सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 61–70

सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 61–70

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६४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) वेदस्वरूपनिरूपण [ e या है । कर रहा है, अर्थात्- ' होतारं विश्ववेदसम् ' में ' होता यो विश्व-व स्थ ' वेदसः ' मत कहो, ऐसा सूचित कर रहा है । तब ' होतारम् ' के 7.स स्थानमें ' होता ' यह सोचना मनुष्यबुद्ध्युत्पन्न होनेसे ' मानुष ’ - सा है । जब ' होता ' एक ही पद है; तब वहाँ ' होता अरम् ' इन विश्ववेद दो पदोंकी कल्पना में ' होता ' पदका मनुष्यता से सम्बन्ध करके उसकी निन्दा करना वाजसनेयी ( माध्यन्दिन ) शाखाके कर्म में पाठ उसके प्रयोगके निषेधको सूचित करता है । इस प्रकार अपनी-- सामि त्विक् अपनी वेदशाखावाले अन्य शाखाके पाठको ' मानुष ' कहकर क स्वशाखीय - कर्म में उसके उच्चारणका निषेध अभिप्रेत करते हैं । ऋ. ९ १ १६ इससे भिन्न शाखाओंके पाठकी मानुषता नहीं हो जाती; किन्तु के स्थान इस निन्दाका तात्पर्य अपनी शाखा में निष्ठाको दृढ करना हुआ 5 पर करता है । दसम् ' । यदि शतपथके कथनानुसार सभी संहिताएँ मनुष्यप्रोक्त हैं; निषेध और उनके पाठका प्रयोग शतपथके मतमें यज्ञहीनता है; तो निषेध उसी शतपथमें ' स होतुरिह निलिम्पति, तद्धोतौष्ठयोर्निलिम्पते कल्पित मनसस्पतिना ते हुतस्यानामीषे प्राणाय ' से प्रारम्भ करके ' देवा है; पर म इदं हविर्जुषन्ताम् इति तस्मिन्नुपहूते ' ( शत. १ | ४ | ८ | १, १४-३७ ) कर इन २४ खण्डोंमें तैत्तिरीय ब्राह्मण ( ३।५।१३ ) में पठित श्रुतियोंसे - लघु- श्रत ' अथ प्रतिपद्यते, इदं द्यावा पृथिवी भद्रमभूदिति ' से शुरू करके औ ' तस्माद आह- शं नो अस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे ' ( शत. १।६।२-२-२८ ) है । ' इन २५ खण्डों में तैत्तिरीय ब्रा. ३।५।१०-११ ) के मन्त्रोंका आशी-सोच रहा र्वादादि कर्मोंमें क्यों प्रयोग किया गया है? इससे स्पष्ट है कि-लम् ' निं CC - 0. Ankur Joshi शतपथकी दृष्टिमें सभी वेदशाखाएँ वेद हैं । ' होता यो विश्व-वेदसः ' यह किस शाखाका पाठ है जब तक वादी यह ठीक-ठीक न बताएँ; तब तक यह शाखान्तरका पाठ भी नहीं कहा जा सकता । यह कल्पना तो ' होतार ' के ' होता - अरम् ' की सूझसे निकली प्रतीत होती है । यदि इस पाठ बाली कोई विशेष शाखा होती; तो शतपथ में उसका स्थान - स्थानमें निराकरण होता; पर नहीं है । इसके अतिरिक्त शतपथके उक्त मन्त्र वाली संहिता भी शाकल्य-संहिता ही है; और वाजसनेय - शतपथसे उपजीवित संहिता वाजसनेयी, तथा काण्व - शतपथसे उपजीवित संहिता काव-संहिता ( शाखा ) है - यह प्रतिपक्षियोंको जान रखना चाहिये । ऐसी एक भी संहिता नहीं है, जो कोई किसी ऋषिके नामकी शाखा न हो । वाजसनेय - संहिता मूल है, कृष्णयजुर्वेद संहिता व्याख्यान है - यह भी नहीं कहा जा सकता । इतिहास से ही सिद्ध है कि- कृष्णयजुर्वेदसंहिता पूर्व थी, फिर श्रीयाज्ञवल्क्यने सूर्यसे शुक्ल यजुर्वेदसंहिता, तथा ब्राह्मण प्राप्त किया । तब कृष्णका व्याख्यान तो कदाचित् शुक्कसंहिता हो जाए, फिर वह ( वा. सं. ) भी अन्योंकी दृष्टिमें वेद न रहेगी, पर यह प्रतिपक्षियों को ष्ट है । ( १२ ) वर्तमान ऋग्वेदसं.को हमने शाकल्यसंहिता कहा है, इस पर एक प्रतिपक्षी कहता है- ' काठकसंहिता आदि के समान ऋग्वेद आदि के नामसे प्रसिद्ध शाकलशाखा आदि संहिताएँ नहीं हैं, किन्तु पदपाठका कर्ता होनेसे भी उनके नामकी Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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६६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) वेदस्वरूपनिरूपण संहिताएँ कहलाने लगती हैं । ' उखः शाखामिमां प्राह आत्रेयाय यशस्विने । तेन शाखा प्रणीतेयमात्रेयीति च सोच्यते, यस्याः पदकृदात्रेयः ' ( तैत्तिरीयकाण्डानुक्रम पृ. ६/२६, २७ ) उखने यह शाखा आत्रेय को पढ़ाई, आत्रेयने इसे पदपाठ करके तैयार किया, आत्रेय पदकार है, इसलिए यह ' आत्रेय संहिता ' कही जाती है । इसी प्रकार ऋग्वेद आदिकेलिए शाकल संहिता आदि की बात है । शाकल्यने ऋग्वेदका पदपाठ किया है ' । ऐसा कहने वाले प्रतिपक्षीसे प्रष्टव्य है कि आत्रेयको उख-द्वारा शाखाके प्रवचनसे और