सनातन धर्मालोक ८ — पृष्ठ 81–90

सनातन धर्मालोक ८ · पृष्ठ 81–90

पृष्ठ 81

सनातन धर्मालोक ८, पृष्ठ 81 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१३४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) एवं वेदका अधिकार भी नहीं हो सकता । इसमें स्पष्टता ' आलोक ' के तृतीय पुष्पमें देखनी चाहिये । अथवा कहीं पञ्चजनों - शूद्रनिषादान्तोंका यज्ञ दिखाया भी गया हो; वहाँ लौकिक - अग्निमें किये जाते हुए पश्च - महायज्ञ हैं; उन्हें ' नमः ' अन्तवाले मन्त्रोंसे शुद्र- निषाद भी कर सकते हैं इष्ट । निषादसे वहाँ शाखानुसार सुधन्वा रथकार लिया जाता है । ( ग ) शेष प्रश्न यह है कि - स्त्री से कई स्वयोग्य मन्त्र बुलवाना; इसपर यह याद रखना चाहिए कि- कई विशेष मन्त्र स्त्रीके चुलवाने-के आजावें; तो इससे उसका वेदमें औत्सर्गिक ( सामान्य - रूपसे ) अधिकार नहीं हो जाता । स्त्रीका विवाह उसका द्विज - कल्पत्वा-पादक संस्कार होता है; अतः वह द्विजकल्प होनेसे कई स्वाघिकृत मन्त्रोंको बोल सकती है; पर उसका साक्षात् उपनयन न होने और मुख्य द्विजत्व न होनेसे वह वेदके क्रमिक एवं विधिपूर्वक स्वाध्याय में अधिकृत नहीं होती । क्रमिक और विधिपूर्वक वेदमें अधिकार उपनीतका होता है । जैसे कि मनुजीने कहा है-' कृतोपनयनस्यास्य व्रतादेशनमिष्यते । ' ब्रह्मणो ( वेदस्य ) ग्रहणं चैव क्रमेण विधिपूर्वकम् ' ( २।१७३ ) । सो अनुपनीता लड़कीको भी वेदका क्रमिक एवं वैध अधिकार तो नहीं रहता । हाँ, द्विज-कल्पत्वापादक विवाह हो जानेसे उसको केवल स्वनियत- मन्त्र पति आदिके सहारे बुलवाये जा सकते हैं । ' नाभिव्याहारयेद् ब्रह्मं स्वधानिनयनाद् ऋते । शुद्र ेण हि समस्तावद् यावद् वेदे न जायते ' ( मनु. २।१७२ ) यहां पर उपनयनसे पूर्व जब ब्राह्मणादिको CC - 0. Ankur Joshi Collection स्त्री - शूद्रोंका वेदाधिकार - विचार [ १३५ भी वैधरूपसे वेदमन्त्र बोलनेका अधिकार नहीं है; और उसे शुद्र - जैसा माना गया है; तो साक्षात् शूद्र, जो स्वभावतः अनुपनीत है - वेद में अधिकृत कैसे हो सकता है? इससे शुद्रका वेदाधिकार स्पष्ट खण्डित जाता है; दोनों पद्य वादि - प्रतिवादि-मान्य होने से अन्तिम निर्णय दे देनेवाले हैं । तब साक्षात् उपवीतसे रहित स्त्री भी वेदमन्त्रपठनमें साक्षात् अधिकारिणी नहीं । विवाह वा यज्ञादिमें उसका कोई विशेष मन्त्र आजावे; तो या तो उन स्त्रियों द्वारा पुरोहित आदिके सहारे बुलवाया जाता है, अथवा यह सम्भव न हो; तो उसकी असमर्थता में पुरोहित आदि ही उसकी ओरसे बोल दिया करते हैं । प्रश्नकर्ता - आर्यसमाजियोंकी संस्कारविधि ही देख लीजिये, कई मन्त्र उसमें वच्चेको कहे जाते हैं; और कई बच्चेके बुलवानेके भी मन्त्र हो सकते हैं; उस समय बच्चा न तो उन मन्त्रोंको समझ · सकता है, न बोल ही सकता है । उस समय उन मन्त्रोंको पिता वा पुरोहित वा आचार्य बोल दिया करता है । ' संस्कारविधि ' ( के ५६ पृष्ठ ) में सद्योजात बालककेलिए त्र्यायुषं जमदग्नेः तन्नो अस्तु त्र्यायुषम् ' यह बच्चेके अपने चिरायुष्ट्रकेलिए ' नः ' ( मम ) इस लिङ्गसे बच्चेका पठनीय मन्त्र होनेपर भी उसे बच्चेका संरक्षक ही बच्चेकी ओरसे प्रतिनिधि बनकर बोल दिया करता है । अन्नप्राशनसंस्कार में छः महीनेके बालकका ' ऊर्ज नो घेहि ' ( पृ. ७० ) मन्त्र जो ' नः ' के लिङ्गसे बच्चेके पढ़नेका था; उसे Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 82

सनातन धर्मालोक ८, पृष्ठ 82 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१३६ ] श्री सनातनधर्मालोक ( ८ ) स्त्री - शूद्रों का वेदाघिकार- विचार आचार्य, पुरोहित आदि ही बोल दिया करते हैं । इस प्रकार ' अस्मे वीरान ' ( १.६८ ) ' मयि मेधां मयि प्रजां ' ( पृ. ८६ ) आदि अस्मद् - शब्द - घटित मन्त्र बच्चोंके उच्चारणीय होते हुए भी जैसे उसके प्रतिनिधिके द्वारा बोलकर संस्कार की पूर्ति कर दी जाती है; वैसे ही पत्नी - पठनीय मन्त्र भी पुरोहित आदिके सहारे वा पुरोहित आदि द्वारा ही स्त्रीके प्रतिनिधित्वसे बोलकर कृत्य की पूर्ति कर दी जाती है । अनधिकृत स्त्री भी उस समय उस छोटे बच्चेकी भांति होनेसे उसके उच्चारणीय मन्त्रोंको पति वा पुरोहित आदि ही उसके प्रतिनिधित्वसे बोल दिया करते हैं । वैसे तो ' इतो मुक्षीय मामुतः ' ( यजुः ३।