सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 171–180

सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 171–180

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ३०८ ] अनुपातसे कन्याविवाह हो । लड़कों का १६ वर्षे दरहे है, वहां उसी चाहिये । १८-१६-२० वर्षमें प्रायः वैद्य पूर्व विवाह तो नहीं करना । ऐसा न करने से ही है ऐस परिस्थितिवश उनका विवाह कर देना चाहिये नेिपर उनमें कई दुष्प्रवृत्तियां जन्म लेकर उनका भविष्य में सर्वनाश विवाद से कर देती हैं । वे फिर स्त्रीके योग्य भी नहीं रह जाते । यम सर्वनाशको अपेक्षा अल्प - नाश सहन करना ठीक ही है । ब लड़कियोंकी भी जो कि आजकल परीक्षा सम्बन्धी पढ़ाई T, नाटक छोटी चंढ़ाई जा रही है; इससे उनकी २६ - २८ वर्षकी आयु हो जाती अ है । इससे उनको उनकी अवस्थाके अनुपातके अनुसार पति भयावह नहीं मिलता, जो कुमार बैठा हो । या तो उन्हें विधुर पि वाह मिलता है, या अपना सर्वनाश कर चुका हुआ पति मिलता है; शायद अथवा दोनोंकी अवस्थाका अनुपात ठीक नहीं बैठता । अतः सार ही उनकी १४ वर्षसे ऊपर तो विवाहकी आयु नहीं बढ़नी देनी दि यही चाहिये । १६ तक भी उस समय रखनी चाहिये, जब मनु-अनुसार उनके गुणवान् अनुकूल वर ढूँढ़ने में कठिनता पड़ करना उन्हें रही हो । गुणवान् वर मिल जानेपर शास्त्रानुसार उनका जीवाका ऋतुकालसे पूर्व ही विवाह कर डालना चाहिये । अथवा विशिष्ट परिस्थितिवश उनका विवाह १५-१६ वर्षमें वर्षके करना भी पड़े; तब उनका वाग्दान तो पहलेसे ही कर डालना नुसार चाहिये; क्योंकि वह भी एक प्रकारका विवाह ही होता है-विवाह ‘ प्रदानं स्वाम्यकारणम् ' ( मनु. ५/१५२ ) और विवाहपर संस्कार-होता कौस्तुभ, संस्कार भास्कर और संस्कार- दीपक आदिके अनुसार CC - 0. Ankur Joshi Collection, बाल्यविवाह - विमर्श । [ ३०६ कन्यापिता प्रायश्चित्तस्वरूप गोदान आदि प्रायश्चित्त कर ले । अव ' अष्टवर्षा भवेद् गौरी ' इस विषयका एक अन्य भी निबन्ध देकर फिर ' सीता - राम विवाहायुविषयक ' लेखमाला समाप्त हो जायगी । इतिहास - चर्चा भी समाप्त हो जायगी । फिर ' कण्टकशोधन ' होगा । -१० “ अष्टवर्षा भवेद् गौरी " यद्यपि इस विषय में विस्तार तो बहुत होगया है; तथापि ' हाथी निकल गया, पर उसकी पूँछ रह गई ' कहीं यह कहावत चरितार्थ न हो जाय इस विचारसे एक छोटासा निबन्ध देकर यह विषय समाप्त किया जाता है । ( १ ) ' विश्वसंस्कृतम् ' ( २२ ) में ' नारी ' ( एक बनावटी कहानी ) में उसके सनातनधर्मित्र व लेखकने ' अष्टवर्षा भवेद् गौरी, गौरी ददन्ना लोके ' इत्यादि पद्यकी आत्रेयी - वासन्तीके बनावटी संवादसे अवैदिकता बताई है । पहले इस बनावटी संवादको श्रीभवभूतिने बनाया; फिर उसकी भी बनावटको उक्त लेखकने बनाया, परन्तु ' रोमकाले तु सम्प्राप्ते सोमो भुङ्क्तेऽथ कन्यकाम् । पयोधरेण गन्धर्वो, रजसाऽग्निः प्रकीर्तितः ' ' इस संवर्तके पद्यको लेखकने प्रमाण मान लिया है; और उसकी ' सोमः प्रथमो विविदे गन्धर्वो विविद उत्तरः । तृतीयोऽग्निष्टे पतिः, तुरीयस्ते मनुष्यजाः ' । ' सोमो ददद् गन्धर्वाय गन्धर्वो दददग्नये । रयि Gujarat. An eGangotri Initiative

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३१० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ९ ) च पुत्रश्चादाद अग्निमथो इमाम् ' ( सं ० २०१६०२१ ) सङ्गति लगाई है; और लिखा है कि - संवर्तस्मृति-इन वेदमन्त्रोंसे पता लगता हैं- जब तक रज: -प्रवृत्ति नहीं होती; के इस वचनसे अधीन रहती है । तब तक कन्या सोम, गन्धर्व, अग्निदेवके होनेपर वह वह्निके अधिकारमें आ जाती है; और रजः प्रवृत्ति रजसे शुद्ध करके उसे मनुष्य के अधिकारमें सौंपता वह्नि उसको है । तभी अग्निकी साक्षीमें कन्याविवाह होनेकी आर्यमर्यादा है । शीघ्रबोधकर्ता काशीनाथने ही मुसलमानी समयसे डरकर सब पुस्तकों में अपने शिष्यों द्वारा ' त्र्यस्तै नस्कं यान्ति ' आदि

