सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 161–170
सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 161–170
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श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) २६. २८८ ] लगे अब तो ' सर्वनाशे समुत्पन्ने ह्यर्धं त्यजति पण्डितः । अर्धेन पने - हा! कार्य सर्वनाशो हि दुस्सह: ' इस नीतिका आचरण करू । लड़के. कुरुते दिक यह कहकर यह सुधारकजी मुझे कहने लगे कि- पं. जी! हिक विवाद यदि अब हम स.ध.की शैली से कन्या विवाह करें; तो मुझे क्या करना होगा । मैंने कहा कि - तब आपको कन्याके रजस्वला हो जानेका प्रायश्चित्त करना पड़ेगा । वह प्रायश्चित्त सुनिये-हुआ था । शब्द ( १६ ) संस्कारदीपकमें संस्कारभास्करसे श्राश्वलायनका यह , पर वचन आया है --- ' पिता ऋतून स्वपुत्र्यास्तु गणयेद् श्रादितः दो पर सुधीः । दानावधि गृहे यत्नात् पालयेच्च रजोवतीम् । ' यह वही नेपर पूर्व श्लोक है, जिसको आ.स. के स्वा. विश्वेश्वरानन्द जीने अपनी -विवाह पुस्तक ' पुरुषार्थ - प्रकाश ' ( पृ. १४५ - १४६ ) में ' संस्कार - कौस्तुभ'के नियोगपर नामसे रजस्वला - विवाह की सिद्धिकेलिए दिया था । देखो इसपर सभ्यतावश पथिककी पुस्तक वॅ.सि.मा. ( पृ. ३४ ); पर आगेके जो पद्य थे, सकेगा । उनको अपनी साम्प्रदायिक परम्पराकी प्रकृतिके कारण उन उनस ' स्वामीने छिपा दिया । धर्म पूर्व ' तब कन्या के पिता ने कहा- यह स्वामी लोग भी क्या पूर्वा-भिप्राय है पर प्रकरण छिपा लिया करते थे? मैंने कहा कि हां, यह पूर्वो-त्तर प्रकरण छिपा लेंनेकी शैली सबसे पूर्व इस सम्प्रदाय के सच्चा-वाहतो. लक बड़े स्वा. जीने शुरू की थी; फिर उनके अनुयायिवगमें छोटे नये रंगरूटसे शुरू करके बड़े नेता तक सब इसी थैलेके चटूटे-वटटे हैं । इसीसे वे अब तक अपना निर्वाह करते चले आये हैं; त्या करूँ । और उनके सम्प्रदायकी वालूकी दीवार इसी पूर्वापर - प्रकरणके CC - 0. Ankur Joshi Collection एक वैदिक विवाहका रहस्य । [ २८६ छिपानेसे यथाकथञ्चित् गिरती पड़ती भी बनी रही; पर अव ' आलोक ' - ग्रन्थमालामें वह इन लोगोंसे छिपाया हुआ पूर्वापर-प्रकरण जनताके समक्ष रखना शुरू कर दिया गया है, इसीसे इन लोगोंका पराजय शुरू हो गया है; और आगे इस साम्प्रदा-यिक खोखली नींवके शीघ्र गिर जानेकी सम्भावना है । तब यह कन्या- पिता कहने लगे; यह तो बड़ी अच्छी बात है: ' आलोक ' - प्रन्थमालाके अष्टम पुष्पकी मेरी लड़कीने भी ( १४ वें सन्दर्भ में ) बड़ी प्रशंसा की है । इस लड़कीके पतिने भी ( १३ वें- सन्दर्भ में ) उक्त ग्रन्थमालाकी यथार्थता पर प्रकाश डाला है । मैंने भी सुन रखा है । मैं भी अव उक्त प्रन्थमाला मंगवाऊँगा; और उसे पढ़कर इन लोगोंके षड्यन्त्रका ज्ञान करके फिर उनका भाण्डा - फोड़ करूँगा । अस्तु । पं. जी, बताइये वे उक्त स्वामीसे छिपाये हुए श्लोक, और उनका वास्तविक अर्थ भी बताइये । मैंने कहा - सुनिये फिर सावधान होकर । पूर्वसे ध्यायेके पद्य यह हैं - ' दद्यात् तदृतुसंख्या गाः शक्तः कन्या- पिता यदि । दात-व्यैकापि च यत्नेन दाने तस्या यथाविधि । दद्याद् वा ब्राह्मणे-ध्वन्नम् अतिनिःस्वः सदक्षिणम् । तदतीर्तुसंख्येषु वराय प्रति-पादयेत् । उपोष्य त्रिदिनं कन्या रात्रौ पीत्वा गवां पयः । श्रदृष्ट-रजसे दद्यात् कन्यायै रत्न - भूषणम् । तामुद्वहन् वरश्चापि कूष्माण्डै-जुहुयाद् घृतम् ' ( संस्कार- दीपक पृ. ६३-६४ ) इनका पूर्वापर - प्रकरणसे भाव यह है कि - यदि आपत्ति आदि विशेष परिस्थितिवश गुणवान् वर न मिलनेकी दशा में विवाइसे स ० ध ० १६ Gujarat. An eGangotri Initiative
