सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 191–200
सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 191–200
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३४८ ] भी मीमांसादर्शनसे सूचि भत्ताके नापितसे है । यह बात प्रकृत थाह स्थान ' ग्रस्त है; श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) विरुद्ध बताता है । यद्यपि वादीकी यह बात विवाह ' को तो सिद्ध नहीं कर सकी; बल्कि चर्चा होनेसे न्यायके अनुसार ' अर्थान्तरनिग्रह-तथापि वह यह बतावे कि यदि वादी ' वर्ष ' का अपर अर्थ ' दिन ' मानता है; तब जो कि सौ वर्षकी आयु शास्त्रोंमें विद्यालय लिखी हुई है; वादी क्या ' वर्ष ' का अर्थ ' दिन ' करके उसे मार्थ विदिनकी आयु ( ३ || महीने की ) मानेगा? ' असन् वर्ष - सहस्रारिण ' इस ( ६१२८/२ ) इस वाल्मीकिके वचनमें क्या वाद रजानन्द ३३-३४ वर्षकी आयु मानेगा? ' तेनायुरमितं लेभे भरद्वाजः ' अचारा ' ( चरक सूत्र. १/१२५ ) ' संस्कृत व्याकरणका इतिहास ' ( पृ. ६८ ) निवर्सिटी में आर्यसमाजी विद्वान् श्रीयुधिष्ठिरजी मीमांसकमे भरद्वांज कहते. श्रादि ऋषियोंकी एक सहस्र वर्षकी आयु मानी है । तब क्या वे जानता तीन वर्षके लगभग थे? आर्यसमाजी अनुसन्धाता श्रीभगवद्दत्त कर दिए जीने अपने ' भारतवर्षके बृहद् इतिहास ' में भी लम्बी आयु मानी है । तब क्या वैसा लिखते हुए यह आर्यसमाजी विद्वान् नासमझ हैं? क्या मीमांसकजी मीमांसादर्शन नहीं पढ़े? ' प्रभ ( ख ) अथवा कुछ क्षण के लिए मान भी लिया जावे कि - मतङ्गने ना उतने वर्ष नहीं; किन्तु उतने दिन तपस्या कीं; तब भी वहाँ उस किस चायंडालको ब्राह्मणत्व मिलना तो कहीं नहीं कहा गया । तबं नहीं;. वादी के स्वामीने जो उसे ब्राह्मणत्व मिलना कह दिया - यह उनकी बात इतिहाससे विरुद्ध सिद्ध हो गई । इसलिए सिद्ध हुछा कि-स्थाको ।.स्वा. द. जी बहुत - सी गलत बातें इतिहासके नामसे कह दिया CC - 0. Ankur Joshi ऐतिहासिक भूल । Collection Gujarat An करते थे । देखिये- ' व्यासजीने चित्राङ्गद और विचित्रवीर्यके मर जानेके पश्चात् उन श्रपने माइयोंकी स्त्रियोंका नियोग महा-आरतमें लिख दिया ' यह स.प्र. ( ४ पृ. ७३ ) में स्वामीने लिखा है: जबकि महाभारतानुसार चित्राङ्गदं विवाहसे पूर्व ही एक गन्धवं द्वारा मारा गया था । तब उसकी स्त्री कहांसे पैदा हो गई; विधवा वह कैसे हुई? और उसका नियोग कहाँ हुआ? देखिये महाभारतमें-चित्राङ्गदका गन्धर्वके साथ युद्ध हुआ, उसने उसे मार डाला । ' तस्मिन् विमर्दे तुमुले शस्त्रवर्षसमाकुले । मायाधिकोऽ बुधीद वीरं गन्धर्वैः कुरुसत्तमम् ' ( १११०११७-६ ) ' हृते चित्राङ्गदे भीष्मो वाले भ्रातरि ' ( १०२।१ ) ' संप्राप्तयौवनं दृष्ट्वा भ्रातरं धीमतां सुरः । भीष्मो विचित्रवीर्यस्य विवाहायाकरोन्मतिम् ' ( २ ) यवीय-' सस्तव भ्रातुर्भार्ये ' ( १०५।