सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 71–80
सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 71–80
पृष्ठ 71
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
११४ ] श्री सनातनधर्मालोक ( ८ ) के इन मन्त्रों में पष्ठी विभक्तिके ' स्य ' में स्वरित और अनुदात्त स्वरका भेद प्रत्यक्ष दीख रहा है; इसका जो उत्तर होगा, वह अन्य संहिताओं में भी होगा । सो यदि प्रतिपक्षी ' महाभाष्य ' के वचन में ' छन्दः'का अर्थ ' संहिता ' ले, और ' संहिता ' में वर्णानुपूर्वीको अनित्य माने और वेदमें नित्य; तो उसे याद रखना चाहिये कि ऋग्वेद, यजुर्वेद आदि कहीं न तो मिलते हैं; और न कभी मिल सकते हैं । आपको ऋग्वेदसंहिता, यजुर्वेदसंहिता आदि ही मिलेगी, ऋग्वेद आदि नहीं मिलेंगे । इसी प्रकार काठकसंहिता आदि भी यजुर्वेद-संहिता हैं, बाष्कल - संहिता आदि भी ऋग्वेद संहिता हैं, पैप्प-लाद संहिता आदि भी अथर्ववेद संहिता हैं । जो उन पर यह लिखा नहीं मिलता; उसमें कारण प्रकाशकोंका या तो अज्ञान है, या प्रकाशक प्रायः आर्यसमाजी हैं । उन्होंने उसे वहांसे हटा है । सो महाभाष्यकारका उक्त मत वेदमीमांसक मीमांसादर्शन-से विरुद्ध होनेसे ऐकदेशिक हैं । उसके दोनों वाक्यों में कोई विरोध नहीं । ' नहि छन्दांसि क्रियन्ते, नित्यानि छन्दांसि ' इस महाभाष्यकारके वाक्य में छन्दोंकी नित्यता में काठक आदि छन्दों - संहिताओं की नित्यता भी सिद्ध हो ही गईं, हाँ वर्णोंकी आनुपूर्वी तो भाष्यकार के मतमें चाहे लौकिकी हो, चाहे छान्दस ( वैदिक ), वई अनित्य ही है । छन्दसे अभिधीयमान अर्थे ईश्वर तो नित्य ही है; उसी देवात्मक ईश्वरके प्रतिपादनमें वेदोंका CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदस्वरूपनिरूपण [ ११५ मुख्य तात्पर्य है; उसी वेदार्थं ईश्वरको नित्य बताया गया, पर वर्णानुपूर्वीको अनित्य बताया गया । जिस - जिसको चाहे वह फठ हो, चाहे याज्ञवल्क्य हो, चाहे शौनक हो, चाहे पिप्पलाद चाकुथुम ऋषि, प्रत्येकको समाधिके माध्यम से प्राप्त शब्दों के उच्चारणके भेदसे भिन्न आनुपूर्वियोंके उच्चारणकर्ता कट-शौनक आदि हैं । इससे संहिता अनित्य नहीं हो जाती, परन्तु कण्ठ तालु आदिके अभिघातसे प्रकट हुई ध्वनियोंसे प्रकट हुई आनुपूर्वी में ध्वनिकी अनित्यता उपचार - भावसे कह दी जाती है । वस्तुतः काठक आदि संहिता कृतक नहीं हो जातीं, नहीं तो फिर याज्ञवल्क्य शौनक कुथुम श्रादि की प्रतिपक्षि - सम्मत संहिताएँ समान न्याय से कृतक हो जाएँगी । शेष इस विषय में पुष्पमें देखें । ( १६ ) श्रीयास्कके निरुक्तमें भी वेदमन्त्रोंकी व्याख्या स्पष्ट है । स्वा. द. जीने भी शोलेतूर में छपाये हुए अपने विज्ञापन - पत्र में कहा है- ' नैरुक्तम् १२ तत्र वेदमन्त्राणां निरुक्तयः सन्ति ' । उसी निरुक्त ( ६५ ( १ ) में ' भद्र ' वद दक्षिणतः ' इस मन्त्रकी ' तदभिवादिनी एषा ऋग् भवति ' कहकर जो ऋचा कही है, वह आर्यसमाज-सम्मत - वेद में नहीं है । इस प्रकार ' हविर्भिरेके स्वरितः सचन्ते... नेज्जिह्मायन्त्यों नरकं पताम ' यह मन्त्र निरुक्त ( १।११।१ ) के निपात-प्रकरण में उधृत है । इसका चौथा पाद ' उपसंवादाशङ्कयोश्च ' ( ३।४।८ ) इस छान्दस ( वैदिक ) " सूत्रका उदाहरण है; पर यह मन्त्र आयँसमाजसम्मत वेदमें नहीं दीखता । इससे उसका लुप्तशाखा में Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 72
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
११६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) अनुमान करना चाहिये । ऋक्परिशिष्ट में तो प्रत्यक्ष है । इससे स्पष्ट है कि सभी शाखाएँ वेद हैं । ( ख ) इस प्रकार निरुक्तमें मन्त्रभागकी निरर्थकता - सार्थकता -प्रकरण में ' एक एव रुद्रोऽवतस्थे न द्वितीयः ' यह मन्त्र मुद्रित -शाखाओं में नहीं मिलता । ' एक एव रुद्रो न द्वितीयाय तस्थे ' यह मन्त्र तो कृष्णयजुर्वेद तै.सं. ( ११८/६/१ ) में मिलता है । ( ग ) इस प्रकार निरुक्त ( ३ | २१ | १ ) का ' अवततधन्वा पिनाकहस्तः कृत्तिवासाः ' यह निगम ( स्वा. दु. के शब्दों में वेदवचन ) शुक्लयजुर्वेद वा.