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२ ९ ० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( e ) पूर्व ही कन्याका रजोदर्शन हो जावे. फिर भी वर न मिल सके, तो पिता अपनी स्त्रीकी सहायतासे कन्याके उन ऋतुओंको पतिके न मिलने तक कन्यादान तक गिनता चला जावे, और उस कन्याका बड़े प्रयत्नसे संरक्षण करे, क्योंकि ऋतु होने पर लड़की की पुरुषप्राप्तिकी इच्छा प्रबल हो उठती है । जब उस लड़कीकेलिए वर मिल जावे; तब विवाह वाले दिन यदि पिता की शक्ति हो; तो जितने उस कन्याके ऋतु हो चुके, उतनी संख्या की गौओंका दान प्रायश्चित्तरूपमें करे । इतनी दानकी शक्ति न हो; तो प्रायश्चित्तस्वरूपमें एक ही गायका दान दे । अथवा बहुत निर्धन हो; तो ब्राह्मणको दक्षिणा सहित अन्नदान दे । कन्या भी तीन दिनके उपवासका प्रायश्चित्त करे । वर भी कूष्माण्ड घृत आदिका प्रायश्चित्तस्वरूप हवन करे । ऐसा करनेसे उस ऋतुमती कन्याके प्रदानका दोष हट जाता है । ऐसे अनुकल्प विशेष-परिस्थितिमें करने पड़ते हैं । यह सुनकर कन्याके पिता यह सुधारकजी प्रसन्न होकर कहने लगे कि मैं यह प्रायश्चित्त करनेकेलिए प्रस्तुत हूँ । आगे से मैं कभी भी सं.वि.से किसी लड़की - लड़केका विवाह नहीं कराऊँगा । वरके पिताने भी प्रतिज्ञा की । ( १७ ) यह पूरा ' होली के हुलास ' का विवरण सुनाकर होली में इकट्ठी जनताको पण्डितजी कहने लगे कि यह इनकी बात सुनकर भी मैंने इन्हें विवाह पढ़नेका निषेध कर दिया कि - अब मैं सनातनधर्मी विवाह नहीं पहूँगा; आप किसी अन्य सनातन-CC - 0. Ankur Joshi Collection एक वैदिक विवाहका रहस्य धर्मी पण्डितके पास जाइये । पर वह सुधारक जी बहुत नाराज हो गये और कहने I " हा " न मैं इधर का रहा, न में उधर का रहा । जब लो I धर्मकी रीति अनुसार शास्त्रीय प्रायश्चित्त करने को सता प्र तैयार तव आप यह विवाह - संस्कार क्यों नहीं करते? ' क वे कहने लगे कि सनातनी पण्डित हमें कट्टर दे ... सम्प्रदायका मानते हैं अतः वे हमारे पास यावेंगे नहीं भ अपने सम्प्रदाय के पण्डितोंको और उनकी विधिको श्रा । चाहता नहीं तो क्या मैं छाव सिक्खी विवाह करू म १ ९ सरकारी रजिस्टर में लिखा - पढ़ी वाला विवाह करके इसे और परलोकको बिगाडूं ”? प यह सुनकर वे पंजी होली में मस्त जनताको कहने से सु कि मैंने इन सुधारकजी की एक भी न सुनी; क्योंकि यह पह परि मेरी बहुत बेइज्जती कर चुके थे, मुझे पागल तक कह चुके जन मैंने कहा कि आप अपनी इच्छानुसार करें - यह कहकर मैं वही पह चला आया । सो आज यह सुधार केजी यहाँ मिल गये है । होली का रंग पड़ने से बिगड़े हुए हैं । मुझे देखकर उस दिन चदनाका स्मरण व्याजानेसे यह मुझसे यहाँ बिगड़ पट्टे गज और मुझसे झगड़ने लग गये हैं । यही है मेरी होली - हुलाक सप नित कथा, जिसे आप लोगोंने सुना है । जनताने सभी बातें बड़ी तन्मयतासे सुनीं, और प्रभाति । भी हुई और उन लोगोंने अनुभव किया कि इसमें असत्यतत्र Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) २६२ | भी नहीं है; और तब उन लोगोंने दोनों को समझाया । लेश कहने पण्डितजीको कहा कि जब यह सुधारक जी प्रायश्चित्तकेलिए स तैयार हैं, तब इनका आपत्तिकाल समझ कर आप अपनी सनात प्राचीन सनातनी - पद्धतिके अनुसार इनकी कन्याका उद्धार वैधार कर दो । जनताने सुधारक जीको भी समझाया कि अब इस नामको वेंगे भी छोड़ दो । पूर्ण सनातनधर्मी बन जाओ, आगेसे तदनुकूल श्राचरण करनेकी प्रतिज्ञा करो । ' स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयांत् ' ( गीता २।४० ) ( इस सनातनधर्मका श्रंशतः इस चरण भी बड़े भयों - सङ्कटोंसे बचानेवाला है । ) और इन पं.जीसे पूर्व किये हुए दुर्व्यवहारकी क्षमा मांगो - यह कहकर उस कले सुधारकसे पण्डितजी के चरणोंका स्पर्श करवाया । फिर यह पह पण्डितजी उन सुधारकजी से उस विषयकी बातें करने लगे । चुके जनताने उन पण्डितजीको सुगन्धित फूलोंकी एक बड़ी माला मैं बह पहराई । और पण्डितजी का बड़े जोर - शोर से गर्जकर जयजयकार किया । इससे मेरी नींद उचट गई, देखा कि प्रातःकाल होने वाला उस दिन है; और यह गर्जना उस जय - जयकारकी नहीं थी; यह बादल गर्ज रहे थे । मुझे अनुभव हुआ कि यह तो ' होली के हुलासका सपना ' था । ऐसे विचित्र स्वप्न के आने से विस्मित होकर मैंने नित्यकृत्य करने के लिए खाट छोड़ दी । प्रभावि सत्यताक CC - 0. Ankur Joshi Collection ( ६ ) बाल्यविवाह - विमर्शों 1 .. आजकल कितने ही लोग वात्यविवाह प्रथाकी निन्दा करते हैं । इसमें कुछ सन्देह नहीं कि वास्तविक विचार- पूर्वकता न होनेसे ही बाल्य- विवाह में बहुत दोष हो जाया करते हैं! दोष कहां नहीं होते; ' सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ' ( गीताः १८।