सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 181–190
सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 181–190
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[ श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) ३२८ हो सके । थीं । हमने उसमें स्वामीका कापड़ी होना वा औदीच्य ब्राह्मण धानाने होना, जो दूसरोंका मत था; वह दे डाला था । बादीका आग्रह पर यदि देखकर हमने उन्हीं लोगोंका उसपर अनुसन्धान भी दे दिया कि उसने था; वादी उसपर चुप रहा । यह व्यक्तिगत बात है; अतः हम उसपर अधिक लिखकर उसे महत्त्व देना नहीं चाहते । अच्छा विद्या तो यह था कि - वादी उनको कापड़ी मानकर अपने ' गुणकर्मणा लोकन वर्ण: ' सिद्धान्तको पानी देता; पर यदि वह इस सिद्धान्तके करेगे । चकनाचूर होनेकी पर्वाह न करके स्वाम को ' औदीच्य ब्राह्मण ’ पथिको बड़े धड़ल्ले से मानकर ' जन्मसिद्ध वर्ण - व्यवस्था ' को, अपने पर वह शब्दों में ' पौराणिकता ' को प्रश्रय देता है; तो बधाई हो । की मानि अधिक कुछ कहा जावे; तो दयानन्दी पथिक स्वामीजीसे गया हो । उत्तराधिकार में प्राप्त गालियाँ देता है; अतः हम वैयक्तिक चर्चा । विद्यार्थी छोड़कर शास्त्रीय वातोंपर विचार करेंगे । ( ख ) श्री. द. त्रिपाठीजीने वादी के एक लेखपर कुछ लिखा नहीं था; तव मैंने उनकी ओरसे वादीका खण्डन किया था; तो फिर = समें श्रम श्रीत्रिपाठीजी को लिखनेकी आवश्यकता नहीं थी । वादीने तः उसे इसका अभिप्राय उनकी उत्तर में असामर्थ्य दिखलाया; और तथा इससे हमारे लेखपर कुछ कुतर्क लिखे । तब श्री त्रिपाठीजीने वादी की हो रहे हैं । दुराशाके दमनार्थ मेरी और अपनी दोनों ओरसे वादीका 7 साम प्रवल निराकरण किया; तब मुझे पृथक् लिखनेकी आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि - वादीका वाद श्रीत्रिपाठीजीसे चला था; लिख डा अतः उपसंहार भी उन्होंने ही करना था । वादीने ' सिद्धान्त ' के वे CC - 0. Ankur Joshi Collection भ्रान्त - पथिक । [ ३२ ९ अङ्क उनसे मँगाये थे कि ' मैं उनका प्रत्युत्तर दूँगा ' । पर बेचारी उसकी लेखनीने जवाब दे दिया; सिर झुक गया । चुप लगा गये । अब उस लेखपर यदि वादी लिखे; तो हम बैठे ही हैं, सम्भाल लेंगे । वहानेवाजीका क्या लाभ? पर उस पूरे लेख पर लिखना होगा । ( २ ) ' क्या महीदास शुद्र थे '? यह लेख मैंने ' वैदिक - धर्म ' ( ३० । २ फर्वरी ४६ ) में दिया था । उसपर ' क्या ऋषि महिदास ब्राह्मण थे? ' यह पथिकका लेख उस पत्रके ( ३१३ मार्च ५० ) अमें छपा । उसमें आर्यसमाजियोंकी सम्मतिके सिवाय कुछ भी नहीं था । हमने उसके प्रत्युत्तरमें ' श्रीमहिदास शूद्र थे? " यह लेख उसी के ३११५ ( मई ५० ) अमें प्रकाशित किया । इसपर पथिक चुप्पी लगा गया । ( ख ) मेरा ' क्या ऐलूष कवष शूद्र थे? ' यह लेख ' वैदिक-धर्म ' ( ३१।२ फर्वरी ५० ) में निकला । इसका प्रत्युत्तर पथिकने ' वैदिक - धर्म ' में न देकर - जिससे मुझे पता न लग सके - ' ऋषि कवष इलूषका वर्ण निर्णय ' शीर्षकसे ' सार्वदेशिक ' ( ३१।१ अप्रेल ५० ) में दिया । यह अङ्क अचानक मुझे मिल गया । उसका प्रत्युत्तर मैंने ' वैदिकधर्म ' में तुरन्त छपने भेजा; पर उन्होंने उसके छापने में बहुत देरी कर दी । अन्तमें वह उसके दिसम्बर १ ९ ५६ में निकला । पर हमने उससे पूर्व ही उन दोनों प्रत्युत्तरात्मक लेखोंको अनेक प्राचीन प्रमाणोंसे पुष्ट करके ( वैशाख सं. २०१० ) में ' आलोक ' के ३ य पुष्पमें छपवा दिया था; पर वादी उन दोनों ही Gujarat. An eGangotri Initiative