सं. ( १६ ५१ ) में ' आयुधं निधाय कृत्तिं वसान आचर पिनाकं बिभ्रदागहि ' इस भिन्नरूपमें मिलता है । यदि निरुक्तस्थ उक्त पाठ वेदका नहीं; तो श्रीया स्कने उसे ' निगम ' क्यों लिखा? इससे स्पष्ट है कि - कृष्णयजुर्वेद ( तै. सं. ११८।६।१२ ) भी - जिसका उक्त मन्त्र है- वेद है, जिसे वादी वेद नहीं मानते । ( घ ) ' सुविते मा धाः'को भी निरुक्त ( ४ | १७ | १ ) में ' निगम ' ( वेदवचन ) माना है, यह भी ' कृष्णयजुर्वेद तै.सं. ( १।२।१०।१७ ) में है । ( ङ ) इस प्रकार ' ओषधे! त्रायस्वैनं स्वधिते मैन हि सी: ' इस मन्त्रको निरुक्त ( १।१५।६ ) में मन्त्रभागकी सार्थकता के शास्त्रार्थमें उद्धृत किया गया है, पर यह भी कृष्णयजुर्वेद ( तै.सं. आदि ) में है, देखिये इसपर ' आलोक'का चतुर्थपुष्प | ' शुक्लयजुर्वेद ' में ' त्रायस्व'के साथ ' एनं ' नहीं है । देखिये - ( वा. सं. ४ । १,६।१५ ) । तब वादिप्रतिवादिमान्य निरुक्तकारके अनुसार कृष्णयजुर्वेदकी शाखाएँ भी मन्त्रभागात्मक- वेद सिद्ध हुई । ( च ) इस प्रकार CC - 0. Ankur Joshi Collection वैदस्वरूपनिरूपणं [ ११० ‘ अग्नये समिध्यमानायानुत्र हि । ' यह मन्त्र मन्त्रभागके सार्थंकर प्रकरण निरुक्त ( १११५८ ) में दिया गया है; यह भी मैत्रायणी संहिता ( १ । ४ । ११ । ४५ ) में है । इस प्रकार सभी वेद - शाखाएँ. मन्त्र भागात्मक वेद सिद्ध हुईं । ( छ ) ' तच्छंयोरावृणीमहे ' यह ' निगन ' भी निरुक्त ( ४ । २११२ ) में कृ.य.तै.सं. ( २।६।१०।३ ) का दिया गया है । इससे सिद्ध हुआ कि जो लोग इन चार पोथियोंके अतिरिह अन्य वेद - शाखाओंको वेद ( मन्त्रभाग ) नहीं मानते, वे भ्रान्त हैं । ( १७ ) महाभारत के आदिपर्व ( ३ ६७-६८ ) उपमन्युके आख्यान में तथा अन्यत्र कई वेदमन्त्र उधृत किये गये हैं, पर यह उपलब्ध संहिताओंमें नहीं हैं; तब लुप्त- शाखाएँ भी वेद सिद्ध हुईं । ( ख ) वाक्यपदीयके १११२१ पद्यकी व्याख्या में भर्तृहरिने कहा है - ' ऋग्वर्णैः खल्वपि - ' इन्द्राच्छन्दः प्रथमं प्रास्य दन्नौं तस्मादिमे नामरूपे विषूची । नाम प्राणाच्छन्दसो रूपमुत्पन्नमेकं छन्दो बहुधा चाकशीति ' इति । तथा पुनराह - ' वागेव विश्वा भुवनानि जज्ञे वाच इत् सर्वममृतं यच्च मर्त्यम् । अथेदं वाग् बुभुने वागुवाच पुरुत्रा वाचो न परं यच्च नाऽह ' पर यह ऋचाएँ मुद्रित ऋग्वेदको शाखा में नहीं मिलतीं । पर जब सभी वेद-शाखाओं ` तथा ब्राह्मणभाग और उसके उपनिषद् तथा आरण्यक भागको वेद मान लिया जाय; तब सङ्गति लग जाती है; इनका लुप्त - संहिताओं में अनुमान कर लेना पड़ता है । इससे सभी शाखा - ब्राह्मण वेद सिद्ध हुए । ( ग ) पिङ्गल छन्दःसूत्रके ३।१८ की टीका में यादवप्रकाशने यह Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 73
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
११८ ] श्री सनातनधर्मालोक ( ८ ) ऋचा उधृत की है- ' इन्द्रः शचीपतिर्बलेन व्रीडितः, दुश्च्यवनो वृषा समत् सुसासहिः ' । यही मन्त्र ऋक् प्रातिशाख्य ( १६।१४ ) के उवटभाष्य में चतुष्पदी गायत्रीके उदाहरण में उद्धृत किया है । पिङ्गलच्छन्दःसूत्र ( ३।१२ ) की टीकामें नागीगायत्रीके उदाहरण-में यादवप्रकाशने ' ययोरिदं विश्वमेजति ता विद्वांसा हवामहे वाम् । वीतं सोम्यं मधु ' यह ऋचा उधृत की है । वहीं ३ । १५ सूत्रकी व्याख्यामें प्रतिष्ठा - गायत्री के उदाहरण में ' देवस्त्वा सविता मधु पाङ्क्तां विश्वचर्षंणी । स्फीत्येव नश्वरः ' यह ऋचा उद्धृत की गई है । एतदादिक ऋचाएँ आर्यसमाजकी इष्ट ऋग्वेदशा.सं.-में नहीं मिलती हैं । ( घ ) इस प्रकार ' वनस्पते! रशनया नियूय ' यह ऋचा निरुक्त ( ८ । २० । १ ) में उद्धृत की है; पर ऋसं. ( १० । ७० । १० ) में उक्त मन्त्रसे बहुत अंशों में भेद है; अतः सभी वेद-शाखाओंके वेद माननेके बिना कार्य निर्वाह नहीं हो सकता । ( ङ ) श्रीयास्क निघण्टुको समाम्नाय मानते हैं; और उसे छन्दों ( वेदों ) से समाहृत ( संगृहीत ) मानते हैं ( निरु. १ । १ । ४ ) । बहुत से निघण्टुके शब्द तथा नैगमकाण्डके शब्द और मन्त्र हैं, जो आर्यसमाजसम्मत वेदमें नहीं मिलते । जैसेकि - सुवर्णका नाम ' जातरूपम् ' ( १/२ ) । क्षिप्रका नाम ' साचीवित् ' ( २।