६० ) इस मन्त्रको परमात्मा ही कह रहा है - यह प्रतिपक्षी भी मानते होंगे, ऋषि वसिष्ठ कह रहे हैं - यह भी वे मानते होंगे; तो परमात्मा तथा ॠषि क्या पत्नी हैं; और श्वशुरालय में अपना जाना माँग रहे हैं? जैसे परमात्माने यह मन्त्र बनाया, ऋषिने उसका उच्चारण किया । था यह मन्त्र पतिके पास जा रही स्त्रीकेलिए; पर उच्चारण ऋषिने ही उसका किया; वैसे इस स्त्रीके मन्त्रको यदि उसका पति वा पुरोहित उसके प्रतिनिधित्व से उच्चारण करता है; तो इसमें भी पूर्वोक्त प्रकारसे कोई भी दोष नहीं आता । यह मन्त्र किसी स्त्रीके तो बनाये नहीं कि - स्त्री ही बोलेगी? वेदमें तो कई मन्त्र पशुओं के लिए भी आते हैं- ' अनड्वान् ब्रह्मचर्येण अश्वो घासं जिगीषेति ' ( अथर्व. ११५/१८ ), घोड़ेको CC - 0. Ankur Joshi Collection लगाम डालनी, बलके नाकमें रस्सी डालनी आदि ' कर्तव्य भी वेदमें आते हैं; पर इससे वेदमें पशुओंका पशु अि नहीं हो जाता; किन्तु पशुओं के कर्तव्योंको उनका स्वामी उनसे करा लेता है । वेदमें तो मुर्दे को भी सम्बोधित है I । जैसेकि - ' इयं नारी पतिलोकं वृणाना निपद्यतः किया जा मत्यें! श्रेतम् ' ( अ. १८ | ३ | १ ) इसमें वह मुर्दा सुन नहीं उत लेखा वा H मुर्देका वेद में अधिकार नहीं हो जाता; किन्तु उस समय किसी ` द्वारा मन्त्र बुलवाकर कृत्यपूर्तिमात्र कर दी जाती है; वैसे स्त्रीके उच्चारणीय विशेष मन्त्रों में भी समझ लेना चाहिये । शव, पशु, बच्चे आदिके मन्त्रों में आनेपर भी न तो दो द्वारा वे मन्त्र कहे जाते हैं; न उनके प्रति कहे जा सकते है । क्योंकि – वे अज्ञानवश वा अचैतन्यवश समझ नहीं पाते केवल वहाँ कर्मपूर्तिमात्र कर दी जाती है; इस प्रकार अनुपनी होनेसे अविध स्त्री भी शव वा पशु वा बच्चे वा पत्थ मूर्तिकी भांति केवल कृत्यमें बैठी रहा करती है; कृत्य स पुरोहित आदि उसके प्रतिनिधित्व से कर दिया करता है, विधि पूर्ण हो जाती है । सीता वनवासमें भगवान श्रीरामने यज्ञ किये; वहाँ पत्नी स्थानपर सुवर्णकी सीता बैठाई जाती थी । जैसेकि वाल्मीकि रामायण में - ' यज्ञे - यज्ञे च पत्न्यर्थं जानकी काञ्चनी भवत् ( ७६६/७ ) । कात्यायनस्मृति में देखिये - ' रामोपि कृत्वा सौब सीतां पत्नीं यशस्विनीम् । ईजे यज्ञः ' ( २०११ ) वह सोनेकी प्रतिमा Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 83

सनातन धर्मालोक ८, पृष्ठ 83 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१३८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) वाली सीता न तो मन्त्र बोलती थी, न ही सुनती थी; उस समय भी यदि पत्नी - सम्बन्धी कोई मन्त्र आता था; तब पुरोहित वा स्वयं श्रीराम ही बोल देते होंगे; इस प्रकार कर्म पूर्ण हो जाता था । इससे सोने की मूर्ति मन्त्रोंमें अधिकृत नहीं हो जाती थी । इस प्रकार पत्नी भी सोनेकी पुतलीकी भांति साथ बैठी भर रहती है, कर्म उसका पति वा पुरोहित, आचार्य ही कर देता है, साथ बैठने मात्र से उसे फल मिल जाता है । प्रश्नकर्ताके सम्प्रदायाचार्य स्वा. द. जीने अपनी संस्कारविधि-के सामान्य - प्रकरण ( पृ. २ ९ ) में लिखा है - ' यदि यजमान न पढ़ा हो, तो इतने मन्त्र अवश्य पढ़ लेवे । यदि कोई कार्यकर्ता जड, मन्दमति, ' काला अक्षर भैंस बरावर ' जानता हो; तो वह शूद्र है । अर्थात् शुद्र मन्त्रोच्चारण में असमर्थ हो, तो पुरोहित और ऋत्विज मन्त्रोच्चारण करें, और कर्म उसी मूढं यजमानके हाथसे करावें ' । यही बात यहाँ भी घटा लेनी चाहिये । स्त्रीका कोई विशेष मन्त्र आवे; तो स्त्रीके शास्त्रानुसार अनुपवीतिनी होनेसे अविद्य होनेके कारण वह पुरोहित आदिके सहारे उससे बुलवा लिया जाता है । इससे उसका समूचे वेदमें क्रमिक वा विधिपूर्वक . अधिकार नहीं हो जाता । स्त्री वा शूद्रादिका वैध उपनयन न होनेसे ' ब्रह्मणो ग्रहणं चैव क्रमेण विधिपूर्वकम् ' ( मनु. २।