६ ) यह निराकरण है, ' सूपचरणा च स्वघिचरणा च ' इत्येव ब्रूयात् ' यह अपने पाठका उपदेश किया गया है । इसलिए इस अवसर पर वादियोंके मान्य श्रीसायरणा-चार्यने भी अपने ऋग्वेदभाष्य के उपोद्घातमें कहा है- ' इत्यादि विधिरत्र निन्द्यमानोपि कचित् शाखान्तरे भवेत्, प्रामाण्यमपि तच्छाखाध्यायिनः प्रति भविष्यति । यथा गृहस्थाश्रमे निषिद्धमपि परान्नभोजनमाश्रमान्तरेषु प्रामाणिकम्, तद्वत् । अनेन न्यायेन सर्वत्र परस्परविरुद्धौ विधिनिषेधौ पुरुषभेदेन व्यवस्थापनीयौ । यथा मन्त्रेषु पाठभेदः शाखाभेदेन व्यवस्थापितः, तद्वत् । तत्र अनुष्ठातृ - पुरुषभेदेन व्यवस्था । तत्तत्पाठप्रामाण्यमपि तत्तच्छा-स्वाध्यायिनः प्रति भविष्यति ' ( ब्राह्मणकी विधिके प्रामाण्य-प्रकरणमें ) । इस प्रकार वादीका कथन कट गया, सभी वेदसंहिता वेद सिद्ध हुई । तभी तो महाभाष्यकारने यजुर्वेदका आदिम मन्त्र CC - 0. Ankur Joshi Collection बतलाते हुए ' इषे त्वा ऊर्जे त्वा ' इतना ही पाठ दिया है । यदि तैत्तिरीय - संहिता वेद इष्ट नहीं होती; तो ' वायव स्थ ' पाठ साथ देते; जिससे ' उपायव स्थ ' पाठवाली तै.स वैदिक शब्दोंसे भिन्न हो जाती । अब प्रतिपक्षी प्रकृत मन्त्रपर देखें – ' होता यो विश्ववेद इस पाठ में मानुषताका आरोप कल्पित है, वह पाठ शाखा में नहीं । यहाँपर यह समझना चाहिये कि - सामि नामक ऋचाओं का पाठ, होता नामवाला ऋग्वेदी ऋत्विक क है । सामिधेनी में पठित ' अग्निं दूतं वृणीमहे ' ( ऋ. १ । १३ मन्त्रका द्वितीय पाद है ' होतारं विश्ववेदसम् ' । इसके स्थान ' होता यो विश्ववेदसः ' यह पाठ पढ़ा जा सकता है; पर वा सनेयीशाखा के यजमानके यज्ञमें ' होतारं विश्ववेदसम् ' पाठ वाला मन्त्र ही पढ़ना चाहिये, पूर्व- पाठयुक्त नहीं । निषे लिए निन्दा अपेक्षित हुआ करती है । निन्दासे ही निषेध प्रवृत्ति रोकी जा सकती है । वहाँ निन्दा इस प्रकार कल्पित जाती है कि- ' होतारम् ' यह द्वितीयान्त एक पद है; पर निन्दार्थं ' होता - अरम् ' इस प्रकार दो पद कल्पित कर जाते हैं । ' अरम् ' का अर्थ है ' अलम ' । ' वाल- मूल- लघु - अर अङ्गुलीनां वा लो रत्वमापद्यते ' ( ४७६८ ) इस ११२६ औष सूत्र में स्थित वार्तिकसे ' ल ' के स्थान में ' र ' हो जाता है । ' अ का ' निवारण ' अर्थ प्रसिद्ध ही है । अव होता यह सोच रह II कि- ' होता ' यह पढ़ ' होता ' इस पदका ' अरं अलम् ' निं Gujarat. An eGangotri Initiative