३७ ) ' अम्बिकाम्बालिके भार्ये प्रादाद् भ्रात्रे यवीयसे ' ( १०२/६६ ) इन पद्योंसे स्पष्ट है कि यह दोनों स्त्रियाँ अकेले विचित्रवी की थीं, चित्राङ्गदकी इनमें एक भी नहीं थी । वह तो विवाहसे पूर्व मर गया था । इससे स्वामी गलत इतिहास भी लिख दिया करते थे - यह स्पष्ट हो जाता है । ' भीष्म वर लाये ये ऐसा जो श्रीवैद्यनाथ कहते हैं, सो वरण विवाहसे पृथक् होता है । यह भीष्मजी तो विवाह न करनेकी प्रतिज्ञा कर चुके थे, सो यह भीष्मकी स्त्री भी नहीं हो सकती । स्वा.द.जीकी इस मालतीको वादी कभी ठीक नहीं कर सकते । ( १७ ) जो कि वादी लिखता है- " मंतङ्गकी कथाके खण्डनमें मंगली कथा मौजूद है; जिसमें क्षणमात्रमें भृगुके वचनसे वीत-eGangotri Initiative
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३५० | श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) हव्य ब्राह्मण हो गया ' । वादी बतावे कि क्या वीतहव्य चाण्डाल था? यदि नहीं; तब उसकी बात कट गई । इससे मतङ्गकी कथाका खण्डन कैसे हुमा? मतङ्गके ब्राह्मणत्वका तो कहीं किसी ऋषि - मुनिका वचन भी नहीं था कि वह उस वचनके बलसे ब्राह्मण हो जाता । अतः जहां वादीका पक्ष पीसा गया. वहां स्वा. द. जी भी पीसे गये । दोनों गुरु - चेला असत्यवक्ता सिद्ध हो गये! ( १८ ) अब सूतपर वादी लिखता है - ' वास्तवमें सूतजी चर्णसंकर थे ' पर इसमें उसके क्षत्रिय पिता कौनसे थे, माता ब्राह्मणी कौनसी थी, जिससे वह सूतजाति पैदा हुआ; यह चादीको इतिहाससे बताना पड़ेगा; पर उसके पास ऐसा प्रमाण ' शशशङ्ग ' है; अतः निराधार है । अयोनिज शरीर वैशेषिकदर्शन प्रादिमें स्पष्ट है । इस अग्निसे उत्पत्तिमें केवल सृष्टिनियम-विरुद्धता लिख देनेसे काम नहीं चल सकता; जैसे कि - वादीने लिखा है । द्रौपदीकी अग्नि से उत्पत्ति महाभारत में प्रसिद्ध है ही । कौटलीय - अर्थशास्त्र आदिने स्पष्ट लिखा है- पौराणिकस्तु ' धन्यः सूतः ' ( ३ ॥ ३१ ) । वादीके आर्यसमाजी अनुसन्धाता श्रीभगवद्दत्तजी भी लिखते हैं- ' लोमहर्षण आदि तो विद्वान् ब्राह्मण थे ' ( ' भारतवर्षका वृहद् इतिहास ' १ म भाग ३ य अध्याय पं. ३ ) श्रव श्रीभगवद्दत्तजीको वादी झूठा सिद्ध करे । ६८ पृष्ठमें भी श्रीभगवद्दत्तजीने पौराणिक सूतको सारथिसूतसे भिन्न बताया है । श्रीमद्भागवतमें जो उसे प्रतिलोमज़ कहा है, वह तिरस्कारार्थ CC - 0. Ankur Joshi Collection सूत ब्राह्मण है । है यह हम पुराणोंके प्रमाणोंसे तथा श्रीमद्भागवतकीटीका ' आलोक ' ( ३ ) में प्रमाणित कर चुके हैं । श्रीरामतेज पाण्डेव अपेक्षा पुराण- वचन अधिक प्रमाण है । क्या रामतेजबसे वादी प्रमाण मानता है? हमने इसपर पुराणोंकी प्र संगति दिखलाकर सूतजी के प्रतिलोमजत्वका भाव पूर्वापरी क स्पष्ट किय था; वांदी उसपर कुछ भी नहीं लिख सका । तब क्षितिमोहनसेन जो श्राजकलका सुधारक है— का कैसे! उस माना जा सकता है? उसने इधर - उधरका अनुसन्धान स क्रिया । वर्णसङ्कर, शूद्रसे भी निकृष्ट होता है; उसे ब्राह्मण नमस्क क वि नहीं करते 1 । उसके मारनेसे ब्रह्महत्या भी नहीं लगती परउन स ब्राह्मण होनेसे अन्य ब्राह्मण सूतजीको नमस्कार भी करते है । पूर उनके मारने से ब्रह्महत्या भी बलदेवजीको लगी; तभी तो उन्होंने ह उसके प्रायश्चित्तार्थं तीर्थयात्रा भी की थी । कुछ प्रमाण धन है, श्री.