सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 91–100

सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 91–100

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[ १४८ ] श्री सनातनधर्मालोक ( १ ) सुश्रुतमें कन्या- गर्भाधानावस्था [ १४ ९ द जी: में ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ६६८-७११ तथा पृ. ६८० भी देखना चाहिये; त् जिसपर वादी कुछ भी नहीं लिख सका । सूचना - १२७- १२८ पृष्ठमें हमने वादि प्रमाणित श्रीद्वारका-प्रसादसे किये – ' रमण ' अर्थका समाधान किया था । श्रव उसीके कोष ( संस्कृतशब्दार्थकौस्तुभ पृ. ६३६ ) में पथिक देखे । उसमें सुश्रुत ' रमण'का हमारे अनुकूल ' आमोद - प्रमोद ' अर्थ भी किया है; कर वहाँ तब उससे भी हमारे पक्षकी सिद्धि होगई । जो कि वादी सीता-विवाह रामकी वैवाहिक आयुमें उपवेद आयुर्वेद ( सुश्रुत सं. ) का विरोध युवावस बताता है; उसपर भी हम अव प्रकरणवश विचार करते हैं । ( ५ ) कन्याकी विवाहावस्था एवं गर्भाधानावस्था 1 वादी लिखता है - ' ऐसे कालमें विवाह होना चाहिये, जब मैथुनोत! कन्या गर्भाधान के योग्य हो । वह समय १६ वर्षका है- ' ऊन-खोस प्र षोडशवर्षायामप्राप्तः पञ्चविंशतिम् । यद्याधत्ते पुमान् गर्भं कुक्षिस्थः हीद स विपद्यते ' ( सुश्रुत. शारीर. १०/४७ ) १६ वर्षसे न्यून वय वाली ति क्यों स्त्री में २५ वर्षसे न्यून आयुवाला पुरुष जो गर्भको स्थापन करे; तो वह कुक्षिस्थ हुआ विपत्तिको प्राप्त होता है ( नीक्षीवि. पृ. ४३ ) -१५ व प्रत्युत्तर -- ' ऊनषोडशवर्षायां ' यह सुश्रुत सं. में गर्भाधानका

श्लोक है, विवाहका नहीं । विवाहकेलिए तो वहीं ' अथास्मै पञ्च-वेद - कि

निक जोड़ विंशतिवर्षाय द्वादशवर्षां पत्नीमावहेत् ' ( १०।५३ ) यह पाठ है;

जिसे भास्कर - प्रकाशके कर्त्ता श्री तुलसीरामजी स्वामीने भी माना उसमें है है; और उसे भिन्न देशकालादिकेलिए माना है । यह हम अभी-इमसे अभी कह चुके हैं । इस वचनमें १२ वर्षं वाली लड़कीका इस CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat विवाह कहा है । तब प्रतिपक्षीका पक्ष कट गया । ‘ ऊनषोडशवर्षायामप्राप्तः पञ्चविंशतिम ' यह पद्य तो सुश्रुत-सं. गर्भाधानका है, विवाहका नहीं । गर्भाधान तो ऋतुकालमें लड़की की योग्यता आदि देखकर तथा परस्पराभिलषिततामें जब-तब किया जा सकता है; निश्चितता तत्र भी उसमें नहीं की जा सकती । यद्यपि गर्भाधानाभिधायक " ऊनपोडशवर्षायाम् अप्राप्तः पञ्चविंशतिम् ' सुश्रु. के इस पद्यमें वर्तमानमें यह पाठ सब संस्क-रणों में पाया जाता है; तथापि हमारा विश्वास है कि यहाँ पर भी प्राचीन पाठ ' ऊनद्वादशवर्षायां ' ही था । इसमें हम पूर्वापरके समन्वय सहित अपने विचार उपस्थित करते हैं । वादी - प्रतिवादी इस पर यदि निष्पक्ष दृष्टि हो जावेगा । ( ५ ) सुश्रुतमें ( १ ) हमारे विचारमें पाठ नहीं है, यद्यपि यह ' ऊनद्वादशवर्षायामप्राप्तः यद्याधत्ते पुमान् गर्भं डालेंगे; तो यह विषय उनके हृदयङ्गम कन्या - गर्भाधानावस्था । ' ऊनषोडशवर्षायां ' यह सुश्रुतसम्मत

भी कुछ समय से चालू है; तथापि-पञ्चविंशतिम् ।

कुक्षिस्थः स विपद्यते ॥

जातो वा न चिरं जीवेद् जीवेद् वा दुर्बलेन्द्रियः । तस्माद् अत्यन्त - बालायां गर्भाधानं न कारयेत् ' । ( शारीरस्थान १०।५४-५५ ) यही पाठ प्राचीन तथा युक्ति - युक्त एवं सुश्रुतसंहितासम्मत है । . An eGangotri Initiative