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३३० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) लेखों का शक्तिवश प्रत्युत्तर न दे सका । हमने उसे पत्र द्वारा पूछा भी कि कदाचित् उसने अन्य पत्रोंमें उसका प्रत्युत्तर दिया हो । क्योंकि यह उसकी प्रकृति है, जिस तटस्थ पत्रमें उसका लेख छपा हो; यदि हमारा भी उसी पत्र में प्रत्युत्तर निकल जावे, तब वादी उस पत्रको छोड़कर अन्य पत्रमें उसपर कुछ लिख देता है, जिससे हमें पता न लगे; और फिर उल्टा उलाहना भी दे दिया करता है कि इन्होंने हमारे लेखका उत्तर नहीं दिया; पर उसने अपने श्रा. शु. १० रवि २००८ के पत्र में मुझे लिखा था कि मैंने आपके इन लेखोंपर कुछ नहीं लिखा ' । पर अब वह अपनी झूठी डींग मार रहा है कि- मेरे लेखपर शास्त्रीजीकी लेखनी न चल सकी । यह लिखकर स्वामी-जीकी भाभू. के निम्न वचनको चरितार्थ कर रहा है - ' ये चानृतवादिनः, अनृतकारिणः; अनृतमानिनश्च, ते मनुष्या असुरा एव ' ( पृ. ३३० ) ' जो अविद्वान् झूठ बोलने, झूठ मानने और मिथ्याचार करनेवाले हैं, वे असुर कहाते हैं ' ( पृ. ३३२ ) । ' जो - जो मनुष्य स्वार्थी... तथा कपट छल आदि दोषोंसे युक्त हैं, वे ' असुर ' कहते हैं ' ( पृ. ३३२ ) इस पदवीको प्राप्त करनेमें सफलता प्राप्त कर ली मालूम होती हैं । इस उन्नतिपर उसे वधाई! सम्भवतः एक वार उसने वैदिक - धर्म ' में स. प्र. ३ य समुल्लासकी व्याख्या में इस विषय में लिखने की कुछ चेष्टा की थी; उसमें भी. ' वही ढाकके तीन पात ' वाली कहावत चरितार्थ कर दी । केवल सुधारकाभासों वा आयसमाजियोंका उसमें CC - 0. Ankur Joshi Collection ब्रह्मापर प्राक्षेप । [ ३३ ९ ३६ अनुमोदन दिखला दिया । महिदास वा कवषके शुद्रत्वमें प्राचीन प्रमाण कुछ भी नहीं लिखा । अतः वह तो व्यर्थ ही है । अपने पीछ ही व्यक्तियोंकी साध्य सम्मतियोंका भला क्या मूल्य? आप श्रर ( अ भी हमने उससे पत्र द्वारा यह पूछा था; पर ' उत्तर देनेका समर नैक मेरे पास नहीं है ' यह कहकर टाल गया । ( म दयानन्दी पत्र वहुतसे हैं; अत: यह लोग जहाँ चाहें, श्रम नही लेख छपवा सकते हैं; और वे हमारे पास श्राते भी नहीं; सह कारण हमें क्या पता लग सकै कि — पथिकका म कहाँ निकला । हम उसे प्रेरणा करते हैं कि जिस पत्रने वह होग हमारे विरुद्ध लेख छपवाये; वह पत्र हमें भिजवा दिया करे । लिए जिस अप्राप्य पुस्तकसे वह कोई नई युक्ति लिखे; उसे में उस हमारे पास भेज दिया करे, तो हम पथिकको विश्वास दिलाने कि-हैं कि - समय प्राप्त करके हम उस पर अवश्य प्रत्युत्तर दे, किर कारण यह है कि — यह लोग पृर्वोत्तर - प्रकरणको छिपाकर श्रम ( पृ. व्यवहार किया करते हैं; छोटेसे लेकर बड़े तक सभी दयानन्दी तत्त्व इसी असत्य प्रकृतिमें ओत - प्रोत हैं । सो इन लोगों का प्रलुख प्रजा दे देना कुछ कठिन नहीं होता । यह प्रेरणा करके अब सम आगे लिखना प्रारम्भ करते हैं । स्थान न होने से हम पृथ पृथक् शीर्षक नहीं देंगे । विश्व ( ३ ) ब्रह्माका अपनी पुत्रीसे व्यभिचार, ब्रह्माका वीर्यपात श्रतिव दोनों विषयमें ' आलोक ' ( ७ ) में जो आलोचना हमनें दी है क उसपर वादी कुछ भी लिख नहीं सका । पुराण में ब्रह्मा का पुत्र Gujarat. An eGangotri Initiative
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३३ श्री सनातनधर्मालोक ( १ ) ९ ३३२ / में प्राचीन पीछे तो आया है, जो कि - ' कामः प्रथमो जज्ञे नैनं देवा भागना । अपने पितरो न मर्त्याः । ततस्त्वमसि ज्यायान् विश्वहा महान् ' -? श्रर आपुः ( अथर्व. ६।२।१६ ) इस श्रुतिके तथा ' मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा का समर नैकशय्यासनो भवेत् । बलवान् इन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षैति ’ ( मनु. २।२१५ ) इस स्मृतिके वचनका अर्थवाद है, पर व्यभिचार हैं, अपने नहीं दिखलाया गया । अतः वादीका यह असत्य व्यवहार है । नहीं; हाँ, वेदमें वैसा कुछ आभास दीखता है । जैसे कि -'स्वायां देवो नरुद्ध हे दुहितरि त्विषिं ( रेतः ) धात् ' ( ऋ. १२७१५ ) सो जो वहाँ अर्थ होगा, वही पुराण में भी हो जावेगा । जब बादी उसपर कुछ या करे । लिख ही नहीं सका; तब उसपर हम क्या लिखें? स्वा. द. जीने उसे भी उस ब्रह्मा वाली सारी कथाको सूर्यपरक ही लगाया है; कहा है स दिला कि - ' अस्याः कथाया अलङ्काराभिप्रायत्वात् । तस्यामुषसि दुहितरि उत्तर दो किरणरूपेण रूपेण वीर्येण सूर्याद् दिवसस्य पुत्रस्योत्पन्नत्वात् ' श्रत ( पृ. ३१७/१६ ) । स्वामी से पूर्व श्रीकुमारिलभट्टने भी इस कथाका दयानन्दी तत्त्व यही बताया था । तब उस पर कलङ्क कुछ भी न हुआ । का प्रमुख प्रजापति वा ब्रह्मा यहाँ सूर्य ही सिद्ध हुआ । यह वादीकी चाल अब समाप्त हो गई । हम पृथ ( ४ ) ऋष्यशृङ्गका वेश्यागमन तो वादी सिद्ध न कर सका; शेष विश्वामित्रका उत्तर हमने भविष्यपुराणसे ही दे दिया था । पात तव अब पुराण अप्रमाण कैसे हो गया? यह वादीकी प्रकृति दी है कि जिस पुस्तकसे वह आक्षेप करता है; और हम उससे का छिपाये हुए पाठको प्रकट करके उसका जब उत्तर देते हैं; तब CC - 0. Ankur Joshi भ्रान्त पथिक । [ ३३३ वह उस पुस्तकको अप्रमाण कहने लग जाया करता है, अथवा वहाँ प्रक्षिप्तताका बहाना कर देता है । इससे इन लोगोंका • निर्वाह होता जा रहा है । पर विद्वानोंकी दृष्टिमें इसी से इनके पक्षकी दुर्बलता प्रकट है । विश्वामित्रके कुकमंसे क्या स्वामीके कुकर्मका समाधान हो जायगा? ऐसा हो तो बधाई हो । - वाल्मी. रा. में लिखा है- ' महर्षयो धर्मतप्रोभिकामाः कामानु-कामाः प्रतिबद्धमोहाः ' ( ४।३३।५७ ) इसका अर्थ वादी श्री अखिला-नन्द भरियाका देखे - ' धर्म - तपश्चर्यासे अलंकृत, मोहादि विकारोंसे निर्धूत महर्षि लोग भी कामासक्त देखे गये हैं ' ( पृ. ८८७ ) । इसी प्रकार ' घृताच्यां किल संसक्तो दशवर्षाणि लक्ष्मण! अहो-मन्यत धर्मात्मा विश्वामित्रो महामुनिः ' ( ४ | ३५२६-७-८ ) यहाँपर भी सूचित किया है । मनुजीने तपस्यासे पापका फल दूर हो जाना लिखा है- ' महापातकी और शेष उपपातक वाले तपके अनुष्टानस उस पापसे छूटते हैं ' ( १११२३६ ) मनुष्य मन, वाणी, कामसे जो कुछ पाप करते हैं, उन सबको तपस्वी लोग तपस जला देते हैं ' ( ११।२४१ ) । यह सब उदाहरण स्वा. द. जीकी संस्कारविधि में लिखे हुए इमं ते उपस्थं मधुना स ँ सृजामि, प्रजापतेर्मुखमेतद् द्वितीयम् । तेन पु सोभिभवासि सर्वान् अवशान् वशिनी असि राज्ञी ' " ( पू. १३५ ) इत्यादि ' मन्त्रब्राह्मण ' के तीन मन्त्रोंके अर्थवाद हैं । इंस इन मन्त्रोंका अर्थ एक आसमाजी विद्वान् गुरुकुलस्नातक श्रीरामगोपाल विद्यालंकार द्वारा बनाये हुए ' संस्कार - प्रकाश ' Collection Bujarat. An eGangotri Initiative
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३३४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( e ) हासानन्द कलकत्ता प्रकाशित ) से दिखलाते हैं; ( गोविन्दराम वादी यह न कह सके कि आपने गलत अर्थ कर दिया । जिससे वह अर्थ यह है- ' हे काम, तेरा नाम सब जग जानता है । तू -जगमें मदकारी प्रसिद्ध है । यह कन्या तेरे मद करनेका एक साधन है । इसकी तू प्रतिष्ठा कर । हे कामाग्नि, तेरा उत्कृष्ट जन्म इसी स्त्रीजाति में हुआ है ।... हे स्त्री, तेरे उपस्थैन्द्रियको प्रेम से युक्त करता हूँ ।... तू इसी [ उपस्थेन्द्रिय ] के द्वारा वशमें न होनेवाले पुरुषोंको भी नीचा दिखाती है 1... तू सबको वशमें करनेवाली है । तत्त्वकी खोज करनेवाले पुराने अनुभवी ऋषियोंने स्त्रियोंके उपस्थेन्द्रियको मांस खाने वाले अग्निके समान बतलाया है ' । हमारे लोग किसीका गुण - दोष - छिपाते नहीं थे; पर वादी लोग छिपाते हैं, बल्कि दोष बतानेपर गालियाँ देनेपर उतारू हो जाते हैं । ( ५ ) त्रिदेवोंके वादीसे दिये हुए चरित्रके ' स्वकीयां च सुतां ब्रह्मा ' इस भविष्यपुराणके पद्यमें हमने सुता, माता, भगिनी आदिकी परिभाषा ' सत्त्वभूता च भगिनी ' आदि भविष्यपुराणके पद्यसे ही दे दी थी, उसपर वादी चुप हो गया । ( ख ) ' बोधप्राप्ति ' होनेपर भी स्वामी में भांगके व्यसनका समाधान वादी कुछ न कर सका । 5 ( ६ ) ' मधु, मैरेयकं शुचि ' में ' शुचि ' विशेषणसे वहाँ विशुद्ध मद्य बताया गया है; तब ' ब्राह्मणेन नात्तव्यं ' इस मनुपद्यमें ' अशुचि - मद्य'का तथा निषिद्ध मांसका यदि निषेध है; तो ठीक CC - 0. Ankur Joshi Collection मधु आदि पर विचार ३३६ है; वहाँ भी ब्राह्मणको ही निषेध कहा है । श्री माधवाचार्य जो अर्थ वादीने दिया है, वहाँ ' ब्राह्मणको ' यह प्रूफकी ६ छूट गया है । क्योंकि मूलमें जब ब्राह्मण शब्द है तो शुि खजूर भी ' ब्राह्मण ' शब्द होगा ही । श्रीतुलसीराम स्वामीने मी लि जब व है- ' देवताओंका हवि खानेवाले ब्राह्मणको सुरा आदि भी तब व मद्य व करने चाहियें ' । तब क्षत्रियका बादी द्वारा दिये मनुते । पद्यसे निषेध कट गया । सकता होने स शुद्ध - मद्य सोम, आसव, अरिष्ट आदि हैं; उनका श शास्त्रव निषेध नहीं । देखिये वेदमें - ' मद्य ं मदम् ' ( साम. उ... प ‘ मादनः ’ ( ६ | १ | ३ ) ‘ सिश्चता मद्यमन्धः ' ऋ (. २/१४१ ) हे । ग सह गच्छति ' ( साम. पवमान. ) ' त्यं मद्य ' मई भी मह ( ऋ. ६।