श्लोकोंका प्रक्षेप करवा डाला " ।

( २ ) यह सनातनधर्मित्र व लेखकका कथन सनातनधर्म से नितरां विरुद्ध है । इस विषय में विस्तार तो हमारे संस्कृत में लिखित ' श्रीसनातनधर्मालोक ' के ५०० पृष्ठों में है; पर यहाँ उतना स्थान न होनेसे यथासम्भव संक्षेपसे लिखते हैं । यदि वादी संवर्तके वचनको प्रमाण मानता है, और उसका ' रोमकाले तु सम्प्राप्ते ' वचन देता है; तब उसी संवर्तकी स्मृतिमें लिखा है — ' तस्माद् विवाहयेत् कन्यां यावन्नर्तुमती भवेत् ' ( ६८ ) अर्थात् - ऋतुकालसे पूर्व कन्याविवाह करे; तब वादी संवर्तके उक्त वचनको मान ले । यदि नहीं मानता, तो यह उसका ' यसमाजीपन ' है, ' अर्धजरतीय ' है । ( ३ ) उसके इष्ट ' रोमकाले तु सम्प्राप्ते ' इस पद्यंके ' संप्राप्ते ' में ‘ क्त ' प्रत्यय भविष्यत्कालार्थक है, जैसेकि - ' भवत्कृतां भूतिमपेक्ष-श्रष्टवर्षा भवेद् गौरी । ३१ माणा: ' ( किरातार्जु. ३।४६ ) यहाँपर ' भवत्कृतां ' के ' क्त ' करिष्यमाणाम् ' यह भविष्यत्का अर्थ है । ' प्रवृत्ते! का ' भस को ( गीता १/२१ ) यहाँ भी ' प्रवृत्ते ' के ' क्त ' का अर्थ ' प्रवत्स्यमाने शास्त्रसम्म गौरी भविष्यत्का है; तभी तो ' योत्स्यमानानवेक्षेऽहं ' ( ११२३ ' अजुन वाक्यमें भविष्यत्कालका प्रयोग है । ) १ वादी इस प्रकाएं तो बहुतसे प्रमाण हैं । इस विषय में ' आलोक ' ( ८ ) के ६२४ से ६ आद पृष्ठ तक देखना चाहिये । पतिय ( ४ ) अब हम यहाँ वास्तविकता बताने जा रहे हैं । सें में स लिखा है — ‘ सोमो गौरी अधिश्रितः ' ( सं ० ६।१२।३ ) सोम, वे स में रहता है । यहाँपर ‘ सुपां सुलुकू ' ( पा ० ७ १।३ ९ ) से सम्बंध बन लुक हुआ है और ' ईदूतौ च सप्तम्यर्थे ' ( पा ० ११ १२ १६ ) से प्रभु कुमा संज्ञा और प्रकृतिभाव होकर सन्धि नहीं हुई । इस मन्त्रांश था । सोम देवताका ' गौरी ' संज्ञावाली लड़की में अधिपत्य व विवाह गया है । f इसपर प्रश्न होता है - ' गौरी ' क्या होती है? उसपर रू ४० ) र ' यह है कि - ' अष्टवर्षा भवेद् गौरी ' इसे वादी प्रमाण मानता । सोम यह शीघ्रबोध ( १ । ५२ ) में पद्य है । यही पद्य संवर्तस्मृति ( ६१ ) अधिप भी है । इससे पूरे ८ वर्ष बालीका नाम - जिसका वाँ वर्षगन्धव हो रहा होता है- ' गौरी ' होता है; उसमें सोमका आधिपत्य लड़की होता है । यही बात ' सोमः प्रथमो विविदे ' इस वेदमन्त्र लड़की प्रतीत होती है । वर्ष श श्रीकाशीनाथका ' शीघ्रबोध ' संग्रहग्रन्थ है, उसने इन पर वह ल CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातन धर्मालोक ( ६ ) ३१२ ] ' का ' भ को अन्य मुनियोंके स्मृतिग्रन्थोंसे लिया है । यही ' अष्टवर्षा भवेद् खसम्म गरी ' पद्य अङ्गिरः ' - स्मृति ' ( १२६ ) में भी है । ' पराशरस्मृति ' सूर्यमान ( १६ ) में है, तब काशीनाथ के सर्वत्र प्रक्षेपकी बात भी १ ९ २३ ) के वादीकी निष्प्रमाण है । यह " श्रार्यसमाजीपन ' है । मुसलमान इस प्रथमं तो विवाहित स्त्रियोंको भी चुरा लेते थे, याद कीजिये पद्मिनी २४ से ६६ आदि को । तभी तो विवाहिता स्त्रियाँ मुसलमानों के युद्ध में अपने पतियों के युद्ध में जूझ रहे होनेपर अपने चुराये जानेकी श्राशङ्का-हैं । ऐसे में सती हो जाती थीं । यदि विवाहिताओंको डर न होता; तो । सोम पर वे सती क्यों होतीं? कुमारियाँ ही जल जातीं; पर उनका ऐसा सप्तमं वर्णन कहीं नहीं आता; अतः वादीका यह हेत्वाभास है । तब - ) से प्रा. कुमारियों का छोटी आयु में विवाह होनेपर भी कोई लाभ नहीं मन्त्रार्ण था । अतः यह लेखकका मुसलमानी कालके कारण छोटी आयु में विवाह ' हेतु ' नहीं, किन्तु हेत्वाभास है । अस्तु । फिर वेदमें लिखा है- ' गन्धर्वो विविद उत्तर: ' ऋ (. १०८ सपर न ४० ) सोमके वाद कन्याका अधिपति गन्धवे बनता है; क्योंकि मानता सोम अपना आधिपत्य उस लड़की से हटाकर गन्धर्वको उसका ति ( ६ ) अधिपति वना देता है । तभी वेदमें कहा है- ' सोमो ददद् 1 वर्ष गन्धर्वाय ' ( ऋ. १०/८५/४१ ) । गन्धर्वका रोहिणी - संज्ञाकी धिपत्य लड़की में स्वामित्व होता है । ' नववर्षा तु रोहिणी ' । सोम उस - वेदमन्त्र लड़की का पूरे आठ वर्षकी हो जानेपर, जबकि उसका नवम वर्ष शुरू हो रहा होता है, अधिपति एक वर्ष तक बनकर फिर इन पर वह लड़की के पूरे नौ वर्षकी हो जानेपर जबकि वह दश वर्षकी CC - 0. Ankur Joshi प्रष्टवर्षा भवेद गौरी । [ ३१३ Collection Gujarat. हो रही होती है उसे गन्धर्वको सौंप देता है, और गन्धर्व एक वर्षके लिए उसमें अधिकृत रहता है । फिर गन्धवं उस कन्याको अग्निको सौंपता है; उस कन्या-पर अनिका आधिपत्य शुरू होता है - ' दशवर्षा भवेन कन्या ' ( संवर्त. ) । ' कन्या ' संज्ञामें ' अग्नि'का श्राधिपत्य होता है, इसपर वेदका भी संकेत है - ' जारः कनीनाम ' ( ऋ. ११६६८ ) ' कनी ' यह ' कन्या ' के स्थान वैदिक शब्द डीप प्रत्यय में सम्प्रसारणमें रखा गया है । कनीनां - कन्यानां जारः ( पतिः, अग्निः ) ' ( निरुक्त १०/२०१२ ) । ' दशवर्षा भवेत् कन्या ' यह ' कन्या ' शब्दकी परि-भाषा है । पूरे १० वर्षकी होजानेपर जब उसका ११ वाँ वर्षे प्रारम्भ होनेको होता है, पूर्ववत् एक वर्ष ११ वर्षकी समाप्ति तक जबकि बारहवाँ वर्ष लड़की का प्रारम्भ होनेको होता है, अभि कन्याका अधिपति रहता है, तभी वेदमें कहा है- ' तृतीयोऽभिष्ट पतिः ' ( ऋ. १०/८५ | ४० ) ' गन्धर्वो दददग्नये ' ( ४१ ) । यह सोम, गन्धर्व तथा अग्नि कन्या के शरीरके भीतर ही रहते हैं । जो - जो कन्याका अङ्ग बाहर आता है, वह पहले शरीरके अन्दर ही प्ररूढ होता है; अर्थात् उसकी उद्गमक शक्ति अन्दर उत्पन्न होती है । पीछे क्रम - क्रमसे उस अङ्गका बाहर प्ररोहण शुरू होता है । जबतक वह शारीरिक अङ्ग शरीरके अन्दर रहता है; तब तक उस - उस देवका भोग शुरू हो जाता है । जब वह अङ्ग भीतरसे बाहर आना चाहता है; तब भीतरसे उस पूर्व देवका अधिकार भी समाप्त हो जाता है; और अग्रिम An eGangotri Initiative