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१५० | श्रीसनातनधर्मालोक ( ह ) ‘ ऊनषोडशवर्षायाम् ' इस पाठके सुश्रुतके अभिमत न होनेमें पाँच - छः कारण हैं; उन्हें हम ' आलोक ' - पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं । ( १ ) निर्णयसागर प्रेस मुम्बई में प्रकाशित, श्रीडह्नरणाचार्य टीका वाली, श्रीयादवजी त्रिकम महोदयसे सम्पादित सुश्रुतसंहिता प्रथम - संस्करण तथा द्वितीय संस्करण में ' ऊनषोडशवर्षायाम् ' इस गर्भाधान वाले सूत्रकी टिप्पणी में लिखा है- ' उनद्वादशवर्षायाम् ' इति हस्तलिखितपुस्तकेषु पाठ उपलभ्यते ' । जव इस प्रकार प्राचीन हस्तलिखित सुश्रुतसंहिताकी पुस्तकों में ' ऊनद्वादशवर्षायाम् ' पाठ मिला है, और उस पाठमें छन्दोभङ्ग आदि कोई दोष भी नहीं है; तब यही पाठ प्राचीन सिद्ध हुआ, ' ऊनषोडशवर्षायां ' पाठ बहुत प्राचीन नहीं । ' ऊनषोडशवर्षायां ' यह पाठ कुछ समयसे परिवर्तित किया हुआ मालूम होता है । यह पाठ सुश्रुतसंहितासे विरुद्ध है; क्योंकि भगवान् धन्वन्तरि ' रसादेव स्त्रिया रक्तं रजः सव्ज्ञं प्रवर्तते । तद् वर्षाद् द्वादशादूध्वं याति पञ्चाशतः क्षयम् ' ( सुश्रुत-सूत्रस्थान १४।६ ) इस प्रमाणसे १२ वर्षोंके अन्तमें ऋतुकाल कहते हैं, १६ वर्षोंके अन्तमें ऋतुकाल नहीं कहते । और गर्भा-धानका सम्बन्ध ऋतुसे होता है - यह सर्वसम्मत है, क्योंकि-ऋतु होता है पुष्प, और गर्भ होता है फल । ऋतु १६ वें वर्षमें नहीं होता, किन्तु १२ वें के अन्तमें । अतः यह ' ऊनद्वादशवर्षायां ' पाठके सुश्रुतसंहितासे अभिमत होनेमें प्रथम कारण है । CC - 0. Ankur Joshi Collection सुश्रुत में कन्या - गर्भाधानावस्था [ t १५ ( २ ) संहिताकार लड़कीका विवाह १२ वें वर्ष में मानते है प्रस जैसे- ' अस्मै पञ्चविंशतिवर्षाय द्वादशवर्षीयां पत्नी माव ( सुश्रुत शारी. ५३ ) । इसपर हम अग्रिम निवन्ध में प्रकार नपुं डालेंगे । जब ऐसा है; तो गर्भाधान प्रतिपादक पद्यमें भी सुश्रुतः भव चार्यको ' ऊनद्वादशवर्षायां ' ही पाठ अभिमत था । यह धिक पाठके होनेमें दूसरा कारण है । कन्य ( ३ ) हस्त - लिखित प्राचीन पुस्तकोंमें ' ऊनद्वादशवर्षायाम् ' बई ' वी पाठ उपलब्ध हुआ है - यह पूर्व कहा जा चुका है यह ' ( चर द्वादशवर्षायां ' पाठके सुश्रुतसंहिताको अभिमत होने में तृतीः खण्ड कारण है । निर्णयसागरके सुश्रु. ३ य संस्करणकी टिप्पणी में में और होन ' उनद्वादशवर्षायाम् ' इति हस्त लिखित पुस्तकेषु पाठ उपलभ्व विधि लिखा है । अपने मान्य संस्करणको भी यदि वादी नहीं मानता तो यह उसकी धींगाधींगी है । चौखभावाले संस्करणमें पुरुष नपुं ‘ ऊनद्वादशवर्षायां ' यह पाठान्तर मिलता है । डह्नरणाचार्य टीकामें भी ‘ ऊनषोडशवर्षया सह ' यहाँपर ' ऊनद्वादशवर्षया केव यह पाठान्तर मिलता है । विवा ( ४ ) चतुर्थ कारण यह है– पञ्चविंशे ततो वर्षे पुमान् नारी | पुमा षोडशे । समत्वागत्तवीर्यौ तौ जानीयात् कुशलो भिषक् ॥ ( एषोडश् सूत्रस्थान ३५।१३ ) इस वचनसे सोलह - पच्चीस वर्षमें स्त्री - पुरुष होगा वीर्यं सम माना गया है । इसी प्रमाणसे कतिपय व्यक्ति पश्चीम द्वाद सोलह वर्षके पति - पत्नीका आपस में संयोग चाहते हैं । " ईषद पति - पत्नी दोनोंके वीर्य के समान होनेसे नपुंसककी उत्पत्ति Gujarat. An eGangotri Initiative

