सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 101–110
सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 101–110
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[ १६७ श्री सनातनधर्मालोक ( १ ) १६८ ] तक पुरुषके यौवनका २१ से प्रारम्भ माना गया है; उस गणनासे अनुकूल स्त्रीका भी यौवन १२ वर्षसे माना जावेगा । तब ' सुश्रुत ' में या हम द्वादशवर्षा पत्नीमावहेत् ' ' ऊनद्वादशवर्षायाम् ' यह पाठ में भी सुश्रुताभिमत ही सिद्ध हुए । है, ( क ) सोलह - चौवीस वर्षकी युवति हो अपने अनुकूल पतिको ये हूँढ़ सकती हैं, यह विचार - धारा तो अँग्रेजी प्रसाद है । दूसरेके रन्तरे । स्वभाव एवं चरित्रका परीक्षण कोई सुगम कार्य नहीं । उसमें नेरिति दूरदर्शी भी संशय में पड़ जाते हैं । ' विषरस भरा फनक घट अन्दर जैसे ' झट परीक्षित नहीं हो सकता है? उस समय तो इन्द्रिय-वृद्धि, वृत्ति प्रवल होती है, अनुराग एकदम उन्मुख होता है । दूसरेकी उसमें प्रकृतिके परीक्षण में जिस धैर्य, विवेक एवम् अनुभवकी अपेक्षा ३० तक रहा करती है, वे उस समय अकर्मण्य होते हैं । एक सुतीक्ष्ण वृद्धिः कटाक्ष, तथा मृदु मधुर हास्य और कुछ अङ्गलावण्य तब एकद्म और मनको अधिकृत कर लेते हैं । उस समय स्वभाव - चरित्र पूर्णता आदियोंकी परीक्षाका अवसर ही नहीं मिलता । उस अवस्थामें ७ कामभाव के आधिक्यसे सात्त्विक प्रेमका प्रभाव चित्तसे हट रिति ) जानेके कारण चित्तका मार्दव नष्ट हो जाता है । उस समय माना प्रकृति बहुपुरुषभावभावित होनेसे एकमें स्थिर नहीं हो सकती । है । पिता के घर में स्वतन्त्रता अधिक और लज्जा कम होनेसे अधिक ३५ १३ आयुमें पतिके वश होना और लज्जाशील होना दुःशक हो जाता वनकी है । उसमें कई कुचेष्टायें हो जाती हैं, सास - ससुरसे भी नहीं हुई शरमाती हैं । CC - 0. Ankur Joshi श्री सीतारामकी वैवाहिक अवस्था [ १६६ Collection Gujarat. ( ख ) पुरुष अङ्गी होता है और स्त्री अङ्ग । अङ्गी मुख्य होता है, अङ्ग गौण I । अङ्गाङ्गिता होनेसे एकता होती है । दोनों अङ्ग या दोनों श्रङ्गी हों, तो पार्थक्य हो जाता है, एकता नहीं । इस प्रकार दोनोंका साम्यवाद पृथक् कर देनेवाला, तथा परस्पर विवाद बढ़ानेवाला होता है । जिस देशमें लड़कीके अधिक श्रायु विवाहका नियम होता है, वहाँ पति - पत्नीका श्रङ्गाङ्गिभाव लुप्त हो जाता है । वहीं विवाहोच्छेद प्रथा भी जारी हो जाती है । यदि उस अधिक आयु में सम्यक्तया स्वभावादिकी परीक्षा तथा परस्पराभिलाषिततामूलक शान्ति होती, तो इङ्गलैण्ड आदि में प्रचुर मात्रा में विवाहोच्छेद क्यों होते? इस देशमें भी उन हानियोंको क्यों आमन्त्रित किया जा रहा है? अपने आयुर्वेदका अनुसरण ही श्रेयस्कर है । आयुर्वेदने इन सव हानियोंको लक्ष्य करके ही जनताको आदेश दिया था कि-' अथास्मै पञ्चविंशतिवर्षाय द्वादशवर्षा पत्नी मावहेत् ' ( सुश्रुत-शारीरस्थान १०।५३ ) | तदनुकूल ही सुश्रुत को-' ऊनद्वादशवर्षायामप्राप्तः पञ्चविंशतिम् । यद्यधत्ते पुमान गर्भ कुक्षिस्थः स विपद्यते । जातो वा न चिरं जीवेद् जीवेद् वा दुर्बलेन्द्रियः । तस्माद् अत्यन्त- बालायां गर्भाधानं न कारयेत् ' ( शारीरस्थान १० / ५४-५५ ) यही पाठ इष्ट था, यह ' आलोक ' के पाठकोंने अनुभव किया होगा । जो लोग ' ऊनषोडशवर्षायां ' यही पाठ रखना चाहते हैं, वे ‘ तस्माद् अत्यन्त - बालायां ' यह तृतीय - चतुर्थ पाद नहीं रखते, पर यह चतुर्थ पाठ बहुत प्रसिद्ध है; अतः तदनुसार प्रथम पाठमें भी ' ऊनद्वादशवर्षायाम् ' ही पाठ वास्तविक है यह सिद्ध हो गया । An eGangotri Initiative
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( ६ ) सुश्रुतमें कन्या विवाहावस्था । पारकों ने ' सुश्रुतमें कन्यागर्भाधानावस्था ' विषय देख लिया; अव उनके आगे ' सुश्रुतमें कन्याविवाहावस्था ' यह विषय उपस्थित किया जाता है । इन दोनों ही विषयों पर पाठक गम्भीर दृष्टि डालेंगे | ( १ ) ' सुश्रुत संहिता ' शारीरस्थानमें दसवें अध्यायमें संस्कारोंका निरूपण आया है । आरम्भमें उसमें गर्भिणी के प्रथम दिवससे लेकर प्रसव तक ( १०।