पृष्ठ 174

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३१४ | श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) देवका अधिकार शुरू हो जाता है । वह अधिकार पूरा एक वर्ष रहता है, जैसे कि - हम पहले मीमांसा कर चुके हैं । तो जो ' रोमकाले तु सम्प्राप्ते सोमो भुङ्क्तेऽथ कन्यकाम् । पयोधरेण गन्धर्वो, रजसाऽग्निः प्रकीर्तितः ' यह वादीद्वारा संवर्तका वचन दिया गया है, सो सोम, गन्धर्व एवं अग्निदेवोंका कन्या के भीतर रहनेका सम्बन्ध होनेसें, भीतर प्ररूढ हुए रोम, पयोधर, तथा रजकेलिए है । सो सोम, गन्धर्व तथा अग्निका भी अधि-कार उन अङ्गके भीतर रहने तक होता है । सो जब रोम कन्याके बाहर शुरू होना चाहते हैं; उस समयसे पूर्व सोमका; जब पयोधर बाहर शुरू होना चाहते हैं, उस समय से पूर्व गन्धर्वका; और जब रजका कन्याके अङ्गसे बाहर आनेका अवसर आने को होता है, उससे पूर्व अग्निका अधिकार समाप्त होने लगता है; उस समय सोम गन्धर्वको और गन्धर्व उस कन्याको अग्निको और अग्नि अपना आधिपत्य छोड़कर उस कन्यामें उसके माता - पितासे नियत किये वरका आधिपत्य कर देता है । इसी कारण वर अग्निकी साक्षी में उस कन्या को उसके माता - पितासे लेता है । सो यह अवस्था कन्याके १२ वें वर्ष आरम्भ हो जाती है । उसी समय ' अग्निर्मह्यमथो इमाम् ' ( ऋ. १०/८५/४१ ) ' तुरीयस्ते मनुष्यजाः ' ( अथर्व. १४/२/३ ) ' पुनः पत्नीमग्निरदाद् ' ( अथर्व. १४/२/२ ) इन वैवाहिक वेदमन्त्रोंकी चरितार्थता होती है । इसीका नाम देवदत्तत्व ( देव - द्वारा मनुष्य-को देना ) होता है । तभी मनुजीको जो पूर्ण वेदज्ञ थे ( मनु.. २/७ ) भष्टवर्षा भवेद् गौरी । [ ३0६१६ कहना पड़ा - ' वहेत् कन्यां हृद्यां द्वादश - वार्षिकीम् ' ' देव दत्ता ' पतिर्भार्यां विन्दते, नेच्छयात्मनः ' ( ६५ ) ( ध ) बन्हेर! यह उसमें दिया गया है कि अग्निदेवसे दी हुई कन्याको वर रजका अपनी इच्छासे नहीं । लेवा प्राकट्य । सो कन्याका विवाह रजके अन्तः सञ्चयमें ही सिद्ध निवास हुआदि बाहर के प्राकट्य नही । बाहर के प्राकट्यमें तो अग्निदेवार उन - उन अधिकार रहता ही नहीं । तब वह उस कन्याको अनधिकार हो जाव ज मनुष्य वरको दे ही कैसे सकता है? सो उस रजः प्राकटर इस पूर्वं ही ' अग्नि ' द्वारा कन्या मनुष्य - पतिको दे दी जाती है, बदिये मा अग्निमें लाजाहोम हो जानेपर वह अग्नि उस लड़की की कला महाम संज्ञाको जीणे कर दिया करता है, इसलिए वेद अमिश्रग्निन कन्यायोंका ' जार कहता है - ' जारः कनीनां ( कन्यानाम् श्रमि हैं । इ ( ( ऋ. १ । ६६ । ८ ) । इसपर श्रीसायणाचार्यने लिखा है- ' विज्ञ प्रवेश व समये अग्नौ लाजादिद्रव्यहोमे सति तासां कन्यात्वं निवर्तले दक्षिण अती जार: - जरयिता इत्युच्यते ' । तब उसका विवाह कन्याल स्या ( रजके बाहर प्राकट्य से पूर्व ही अग्निके आधिपत्य के सत्रायाः लगभग ही हो जाता है 1 । छोटा बादी कहता है- ' रजसाऽग्निः प्रकीर्तितः ' इति संवर्तमृत क्षात् वचसा यावद् रजः - प्रवृत्तिर्न भवति, तावन्तु कन्या सोमादिदेवारको ' धनैव तिष्ठति ' ( विश्वसंस्कृतम् पृ १३४ ) इसमें वादीने ' राकर शब्द रखा है । सो अग्निकी अधीनता भी रजः प्रवृत्तिसे पूर्व दि नह आगई । तब बादीका यह कहना कि - ' रज: - प्रेवृत्तौ जातावांव भीत CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 175