६।२ ) ' यस्य ते मद्य रसं ती दुहत्ति अद्रिमिः ( के लिए ६।६५।१५ ) ' सुरा त्वमसि शुष्मिणी ' ( बलकारिका ) ( यजु, वेदाङ्ग .१६ / ७ ) ' सोमश्च सुरा च देवहितम् । इति देवहिते होते ( मैरेये ' । १२ । ७ । ३ । १४ ) ' सुरायां च यदू ( वर्चः ) श्रहितम् । हुआ है A अश्विना! वर्चः, तेन इमामवतम् ' ( अ. १४ | १ | ३५ ) ' मदिरमय हो .. ( साम. उत्त. ७ ३ ३ ) ' सोमं पिबतं मद्य " ( ऋ. ६/६८ १० ) हमसे असिञ्चतं मधूनाम् ' ( ऋ. १।११७ / ६ ) ( कुम्भान् प्रसिश्चतं आसव-१।११६ | ७ ) ' अन्धो मद्य ' ( ऋ. ७६२१ ) ' मधु ' तो वेद में भातास पड़ा है । सो जो अर्थ उसका वेदमें होगा; वही श्रीराम स्वा बलराम के शुद्ध मधुपान में भी होगा । उनमें भी वादी तेप व ' शराब ' अथ क्यों करता है? सका Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( E ) ३३६ ] वाचार्यजी ' मधु मैरेयक'का भाव मीठा नीरेका रस है । फकी त्रुि वस्तुतः तनोंका रस निकालते हैं; उसे बोतलोंमें भरा जाता है; तो " श्री " खजूरके . ताजा होता है; तो मीठा होता है । बहुत घण्टे हो जावें; ने भी लि जब तब वह वह खट्टा हो जाता है । जब बहुत दिन सड़ाया जावे; तो दि भक्षणा बन जाता है; वह शुचि हो जाता है; उसका निषेध हो मद्य मनुके सकता है । पर यहां शुचि और मधु यह मैरेयकके विशेषरण होनेसे यहाँ ताजा नीरेका रस विवक्षित है, उनमें किसी भी उनका शास्त्रका निषेध नहीं । अव देखिये- अंगूरका रस हरएक पीते उत्त, ४ है; पर उसका बहुत दिन तक सड़ाया गया रस मद्य बन जाता ४१ ) है । गुड़का रस भी पीया जाता है, लाभप्रद होता है; पर उसका मर्द... मी मद्य सड़ा कर बनाया जाता है । सो मद्यका भले ही ब्राह्मण-द्रिभिः एकेलिए निषेध हो; पर इन रसोंका निषेध नहीं । मैरेयका तो ( यजु. वेदाङ्ग व्याकरणकी स्वर - प्रक्रियामें भी वर्णन आता है- ' अङ्गानि - होते ' ( मेरेये ' ( पा. ६२/७० ) ' मधुमैरेय: ' इनके उदाहरणमें प्रद्युदात्त न्हुआ है । सो वहां शुद्धता होनेसे दोष नहीं 1 । वैसे तो अन्नमें भी ' मदिरं मद्य होता है, यवकी सुरा भी मानी जाती है । चरक संहिताके ८ ( १० ) हमसे दिये वचन पर तो वादी चुप्पी ही लगा गया । आयुर्वेद के सितं आसव - अरिष्ट आदि गृहस्थी पीया ही करते हैं । क्या वादी वेद में माक्षासव, लोहासव नहीं पीते? 7 श्रीराम स्वा. द. के स. प्र. प्रथम संस्करण में स्वामीने ' श्राद्ध ' का ही वादी प्रतेप बताया था; सारेको बहिष्कृत नहीं किया गया था; छातः सका तथा प्रथम - संस्कारविधि आदिका भी प्रमाण दिया ही CC - 0. Ankur Joshi प्रान्त पथिक । आ सकता है । पीछे स्वामीका कई बातों यह तो सम्भव है । यदि वे अव होते; तो स.प्र. को भी परिवर्तित कर देते । स्वा. द. के भङ्गापान पर हमने लिखा [ ३३० मत बदल गया हो; अब इस वर्तमान-सम्मति दे दी । ' मांस ' शब्द था; उसपर वादीने १६२/१३ ) वेदमें ' मांस ' ( ऋ. १११६१।१०, ( अथर्व, ४१२४, २६५, १५; ६४७०/१, हादा, ६६७; १०/२/१, ६ १८, १ ९ / १० / ११-१२ ८६२३, ' मांसवान् ' ( १८ | ४ | २० ), मांसस्य ( ४/१२/३, १८४१४२ ) १-२-३-४-५-६-७-८ ) मांसानि ( ४२४ , ११/३/७, १२/११८ ) मांसे ( १ | ११ | ४, ४/१७४, ५/३१११, यजुः २५/३२, १६/८१, २०१३ ) आदिमें आता जो उसका अर्थ वेदमें करेगा, वही है, चादी ' खजूर ' श्रादिके रामायण में भी हो जावेगा । ऊपरके भागको भी ' मांस ' कहा जाता है । जैसे - ' ' खजूरमांसान्यथ ' । ' सुरया सोमः ' का वादीसे दिया हुआ स्वा. द. जीका ' उत्पन्न होती हुई क्रियासे उत्पादित ' यह अर्थ बनावटी है, जो चाहो अर्थ करते जाओ कर दिया गया , पूछने वाला फौन है? फिर च्याक्षिप्त पौराणिक स्थलोंमें भी वैसा अर्थ क्यों नहीं करते? ' ( ७ ) ' यथा मांसं यथा सुरा ' मन्त्रका उत्तरभाग वृषण्यत्तः ' को वादीने छिपा लिया ' यथा पुंसो था । हम द्वारा लज्जित किये जानेपर उसने उसे कुछ श्रच लिखा; अब फिर उसका ‘ एवा ते अघ्न्यै! ‘ मनोभिवत्यें