आत्रेयके द्वारा उसकी योजना से उस शाखाका नाम आत्रेयी हुआ, वा पदपाठके करनेसे? यदि पदपाठ करनेसे उसका ' आत्रेयी ' नाम होता; तो वैसे कहा जाता; पर वहाँ तो कहा है- ' तेन इयं शाखा प्रणीता इति सा आत्रेयी उच्यते ' ( उख से कही हुई शाखाका आत्रेयने प्रणयन किया, उसे लिपिबद्ध किया, अतः ' आत्रेयसंहिता ' यह उसका नाम हुआ । उसने उसके पदों की योजना की, और कुण्डिनने उसकी वृत्ति की । इसमें ' आत्रेयी ' इस नाम निर्देशका पहले हेतु कह्कर फिर ‘ यस्याः पदकृदात्रेयः ' कहा है । इससे सिद्ध है कि-पदपाठके कारण उसकी शाखाका ' आत्रेयी ' नामकरण नहीं, किन्तु आत्रेयद्वारा प्रणयन ही इसमें कारण है । यदि वह आत्रेयद्वारा पदपाठ करने से श्रात्रेयी है; तो कुण्डिन- द्वारा वृत्ति करनेसे वह ' कौण्डिनी ' क्यों नहीं । यदि वर्तमान ऋ.संहिता शाकल्य द्वारा पदपाठ बनाने से ही CC - 0. Ankur Joshi Collection • शाफल्य - संहिता कही गई है; तो जोकि वर्तमान यजुर्वेद स -वाजसनेयी, सामवेद संहिता कौथुमी, अथर्ववेद संहिता शर्मा कही जाती है, जिसे श्रीराजाराम शास्त्री, श्रीविश्वबन्धु श एम. ए., श्रीभगवद्दत्त बी. ए. रिसर्चस्कालर आदि आर्यसमा भी मानते हैं, तो वाजसनि, कुथुम, शौनक आदियोंने पदपाठ किया है - इसमें क्या प्रमाण है? | यदि वादी अनुम से ही यह कहता है, तो पूर्व तरीकेसे काठकसंहिता - श्रादि भी वह यजुर्वेद संहिता आदि मान ले, और कठ आदि उनका पदपाठ - प्रणेता मान ले । इसमें जो उसका उत्तर होर वही यहाँ हमारा होगा । वादीसे कहे हुए अभिप्रायकी असत्या अन्य हेतु यह है कि - शाकल्य श्रादि द्वारा पदपाठ करनेसे ' शास संहिता ' यह नाम कभी भी नहीं हो सकता । पदपाठ कभी संहिता स हो सकता । संहिता सन्धिका नाम होता है, पदच्छेदका नहीं वैसा होनेपर तो ' शाकलपदपाठ ' यही नाम होता । ' शाक्त संहिता ' नाम ही वादी के पक्षका खण्डन कर रहा है । ' शाकल्यने ऋग्वेदका पदपाठ किया ' इस विषय में बा निरुक्तकारकी साक्षी देता है कि- ' शाकल्य ने ऋग्वेदका पदा किया है, ' वा इति य इति च चकार शाकल्यः ' ( निरु. ६६ ( सार्वदेशिक सितं. अक्टू. १६४७ ) प्रतिपक्षीका यह कथन टी नहीं । निरुक्तकारके वाक्यका ' प्रतिपक्षीसे अभिमत अर्थ अ है । निरुक्तकारका सन्दर्भ यह है- ' वने न वायो न्यधायि चाका वन इव बायः - वेः पुत्रः, वा इति य इति च चकार शाकल स ० ध ० ७ Gujarat. An eGangotri Initiative

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८ ] श्रीसनातन धर्मालोक ( ८ ) जुर्वेद - स ( निरु. ६ | २८ | ३ ) इसका यह अर्थ है कि शाकल्यने अपनी ऋग्वेद-हताश संहिता में ' चने न ' इस मन्त्रमें ' वाय: ' इस एक पदको ' चा, यः ' बन्धु श इस प्रकार भिन्न - भिन्न पदरूपमें रखा है । इसका यह तो अर्थ आर्यसमा नहीं है कि उसने इस संहिताका पदपाठ किया; नहीं तो इसका योंने नाम ' शाकल्य - संहिता ' न होकर ' शाकल्य पदपाठः ' होता । यह अनुमा पदपाठ नहीं हुआ करता । आजकल शाकल्य की ही तो ऋग्वेद संहिता सर्वत्र प्रचलित है । जिसको स्वाद तथा उसके अनुयायी ऋग्वेद मानते हैं; उत्तर होर उसमें स्पष्ट ही ग्राज भी ' वा, यः ' यह भिन्न - भिन्न ही पद मिलते हैं । असत्या देखो वैदिकप्रेस अमेरकी ऋग्वेदसंहिता ' ' ( प्रा. सं. १०/२६ १, जिसे ' शाय ५६० पृष्ठ ) ' प्रत्यक्षे किं प्रमाणान्तरेण ' । जब प्रतिपक्षी निरुक्तकार-संहिता को आप्त मानता है, अपने पक्षको भी वैसा ही मानता है; तो अपने मत के अनुसार ' हेर - फेर ' वाली काठकसंहिता आदिको दुका नही' शाकल भी वेद माने; नहीं तो आर्यसमाजियोंको उचित है कि इस ऋग्वेदसंहिताका बहिष्कार करें; क्योंकि - शाकल्यने ' वाय: ' इस एक पदको ' वा, यः ' यह भिन्न - भिन्न पद करके, उसमें हेर - फेर में बा कर उसे ' मानुषी ' कर दिया । इस प्रकार निरुक्तमें उद्धृत का पदप ऋचाएँ वादीसे अभिमत ऋग्वेदसं. की ऋचाओं से कुछ भिन्न हैं-निरु. ६० जिन्हें हम दिखलाने वाले हैं । अब वादी अपने ऋग्वेदको कथन दी ढूँढें; नहीं तो वादीका वैदिक - धर्म ही नष्ट होता है । अर्थ यदि वादी कहे कि - उक्तसंहिता में ' वाय ' के स्थान ' वा यः ' यि चाका यह अलग - अलग अक्षर छापेकी भूल है ' । यह भी ठीक नहीं शाकल CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदस्वरूपनिरूपण [ ee है । इसके पदपाठ में भी ' वा,: य ' यह पृथक - पृथक पद हैं । श्रीविश्वेश्वरानन्द - स्वामी ( आर्यसमाजी ) तथा पूनाकी, तथा मैक्समूलर आदि की पदसूचियों में ' वायः ' यह एक पद है ही नहीं । श्रीविश्वे. वाली पदसूचीमें इसी मन्त्रवाला ' बा ' ( १०/२६/१ ) ३७१ पृष्ठमें है, ' यः ' ( १०/२६१ ) ३२१ पृष्टमें भिन्न-भिन्न पद हैं । अब आर्यसमाज ऋग्वेदसे शून्य होगया; क्योंकि— यह वर्तमान संहिता तो उसकी शाकल - शाखा है । न केवल ऋग्वेदसे, बल्कि श्रार्यसमाज अथर्ववेदसे भी शून्य होगया; क्योंकि उसमें भी ' वने न वा यः ' ( २०१७६।