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श्रीसनातनधर्मालोक ( C ) [ the ] ( tly धन्देरधिकारे समायाति ' गलत है । हाँ, यदि यहाँ कन्याके उसमें में जका भीतरी सञ्जय माना जावे; तो ठीक है, बाहरी रजका वर लेता अर्थ ठीक नहीं; क्योंकि - देवोंका कन्याके अन्दर ही निवास प्राकट्य रहता है, बाहर नहीं; अतः रोम, पयोधर, और रज सिद्ध इ हुआघ्रादि भी भीतरी इष्ट हैं, अर्थात् उन - उन देवोंके आधिपत्यमें लदेवखाः उन - उन अङ्गोंकी उद्गमक शक्ति भीतर - ही - भीतर क्रम - क्रमसे नधिकारण हो जाती है । = -प्राक इसमें हम वादीको वेदका ही प्रबल प्रमाण देते हैं । उसीके है, मित्र उत्तराध में लिखा है - ' रयिं च पुत्रश्चादाद् अग्नि-की कामथो इमाम् ' ( ऋ. १०/८५/४१ ) यहाँपर वर कह रहा है कि-अनि अग्निने मुझे यह कन्या भी दी है, और ऐश्वर्य और पुत्र भी दिये श्रमि हैं । इसीका नाटक यह खेला जाता है- जब वधू वरके घर - ' विप्रवेश करती है; तो उसकी गोद में ' पुत्रस्ते एष: ' ( अ. १४/२/२४ ) निवळं ' दक्षिणोत्तरम् उपस्थं कुरुते वधूः । ब्राह्मणायनं कुमारं शुभनामकं कन्यास्या उपस्थे ( अ ) उपवेशयति ' ( कौशिक, ७७/२४ ) ' जीव-त्रायाः पुत्रमंके उत्तरया उपवेश्य ' ( आपस्तम्बगृ. २३।६।११ ) छोटा बच्चा दिया जाता है, तब वादी बतावे कि क्या अग्निदेव संवर्त साक्षात् ही होकर और पुत्रको भी बाहर साक्षात् लाकर मनुष्य मादिदेव को देता है? क्या वादी यह मानता है कि - पुत्रको पैदा कर साथ ले आई हुई ही लड़कीका वरसे विवाह होता है? नसे पूर्वदि नहीं; तब इसी वैज्ञानिक अर्थसे स्पष्ट हो रहा है कि अग्नि नावायांव भीतर ही भीतर पुत्रोत्पादक रजःसञ्चय कराकर भीतर - ही-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. भवेद् गौरी । [ ३१७ भीतर लड़कीकी पुत्रोत्पादक शक्तिको प्रवृत्त कर रहा होता है । क्योंकि - सन्तानका सम्बन्ध कन्याके भीतरी रजसे होता है । जव उस शक्तिका बाहर प्राकट्य होना चाहता है; उससे पूर्व ही अग्नि उस लड़की में वरका अधिकार करके रजके बाहर श्रा जानेपर स्वयं भी बाहर निकल जाता है । इससे ध्वनित हो रहा है कि- रजोदर्शन से पूर्व ही उसके लगभग लड़की का विवाह हो जावे; वह अवस्था कन्याका १२ याँ वर्ष प्रतिफलित होता है, जैसा कि मनुजीने ६६४ में लिखा है । निष्कर्ष यह है कि - सोम, गन्धर्व, अग्निदेव सूक्ष्म होनेसे कन्याके भीतर ही रहकर अपना - अपना कार्य करते हैं । सर्वज्ञ होने से ' विद्वाँसों हि देवाः ' ( शतपथ ३ ७ ३ ( १० ) वे भीतर उस - उस रोम आदि चिन्हकी शक्ति देखकर ६ वर्षसे लेकर ग्यारह वर्ष तक लड़की में निवास कर रहे होते हैं । जब वह वह अङ्ग वाहर आने को होता है; तब वह वह देव भी अपनी श्रभ्यन्तरिक स्थितिमें ही अर्थात् अपने अधिकारमें ही दूसरे देवका आधि-पत्य कर देता है; तब अन्यके अधिकार क्रमशः हो जाने पर स्वयं भी क्रमशः बाहर हो जाता हैं । इस वैज्ञानिक अर्थसे कन्याकी विवाह - योग्य वय ध्वनित हो रही होती है । इन्हीं वेदमन्त्रोंके वैज्ञानिक अर्थका निष्कर्ष वादीकी मान्य संवर्त-स्मृतिने लिखा है — ' तस्माद् उद्वाहयेत् कन्यां यावन्नर्तुमती भवेत् ' ( ६५ ) । कहीं लड़कियोंकी विवाहावस्था ८, कहीं १२, कहीं १६ An eGangotri Initiative