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[ १३ १५२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) नते है प्रसंग होगा । जैसे कि कहा है— माव ‘ शुक्रवाहुल्यात् पुमान्, आर्तवबाहुल्यात् स्त्री, साम्यादुभयो-प्रकार नंपुंसकम्, ( सुश्रुतसंहिता, शारीरस्थान ३ । ५ ) ' द्वाभ्यां समेन नपुंसको भवति ' ( निरुक्त १४ | ६ ) ' पुमान् पु ' सोऽधिके शुक्र, स्त्री भवत्य-ह सुश्रुताः धिके स्त्रियाः । ‘ समेऽपुमान् पुंस्त्रियो वा ' ( मनुस्मृति ३ | ४६ ) ( रक्तेन कन्यामधिकेन पुत्रं शुक्रेण ' ( चरकसंहिता - शारीरस्थान २/१२ ) ाम् ' वहीं ' वीजात् समांशादुपतप्तवीजात् स्त्री- पुसलिङ्गी भवति द्विरेताः ' इ ' ( चरक. शा. २।१८ ) ' नपुंसकं तयोः साम्ये ' ( भावप्रकाश पूर्व खण्ड गर्भप्रकरण ४० ) । ' पुरुष के अधिक वीर्य होने से पुत्रोत्पत्ति और स्त्रीके अधिक वीर्य होनेसे कन्योत्पत्ति, दोनों पी में तुल्य होनेसे नपुंसक होता है " ( स्वा. दयानन्दजीकी ' प्रथमसंस्कार-पलभ्यते विधि ' पृष्ठ १२-१३ ) तब सोलह वर्षकी लड़की और पच्चीस वर्षके मानव पुरुषकी सुश्रुत ( सूत्र. ३५ १३ ) के अनुसार समवीर्यतामें गर्भ करके नपुंसक उत्पन्न करना भला किस पिताको इष्ट हो सकता है? गाचार्य इसी त्रुटिको दूर करनेकेलिए आयुर्वेद के ग्रन्थ “ वृद्धवाग्भट ” याद के वचनमें २१ वर्षके पुरुषका ' द्वादशवर्षदेशीया ' लड़कीके साथ विवाह कहा है, और चार वर्षके बाद गर्भाधान कहा है । नारी! ' पुमानेकविंशतिवर्षः कन्यां द्वादशवर्षदेशीयां “ उद्वहेत् । तस्यां ॥ ( सु षोडशवर्षायां पञ्चविंशतिवर्षः - पुरुषः पुत्रार्थं यतेत ' । तव पुरुष यो पुरुषहोगा २५ वर्षका और स्त्री होगी षोडशवर्षदेशीया । उक्त क्ति पची ' द्वादशवर्षदेशीया " शब्द में ' देशीयर् ' प्रत्यय साभिप्राय है । - हैं । ईषदसमाप्तौ कल्पब - देश्यदेशीयर: " ( ५ । ३ । ६७ ) इस पाणिनि-उत्पत्ति CC - 0. Ankur Joshi सुश्रुत में कन्या - गर्भाधानावस्था [ १५३ सूत्रसे ' देशीयर् ' प्रत्यय कुछ ' न्यून ' अर्थ में होता है । तव बारह वर्षसे कुछ न्यूनअवस्था वाली, चार वर्षके वाद सोलह वर्षसे कुछ कम अवस्थाकी होगी । उस समय समवीर्यता न होनेसे ( क्योंकि – पूर्ण १६-२५ वर्षीय स्त्री - पुरुषोंकी ही समवीर्यता कही गई है ) – । नपुसकोत्पत्तिप्रसङ्ग भी न होगा । समवीर्य वाली स्त्री के साथ विवाह वा गर्भाधान कभी नहीं करना पड़ता, किन्तु अपनी अपेक्षा हीनवीर्या स्त्री ही श्राधेय-गर्भा हुआ करती है । क्योंकि समवीर्यतामें या तो सन्तान होती नहीं, या नपुंसक सन्तान होती हैं, यह लोकसिद्ध वात है । ' संशयो जायते स्नाम्यात् ' ( महाभारत सभापर्व १७१५ ); तव ' ऊन-षोडशवर्षायां ' यह पाठ सुश्रुतसम्मत न हुआ । स्वा. दु.जीने अपनी ' द्वितीयसंस्कारविधि ' में कहा है । '२५ वर्षका पुरुष और १६ वर्षकी स्त्री दोनों तुल्य - सामर्थ्य वाले होते हैं, इस [ तुल्य-सामर्थ्यके ] कारण इस अवस्थामें जो विवाह करना है, वह अधम विवाह है ' ( पृष्ठ १०३।१०४ ) तत्र ' ऊनषोडशवर्षायां ' यह पाठ अनार्ष सिद्ध हुआ । वहाँपर ' ऊनद्वादशवर्षायां ' यही पाठ आर्ष सिद्ध हुआ । उस अवस्थाके अन्त में ऋतुमतीत्व हो जाने पर पुरुष स्त्रीकी अपेक्षा अधिक शुक्रवान् होता है; तव पुत्रोत्पत्ति भी अवश्य होगी । रजस्वलात्व ही गर्भाशय तथा गर्भाधानकी योग्यताको प्रमाणित करने में प्रकृतिका इङ्गित है । रज वा वीर्य स्वयं बाहर तब आता है; जब वह भीतरकी पूर्ति कर ले । तब वह अधिकतासे बचा हुआ ही बाहर आता है । Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 94

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१५४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) स्वा. द. जीने स.प्र. के ३ य समु. २६ पृष्ठमें लिखा है- ' जब साङ्गोपाङ्ग शरीरस्थ सकल धातु पुष्ट होके पूर्णता को प्राप्त होते हैं, तदनन्तर जो धातु बढ़ता है वह शरीर में नहीं रहता ", इस प्रकार रजका बाहर आना सिद्ध करता है कि गर्भाशय बढ़ रहा है । रज गर्भाधानकी योग्यता में प्रकृतिका इङ्गित है । रजोधर्मकी समाप्ति गर्भाधान योग्यता की समाप्तिका चिह्न होता है । रजस्वलात्व प्रारम्भ न होना गर्भाधानकी अयोग्यताका चिह्न हुआ करता है । ' सुश्रुतसंहिता ' के सूत्रस्थान में कहा है- ' नारीणां रजसि च उप-चीयमाने शनैः शनैः स्तनगर्भाशययोन्यभिवृद्धिर्भवति ' ( १४ | १८ ) यह चतुर्थ कारण स्पष्ट हुआ । ( ५ ) ' ऊनषोडशवर्षायां ' इस पाठके सुश्रुतानभिमतत्वमें पाँचव कारण यह है कि उक्त पद्य - द्वयके अन्तिम अंशमें उप-संहार किया है " तस्माद् अत्यन्तबालायां गर्भाधानं न कारयेत् ' । उपसंहार सदा उपक्रमका अनुवाद किया करता है ' येन उप-क्रम्यते येन च उपसंहियते स वाक्यार्थः ' । न्यायशास्त्रमें उपसंहारका नाम निगमन ' ' तथा उपक्रमका नाम ' प्रतिज्ञा ' हुआ करता है । ' प्रतिज्ञा'का लक्षण ' न्यायदर्शन ' में ' साध्यनिर्देशः प्रतिज्ञा ' ( १ | १ | १३ ) कहा है, और ' निगमन ' का लक्षण है ' त्वप-देशात् प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं निगमनम् ' ( १ | १ | ३ ९ ) । फलतः उपक्रम-का पुनः अनुवाद करना ही उपसंहारका लक्ष्य हुआ करता है । इससे प्रयोक्ताका तात्पर्य निकल आता है । तव ' ऊनषोडशवर्षायाम् ' यह उपक्रम ' तस्माद् अत्यन्त-CC - 0. Ankur Joshi Collection सुश्रुत में कन्या- गर्भाधानावस्था [ १५५ बालायां गर्भाधानं न कारयेत् ' इस उपसंहारसे भी विरुद्ध पड़ता है क्योंकि - ऊनषोडशवर्षा, ( १२, १३, १४, १५ वर्षकी ) स्त्री वाला , भी ली जाय, पर अत्यन्तबाला नहीं होती । इसलिए ' चरक मान च वर्जयेत् ' ( शारीरस्थान ८ | { ) संहिता’में – ‘ प्रतिबालामतिवृद्धां ' मैथुनादतिवालायाः पृष्ठकट्य रुवङ्क्षणम् । रुजयन् दूषयेद् योनिं वायुः प्राक्चररणा हि सा, ( च. सं चिकित्सितस्थान व ३०।२० ) इस प्रकार ‘ अतिवाला ' को तो मैथुन में वर्जित माना गया १ है, ' बाला'को नहीं । वारह वर्षके बाद ऋतु हो जाने पर कन्या ‘ अत्यन्तबाला ' नहीं रहती । तब ' ऊनषोडशवर्षा ' यह उपक्रमका दु पद ‘ तस्माद् अत्यन्तवालायाम् ' इस उपसंहारके पदसे भी विरुद्ध पड़ता है । ' ऊनद्वादशवर्षायाम् ' ऐसा उपक्रमका पाठ होनेपर से ' तस्माद् अत्यन्तबालायां गर्भाधानं न कारयेत् ' इस उपसंहारके वाक्यदे भी सङ्गति लग जाती है, ' येन उपक्रम्यते येन च उपसंहियते स संस वाक्यार्थः ' यह न्याय भी चरितार्थ हो जाता है, क्योंकि गर्भाधान- गभ में बारह वर्षसे कम की ही स्त्री प्रत्यन्तवाला कही जा सकती है, आ बर्षसे कम की अत्यन्तवाला नहीं कही जा सकती । स. प्र. के ४ र्थ समु गभ ' गभ ४६ पृष्ठकी टिप्पणी में उक्त पद्यके अर्थके अवसर पर लिखा गया स्त्रिय है - ' प्रतिबाल्यावस्थावाली स्त्री में गर्भस्थापन न करे ' इससे गर्भ क धान में अतिबाल्य ही निषिद्ध है, बाल्य नहीं । अतिवाल्यो यजुव कन्याविवाह वा गर्भाधान किसीका पक्ष नहीं । बारह वर्षक प्रजां अवस्था अतिवाल्य नहीं । व्यर्थ ( ६ ) कौटलीय ' अर्थशास्त्र ' में कहा है- ' विवाहपूर्वो व्यवहार Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 95