देखिये-अ शिवपु. कैलास में ' तस्मिन्नवसरे सूतं... [ मुनयः ] मुदा ' तं चवन्दिरे ' ( १६ ) ' तं दृष्ट्वा सूतमायान्तं मुनयो हृष्ट - चेतसा । श्रभु श स्थानासनार्घ्यादिपूजया समपूजयन् ' ( १० ( ५ ) ' सूत! खूब! अ महाभागः! त्वमस्मद्गुरुरुत्तमः ' ( ११ । १ ) । देवीभागवतमें में ' नमश्चकः पुनः सूतं ' ( १२/७४ ३०-३१ पद्यमें ) मुनियोंका सूखने में नमस्कार और सूतका उन्हें आशीर्वाद बताया है, इससे सूतजी प • ब्राह्मणत्व स्पष्ट है । उन Gujarat, An eGangotri Initiative
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श्रीसनातन धर्मालोक ( 8 ) ३५२ ] टीकाअ ( १६ ) आगे वादी शूद्रोंके यज्ञोपवीत धारण पर लिखता है । पाण्डेवी उसको ज्ञान नहीं कि स्मृतिकारोंमें मूर्धन्य तथा वादि-तेजबो इतना मनुजी तो शूद्रोंको यज्ञोपवीत दें नहीं; बल्कि निषे प्रतिवादिमान्य पूर्वापरख करें; वादीके ऋषि स्वा.द.जी भी अपनी सं. वि. में उपनयन तथा स्पष्ट वेदारम्भ में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यके अतिरिक्त शूद्रादिको उपनयनका उस - अधिकार न लिखें; तब ' वेदार्थोपनिबद्धत्वात् प्राधान्यं हि मनोः जैसे प्रमा स्मृतम् । मन्वर्थ - विपरीता तु या स्मृतिः सा न शस्यते ' ( बृहस्पतिः ) चान नहीं ' उत्पद्यन्ते च च्यवन्ते च य़ान्यतोऽन्यानि कानिचित् । तान्यर्षाकू-कालिकतया निष्फलान्यनृतानि च ' ( मनु. १२/६६ ) मनुस्मृतिसे नमस्का विरुद्ध वादीसे उद्धृत निबन्ध -ग्रन्थोंके वचन मान्य नहीं हो पर उस सकते । श्रीगङ्गाप्रसादजी शास्त्री की नीति सुधारवादकी है, वे करते थे । पूर्ण सनातनधर्मी नहीं हैं, हम उनका खण्डन कई बार कर चुके उन्हों हैं, अतः ' इन विषयों में माननीय नहीं । वादी मनुको मानता न है, या गङ्गाप्रसादजीको? इसमें कौन अधिक विद्वान् है? अथवा कौन अधिक प्रामाणिक है? पौराणिक विद्वान्को यदि ] सुदाई पंथिक मानता है; तो वह भी अपने - आपको पौराणिक लिखना श्रभु शुरू करे । स्वा. द. निर्णयसिन्धुकी जालग्रन्थ लिखते हैं; वादी अब जालप्रन्थको भी प्रमाणित ग्रन्थ मानने लगा । ती ( २० ) ' शूद्राणामदुष्टकर्मणां ' पर हम मीमांसा ' आलोक ' ( ७ ) सूतक में कर चुके हैं, वादी उस पर चुप्पी लगा गया । अतः उसका नूतजीय पक्ष गिर गया । दूसरोंका मत वह उद्धृत कर लेता है; उसक उनका स्वयं ज्ञान तो होता नहीं, जब हम उसपर ऊहापोह करते CC - 0. Ankur Joshi शूद्रोका उपनयन नही 1 [ ३५३ हैं; तब ज्ञान न होनेसे बेचारा चुप हो जाता है, यह अन्याश्रित होनेसे स्वाभाविक है । ' संस्कारगणपति ' में भी वही उत्तर है । ( २१ ) शार्ङ्गधर भी ' द्विजानां षोडशैव स्युः शूद्राणां द्वादशैव हि ' कहकर स्पष्टतया हमारा पक्ष मण्डित करता है, इतना भी पथिकको आश्चर्य है - ज्ञान नहीं । शूद्रको द्विजसे भिन्न बताकर शार्ङ्गधरने उसको ' एकज ' बता दिया है । सो द्विजत्वापादक यज्ञोपवीत, वेदारम्भ, समावर्तन आदि संस्कार उसके कट जाते हैं; यह वादी के विरुद्ध प्रमाण उसीके पक्षका खण्डन करनेवाला Collection Gujarat. ( २२ ) निर्णयसिन्धु में ही ' गर्भाधानं पुंसवनं... संस्काराः षोडश स्मृताः ' यह कहकर ' नवैताः कर्णवेधान्ता मन्त्रवर्ज