निहन्यताम् भी शेष फिर छिपा ' यह ' अंश ' वादीचे दिया । तब उसको अर्थं गलत क्यों न हो? ' यथा पुंसो स ० घ ० २२ Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) ३३८ ] वादीने ' उसी प्रकार पुरुषका मन ' कर वृषण्यतः ' का अर्थ उसने कैसे कर लिया? दिया । ' यथा'का ' उसी प्रकार ' अर्थ है? ' सर्व जैसे चाहा, अर्थ कर दिया, कौन दयानन्दी पूछता मण्डलम् ' । ' एवा ' में जो ' उसी प्रकार ' अर्थ था, उसे वादीने वै... इनको कोई भला मनुष्य न करे ' यह छिपा लिया । ' इस कारण उक्त मन्त्र के किसी पदका नहीं । ' वृषण्यतः ' का वादीका किया ही नहीं । ' निहन्यते ' का अर्थ ' जाता है ' है, अर्थ वादीने किया ' मारा जाता है ' नहीं । इसीके अन्तिम भागमें ' गाय के मनका बछड़े में ' जाना ' कहा है, ' मारा जाना ' नहीं । दोनों उपमान-उपमेयका साधारण धर्म ' निहन्यते, निहन्यताम् ' है । इनका समान ही अर्थ होगा । पर वादी अर्थ करनेके अवसर पर श्रुतिसे बलात्कार करता है । खेद!!! ( ख ) वैदिक - निघण्टु ( २।१४ ) में ' गति ' अर्थवाली धातुओं में ' इन् ' धातुका तो प्रयोग है । मारने अर्थ वाली धातुओं में निघण्टु ( २/१६ ) में ' इन् ' धातुका प्रयोग नहीं, यह वादी याद रख ले । स्वा.द.जीसे प्रकाशित वैदिक निघण्टु भी देख ले । इससे उसका पक्ष गिर गया । ( ८ ) वादी स्वा.द.को ' वेदमन्त्रद्रष्टा ' होनेसे ' महर्षि ' मानता है, वे कौनसे मन्त्र हैं, जो लुप्त थे, और उन्हें स्वामीने समाधिद्वारा प्रकट किया? अतः यह वादीका असत्यवाद है । यदि वादीके अनुसार मन्त्रार्थं करनेसे जयदेव आदि भी ऋषि हैं; तब आप लोग उनके साथ ' ऋषि ' का प्रयोग क्यों नहीं करते? श्रीसायणाचार्य CC - 0. Ankur Joshi Collection ऋषि ' ' पर विचार | आदिको वेदार्थ करनेके कारण ऋषि क्यों स्वाद और जयदेव आदि आजकलके सभी नहीं कहते है... उपजीव्य है? यदि जयदेव क्षेमकरण आदिको भाष्यकार भी आप कहते हैं, तो स्वा. दु. के ऋषित्वमें कोई विशेषता शौनकादि ऋषियों में बहुतसे मन्त्रद्रष्टा थे ही । वादीकी नहीं रहीं । द्रष्टा शौनकजी ही थे । तभी इसे ' शौनकसंहिता अथर्व कहा जाता है । वेदोंके एक लक्ष मन्त्र माने जाते ' श्र सभी ११३१ संहिताएं ही मिलकर चार वेद बनते हैं; क्योंकि एक भी मन्त्रका द्रष्टा हैं । जब सो ' ऋषि ' कहाता है; तब पद सहयो ऋषित्व में क्या कठिनता है । वादी कोई प्रमाण बतावे हि मन्त्रद्रष्टा नहीं थे । कहीं यदि किसी प्राचीनको " होने पर भी पूज्यतावेश ' ऋषि ' कह भी दिया गया मन्त्रद्रष्टा श्रयास्क हो; जैसे कि ६ आदिको; तो उससे आजकल के बहुत अशुद्धियों तिथा छल - वलसे मलिन स्वामीको ' ऋषि ' कहनातो व्यर्थ । ६ बात है, ' कहाँ राजा भोज और कहाँ भोजुच्या तेली ' टण्डन ' जी तथा ' ' अपने स्वा.द.को ' वाला वास्तविक नहीं; तब स्वा. द. ' । ' ऋषि ' ते श सातवलेकर जीको भी कहते हैं । उस रूपये ' ऋषि ' कहो; तो अन्य बात हैः मन्त्र - द्रष्ट्रत सृषित्व नहीं है । पाणिनि आदि भी जब श्री ह भला किस गिनती में हैं? ( ह ) वैदविषयक हमारी मीमांसाका प्रतिपक्षी कुछ भी उत् नहीं दे सकता । " हम इस विषय में पूरा निबन्ध श्रागे देने वाले Gujarat. An eGangotri हैं । उसमें Initiative दयानन्द सिद्धान्त - प्रकाश के पक्ष की अव्यवस्थिता में
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श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) ३४० ] दिखलाई है | हम यहां केवल एक ही बात वादी के सामने हमने कहते; रखते हैं । वह यह कि -निरुक्तमें श्रीयास्कने मन्त्र अनर्थक-वाष्यकार प्रकरण में ' प्रहारिण ' इति प्रोहति ' यह मन्त्र दिखलाया सार्थक आप वेदमें वादी न्यूनाधिकता नहीं मानता । इस पर वादी है? नहीं रही । ' जातिनिर्णय ' में श्री शिवशंकर काव्यतीर्थका कथन भी देख सकता अथ है । श्रव वादी बतावे कि - उसके वेदमें ' प्रोहाणि ' वाला मन्त्र ता ' कहाँ है? यह उसे चैलेज है । यदि वह वेदमें ; क्योंकि उसका तथा उसके सम्प्रदायका वेद - विषयक जब उसे यह वह स्वयं समझ ले । सहसि ( १० ) ' कृतकं चाभिधानम् ' ( २।