पृष्ठ 176

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श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) ३१८ ] भेदका कारण होता है, लिखी मिलती हैं; वहाँ देशकालके विवाह ही प्रति-अन्तिम निष्कर्ष सब स्थान ऋतुमतीत्वसे पूर्व फलित होता है । जिस अत्युष्ण वङ्गाल आदि देशकालमें ऋतुदर्शन होता है, वहाँ आठ वर्षमें कन्या-वर्षमें कन्याओंका जन्मसे २ || २ || वर्ष तीन देवताओंका निवास विवाह करे । वहाँ विवाह करना होकर || वर्षके बाद वें वर्षके नैकट्यमें कन्याका है । जिस मध्यम ( अर्थात् न बहुत गर्म, न बहुत ठंडे ) उचित यह हमारा देश ) १२ वें के अन्त वा १३ वें के देश - कालमें ( जैसे १२ वें वर्ष में लड़की का विवाह हो । आरम्भमें रजोदर्शन हो; वहाँ शीतल देशकाल ( जैसे यूरोप आदि ) हो; वहाँ १६ वें जहाँ बहुत कर दे । स्मृति आदियोंमें परस्पर विरुद्ध वर्षमें ही कन्याविवाह वचनोंका देशकालादि भेदवश तत्तद्देशके ऋतुकालसे पूर्वताका समन्वय कर लेना चाहिये । सो हमारे इस देशकालमें लड़का १२ वें वर्षके अन्दर ऋतुकालके निकट विवाह शास्त्रीय एवं वैज्ञानिक सिद्ध हुआ । जब ऐसा है; तब ' रजोदर्शनकाल- व्यपगमे - कन्यानां विवाह-काल इति वैदिक विज्ञानम् ' ( पृ ० १३५ ) यह वादीका कथन -' बह्निश्च रजसा शुद्धिं विधाय तां मनुष्याधिकारे समर्पयति ' ( पृ ० १३४ ) उसके इस अपने कथनसे भी विरुद्ध है । स्त्रीका रजोदर्शनकाल तो ५० वर्ष तक रहता है; और रजोदर्शन कालका व्यपगम तो ५० वर्षके बाद हुआ करता है; तब: क्या ' वादी ५०-५१ सालकी कुमारीका विवाह करावेगा? CC - 0. Ankur Joshi Collection अष्टवर्षा भवेद् गोरी । [ te ३२१ रजःकाल सामान्यतया आयुर्वेदानुसार १२ वर्षके श्र होता है ( सुश्रुत सं. सूत्र. १४/६ ); तब क्या वादी कन्यास विवाहका १२ वर्षका मानेगा? यदि ऐसा हो तो वह भी ि हमारे मार्ग पर आगया । केवल इतना भेद रहा कि हम १३ वर्षका आरम्भ चाहते हैं; और वह १२ वें वर्षका अन्त चाहता है. तोर्यसमाजी पक्ष १७ वर्षसे २४ वर्षे तक कन्याविवाहमे खंडित होगया । विव ५- १६ वर्ष वा उसके बाद कन्या - विवाह तो यूरोपका अनुकार मिल हैः । यूरोप्र - जैसे शीतल - देशका अनुकरण करके इस उष्ण - देशों कन्य कुनाइन बलात् लाई गई है; जैसे वह हानि कर रही है, बो उपर भवे ही इस उष्णदेशमें यूरोपका १७- २४ वर्षेका कन्याविवाह श्री. बलात् लाया गया है, और वह देशकी हानि कर रहा है । इससे वच कन्याओंके कई विवाहसे पूर्व ही अन्योंसे अवैध सम्बन्ध ऋ पुरुष इत्याएँ तथा विवाह होजानेपर विवाहोच्छेद आदि हो रहे हैं । वेदर - मनुजी स्पष्ट कह रहे हैं- ' हृद्यां द्वादशवार्षिकीम् ' ( ६६४ ) । इसमें वा अष्टवर्षां ' में १६ वर्षकी कन्या विवाहवस्था कांसे वा टपक पड़ी? | मनुजी कभी भी किसी संख्या में ऐकदेशिक सम छन्दोजातिका निर्देश नहीं करते । यह तो डॉ ० भगवानदासवी होत की अपनी निर्मूल कल्पना है; जिसने वादीको प्रभावित कर गये दिया है । यह किसी भी शास्त्रमें नहीं लिखा कि कन्या इतने उस ऋतुकाल व्यर्थ करके तब विवाह करे । ' त्रीणि वर्षायुतीचा क्षेत, ( मनु: ६ ) ६० ) ऋऋतुत्रयमुपास्यैव ' इत्यादि पद्यं पिताके द्वारा को Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 177