१ ) यह भिन्न - भिन्न पद हैं । उसकी पदसूची ( निर्णयसागर में मुद्रित ) में भी ' वाय: ' कोई पद नहीं । आर्यसमाजी श्रीविश्वेश्वरस्वामीकी अथर्वपद-सूची में भी ' वायः ' कोई पद नहीं । अव आर्यसमाज इस अथर्व संहिता को भी वेद न माने; क्योंकि यह तो शौनकी शाखा है, प्रतिपक्षी के अनुसार शौनकने इसके पदोंकी योजना की । अब उनको अपना अथर्ववेद भी हूँढना चाहिये । -यदि प्रतिपक्षी निरुक्तकारको यह बात मानकर उन्हें प्रमाण मानता है; तो इससे स्पष्ट है कि श्रीयास्ककी ऋग्वेदसंहिता यह शाकल्यसंहिता न होकर कोई अन्य ही थी । तभी तो श्रीयास्क-ने निरुक्त ( ८/२०1१ ) में ' वनस्पते! रशनया नियूय पिष्टतमया वनानि विद्वान् । वहा देवत्रा दिधिषो हवींषि प्र च दातारम-मृतेषु वोचः ' यह जो ऋचा दी है, यह वर्तमान ऋग्वेद ( शाकल्य ) -संहिता में इस रूपमें नहीं मिलती । उसमें तो ' वनस्पते! रशनया Gujarat. An eGangotri Initiative

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१०० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) वैदस्वरूपनिरूपण [ १०१ १ नियूया देवानां पाथ उपवक्षि विद्वान् । स्वदाति देवः कृणबद्ध-वींषि अवतां द्यावापृथिवी हवं मे ' ( १०/७०/१० ) इस रूप में मिली है । यदि यह मैत्रायणी - संहिता ( ४ । १३ । ६५ ) की ऋचा है; तब वह भी ऋचा ( वेद ) माननी पड़ेगी । निरुक्तके उक्त स्थल में ' दिधिषोः ' पाठ है; पर मैत्रायणीके उक्त स्थल में ' दधिषोः ' पाठ है । इस प्रकार ' देवेभ्यो वनस्पते! हवींषि ' ( नि. ८ १६२ ) यह पूर्व ऋचाके साथ वाली ऋचा भी प्रतिपक्षि - सम्मत ऋ.सं. में नहीं; किन्तु मैत्रायणी - संहिता ( ४/१३/६३ ) में है । ' भद्र ं वद दक्षिणतः ' यह निरुक्त ( ६/५/१ ) स्थित ऋचा भी प्रतिपक्षि- सम्मत ऋसं, में नहीं मिली, किन्तु ऋक् परिशिष्ट में मिली है । इस प्रकार निरुक्तमें स्थित ' ओषधे! त्रायस्वैनम् ' यह मन्त्र भी प्रतिपक्षी के तथाकथित वेद ( यजुः वा.सं. ) में नहीं मिलता । जहाँ मिलता है, वहाँ ' त्रायस्व ' के साथ ' एनं ' नहीं है । तब वादी यास्कसम्मत वेदोंको ढूंढे । अजमेर - मुद्रित वेदसंहिताओं का बहिष्कार करे; क्योंकि यह यास्कानुसार शाकल्य आदि शाखाएँ हैं । वस्तुतः शाकल्य - द्वारा पदपाठ करनेसे इसका नाम शाकल्य--संहिता नहीं, किन्तु शाकल्य के प्रवचन करने वा दर्शन करने से यह उसका नाम है । इसी कारण ' सर्वानुक्रमणिका ' में लिखा है - ' अथ ऋग्वेदाम्नाये शाकल के ' ( १।१ ) यहाँ षड्गुरुशिष्य ' वेदार्थदीपिका ' में लिखा है- ' शाकल्योच्चारणं शाकलकम् ' । शौनकाचार्यकी अनुवाकानुक्रमणी में भी लिखा है- ' शाकल्यद्दष्टे ( ४५ ) । शाकल्य संहिता होनेपर भी वह ऋग्वेद कहा जात है प्रतिपक्षी भी इसे ऋग्वेद कहते हैं; अतः वेद संहिताएँ सम घेद सिद्ध हुईं । तभी श्रीपाणिनिने ' यजुषि काठके ' ( ७ । ४ । ३८ ) रे काठकसंहिता को भी यजुर्वेद कहा है । ( १३ ) इसी प्रकार भाष्यकार द्वारा ' शं नो देवीरभिष्टये ' के अथर्ववेदका प्रथममन्त्रका प्रतीक लिखनेसे जिसे स्वा.द.ने भी ऋभाभू.में स्वीकार किया है; और वह अथर्ववेद- पैप्पलादसंहित में होनेसे सभी वेदशाखाएँ वेद हुई । इस विषय में ज्ञानार्थ पाठक ' श्रीसनातनधर्मालोक ' चतुर्थपुष्प ६ ) में मँगाकर उसके ' श्रीपतञ्जलि एवं ' शंनोदेवी ' मन्त्र ' निबन्धको देखें, जिसमें प्रति पक्षियोंके सभी व्याज काटे गये हैं । ' शं नो देवीः ' मन्त्र अथर्ववेदका प्रथम मन्त्र है । इस विषय में साक्षियाँ देखिये – ( क ) महाभाष्यकारने चारों वेदोंके आरम्भिक मन्त्रोंको दिखलाते हुए अथर्ववेदका प्रारम्भिक मन्त्र ' शंनो देवी ' दिखलाया है । ( ख ) गोपथब्राह्मणने ' शं नो देवी - ' इत्येवमादि कृत्वा अथर्ववेदमधीयते ' ( १।१।