१५ ) । ह्रस्वका नाम ' निघृष्वः ' ( ३२ ) । रात्रि का नाम ' शोकी ' ( ११७ ) यह चारों पद वर्तमान चार पोथियोंमें नहीं मिलते, किसी लुम अन्य संहिता वा ब्राह्मण में होंगे । इस प्रकार वैयाकरण सिद्धान्त-कौमुदी, महाभाष्य तथा काशिका आदिमें, तथा स्वा.दु.के CC - 0. Ankur Joshi Collection वैदस्वरूपनिरूपण [ ११६ आख्यातिक एवं अष्टाध्यायी भाष्य आदिमें वैदिक - सूत्रों के जो उदाहरण दिये गये हैं, वे भी सभी आर्यसमाजसम्मत चारों वेदोंमें नहीं मिलते । ऐसे उदाहरण ' आलोक ' के छठे और चौथे पुष्पमें देखिये | इससे स्पष्ट है कि वेदोंकी सीमा यही प्रचलित चार पोथियाँ नहीं हैं । यह चारों वेदोंकी एक - एक शाखाएँ हैं । चारों वेदोंकी सभी शाखाएँ ११३१ हैं, इतने ही ब्राह्मणग्रन्थ भी हुए । तब वर्तमान चार- पोथियों में अनुपलब्ध शब्द अन्य शाखा - ब्राह्मणों में मिलने सम्भव है; तब सभी शाखा त्राह्मण मिलकर वेद सिद्ध हुए । ( १८ ) जोकि - स्वाद जीने स. प्र. के उम समुल्लास ( १२७ पृष्ठ ) में लिखा है कि- ' जितनी शाखाएँ हैं. वे श्राश्वलायन आदि ऋषियोंके नामसे प्रसिद्ध हैं और मन्त्रसंहिता परमेश्वर के नामसे प्रसिद्ध हैं ' यह भी ठीक नहीं । मन्त्र - संहिताओं एवं त्राह्मण-ग्रन्थोंके आरम्भ वा समाप्तिमें अन्य शाखाओं की तरह ऋषियों-का नाम स्पष्ट है | जिसे वे परमेश्वरप्रणीत यजुर्वेद मानते हैं; उसका नाम वाजसनेयी संहिता प्रसिद्ध है, और लिखा भी रहता है, वाजसनेय याज्ञवल्क्य ऋषिका नाम हैं । इस प्रकार वाजसनेयी - ब्राह्मण, तथा वाजसनेयी- उपनिषद् भी जान लेने चाहियें । जैसे आश्वलायनादि ऋषिप्रोक्त होनेसे आश्वलायनी आदि शाखाएँ हैं, वैसे ही स्वा.द. सम्मत ॠग्वेद शाकल्य ऋषिसे प्रोक्त होनेसे शाकल्यसंहिता नामसे, स्वामिसम्मत यजुर्वेद वाजसनेय ऋषिप्रोक्त होनेसे वाजसनेयी संहिता नामसे, स्वामि-Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 74
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१२० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) वैदस्वरूपनिरूपण सम्मत सामवेद कुथुम ऋषिप्रोक्त होनेसे कौथुमशाखा नामसे, स्वामिसम्मत अथर्ववेद शौनकऋषिप्रोक्त होने से शौनक - संहिता नामसे प्रसिद्ध है । इसीलिए अपने अथर्ववेदभाष्यकी भूमिका में आर्यसमाजी विद्वान् पं ० राजारामशास्त्रीजीने भी उक्त संहि-ताओंके यही शाकल्य - संहितां आदि नाम माने हैं । इसी प्रकार श्री सत्यव्रतसामश्रमी, स्वामिहरिप्रसाद, श्रीभगवद्दत्त आदि आर्य-समाजसे सहानुभूति रखनेवाले विद्वान् भी अपने ऐतरेया-लोचन, वेदसर्वस्व - १ म भाग, वैदिकवाङ्मयका इतिहास -१ म भाग आदि पुस्तकों में मान चुके हैं, इसी प्रकार आर्यसमाजी विद्वान् श्रीशिवशङ्करकाव्यतीर्थके तत्त्वप्रकाश, वैदिक इतिहासार्थ-निर्णय ( पृ. ४६ ) आदि भी देख लेने चाहियें । कहीं वेद संहिताओं के आदि अन्त में यह नहीं लिखा कि-परमेश्वरप्रणीत ऋग्वेदः, इत्यादि । वेद अग्नि, रवि, वायुसे भी प्रोक्त नहीं कहे गये, किन्तु उन देवोंसे दोहनमात्र कहा गया है । जो कि स्वा.द.से छपाए वेदोंमें शाखाका नाम नहीं दिखाई पड़ता, वह उनसे तथा उनके अनुयायिओं द्वारा हटा दिया गया है, परन्तु प्राचीन लिखित एवं निर्णयसागर आदिमें मुद्रित ऋग्वेदादियों में तो शाखाका नाम स्पष्ट लिखा गया है । स्वा.द.ने भी अपने ‘ ताद्धित ' ( ६१ पृष्ठ ) में भी ' छन्दोन्ब्राह्मणानि ' ( पा. ४/२/६५ ) इस सूत्रकी व्याख्या करते हुए छन्द ( वेद ) के उदाहरणमें कठाः, मोदाः, पैप्पलादाः, वाजसनेयिन: ' इन शाखाओं का नाम लिखा है । CC - 0. Ankur Joshi Collection इसका पुष्ट प्रमाण यह है कि इन वेदोंका नाम ' वेद ' न मिलकर ' वेदसंहिता ' नामसे मिलता है । ' ऋग्वेद श ' न नहीं मिलता, किन्तु ' ऋग्वेदसंहिता ' नाम मिलता है, इ भाव यह है- ' ऋग्वेदस्य संहिता ' तब प्रश्न होगा किन् ऋग्वेदकी कौनसी संहिता है, तब उत्तर होगा कि ' शाक संहिता ', क्योंकि — ऋग्वेदकी महाभाष्यानुसार २१ संहिता होती हैं । ‘ यजुर्वेद ' नाम नहीं मिलता, किन्तु ' यजुर्वेदसंहित जिसका अर्थ ' यजुर्वेदकी संहिता ' है । फिर प्रश्न होता है कि यजुर्वेद की यह कौनसी संहिता है, तब उत्तर होता है कि: वाजसनेयी - संहिता है, यह काण्वसंहिता है, यह काठकसंहि है, यह मैत्रायणी - संहिता है, यह तैत्तिरीय - संहिता है, कठकपिष्ठल - संहिता है । यजुर्वेद की