४८ ) परन्तु बाल्यविवाह में दोषोंकी अपेक्षा गुण अधिक हैं । जो लोग बाल्यविवाह - प्रथामें केवल दोष देखते हैं; वे पार्श्वात्योंका ही अनुकरण करना चाहते हैं- इस कथनमें थोड़ा भी संकोच नहीं । हम यहाँ उन विचारोंका संग्रह करते हैं? ( स ) एक बार बहुत योग्य किसी अँग्रजकी एक भारतीयके साथ बातचीत हुई । विचार कर उसने कहा कि - वाल्यविवाहकी प्रथामै जातिगत शान्ति तथा व्यक्तिगत सुखकी अधिकता होती है; और यौवनके विवाह में जातिगत उद्यम तथा व्यक्तिगत ओजस्विता की अधिकताका अनुभव होता है । फिर उसने कहा • कि दोनों प्रथाओं में सामंजस्य करनेका कोई मार्ग नहीं दीखता । भारतीयने उत्तर दिया कि हमारे प्राचीन व्यवस्थापकोंने इसी सामंजस्य - विधानके उद्द ेश्यसे ही स्त्रियोंकी श्रायुमें न्यूनता और पुरुषोंकी श्रायुमें अधिकता रखकर विवाहप्रथाके नियमको सुव्यवस्थित कर दिया । जने कहा कि यह भी ठीक नहीं । माताके अपक्च शरीरसे उत्पन्न सन्तान निर्बल पैदा होती है । भारतीयने कहा-2 प लोगोंकी भाषामें पशु - पालन सम्बन्धी जितनी पुस्तकें हैं, Gujarat. An eGangotri Initiative
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२६४ ] श्रीसनातन धर्मलोक ( Ef उनमें किसी माननीय प्रन्थमें ऐसी बात नहीं देखी गई । पिता के शरीरके बलवान होनेसे ही सन्तानकी सर्वाङ्गपूर्णता तथा बलवत्ता हो सकती है । स्त्रीकी निर्बलतामें सन्तानकी निर्बलताका नियम नहीं । यही मत मनुष्य - जननमें भी देखा गया है । अँजने कुछ विचारकर माना किं - ठीक है । पुरुषोंकी अपेक्षा स्त्रियोंका बुद्धि आदिका परिपाक छोटी आयु में ही हो ' जाता है । सो अल्पवयस्क स्त्रीके साथ अधिक वयस्क पुरुषका विवाह उचित है । इससे सब ठीक हो जाता है । उससे प्रेम, शान्ति तथा सुखकी अधिकता हो जाती है । उद्यम और ओजस्विताकी उत्पत्तिका भी अवसर मिलता है । सन्वान भी दुर्बल नहीं होती • साधारण विचारसे भी अधिक वयस्क कन्याका विवाह युक्त प्रतीत नहीं होता । १७-२४ वर्षकी जो युवति वैसे ही पतिको पाकर अपने माता - पिता, भाई - बहन आदि वचपन के सारे साथियोंको छोड़ सकतीं है; वह कैसी ' लज्जाभय - विभूषणा ' है, इसका अनुभव भी नहीं किया जा सकता । वाल्यावस्था से ही माता - पिता जिन्हें दम्पती बनाकर मिला देते हैं, वे दोनों एक होकर धीरे - धीरे नवीन लत्तात्रोंकी तरह एक - दूसरेको आश्रितः करके एक हो जाते हैं । उनकी जितने चिरस्थायी प्रेमकी उत्पत्तिको सम्भावना होती है, अधिक वयस्क विवाह में वैसा प्रेम भला स्थायी कैसे हो सकता है? छोटी आयु में विवाहित हुई स्त्री. ही ' लज्जा भय विभूषण ' हो सकती हैं, २०-२४ वर्ष में बाल्यविवाह - विमर्श । [ २५ २६ विवाहिता तो निर्लज्जा और निडर हुआ करती है । ( २ ) उस समय मन परिपक्क हो जाता है, अभ्यास स्थिर लोग जाता है, और चरित्र अपना एक ढंग पकड़ लेते हैं । फिर हो । कर जोड़ी भी नहीं हो सकती । नई शाखाको वह हैं । एकरूप रास्ते मोड़ना चाहें, पर टूट जाती है; कन्याओं का स्वभाव परन्तु परिपक्वावस्था हम जि मोड़ सकते हैं; परन्तु प्रौढ - शाखा ऐसा करते परि झुकती वा मुड़तो नहीं । वाल्यविवाहों पतिकी परिस्थितिके अनुकूल हो जाता है युव प्राप्त होने पर उनके अपने - अपने स्वभार हैं, परी नियत होकर फिर परिवर्तित नहीं हो सकते । तब वैसे विद्या बहुद असफल हो जाते हैं; और कलहका साम्राज्य शुरू हो जाता है । स्त्रीक फलतः दम्पतिका पारस्परिक अधिक प्रेम पैदा करना तथा यदि विवाहका मुख्य उद्द ेश्य माना जाता है; तब १७-२४ वर्ष दोनो युवतिकी अपेक्षा १२ वर्षवाली लड़कीका विवाह ही ठीक रह है । बाल्यावस्थाका प्रेम ही सात्त्विक