१७३ ) उन्हें क्रमसे विधिपूर्वक स्वाध्यायका तो निषेध है, पर व्युत्क्रमसे वा कहीं विशेष मन्त्र उनके योग्य श्रजावे; तो वहाँ क्रमिक एवं विधिपूर्वकता न होनेसे उसका नाम वेद पढ़ना नहीं हो जाता । सो CC - 0. Ankur Joshi Collection स्त्री - शूद्रोंका वेदाधिकार - विचार [ १३६ विद्यारहित होनेके कारण अथवा केवल पश्चमस्वर उनमें प्रधान होनेसे पूर्णस्वरोंके अभाववश ' मन्त्रो हीनः स्वरतो तो वा ' इस डरसे उनसे न बुलवाकर उनके प्रतिनिधित्व से स्वा. द. के पूर्वोक्त कथनके समान पुरोहित श्रादिसे ही वह मन्त्र बुलवा दिया जाता है । एक उदाहरण स्वा.दु.का अन्य भी देखिये - स. प्र. के छठे समुल्लास ( पृ. ६१ ) में ' पुरोहितं प्रकुर्वीत वृणुयादेव चर्त्विजम् । तेऽस्य गृह्याणि कार्याणि कुर्युर्वैतानिकानि च ' ( ७७८ ) इस मनुके पद्यका अर्थ करते हुए स्वा. द. लिखते हैं- ' पुरोहित और ऋत्विज् का स्वीकार इसलिए करे कि वे [ पुरोहितादि ] अग्निहोत्र और पक्षेष्टि आदि राजघरके कर्म किया करें, और [ राजा ] आप सर्वदा राज्यकार्य में तत्पर रहे ' । सो जैसे राजाके अग्निहोत्रादि-को पुरोहित आदि द्वारा करानेसे वह राजाका किया माना जाता है, जिस प्रकार शुद्र द्वारा मन्त्र न पढ़ सकनेसे उस मन्त्रका उच्चारण स्वा.द.के पूर्वोक्त वचनानुसार पुरोहित वा ऋत्विज् आदि द्वारा करा लिया जाता है; इससे कृत्यकी पूर्ति हो जाती है; वैसे पत्नीके मन्त्र पुरोहितादि द्वारा बुलवाये जानेके विषयमें भी समझ लेना चाहिये । ' स्त्रिया क्लीवेन च हुते न भुञ्जीत ब्राह्मणः क्वचित् । अलीकमेतत् साधूनां यत्र जुह्वत्यमी इविः । प्रतीपमेतद् देवानां तस्मात् तत् परिवर्जयेत् ' ( ४ | २०६ ) ' न वै कन्या [ अविवाहिता ] न युवतिः [ विवाहिता ] नाल्पविद्यो न बालिशः । होता त्यादग्निहोत्रस्य नार्वे Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 84

सनातन धर्मालोक ८, पृष्ठ 84 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१४० ] श्रीसनातनघर्मांलोक ( ८ ) स्त्री - शूद्रोंका वेदाधिकार - विचार नाऽसंस्कृत: [ अनुपनीतः ] तथा । नरके हि पतन्त्येते जुहृतः स च यस्य तत् ' । ( ११।३६-३७ ) मनुस्मृतिके इन प्रमाणोंसे स्त्री - शुद्र आदिका यज्ञादिमें अधिकार बाधित करनेसे यज्ञ विषय वाले वेदमें भी उनका अनधिकार ही सिद्ध हुआ । स्त्री तथा शुद्रका यज्ञोपवीत कोई भी संस्कारविधि नहीं बताती । स्त्रीका रजस्वलात्व, स्त्रीका गर्भाधान एवं प्रसव तथा शुक्राकर्षण आदि, बच्चोंके मलमूत्रमें हाथ रहना आदि स्त्रियों-को अशुद्ध रहने के लिए बाध्य करते हैं; अतः वे शुद्ध वेदपाठकी साक्षात् अधिकारिणी भी नहीं हो सकतीं । ' तपसे शुद्र " ( यजुः ३० | ५ ) इस वेदमन्त्रमें शूद्रको कृच्छ्रकर्म सेवा आदि सवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः ' ( पञ्चतन्त्र-मित्रभेद ) करना वेदकी आज्ञा है । स्वा.द.नीने इसका अर्थ ' दुःखसे उत्पन्न होनेवाले सेवनकेलिए शुद्रको ' यह किया है । श्रीशिवशङ्करकाव्यतीर्थने ' परिश्रमी और कठिन कार्य करनेवाले शूद्रो ' यह अर्थ किया है । स्वा. वेदानन्दने ' कठिन कार्यके अनुष्ठानकेलिए शूद्रको ' यह अर्थ किया है । ' वर्णव्यवस्थाका वैदिक-' रूप ' ( पृ. १० ) में उसके आर्यसमाजी प्रणेताने ' श्रम अथवा मेहनतसे साध्य पशुओं को उत्पन्न तथा सब प्रकार के शिल्पकारी आदि कठिन कार्य करनेकेलिए शूद्रको ' यह अर्थ किया है । मनुजीने ' तपः शुद्रस्य सेवनम् ' ( ११।२३५ ) शुद्रका सेवा - कर्म तप बताया है । ' ब्रह्मणे ब्राह्मणम् ' ( यजुः ३० । ५ ) यहाँ वेदने वेदका पढ़ना - पढ़ाना ब्राह्मण केलिए कहा है; सो वेदानुसार शुद्रको CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदका अधिकार सिद्ध न हुआ; किन्तु उसे सेवाका अधिकार सिद्ध हुआ । " तत् कृरमो ब्रह्म वो गृहे संज्ञानात्मक ब्रह्म ( वेद ) स्त्रियोंके लिए नहीं । अयं स ' वेदमाता द्विजानाम् ' ( अथर्व. संज्ञानं पुरुषेभ्यः ' ( अथर्षे. ३/३०६ घरके पुरुषोंकेलिए बताया गया । होता यो द्विजन्मा ' ( ऋ. १ ९ १४६ २६/७१ ( १ ) इन मन्त्रोंके अनुष वेदका अधिकार द्विजपुरुषको है । यदि ' यथेमां वाचं ' से ह शूद्रादिको बेदाधिकार दिया जावे; तो यह वेदका परा विरोध हो जावेगा । सो स्पष्ट है कि वहाँ ' वाचं ' और ' जने