सभी १०१ संहिता है । ' सामवेद ' नाम नहीं मिलता, किन्तु ' सामवेद संहिता ' नाम मिलता है । इसपर प्रश्न यह है कि यह सामवेद की कौनसी संहिता है, इसपर उत्तर होता है कि यह सामवेदकी कौथुमी संहिता है, यह जैमिनि - संहिता है इसकी सभी १००० संहिता हूँ । ' अथर्ववेद ' नाम नहीं मिलता, किन्तु ' अथर्ववेद संहिता ' नाम मिलता है । तब प्रश्न यह है कि यह अथर्ववेद की कौनसी संहिता है, इसपर उत्तर यह होता है कि यह अथर्ववेदी शौनकी -संहिता है, यह पैप्पलाद संहिता है; सभी नौ संहिता होती हैं । इस ' संहिता ' नाम से सिद्ध होता है कि - सभी वेदे शाखाएँ ही होती हैं, और वे सभी वेदसंहिताएँ वेद हैं । Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 75
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१२२ ] श्रीसनातनधर्मालोकं ( ८ ) अष्टाध्यायीमें भी ‘ शौनकादिभ्यः छन्दसि ' ( ४ | ३ | १०६ ) इस सूत्रमें छन्द ( वेद ) वाच्य होनेपर शौनक आदियोंको णिनि कहा है । इस गण में प्रसिद्ध शौनक तथा वाजसनेयी शाखाओंका नाम स्पष्ट है; तब शाखाओंकी वेदता सिद्ध हुई । इस प्रकार ' कठचरकाल्लुक् ' ( पा. ४ | ३ | १०७ ) ' कलापिनोऽण ' ( ४ | ३ | १०८ ) पाणिनि - सूत्रों में कठ, चरक, तथा कलाप शाखाओंको वेदत्व श्रभिधेय होनेपर प्रत्यय वा प्रत्ययका लुकू कहा है, इन सब प्रमाणोंसे वेदशाखाएँ पाणिनि आदिके अनुसार वेद सिद्ध होती हैं । ( १६ ) जो कि - निरक्षर आर्यसमाजी मानते हैं कि वेद अन्य बस्तु है, और शाखा अन्य वस्तु है, शाखा वेद नहीं हो सकती, और वेद शाखा नहीं हो सकते, उसका पहले हम खण्डन कर चुके हैं । जो कहते हैं कि- शाकल्य आदि चार शाखाएँ वेद हैं: और अन्य शाखाएँ शाखा हैं, वेद नहीं ऐसा कहने वालोंकी बुद्धिका उतना मूल्य है, जैसे कि कोई आर्यसमाजी ' सत्यार्थ-प्रकाश ' के किसी एक समुल्लास वा, दो, तीन, चार समुल्लासों को ' सत्यार्थप्रकाश ' माने; शेष समुल्लासोंको स. प्र. की शाखाएँ माने, ' सत्यार्थप्रकाश ' न माने । अष्टाध्यायी के तीन - चार अध्यायों को ही व्याकरण माने, अन्य अध्यायोंको उनकी शाखा माने । मनु-स्मृतिके चार अध्यायों को ही मनुस्मृति कहे. शेष अध्यायोंको उनकी शाखा माने; उन्हें मनुस्मृति न माने । शाखाएँ सभी वेद हैं, यह सिद्ध हो ही गया । इस कारण CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदस्वरूपनिरूपणं [ १२३ मनुस्मृतिमें कहा है- ' यत्नेन भोजयेत् श्राद्धं बह्वचं वेदपारगम् ' शाखान्तगमथाध्वर्यु छन्दोगं तु समाप्तिकमः ( ३११४५ ) यहां श्री कुल्लूकभट्टने लिखा है- ' ऋग्वेदिनं मन्त्र त्राह्मणात्मकशास्त्रा- -ध्यायिनं यत्नतो भोजयेत् । तथाविधमेव यजुर्वेदिनम् । वेदस्य पारं गच्छतीति वेदपारगः, शाखाया [ जातावेकवचनम् ] अन्तं गच्छतीति शाखान्तगः, समाप्तिरस्यास्तीति समाप्तिकः । सर्वैरेव शब्दैर्मन्त्र - ब्राह्मणात्मक कृत्स्नशाखाध्येताऽभिहितः ' । इससे स्पष्ट है कि- वेदशाखाकी अन्तप्राप्ति, अथवा वेदपार, वा वेदसमाप्ति समान बातें है । तब सभी शाखाएँ वेद सिद्ध हुई । शाखाओंका नाम मन्त्रभाग प्रसिद्ध वेद चार हैं, वा तीन- इस पर अन्यत्र विचार होगा । ( २० ) दूसरा वेदभाग ब्राह्मण है, इसपर छठा पुष्प देखना चाहिये । इस प्रकार सिद्ध हुआ कि केवल वर्तमान ऋ.सं. यजुर्वेद संहिता आदि चार पोथियाँ ही ऋग्वेद - यजुर्वेद आदि नहीं; किन्तु ऋग्वेदादिकी सभी २१ संहिता, तथा उनके उतने ही ब्राह्मण ऋग्वेद हैं । पृथक् - पृथक् उनका नाम शाकल्य - संहिता, बाष्कलसं. आश्वलायनसं., शाङ्खायन - संहिता, वध्र्वच संहिता आदि भी हैं । उतने ही ब्राह्मण भी ' ऋग्वेद ' शब्दसे गृहीत किये जा सकते हैं । पृथक् - पृथक् उनके ऐतरेय - शाङ्खायन आदि भी नाम हैं । इस प्रकार यजुर्वेदकी शुक्ल - संहिताएँ वाजसनेयी ( जिसे आर्यसमाज वेद मानती है ) तथा काएवसंहिता आदि १५ संहिताएँ हैं । इस पर आर्यसमाजी विद्वान् श्रीहरिप्रसाद वैदिक-Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 76