प्रेम हुआ करता है । कम माता - पिता, भाई - बहिनोंसे वा मित्रोंके साथ चित्तका जैस एवं ह प्रेम बचपन में होता है; अधिक वयमें परिचित हुन्छसे उल्ल मनर प्रेम नहीं हुआ करता है; वहां तो स्वार्थपरता ही हुआ करती है । की प चाल्यकालीन किसी मित्रके दोषोंके देखने की इच्छा भी प्रा. वयस्व नहीं हुआ करती । वह जो करता है, वही ठीक लगता है । समर्थ वह जो कहता है, वही मधुर मालूम होता है । उनमें किसीके भी देखने वा स्मरण करनेमें वा उसका नाम सुनने में भी स आयु तत्काल ही सरलताको तथा स्निग्धताको प्राप्त हो जाता है । वे प्रथा CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) २६६ ]. बाल्य में दाम्पत्य - प्ररण्यके वीजको न बो कर उसमें देरीं लोग स्थिर करते हैं, वे प्रेमपीयूषके वास्तविक रसाखादनसे वश्चित ही रह फिर बद हैं । भोगोंका भोगना वास्तविक प्रेम नहीं होता । इम ( ३ ) कई लोग कहा करते हैं कि - ' अधिक अवस्थामें बुद्धिकी सारे परिपक्कता दशा में पारस्परिक स्वभाव एवं चरित्र आदिको जानकर विवाह युवति और युक्क विवाहित होकर प्रेमसूत्रमें आबद्ध हो जाते जाता है हैं ', पर यह बात कथनमात्र ही है । दूसरेके स्वभाव एवं चरित्रको - स्वभार परीक्षा कोई सुगम काम नहीं है । इसमें बहुत सुविज्ञ तथा से बिवाद बहुदर्शी पुरुष भी पदे पदे फेल हो जाते हैं । १७-२४ वर्षक जावा है । स्त्री की बात तो न पूछिये । उस अवस्थामें इन्द्रिय - वृत्ति प्रबल करना है तथा कल्पना - शक्ति तेजस्विनी होती है, और अनुराग एकदम ही २४ वर्ष दोनोंके उन्मुख होता है । एक दूसरेके स्वभावको परीक्षा में जिस क रहब धैर्य एवं विवेककी आवश्यकता होती है, वे उस समय प्रायः करता है । अकर्मण्य होते हैं । एक सुतीक्ष्ण कटाक्ष तथा मृदु - मधुर मुस्कान का जैस एवं हास्य, और कुछ अङ्ग- लावण्यका वैचित्र्य तव सहसा ही सेउ मनरूप दुर्गपर अधिकार कर लेते हैं; स्वभाव तथा चरित्र आदि-करती है । की परीक्षाका तब अवसर भी नहीं मिलता । इस कारण अधिक-भी प्रा. वयस्कताका विवाह साधारणतः चिरस्थायी प्रेमके पैदा करने में गता है । समर्थ नहीं हुआ करता । किसीके ( ४ ) यह भी भूलने की बात नहीं है कि जिस देशमें अधिक भी आयु में विवाह करनेके कानून बने हुए हैं; वहाँपर विवाहोच्छेद-है । प्रथा भी अवश्य चालू हो जाती है । यदि उस समय स्वभाव-CC - 0. Ankur Joshi वाल्यविवाह - विमर्श । [ २६७ Collection Gujarat. श्रादिकी परीक्षा ठीक - ठीक हो सकती; तब ऐसा कैसे होता? फलतः अन्धानुरागमूलक विवाहके बन्धनमें अकृत्रिम प्रेमकी उत्पत्तिकी सम्भावना अतिकठिन होती है । इसलिए साधारण - सी बातोंमें ही वह बन्धन स्वयं ही टूट जाता वा ढीला हो जाता है । इङ्गलैण्डके लोग अधिक अवस्थामें विवाह करते हैं; वहाँ पर तलाकका कानून भी बना हुआ है । इसलिए वहां प्रतिवर्ष अधिक-मात्रामें तलाक हुआ करते हैं । ऐसी व्यवस्था उनके अनुरूप न होनेसे इससे वे बहुत दुःखी हैं । अमेरिकामें भी अधिक वयमें विवाह हुआ करता है । अब कई लोग वहां विवाह - प्रथाको कनेकेलिए तैयार हो रहे हैं । यदि अधिक वयस्क विवाहका परिणाम सुखजनक होता, तब उस सुखके हटानेकेलिए इस प्रकार यत्न वा ग्रह क्यों होते? वल्कि ऐसे ही देशोंमें ऐसी गड़बड़ियां हुआ करती हैं । यह सब अधिक वयस्क विवाह के ही फल हैं - इसमें कोई अतिशयोक्ति वा असत्य नहीं । : ५० ( ५ ) स्पेन, इटली, ग्रीस आदि देशोंकी स्त्रियां भी पढ़ती-लिखती हैं, पर उनमें इङ्गलैण्ड - अमेरिका आदिकी भांति परस्पराभिलषित अधिक वयस्कताके विवाहकी प्रथा प्रायः चालू नहीं । इससे वहां दम्पतियोंका परस्पर प्रेम भी खूब होता है । फलतः जिस देशमें अधिक वयमें विवाह होता है; वहीं विवाह बन्धन की शिथिलता, तथा दम्पतियोंका प्रेम अन्धानुराग-मूलक होनेसे अचिरस्थायी हुआ करता है । हमारे धर्मशास्त्री, अतीत - अनागतदर्शी मुनि लोगोंने स्त्रियोंके अधिक वयस्कताके An eGangotri Initiative