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१५६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) १५५ पड़ता ( धर्मस्थीय तृतीय अधिकरण २ ( १ ) अर्थात् व्यवहार विवाहसे वाला शुरू होता है । वहीं कहा है कि बारह वर्षकी स्त्री योग्य होती है, और सोलह वर्षका पुरुष- ' द्वादशवर्षा व्यवहार-चरक- स्त्री प्राप्त-व्यवहारा भवति, षोडशवर्षश्च पुमान् ' ( ३ | ३ | १ ) इससे कौटल् ८ ( ६ ) भी बारह वर्षकी कन्याकी पद् व्यवहारयोग्यता बताकर बारहवें स्थान वर्षमें उसका विवाह सिद्ध कर दिया है । इसी से ' शुक्रनीति ' में गया १२ वें वर्ष के बाद लड़की को गाली आदि देना निषिद्ध कर दिया कन्या है - ‘ षोडशाब्दात् परं पुत्रं द्वादशाब्दात् परं स्त्रियम् । न ताडयेद् दुष्टवाक्यैः ' ( ३।१६ ) कमका विरुद्ध इस प्रकार बारह वर्ष पूर्वकी ही लड़की के अत्यन्तबाला रो होनेसे उसमें गर्भाधानका निषेध है, उसमें भी विवाहमात्रका वाक्य निषेध नहीं है, क्योंकि विवाह और गर्भाधान संस्कार भिन्न - भिन्न यस संस्कार हैं, और भिन्नकालीन हैं । विवाहकालमें ही शास्त्र धान गर्भाधान नहीं कहता, किन्तु ऋतुकालमें ही । इस कारण है, आयुर्वेद कहता है- ' आर्तव सावदिवसाद् ऋतुः षोडशरात्रयः । समु गर्भग्रहणयोग्यस्तु स एव समयः स्मृतः ' ( ' भावप्रकाश पूर्वखण्ड ' चा गया ' गर्भप्रकरण २ श्लो. ' ) ' बृहत्पराशर स्मृति ' में भी कहा है, ' ऋतावृतौ गर्भा स्त्रियं गच्छेत् स्वेच्छया वा वरं स्मरन् ' ( ४३६ ) ' वसिष्ठधर्मसूत्र'-वाल्य कहा है, ' ता अब्रुवन् ऋतौ प्रजां विन्दाम है ' ( ५८ ) कृष्ण-वर्ष यजुर्वेद ( तै. सं. ) ( २।५।१५ ) में भी यही कहा है प्रजां विन्दामहै ' ) यहाँपर यह ( ऋत्वियात् व्यर्थ करने नहीं कहा गया है, कि इतने ऋतु चाहियें | यवहार CC - 0. Ankur Joshi Collection सुश्रुत में कन्या - गर्भाधानावस्था [ १५७ इस कारण बाह्य एवम् श्राभ्यन्तरिक साक्षीसे ' ऊनद्वादश-वर्षायामप्राप्तः पञ्चविंशतिम् । यद्याधत्ते पुमान् गर्भं कुक्षिस्थः स विपद्यते ' यही सुश्रुतसम्मत तथा संगत पाठ है । इससे १२ वर्षमें कन्याविवाहप्रतिपादक सु. शा. १०१५३ के वचनकी संगति भी लग जाती है, और १२ वर्षके बाद गर्भकाल रजः काल प्रतिपादक सूत्रस्थान ( १६ । ६ ) के वचनसे भी एकवाक्यता हो जाती है । ( ६ ) ऊनषोडशवर्षायां ' इस पाठके सुश्रुतसे विरुद्धतामें छठा कारण है - प्रत्यक्षका व्याकोप । क्योंकि ऊनषोडश वर्षकी स्त्रियों-का गर्भे कुक्षिमें विपद्यमान नहीं देखा जाता । उसकी सम्भावना तो बारह वर्षसे लड़कीके कम होनेमें गर्म करने पर ही रहती है । सोलह वर्षसे कम की स्त्रियोंके उत्पन्न वालक पिताके २०-२५ वर्षके निकटके होनेपर चिरायु देखे गये हैं, दुर्बलेन्द्रिय भी नहीं देखे गये । बल्कि सोलह वर्षके अभिमन्यु द्वारा ( महा. आदि. ६७ | ११७-११८ ) १२ वर्षको उत्तरामें जो कि गुड़ियाएँ खेला करती थी ( महा. विराट ३७/२६ ); निषिक्त परीक्षित् अल्पायु भी नहीं था, निर्वंश भी नहीं था, दुर्बलेन्द्रिय भी नहीं था । १५ वर्षकी, १४ वर्षकी लड़कियोंके तो जीवित, स्वस्थ और दृढ बालक देखे भी गये हैं, देखे जाते भी हैं । १३ वर्षकी लड़कियोंमें पैदा हुए लड़के भी बहुत हैं । १२ वर्षकी विवा-हिताओंके ऋतुमती हो जानेपर गर्भमें आये हुए और उत्पन्न हुए लड़के भी दृष्टिगोचर होते हैं । ( क ) ' देशदर्शन ' ( हिन्दी ग्रन्थरत्नाकर कार्यालय बम्बईसे Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 96