१४ १२ बतावे कि वादीने व्यर्थ ही दिया है, उसकी सं. भी है, अथर्वसं. शौनकी संहिता है, इसी प्रकार जैसे कि कौथुमी संहिता - यह सभी शाखाएँ हैं । स्वा. द द्वयों में यही चार शाखाएँ चार वेदोंकी मिलीं, न दिखला सका; तो मत स्वयं कट गया-) यह भीमांसासूत्र तो ' शाकल्यसंहिता ' शेष माध्यन्दिनीसं., . जीको अपने समय-तो उन्होंने इन्हें ही व्यर्थ चार वेद मान लिया । यदि कारावसंहिता, पैप्पलादसंहिता आदि ' ऋषि ' शाखाएँ पहले उन्हें मिलतीं, तो वे उन्हें ही चार वेद मान लेते । उस रूपये उनमें कर्म एक है यह सिद्धान्त है । इन वादीकी शौनक-न्द्रत माध्यन्दिन आदि शाखाओं में भी ' कृतकं चाभिधानम् ' सूत्र वैसा जब श्री हो प्रवृत्त होता है । ...... महाभाष्यकार ने यह कहीं नहीं लिखा कि वेदोंकी चार भी संहिता हैं, किन्तु ११३१ सभी संहिताओंको उन्होंने चार वेद लिखा देने वाले है । वे सभी मिलकर मन्त्र- ब्राह्मण समेत चार वेद हैं । स्वा.द. यतता CC - D. Ankur Joshi Collection वेदोंकी संहिताएं । [ ३४१ जीके भी मान्य तथा वेदज्ञ महाभाष्यकारको अमान्य करना यह पथिकका दुस्साहस है । वेदसे ही तो जानकर भाष्यकारने वेदकी स्वरूपसत्ता बताई है । यहां महाभाष्यकारने वेदविरुद्ध कहाँ लिखा है? वादीने भी बेदका कोई प्रमाण उपस्थित नहीं किया था; केवल स्वा.द. जीका नामभर लिख डाला था; तब महाभाष्यक मुकाबले में स्वा. द. ... वादीने जो चार वेदोंके यह महाभाष्यमें कहां हैं? भाभू में अथर्वा श्रादिम त्रिषता: नहीं; तब वादीका कितना निकम्मा प्रश्न है कि-किसकी हैं? महाशय, मूल जीका मत मान्य नहीं हो सकता । आदिम अन्तिम मन्त्र लिखे हैं. महाभाष्यने तथा स्वा. द. जीने मन्त्र ' शं नो देवी ' लिखा है, ' ये पक्ष कट गया । यह भी वादीका ११३१ शाखा वेदकी हैं; तो शाखाएँ नहीं दीखा करता है, वह मूल तो वेद ही है । सो वह कहीं पृथकूं नहीं मिला करता । शाखादि सभी अवयव मिलकर ही वृक्ष हुआ करता है । वस्तुतः मूल है-परमात्मा । उसीसे यह वेद - वृक्ष विकसित हुआ है; और वह परोक्ष है । आगे जो वादीने श्रीवैद्यनाथजीका मत लिख भर दिया है, उसकी प्रत्युत्तर वह आगे देखे । ( ११ ) ' कन्याओंकी प्रौढावस्था में विवाह पर जो गोभिल आदिके वचन वादीने ( पृ. ३०-३७में ) तथा ' कन्याके गर्भाधानकी वास्तविक आयु पर जो वचन ( पृ. ३८-४२में ) वादीने दिये हैं, उनका प्रत्युत्तर हम इस पुष्पमें पृ. ११४ से ३२५ पृष्ठ तक में दे चुके हैं । ( १२ ) मूर्तिपूजा - विषयमें स्वा. द. जीको चित्र ऊँचे स्थान पर Gujarat. An eGangotri Initiative
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३४२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) रखना सम्मानकेलिए होता है । स्वा. द. जीके वचन ' किसी जड़ पदार्थ के सामने सिर झुकाना वा उसकी पूजा करना सब मूर्ति -पूजा है ' ( स.प्र. ११ पृ. २३० ) ' पूजा ' का अर्थ स्वामी ' सत्कार ' मानते हैं — ' अभ्यर्चनं - सत्करणं कर्तव्यमिति ' ( ऋभाभू. शता. पृ. ६३६ ) ‘ देवताभ्यर्चनं ’ ……. ' वहाँ जाना, बैठना और उन लोगोंका सत्कार करना ' ( पृ. ६३ ९ ) ' पूजनं, पूजा, सत्कारः, प्रियाचरणम्, अनुकूलाचरणञ्च - इत्यादय: पर्याया भवन्ति ' ( भाभू. शता. प्र. ३४४ ) ' जो दूसरेका सत्कार, प्रियाचरण, इसीका नाम पूजा है " ( पृ. ३४५ ) इससे स्पष्ट हुआ कि पूजाका अर्थ सत्कार है । सो यह मृतक स्वा. द. जीके चित्रका सत्कार करना चाहे वह मानसिक ही क्यों न हो, वह मूर्ति - पूजा ही प्रतिफलित हुई । तो क्या वह स्वामीजी का कथन ' ऊटपटांग ' है? १७ नवम्बरको ला. लाजपतरायकी मूर्तिपर आर्यप्रतिनिधि सभा पञ्जाव; तथा अन्य समाजें, डी.ए.