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श्रीसनातनधर्मालोक ( e ) ३२० J अन्तो होजानेपर भी न देनेपर उसके आपत्तिकाल में कन्याका लड़कीके ऋतुमती पूर्वप्रोक्त मनुके उक्त पद्यके आगे लिखा मी ि चरितार्थ हैं; इसीलिए भर्तारं ' ( ६६१ ) । इस पद्यपर हमने विवेचन है- ' प्रदीयमाना म १३ अन्यत्र दिया है । हता है ' रोमकाले तु सम्प्राप्ते ' जैसे परस्पर - विरुद्धं वचन तथा कन्या-विवाह - वयमें भिन्न - भिन्न निर्देश कहीं भिन्न - भिन्न स्मृतियों में यदि मिलें; उन सबका तात्पर्य भिन्न - भिन्न देशकालमें ऋतुकालसे पूर्व ननुकरण कन्याविवाह कर देनेमें है; तभी वादीकी मान्य संवर्तस्मृतिमें देश उपसंहार किया है — ' तस्माद् विवाहयेत् कन्यां यावन्नर्तुमती भवेत् ' ( ६७ ); पर वादीने अपनी मान्य भी संवर्तस्मृतिके इस बाइ वचनको जन- दृष्टिसे छिपा दिया है, यह आर्यसमाजी नीति है ॥ इससे ऋतुकालके प्रारम्भ हो जानेपर कन्यामें सम्भोगकी इच्छा, I पुरुषके मिलने की इच्छा स्वभावतः शुरू हो जाती है । जैसे कि-हे हैं । वेदमें भी सूचित किया है—-= 1६४ ) | ' जायेव पत्ये उशती सुवासाः ' ऋ (. १०/७११४ ) । ' मलवद्-कहां वासाः ' शास्त्रमें ऋतुमतीको कहते हैं; क्योंकि उस रजस्वलात्वके कदेशिक समय उसके कपड़े रजोलिप्त हो जानेसे मलयुक्त एवं मलिन दासी होते हैं । ' शुक्र और असृक् ( रुधिर ) मल ( मनु. ५।१३५ ) माने का गये हैं । उस ' मलवद्वासाः ' का प्रतियोगी शब्द है ' सुवासाः ' या इतने उसका अर्थ है ऋतुस्नाता । उस समय अर्थात् रजस्वलात्वके यदी चार दिन के बाद वह ऋतुस्नान करती है, उन मलवाले कपड़ों-द्वारा को वह धोती है; तब वह ' सुवासाः ' कही जाती है । उस समय CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. प्रष्टवर्षा भवेद् गौरी | [ ३२१ वह ' उशती ' होती है, ' वश् कान्तो ' का शत्रुमें ' उशती ' बनता है । उस समय उसको पतिकी इच्छा होती है । इस प्रकारके मन्त्र वेद में अन्य भी मिलते हैं । उपवेद आयुर्वेद में भी लिखा है-' नरकामां प्रियकथां विद्याद् ऋतुमतीमिति ' ( सुश्रुत, शारीर. ३ । ७-८ ) । शाक्तानन्दतरङ्गिणीमें भी लिखा है- ' रजस्वला च या कन्या विशुद्धा पञ्चमे दिने 1 । पीडिता काम - बाणेन तत: पुरुष-मीते ' । तब उस रजः - स्रावमूलक कामुकतासे पूर्व ही उस कन्या की भावनाका केन्द्र वही पति बना रहे; वह ऋतुमती होकर कामुकताको प्राप्त होकर अन्य युवकोंकी ओर आकृष्ट होकर अपनेको कहीं कलुषित न कर बैठे; यही अन्तर्भावना उसके रजःस्रावसे पूर्व ही सुन्दर पति चुनकर उसके विवाह कर देनेकी होती थी । इससे वह विवाहकालीन पति उस कोमल - भाववाली कन्याके मनमें दृढ हो जाता था । यदि रजःस्त्रावसे पूर्वसे ही उसे पति न मिला; तो वह ऋतु-मती होती हुई वेदानुसार उशती ( कामुकी ) हो जानेसे विभिन्न युवकोंकी ओर आकृष्ट होती रहेगी, तब उसके वासना - पूर्तिके नानाविचार उत्पन्न होंगे । यदि वर ऋतुकालसे पूर्व ही नियत हो जावेगा, तो रजोधर्मसे पूर्वसे ही उसके स्थित होनेसे उसका अन्तःकरण उसी ओर आकृष्ट होगा, उससे ममता बढ़ेगी; और - " प्राणैस्ते प्राणान् सन्दधामि, अस्थिभिरस्थीनि, मांसैर्मासानि, ' त्वचा त्वचम् ' ( पारस्करगृ. १।११५ ) इन मन्त्रोंसे पूरा एकीकरण स ० ध ० २१ An eGangotri Initiative