३-८ ) उसके कर्त्तव्य बताये गये हैं । फिर बच्चेका जातकर्म तथा रक्षाविधान करके नामकरण श्रादिसे विद्या - प्रहण तकका वर्णन किया गया है ( १०/५२ ) । फिर ' अथास्मै पञ्चविंशतिवर्षाय द्वादशवर्षी पत्नीमावहेत् पित्र्य-धर्मार्थकामप्रजाः प्राप्स्यति ' ( १०।५३ ) यहां पर पुरुषकी विवाह-की आयु २५ तथा कन्याकी वैवाहिक आयु वारह वर्षकी आदिष्ट की गई है । ' सुश्रुत संहिता ' के सब संस्करणों में यही पाठ है, पर आज कल कई महाशय उसमें परिवर्तन करने लग गये हैं । ' द्वादशवर्षा ' के स्थान में ' षोडशवर्षा ' पाठ करने लग गये हैं । पूर्वपक्ष - उन महाशयोंका यह अभिप्राय है कि- ' द्वादशवर्षा ' यह पाठ ठीक नहीं, क्योंकि वह सुश्रुतसे विरुद्ध है । ' षोडश-वर्षां पत्नीमावहेत् ' यही पाठ ठीक है, क्योंकि इसका अग्रिम पद्य ‘ ऊनषोडशवर्षायामप्राप्तः पञ्चविंशतिम् ' ( १०।५४-५५ ) यह है, इसमें २५-१६ वर्षका अनुपात बताया गया है । ' पञ्चविंशे ततो वर्ष पुमान् नारी तु षोडशे । समत्वागतवीर्यौ तौ ' ( सुश्रुत ० सुश्रुत में कन्या विवाहावस्थ [ १७१ १७ सूत्रस्थान ३५/८ ) इस पद्य में भी पच्चीस वर्षके पुरुषका सोलह वर्षकी स्त्रीसे संयोग बताया गया है । प्राचीन संस्करणोंमें ' पोढश वर्षां पत्नीमावहेत् ' वही पाठ था, यह बात संवत् १६४४. ठीक प्रकाशित श्रीविश्वेश्वरानन्द स्वामीसे प्रणीत ' पुरुषार्थ प्रकाश वेद, ग्रन्थ से मालूम होती है । उसमें युवति - विवाह समर्थन में यही है । वचन ' षोडशवर्षां पत्नीमावहेत् ' इस रूपमें उद्धृत किया गय कहा है । विवाह - कालमें कन्या के बारह वर्षका निर्धारण करने पर मत्य और पुरुषके पच्चीस वर्षका निर्धारण करने पर सुश्रुत के गर्भाधान- मनुस प्रतिपादक वचनमें भी ' पञ्चविंशति ' के स्थान ' एकोनत्रिंशत् ' ही गुणव पाठ होता, क्योंकि लड़की का विवाह हुआ १२ वें वर्षमें, गर्भा पूर्व वत्सर धान हुआ १६ वें वर्ष में, तो पच्चीसवें वषमें विवाहित पुरुष भी प्रकृत्य ४ वर्षके बाद २६ का हो जायगा । अतः ' द्वादशवर्षा ' पाठ ठीक क्षयम नहीं । ' षोडशवर्षा ' पाठ होनेपर १६-२५ वर्ष में विवाहित कन्या बाद और पुरुषका उसी अवस्थामें गर्भाधान हो जायगा, तब ' उन उल्लेख षोडशवर्षायामप्राप्तः पञ्चविंशतिम् ' इस गर्भाधान प्रतिपादक वचनकी पूर्वोक्त वैवाहिक - सूत्रसे ठीक संगति लग जायगी । गौतम विवाहका प्रयोजन ही ' पित्र्यधर्मार्थकामप्रजाः प्राप्स्यति ' वह बोधार बताया गया है, अत: ‘ अथास्मै पञ्चविंशतिवर्षाय षोडशवर्ष गोभित पत्नी मावहेत् ' यही सुश्रुतसंहिताका पाठ है । ' पराशर उत्तरपक्ष- ऋतुम ( २ ) हम भी ' आलोक'- पाठकोंके समक्ष अपने विचार आयुर्वे उपस्थित करते हैं, सुश्रुतसंहिताकी सभी पुस्तकों में ' अथास हुआ ह CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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[ RUP श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) १७२ । सोलह पञ्चविंशतिवर्षाय द्वादशवर्षां पत्नीभावहेत् ' यही पाठ है, और वह - पोटश-ठीक भी है । आयुर्वेद दृष्टशास्त्र होता हुआ भी अदृष्ट - शास्त्र २६४ ज्यसे वेद, स्मृति, पुराण आदिका सर्वत्र अनुवर्तन करता है - यह प्रत्यक्ष नकाश- है । स्मृति आदि शास्त्रोंमें कन्याका विवाह ऋतुकालसे पूर्व ही यही कहा है । इस विषय में ' काममामरणात् तिष्ठेद् गृहे कन्यतु-T गया सत्यपि । न चैवैनां प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कर्हिचित् ' ( ६८६ ) यह करने पर मनुस्मृतिका वादिप्रतिवादि - सम्मत वचन भी साक्षी है । इसमें अधान गुणवान् वरकी प्राप्ति हो जानेपर कन्याका ऋतुमतीत्व हो ' ही पूर्व ही विवाह सूचित किया गया है । ऋतुकाल ' द्वादशाद् गर्भा वत्सरादूर्ध्वमापञ्चाशत् समाः स्त्रियाः । मासि मासि भगद्वारात् रूप भी प्रकृत्यैवार्तवं स्रवेत् ’ ॥ ‘ तद् वर्षाद् द्वादशादूर्ध्वं याति पञ्चाशतः ठ ठीक क्षयम् ' ( सु. सू. स्थान १४/६ ) इन प्रमाणोंसे लड़की के १२ वर्षके कन्या बाद कहा है, तब उससे पूर्व वारहवें वर्षमें कन्या के विवाहका 371- ' उल्लेख उपपन्न ही है । तपादक ( ३ ) जव कि वेद, मनुस्मृति, बृहद्यमस्मृति, अङ्गिरः - स्मृति, नायगी । गौतमधर्मसूत्र, वशिष्ठधर्मसूत्र, देवलस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति, त ' य वोधायनधर्मसूत्र, व्यासस्मृति, हारीतस्मृति, मानवगृह्यसूत्र, डशवर्ष गोभिलगृह्यसूत्र, वृद्धवाग्भट, निर्णयसिन्धु, धर्मसिन्धु, स्मृतितत्त्व, पराशर -माधवीय, मदनपारिजात आदि कन्याका विवाह उसके ऋतुमतीत्वसे पूर्व कहते हैं, तब इनका अनुसरण करनेवाले विचार श्रायुर्वेदमें भी वारह वर्षकी कन्याका विवाह क्यों न लिखा अथ हुआ हो? CC - 0. Ankur Joshi सुश्रुत में कन्या विवाहावस्था [ १७३ Collection Gujarat. किसी भी सुश्रुत संहिताकी पुस्तकमें ' द्वादशवर्षा पत्नी मावहेत ' यहाँ ' पोडशवर्षां ' यद्द पाठान्तर भी नहीं है । सुश्रुत संहिता जो निर्णयसागर प्रेसमें छपी है- के प्रथम द्वितीय संस्करणमें ' द्वादश-वर्षां ' यह पाठ है, परन्तु उसके तृतीय संस्करण में किसी संस्कर्ता-ने ' षोडशदशवर्षा ' यह पाठ कर डाला है । यह स्पष्ट प्रक्षिप्त है । संस्कर्ताने ' द्वादश ' के स्थानमें ' पोडश ' पाठ बदल दिया, पर ' द्वादश ' का ' दश ' शब्द चुगली खानेकेलिए बच गया । जब कि प्राचीन हस्त - लिखित पुस्तकें में ' द्वादशवर्षा ' यह पाठ है । उसी तृतीय संस्करणकी टिप्पणी में भी लिखा है- ' द्वादशवर्षां ' इतीतरेषु हस्तलिखित पुस्तकेषु ' इससे सिद्ध हुआ कि प्रायशः हस्तलिखित पुस्तकों में ' द्वादशवर्षां ' ही पाठ है । तव मुद्रित पुस्तकोंमें किसीने पाठ परिवर्तित कर दिया, यह स्पष्ट ही है । यह संस्कर्ताका स्वैराचार है । वह लड़कीका १२ वें वर्ष में सुश्रुत - प्रोत विवाह न माने, यह उसकी इच्छा पर है, पर उसका यह अधिकार नहीं कि - प्राचीन पाठको ही बदल दे, यह उसकी अनधिकार चेष्टा है । ( ४ ) अब शेष प्रश्न यह रहता है कि - ' यदि २५ वर्षके पुरुष-का १२ वर्षकी स्त्रीके साथ विवाह होगा, तब स्त्रीका गर्भाधान १६ वर्षमें अभ्यनुज्ञात होनेसे, ४ वर्षके बाद १६ वर्ष लग जाने पर पुरुषकी उस समय २६ वर्षकी अवस्था हो जायगी । त ' ऊनषोडशवर्षायामप्राप्तः पञ्चविंशतिम् ' इस सुश्रुत - वचनका अन्वय नहीं लग सकेगा ' । पर यह विरोध उनकी दृष्टिमें रहता है जो दयानन्दी दृष्टिकोणसे देखते हैं । वस्तुतः विवाह और गर्भाधान An eGangotri Initiative
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१७४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) ये दो भिन्न - भिन्न संस्कार हैं, और भिन्न - भिन्न कालीन हैं । विवाहका काल ऋतुकालसे कुछ पूर्व हुआ करता है; और गर्भाधानका काल ऋतुकालमें होता है । गर्भाधानाभिधायक वर्तमान में प्राप्त पद्य में पति - पत्नी दोनोंका नौ वर्षका अन्तर सुश्रुतने श्रावश्यक नहीं बताया । उसका तो यह भाव है कि - गर्भाधानके समय स्त्री १६ वर्षसे कम न हो, और पुरुष गर्भको श्रहित करनेके समय २५ वर्षसे कम न हो, नहीं तो गर्भ नहीं होता, अथवा उसमें दुर्बलेन्द्रियता होती है । इससे पति - पत्नीकी उक्त वर्षोंसे न्यूनता ही निषिद्ध है, अधिकता निषिद्ध नहीं; और न नौ वर्षों का अन्तर नियमित है, अन्यथा ' ऊन-षोडशवर्षायामप्राप्तः पञ्चविंशतिम् ' में ' ऊन प्रप्राप्त ' शब्द न होते । ( ५ ) इसका यह आशय नहीं है कि - ' विवाहके समय यदि पुरुष २५ वर्षका है, और स्त्री १२ वर्षकी है, ४ वर्षके बाद स्त्र यदि १६ वर्षकी हो जावे, और पुरुष २६ वर्षका हो जावे, पुरुष उस स्त्रीमें गर्भाधान करे, तो उसमें गर्भ ही आहित न होगा, अथवा उसकी सन्तान दुर्बलेन्द्रिय होगी । उस पद्यका यह आशय कदापि नहीं, यह पद्य तो गर्भाधानमें १६ वर्षसे स्त्रीकी, २५ वर्षसे पुरुषकी न्यूनता ही निषिद्ध कर रहा है । उक्त पद्य न उतनी गर्भावस्थाका नियमन कर रहा है, न ε वर्षोंका अन्तर अनिवार्य बना रहा है । नहीं तो फिर इस अन्तरके न होने पर गर्म ही आहित न होवे, अथवा उस अन्तरके न होने पर अर्थात् पुरुषकी २६ वर्षकी अवस्था में और सुश्रुतमें कन्या विवाहावस्था [ १७५ १ स्त्रीकी १६ वर्षकी अवस्थामें पारस्परिक संयोग होने पर उत्पन्न सन्तानें सदा दुर्बलेन्द्रिय वाली ही हों! जो दम्पति विवाद करते हैं, क्या उनका परस्पर ६ बर्षका अन्तर होता है?? २ नहीं, तब तो वादियोंके सिद्धान्तानुसार गर्भ होने ही बन्द हो जावें । यदि सृष्टि नहीं रुक रही, दुर्बलता भी नहीं दीख रही भ , इससे स्पष्ट है कि — यह अनुपात अनिवार्य नहीं । वाग्भटमें तो २ २० वर्षके पुरुष और १६ सालकी लड़कीका