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२६८ ] श्रीसनातन धर्मालोक ( ६ ) विवाहोंसे होने वाली हानियोंका दूरदर्शितासे विचार करके ही उनका अल्प वय में विवाह निर्धारित किया था । यदि वर्तमानके शिक्षितम्मन्य उनके वचनों पर आचरण नहीं करना चाहते; तब उन्हें विवाहोच्छेद तथा अशान्ति आदि कटकोंसे समाजके श्रृङ्ग - भङ्गकेलिए भी तैयार रहना चाहिये, जिसका सूत्रपात वैसे कानून बन जानेसे हो चुका है, क्योंकि विवाहोच्छेद अधिक-वयस्क विवाहका ही लड़का है । ( श्री भू. दे. व. ) ( ६ ) कई लोग कहते हैं कि - बाल्यविवाह भावी सन्तानोंकी शारीरिक दुर्बलता तथा बुद्धिमन्दता आदि दोषोंको पैदा करता है; पर उनका यह कथन प्रत्यक्षका अपलाप है । देखिये -१ भगवती जानकी त्रेतायुगमें छठे वषमें विवाहित हुई थी, और भगवान् राम उस समय ' ऊनषोडशवर्ष ' थे । ( इसको ' आलोक ' ( ७ ) में तथा इस पुष्पमें ४ थं निवन्धमें सिद्ध किया जा चुका है ) । उसने समय पर लवकुश नामके अनन्य साधारण, अतुलित बलशाली पुत्रों को पैदा किया - यह इतिहासविज्ञोंसे तिरोहित नहीं । २ इस प्रकार द्वापरयुगके भूषण भगवान् नन्दनन्दन श्रीकृष्णको दिव्य जन्म दिया था; वह देवकी भी बाल्यावस्था में विवाहित थी; उसे वहां ' वाला ' कहा गया है । ३ वीरवर अभिमन्युका विवाह सोलह वर्षसे पूर्व ही किया गया था । १६ वर्षमें तो उसकी हत्या कर दी गई थी — ' तस्याः ( अर्जुनस्या ) ऽयं भविता पुत्रो बालो भुवि महारथः ( अभिमन्युः ) । ततंः षोडशवर्षारिण स्थास्यत्यमरसत्तमाः । अस्यः षोडशवर्षस्य स वाल्यविवाह - विमर्श । [ २ ३०१ संग्रामे भविष्यति ' ( महाभारत आदिपर्व ६७ / ११७-११८ ) प्रकारः उसकी स्त्री उत्तराका विवाह भी बाल्यमें ही हुआ | प्रवत यह तो महाभारतसे स्पष्ट ही है; उनके पुत्र परीक्षितका वा पैदा इतिहासमें प्रसिद्ध है- ' एकं वंशकरं पुत्रं ( परीक्षितं वीरं श्री जनयिष्यति ' ( १८६७/१२३ ) । इस प्रकार स्पष्ट हो गया कि - बोटी शास्त्र श्रायुर्मे विवाहित स्त्रियोंकी भावी सन्तानोंमें कोई भी हानिय शास्त्र मात हुई 1: ( ७ ) अथवा बहुत पुराना इतिहास छोड़ दीजिये, निर तथा भूतकालको ही देख लीजिये । ४ अकबर शाह के समय में मेवा, व्यास केसरी श्री प्रतापसिंहको ही देख लीजिये, जिनकी अननः सत्य साधारण देश - भक्तिको सुनकर शरीर रोमाञ्चित हो जाता है । बांह उनकी माता बाल्यावस्थामें ही विवाहित हुई थी । ५ महाराः विवा राष्ट्रको स्वामी श्रीशिवाजी जिनने औरङ्गजवके दांत खट्टे क स्वराज्यको स्थापित कर गेरुई पताका फहरा दी थी; वे याद बाल्यावस्था में ही विवाहित माताकी सन्तान थे । उनकी माह दृढ़ - प्र तीन वर्षमें ब्याही गई थी । ६ सुप्रसिद्ध बाजीराव पेशवा समस् ६- १० वर्षके भीतरकी माँकी सन्तान थे । ७ इस प्रकार पंवार गाते केसरी रंगजीतसिंह जी भी बाल्यविवाहिता माताकी सन्तान है । सिद्धा प्रसिद्ध कीर्तिवाले गो. तुलसीदासकी माता हुलसीदेवी अपरि बाल्यविवाह संस्कृता हुई थी । अव वर्तमान समयकों ( समुद्र देखिये ६ वङ्गाल - देशके रत्न श्री ईश्वरचन्द्र विद्यासागर मडि माता भी बाल्यावस्था में ही व्याही थी । १० ब्राह्मसमाज मावा CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative '
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[ २ श्री सनातनधर्मालोक ( 8 ) ३०० ] 5 ) । प्रवर्तक श्रीराममोहनराय भी छोटी आयु में विवाहित माता हुआ था. पैदा हुए थे । ११ काशीको प्रकाशित करनेवाले श्रीवाल शास्त्री, का पर श्रीशिवकुमार शास्त्री, श्री कैलासनाथ शास्त्री, म.