२६ ) लिखकर अथर्ववेदका आदिम मन्त्र ' शं नो देवी ' माना है । ( ग ) स्वा. दयानन्दने अथर्ववेदका व ब्राह्मण गोपथ माना है, ( स.प्र. ७ समु. पृ. ४२ ) और गोपय उ अथर्व - पिप्पलादसं.का ब्राह्मण है, सो पैप्पलादशाखाका प्रथम- म मन्त्र ' शं नो देवी ' होने से वह भी अथर्ववेद एवं वेद सिद्ध हुई ॥ गुर ( घ ) छान्दोग्यमन्त्रके भाष्य ( ६ । ४८ पृ. ११७ ) में गुणविष्णुने भी र कहा है- ' शं नो देवीरिति अथर्ववेदाऽऽदिमन्त्रोऽयं पिप्पलाद- दृष्टः । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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[ II pop १०२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) वेदस्वरूपनिरूपणं [ १०३ हा जाता इसीसे आजके विद्वानोंको पता लगा कि - अथर्व - पैप्पलादसं.का सभी प्रथम मन्त्र ' शं नो देवी ' है । ( ङ ) स्वा.द.ने भी ऋभाभू. के ८६ ४ ( ३८ ) ३ पृष्ठ में ' शं नो देवी ' को प्रथर्ववेदका प्रथममन्त्र - प्रतीक माना है । आर्यसमाजी श्रीब्रह्मदत्तजिज्ञासु आदि स्वाद के प्रत्येक वाक्यको ष्टये ' को शुद्ध मानते हैं । तब भी हमारा ही पक्ष सिद्ध हुआ । द ( च ) ' वेदसर्वस्व ' ( प्रथम भाग ) के १०३ पृष्ठ में आर्यसमाजी-संहिता विद्वान् स्वा. हरिप्रसाद ' वैदिक- मुनि'ने भी लिखा है - शौनक-ज्ञानार्थ संहिता [ अथर्ववेद का आरम्भ ' ये त्रिषप्ताः परियन्ति ' मन्त्र से उसके होता है, और पैप्पलाद संहिता [ अथर्ववेद ] का ' शं नो देवीरभिष्टये ' मन्त्रसे नमें प्रति प्रारम्भ होता है ' " ' " महाभाष्यकार पतञ्जलि मुनि और गोपथब्राह्मण के कर्ता जिस ' शं नो देवी ' मन्त्र से अथर्वसंहिताका श्रारम्भ लिखा विषय मे है, वह ' पिप्पलाद संहिता ' में ही पाया जाता है, शौनकसंहितामें नहीं ' । ( छ ) आजकल ' शं नो देवी ' मन्त्र अथर्ववेद - शौनकसंहिता के रम्भिक नो देवी प्रथमकाण्डके छठे सूक्तका प्रथममन्त्र है, अथर्ववेद - पैप्पलाद-' संहितामें नहीं मिलता, उसका कारण यह है कि आजकल जो येवमादि पैप्पलाद संहिता मिली है, उसका पहला पत्र नष्ट है । उसीमें आदिव ' शं नो देवी ' यह ४ मन्त्रोंवाला सूक्त था । मालूम होता है कि-थर्ववेदा वह पहले - पहल किसी अर्वाचीन मत वालेके हाथमें पड़ी, उसने गोप उस ' शं नो देवी ' वाले पहले पत्रको फाड़ डाला कि कहीं प्राचीन प्रथम- मत ' सभी शाखाएँ वेद हैं ' यह न सिद्ध हो जाय । भला हो द्ध हुई । गुणविष्णुका; उसने अपने छान्दोग्य मन्त्रभाष्य में यह लिख ने भी रखा; और सभीको ज्ञान हो गया । ( ज ) श्रार्यसमाजी श्री--दृष्टः । राजाराम शास्त्रीने भी अपने अथर्ववेदभाष्यकी २३ पृष्ठकी टिप्पणी में कहा है – ' यह [ शं नो देवीः ] सूक्त पैप्पलाद में नहीं है । सम्भव है - उसके पहले पत्र पर हो, जो नष्ट है । ( झ ) आर्यसमाजी श्रीब्रह्ममुनिने भी ' सार्वदेशिक ' ( सितं. अक्टू. १ ९ ४७ ) ४१२ पृष्ठमें कहा है- ' जिस ग्रन्थ में ' शं नो देवी ' पाठ प्रारम्भमें है... जो कि ' पैप्पलाद संहिता ' है ' । ( ञ ) आर्यसमाजके अनुसन्धाता श्री-भगवद्दत्त बी.ए.ने भी ' वैदिक वाङ्मयका इतिहास ' प्रथमभागके २२४ पृष्ठमें लिखा है— ' महाभाष्य पस्पशाह्निकमें अथर्वणोंका प्रथम-मन्त्र ' शन्नो देवी: ' माना गया है । गोपथब्राह्मण ( ११२६ ) का भी ऐसा ही मत है । इसी सम्बन्धमें छान्दोग्य - मन्त्रभाष्य में गुणविष्णु लिखता है - ' शं नो देवीः ' अथर्ववेदादिमन्त्रोऽयं पिप्पलादृदृष्टः ' अर्थात् पैप्पलादोंका प्रथममन्त्र ' शं नो देवीः ' है । पिप्पलादसंहिताके उपलब्ध हस्तलेख में प्रथमपत्र नष्ट हो चुका है । अतः गुणविष्णुके कथनकी परीक्षा नहीं की जा सकती ' । [ पर हम इसकी परीक्षा ' आलोक ' ग्रन्थमालाके चतुर्थपुष्प ( १२१-१६६ पृष्ठ ) में कर चुके हैं ] । ( ट ) ' वैदिक वाङ्मयका इतिहास ' प्रथमभागके द्वितीय-खण्डमें श्रीभगवद्दत्तजी ने लिखा है- ' शं नो देवी ' इस मन्त्र के सम्बन्ध में वह ( गुणविष्णु ) लिखता है - ' अथर्ववेदादिमन्त्रोऽयं पिप्पलाददृष्टः वरुणदैवतः । छन्दो गायत्री । [ यहां ' शं नो भवन्तु पीतये ' के ' स्थान ' आपो भवन्तु पीतये ' पढ़ा जाता है ] अर्थात् यह अथर्ववेदका प्रथममन्त्र है । इसका द्रष्टा पिप्पलाद है । इससे निश्चित होता है कि- ' शं नो देवी, मन्त्र ' पैप्पलाद संहिताका श्रादि CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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१०४ ] श्री सनातनधर्मालोक ( ८ ) मन्त्र था । ' ( ठ ) आर्यसमाजी - भाष्यकार श्री जयदेवने भी अपने अथर्ववेद भाष्यकी भूमिका में दबे शब्दों में माना है कि-' पैप्पलाद - शाखाका प्रथममन्त्र भी ' शं नो देवी ' मन्त्र है ' । ( ड ) श्रीब्रह्मदत्तजी जिज्ञासुने भी अपने यजुर्वेदभाष्य- विवरण ( प्र.