क्रियाः स्त्रियाः । विवाहो मन्त्रतस्तस्या शूद्रस्याऽमन्त्रतो दस ' यहाँपर लड़कीके ६ संस्कार अमन्त्रक करना कहा हैं, और विवाह समन्त्रक । पर शूद्रका तो विवाह भी अमन्त्रक कहा है । सो मन्त्रक होनेसे उसे जनेऊका अधिकार सिद्ध न हुआ यह स्पष्ट है । ' शूद्राणां ब्रह्मचर्यत्व ' में ब्रह्मचर्य का अर्थ ' कौमार्य ' है, उन्हें उपनयनका अधिकार तो कोई भी श्रुति - स्मृति नहीं देती । इधर वहाँ ' कैश्चित् ' कहा है । ' कैश्चित् ' वाला मत सर्वसाधारण न होनेसे मान्य नहीं होता । ( २३ ) आगे वादी कहता है- ' अपरार्क में लिखा है- ' एतच्चातुर्व-रायपुर न - द्विजातिपरम् ' पर वादीने इसका पूर्ववचन अपनी गुरु-पुरुस्प्रहानुसार छिपा लिया है । वह वचन यह है - ' गर्भाधानमृतौ पुंसः ' सं ० ध ० २३ An eGangotri Initiative
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३५४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) इत्यत्र ग्राह् - ‘ एतच्चातुर्वर्ण्यपरम्, न द्विजातिमात्रपरम् ' अर्थात् गर्भाधान केवल द्विजोंकेलिए नहीं है, इसे चारों वर्ण कर सकते हैं, इससे सिद्ध हुआ कि शेष संस्कार द्विजोंके हैं, शूद्रके नहीं । आगे उसी निर्णय- सिन्धु में मेधातिथिका वचन लिखा है-' उपनयनाख्यं संस्कारं च शूद्रो नार्हति, ते च तूष्णीं कार्याः ' । अर्थात् शूद्रके संस्कार विना मन्त्रके होते हैं । शूद्रोंका उपनयन अमन्त्रक भी नहीं हुआ करता । शूलपाणिने लिखा है- ' श्रमन्त्रस्य शूद्रस्य विप्रो मन्त्रेण गृह्यते । इयं परिभाषा सर्वार्था, तेन शूद्रधर्मेषु सर्वत्र विप्रेण मन्त्रः पठनीयः, सोपि पौराण एव ' अर्थात् कहीं शुद्रका मन्त्र आ भी जावे; वहाँ उसे ब्राह्मण ही पढ़ता है, वह भीं पुराणका मन्त्र ही । इससे जब शूद्रको पुराणके मन्त्रका भी साक्षात् अधिकार नहीं; तब वेदका क्या अधिकार होगा? इससे वादीका पक्ष निर्णयसिन्धु द्वारा ही कट गया । पूर्वापर छिपा लेनेका यही परिणाम हुआ करता है । ( २४ ) शूद्रको उपनयन आदिका अधिकार कोई भी संस्कारविधि नहीं बताती; वादी अपने स्वामीकी संस्कारविधि ही देख ले । क्या वादी के आचार्य अनभिज्ञ थे; जो उन्होंने शूद्रको उपनयनकेलिए अधिकृत नहीं किया? वादिप्रतिवादिमान्य मनुजी क्या वेदानभिज्ञ थे? ( क ) मनुजीने वेद न पढ़नेवाले द्विजको शूद्र जैसा माना है; ‘ योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम् । स जीवन्नेव शुद्धत्व -माशु गच्छति सान्वयः ' ( २।१६८ ) तो यदि शूद्रका भी वेदाधिकार होता; तो वेदरहित - द्विजको शूद्र न कहा जाता । यह पद्य वादि-शूद्रका अनधिकार । प्रतिवादिमान्य है; अतः इसको प्रक्षिप्त भी नहीं कहा जा सकत इससे शुद्रका वेदाधिकार कट रहा है । ( ख ) अन्य भी प्रतिवादिमान्य मनुपद्य वादी देखे- ' शूद्र रेण हि समस्तावद्यावद् वाहि विदे ' न जायते ' ( २।