है, उसमें ' वेदवाचं ' नहीं; अतः साधारण जीवकी वाणी में सबका अधिकार है; परन्तु ' वेदमाता द्विजानाम् ' में ' वेद ' रद्द स्पष्ट है; इसमें साधारण वाणी नहीं बताई गई; और वे द्विजोंका अधिकार बताया है, यहाँ ' जनानाम् ' नहीं आया; श्र. यहाँ सर्वसाधारण जन वेदके अधिकारी इष्ट सिद्ध न हुए ' वेदमाता ' का यहाँ सावित्री - गायत्री अर्थ भी माना जावे; वह सारे वेदकी सार मानी गई है, देखो मनुस्मृति ( २ / ७६-७७ ) तभी सर्ववेदारम्भ में वेदका सारस्वरूप सावित्री - गायत्री - मन गृह्यसूत्रोंके भी अनुसार ब्राह्मण ब्रह्मचारीको दिया जाता ( पारस्करगृ. २ । ३ । ७ ), तो जब वेदके एक मन्त्र गायत्री में है । केवल द्विजोंका अधिकार है; शूद्रोंका नहीं; तब समूचे देश ' शुद्रका अधिकार वेदको कैसे इष्ट हो सकता है? ' ( घ ) इस प्रकार जब वेदमें अधिकार द्विजको है; म Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 85

सनातन धर्मालोक ८, पृष्ठ 85 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१४२ ]: श्रीसनातनधर्मालोकः ( ८ ) अधिकार ' कुर्वन्नेवेह कर्माणि... न कर्म लिप्यते नरे ' ( ईशो. ३ ) आदि में भी ‘ नर ’ तथा ‘ उद्यानं पुरुष! ' नावयानं ' आदिमें भी द्विज पुरुष नर्व. ही इष्ट सिद्ध हुआ; शूद्रादि नहीं? ' पुरुष ' और ' नर ' कहनेसे ३१३०१ स्त्रीकी भी निवृत्ति होगई । या गया इससे स्पष्ट है कि- स्त्री शूद्रों को बेदाधिकार नहीं । अधिक . १११४६३५ इस विषय में देखना चाहते हुए ' आलोक ' का तृतीय पुष्प ( मूल्य ३३ ) के अनुष और छठा पुष्प ( मूल्य १० ) मँगावें । उनसे प्रतिपक्षियोंकी सब से शंकाएँ दूर होंगी । का पल ' जने वाणी में ( ५ ) क्या वेद में केवल यौगिकता है? ' वेद ' ( १ ) आजकल वेदमें अपने मनमाने सिद्धान्तोंके अनुकूल और वे अर्थ निकालनेके लिए अर्वाचीन विद्वानोंका बहुत प्रयत्न दीख आया; पड़ता है । ' वेद क्या कहता है ' यह उपेक्षित करके ' वेदमें हमारे द्धन हुए सिद्धान्त निकलने चाहियें ' इसमें उनका ध्यान रहता है । इसी जावे; कारण उन्होंने वेदमें केवल यौगिकतावादका आश्रय ले रखा २ / ७६-७७ ) है । वेदमें इस प्रकार के वर्णन हैं; जिनसे सनातनधर्म के सिद्धान्त गायत्री - स सिद्ध होते हैं, पर यह न सहकर वे वैसे स्थलों में उन्हें हटानेके-जावा लिए यौगिकता मात्रका व्याज करते हैं । गायत्री में उनका अभिप्राय यह है कि ' वेदमें यौगिक ही शब्द हैं, नमूचे दे रूढ अथवा योगरूढ नहीं ' । अपने पक्ष की पुष्टिमें वे श्रीयास्क के ' सर्वाणि आख्यातजानि नामानि ' ( १।१२।२ ) इस सिद्धान्तको कहै संकेतित करते हैं । परन्तु उनका यह प्रयत्न वहाँ रहता है जहा hi क्या वेदमें केवल यौगिकता है! [ १४३ Collection Gujarat. वेद में कोई पुराण- इतिहास से सम्बन्ध रखनेवाला प्रकरण हो । पुराण - विषयसे तटस्थ वेदस्थलमें तो वे स्वयं ही रूढ - योगरूढ अर्थ किया करते हैं । जैसेकि निम्न शब्दोंमें—– ' गोक्षीर ' ( अथर्व. २ २६ ( ४ ), ' सूर्य ' ( अथर्व. १ | १० | ३४ ), ' पृथिवी ' ( अ. १२/११ ), ' पिप्पली ' ( अ. ६।१०६ / १ ), ' गुग्गुलु ' ( अ. १६३८१ ), ' पृश्निपर्णी ' ( अ. २२२५१ ), ' स्त्री ' ( ऋ. ५६११६ ), ' क्रिमि ' ( अथ. ५ | ३३ | ३ ), ' आर्य ' ( ऋ. ६ ६३५ ), एतदादिक वैदिक शब्दोंको वे रूढ वा योगरूढ शब्दों-की तरह व्याख्यात करते हैं । यदि हम उसकी सारी सूची तैयार करें; तो एक लघु - पुस्तक बन जाय । इसमें संस्कृतके परिनिष्ठित विद्वानोंको अवश्य ही सतर्कताका अवलम्वन करना चाहिये । ( २ ) वास्तव में उन आधुनिक वादियोंका यह सिद्धान्त कि-वेदमें यौगिक शब्द ही केवल हुआ करते हैं, और लोकमें केवल रूढ, सर्वथा निर्मूल है । केवल इससे वे अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं । वेदमें प्रकरण आदिकी व्यवस्थासे रूढ भी शब्द होते हैं, यौगिक भी; योगरूढ भी शब्द होते हैं, यौगिकरूढ भी । जो कि वे केवल यौगिकताको सिद्ध करनेके-लिए यास्कके सिद्धान्तका संकेत देते हैं; इसमें उनकी ही भ्रान्ति है; यास्क यह अवश्य कहते हैं कि सब नाम आख्यातज होते हैं; पर वे यह नहीं कहते कि वेदमें केवल यौगिक शब्द होते An और लोकसें केवल रूढ । श्रीयास्कका वैसा नाशय नहीं है । Esangthitiative