सं. ) में इस मन्त्रके द्वारा पैप्पलादशाखाके अथर्ववेद सिद्ध हो जानेसे इस शङ्काको ' पर्याप्त बलवती ' माना है । पर उसका उत्तर देते हुए उनकी दशा दयनीय होगई है । इस विवेचनसे सभी शाखाएँ वेद सिद्ध हो जाती हैं । ( १४ ) बोधायनधर्मसूत्र ( २६/७ ) में ' जायमानो ह वै ब्राह्मणः ' ( तै.सं. ६ | ३ | १०१५ ) मन्त्र केलिए लिखा है- ' एवमृणसंयोगं वेदो दशैँयति ' । न्यायदर्शनके वात्स्यायनभाष्य ( ४/१/६० ) में भी उक्त वाक्यको ‘ वैदिकवाक्य ' ‘ ऋषि ' ( वेद ) कहा है, उससे कृष्णयजुर्वेदकी संहिताएँ भी वेद सिद्ध हुईं । ( ख ) अब इस विषय में महाभाष्यकी साक्षी देखिये- ' अस्त्य -प्रयुक्तः ' यह पस्पशाह्निकमें आक्षेपवार्तिक है, इसमें ऊष, चक्र आदि अप्रयुक्त शब्द आक्षिप्त किये गये हैं । इसके प्रत्युत्तर के उपसंहारमें ‘ सर्वे देशान्तरे ' वार्तिकके भाष्य में वादिप्रतिवादि-मान्य श्रीपतञ्जलि ने कहा है- ' ये चापि एते भवतोऽप्रयुक्ता श्रभिमताः शब्दाः, तेषामपि प्रयोगो दृश्यते । क? वेदे । तद् यथा - सप्तास्ये रेवतीरेवदूष, यद् वो रेवती रेवत्यां तमूष, यन्मे नरः श्रुत्यं ब्रह्म चक्र, यत्रा नश्चक्रा ' । यहां उन अप्रयुक्त शब्दोंको वेदमें दिखलाया है । इन भाष्यकारसे उद्धृत वेदमन्त्रों में CC - 0. Ankur Joshi Collection वैदस्वरूपनिरूपणे [ १०५ ' सप्तास्ये ' मन्त्र तो ऋग्वेदशाकल्यसं. ( ४ । ५११४ ) में मिलता है ॥ शा ' यत्रा नश्चक्रा ' यह यजुर्वेद वाज. सं. ( २५/२२ ) तथा ऋ लो ( १८६।१ ) में प्राप्त है । आर्यसमाज इन्हें वेद मानता है । ' यन्मे नरः श्रुत्यं ब्रह्म चक्र ' यह मन्त्र तो कृष्णयजुर्वेदका ठक.. ( ६।१८।६३ ) में मिलता है । ऋ.शा.सं. ( १।१६५ । ११ ) में भी है, परन्तु ' यद्बो रेवती ' यह मन्त्र किसी भी मुद्रित वेद संहितामें । भ प्राप्त नहीं । अतः इसे किसी लुप्त शाखाका मानना पड़ेगा; अंशतः । यह कृष्णयजुर्वेद - काठकसं. ( ३१/७/१८ ) में मिलता है, आर्यसमा या इसे वेद नहीं मानता; पर आर्यसमाजका परम मान्य भाष्यकार का इसे वेद मानता है | इससे सभी शाखाएँ वेद सिद्ध हैं? का ( ग ) प्रत्याहाराह्निकमें ‘ एओङ् ' सूत्र में महाभाष्य में ' ननु भोः! अ छन्दोगानां सात्यमुग्रिराणायनीया अर्धमेकार मर्धमोकारं च वर अधीयते — ' सुजाते एश्वसूनृते! ' अध्वर्यो ओद्रिभिः सुतम् ' इस की प्रश्न के उत्तर में कि- सात्यमुनि -राणायनीय सामवेद संहिता में शौ अर्ध ए - श्रो मिलता है - इसमें समाधान दिया गया है- ' पारिषद- सम्प्र कृतिरेषा तत्रभवताम् । नैव हि लोके नान्यस्मिन् वेदे अर्ध उप एकारोऽर्घ ओकारो वाऽस्ति ' अर्थात् - इस वेद ( सात्यमुनिसंहिता ( १ एवं राणायनीय - संहिता ) में तो अर्ध एकार मिलता है, पर अन्य शा वेद में नहीं मिलता । यहां महाभाष्यकारने ' नान्यस्मिन वेदे ' भा इस शब्द से # छान्दोग्य ( सामवेद ) की सात्यमुग्रि - राणायनीय- सी * सामवेदका ' छन्दःसंहिता ' नाम होनेसे उसके गान करने वाले श ' छन्दोग ' कहे जाते हैं, और उसका ब्राह्मण ' छान्दोग्य ' कहा जाता है । की Gujarat. An eGangotri Initiative

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१०६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) [ १०५ भी वेद मानी है । नहीं तो महाभाष्यकार ' नैव हि है । शाखा लोके, नैव च वेदे ' यह न कहकर ' नाऽन्यस्मिन् वेदे ' क्यों कहते? शासं, ‘ अन्यस्मिन् वेदे ’ कइनेसे सभी बेदशाखाएँ वेद सिद्ध हुईं । ना है । ( घ ) इस प्रकार ४ | ३ | १०१ सूत्रके महाभाष्य में ' नहि छन्दांसि ठकसं. क्रियन्ते, नित्यानि छन्दांसि ( वेदा:) ' छन्दोयँमिति चेत तुल्यमेतद् भी है, भवति - ग्रामे ग्रामे काठकं कालापकं च प्रोच्यते । ननु चोक्तम्-हिता में नहि छन्दांसि क्रियन्ते, नित्यानि छन्दांसीति । यद्यपि अर्थो नित्यः, अंशतः यातु सौ वर्णानुपूर्वी, सा अनित्या, तद्भेदाश्च एतद् भवति-समान काठकम्, कालापकम्, मोदकम्, पैप्पलादकम् ' इस सन्दर्भमें यकार काठक आदि सभी शाखाओंको छन्द ( वेद ) सिद्ध किया गया है, भोः! और उनका उस समय ग्राम - ग्राम में प्रचार भी सूचित किया गया है । 