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१२४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) मुनिने अपनी ' वेदान्तसूत्र की वैदिक- वृत्ति ' की भूमिका में यह शब्द लिखे हैं-' यथाहि ऋग्वेदमन्त्राणां तावत् शाकली - संहिता प्रमाणं मन्यते, प्राथमिकत्वात्; तथा याजुषमन्त्राणां ' काण्वी --संहिता ' प्रमाणं मन्यते, शिष्ट परिगृहीतत्वात्, न मायन्दनी संहिता, तदऽपरिगृहीतत्वात् । नहि यथा कारवी - संहिता शिष्टैः परिगृह्यते, तथा माध्यन्दिनी [ वाजसनेयी ] संहितापि परिगृह्यते, येन प्रमाणं मन्येत । शिष्टा हि निखिलजनोपकारार्थमुपनिषदः सर्वाः सञ्ज-वृक्षवो यथा काण्वानां मन्त्रोपनिषदमीशावास्यं तावत् संगृहन्ति; तथा ब्राह्मणोपनिषदं बृहदारण्यकमपि तेषामेव [ काण्वानां ] सञ्चिन्वन्ति, न माध्यन्दिनानाम् । किं कारणम् '? इदमेव कारणम्-न ते माध्यन्दिनीं संहितां प्रमाणं मन्वते । चेन्मन्वीरन्, कथं न सञ्चिन्वीरन । नहि प्रमाणस्य सतः सञ्चयो दुष्यति शिष्टानाम् । किमधिकेन इह स्यात् पण्डितानां मतिमताम् - इदानीन्तनो वेद-भाष्यकृत् सायणाचार्योंपि च ' काण्व - संहिता ' मेव भाष्येण अलंकुरुते, न विन्दमानामपि माध्यन्दिनी - संहिताम् ) तदैव तस्य तदप्रमाणत्वं शिष्टाऽगामित्वं च प्रव्यक्तं चाकाश्यते । माध्यन्दिन-संहिताभाष्यकृतो महीधरप्रभृतयस्तु नात्यन्तं शिष्टानुगामिनः-इति किं तत्र सतापि तद्भाष्येण ' ( पृ. ४-५ ) । यहांपर ' वैदिकमुनि ' ने कावसंहिताको वाजसनेयी संहिता की अपेक्षा शिष्टपरिगृहीत होनेसे अधिक प्रमाण माना है । उसमें दो युक्तियां दी हैं । एक यह कि - ' ईशोपनिषत् काण्वसंहिताकी ही प्रसिद्ध है । वाजसनेयीकी CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदस्वरूपनिरूपण १२ ईशोपनिषत् तो अब आर्यसमाजने चालू की है । शा श्री सायणाचार्य ने शुक्ल- कावसंहितापर तो भाष्य किया है माध्यन्दिनपर नहीं " । पर हम सभी संहिताओं को सनात, जा धर्मानुसार प्रमाण मानते हैं । पृथव कृष्णयजुर्वेद की शाखाएँ तैत्तिरीय संहिता, काठक अथ सहि मैत्रायणी - संहिता, कठकपिष्ठल - संहिता आदि ८६ संहिताएं । अल इस प्रकार १०१ शाखा यजुर्वेद है । पृथक - पृथक उनके पूर्व संहि भिन्न - भिन्न नाम भी हैं । उतने ही ब्राह्मण भी ' यजुर्वेद ' शब्द अन्य लिये जाते हैं । पृथक् - पृथक् उनके शुक्लशाखाओं में शतपथ श्र नाम हैं, तथा कृष्ण शाखाओंमें तैत्तिरीय आदि नाम भी हैं । हैं; इस प्रकार सामवेदकी कौथुमी - संहिता, राणायनी -संहि दिख जैमिनीय - संहिता, औपमन्यव संहिता आदि सभी १००० सहि है-सामवेद हैं । पृथक् - पृथक् उनके अपने नाम भी हैं । उतने समान निरुत्त ब्राह्मण भी ' सामवेद ' में गृहीत हो जाते हैं, क्योंकि वेदमन उक्ताः ब्राह्मणात्मक हुआ करता है । उनके पृथक् - पृथक् छान्दोर इसी ताण्ड्य, दैवत, षडविंश आदि नाम भी हैं । ब्राह्मणभागमे । ११५५२ आरण्यक एवं उपनिषद् भी अन्तर्भूत हो जाते हैं - यह द हैं । भूलना चाहिये । तभी तो निरुक्तमें श्रीयास्कने ' यस्मात्परं केवल परमस्ति किञ्चित् ' इस कृष्णयजुर्वेद के ब्राह्मणभाग रखा श्वेताश्वतरोपनिषत् के वचनको ' इत्यपि निगमो भवति ' ( २।३।१ ) इस शब्द से वेद - प्रमाण माना है । और ' अग्नये समि इसक मानाय ' ( १।१५ / ८ ) इस अन्य शाखाके वचनको भी म Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 77
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१२६ ] श्री सनातनधर्मालोक ( ८ ) है शामिल किया है ॥ दू इस प्रकार अथर्ववेदकी शौनक- संहिता, पैप्पलाद संहिता किया को है,। जाजल - संहिता आदि सभी नौ संहिताएँ अथर्ववेद हैं, सनातन । पृथक-पृथक उनके अपने - अपने नाम भी हैं । उतने ही ब्राह्मण भी श्रथर्ववेद शब्दसे पहले कहे प्रकारसे गृहीत हो सकते हैं । उनके अलग - अलग गोपथ आदि नाम भी हैं । गोपथ यह पैप्पलाद-हिताएं संहिताका ब्राह्मरण है । वेद चार हैं, तीन नहीं; इस विषय में के पूर्व अन्यत्र कहा जावेगा । तुर्वेद ' शब् दातपथ इन सब संहिताओंके कल्प ( गृह्यसूत्र, श्रौतसूत्र, धर्मसूत्र ) होते भी हैं । हैं; जिनमें उन शाखाओंके मन्त्रोंके कर्मविशेषमें विनियोग दिखलाये गये हैं । इसलिए अथर्ववेद - गोपथब्राह्मणमें भी कहा नीसहि है— ' एवं व्यवस्थिता वेदाः सर्व एव स्वकर्मसु । सन्ति चैषां ooo eife समाना मन्त्राः, कल्पाः, ब्राह्मणानि च ( १२५/२५ ) । इस प्रकार । उतने निरुक्तमें भी कहा है – ' यज्ञस्य चत्वारि शृङ्गति वेदा वा एते