पृष्ठ 178

सनातन धर्मालोक ९, पृष्ठ 178 का मूल पृष्ठ
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श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) ३२२ ] जायगा । तभी ' स्वायां तनू ऋत्व्ये नाधमानाम् ' ( ऋसं. हो चरितार्थता होगी । यहाँ लड़की का १० | १८३/२ ) इस मन्त्रकी विशेषण ' ऋत्व्ये नाधमाना ' है, अर्थात् मृव्ये ऋतुकाल में -'पतिसङ्गको चाहती हुई ' । स्वा. द. जीने भी सं.वि. • नाधमानाम् . ( पृ. १७ ९ ) ' ऋत्विये ' का अर्थ ' ऋतु समयमें ' किया गृहाश्रमप्र है । आर्यसमाजके स्व. पं. नरदेव शास्त्रीजीने भी ' ऋतुकालमें तू पतिकी इच्छा करती है ' यह अर्थ ऋग्वेदालोचन ' ' ( पृ. २७० ) में किया है । श्रीसातवलेकरजीसे सम्पादित वेदामृत ( प्र.सं. १६८१ ) में स्वा. स्वतन्त्रानंन्दजीने भी ' ऋतुकालीन संयोग चाहती हुई ' यह अर्थ किया है । आर्यसमाजके श्रीराजाराम शास्त्रीजी ने भी अ. १२।३।२६ में ' ऋतुकालीन संयोग चाहती हुई ' यह अर्थ ' किया है । ‘ नाधमानाम् ' का अर्थ है माँगती हुई, चाहती हुई-' नाधूँ याच्ञायाम् ' ( भ्वा.आ.से. ) । काठकगृ. ( १६।१ ) सूत्रके भाष्यमें आदित्यशरणने लिखा है- ' ब्रह्मचर्यान्तं निमित्तम्, ' दशवार्षिकं ब्रह्मचर्यं कुमारीणां द्वादश-वार्षिकं वा । श्रत ऊर्ध्वं पुरुषं प्रति इच्छया, स्वप्ने वा रेतः - सेकः सम्भाव्यते ' । इस उल्लेखसे सिद्ध हुआ कि वह ऋतुकालमें पुरुषको चाहती है । सो ऋतुकालमें पतिकी निकटता वा पतिके प्रति प्रार्थना तब हो सकती है, जब ऋतुकालसे कुछ पूर्व ही उसका विवाह हो जावे; क्योंकि ऋतुकालका पता तो पूरा होता नहीं कि - कब शुरू हो जावे; क्या वह कुमारी ऋतुवाले दिन किसीका CC - 0. Ankur Joshi Collection प्रष्टवर्षा भवेद् गौरौ । डा खटखटाने जावे? ' यदा भवति संसर्ग ऋतुकाल .सं. शारीर. ३ ( २ ) यहां ऋतुकालमें संयोग ( क ' शुद्धस्नातां चतुर्थेऽहनि अह्तवाससम् अलङ्कृतां कहा है । प्रा ( सुश्रुत, शारीर. २२२५ ) यहां भी ऋतुके चतुर्थ... दिन भर्तारं ' । दो सं " कहा है; यदि वह विना विवाह के ही ऋतुमती रहेगी; तब उसको भर्तुदर्शन, विना विवाह के कैसे हो घराबर तब यह सब श्रुति - स्मृति तथा उपवेदादिके वचन सकता व्ययं । गा • जाएँगे 1 यथ फलत: वेद भी बाह्यऋतु के प्राकट्यसे पूर्व ही पड द्वारा बरको कन्याका दान ` कराता है । दान होता अग्नि भी - देश वस्तुका ही है, रजस्वला हो जानेपर लड़की का दान साहितस नहीं रहता । यह रजस्वलात्त्व कृष्णयजुर्वेदानुसार स्त्रियोंको भी हत्याका भाग दिया गया है | देखिये- ' विश्वरूपो वै प तस्य त्रीणि शीर्षाणि श्रासन्... तस्माद् इन्द्रोऽविभेद्.. मादाय शीर्षाणि प्रच्छिनत्... ब्रह्महत्यामुपागृहात् ॥ विष पृथिवीमुपासीदद् - अस्यै ब्रह्महत्यायै तृतीयं प्रतिगृहाणा.... पूर वनस्पतीनुपासीद् - अस्यै ब्रह्महत्यायै तृतीयं प्रतिगृह्णी सभ स ( इन्द्रः ) स्त्री ष ँ सादमुपासीदद् - अस्यै ब्रह्महत्यायै तृतीचे ध्या " गृह्णीतेति । ताः [ स्त्रियः ] अब्रुवन् वरं वृणाम है, ऋत्विया प्र मित्र विन्दम है... तृतीयं ब्रह्महत्यायै प्रत्यगृह्णन् । सा मलवद् - वासा ग्रह तस्माद् मलवद्वाससा न संवदेत, न सह आसीत; नाऽस्या वर्ष मद्याद् ब्रह्महत्या ह्येषा वर्णं प्रतिमुच्यास्ते ' ( तै.सं. राशश इस7 Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ह ) ३२४ / काले सो परिस्थितिवश ऋतुमती हो चुकी हुईके विवाह में ET एयर कर्तव्य हो जाता है । जैसे कि - संस्कार - कौस्तुभ, 1 प्रायश्चित्त एवं संस्कार- दीपक आदिमें बहु प्रायश्चित्त श्राया न. संस्कारभास्कर जैसे कि -, ' पिता ऋतून् स्वपुत्र्याश्च गणयेद् आदितः सुधीः । परि है । बराबर दिनाबधि गृहे यत्नात् पालयेश्च रजोवतीम् । दद्यात् तदृतुसंख्या ह गाः शक्तः कन्यापिता यदि । दातव्यैकापि च यत्नेन दाने तथा सकता नव्या यथाविधि ' इत्यादि वचन द्वारा प्रायश्चित्तस्वरूप गोदान करना पड़ता है । दयानन्दी भी इसका पूर्व पद्य उधृत कर लेते हैं; अग्नि- शेषको जनदृष्टिसे छिपा देते हैं । सर्वसाधारणतया ऋतुमतियोंके विवाह करनेपर अँग्रजी न्ता भी । सभ्यताका अनुकरण करनेसे विवाहोच्छेद ( तलाक ) आदिके त्रयको भी शुरू हो जानेसे समाजका अङ्गभङ्ग ही होगा । अधिक स्पष्टता • किसी अन्य पुष्पमें होगी । भेद.... श्रीसीताकी विवाहावस्था के प्रसङ्गसे कन्याविवाहावस्थाका विषय, न चाहते हुए भी कुछ विस्तीर्ण हो गया है । एक ही स्थान गृहात् ॥ ...... पूरा विषय आजानेसे सभीको सुविधा रहती है । अब इसे निगृहीत समाप्त करके ' कण्टकशोधन ' दिया जा रहा है, पाठक उसे भी तृतीय श्र ध्यानसे. देखें;. उसमें भी विचारणीय अनेक विषय पढ़नेको मिलेंगे । अन्तमें इस विषय में इतना याद रखना चाहिये कि-स्त्वियात् इ ' अष्टवर्षा भवेद् गौरी ' का यह भाव नहीं कि- २-३ वर्षकी वा ६-७ साम वर्षकी लड़की का विवाह कर दिया जावे । ऐसा कभी नहीं । नऽस्या १-६ इसका तात्पर्य तो यह है कि - १२ वर्षके लगभग लड़कीका विवाह ||| CC - 0. Ankur Joshi अष्टवर्षा भवेद् गौरी । [ ३२८ ऋतुकालसे पूर्व होजाना शास्त्रीय है । यदि गुणवान पति मिलने में देरी भी हो जाय, वा परिस्थितिवश विलम्बके अन्य कारण बन जाएँ; तब कन्या के पिताको शास्त्रीय प्रायश्चित्त गोदानादि वा दक्षिणादि दान कर लेना चाहिये । ' गौरीं ददन्नाकलोके ' आदि वचन ऋतुकालसे पूर्व विवाह करनेके श्रर्थवाद हैं, ऋतुकालमें अविवाहिता लड़कीके बिगड़नेकी वा कई प्रकार के गर्भाशय के कठोर होनेसे भीतरी रोगोंकी जो कि भाविपतिकी भी हानि करनेवाले होते हैं, आशङ्का रहती है; इसलिए ' न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी ' इस कहावत के अनुसार अपने वा अपनी लड़कीके परित्राणार्थ उक्त वचनोंकी चरितार्थता है । अत्र कष्टक-शोधन देखिये । Collection Gujarat. कण्टकशोधन ( ११ ) भ्रान्त पथिक हमने ' आलोक ' ( ७ ) में दयानन्दी - पथिकके नोचीवि, पर विवेचन दिया था; उसपर उसने कुछ लिखा है । उसमें उसने अपने पक्षकी सिद्धिमें अन्य दयानन्दियों एवं सुधारकाभासोंके साध्य वचन देकर जो कि उसकी सदाको प्रकृति रही है, अपनी पुस्तककी तोंद बढ़ा दी है । यदि उन वचनोंको जो स्वयं साध्य हैं, उस पुस्तकसे निकाल दिया जाय, तो उसकी वह पुस्तक दो फर्मोंकी भी कठिनता से बनेगी । पुस्तक ' वै. सि. मातण्ड ' नामसे है । इस नामका पथिकके An eGangotri Initiative