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१५८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) प्रकाशित श्री शिवनन्दनसिंह प्रणीत ) १३२ पृष्ठमें लिखा है-' डाक्टर ग्रीन कहते हैं कि ' ढाकेमें मैंने एक लड़की को १२ वर्षकी आयु में गर्भवती पाया ' । डा ० कन्हैयालाल कहते हैं कि - बंगाल में आमतौर पर १२ वर्षकी लड़कियाँ गर्भवती पाई जाती हैं, ( मेडिकल ज्युरिसप्रुडेन्स फार इण्डिया आर. चीवर्स पृ. ६७३ ) ( ख ) अमेरिकाकी कैलीफोर्नियास्थित सुप्रसिद्ध महिला-लेखिका ' मिसेज जोजेफ रेबेलो'ने एक वक्तव्य प्रकाशित किया है । उसका अनुवाद यह है- यदि १२ वा १३ वर्षकी लड़की विवाह चाहती है, तो उसमें रुकावट क्यों की जाय? मेरा विवाह भी इसी अवस्था में हुआ था, इससे मुझे पश्चात्ताप नहीं हुआ । आज मेरे विवाहको ३५ वर्ष होगये हैं । मैंने २१ बच्चोंका मातृत्व प्राप्त किया है, जिनमें १६ बच्चे अभी भी जीते हैं । सभी स्वस्थ हैं । उनमें १० बालिकायें हैं । उन्होंने भी मेरा अनुकरण किया है, एक ने १२ वर्षमें विवाह किया, दूसरीने १३ वर्षमें 1 । दोनों ही २-२ बालक पैदा कर चुकी हैं ' । इस वक्तव्यके अंग्रेजी शब्द ' अनुभूत - योगमाला ' के १७/३ अङ्क ३८७ पृष्ठमें देखे जा सकते हैं । ( ग ) लाहौरके ' शक्ति ' नामक दैनिक पत्र ( १७१६।३७ ) ( सम्पादिका श्रीशंनोदेवी ) में कुमारी कौशल्या देवी कपूरने लिखा था " हरी टहनीको जिधर चाहें घुमा लें, परन्तु पकी टहनी ऐसा करने पर टूट जाती है, पर झुकती नहीं । यही हाल इस समय लड़कियोंका है । वालविवाहसे तो उनके स्वभाव परि-CC - 0. Ankur Joshi Collection सुश्रुत कन्या - गर्भाधानावस्था [ १५६ स्थितियोंके अनुकूल ही बन जाते थे, लेकिन अव परिपक्वावस्था-में पहुँचनेपर निजी स्वभाव वा आदतोंके वन जानेपर उनके | स्वभावको परिस्थितियोंके अनुसार बदलना कठिन हो जाता है, और वैसे व्याह असफल सिद्ध होते हैं " । ( घ ) ' गुनाहोंका देवता ' ( उपन्यास ) ( डा ० धर्मवीर भारती ) ( पू. ८६ ) में ईसाई लड़की पम्मी से उसका अनुभव कहलवाया गया है-“ १४ वरससे ३४ बरस तक लड़कियोंको बहुत शासन रखना चाहिये । इसलिए कि इस उम्र में लड़कियाँ बहुत नादान होती हैं । जो कोई भी चार मीठी बातें करता है; तो लड़कियाँ समझती हैं कि- इससे ज्यादा प्यार उन्हें कोई नहीं करता । और उस उम्रमें जो कोई भी ऐरागैरा उनके संसर्ग में आ जाता है, उसे ' प्यारका देवता ' समझने लगती हैं । नतीजा यह होता है । कि वे ऐसे जालमें फँस जाती हैं कि जिन्दगीभर उससे छुटकारा नहीं मिलता । मेरा तो यह विचार है कि या तो लड़कियाँ ३४ बरसके बाद शादियाँ करें, जब वे अच्छा - बुरा समझने के लायक हो जाएँ । और नहीं तो मुझे तो हिन्दुओंोंका कायदा सबसे ज्यादा पसन्द लगता है कि - १४ वरसके पहले ही लड़की की शादी कर दी जाय और उसके बाद उसका संसर्ग उसी आदमीसे रहे, जिससे उन्हें जिन्दगी-भर निवाह करना है; अपने विकासक्रम में दोनों ही एक - दूसरे-को समझते चलें, लेकिन यह तो सबसे भद्दा तरीका है कि -१४ और ३४ वरसके बीच में लड़की की शादी हो, या उसे श्राजादी Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 97