म. श्रीगंगाधर ) वीरं दे शास्त्री, व्याकरणकेशरी एवं साहित्यार्णव - कर्णधार गो. दामोदर कि - बो शास्त्री आदि दिग्गज पण्डित - वरेण्य भी बाल्यविवाहित , हानि - माताओं के ही गर्भ में निवास करके उत्पन्न हुए थे । १२ जिस भारतविख्यात यशवालेकी देश - सेवा, सत्यनिष्ठा, निक तथा स्पष्टवादिता आदि गुण भारत के कोने - कोने में आबाल - वृद्ध में में मेवार व्याप्त होकर अतुलकीर्तिकारक हुए, जिनकी न्यायशीलता और - अनमः सत्यवादितासे प्रसन्न हुआ हुआ वायसराय उन्हें अपनी दाहिनी जाता है । बांह मानता था; वे न्यायाधीश ( जस्टिस ) रानाडे भी बाल्य में महाराण विवाहित माता के ही आनन्दवर्धक पुत्र 1 १३ कौन भारतीय लोकमान्य श्रीवालगङ्गाधर तिलक का नी; श्रादर नहीं करता, जिन उदारचित्तवाले महोदयकी विद्वत्ता, नकी माह दृढ़ - प्रतिज्ञा, निर्भीकता आदि गुणोंको न केवल हर्मी, बल्कि पेशवा समस्त विश्वके विद्वधुरीण मी तथा अन्य लोग भी मुक्तकण्ठसे पर पंजा गाते हैं, जन्मसिद्ध स्वराज्यके मूलमन्त्रके उपासक जिनके सन्तान । सिद्धान्त हिमालय की भांति अचल, और युक्तियुक्त राजनीतिज्ञता सीदेवी से अपरिवर्तित रही, अव्यभिचारी धैर्य और गाम्भीर्य जिनका मयको समुद्र समान था, समस्त कलाओं में अभिज्ञ, श्रगण्यगुण-सामण्डित पण्डित श्री तिलकजी भी छोटी अवस्था में विवाहित हीं ह्रासमान माता के सन्तान थे । CC - 0. Ankur Joshi बाल्यविवाह - विममं । [ ३०१ १४ कौन भला ' गोखले ' इस उपनामवाले श्रीगोपालकृष्णको नहीं जानता, जिनके विद्वत्ता एवं माधुर्य एवं सारसे सम्भृत प्रश्नपूर्ण व्याख्यानको सुनकर उसके उत्तर ढूँढनेमें व्यस्तचित्त लार्ड कर्जन नामक वायसराय भी अन्तमें चुप हो गया । जिन अर्थशास्त्रोंके परिशीलन में यूरोपीयनों में भी दो - तीन ही सफल हुआ करते थे, उनको सम्पूर्ण रूपसे जानकर जो राजा - प्रजा दोनोंके विश्वासपात्र हुए थे, वे श्रीगोखले भी छोटी श्रायुमें ब्याही आताके गर्भ से उत्पन्न हुए थे । १५ वह असाधारण चिरजीवी सुरेन्द्रनाथ बॅनर्जी जिनकी वाक्पटुता बहुत प्रसिद्ध हो गई थी, जो बङ्गालमें बिना छत्रके दूसरे राजा माने जाते थे, जिनने अस्वास्थ्यका आक्रमण स्वप्नमें भी नहीं देखा था; उनकी माता भी बाल्यावस्था में ही विवाहित श्री ।१६- जिनने स्वराज्यदल निकालकर भारतके वायसरायको भी किंकर्तव्यविमूढ बना दिया था, जिनके प्रकाण्ड पाण्डित्यके वैभवसे और विमुग्धताको पैदा करनेवाले चातुयेंसे वश हुई । समस्त देशी जनता अपने जीवनधन के अर्पणको भी साधारण-सा मानती थी; वे श्री सी. आर. दास बालविवाहवाली लड़की से यथासमय उत्पन्न हुए थे । १४-१५ प्रतिपक्षियोंके नेता निनने पांच - सात लाख जनताको अपने सम्प्रदायकी छत्रछाया में प्राप्त कराया था; वे भी सनातन-धर्मी पिता के पुत्र स्वा. दयानन्द वाल्यविवाहित माताकी सन्तान थे, जो बल, बुद्धि, तर्क और उत्साहमें अनन्य साधारण · थे । Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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३०२ | श्रीसनातनधर्मोलोक ( e ) १८ अथवा बहुत दूरके व्यक्तियोंको क्यों लिया जावे, सारे संसारको अपने प्रभावसे विस्मित कर देनेवाले श्रीयुत गांधीजी की हो माताने बाल्यावस्थामें विवाहित होकर भी भारतके सारभूत, निराधार जनताके आधारभूत, विश्ववन्द्य कहे जानेवाले महात्माकी पदवीको प्राप्त किये सुपुत्रको पैदा किया, जिनने स्वराज्य लेकर अँग्रेजोंको वहिष्कृत कर दिया; जो १२० वर्षकी अवस्थाको प्राप्त करनेका विश्वास रखते थे । उन श्रीगान्धिजीने भी बाल्यविवाह करके देवीदास आदि प्रसिद्ध पुत्रोंको पैदा किया । १३ स्वराज्य - पक्षपाती, जनताके प्रधान नायक श्री मोतीलाल नेहरूकी, नारीजनों में अद्वितीय माताने भी वाल्यविवाहित होकर भी ऐसे अनुपम, राष्ट्रमहासभा तथा दूसरी जनताके, बिना छत्रके राष्ट्रपतिको पैदा किया, यह किससे छिपा है? २० भारतके भूषण महामनाः पण्डितप्रवर श्रीमदनमोहन मालवीय भी वाल्यविवाहित विश्वजनीन जननीकी कुक्षिसे पैदा हुए भी कैसे सर्वमाननीयतासे सम्पन्न उत्पन्न हुए । २१ झांसी की रानी लक्ष्मीबाई जिसने ब्रिटिश सेनापति सर ह्यू रोज़को भी हरा दिया था, जिसकी प्रशंसा गदरके समय ब्रिटेनके सेनापतियोंने भी की । उसका विवाह भी आठ बर्षकी श्रायुमें ही हुआ था । २२ म.म. पं ० प्रभुदत्तजी अग्निहोत्री म.