संयोग कहा है । f नहीं तो फिर सुधारकोंको १४ वर्षकी पत्नी तथा १८ वर्षदे पतिके विवाहके आदेष्टा ' शारदाविल ' का भी विरोध करना चाहिये, क्योंकि उसमें सुश्रुत - सम्मत अन्तर नहीं । यदि स सुधारकोंके अनुसार ' शारदाबिल ' में न्यूनता का निषेध है उ अधिकताका नहीं, और उसमें १४ - १८ वर्षके अनुपातका नियमन नहीं, वैसे ही सुश्रुतोक्त गर्भाधानाभिधायक पद्यमें भी न्यूनताका ६ ही निषेध है, अधिकताका नहीं, और १६ - २५ वर्षोंका नियमन स भी इष्ट नहीं । तभी तो उस पद्य में ' ऊनषोडशवर्षा ' ' पञ्चविंशति- पf मप्राप्तः ' यहाँ पर ‘ ऊन - अप्राप्त ' शब्द प्रत्यक्ष हैं । स ( ६ ) सुश्रुतोक्त अनुपात में अनिवार्यता तथा उससे भिन्नतालेँ गर्भ हित न मानने पर दयानन्दियोंको अपने स्वामी f आदिष्ट वैवाहिक अनुपातके अन्तर खण्डित करने पड़ेंगे । प्रथम संस्कार - विधिमें स्वा. द. जीने लिखा है- ' स्त्री से पुरुषकी त दो गुणा, चढ़ाई गुणा, वा ड्योढ़ा उमरवाला पुरुष होय, 2 तो उसके साथ विवाह कर अर्थात् १६ वर्षकी कन्याको ३२ य CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) १७६ ] उत्पन्न १८ वर्षकी कन्या होय, तो ३६ वर्षका पुरुष, विवाह वर्षका पुरुष कन्या , हो तो ४० वर्षका पुरुष, एवं २४ वर्षकी कन्या ? यहि २० हो तो वर्षकी ४८ वर्षका पुरुष, इसी प्रकार अढ़ाई गुणा और ड्योढ़ा बन्द हो भी समझ लेना ( पृ. ६६-६७ ) । द्वितीय स.प्र. के ४८ पृ.में १८-३०, ख रही, २०–३५, २०-४०. २४-४८ यह स्त्री - पुरुषका वैवाहिक अनुपात तो लिखा गया है । तब इन अनुपातों में भी दयानन्दियोंको गर्भका है । अभाव और सन्तानमें दुर्बलेन्द्रियता माननी पड़ जावेगी? वर्षकै ( ७ ) इसके अतिरिक्त स्वा. द. जीने सृष्टिके आरम्भमें एक करना समयमें ही पति - पत्नियोंकी उत्पत्ति मानी है, ऐसा होने पर जब । उनका विवाह हुआ, तब उनकी समान अवस्था ही सिद्ध हुई । है, फिर भी जब उनकी सन्तानें हुईं, उनसे सिद्ध है कि -सुश्रुतोक्त नियमन अनुपात अनिवार्य नहीं । स. प्र. के १४ समुल्लास ३७५ पृष्ठमें नताका स्वामी ने लिखा है- ' यदि वरावर अवस्थावाली सुहागिन स्त्रियां नियमन पतिको पार्क बहिश्त में रहती हैं तो ठीक नहीं हुआ, क्योंकि वंशवि स्त्रियोंसे पुरुषका आयु दूना, ढाई गुना होना चाहिये ' इससे भी सुश्रुतोक्त उक्त ( १६२५ ) अनुपात स्वा. द. जीसे भी विरुद्ध सिद्ध हुआ । तव सुश्रुतने पुरुषकी आयु जो २५ वर्षकी कही है, नाम जिसमें किसी भी वादी प्रतिवादीकी विप्रतिपत्ति नहीं, उस अनुपातके अनुसार स्त्रीकी आयु १२ वर्षकी होनी चाहिये । रुपकी तव ' अथास्मै पञ्चविंशतिवर्षाय द्वादशवर्षा पत्नीमावहेत् ' ( शारीर. १० | ५३ ) ' ऊनद्वादशवर्षायामप्राप्तः पञ्चविंशतिम् ' ( १० | ५४-५५ ) ३२ यह प्राचीन पाठ युक्त ही सिद्ध हुआ । CC - 0. Ankur Joshi Collection सुश्रुतमें कन्या विवाहावस्था [ १७० ( ८ ) ' पञ्चविंशे ततो वर्षे पुमान् नारी तु षोडशे ' इस पद्यमें १६-२५ के स्त्री - पुरुषोंका संयोग बताया गया है, ऐसा वादीका कथन तो निर्मूल है, क्योंकि सुश्रुतके इस पद्यमें पति - पत्नीके विवाह वा संयोगका तो गन्धमात्र भी नहीं है, न ही प्रकृतस्थलमें वैसा प्रकरण है । इसमें तो १६ वर्षकी स्त्री तथा २५ वर्षके पुरुषकी समवीर्यता समान - बलता कही है, जिसमें इस अवस्थाके स्त्री - पुरुषोंको ओषधिकी मात्रा समान देनी चाहिये - यह संकेत मिलता है, विवाह वा गर्भाधानका नहीं । ' समत्वागतवीर्यौ तौ जानीयात् कुशलो भिषक् ' ( सुश्रुत ३५ १३ ) यह भिषक्की प्रेरणा भैषज्यकेलिए है, विवाह वा गर्भाधानका वैद्यसे कोई सम्बन्ध नहीं । भैषज्यमें भिषकको स्त्री - पुरुषोंका वलावल देखना पड़ता है, इसलिए ही उसे यहां वैसी प्रेरणा दी गई है । गर्भाधान समवीर्यतामें नहीं हुआ करता, प्रत्युत समवीर्यतामें गर्भ हित करने पर नपुंसकी उत्पत्ति सम्भव है - यह आगे कहा जायगा । यदि वादियोंके अनुसार १६-२५ वर्षोंका अनुपात अनिवार्य होता, तो ' उत्तरां प्रतिगृह्णातु सव्यसाची धनंजयः । अयं ह्यौपयिको भर्ता तस्याः पुरुषसत्तमः ' ( विराटपर्व ७११३४ ) जो उत्तरा अर्जुन-को दी जा रही थी, वह उसके पुत्र अभिमन्युको क्यों दी गई? ' अभिमन्युर्महाबाहुः पुत्रो मम विशां पते! जामाता तत्र युक्तो वै भर्ता च दुहितुस्तव ' ( ७२।६ ) क्या अर्जुन - अभिमन्यु दोनोंकी समान अवस्था थी? अथवा अभिमन्युके योग्य वह अर्जुनको क्यों दी जा रही थी? देवयानी कचसे विवाह चाहती थी; फिर Gujarat. Alice Gangri Initiative