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) १६० ] दी जावे " | ( ङ ) देशनेता ला ० लाजपतिरायने भी ' दुखी भारत ' पुस्तकके २०६-२०७ पृष्ठमें लिखा है — ‘ प्राचीनकाल में जिन जातियोंने बड़ी-बड़ी सभ्यताओंको जन्म दिया, उनमें से बहुतों में वालविवाहको प्रथा प्रचलित थी । यूनानके लोग जो पूर्ण मनुष्यके सुन्दर विकास और उसकी सर्वाङ्ग उन्नतिके यादशैसे आज भी हमें उत्साहित करते हैं, अत्यन्त बाल्यावस्था में ही विवाह किया करते थे । रोमन लोग भी जिन्होंने उत्तम सैनिकों और शासकों की सृष्टिकी थी, बालकालमें ही विवाह करते थे- इत्यादि ( च ) लण्डन के प्रोवेशन अध्यक्षका निम्न वक्तव्य भी पन्नोंमें प्रकाशित हो चुका है कि- ' यदि सत्य अवस्था पुरुषोंके आगे प्रकट हो, तो पता लगेगा कि यहाँ कोई वर्ष भी खाली नहीं जाता, जिसमें १३ वर्षकी कुमारियां - सम्भवतः उनकी संख्या कई सैकड़े होगी - बच्चोंको न पैदा करती हों । मैं दावा करके कहता हूँ कि - १२ वर्षकी लड़कियां भी प्रति वर्ष वच्चोंको पैदा करती हैं । १३-१४ वर्षकी कुमारियोंको तो मैं बहुत संख्या में जानता हूँ, जो उस अवस्था में माताएँ हो चुकी हैं । जब इस प्रकार १२-१३ वर्षकी अवस्थामें प्रसव प्रत्यक्ष है, तव ' ऊनषोडशवर्षायां ' यह पाठ प्रत्यक्षसे भी विरुद्ध है, वहां ‘ ऊनद्वादशवर्षायां ' यही पाठ प्रत्यक्षके भी अनुकूल पड़ता है । और फिर ‘ ऊनद्वादशवर्षायाम् ' से ' बारह वर्षकी कन्या में गर्भाधान अवश्य करे ' – यह आज्ञा भी नहीं दी जा रही, प्रत्युत १२ वें वर्षसे CC - 0. Ankur Joshi Collection सुश्रुत में कन्या- गर्भाधानावस्था [ १६१ पूर्व गर्भाधान कन्याका निषिद्ध किया जा रहा है । उससे ऊपर की कन्याको जब गर्भाधानकी योग्यता हो जाय, तभी उस लड़की की इच्छामें गर्भाधान की विधि उचित है । ऋतु हो जानेपर क्रम - क्रमसे ऋतुकालमें ( जब तब नहीं ) मैथुन होनेपर कोई हानि भी नहीं होती । आजकलके पशु - सदृश दैनन्दिन मैथुनमें तो सोलह क्या, फिर २४ वर्षके विवाह वा गर्भाधानमें भी हानि सम्भव हो सकती है । ( च ) १२ वर्षकी कन्यासे विवाह करने पर जब तक उसमें गर्भाधानकी योग्यता नहीं होती, तव तक संयम भी अवश्य-कर्तव्य है । विवाहका धार्मिक प्रयोजन होता है - अग्निहोत्र-ग्रहण । जैसे कि कहा है - आवसथ्याधानं ' दारकाले ' ( पारस्कर गृहसूत्र १-२-१ ) विवाह प्रेमका पवित्र आदर्श हुआ करता है । वह प्रेम शीघ्र ग्राम्यधर्मकी अपेक्षा नहीं करता । ग्राम्यधर्म ( मैथुन ) तो स्वार्थमात्र होता है । अन्यथा यदि विवाहित होकर आई हुई ट मैथुन कर लेना वा उसमें गर्भका अहित करना ही प्रेम माना जायगा, तो बड़ा अनर्थ हो जावेगा । यदि आरम्भसे ही ' संयम ' का अभ्यास न होगा तो ' महिषी प्रस-वोन्मुखी, महिषो मदनातुरः ' यह न्याय ही चरितार्थ हो जायगा । तब तो वैसे व्यक्ति चाहेंगे कि इसे गर्भ ही न हो । क्योंकि गर्भके श्रहित होनेपर भी मैथुनका निषेध होता है । फिर तो असंयमी वे उसके रजस्वलात्व के चार दिन भी कैसे छोड़ सकेंगे? यदि आरम्भसे ही उन्हें ' सयम'का अभ्यास Gujarat. ArGago Initiative