1 की आनुपूर्वीकी अनित्यता ( अनियतता ) तो सभी शाखाओं-रंच की बताई गई है, जिसमें वर्तमान शाकल्य, वाजसनेय, कौथुम, और इस इता में शौनकी संहिताएँ भी शामिल हैं- जिन्हें श्राजका श्रवचीन श्रार्यसमाज-रेषद • सम्प्रदाय चार वेद मानता है । यहां काठक आदि नाम तो उपलक्षणार्थ है । इस कारण ' शाकल्यस्य संहितामनुप्रावर्षत् ' हिवा ( १ | ४ | ८४ ) ' प्रत्यष्ठात् कठकौथुमम् ' ( २ | ४ | ३ ) यह भाष्यकारसम्मत अन्य शाकल्य - कौथुम - वाजसनेय आदि शाखाएँ भी वैसी सिद्ध हैं । वेदे ' भाष्यकारने ' यद्यपि अर्थो नित्यः ' कहकर ज्ञानरूपसे सारी नीय- संहिताओंको नित्य स्वीकार किया है । ' वर्णानुपूर्वी अनित्या ' से शब्दानुपूर्वी सभी आर्यसमाजादि- सम्मत वर्तमान- वेदसंहिताओं है । की भी अनित्य मानी है । हम तो यहाँ अनित्यका अर्थ ' अनियत ' ` वैदस्वरूपनिरूपणं [ १०७ समझते हैं, जैसा कि हमने ' आलोक ' के चतुर्थ पुष्पमें लिखा है; पर कई लोग ऋषिप्रोक्तता से ऋषिभेदवश ' अनित्य ' ही थे मानते हैं; उसमें वे प्रलय तककी सीमा मानते हैं । इसीके प्रमाणस्वरूप वे ' स्तोमं जनयामि नव्यम ' ( ऋ. १११०६२ ) इसे ऋषिका वाक्य मानते हैं । इसी प्रकार ' द्वे सृती अशृणवम् ' ( ऋ. १० / ८८।१५ ) तथा ऋ.सं. ( ७/२२६ ) आदि मन्त्रोंमें भी । इस कारण उनके अभिप्रायके अनुसार निरुक्त ( १०/४२/३ ) में ' प्र तद् वोचेम ' मन्त्रमें ' अवस्रवेत् ' पदके दो बार उच्चारणमें श्रीयास्कने ‘ तत् परुच्छेपस्य ( तन्नामकर्षेः ) शीलम् ( शैली ) ' यह कहकर उस विशेष - ऋषिकी ही यह दो बार कहने की शैली मानी है, यह शैली ऋ.सं.के १।१२७-१३६ इन तेरह सूक्तोंमें स्पष्ट है । इसीलिए हो न्यायभाष्यकार श्रीवात्स्यायनने भी २१२६८ सूत्रके भाष्य में ' सम्प्रदायाभ्यासप्रयोगके अविच्छेद से ही वेदोंको नित्य माना है, वर्णों की आनुपूर्वीकी नित्यतासे नित्य नहीं माना । क्योंकि-नैयायिक शब्दमात्रको अनित्य मानते हैं । इससे अपनी इष्ट संहिताओंके अतिरिक्त अन्य संहिताओंको अनित्य सिद्ध करना चाहते हुए आधुनिक व्यक्तियोंका पक्ष खण्डित है । यहाँ शाखाओं को अच्छन्द ( अवेद ) नहीं बताया गया है, किन्तु छन्द ( वेद ) ही । इस विषय में ' आलोक ' के चतुर्थ पुष्पमें स्पष्टता देखिये | ( १५ ) ( क ) पूर्वपक्ष – निरुक्तमें वेदोंकी श्रनुपूर्वीको नित्य बतलाया गया है - ' क्रीडन्तौ पुत्रैर्नप्तृभिरिति नियतवाचोयुक्तयो CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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१०८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) नियतानुपूर्व्या भवन्ति ' ( निरुक्त १११६ ) ( अर्थात् - वेद में ' क्रीडन्तौ पुत्रैर्नप्तृभिः ' ( ऋ. १० | ८५ | ४२ ) इत्यादि वेदमन्त्रों की आनुपूर्वी नित्य ( हेर - फेर से रहित ) है; पर शाखाओंकी वर्णानुपूर्वी हेरफेर वाली है; अतएव वेद नहीं । ( श्रीब्रह्ममुनि ) । ' नित्य ' शब्द और ' नियत ' शब्द समानार्थक हैं, कोशमें ' नियतं ध्रुवम् ' आया है, ' नियतं ध्रुवं नित्यं ' यह काशिका में है । स्कन्दस्वामीने द्वितीया-ध्याय में ' अर्थो नित्यः ' में निरुक्त तथा उसकी टीकामें ' नियत ' का अर्थ ' नित्य ' किया है । शब्दकल्पद्रुममें भी इसी प्रकार है । ( श्रीब्रह्मदत्तजिज्ञासु ) ( ख ) ' स्वरो नियत आम्नायेऽस्य वाम - शब्दस्य ' ( श २२५६ ) महाभाष्यके इस वचनमें वेद में ' अस्य वामस्य ' ( ऋ. १।१६४।१ ) इत्यादि वेदवचनों का स्वर नित्य और वर्णानुपूर्वी भी विना हेरफेर वाली कही है, पर शाखाओं में हेरफेर होता है; अतः -वे वेद नहीं । ( श्रीब्रह्ममुनि, तथा श्रीब्रह्मदत्तजिज्ञासु ) ( ग ) ' तेन प्रोक्तम् ' इस सूत्रमें महाभाष्यकारने कहा है- ' या त्वसौ वर्णानुपूर्वी सा अनित्या । तद्भेदाच्च एतद् भवति - काठकम्, कालापकम्, पैप्पलादकम् ' इस वचनके पर्यालोचनसे मालूम होता है कि काठक आदि शाखाओंका ऋषियोंने ही प्रवचन किया है, अतएव वे कृतक हैं; अतः वेद नहीं । ( श्रीब्रह्मदत्त जिज्ञासु, श्रीब्रह्ममुनि ) उत्तरपक्ष - ( क ) पूर्वपक्षीसे प्रष्टव्य है कि क्या वह निरुक्त-कारको प्रमाण