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श्रीमनातनधर्मालोक ( 1 ) १७८ ] राजा ययातिसे विवाह हुआ? क्या कच और उसका आयु थी? इससे स्पष्ट है कि इस ६ वर्षके ययातिकी बराबर अनिवार्यता नहीं । वह अनुपात अनुपातकी विवाह वा गर्भाधानमें १२ वर्षकी थी, उत्तरा - अभिमन्युमें था भी नहीं । उत्तरा १६ वर्षका था, तो क्या उनकी सन्तान नहीं हुई? अभिमन्यु परीक्षित् दुर्वलेन्द्रिय था? यदि ऐसा अथवा क्या उसका पुत्र १२ वर्षकी ही ठीक नहीं, तब कन्याकी विवाहावस्था सुश्रुतप्रोक्त चाहे उसका १६ वर्षमें ही हो । क्योंकि- विवाह है, गर्भाधान भिन्न - भिन्न हैं और भिन्न - भिन्न तथा गर्भाधान दोनों संस्कार कालीन हैं । इसी कारण वृद्ध वाग्भटने भी कहा है- ' पुमानेक-विंशतिवर्षः कन्यां द्वादशवर्षदेशीयामुद्वहेत् ' । द्वादशवर्षदेशीयामें प्रत्यय है. और वह यहाँ साभिप्राय है । उसका अर्थ है देशीयर् १२ वर्षसे कुछ कम, १२ वर्ष उसके पूर्ण न हो चुके हों । उसका तात्पर्य यह है कि - चार वर्षके वाद पुरुष २५ का हो; और स्त्री पूरी १६ वर्षकी न हो, कुछ कम हो । तब पति - पत्नीकी सम-वीर्यता न होनेसे, पुरुषकी अपेक्षा स्त्रीकी कुछ अल्पवीर्यता होनेसे क्लीव सन्तति उत्पन्न न होगी । ( ६ ) इसमें यह व्याज नहीं किया सकता कि २५ वर्षका पुरुष चार वर्षे तक संयम न कर सकेगा । जबकि प्रश्नकर्ताके नेता स्वामी दयानन्दजी पुरुषका ४८ वर्ष तक भी संयम कराते हैं, तो पच्चीस वर्ष तक संयम किये हुए पुरुष क्या चार वर्ष तक ही संयम न कर सकेगा? इसी कारण देशमें द्विरागमनकी प्रथा CC - 0. Ankur Joshi Collection सुश्रुत कन्या विवाहावल्या भी होती है । २५ वर्षके वाद ४ वर्ष तक जिसके असंयम शङ्का है; वह २५ वर्ष तक ही संयमी रहा होगा , इसका ही निश्चय है? " विवाह होने पर ही असंयम की शङ्का बनी है, अविवाहितत्वमें नहीं ", ऐसा कथन भी निर्बल है आशङ्का करनेवाले अविवाहित वा स्त्री - हीन पुरुषोंको । क्या ऐ मानते हैं? क्या उनके श्रोत्रपथमें ' परकीयासु दोषोति संक नैव विद्यते । प्रशस्ता तेन साधूनामुपास्या कर सुन्दरी ' स्वी नहीं आई है? जिन्होंने इस सुन्दरीको अपना यह लिया सुन्न । वे अविवाहमें भी असंयमी हो सकते हैं । जिन्होंने उसे नहीं किया है, वे विवाह में भी संयमी हो सकते हैं । केक स्त्रीसे बाह्यविनोद तथा प्रेमवर्द्धन ही उनका कृत्य होगा । ' गर्भाधान से रहित विवाहसे क्या लाभ है ', यह आक्षेप ठीक नहीं, ' आवसथ्याधानं दारकाले ' ( पारस्करगृह्यसूत्र १ । २ ॥ अग्निहोत्रधर्मका ग्रहण उस समय चरितार्थ हुआ करता है इसके अतिरिक्त विवाह होता ही पवित्र प्रेमका आदर्श वह प्रेम बिना ग्राम्यधर्मके भी हो सकता है । ग्राम्यधर्म है । स्वार्थमात्र है । नहीं तो यदि विवाहित होकर आई हुईसे मधुर कच कर लेना ही प्रेम समझा जायगा, तो महान् अनर्थ हो जायगा E इस विषय में ' हम पूर्व प्रकाश डाल चुके हैं । घ यह सब कुछ हमने ' ऊनषोडशवर्षायाम प्राप्तः पञ्चविंशतिम् प इस सुश्रुतके प्रचलित पाठको अवलम्बित करके लिखा है । वस्तुतः ' सुश्रुत'को ' ऊनद्वादशवर्षायामप्राप्तः पञ्चविंशतिम् ' यह Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) १५० ] पाठ इष्ट है । इस विषय में हम गत निवन्धमें ' सुश्रुतमें कन्या-गर्भाधानावस्था ' विषय उपस्थित कर ही चुके हैं । जो लोग ' ऊनषोडशवर्षायां ' ही पाठ मानते हैं, वे ' तस्माद् अत्यन्तवालायां गर्भाधानं न कारयेत् ' यह उपसंहारका पद्यांश नहीं पढ़ते । पर यह उपसंहारांश बहुत प्रसिद्ध है, तब उसके अनुरोधसे सुश्रुतोक्त पाठ भी ' ऊनद्वादशवर्षायां ' ही वास्तविक है । ( १० ) जबकि स्त्रीके गर्भाधानावस्था प्रतिपादक पद्यमें ही ‘ ऊनद्वादशवर्षावां ' पाठ है, तब कन्या विवाह सूत्रमें ' अथारमै पञ्चविंशतिवर्षाय द्वादशवर्षां पत्नी मावहेत् ' ( शारीर. १० | ५३ ) यही पाठ स्वत: सिद्ध हुआ । जो लोग ' षोडशवर्षा पत्नीमावहेत् ' यह पाठ ' द्वादशवर्षा ' के स्थानमें कल्पित करते हैं, उनका