पृष्ठ 86

सनातन धर्मालोक ८, पृष्ठ 86 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१४४ ] श्री सनातनधर्मालोक ( ८ ) श्रीयास्कके सिद्धान्तको वे जानते ही नहीं । यास्कका सिद्धान्त ठीक है कि सब संस्कृत नाम चाहे वेदका हो, चाहे लोकका हो, आख्यात ( धातु ) से बनते हैं । कोई भी नाम ( शब्द ) चाहे वह रूढ हो वा योगरूढ - आख्यात ( धातु ) से रहित नहीं हुआ करता; यह श्री-यास्कका अभिप्राय है । इसका यह तात्पर्य नहीं कि - वेदमें यौगिक ही शब्द हैं, भिन्न नहीं, और लोकमें केवल रूढ हैं, यौगिक नहीं । इसका तात्पर्य तो यह है कि न केवल वेदमें ( क्योंकि -श्रीयास्कने वेदका नाम नहीं लिया, प्रत्युत सर्वत्र ही - चाहे लोक हो वा वेद- ' नाम ' आख्यातज हुआ करते हैं । ' श्रयमपीतर एतस्मादेव ' ( २।१७।१, २/२२/१, ४।१३।१ ) इत्यादि कहते हुए भी श्रीयास्क लौकिक अर्थ वाले शब्दोंको भी यौगिक बताते हैं । इसी कारण ही लौकिक ' अमरकोष ' आदिकी ' सुधा ' व्याख्या श्रादिमें रूढ - योगरूढ शब्दों में भी प्रकृति - प्रत्यय दिखलाकर व्युत्पत्तियाँ की गई हैं । परन्तु जिस नाम ( शब्द ) में उस उस आख्यात ( धातु ) के विद्यमान होनेपर भी उस आख्यातके अनुसार अर्थ नहीं मिलता, वह रूढिशब्द है अर्थात् वहाँ रूढिसे अर्थ होता है । जैसेकि - स्वाद. जीने भी ' नामिक ' के द्वितीय पृष्ठ में लिखा है-' रूढि उसको कहते हैं, जिनमें प्रकृति और प्रत्ययका अर्थ न घटता हो; किन्तु वे संज्ञादि - बोधक हों; जैसे- खट्वा, माला; शैलि इत्यादि ' । स्वामीजीके इस वचनसे सिद्ध होता है कि रूढि CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या वेदमें केवल यौगिकता है! [ Ph शब्दों में भी अन्य शब्दोंकी तरह प्रकृति - प्रत्यय तो केवल उस शब्द में प्रकृति - प्रत्ययका अर्थ नहीं मिलता होते है ॥ इस हमारा पक्ष सिद्ध हुआ । वेदमें इस प्रकार के शब्द दुर्लर नहीं हैं । अथवा - ' चित्रकर्मणि कुशलः ' यहाँपर ' सर्वाणि आख्या जानि नामानि ' इस सिद्धान्त के अनुसार ' कुशान् लाति ' आख्यातके अनुसार अर्थ है और वह मुख्य है; परन्तु वा. प्रकृतमें नहीं घट सकता; तब रूढिसे कुश उखाड़नेकी चतुरतार्थ समतासे चतुर अर्थ हो जाता है । यही इस शब्दको आस्याः तज होनेपर भी रूढिता हुआ करती है । इसलिए ' मीमांस दर्शन ' शाबर - भाष्यमें कहा है – ' कुशलः - प्रवीण इति, बहु कुशानां लातुर्गुणेषु सत्सु निपुणतायामेव कुशल- शब्दो रोहान रूढि - शब्द एव भवति । बहुषु च वीणावादस्य गुणेषु स निपुणे एव प्रवीण शब्दो वर्तमानो रूढ इत्युच्यते । तस्मार् सत्यपि लक्षणात्वे श्रुतिसामर्थ्यात् रोहति शब्दः ' ( ६ । ७ । २२ ) । इसी प्रकार किसी अन्वेका नाम कमलनयन है । यहाँ आख्यातजत्वके सिद्धान्तवश ' कमलनयन ' पदकी व्युत्पत्ति हो । पर भी उस पुरुष में वह अर्थ न मिलने से वह शब्द आख्यातव होता हुआ भी रूढि - शब्द गिना जाता है । आर्यसमाजी विद्वार श्रीराजाराम शास्त्रीने निरुक्तकी भूमिका पृ. ८ में भी यही मान है । ( ३ ) वैयाकरणोंको मालूम होगा कि - ' महाभाष्य में प्रत्या f स ० ध ०१० Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 87

सनातन धर्मालोक ८, पृष्ठ 87 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१४६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) हाराह्निकमें ‘ ऋलृक् ’ इस शिवसूत्रमें वार्तिककारने यदृच्छा - शब्दों-का खण्डन करके जाति - शब्द, गुणशब्द तथा क्रियाशब्द ये तीन शब्द स्वीकार किये हैं । भाष्यकारने भी उनका खण्डन न करके उसमें अपनी अनुमति सूचित की है । परन्तु उस भाष्य-सन्दर्भका यह आशय नहीं कि - ' यदृच्छा ' शब्द ( रूढिशब्द ) संस्कृत - संसार में हैं ही नहीं; वरन यह आशय है कि- यदृच्छा शब्द भी व्याकरणानुगृहीत ही होने चाहियें; जैसे कि - ' लुतक ' नाम न रखकर ' ऋतक ' नाम रखना चाहिये । इस प्रकार जब वे यदृच्छा - शब्द भी व्याकरणानुशिष्ट होंगे; तब उनका गुण, क्रिया अथवा जाति शब्द में अन्तर्भाव हो जानेसे वे पृथक् नहीं गिने जाएँगे । परन्तु गुणशब्द वा क्रिया- शब्द माने जाने