म. पं ० विद्याधर शास्त्री गौड तथा पं ० श्रम्बिकादत्त व्यासजी की पत्नियां भी छोटी आयु में विवाहित थीं; इससे इनमें किसी को भी हानि नहीं पहुँची । २३ हमारे एक शिष्य व्रजलाल श्रार्य हैं, बाल्यविवाह - विमर्श । [ उनका विवाह १६ वर्षसे पूर्व हुआ; उनकी पर्याप्त सन्तानें वे आर्यसमाज के उपदेशक हैं । कुछ भी अस्वस्थता नहीं है । ( ८ ) श्रव पाठक सोचें, भारत में जितने पुण्यधन्य गण्यमान क्षत्रियमूर्धन्य, जिनकी सज्जनता विश्रुत है, दानिश्रेष्ठ, विद्वदपुर प राजनीति - प्रवीण, अपना सारा धन छोड़कर विश्वजनके प अवतीर्ण हुए, जितने तपस्वी, प्राणिहितकर्ता, देशहितैषी उ शुद्ध आचार - विचारवाले लोग हुए, जो अपने सांसारिक सुख बा छोड़कर परोपकारमें लगे हुए हैं, उनमें प्रायः वारह वर्ष त भ विवाहिता, शुद्ध विचारवाली लड़कियोंके ही यथासमय व आहित हुए । सो इस बालविवाहको कौन दूषित कर सकता है । क ला ० लाजपतराय से बनाई हुई ' दुखी भारत ' पुस्तकके! वि २०६-२०७ में लिखा गया है - ' प्राचीनकालमें जिन नातियों युग बड़ी - बड़ी सभ्यताओं को जन्म दिया है, उनके अधिकांश में बाल पद विवाहकी प्रथा प्रचलित थी । यूनानके लोग जो पूर्ण मनुमो नह सुन्दर विकास तथा उसके सर्वाङ्गीण उन्नति के आदर्श से ध भी हमें उत्साहित करते हैं, अत्यन्त बाल्यावस्था में ही विवाह क थे । रोमन लोग भी जिन्होंने उत्तम सैनिक शासकोंकी १६ बात की - वाल्य में ही विवाह करते थे । यही प्रथा [ बाल्यविवाह ] िहै । लोगों में भी प्रचलित थी । इङ्गलैंडमें तो स्टुअर्ट सके समय स दर बालविवाह प्रचलित था । यदि केवल वालविवाह ही राष्ट्रक भीत अशक्त करनेका एकमात्र कारण होता, तो इतिहास में यूनाद होते रोम तथा हित्र जातियों का इतना स्थायी प्रभाव न पह CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) ३०४ सन्तानें है ( २०६-२०७ पृष्ठ ) । ह्रीं । " रिसले तथा गेट नामक दो साहिबोंने सन् १६० ९ की वाण्यमान मनुष्य- गणना के विवरण में ४२३ पृष्ठमें लिखा है- जिसने द्वदपुरीष पंजाबी सैनिकों का दल कहींसे निकलते देखा है, अथवा प्रामके जनकेशि कुपर स्वस्थ - जाट स्त्रियोंको जलसे भरे बड़े - बड़े घड़ों को तैषी ल उठाये हुए देखा हैः उसके हृदयमें यह बात पैदा नहीं हो सकती कि-क सुखो बाल्यविवाहका जातीय स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ता है ' ( दुखी वर्ष भारत २०७ पृष्ठ ) । समय ग स्थाली - पुलाक न्यायसे हमने यहाँ इस विषय में कुछ दिग्दर्शन सकता है । करा दिया है । स्वा.द. जीसे पूर्व तथा उनके ४० साल तक बाल्य-पुस्तक! विवाह जारी रहा, अब भी अधिकांशमें हो रहा है । मुसलमानी जगमें तो बादी भी मानते हैं कि उस काल बाल्य - विवाह रहा, शमें बाल पर उससे लोगोंके स्वास्थ्य पर वा वैदुप्यपर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ा । शं ( ६ ) पर कई लोग आशंका करते हैं - बाल्यविवाहसे बालकों ववाह क की मृत्यु संख्या अधिकांश बढ़ती है; पर यह भी ठीक नहीं । कोंकी १६११ सन्की जनगणना की लिपिमें दीखता है कि- जिन प्रान्तों में ह ] बाल्यविवाह प्रथा अधिक है, उनमें बच्चोंकी मरण - संख्या थोड़ी समय है । यह प्रथा वङ्गाल, बिहार, उड़ीसा प्रान्तों में अधिक है । उनमें राष्ट्रक दरभङ्गा और भागलपुर जिला देखिये वहाँ की १०-११ वर्षके में यूनाद भीतरकी लड़कियोंकी हजार के पीछे ५६५, ४३४ संख्यक विवाह पड़ होते हैं । मृत्युएं इन जिलों में प्रतिशत १३ हैं । इस प्रकार बाला-CC - 0. Ankur Joshi Collection वाल्यविवाह - विमर्श | [ ३०५ सार, जलपाद गोड़ी, दार्जिलिङ्ग नामक जिलोंमें ५२, १७ संख्यक बाल - विवाह हुआ हज़ार पीछे, ६५, संख्या होनेपर करते हैं; इस प्रकार थोड़ी भी २७, २७, २२ बालकोंकी मृत्युएं हुआ हैं । वर्मामें वाल्यविवाह प्रायः नहीं है, परन्तु वहाँ के करती मरण- गणना सारे भारतकी अपेक्षा अधिक वालकोंकी हैं । तव सुधारकों-की उक्त आशङ्का भी निर्मूल निकली । ( ख ) यह सुधारकोंका दूसरा ब्रह्मास्त्र है कि वाल्य-पति - पत्नी दोनोंके स्वास्थ्यको विवाह विकृत करता हुआ स्त्रियोंकी मरण - संख्या बढ़ाता है । इसमें भी १६११ सन्की जनगणना रजिस्टरमें ३३ वें पृष्ठको देखकर बाल्यविवाहका के चाहते