वेदमन्द उक्ताः ' ' त्रिधा बद्धः - त्रेधा बद्धो मन्त्र - त्राह्मण- कल्पैः ' ( १३/७/१ ) छान्दोग्य इसीलिए तो ' द्वादशवर्षं ब्रह्मचर्यं पृथग् वेदेषु तत् स्मृतम् ' ( गोपथ. भाग । १ । ५ । २५ ) यहाँ पर चार वेदोंके पढ़नेकेलिए ४८ वर्ष रखे गये -यह हैं । ८ वर्ष से उपनयन होता है, इस प्रकार ५६ वर्ष हो जाते हैं । इमात्परं द केवल चार शाखामात्र वेद मानें तो इतना समय कभी न रखा जाता । तब शाखा, ब्राह्मण, कल्प मिलकर वेद वहाँ इष्ट वति ' ( है । कल्प वेद नहीं होता; पर वेदका विनियोग दिखलाता है । ' म इस कारण उसका भी वेदके साथ पढ़ना आवश्यक है; क्योंकि-CC - 0. Ankur Joshi वेदस्वरूपनिरूपण [ १२७ Collection Gujarat. बिना विनियोगके जाने वेदके अर्थका पूर्ण ज्ञान नहीं होता । वेदके सहायक उपवेद भी यहाँ गृहीत किये जाते हैं । इस प्रकार यह सारा वेद सनातनधर्मका प्रतिपादक है । तभी तो मनुजीने कहा है- ' वेदोऽखिलो धर्ममूलम ' ( २२६ ) यहाँ ' अखिल ' शब्द सब वेदके शाखा और ब्राह्मणोंको सूचित करता है । इसलिए कुल्लूकभट्टने भी कहा है - ' वेद ऋग्यजुःसामाथर्व-लक्षणः । स सर्वो विध्यर्थवाद [ ब्राह्मण ] मन्त्रा शाखा ] त्मा धर्मे मूलं प्रमाणम् ' । ( २१ ) इस प्रकार वैदिक - साहित्य पर्याप्त विशाल है; पर मुसलमानोंकी कृपा तथा हमारे प्रमादसे बहुतसी शाखाएँ, बहुत ब्राह्मण, बहुत श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र और धर्मसूत्र लुप्त हैं । देखिये- ऋग्वेद की शाकल्य - संहिता तो छपी हुई मिलती है; पर उसका ब्राह्मण लुप्त है । उसकी आश्वलायनी शाखा तो लुप्त है; पर उसका ब्राह्मण ऐतरेय मिलता हैं । तब उसकी शाखावाले अन्य गति न होनेसे शाकल्य - संहिताको ही पढ़ते हैं । उस ऋग्वेदकी शाङ्खायनी शाखा तो लुप्त है; पर शाङ्खायन - त्राह्मण मिलता है । इसलिए उस शाखावाले भी लाचारीसे शाकल्य-शाखा को ही पढ़ते हैं । इस प्रकार लुप्त शाखाओंके बीचमें बाष्कल - संहिता के कई मन्त्र किसी - किसी यज्ञपद्धतिमें मिलते हैं । अन्य शाखाएँ तथा ब्राह्मण लुप्त हैं । यजुर्वेद में शुक्ल की तो वाजसनेयी तथा काण्व संहिता मिलती हैं; दोनोंके पृथक् - पृथक् शतपथ ब्राह्मण भी मिलते हैं; An eGangotri.Initiative
पृष्ठ 78
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१२८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) अन्य संहिता तथा ब्राह्मण लुप्त हैं । कृष्ण यजुर्वेदकी तैत्तिरीय-संहिता तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण तो मिलता है । काठक -संहिता, मैत्रायणी - संहिता, कठकपिष्ठल - संहिता अब उपलब्ध हुई हैं । शेष शाखाएँ तथा ब्राह्मण लुप्त हैं । सामवेदकी कौथुमी - संहिता तो सुलभ है; उसके ताण्ड्य वा छान्दोग्यादि ब्राह्मण भी मिलते हैं । राणायनीय - संहिता कर्णाटकादि दक्षिण देशमें मिलती है, पर उसका ब्राह्मण लुप्त है । जैमिनीय संहिता भी मिलती है; जैमिनि ब्राह्मण भी मिलता है; अवशिष्ट संहिता तथा ब्राह्मण नहीं मिलते । अथर्ववेदकी शौनक - संहिता तो मिलती है, पर उसका ब्राह्मण लुप्त है । उसकी पैप्पलाद संहिता अब मिली है । उसका गोपथ-ब्राह्मण तो मिलता ही है । अन्य शाखा तथा ब्राह्मण नहीं मिलते । कई अन्य ब्राह्मण तो मिलते हैं; पर उनकी संहिताओं का पता नहीं लगता कि वे किस संहिताके हैं । यद्यपि वैदिक-साहित्यकी यह दुरवस्था है, पर एतद्विषयक ज्ञान हमें रखना ही चाहिये । लुप्त ग्रन्थोंका अन्वेषण भी संहिताएँ तथा कई ब्राह्मण समय - समय ' एकैकस्यास्तु शाखाया एकैकोपनिषन्मता ' ( निषद् में लिखा है । तब ११३१ उपनिषदें उनमें ११२ वा कुछ अधिक उपनिषदें छपी उनमें बहुतों का यह ज्ञान नहीं होता कि वे करना चाहिये । कई पर मिलते भी हैं । १ । १४ ) यह मुक्तिकोप-भी होनी चाहियें । हुई मिलती हैं; पर किस वेदकी किस सहिताकी हैं । कई वज्रसूचिका आदि उपनिषद् बौद्धों वा CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदस्वरूपनिरूपण t अन्यों बनाई हुई अर्वाचीन कही जाती हैं । इस प्रकार कई शाखाओंके सूत्रग्रन्थ तो मिलते हैं उनकी शाखाएँ लुप्त हैं । कई शाखा तो मिलती हैं: । ; पर उनके सूत्रग्रन्थ लुम हैं । उन उन शाखाओं के सूत्रोंमें अपनी - अपनी