मानता है? वह निरुक्तकार - प्रोक्त ' क्रीडन्तौ ' वेदस्वरूपनिरूपण I " ११ इस सम्पूर्ण मन्त्रकी आनुपूर्वीको नित्य मानता है; है । ' क्रीलन्तौ पुत्रैर्नप्तृभिः ' इतने अंशकी । यदि इतने ही अंश तो ऋसं. के उक्त मन्त्र में ' क्रीलन्तों ' यह वैदिक ' ल ' वाला देख और अथर्व में ' क्रीडन्तौ ' ( १४ | १ | २२ ) यह ' ड ' वाला पाठ पाठ है, तब इनमें भेद पड़ जानेसे वेदत्व नहीं रहा । यदि उक्त हो त्वा मन्त्रकी वर्णानुपूर्वी इष्ट है; तो ऋसं. में तो उक्त मन्त्रमें मेरे भेद मानौ स्वे गृहे ' यह पाठ है, और अथर्वमें ‘ मोदमानौ स्थान ति पाठ है । तब यहाँ शेष मन्त्रकी समानता तथा इन अं १० हेरफेर होनेसे प्रतिपक्षीके अनुसार वेद - मन्त्रत्व नहीं रहेग भेद · यदि रहेगा; तो अन्य शाखाओं में कुछ अंशों में भेद होने भी वह वेद ही रहेगा । वस्तुतः निरुक्तकार ' नियत ' शब्दका ( ऋ ' निश्चित ' तो मानता है ‘ नित्य ' नहीं । सो अपनी - अपनी संहित आ . मन्त्रोंकी आनुपूर्वी निश्चित होती है - यही यहाँ अर्थ इष्ट ५।१ ' ध्रुव ' आदिका भी वही अर्थ इष्ट है । ( ख ) अब ' अस्य - वामीय ' सूक्तकी आनुपूर्वी में भेद देखिये- श्र ऋसं.के प्रथम मण्डलके एक ही १६४ सूक्तमें उसके ५२ मन्त्री कि पर अथवेंमें नवमकाण्डके ६-१० इन दो सूक्तों में विभक्त हैं । अर इस पर वादी कहे कि - अष्टकवाली ऋसं. में देखो; तो वह व्य ' बाष्कल- संहिता ' है, वह वादीका वेद कैसे हो सकता है? ' स और देखिये- ' ऋसं. ( १।१६४ ) के ' अस्य वाभीय'का २१६ यह मन्त्र ' यत्रा सुपर्णा ' है, और २२ वाँ ' यस्मिन् वृते ' है, पर अ अ ( I ) में २१ वाँ मन्त्र, यस्मिन् वृते ' है और रेखा ' यत्रा सुप बह CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) ११० है; अ है । इयाँ विपरीत श्रनुपूर्वी होनेसे वादीके अनुसार भी वेदत्व ही अंश न रहा । अब इसी ' अस्य- वाम ' सूक्तकी वर्णानुपूर्वी में भी भेद ला देखिये - ऋसं.में ‘ सप्त स्वसारो अभिसंनवन्ते ' ( ऋ ३ ) यह पाठ पाउ पाठ है, और अथर्वमें ' अभिसंनवन्त ' यह लकारभेद है । ' अचिकि-उक्त त्वाञ्चिकितुषः ' ( ऋ. ६ ) ‘ अचिकित्वांश्चि- ' ( अ. ७ ) यह सन्धि-भेद है । यहीं ' विद्मने ' ( ऋ. ) विद्वनो ' ( अ. ) यह शब्दभेद है । नौ स्वर · ‘ तिस्रो मातः’'ग्लावयन्ति ‘ “ विश्वविदं अविश्वमिन्वाम् ' ( ऋ. € इन श १० ) ग्लापयन्त-- " विश्वविदो अविश्वविन्नाम् ' ( अथ. १० ) कितना हीं रहेग भेद है आनुपूर्वीका? । द होने ' अयं स शिक्ङ्क्ते ' यह इस सूक्तका प्रसिद्ध मन्त्र है । इसमें ' म ' दुका ( ऋ. २६ ), ' मर्त्यान् ' ( अ. ६/१०/७ ) यह वचनभेद है, क्या यह संहित पूर्वीभेद नहीं? ' द्यौर्मे पिता ' ( ऋ. ३३ ) ' द्यौर्नः पिता ' ( अ. इष्ट ५ ( १५५१२ ) में भी वचन - भेद है । ' पृच्छामि यत्र भुवनस्य नाभिः । पृच्छामि त्वा वृष्णो अश्वस्य रेतः ' ( ऋ. ३४ ) ' पृच्छामि वृष्णो देखिये- अश्वस्य रेतः । पृच्छामि विश्वस्य भुवनस्य नाभिं ' ( अ. १३ ) यहाँ २ मन्त्री कितना आनुपूर्वीका भेद है? ' त इमे समासते ' ( ऋ. ३६ ) ' ते हैं । अमी ' ( अ. १८ ) यहाँ सर्वनामका भेद है । ' सहस्राक्षरा परमे चोह व्योमन ' ( ऋ. ४१ ) यह मन्त्र यहाँ समाप्त है, पर अथर्व में है? ' सहस्राक्षरा भुवनस्य पङ्क्तिस्तस्याः समुद्रा अधिविक्षरन्ति ' ( २१ ) का २१६ यह बढ़ा हुआ पाठ है । ' विश्वमेको विचष्टे ' ( ऋ. ४४ ) ' विश्वमन्यो पर. अभिचष्टे ' ( अ. २६ ) यह पाठ है । इसी सूक्तमें अन्य भी सुप बहुत से आनुपूर्वी - भेद्र हैं- पर हमने नहीं दिखलाये । तब क्या वेदस्वरूपनिरूपण [ १११ श्रीमुनिजी अथर्ववेदसं. में ऋसं. से हेरफेर करनेके कारण अपने अथर्ववेदको अस्य वामीयसूक्तमें श्राम्नाय ( वेद ) नहीं मानेंगे, जो इसमें उनका उत्तर होगा; वही हमारा ' शाखाओंके पाठभेद ' में होगा । अतः महाभाष्यकारके मत में ' एतस्मिँच अतिमहत शब्दस्य प्रयोगविषये ते ते शब्दास्तत्र - तत्र नियत-विषया दृश्यन्ते ' इस महाभाष्यकार के वाक्य की भान्ति ' निश्चित ' . अर्थ है, कि ' अस्य वामस्य ' आदिमें अपनी - अपनी संहिता में ' वामस्य अस्य ' इस प्रकार विपरीत आनुपूर्वी नहीं होती । पूर्वपक्षीको यह बताना चाहिये कि ' छन्द ' और ' अन्ना ' शब्द पर्यायवाचक हैं- या भिन्न - भिन्न? यदि समान हैं, तो छन्दकी वर्णानुपूर्वी भी नियत सिद्ध हुई । यदि वादी काठक-' संहिता आदिको ' छन्द ' मानता है, ' श्राम्नाय ' नहीं, तब ' गोत्र-चरणाद् वुञ् ' ( पा. ४ | ३ | १२६ ) इसके उदाहरण ' काठकम् ' में आम्नाय ( वेद ) अर्थ में वुञ् प्रत्यय हुआ है, तब वादीका पक्ष कट गया । ' आथर्वणिकस्य इकलोपञ्च ' स्त्रैणताद्वित के ४३६ वार्तिकमें स्वा.