यह आशय है कि विवाह युवतिका होता है, बालाका नहीं । श्रतः इसी लक्ष्यसे वे लोग १७ वर्षसे लेकर २४ वर्ष तककी लड़की का विवाह मानते हैं, इसलिए ही यहाँपर भी ' षोडशवर्षा पत्नी-मावहेत् ' पाठ प्रक्षिप्त करते हैं, पर ' भक्षितेपि लशुने न शान्तो व्याधि: ' इस न्यायसे उनका यह परिश्रम जहाँ अवैध है, वहाँ व्यर्थ भी है, क्योंकि - स्त्रीका १६ वाँ वर्ष भी उनके इष्ट प्रमाणोंके अनुसार बाल्य है । जैसे कि- ' बालेति गीयते नारी यावद् वर्षाणि षोडश । ततस्तु तरुणी ज्ञेया द्वात्रिंशद् - वत्सरावधि ' ( भावप्रकाश पूर्वखण्ड ऋतुप्रकरण २७७ श्लोक ) ' षोडशवार्षिकं यावद् बाल्यं तावत् प्रवर्तते ' ( हारीत - संहिता शारीरस्थान ) । तब १६ वर्ष में लड़की का विवाह भी बाल्यविवाह ही हुआ तब Ankur १७-२४ shollection वर्षमें सुश्रुतमें कन्या विवाहावस्था [ १८१ लड़कीका विवाह तो निषिद्ध हो हुआ; बल्कि श्रायुर्वेद तो तरुणीका विवाह निषिद्ध करता है जैसे कि - भावप्रकाशमें कहा है । ' नित्यं बाला सेव्यमाना नित्यं वर्द्धयते बलम् । तमरणी ह्रासयेत् शक्तिं प्रौढोद्भावते जराम् ' ( पूर्वखण्ड ऋतुप्रकरण २७६ ) । तब ' द्वादशवर्षा पत्नीमावहेत् ' यह पाठ धर्मशास्त्रानुमोदित होनेके साथ आयुर्वेदानुमोदित भी सिद्ध हुआ । ( ११ ) जो कि यह कहा जाता है कि - सं ० १६४७ में छपे हुए ' पुरुषार्थ प्रकाश ' में ' षोडशवर्षा पत्नीमावहेत् ' यही सुश्रुतका पाठ श्रीविश्वेश्वरानन्द जी स्वामीने उधृत किया है, यह भी ठीक नहीं । क्योंकि- स्वामी विश्वेश्वरानन्दजीसे पहले के उत्पन्न हुए स्वा. द. जीने अपने स.प्र. तथा ' संस्कार - विधि ' में ' ऊनषोडशवर्षायां ' यह सुश्रुतका गर्भाधानाभिघायक पद्य, तथा ' पञ्चविंशे ततो वर्षे पुमान् नारी तु षोडशे ' वह २५-१६ वर्षके पति - पत्नीकी समवीर्यताका प्रतिपादक सुश्रुत - पद्य उधृत करके भी ' अथास्मै... षोडशवर्षा पत्नीमावहेत् ' ऐसा स्त्री - विवाहावस्था प्रतिपादक पाठ कहीं भी उधृत नहीं किया । इससे भी स्पष्ट है कि - सं. १६४७ से भी पूर्व सं. १६३२-१६३३ में प्रकाशित ' सुश्रुत संहिता ' में ' द्वादशवर्षामावहेत् ' यही पाठ था, जिसे स्वामीने अपने पक्षसे विरुद्ध देखकर उद्धृत नहीं किया । अन्यथा वे अपने पक्ष १६-२५ वर्षके स्त्री - पुरुषके विवाहकी सिद्धिकेलिए दिये हुए ' ऊनषोडशवर्षायां ' इस गर्भाधानाभिधायक पद्यके साथ ही ठहरे हुए ' अथास्मै... षोडशवर्षा ' इस वादिसम्मत Gujarat. An eGangotri Initiative •
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१८२ ] श्री सनातनधर्मालोक ( 8 ) विवाहावस्थाभिधायक पाठको अवश्य उद्धृत करते । पर स्वा. द. जीने सुश्रुत संहिताके शारीरस्थानके प्रकृत स्थलमें ' द्वादशवर्षा पत्नीमावहेत् ' यह स्वपक्ष - विरुद्ध पाठ देखकर एक ' ऊनषोडशवर्षायां ' यह गर्भाधानाभिधायक शारीरस्थानका पद्य लिखकर, फिर उसके साथ लिखे ' द्वादशवर्षा पत्नी मावहेत् ' इस विवाहाभिधायक शारीरस्थानके पूर्व अव्यहित सुश्रुत - वचनको अपने विरुद्ध होनेसे न लिखकर सुश्रुतके सूत्रस्थान की ओर दौड़ लगाई, और वहाँका ' पञ्चविंशे ततो वर्षे पुमान् नारी तु षोडशे ' ( ३५।१३ ) यह वचन जिसका स्त्री - पुरुषकी विवाहावस्थासे कोई सम्बन्ध नहीं था - उद्धृत कर दिया, उसका बलात् विवाहावस्थासे सम्बन्ध कर दिया । इससे स्पष्ट है कि-श्रीविश्वेश्वरानन्द स्वामीने ही ' द्वादशवर्षा पत्नी ' के स्थानमें ' षोडशवर्षा ' पाठ कल्पित कर दिया । उसीको देखकर आजकलके सुधारकोंने भी सुश्रुतसं.में परिवर्तन कर दिया हैं । ( १२ ) इस प्रकार आह्निकसूत्रावली में भी ' द्वादशवर्षा पत्नी-मावहेत् ' ( अष्टाङ्गभागकृत्यानि पृ. २२६ ) यही पाठ श्रीधन्वन्तरि के नामसे उद्धृत किया गया है । ( ख ) वृद्ध वाग्भट भी यही साक्षी दे रहा है कि- ' पुमानेकविंशतिवर्षः कन्यां द्वादशवर्ष-देशीयाम्... उद्वहेत् ' । इस साक्षी से भी ' द्वादशवर्षा पत्नी मावहेत् ' यही पाठ सुश्रुतसंहिता में था । ( ग ) श्रीघाणेकरने सुश्रुत-संहिता पर उत्तम व्याख्या की है, उस ( प्र.