संहिता के मन्त्रों की प्रतीकें होती हैं; और अन्य संहिताओं मन्त्र पूर्ण दिये जाते हैं । जैसे पारस्करगृह्यसूत्र यजुर्वेदका वाजसनेयी - संहिताका सूत्र है । उनमें जिन मन्त्रोंका प्रतीकमात्र दिया है, उन्हें अपनी संहिताका समझना चाहिये । ' यज्ञोपवीत परमं पवित्रम् ' आदि पूर्ण मन्त्र अन्य संहिताओंके दिये गये हैं । इससे यह भी सिद्ध होता है कि एक वेदकी सभी संहिताओंमें समान वा थोड़े भेद वाले मन्त्र नहीं होते, किन्तु भिन्न - भिन्न मन्त्र भी होते हैं । तलवकारोपनिषद् सामवेदकी तलबकार • शाखासे निकली है । इसी कारण उसके मन्त्र सामवेदी वर्तमान कौथुमसंहिता में नहीं दीखते । इस प्रकार अन्यान्य उपनिषद् तथा गृह्यसूत्रादिमें भी जानना चाहिये । आशा है कि जो कि वर्तमान पण्डितोंको समा आदिकी कृपासे कई भ्रम होगये हैं; वे दूर हो गये होंगे । प्रसङ्गसे यहां पर सनातनधर्मका साहित्य बतलाया जाता है-' वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् । आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ' ( मनु. २।६ ) । ' वेदोऽखिलो धर्ममूल ' की व्याख्या तो हमारा यह निबन्ध तथा छठे पुष्पका ' वेद ' स्वरूपनिरूपण ' निबन्ध है - यह पाठकोंने देख लिया होगा । Gujarat. An eGnitiative
पृष्ठ 79
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातन धर्मालोक ( ८ ) १३० ] ' स्मृति - शीले ' इस शब्द से मनु आदि स्मृतियाँ, गीता आदि धर्मशास्त्र, श्रौतसूत्र - गृह्यसूत्र - धर्मसूत्र आदि समझने चाहियें । ' आचारश्चैव साधूनाम् ' से पुराण - इतिहास लेने चाहियें । ' आत्मनस्तुष्टिरेव च'से पुराण- इतिहास स्मृति आदियों में वैकल्पिक धर्मभेदमें अपनी इच्छा जाननी चाहिये । इस प्रकार हमारे सनातनधर्म के सिद्धान्त इस साहित्यमें देखे जा सकते हैं । पर जो आर्यसमाजी- ' जो कोई किसीसे पूछे कि तुम्हारा क्या मत है, तो यही उत्तर देना कि हमारा मत वेद अर्थात् जो कुछ वेदोंमें कहा है, हम उसको मानते हैं ' ( सत्यार्थप्र. ७ समु. १२७ पृ. ) ( प्रश्न ) तुम्हारा क्या मत है? ( उत्तर ) वेद अर्थात् जो - जो वेदमें करने और छोड़ने की शिक्षा की है, उस उसका हम यथावत् करना छोड़ना मानते हैं, जिसलिए वेद हमको मान्य हैं, इसलिए हमारा मत वेद है ' ( स.प्र. ३ पृ. ४२ ) इस स्वा.द. के वचन को मानते हैं, और वेदको वर्तमान चार पोथियों में संकुचित मानते हैं, वे सभी विधि - निषेधात्मक अपने सिद्धान्तों-को अपने वेदसे नहीं दिखला सकते; इसीलिए वे यौगिकतामात्र-का बहाना करके भाषाशास्त्रपर आक्रमण करके इन्हीं चार पोथियोंके मन्त्रों में तोड़ - मरोड़ करके ' मक्खीको मल - मलकर भैंसा ' वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए वेदोंकी दुरवस्था करते हुए अवश्य शोचनीय हैं । पर यदि वे संहिता ब्राह्मणा-त्मक वास्तविक वेदको स्वीकार कर लें; तो उन्हें वेदोंके मन्त्रोंकी तोड़ - मरोड़ न करनी पड़े । पर तब उनकी साम्प्रदायिक वालुका-भित्ति अनायास ही ढह जाय । इसलिए वे कृत्रिम यौगिकता पक्षको अवलम्बन करनेकेलिए विवश हो जाते हैं; जिसका दूसरा नाम अव्यवस्था है, जिसमें कोई मर्यादा वा व्यवस्था नहीं रह पाती -जिसका निरूपण इम ५ वें निबन्धमें करनेवाले हैं- आशा है-पाठकोंने ऐसा करनेमें उनका अभिप्राय समझ लिया होगा Joshi Collection ४ - स्त्री शूद्रोंका वेदाधिकार - विचार । पूर्वपक्ष - श्रपने वेदस्वरूपनिरूपण तो कर दिया; अब वेदाधिकार पर विचार होना प्रासङ्गिक है । सनातनधर्म वेदमें अधिकार द्विज - पुरुषका बताता है; पर वेदमें स्त्री तथा शूद्रको भी अधिकार है - यह वेद ही स्वयं बताता है । देखिये-( क ) ' यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः । ब्रह्मरा-जन्याभ्या ँ शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च ' ( यजु. २६२ ) यहाँपर परमात्माके द्वारा त्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र आदिको वेदका पढ़ाना कहा जा रहा है । ( ख ) ' पञ्चजना मम होत्रं जुषध्वम् ' ( ऋ. १०।