पृष्ठ 98

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] श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) १६२ होगा, तो आगे भी वे संयम कर सकेंगे । पहले पतिको प्रेममय व्यवहार तथा प्रेमालापों से ( छ ) वस्तुतः दोनोंकी आपस में पत्नीको अपना बनाना पड़ता है । जब पैदा हो जावे, जो कि छोटी आयु, निर्मल हृदयता में ममता सम्भव है; एक - दूसरेके हृदयमें विरहमें उत्कट उत्कण्ठा उत्पन्न हो जावे, और जब पत्नीको गर्भाधानकी योग्यता हो जावे; तभी उसमें नियमतः गर्भ हित करना चाहिये । नहीं तो आई हुई ही उससे झट ग्राम्यधर्म आरम्भ होनेपर पत्नी पतिको स्वार्थी समझ लेती है । इस पर कामशास्त्र पठितव्य हैं । वस्तुतः यह है भी स्वार्थ ही । जब तक उसकी पूर्ण अभिन्नता तथा गर्भाधान योग्यता न हो, क्योंकि प्रारम्भमें उसे पीड़ा भी होती हैं, तब तक यदि पति संयम नहीं कर सकता, तो जब वह ' पत्नी ' अस्वस्थ हो, या उसके विशिष्ट अङ्गमें पीड़ा हो, तब पुरुष संयम कैसे कर सकेगा? तब क्या दोनोंमें विवाद न होंगे । यदि पुरुष उसके विवाह हो जानेपर, आरम्भमें उसकी विद्यमानता में भी संयमका अभ्यास कर सकेगा, तब आगे भी उसके रोग - विशेषमें तथा गर्भिणीत्वकी दशामें, रजस्वलावस्थामें, प्रसवावस्थामें, पितृगृह - गमनावस्थामें, किसी सम्बन्धी के निवासके अन्तरायमें संयम वा धैर्य कर सकेगा । नहीं तो फिर चतुर्थी - कर्म तक भी संयम न कर सकेगा । फिर गृहस्थाश्रममें अशान्ति सुलभ हो जायगी । तब पतिसे ही वलात् उत्तेजित की हुई स्त्री इतनी उत्तेजित हो उठती है कि फिर एक पुरुष तो क्या, CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीसीतारागकी वैवाहिक अवस्था कई पुरुष भी उसे तृप्त नहीं कर सकते 1 । ' आहारो मैथुनं निद्रा सेवनात्त विवर्धते ' जब वही पुरुष उसकी इष्टपूर्ति से क्षमतावान् नहीं होता, या पति ही बाहर होता है तो फिर स्त्री अन्य अटन करती है । यही प्रायः कलहका या स्त्रियोंके भाग जाने निदान बनता है | इस प्रकारके स्वार्थ उत्पन्न हो जाने पर जब स्त्री शीतल आदि कारण कुरूप हो जाती है; या ऐसा कोई अन्य कार आ पड़ता है; तब उसी स्वार्थी, कामी पुरुषकी उसमें अत्यन घृणा हो उठती है, क्योंकि - ' पतनान्ताः समुच्छ्रयाः ' ( वाल्मीकि । २ १०५।१६ ) अत्यन्त उच्चताका परिणाम अवनति ही हुथा करता है । तव वह स्वार्थमय बालूकी दीवार थोड़ा ही प्रहार पाकर गिर पड़ा करती है । उसमें यही कारण है कि - यह दाम्पत्य की दीवार नींवसे प्रेममूलक ममतासे पारस्परि सहानुभूतिसे दृढ़ नहीं की जाती; किन्तु ग्राम्यधर्ममूलक बा रूपमात्रमूलक ममतासे नाममात्र धारण की जाती है । तब उस कच्ची दीवालके गिरनेसे उसके दुष्परिणाम भी अवश्य होते हैं । ( ज ) फलतः प्रत्यक्षानुकूलता होने से ' प्रत्यक्षे किं प्रमाणान्तरेण ' । सुश्रुतको भी ' ऊनद्वादशवर्षायां ' यही पाठ इष्ट है । जो लोग २४-२५ वर्ष तक लड़कीको कुमारी रखते हैं, वे आयुर्वेद - शास्त्रके प्रतिकूल करते हैं । ' भावप्रकाश ' पूर्वखण्ड ऋतु प्रकरण २७६-२८० पद्यमें लिखा है - ' नित्यं बाला सेव्यमाना नित्यं वर्धयते । Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) १६४ ] ह्रासयेत् शक्ति प्रौढोद्भावयते जराम् ' यहाँपर बलम् के | तरुणी सेवनसे शक्तिह्रास कहा गया है । ' बाला- स्त्री क्षीर-तरुणी । घृतमुष्णोदकं स्नानं सद्यः प्राणकराणि षट् ' । ' रति-भोजनम् मञ्जरी ' में भी लिखा है - ' बाला स्त्री प्राणदा प्रोक्ता तरुणी प्राण-' । इन प्रमाणों में सर्वत्र वाला सेवनको बलवर्धक तथा हारिणी तरुणी - सेवनको बलनाशक कहा गया है । उसका आशय वही है, जो पूर्व कहा जा चुका है । उसका उपयोग शनैः - शनैः करना पड़ता है, कुछ संयम करना पड़ता है | तरुणी के ग्रहणसे उसमें ऊष्मा अधिक होनेसे, उसमें धैर्य न होनेसे वह पुरुषका बल-ग्रहण अधिक करती है, और हानिको पहुँचाती है । जैसे कि-' सुश्रुत संहिता ' में कहा है – ' अतिब्रह्मचारिणीं चिरोत्सृष्टां नारी-मत्यर्थमुपसेवमानस्य मेढ्रमागम्य प्रकुपिता दोषाः श्वयथुमुपजन-यन्ति, तमुपदंशमाचक्षते ' ( निदानस्थान १२/७ ) तब कामी पुरुष उसका दास हो जाता है । ( झ ) ऋतुकालके अनन्तर स्त्रियोंमें वेग हुआ करते हैं, उस समय यदि वह विवाहिता न होगी, तो उसे उन वेगोंको रोकना पड़ेगा, तब हानि होती है । जैसे कि - चरक संहिताके निदान-स्थानमें कहा है – ' वेगान् उदीर्णान् उपरुन्धत्याः... क्षिप्र ं वातः प्रकोपमापद्यते ' ( ३ | १६ ) ( उद्गत हुए वेगोंको रोकनेपर लड़की में वायुका प्रकोप हो जाता है ) 1 । इसी प्रकार उसीके चिकित्सित-स्थानमें भी कहा है – ' ऋतौ अनाहारतया भयेन, विरूक्षणै-वॅगविनिग्रहैश्च । संस्तम्भनोल्लेखनयोनिदोषैर्गुल्मः खियं रक्तभवो CC - 0. Ankur Joshi Collection सुश्रुत कन्या गर्भाधानावस्था [ १६५ ऽभ्युपैति ' ( ५/१६ ) । इस प्रकार चिरकौमारधारण करनेवाली लड़कियोंके प्रदर, योनिकाठिन्य, सिफलिस, तसन्नुज, इत्यादि नामोंसे प्रसिद्ध दोष हुआ करते हैं । ये रोग ऋतु - विकारसे होते हैं । ऋतु - शुद्धि पुरुष - संयोगके बिना नहीं होती । कन्या के विवाहमें देरी होनेपर ऋतु - शुद्धि कैसे हो? ( ञ ) ऋतुमती हो गई हुई स्त्री नर - कामा हो जाया करती है, उसको स्वप्न भी इसी प्रकारके याते हैं, तव विवाहिता न होनेसे पति - निकटता न होनेके कारण हानि हुआ करती है । जैसे कि ' सुश्रुत संहिता ' में कहा है— ' ऋतुस्नाता तु या नारी स्वप्ने मैथुनमाचरेत् । आर्तवं वायुरादाय कुक्षौ गर्भं करोति हि । मासि मासि विवर्धेत गर्भिण्या गर्भलक्षणम् । कललं जायते तस्या वर्जितं पैतृकैर्गुणैः ( अस्थ्यादिभिः ) । सर्प - वृश्चिक- कूष्माण्डविकृताकृतयश्च ये । गर्भा-स्त्वेते स्त्रियाश्चैव ज्ञेयाः पापकृता भृशम् ' ( शारीर - स्थान ४३।४६ ) । यही बात ' भावप्रकाश ' गर्भप्रकरण ६३ पद्य में भी कहीं गई है । ( अर्थात् ऋतुस्नाग जव सपने में भी मैथुन सोचती है; तब उसका ऋतु गर्भाशय में जा पड़े; तो उसे गर्भ हो जाता है; और उसमें उससे हड्डी के बिना लोथड़े पैदा हो जाया करते हैं, क्या इससे कुमारियोंकी हानि नहीं? " ( ट ) इसी प्रकार ऋतुमतीत्वमें मैथुनेच्छाके स्वाभाविक होनेसे, जैसे कि - ' जायेव पत्ये उशती सुवासा ' ( ऋ. १०/७१ | ४ ) ( वेदके इस मन्त्रमें ऋतुकालमें स्त्रीकी पतिकी कामना कही गई । Gujarat. An eGangotri Initiative