वी. कालेजका सारा स्टाफ पुष्प चढ़ाते थे, यह ' हिन्दी मिलाप लाहौर ' में प्रतिवर्ष छपता था; अब भी सम्भवतः ऐसा होता है ' इसपर वादी चुप्पी लगा गया । डेका भी वे अभिवादन करते हैं - यह सब मूर्तिपूजा है? इसपर वादी कहता है कि- " आपका यह ' वाग्जाल ' है " । जब वादी किसी बातका प्रत्युत्तर नहीं दे सकता, तो वहां ' वाग्जाल ' शब्द तथा ' ऊटपटांग ' शब्द लिखकर उस बातको टाल दिया करता है? यह पाठक जान रखें । अनुभवी जान जाते हैं कि - यह सब वादी-की ' यावज्जीवमहं मौनी ' न्यायकी चरितार्थता है । वेद तो स्वयं CC - 0. Ankur Joshi Collection मूर्ति - पूजा ३६ मूर्तिपूजाके उदाहरण हैं - यह वादी समझ रखे । वेदोंको १४ ' ईश्वरका ज्ञान ' मानते हैं, तो निराकार- ज्ञानके चार मन्दिर कृ ( कही पोथियाँ ) बनाकर चार मूर्तियोंकी अक्षरोंके प्रतीक साकार अक्षरोंकी उपासना की जाती है; उनश सम्मान, उनपर श्रद्धा आदि की जाती है, उनकी उपासन ब्रह्मका ज्ञान किया जाता है । सन् १६१५ में ला. मुन्शीर ( स्वा. श्रद्धानन्द ) जीने गुरुकुल काँगड़ी में वेद - सम्मेलनमें दे नम वर्ष पुस्तकोंको सभापति भी बना दिया था; यह सब मूर्तिपूजा है । स जब वेदग्रन्थ द्वारा ब्रह्मज्ञान करनेवाले वादी मूर्तिपूजक हैं । नहीं का वादी निराकार वेदसे निराकार ब्रह्मकी उपासना करे । साझा चैत वेद्रमूर्तियोंका अपने सिद्धान्तानुसार जलप्रवाह कर दे; ने अपने घर में न पधरावे, यदि वह मूर्तिपूजा नहीं मानता । * जब बुद्धदेवजीने स्वा. द. जीके चित्रपर पाँवकी ठोकर कर दी थी, तब आर्यसमाजियोंने बड़ा होहल्ला मचाया क यह बुद्धदेवजीने इसके लिए पश्चात्ताप भी किया था - यह सब यह पूजा ही तो है । इसी प्रकार सं. १६८० के लगभग महारा दि कृष्णके ' प्रकाश ' पत्रके ऋष्यङ्क में स्वा. द. जीका मुखपृष्ठ में चित्रक दूसरी ओर ' भल्लाके चूट ' का चित्र था; जो ठीक स्वाद. ' दे मुखपर दूसरी ओरसे लग रहा था; आर्यसमाजियोंने उस पूज महाशय: कृष्णको लोभी लालची कहकर खूब झाड़ा ६६ ' भविष्य में म. कृष्णने वैसा न करनेकी प्रतिज्ञा की, और दी माँगी । बुद्धदेवजी के स्वाद के चित्र पर पाँव रखनेपर महरा ( दे Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) ३४४ ] दोंको चा कृष्णजी ही ने बड़ा प्रबल विरोध किया था; यह सब मूर्तिपूजा न्दिर ( क ही तो है? ७ म पुष्पमें लिखे होनेपर भी वादीने इसपर कुछ न न निरा लिखकर मूर्तिपूजाके आगे सिर झुका दिया । है; उन वेद तो ' नमस्तेस्तु अश्मने ' ( अथर्व, १ | १३ | १ ) कहकर पत्थर उपासनाई ( अश्मा ) को भी नमस्कार कहता है, सिर झुकाना होनेसे . मुन्शीराम नमस्कार पूजा होती है; ' णम प्रहृत्वे ' । अश्मा यद्यपि यहाँपर निलन में के वर्षाके पत्थर ' ओले ' का नाम है; तथापि उसके उपलक्षण ना है । जड़ मानी जाती हुई सभी वस्तुओंको नमस्कार भी आ गई है । | नही कारण यह है कि यह वस्तुएँ ऊपरसे जड़ होती हुई भी वस्तुतः | साश चेतन हैं । यह बात ' सर्वस्य वा चेतनावत्त्वात् ' ऋषिः पठति-दे; ञं ' शृमेत प्रावाणः ' ( महाभाष्य ३।११७ ) में स्पष्ट है । श्रीयुधि०-न्ता । मीमांसकजीका यहाँ ' दुष्कृतं चरकाचार्यम् ' में ' चेतनवत् ' अर्थं ठोकर मर करना ठीक नहीं; यहाँ ' चेतनवत् ' नहीं है, ' चेतनावत् ' है, और चाया यहाँ ' वति ' प्रत्यय नहीं है, किन्तु ' मतुपू ' है, तभी तो भाष्यकारने सब यहां पर वेदका ' शृणोत ग्रावाणः ' ( पत्थसे सुनो ) यह प्रमाण महारा दिया है । में चित्र वेदाङ्ग व्याकरण में भी ' जीविकार्ये चापये ( पा. ५३६६ ) स्वा. दु.डी ' देवपथादिभ्यश्च ' ( पा. २३।१०० ) ' यास्तु एंता: [ मूर्तयः ] सम्प्रति उससमा पूजार्थाः, तासु भविष्यति, शिवः स्कन्दः इति ' ( महामाष्य शशस फाड़ा ६६ ) आदि कहकर वेदाङ्गने अपने मूल वेदमें भी मूर्तिपूजा बता और दी है । इसीलिए तत्त्वबोधिनी में भी लिखा है- ' यास्तु यत र महरा ( देवमन्दिरे ) प्रतिष्ठाप्यन्ते ' पूज्यन्ते. च, वासु उत्तरसूत्रेण लुप्ं । CC - 0. Ankur Joshi Collection मूर्ति - पूजा [ ३४५ तदुक्तम्- ' अर्चासु पूजनार्हासु ' शिवः, विष्णुः ' यह वृत्ति में लिखा है । स्वा. द. जीने भी ' ताद्धित ' में ' शिवः, विष्णुः, श्रादित्यः ' आदि उदाहरण दिये हैं । इससे संघ के पक्षकी सिद्धि हो गई । मन्दिरमें देवमृर्तिकी प्रतिष्ठापना वैदिक है इस विषय में ' आलोक ' ( ६ ) ( पृ. २२१-२२२ ) में हमने स्पष्ट किया है । आर्यसमाजियोंका हवन भी देवमूर्तिपूजा है । स्वा.द.