५३ । ४ ) यहाँपर पञ्चजनोंका, यज्ञका सेवन कहा है । पञ्चजन यहां निरुक्तमें ' चत्वारो वर्णाः पञ्चमो निषादः ' ( ३८१ ) यह कहे हैं । इसमें शूद्र अन्त्यजोंका भी यज्ञाधिकार कहने से वेद में स्त्री - शुद्रोंका अधिकार सिद्ध होता है । ( ग ) उवट-महीधर आदिके भाष्य में ' त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धि पतिवेदनम् । ... इतो मुक्षीय मामुतः ' श्रादि मन्त्र स्त्रीके पढ़नेकेलिए कहे हैं । यदि स्त्रीको अधिकार नहीं; तो एतदादिक मन्त्र उसे कहनेकेलिए कैसे बताये गये हैं? क्या पति ही उन्हें पढ़ेगा; वह पति ही अपने पितृगृह से छूटेगा? ( घ ) ' कुर्वन्नेवेह कर्माणि... न कर्म लिप्यते नरे ' ( यजुः ४०।२ ) ' उद्यानं ते पुरुष! नावयानं ' ( अथर्व. १६ ) इन मन्त्रों में ' नर, पुरुष ' शब्द आनेसे ' शूद्र - अन्त्यज ' आदिके भी ' नर ' होनेसे उसे भी वेदका अधिकार सिद्ध हुआ । ( स्वा. रामेश्वरानन्द आदि आर्यसमाजी ) । Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 80
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१३२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) उत्तरपक्ष -- इस विषयको आर्यसमाजी ही उपस्थित किया करते हैं, अतः उन्हें हम उन्हींकी शैलीसे उत्तर देंगे । इस विषयको स्पष्टतासे जाननेकेलिए उन्हें ' आलोक ' का तृतीय तथा छठा सुमन मँगाना चाहिये । उनमें इन सब शङ्काओं का समाधान कर दिया गया है । यहां संक्षेपसे बताया जाता है । ( क ) ' यथेमां वाचं ' मन्त्रको ईश्वर नहीं कह रहा है; क्योंकि वह ऋषि नहीं; ईश्वर यहां देवता होनेसे वाच्य है, वक्ता नहीं । यदि इसे ईश्वर ही कहता है तो इसके साथ वाले ' तदस्मासु द्रविणं घेहि चित्रम् ' ( २६ | ३ ) इस ईश्वर देवतावाले मन्त्रमें भी ईश्वर ही धनकी प्रार्थना करता होगा, तो क्या परमात्मा ही अपने लिए चन्दा माँगता है? ' यथेमां वाचं ' मन्त्र के अन्त में भी कहा है-' प्रियो देवानां दक्षिणायै दातुरिह भूयासम् । अयं मे कामः समृध्यताम् ' ‘ मैं देवताओंका प्यारा बनूँ, दक्षिणा देनेवालेका प्यारा बनूँ । मेरी यह कामना पूरी हो, तो क्या आप्तकाम ईश्वर ऐसी प्रार्थना कर सकता है? पूर्वेपक्षी के साम्प्रदायिक आचार्य स्वा. द. जीने लिखा है- ' न ईश्वरको कोई अप्राप्त पदार्थ, न कोई उससे उत्तम । और पूर्णसुखयुक्त होने से [ उसे ] सुख की अभिलाषा भी नहीं है, इसलिए ईश्वरमें इच्छाका तो सम्भव नहीं ' ( स.प्र. ७, ईश्वरसगुण - निर्गुणविषय पृ. १२४ ) । इस मन्त्रका ईश्वर देवता है; ऋषि नहीं । ऋषि होता है वक्ता, देवता होता है वाच्य । सो यहाँ जीव- परमात्मा से ऐसा आशीर्वाद अपनेलिए माँग रहा है, वा प्रार्थना कर रहा है । इसमें CC - 0. Ankur Joshi Collection स्त्री - शूद्रोंका वैदाधिकार - विचार ' आवदानि, भूयासम्, समृध्यताम्, उपनमतु ' आदि आशीर्लिङ् लकार ज्ञापक हैं; तब यहां ईश्वर बक्ता न होते ' ईश्वरकी वाणी ' अर्थ भी नहीं; किन्तु जीव वक्ता होने ' जीवकी वाणी ' ही अर्थ है । वह है ' दीयतां भुज्यताम् ' श्र यज्ञके समय कही जानेवाली जीवकी वाणी । वह ब्राह्मण-मित्र ( स्व ), शत्रु ( अरण ) आदि सबको ' यज्ञेन द्विषन्तो मिश भवन्ति ' ( नारायणोपनिषद् ७६ ) कही जाती है; क्योंकि - यज्ञान भोजनका प्रसाद सभीको, बिना भेदभावके उनकी अपनी - अप पङ्क्तिमें दिया जाता है । अतः यहाँ वेदाधिकार की कुछ में चर्चा नहीं, गन्ध भी नहीं । किसी भी प्राचीन भाष्यकारे इसका अर्थ वेदाधिकारपरक नहीं किया; किसी भी गृह्यसूत्रकार इसका ऐसा विनियोग नहीं रखा । ( ख ) यही बात ' पञ्चजना मम होत्रं जुषध्वम् ' मन्त्रमें भी है । ' होत्रं ' का अर्थ यहाँ ' आह्वानम् ' है, जैसे कि - श्रीसायणाचार्य ऋ. १०२५३२५ में किया है । सो यहाँ भी ऋषिका यज्ञान्तमें प्रसाद ले जानेका सबको आह्वान है । यज्ञके पक्षमें ' यज्ञियाः पञ्चजना ' यज्ञके योग्य पञ्चजनसे ' ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य लिये जाते हैं । शूद्रादि नहीं । जैसे कि - यजुर्वेद - शतपथ ब्राह्मणमें कहा है-' ब्राह्मणो वैव, राजन्यो वा, वैश्यो वा, ते हि यज्ञियाः ' ( ३ | १ | १ | १ ) । तभी वहां १० वीं कण्डिका में कहा है कि - यज्ञदीक्षितको शूद्र से साक्षात् बात भी नहीं करनी पड़ती । उससे आवश्यकता में द्विजकी माफ बातचीत करना कहा है । जब ऐसा है. तब शूद्रको वैदिक - यज्ञका Gujarat. An eGangotri Initiative