द.जीने ‘ अथर्वन ' शब्दको भी चरणवाची मानकर ' आथर्वेणिकस्य धर्म आम्नायो वा श्रथर्वणः ' यह ' आन्नाय ' प्रथमें उदाहरण दिया है । महाभाष्यकारने जो छन्दोंकी आनुपूर्वी अनित्य बताई है, उसमें प्रतिपक्षि- सम्मत शाकल्य, वाजसनेयी, कौथुम, शौनक-संहिता आदि सभी शामिल हैं । बात यह है कि कई प्राचीन विद्वान् जिनमें श्रीपतञ्जलि - यास्क - गौतममुनि आदि सम्मिलित CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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११२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) हैं - वे वेदको अर्थ ( ज्ञान ) रूपमें तो नित्य मानते हैं, शब्दरूप में भी; पर शब्दोंकी अनुपूर्वीको उन - उन ऋषियों द्वारा आविर्भा-वित मानते हैं । इसलिए श्रीयास्क ' यत्काम ऋषिर्यस्यां देवता-यामार्थपत्यमिच्छन् स्तुतिं प्रयुङ्क्ते ' ( नि. ७११।४ ) यहाँ ऋषिको स्तुतिकर्ता कहकर मन्त्रको ऋषिकृत सूचित करते हैं । ' कुत्सः कर्ता स्तोमानाम् ' ( नि. ३ | ११ | ५ ) ' ऋषेदृष्टार्थस्य प्रीतिर्भवति आख्यानसंयुक्ता ' ( निरु. १०/१०/२ ) ' ऋषिर्नदो भवति, नदतेः स्तुतिकर्मणः ' ( निरु. ५ | २ | ६ ) ' एवमुच्चावचैरभिप्रायैर्ऋषीणां मन्त्र-दृष्टयो भवन्ति ' ( निरु. ७/३८ ) ' सत्त्वानां प्रकृतिभूमभिऋषयः स्तुवन्ति ' ( ७ । ४ । १० ) । एतदादिक निरुक्तके वाक्य इसी बात को सूचित करते हैं । ऐसा कई लोगोंका मत है । उन्हीं के मतानुसार कई वेदमन्त्र भी यह बात सूचित करते हैं । जैसे कि - ' स्तोमं जनयामि नव्यम् ' ( १।१०६ / २ ) यह ऋषिका ही वाक्य है । इस प्रकार ' द्वे सृती अशृणवम् ' ( ऋ. १०/८८/१५ ) ' इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद् विचचक्षिरे ' ( यजुः ४० | १० ) ' अग्निः पूर्वेभिषि भिरीड्यो नूतनैरुत ' ( ऋ. १।१।२ ) इत्यादि वेदमन्त्र मन्त्रोंकी ऋषिकृतता को सूचित करते हैं, इसलिए यत्र - तत्र ' मन्त्रकृत: ' ( तै.बा.२८७४ ) आदि शब्द आते हैं । श्रीयास्कने निरुक्त ( १०/४२/३ ) में इस विषय में तो स्पष्टताकी सीमातीतता कर दी है । वे ' प्रो-चेम ' आदि मन्त्रों में ' अवस्रवेत् ' आदि पदोंको दो बार उच्चारण करनेमें ' तत् परुच्छेपस्य शीलम् ( शैली ) यह कहकर परुच्छेप नामक ऋषिकी अपनी शैली ही बताते हैं । उस ऋषिकी मन्त्रके CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदस्वरूपनिरूपण [११ अन्तिम पदको दो बार पढ़ने की शैली ऋ.शा.सं. के ११२७ शुरू करके १३६ सूक्त तक १३ सूक्तोंमें देखी जा सकती है । सूच स श्री वात्स्यायन - गौतम आदि शब्दाऽनित्यत्ववादी नैयायिक वेदके शब्दोंको भी अनित्य मानकर उसकी नित्यतात. अनागत - मन्वन्तरयुगान्तरोंमें सम्प्रदायाभ्यासप्रयोगाऽविच्छेद. के ही कारण ( न्याय. २ | १ | ६८ ) मानते हैं, शब्द के नित्य होनेसे-नहीं । इसलिए नागेशभट्टने भी ' मतौ छः ' ( ५२ ५६ ) इस सूत्र की व्याख्यामें लिखा है - ' तत्तत्कल्पे यादृशी [ आनुपूर्वी ] ऋषिभिः कृताः सा तत्तत्कल्पसमाप्तिपर्यन्तं नियता- इत्यर्थः ' । फलतः यह वर्णानुपूर्वीकी अनित्यता सभी वेदसंहिताओंके. स लिए महाभाष्यकार ने मानी है, जिसमें प्रतिपक्षिसम्मत चार ल वेदसंहिता भी आ जाती हैं; केवल कठ आदि शाखाओंकी नहीं । काठक आदि उदाहरण तो महाभाष्यकारने प्रदर्शनार्थं य दिये हैं; नहीं तो इनसे भिन्न जैमिनि संहिता मैत्रायणी - संहिता आदिकी वर्णानुपूर्वी फिर प्रतिपक्षीके मत में भी नित्य हो जावेगी । जिस ' अस्य वाम ' के स्वरको प्रतिपक्षी नित्य मानता है, और उसकी आनुपूर्वीको भी; सो उसकी आनुपूर्वीकी अनित्यता वि हम पूर्व दिखा चुके हैं; अब उसके स्वरकी अनित्यता भी देख म लीजिये - ' अस्य वामस्य प ' ( ऋ १११६४ | १ ) ' स्य वामस्य ' ( ७ ) छ पहले मन्त्रमें विभक्तिको स्वरित है; ७ वेंमें स्वरित न करके अ अनुदात्त हो रखा गया है । दोनों ही अगला अक्षर उदात्त ( व है । इस प्रकार ' स्य वामस्य ' ( ६ ६ १ ) ' अस्य वामस्य ' ( ५ ) स ० ध ०८ Gujarat. An eGangotri Initiative