पृष्ठ 180

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३२६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ९ ) तथाकथित ऋषिके ' बेदविरुद्ध मतखण्डन ' के ढङ्ग से खण्डन यह है कि- ' वैदिक - सिद्धान्त ' प्रकाशरूप है, वा स्वभावसे अन्धकार-रूप? प्रकाशस्वरूप हो; तो सूर्यके तुल्य स्वयं प्रकाशरूप होने से ‘ मार्तण्ड ' नामक पुस्तक देखनेके अर्थ सूर्यकी अपेक्षा न होवे । सूर्यप्रकाशकी अपेक्षा बिना ही कार्य सिद्ध कर सके; सो सम्भव नहीं । स्वभावसे वैदिक - सिद्धान्तमें अन्धकारस्वरूप होना द्वितीयपक्ष भी ठीक नहीं; क्योंकि स्वभावसे ही अन्धकारस्वरूप हो; तो सूर्यसे भी उसका प्रकाशित होना असम्भव हो जावे । इसी प्रकार ' वै. सि. मार्तण्ड ' का भी खण्डन जानो । अतः इस पुस्तकका नाममात्र भी शुद्ध नहीं है, ग्रन्थके अशुद्ध होने का तो कहना ही क्या है ' ( शताब्दीसं पृ. ८१२ ) यदि यह स्वा. द. जीकी युक्ति वा शब्द ठीक हैं; तो पथिककीं पुस्तकका नाम गलत सिद्ध हुआ । तब वह उस वेदविरुद्ध गलत नामको हटा दे । यदि स्वाद जी की युक्ति वा यह शब्द ही गलत हैं; तो स्वा. दु.जी भी गलत शब्द वा गलत युक्तियाँ देनेवाले सिद्ध हो गये, तब पथिक स्वामीके इन शब्दोंका खण्डन करके अपनी पुस्तकके नामका समर्थन करे; और स्वा, द. जीको अपने ग्रन्थों में गलत युक्तियां देनेवाला सिद्ध करके अनाप्त सिद्ध करे; और उनके मतको मानना बन्द करे । इस पुस्तकके सम्पादक हमारे ' विद्यार्थी ' जीने लिखा है कि-' नी.श्री.वि. ' का पं ० माधवाचार्यजीने कोई उत्तर नहीं दिया ' । पहले तो हमने ही आलोक ' ' ( ७ ) में उसका प्रत्युत्तर दिया था, CC - 0. Ankur Joshi Collection भ्रान्त पथिक । [ ३ कैसी वह अकाट्य पुस्तक थी कि उसका प्रत्युत्तर ही न हो सके पं ० माधवाचार्यजीने भी ' लोकालोक ' के शङ्कासमाधानाने । थ परिशिष्ट में उसका प्रत्युत्तर दे दिया है । समय न मिलने ह पर यदि दे कोई उसपर कुछ न लिख सके; तो क्या यह कहा जाये कि उससे उसकी सामर्थ्य ही नहीं? वाह!!! थ फिर ' वै. सि. मा. ' के प्रत्युत्तरके सम्बन्धमें हमारे विद्या तोउ जीने हमारे लिए लिखनेकी कृपा की है कि- ' इसका अवलोकन वय शास्त्रीजी भी कभी लेखनी उठानेका दुःसाहस नहीं की च कदाचित् यह इस कारण लिखा गया है कि वह पवि संस्कृत - साहित्यका अप्रतिभट विद्वान् समझता हो; पर ये श ‘ विद्यार्थी ' जीकी आशा ‘ शल्यो जेष्यति पाण्डवान ' की मानि दुराशा है; अथवा यह अपने प्रचारका उपाय सोचा गया हो । उन अस्तु! जो हो; अब हम वह ' दुस्साहस ' शुरू करते हैं । विद्यार्थी छो जी भी उनकी आशा झुठलानेकी हमें क्षमा देंगे । वादीकी पुस्तक में अपना तो प्रायः कुछ रहता नहीं था भगवान्‌की उसपर बड़ी दया ही रहती है; हाँ, उसमें धन श्री दयानन्दियों एवं सुधारकोंका मतसंग्रह रहता है; अतः उसे इस खण्डनसे उन सभीका निराकरण हो जावेगा; यह, तथा इससे इस बहुत विषय आगये हैं - यह सोचकर हम इधर प्रवृत्त हो रहे हैं । दुर पाठकों को एक ही स्थान सब प्रकारकी मनोरञ्जनकी सामई प्रव मिल जावेगी । नह १ स्वामीजीकी दो जातियां जो प्रसिद्ध थीं, हमने लिख डा Gujarat. An eGangotri Initiative