पर भी जिसमें वह गुण वा क्रिया न मिले, जैसे ' ऋतक ' नाम-वाले पुरुषमें ऋति - क्रिया न दिखलाई पड़े; वह गुणशब्द वा क्रियाशब्द होता हुआ भी ' यदृच्छा ' नामवाला या ' रूढि ’ नामवाला होता है । जैसे कि-किसीका नाम ' तुलसीराम ' है । यदि वह तुलसी में वा तुलसीसे रमण ( क्रीडा - मनोरञ्जन ) करता है, वा तुलसीको प्रसन्न रखता है; तब तो वह गुणशब्द वा क्रियाशब्द है । यदि वैसा गुण वा क्रिया नहीं रखता; तब वह गुणशब्द अथवा क्रियाशब्द होता हुआ भी यदृच्छा - शब्द ही है । इसी कारण ही ' काव्यप्रकाश ' प्रणेता भट्ट - मम्मटने द्वितीय - उल्लास में संकेतग्रह-निरूपण में ' न सन्ति यदृच्छा - शब्दाश्चतुर्था: ' इस भाष्योक्तिको CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या वेदमें केवल यौगिकता है? [ १४७ जानते हुए भी ' चतुष्टयी शब्दानां प्रवृत्तिरिति महाभाष्यकारः ' यह महाभाष्यका मत दिया है । अन्यथा भट्ट - मम्मट अवोध नहीं थे कि उनके सिद्धान्तके विरुद्ध उनका मत देते । उनका तब हमने पहले बता दिया है । इधर ' महाभाष्य ' में ' सन्ति यदृच्छाशब्दा इति कृत्वा प्रयो-जनमुक्तम्; न सन्ति - इति परिहारः । समाने चार्थे शास्त्रान्वितो-S शास्त्रान्वितस्य व्यावर्तको भवति । यथा - देवदत्त - शब्दो देव-विषण - शब्दं व्यावर्तयति, न गाव्यादीन ' इस पूर्वपक्षका ' नैष घोषः, पक्षान्तरैरपि परिहारा भवन्ति ' यह ढीला उत्तर दीखनेसे रूढिशब्दोंकी संज्ञा सिद्ध होती है । इससे स्पष्ट है कि जो शब्द आयात हो; पर उसका अर्थं तच्छन्दवाच्य उसमें न घटे, वह रूढि शब्द है । ' महाभाष्य ' ( १ । १ । १ सूत्र ) में भी ' वेदेऽपि याज्ञिकाः संज्ञां कुर्वन्ति - स्फ्यो यूपश्चपालः- इति । तत्रभवतामुप-चाराष्ट्र अन्येऽपि जानन्ति - इयमस्य संज्ञा इति ' इससे भी वेदमें संज्ञाशब्द- रूढिशब्द सिद्ध हुए । ( ४ ) ' श्री ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासुने ' वेद - सम्मेलन ( २३।१०।१६४३ ) के भाषण में वेद में केवल यौगिकतावादकी पुष्टि करते हुए उसमें यास्ककी जो कि यह साक्षी दी है कि- ' यास्क यौगिकवादका परम - पोषक है । यास्कके समस्त निर्वाचन इसीके प्रमाण हैं । ' अयमपि इतर: शिर एतस्मादेव ' इत्यादि वचनोंका क्या अभिप्राय है? ' यह कथन तो व्यर्थ है । यदि यास्कके अनुसार वेदमात्रमें ' शिरः ' शब्द केवल श्रादित्यवाचक होता, ' सिर ' वाचक नहीं; Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 88

सनातन धर्मालोक ८, पृष्ठ 88 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१४८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) तब तो जिज्ञासुजीका वचन कथंचित् ठीक था; परन्तु ऐसा है नहीं । ' इन्द्रः शिरो, अग्निर्ललाटम् ( अथर्व ६७१ ) इत्यादि बहुत मन्त्रोंमें ‘ शिरः ' शब्दका अर्थ लोककी तरह ' सिर ' ही है । बल्कि श्रीयास्कने भी जिज्ञासुजीके अनुसार लोकप्रसिद्ध ' शिरः ' शब्द में भी वही धातु मानी है जिसे आदित्य वाचक ' शिरः ' शब्दमें माना था । इससे उसके मतमें भी लोक तथा वेदमें सभी स्थलमें यौगिकता तथा योगरूढिता है । उसके मत में वेदमें यौगिकताका एकमात्र नियम नहीं । तब इससे जिज्ञासुजीकी कोई भी इष्ट-सिद्धि नहीं । बल्कि उनके मतमें अनिष्टापत्ति ही है; क्योंकि लोकरूढ शब्द भी वेदमें लोकरूढ अर्थ में भी देखे गये हैं । तब इससे हमारा ही अभिमत सिद्ध हुआ । ( ५ ) आधुनिक वादी वेदाङ्ग - व्याकरणके कर्ता श्रीपाणिनिको भी माननीय मानते हैं । श्रीपाणिनिने औणादिक - शब्दोंको प्रकृति - प्रत्ययसे रहित अव्युत्पन्न माना है । इसीलिए ही तो ' अतः कृकमिकंस- ' ( ८ | ३ | ४६ ) इस सूत्र में ' कमुँ ' धातुसे ही ' कंस ' का ग्रहण हो सकता था, ( जैसे कि- इस सूत्रके ' कृ ' धातुसे ' कारः ' का ग्रहण हो जाता हैं ) तथापि वैयाकरणोंके प्रसिद्ध शत्रु ' गौरव ' से भी न डरकर श्रीपाणिनिने उस ' कंस ' शब्दका प्रयोग किया है; उसमें केवल यही कारण है कि - श्रीपाणिनि कई औौणादिक शब्दोंको जो वेदमें भी सुलभ हैं - रूढ मानते हैं । इस प्रकार वेदाङ्ग - व्याकरण के प्रणेता श्रीपाणिनि कृत् - तद्धितसे CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या वेदमें केवल यौगिकता है? भिन्न अव्युत्पन्न शब्दों की ' अर्थबदधातु - ( १ २/४५ ) इस सूत्र प्रातिपदिक - संज्ञा करके उनके आगे विभक्ति लगाते हैं । पाणिनिके मतमें वेदमें भी रूढि - शब्दोंकी सत्ता सिद्ध हुई, क्योंर वेदमें सभी कृदन्ती तथा तद्धितान्त शब्द नहीं । इसीलिए स्वा दयानन्दजीने ‘ नामिक’के द्वितीय पृष्ठमें लिखा है, “ पाणिनि श्र? रूढि भी मानते हैं । " यदि ऐसा है, और श्रीपाणिनिकी ' अष्टाध्यायी ' को वादी वेदाह मानते हैं, और उसकी व्याख्याको ‘ वेदाङ्ग - प्रकाश ' मानते है और श्रीपाणिनिको वेदज्ञ भी मानते हैं, तब वेद में भी श्री पाणिनिये छअनुसार रूढ -शब्दोंकी सत्ता सिद्ध हुई । इसीलिए ही श्रीयाको ' न सर्वाणि श्राख्यातजानि नामानि ' इस पक्षका पोषक गार्ग्य कहकर फिर ‘ वैयाकरणानां चैके ' ( निरु ० १ | १२ | ३ ) इस स्थलये अपने प्राग्भव वैयाकरणों और श्रीसामश्रमी के अनुसार श्री पाणिनि का सङ्केत किया है । इसलिए ' महाभाष्यकार ने भी ' आयनेय ' ( ७ | १ | २ ) इस सूत्र में ' उणादयोऽव्युत्पन्नानि प्रातिपदिकानि ' यह माना है । इसी प्रकार ' आदेश - प्रत्यययोः ' ( ८ । ३ । ५६ ) इस सूत्र भी उन्होंने औणादिक - शब्दों में प्रकृति - प्रत्ययके विभागा व्युत्पादन है, और नहीं है - यह दो पक्ष माने हैं । इस प्रकार वेद में भी रूढ - योगरूढ शब्द सिद्ध हुए । इसके अतिरिक्त जिस शब्द के अर्थगत धमें उस शब्दसे धाच्यमें भी प्राप्त हों; अन्यत्र भी अतिव्याप्त हों, उनमें एकमें हूं नियमन करनेपर योगरूढिता हुआ करती है । अर्थात् धातुः Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 89

सनातन धर्मालोक ८, पृष्ठ 89 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१५० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ८ ) होनेपर भी वह शब्द सामान्यका नाम न होकर किसी विशेषका नाम हो, वह योगरूढ़ हुआ करता है । रूढि शब्द सिद्ध होनेपर भी जैसे वह यास्कका सिद्धान्त विघातको प्राप्त नहीं होता, वैसेही योगरूढिता माननेपर भी उक्त सिद्धान्तमें क्षति नहीं पड़ती । ‘ पङ्कज ' पद यौगिक होनेपर कीट, कमल आदि बहुतों का वाचक होता हुआ भी कमलमें नियमित होता है । अतएव यह शब्द आख्यातज होनेपर भी योगरूढ है । स्वा ० दयानन्दजीने योगरूढका उदाहरण ' नामिक ' के द्वितीय पृष्ठमें ' दामोदर ' शब्द दिया है । श्रीयास्कने भी तज्ञा, परिव्राजको भूमिज: ' ( निरुक्त १ | १४ | २ ) इस प्रकार ' विल्वादः, लम्बचूड़क: ’ ( नि ० १ । १४ । ७ ) एतदादि योगरूढ - शब्द स्वयं उदाहृत किये हैं । यहाँ उनका यह अभिप्राय है कि कई संन्यासी आदि परिव्रजन क्रियाके होने वा न होनेपर भी ' परिव्राजक ' कहे जाते हैं, और कई भिन्न यात्री पुरुष व्रजन ( गमन ) क्रिया से युक्त होनेपर भी ' परिब्राजक ' नामसे नहीं कहे जाते । एक तक्षण - क्रिया करता वा न करता हुआ भी तक्षा कहा जाता है, और दूसरा ब्राह्मणादि तक्षण ( छीलना ) करता हुआ भी ' तक्षा ' नहीं कहा जाता है । यौगिक मात्राग्रह होने पर कोई तक्षण - क्रिया करता हुआ ' तक्षा ' क्यों न कहा जावे? वादी यज्ञकी समिधाको तक्षण करता हुआ ' तक्षा ' क्यों नहीं कहा जाता? यही योग-रूढिता हुआ करती है । आगे बिल्वका फल खानेवाला होनेपर भी, भविष्य में लम्बी शिखावाला होनेपर भी अब उस क्रियाका CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या वेदमें केवल यौगिकता है? [ १५१ अर्थ न मिलनेसे बिल्वाद तथा लम्बचूड़क नाम रूढि होनेके योग्य है । धातुज होकर वह शब्द हर एकका विशेषण हो सके, तो वह यौगिक हुआ करता है । वेदमें यौगिक शब्दोंको तो श्राधु-निक वादी समाजी भी मानते ही हैं, पूर्व कहे हुए प्रकार से अव उसमें रूढि तथा योगरूढि शब्द भी सिद्ध हो गये । स्वा.द. ' नामिक ' के द्वितीय पृष्ठ में रूढि शब्दोंके विषयमें लिखा है-' रूढि ' उनको कहते हैं कि- जिनमें प्रकृति और प्रत्ययका अ घटता हो, किन्तु वे संज्ञाबोधक हों, जैसे खट्वा, माला, शाला इत्यादि ' । अब देखना चाहिये कि वेदमें इनमें कोई शब्द मिलता हैवा नहीं? यदि मिल जाए; तो मानना पड़ेगा कि वेदमें भी - रूढिशब्द हैं । अब देखिये वेद में ' शाला ' शब्द । ' शालाया विश्ववारायाः ' ( अथर्व ० ६।