जी ' वेदविरुद्ध - मतखण्डन ' में लिख गये हैं, " यत्र होमः क्रियते, तदेव ' देवालय ' शब्देन उच्यते ( कथम् ) होमस्य देवपूजा - शब्देन गृहीतत्वात् । ' होमो देवः ' ' होमैर्देवान ' [ अर्चयेत् ] ( मनुः ) होमेनैव देवपूजनं भवतीति मनुना उक्तत्वात् ।... अतो होम-स्थानं यज्ञशालैव ' ' देवालय ' शब्देन ग्राह्या इति निश्चय: ' ( शता. प्र. ७८६-८७ ) सो वहां प्रतिपक्षियोंके अनुसार तिथि - नक्षत्र आादियोंके जड़ देवतां अग्नि, वरुण, सोम आदियोंको हवि देकर उनकी पूजा की जाती है - सो यह भी मूर्तिपूजा प्रतिफलित - ( १३ ) हमने ' शार्ङ्ग ' एक चटका ( चिड़िया - पक्षिणी ) थी, यहू प्रमाण देकर बताया था । वादीने भी सनातनधर्मियोंके प्रमाण दिये हैं, जिनमें स्पष्ट रूपसे उसे चटका ( चिड़िया ) लिखा गया था । यहां वादीने अज्ञानियोंको तुष्ट करनेकेलिए वे वचन तो लिखा दिये, परन्तु जनताकी आंखमें धूल झोंक दी है । उनसे वह यह न सिद्ध कर सका कि वह मानुषी थी । वादी लिखता है तीनों पौराणिक पण्डितोंने शास्ङ्गी ( चटका ) को स्पष्ट स्त्री Gujarat. An eGangotri Initiative
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३४६ ] श्री सनातनधर्मालोक ( 1 ) लिखा है ' । ' जब वह चटका ( चिड़िया ) थी, तो वे क्या उसको स्त्री न लिखकर ' पुरुष ' लिखते? उसे उन्होंने मानुषी कहां लिखा है? क्या ' स्त्री ' मानुषीको कहते हैं? क्या पक्षिणियां स्त्री नहीं होतीं, क्या पुरुष होती हैं? यह है ' आगरा विश्वविद्यालयकी संस्कृत - परीक्षाकी उपाधिका परिणाम '!!! ' निकृष्टयोनिजा ' का अर्थ तो चिड़िया नहीं, पर पक्षिणी होनेसे वह निकृष्टयोनिजा थी । ' अक्षमाला ' तो सारस्वत ब्राह्मणकी वृक्षपर रहनेवाली लड़की नहीं थी; जैसा कि वादीने उपहास किया है, मनुष्य होनेसे वे वृक्ष पर क्यों रहें, और न ही वे उड़ती थीं, पर शार्ङ्गिकी तथा उनके बच्चोंका वृक्षपर रहना, तथा बच्चे होनेसे पंख न उगने से उड़नेकी शक्तिमें असामर्थ्य बताया है । इसपर भ्रान्त पथिकको कुछ उत्तर तो न सूझ पड़ा, केवल आक्षेपमात्र कर दिया । यह है ' आचार्यकी आचार्यता ' । तभी तो उसने एक ' काव्यतीर्थ ' को भी ' वेदोंका उद्भट विद्वान् ' लिख दिया | ' अक्षमाला ' को ' स्त्री ' होनेसे ' निकृष्टयोनि ' लिखा गया है; क्योंकि - पुरुषोंकी अपेक्षा निकृष्ट - कर्म होनेसे स्त्री बनती है; तभी तो स्वा. द. जीने भी स.प्र. में लिखा है- जो ' स्त्रीके शरीर धारण करने योग्य कर्म हों, तो स्त्री, और पुरुषके शरीर धारण करने योग्य कर्म हों; तो पुरुषकें शरीरमें प्रवेश करता है ' ( ६ समु. पृ. १५६ ) इनसे पुरुषके पतित होनेसे स्त्री वनना उनकी निकृष्टयोनिता बता रहा है । फलतः वादी हमारे किसी भी युक्ति - प्रमाणपर नहीं लिख सका । आगे ' हरिणीगर्भसम्भूतः ' उलूकी - गर्भसम्भूतः ' श्रादिपर वादीने कुछ CC - 0. Ankur Joshi Collection आचार्य प्रचारज । भी नहीं लिखा । शायद वह हरिणी और उलूकी ' कुशवाहा ' जातिकी स्त्रियां हों!! वादिमान्य मी ' वज्रमुभि उपनिषद्'में भी इन्हें जात्यन्तर - जन्तुयोंसे उत्पन्न माना है । " ( १४ ) ' आचार्य ' का अर्थ वादीने ' अचारज ' बताया यह लिखा कि- ' द्रोणाचार्य आदि क्या अचारज थे ' था, हमरे चुप्पी लगा गया । क्या कृपाचार्ये आदिको किसी विश्वविद्यालय इसपर दा उपाधि मिली थी? अब तो अपने आपको आचार्य लिख वाले ' पथिक ' जी भी ' अचारज ' बन गये । वधाई हो इस लिये दिन ( ६२ पर । पथिकजीके ‘ परमइस परिव्राजकाचार्य ' स्वा. विरजानन्न । ३३-३ तथा आचार्य स्वा.द.जी तथा आचार्य वैद्यनाथजी भी ' श्रजाय चर बन गये, इस उन्नतिपर बधाई! अब तो वे आगरा यूनिवर्सिटी में एम.ए.में द्वितीय श्रेणीमें उत्तीर्ण होना लिखकर हमें कहते? आदि ' अब तो आप नहीं कहेंगे कि कुशवाहा संस्कृत नहीं जानता तीन ( आषा. कृ. ८ मंगल २०२२ ) इससे उसने स्वयं सिद्ध कर सि जीने कि पहले मैं संस्कृत नहीं जानता था; पर अब जान गया है । त इस उन्नति पर भी बधाई हो । हैं? व ( १५ ) प्रमत्तापर हम आगे लिखेंगे । वादी के प्रमाण मर का नाईसे विवाह कहीं नहीं बताया गया है । वहाँ तो नाति व्यभिचारसे मतङ्गकी उत्पत्ति बताई गई है । क्या वादी किसी चाड स्त्रीके व्यभिचारको वैध विवाह मानता है? यदि नहीं. वादीच वादीकी यह बात भी कट गई । बात ( १६ ) आगे. ' मतङ्गकी एक सहस्र वर्षकी घोर तपस्याको । स्वा.द. Gujarat. An eGangotri Initiative