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१६६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) है । ) अविवाहितात्वमें पति न होनेसे ' यदि पुंसां गतिर्ब्रह्मन्! कथञ्चिन्नोपपद्यते । अप्यन्योन्यं प्रवर्त्तन्ते नहि तिष्ठन्ति भर्तृषु ' ( महाभारत अनुशासन पर्व ३८/२२ ) देखिये इसकी नीलकण्ठी टीका - ' कृत्रिमं लिङ्गं निर्मायेति शेषः ' । ' जारं न कन्या ' ( ऋ.सं. ६ । ५६ । ३ ) इत्यादि वेदशास्त्रानुसार दशा उपस्थित हो जाया करती है । इसका अर्थ लिखना उचित नहीं । अधिक वयस्क कन्याओंके अपहरण वा स्वयं भाग जाने की घटनाएं एतदादि - मूलक ही हुआ करती हैं । ला ० लाजपतिराय - प्रणीत ' दुखी - भारत ' के २३३ से २३५ पृष्ठ तक अविवाहित १४-१५ वर्षकी आयुकी लड़कियोंके दुश्चरित दिखलाये गये हैं । ( ठ ) तव अधिक वयस्क कन्याओं के विवाहमें कितनी हानि सिद्ध हुई । ' सुश्रुत ' में भी ' महाभारत ' के ऊपर कहे पद्यके अर्थको संकेतित किया गया है- ' यदा नार्यौ उपेयातां वृषस्यन्त्यौ कथञ्चन । मुञ्चन्त्यौ शुक्रमन्योन्यमनस्थिस्तत्र जायते ' ( शारीर स्थान २ । ४३ ) एतदादिक कारणोंसे सुश्रुत संहिता के गर्भाधाना-भिधायक पद्यमें भी ' ऊनद्वादशवर्षायां ' पाठ सुश्रुताभिमत है । विवाहाभिघायक सूत्रमें तो ' द्वादशवर्षा पत्नीमावहेत् ' ( शारीर-स्थान १० | ५३ ) यह पाठ तो प्रत्यक्ष है ही, और सुश्रुतको अभिमत है ही । ( ड ) जैसे कुनाइन आदि दवाइवाँ विदेशों की हैं, विदेशी ही प्रकृतिके अनुकूल हैं, हमारे देशमें परिणति हानिप्रद हैं, CC - 0. Ankur Joshi Collection सुश्रुत में कन्या - गर्भाधानावस्था [ ११७ १६८ उनका सेवन ठीक नहीं, वैसे ही लड़की को बहुत वर्षों अविवाहित रखना शीतदेशताके कारण विदेशों में भले ही तक पुरुष अनुकूल स्त्रीव हो, पर इस देशकी प्रकृतिके अनुकूल नहीं । तब क्या हम विदेशोंके नक्काल बनकर अपनी आयुर्वेद की संहिताओं में भी द्वाद तदनुकूल परिवर्तन करते फिरें? जब विदेशी चले गये हैं, सुश्रुत उनकी प्रकृतिको भी हमें पार्सल करके वहीं भेज देना चाहिये । ढूँढ़ ( ७ ) ' सुश्रुत - संहिता ' में लिखा है – षोडशसप्तत्योरनारे स्वभा मध्यसं वयः । तस्य विकल्पो वृद्धियौवनं सम्पूर्णता हानिरिति ' दूरद ( सूत्रस्थान ३५ | २६ ) यहां पर १६ से ७० वर्षके अन्दर अन्दर जैसे ' मध्यम अवस्था मानी गई है । इसी मध्यम अवस्थाके वृद्धि, वृत्ति यौवन, सम्पूर्णता, हानि ये अवान्तरभेद कहे गये हैं । उसमें प्रकृत १६ वर्षसे लेकर २० तक वृद्धि ( या विंशतेर्वृद्धिः ) २१ से ३० तक रहा यौवन ( त्रिशतो यौवनम् ) ( पाठान्तरमें- आ ' पोडशाद् वृद्धिः कटाच आपञ्चविंशतेर्यौवनम् ' जन्म से १६ वर्ष तक वृद्धि अवस्था और मनक २५ तक यौवन होता है ) । ३१ से ४० वर्ष तक सम्पूर्ण आदि ( आ चत्वारिंशतः सर्वधात्विन्द्रियवल - सम्पूर्णता ) ४१ से ७० काम तक हानि ( अत ऊर्ध्वम् ईषत् परिहारिणर्यावत् - सप्ततिरिति ) जाने अवस्था मानी गई है | यहाँ पुरुषका यौवन २१ से ३० तक माना प्रकृति गया है । पाठान्तरमें १६ से २५ तक पुरुषका यौवन माना है । पिता २५ वर्षीय पुरुष और १६ वर्षीय स्त्रीकी सूत्र स्थानीय ३५ १३ आयु बचनसे समवीर्यता बताई गई है । २५ वर्ष पुरुषकी यौवनकी है । मध्यमावस्था है; तब स्त्रीकी १६ वर्ष यौवनकी मध्यमावस्था हुई, शरम Gujarat. An eGangotri Initiative