३।१ ) यहाँपर स्वा ० द ० जीकी ' संस्कार-विधि ' का २१६ पृष्ठ देखना चाहिये । इस प्रकार अन्य शब्द भी हूँ जा सकते हैं । .सं.वि.के वेदारम्भ - संस्कारके ११२ पृष्ठमें स्वामीने रूढि-शब्द धन, वन आदि माने हैं । यह शब्द वेद में भी देखिये - ' घन ( यजु. ४ | ३१ ), धन ( अथर्व. ११/१२८, १२/२/५१ ) इस प्रकार वेद रूढशब्द भी सिद्ध हुए । महाभाष्य ( १।१ तृतीयाह्निक ) में वेद स्पय, यूप, चषाल आदि संज्ञा ( रूढ ) शब्द माने हैं । ' जो व्युत्पत्ति करने पर अन्य अर्थका वाचक हो; और रूढितामें अन्य अर्थका वाचक हो वह यौगिकरूढ हुआ करता Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 90

सनातन धर्मालोक ८, पृष्ठ 90 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१५२ ] श्रीसनातन धर्मालोक ( ८ ) है । यौगिक- रूढ शब्द भी वेदमें हैं । बल्कि उसका उदाहरण वेदका ही ' उद्भि ' पद प्रसिद्ध है । ' उद्भिदा यजेत ' यह श्रुति ‘ मीमांसा - दर्शन ' ( १।४।१-२ सूत्र के भाष्य ) में उधृत की गई है । बद्द ' उद्भिद् ' पद यौगिकतामें वृक्षको तथा रूढिता में यज्ञविशेष-को बतलाता है । यदि वेदमें रूढि शब्द सर्वथा नहीं; तो अपि ' वा नामधेयं स्यात् ' ( मी. द. १४/२ ) यहाँ पर मीमांसाकारने ' उद्भिद् ' आदिको वेदमें कर्मविशेषका नाम कैसे माना है? तब वेदमें भी रूढ, योगरूढ, यौगिक और यौगिकरूढ ये चार प्रकार-के शब्द सिद्ध होगये । तब वेदमें केवल यौगिकता सिद्धान्तित करनेवाले वादी खण्डित होगये । ( ६ ) वेदमें ' मर्य इव योषाम् ' ( अथर्व. १४/२/३७ ) इस मन्त्रमें यदि ' मर्य ' शब्द ' मनुष्य ' अर्थ में रूढ है, तो ‘ स मर्यः ' ( ऋ. १७७ | ३ ) इस मन्त्रमें अग्निका विशेषण होनेसे ' मारक ' अर्थ में यौगिक भी है क्योंकि — रूढ हो या योगरूढ शब्द; यदि किसीका विशेषण बन जावे; तो वह यौगिक हो जाता है । इस प्रकार ' यत्रा नरो देवयन्तः ' ( अथर्व. २०/१०७/१५ ) यहाँ यदि नृ ' ' शब्द मनुष्य - अर्थ में रूढ है, तो ' दिवो नरः ' ( ऋ. ११६४ | ४ ) इस मरुत-देवताके मन्त्रमें ' नेतार: ' इस अर्थ में यौगिक भी है । इसी प्रकार नृणां नृतम! ' ( ऋ. ६ ३३ ३ ) इस इन्द्र- देवताके मन्त्रमें ' नेतॄणां मध्ये अतिशयेन नेतः! ' इस तरह सायण आदियोंने यौगिक अर्थ करके युक्तता ही की है । ' पुरुषः पशुः ' ( अथर्व. ८२२५ ) इस मन्त्रमें यदि ' पशु ' शब्द गज आदि शब्दों में रूढ CC - 0. Ankur Joshi Collection क्या वैदमें केवल यौगिकता है? [ 0 है; तो ‘ विद्वान् अनष्ट - पशुः ' ( ऋ. १०/१७/३ ) इस पूपा देवत मन्त्रमें ' पशु ' शब्द ' ज्ञान ' अर्थ में यौगिक है । ' अनष्ट-अर्थात् अप्रतिहत - ज्ञानवाला । इस प्रकार ' तस्मै पावक! ' १ १३ ६ ) यहाँ पर यदि पा शब्द अग्नि रूढ है, तो ' समुद्रार्थो याः शुचयः पावकाः आपो देवीरिह मामवन्तु ' ( ऋ. ७१४६२ ) यहाँ पर अप दे, होनेसे ‘ पावकाः ' शब्द यौगिक है । ' पुरन्धिर्योषा ' ( वा. ) २२ । २२ ) इस मन्त्रमें यदि ‘ योषा ' शब्द स्त्रीके अर्थ में रूह । तो ' शुद्धाः पूता योषितो यज्ञिया इमा श्रापः ' ( अथवे. ११ ११६ इत्यादि मन्त्रोंमें ‘ योषित् ' शब्द जलोंके अर्थ में यौगिक है । य ) ' देवान्, मनुष्यान्, असुरान्, ( अथवें. ८ | १ | २४ ) यहाँपर ' असू शब्द देव - विरोधी दैत्य - अर्थ में रूढ है; तो ' ये च देवा रह नॄन् पाहि असुर! त्वमस्मान ' ( १ | १७४ | १ ) यहाँपर ' असुर ' छ इन्द्र - देवकेलिए ‘ बलवान् ' इस अर्थ में यौगिक रूपसे प्रयुक्त हुए है । ' माऽप स्थातं महिषेव अवपानात् ' ( ऋ. १०।१०६।२ ) यहाँस ' महिष ' शब्द ' पशुविशेष ' अर्थ में रूढ है; तो ' अपामुपते महिषाः ' ( ऋ. ६ ८ ४ ) यहाँपर ' महान ' अर्थ में वह यौगिक है । जैसा कि - ' निरुक्त ' में ' महान्तो माध्यमिका देवगणाः ' ( निर ७ | २६ | १ ) कहा है । यदि ' वह्नि ' शब्द वेदमें ' वहिं यशसं ' ( ऋ. ११६० १ ) इत्या मन्त्रोंमें अग्नि - अर्थमें रूढ ' है; तो ' यदी मातरो जनयन्त बह्निमं ( ऋ. ३।३१ / २ ) इन मन्त्रोंमें ' वह्नि ' शब्द ' पुत्र ' अर्थ में यौगिक है । Gujarat. An eGangotri Initiative