हुए भी मि. श्रोमलेको वाल्यविबाहके खण्डन करना समर्थक और विरोधी देशोंकी मृत्यु - संख्याकी तुलना करनेमें बाल्यविवाहकी मृत्युकारणताको निर्धारित न कर सकनेसे अन्य उपाय न होनेसे स्वयं स्वीकार करना पड़ा कि हमारा निश्चय श्रप्रमाण पृष्ठके देखनेसे मालूम पड़ता है । उस है कि बङ्गालमें हर वर्षे ६१ तथा बिहार में ८६, पर यूरोपमें उससे भी अधिक ६५ मृत्युएं हुआ करती हैं । फिर उस लिपिके ३०२ पृष्ठ देखनेसे पता लगता है कि-आयर्लेण्ड, स्काटलेण्ड, दोनों देशोंकी अपेक्षा भारतवर्षकी स्त्रियोंकी मरण - संख्या थोड़ी है । उसके १३३ पृष्ठ देखनेसे मालूम पड़ता है कि - मुसलिम स्त्रियोंकी अपेक्षा भी अधिक बाल्यावस्थामें विवाहित होती हुई हिन्दु - नारियोंका जीवन - काल Gujarat. A Gorolnitiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ९ ) ३०६ ] है, और २३३ पृष्ट में वहाँ लिखा है कि- भारतीय अधिक मिलता अपेक्षा अधिक आयु स्त्रियोंकी अन्य - धर्मावलम्बी स्त्रियोंकी होती है । ( पं ० रा ० रा ० शा ० द्र ० ) स्पष्ट हो जाता इस प्रकार ऊपर किये हुए आलोचनसे यह स्त्रियोंकी आयु न्यून होती है, और बच्चों-हैं कि - बाल्यविवाहसे सुधारकोंका कथन गलत है । की मृत्यु- संख्या बढ़ जाती है - ऐसा आपको नास्तिक- लोग नाममात्रसे ही अपने यह प्रत्यक्षद्रष्टा अविश्वासी यह लोग आस्तिक कहा करते हैं । कर्मव्यवस्थामें उसे कारण न मानकर जोकि सनातनधर्मी शास्त्रोंपर आक्रमण करते हैं; उसमें कारण इनकी अपनी उदारदरी की पूर्ति, तथा सम्प्रदायका प्रचार तथा सनातनधर्मके साथ द्वेषविशेष ही अपने धार्मिकोंको उचित है कि - शास्त्रोंके उल्लंघन में है । इसलिए उत्साहित न हों । परिस्थितिवश आप यदि उनका आचरण नहीं कर सकते; पर जो उस पर चलना चाहते हैं; उन्हें मत रोकिये । ( १० ) शास्त्राज्ञाका आचरण करनेमें जहाँ पारलौकिक लाभ हैं; वहां ऐहिक लाभ भी हो सकते हैं । सुधारकोंके जन्म से पहले जबकि वाल्यविवाह प्रचुरमात्रामें था, तब आजकी अपेक्षा मृत्यु भी न्यून. थी; और दुर्बलता भी नहीं थी । बाहरी दृष्टि भी मानी जावे; तव भी असंयम तथा खाने - पीनेकी वस्तुओंकी निस्सारता ही कारण उसमें सम्भव है, वाल्यविवाहमात्र उसमें कारण नहीं । यह तो आजकल के यौवनविवाहमें भी कारण हो सकता है । इसीलिए तो. टी.बी. की बीमारियां, और प्रश्रुत-CC - 0. Ankur Joshi Collection बाल्य विवाह - विमर्श ॥ ३१ पूर्व हार्टफेल, कैंसर आदि तथा अन्य भयानक रोग जो बाल्यविवाह के युगमें सुने भी नहीं जाते थे वद दे ॥ डाक्टरों संख्या तथा रोग - संख्या भी आजकल बढ़ती चली - वैद्यो पहले नहीं था । पहले छोटी आयुके लड़कोंके विवाह जा रही है उनमें संयम नहीं होता था । आजकल बड़ी होनेपर उन आयुम होनेपर भी छोटे लड़कोंमें ही बुरी कुटेवें, तथा विवाह.. क असंयम रहा है; जीवन विषमय हो रहा है; आजकल के सिनेमा वा स यदि उनमें और चार - चांद लगा रहे हैं । शुक्रमें, नाट श्रयुमें ही बढ़ जानेसे लड़कों - लड़कियोंमें उष्णता छोटी बंद जो विशेष श्रद्ध छेड़ - छाड़े हो रही हैं; यह वाल्यविवाहसे भी अधिक हैं । सुधारकोंके इन शास्त्रविरुद्ध प्रचारोंसे लड़कियोंके भया नह श्रयु जो ' बढ़ाई जा रही है; तब तदनुसार विवाह मि भविष्यामें कोई भी लड़की शायर विवाहसे पूर्व अक्षतयोनि नहीं मिलेगी । तदनुसार ही कुमारियोंकी विवाहसे ' पूर्व ही भ्रूणहत्याएँ हो रही हैं - यदि यही उन वैदिकता है, इसीसे वे श्राजके भारतकामुख उज्ज्वल करना अ चाहते हों, तो आशा है उन्हें सफलता मिलती जा रही है, उन्हें रह बधाई हों । इन्हीं हानियोंको दूर करने के लिए ही श्रीराम - सीताका I छोटी आयु में विवाहका नाटक हुआ था । • हम इस निबन्धसे यह नहीं बता रहे कि - दो - तीन वर्षके क लड़के - लड़कियों का विवाह कर दिया जावे । नहीं, शास्त्रानुसार च ऋतुकालकी निकटता में उससे कुछ पूर्व १२ वें वर्ष में कन्याविवाह Eg कर देना चाहियेः । जिस देशमें जितनी देर में ऋतुप्राकट्य क होता Gujarat. An eGangotri Initiative