सं. ) में भी यही पाठ है । ( घ ) श्रीमुरलीधर कृत टीका वाली सुश्रुतसं में भी यही पाठ है । CC - 0. Ankur Joshi Collection सुश्रुत में कन्या विवाहावस्था [ १८: १ ( ङ ) मोतीलाल बनारसीदासकी छपवाई हुई मूल ' सुश्रुतसंहिता ' में भी यही पाठ है । ( च ) भास्कर - प्रकाश ४ थे समुल्लास में श्री स्व श्री तुलसीराम स्वामीने ' द्वादशवर्षा ' पाठ कन्या विवाहावस्थादे ३ श माना है । यदि आजकलके अर्वाचीन संस्करणोंमें ε “ षोडशवर्षा ' पाठ रख रहे हैं, इसके उत्तरदायी वे ही हैं, उसमा स सुश्रुतकर्तासे कोई सम्बन्ध नहीं । व ( च ) चरक - संहितामें कहा है- ' नर्ते वै षोडशाद् वर्षान ल सप्तत्याः परतो न च । आयुष्कामो नरः स्त्रीभिः संयोगं कर्तुमईनि चिकित्सास्थान २।४० चतुर्थपाद ) यहाँपर वादि - प्रतिवादिमान चरकने १६ वर्षसे पूर्व और ७० वर्षके बाद पुरुषको स्त्री - संगळे तथ लिए निषेध कर दिया है । कौटलीय अर्थशास्त्र में भी पुरुषो भी ब्रह्मचर्यकेलिए कहा है - ' ब्रह्मचर्य च य षोडशाद् वर्षाद्, श्र [ ततो ] गोदानं दारकर्म च ' ( १५ ) यहाँपर म ० म ० पं ० गणपति शास्त्रीने व्याख्या की है - ' षोडशवर्षमभिव्याप्य ब्रह्मचर्य र मिति । अतः पश्चात् गोदानं - केशान्तकर्म, दारकर्म च विवाह । इस प्रकार जब कम से कम १६ वर्षके पुरुषको चरक ल तब कौटल्यने स्त्री - संगके लिए आदेश दिया है, तो ' वेदानधील वर्ष वेदौ वा, वेदं वापि यथाक्रमम् । अविप्लुतब्रह्मचर्यो गृहस्थाश्रम कु पल्ल माविशेत् ' ( मनु. ३'२ ) तदर्धिकं पादिकं वा ग्रहणान्तिकमेव व उस ( मनु. ३ | १ ) ' ग्रहणान्तं वा जीवितस्याऽस्थिरत्वात् ' ( बोधावर खी धर्मसूत्र १ | ३ | ४ ) इन प्रमाणोंसे जिसने पादिक ब्रह्मचर्याश्रम नि रहे है, उस १७ वर्षके पुरुषको स्त्री क्या १७-२४ वर्षकी दी जायग आ Gujarat. An eGangotri Initiative
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[ १८३ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) १८४ | -संहिता ' द. जीने भी स. प्र. के तृतीय समुल्लास २५ पृष्ठमें मनुस्मृतिके समें थी स्वा. ३१ पद्यके व्याख्यानमें पादिक ब्रह्मचर्य पुरुषका ८ वर्षके बाद डावस्थाएँ वर्ष तक माना है, तदनुसार १७ वर्षके पुरुषकी ब्रह्मचर्याश्रमकी I समाप्ति हो जायगी । अव उसे विवाह करना है, उसे १७–२४ उस वर्षकी लड़की भला कैसे दी जा सकती है? वहाँ ११-१२ वर्षीय वर्षात लड़कीका देना ही सर्वसम्मत होगा? ( १३ ) वेदसे भी सिद्ध होता है कि -२५ वर्ष से पूर्व भी विवाह हो सकता है – ' श्वशुराय शम्भूः ' ( अथर्ववेदसं. १४।२।२६-२७ ) दिमान तथा अथर्व. ( १४ | १ | ४४ ) के अनुसार बहूका सास - ससुरके ऊपर श्री - संगळे भी राज्य करना कहा है । इसी तरह ' वधू ' प्रतीक्षन्ते स्वशुरो पुरुषके देवरश्च ' ( अथर्व. १४ | १ | ३ ९ ) यहाँपर भी बहूके राज्यमें ससुरकी दू, स्थिति कही गई है । गणपति यदि पुरुषका विवाह केवल २५ वर्षमें ही हो, तो कम से कम दो वर्षों में उसका पुत्र होगा । उस समय पिता २७ वर्षका होगा? वाह तब वह पुत्र को आठ वर्ष की अवस्था में ( जब कि वह स्वयं ३५ चरक वर्षके लगभग होगा ) गुरुकुलमें पठनार्थ भेजे, और पुत्र गुरु-दानधील कुलमें २५ वर्षतक रहकर घर लौटे, उस समय पिता अपनी हस्थाश्रम पत्नीसहित वानप्रस्थमें होगा । तब २६ वें वर्ष पुत्र विवाह करे, कमेव उस समय उसके माता - पिता के गृहस्थाश्रम में न होनेसे उसकी बोधावर स्त्रीके सास - ससुर पास न होनेसे उक्त वेदमन्त्रका कथन व्यर्थ श्रम कि रहेगा । यह गणना है अधम ब्रह्मचर्य ( २५ वर्ष ) के विवाहमें, जायग और प्रथम लड़केकी । ४८ वर्षके ब्रह्मचर्य में तथा वेद - सम्मत CC - 0. Ankur Joshi Collection सुश्रुत में कन्या विवाहावस्था [ १८५ १० लड़कों में तो भला क्या कहना? इससे स्पष्ट है कि वेदके मतमें १८-१९ -२० वर्षमें भी पुरुष का विवाह हो सकता है । तभी तो पादिक ब्रह्मचर्य माना गया है । एक वेदाध्ययन का ब्रह्मचर्य मनुस्मृतिके ३ | १-२ पद्योंमें आया है, जिसे खा. द. जीने भी अपने स. प्र. के ३, ४ समुल्लासमें माना है । उस समय विवाह करनेपर पिताके भी गृहस्थाश्रममें होनेसे, बहूका ससुर निकट होनेसे उक्त वेदमन्त्रकी सार्थकता सिद्ध होती है । ( ख ) इसी प्रकार ' इहैव स्तं मा वियोष्टं विश्वमायुर्व्यश्नुतम् । क्रीडन्तौ पुत्रैर्नप्तृभिर्मोदमानौ स्वे गृहे ( ऋ. १०१८५१४२ ) इस वेद-मन्त्रके अनुसार दम्पतीका पुत्र - पत्रोंसे खेलना कहा है, यदि २५ वर्ष का पूरा ब्रह्मचर्य माना जावेगा, तब दम्पती पौत्रोंसे न खेल सकेंगे, क्योंकि वे वानप्रस्थाश्रम में होंगे । इससे वेदानुसार २५ वर्ष से पूर्व भी विवाह हो सकता है, तभी पौत्रोंसे खेलना सम्भव होगा । इस विषय में ' आलोक ' ( ८ ) पृ. ४०२-४०६ में स्पष्टता देखिये । इसलिए वाग्भटसंहिता आदि में पुरुष का २० वें वर्षमें भी संयोग लिखा है; तब विवाह उससे पूर्व स्वतः सिद्ध है । चरकका मत हम बता ही चुके हैं । इस प्रकार जब १८-१६ आदि वर्षोंमें भी उपवेद आयुर्वेद को, तथा उसके वेद अथर्ववेद को पुरुषका विवाह सम्मत है, तो क्या वह १७-२४ वर्षकी कन्यासे विवाह करे? तब सुश्रुत आदि का अनुपात कैसे उपपन्न होगा? उस समय तो उस अनुपातके अनुसार उस पुरुष को ११-१२ वर्ष की लड़की मिलनी चाहिये । Gujarat. An eGangotri Initiative
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१८६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) ( १४ ) पुरुषके विवाहको अवस्था में स्मृति आदि शास्त्रों में जो कि बिलम्ब वा शीघ्रता कही गई है, वहाँ पुरुषके वीर्य की पक्वता - अपक्वतासे सम्बन्ध नहीं हुआ करता । वीर्यपक्वता आदि का सम्बन्ध गर्भाधानसे तो कथञ्चित् हो, पर विवाह से नहीं है । विवाह में विलम्बका कारण तो शास्त्रों में वेदकी समाप्ति को हो माना है, वेदकी शीघ्र समाप्तिमें विवाह भी शीघ्र कहा गया है, तभी तो ' ग्रहणान्तिक ब्रह्मचर्य ' भी माना गया है । इस कारण ' त्रिंशद्वर्षो वहेत् कन्यां ' ( ६६४ ) इस मनु - पद्य की व्याख्यामें पुरुषकी ३० वर्षकी अवस्थामें विवाह श्रादिष्ट करनेमें कारण लिखा है ' एतच्च योग्यकालप्रदर्शनपरम् नतु नियमार्थम्, प्रायेण एतावता कालेन गृहीतवेदो भवति गृहीतवेदश्च उपकुर्वाणको गृहस्थाश्रमं प्रति न विलम्बेत इति सत्वर इत्यस्यार्थः । इसी प्रकार ' मोमांसादर्शन ' के ( ६८ १३ सूत्रके, शावर भाष्य में भी कहा है - ' विद्याग्रहणोत्तर - कालश्च दारसंग्रहः ( विवाहः ) ' । वेद - ग्रहण के निश्चय न होने से हो मनुस्मृतिमें पुरुषकी अवस्थाके लिए ३० वर्ष भी आये हैं, २४ वर्ष भी । जब इस प्रकार कहा गया है, तब व पक्वता विवाहकी उपकारक नहीं, किन्तु गर्भाधान की उपकारक कथञ्चित् हो सकती है । गर्भाधान विवाहसे भिन्न संस्कार है, तथा भिन्नकालीन है । गर्भाधानकी अवस्था में भले ही मतभेद हो, यद्यपि चरकने तो १६ वर्षीय पुरुषको भी स्त्री - संयोग की आज्ञा दे रक्खी है, यह पूर्व कहा ही जा चुका है, फिर भी विवाहको अवस्थामें तो विवाद ही व्यर्थ है । CC - 0. Ankur Joshi Collection T सुश्रुत में कन्या विवाहावस्था [ १७ १८ फलतः १२ वर्षमें कन्या विवाह किसी भी दृष्टिको घोड निन्दित नहीं । सुश्रु तमें कन्याका विवाह ऋतुकालसे पूर्व इ स्वा तः वहाँ ' द्वादशवर्षीयां पत्नी मावहेत् ' यही सुश्रुत सम्मत पर वा है, ' षोडशवर्षा ' पाठ नहीं । तभी स्वामी दयानन्दजीने । ग्रन्थ पक्षसे विरुद्ध होनेसे उसे उद्धृत नहीं किया । नहीं ( १५ ) परन्तु स्वा.द.जीके कई चेले - चांटे इस बातको वे यह नहीं करते । वे कहते हैं कि - " स्वामीजी के समय भी मिल सुश्रु । कन्याविवाहके विषय ” में ‘ अथास्मै पञ्चविंशतिवर्षाय षोडशन पत्नीमावहेत् ' यही पाठ था । ' द्वादशवर्षा ' नहीं । इस विवा प्रमाणस्वरूप वे स्वामीजीकी ' संस्कारविधि ' के गर्भाधानप्रकार की ३२ पृष्ठसे निम्न उद्धरण देते हैं " अब देखिये सुश्रुतकार पर पर वाले वैद्य कि जिनका प्रमाण सब विद्वान् लोग मानते हैं, उन्होंन ( सुश्रुतकार ) विवाह और गर्भाधान का समय, न्यूनसे ही सं १६ वर्षकी कन्या और २५ वर्षका पुरुष अवश्य होवे, यह लित्नीम हैं " इससे स्पष्ट है कि स्वामीजी के समय में भी सुश्रुत - प्री उन्न ' षोडशवर्षा पत्नीमावहेत् ' यही पाठ था ' द्वादशवर्षा नहीं ( ( श्री ध. दे. ' श्री ' में ) को हीं । हम इस बात पर भी विचार करना चाहते हैं, जिससे ह हो जावेगा कि ' सुश्रुतसंहिता ' में स्वामीजीके समय में । न १ ' षोडशवर्षा पत्नी ' पाठ था, वा ' द्वादशवर्षा '? ' आलोक ' के वि रखते ह पाठकगण इसमें ध्यान दें । यहा यदि सुश्रुतके उक्त स्थलमें ' अथास्मै पञ्चविंशतिवर्षी Gujarat. An eGangotri Initiative