१७२ ) यहां द्विजको उपनयन न होनेपर जैसा माना गया है । यदि शूद्रका उपनयन होता, तो शुरु घ उपनयन-रहित द्विजको शूद्र न कहा जाता । ( ग ) अन्य भी देखिये न तिष्ठति तु यः पूर्वा नोपास्ते यश्च पश्चिमाम् ।... वा बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मण: ' ( २११०३ ) यह स शूद्रवद उ वादिप्रतिवादिमान्य है, अतः इसे भी कोई प्रक्षिप्त मनुपद्यभ उ नहीं क सकता । इसमें दो काल सन्ध्या न करनेवाले द्विजको पुर बहिष्कृत कहा गया है । इससे सन्ध्या आदि वैदिक द्विज - कार्य स्व शूद्रका अनधिकार सिद्ध होता है; तब वादीने जोकि आर्यसमाज वा सुधारकोंके शूद्रादिके अधिकारके कई वचन दिये भी है रा वे वादिप्रतिवादिमान्य मनुस्मृतिसे विरुद्ध होनेसे मान्य नही वे तो आर्यसमाजियों वा सुधारकोंके व्यक्तिगत वचन हैं; उनका है । कुछ भी मूल्य नहीं । यहाँ तो शास्त्रीय प्रमाण अपेक्षित है बन व्यक्तिगत विचार नहीं । उन आजकलके शूद्रसेवकके वचन अन कुछ भी मूल्य नहीं । हम ' आलोक ' ( ३ ) में इस विषय में प्रमाण उन वाद पर विचार कर चुके हैं । अप ( २५ ) भविष्यपुराण में चारों वर्णोंकी यज्ञोपवीत - संस्कार की विधि में श कहीं भी नहीं कही गई है । जिन शूद्रोंने षड्यन्त्रसे ऐसा किया हम था, इन्द्रने उनसे वेद छिनवा लिये, और वे बौद्ध बन गये । बरत CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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[ श्री सनातन लोक ( 8 ) ३ ३५६ / ना सका विषयमें हम ' आलोक ' ( ३ ) और ( ७ ) में दिखला चुके हैं । भी वादि- ॥ इस तो त्रिशङ्कु - चाण्डालके यज्ञमें देवता नहीं आये; तब बंद यावद् तभी नये देवता बनाने पड़े । चाण्डाल- त्रिशङ्कुको जब विश्वामित्रको नेपर शुक्र यज्ञवलसे देवलोकमें विश्वामित्रने भेजा; तब उस त्रिशङ्कुको उपनयन देवेन्द्रने स्वर्गसे गिरवा दिया । अतः वादी खण्डित हो गया । देखिये- बादी उसका उत्तर न दे सका; और न सात जन्मोंतक उसका शूद्रवद उत्तर दे सकता है । उसका कारण यह है कि यह दूसरोंके लेख अनुपद्मश्री उधृत भर कर लिया करता है, स्वयं वह विचार उसपर नहीं नहीं करता; इसलिए शीघ्र ही निगृहीत हो जाता है । उसने भविष्य-के सम पुराणका प्रकरण छिपाकर अनृतवादको महत्त्व दिया है । स्वा.द. पञ्चमहायज्ञविधि ( शता.सं.पू. ८७७-७८ ) में लिख गये हैं, यसमा ' जो सत्यसे अलग होके झूठको प्राप्त हों; वे मनुष्य असुर और ये भी है राक्षस कहे हैं ' अब वादी यह पदवी पसन्द करता है; तो उसकी न्य नहीं इच्छा । असत्यवादीको ( देवीभा. ६।११।४३ में ) राक्षसावतार कहा उन है । उसी का अपना प्रमाण ' उष्ट्रलगुड ' - न्यायसे उसका विरोधी पेक्षित है वन गया । बुद्ध विष्णुके अवतार थे; तभी तो शूद्रोंका वेदोंमें वचन अधिकार देखकर उनसे वेद श्रीविष्णुभगवान्ने छिनवा लिये । प्रमाए उनसे वेद छिनवानां कोई पक्षपात भी नहीं था । सबके अपने-अपने अधिकार होते हैं । आपके स्वामीजीने ही उपनयन संस्कार की में शूद्रोंको क्यों नहीं गिना, क्या वे पक्षपाती वा अनभिज्ञ थे? सा कि हम बुद्धको वेदविरोधी कहाँ कहते हैं; वह तो उन्होंने नीति गये । बरतकर बाहरसे वेदोंका खण्डन किया कि अनधिकारी उन्हें गरुड़पुराणका प्रमाण [ ३५७ नएँ । ( २६ ) गरुडपुराणके प्रमाण पर हमने इतना लिख दिया कि-उसपर वादीकी लेखनी चल ही न सकी । यह बेचारे करें भी क्या; दूसरेके विश्वासपर दूसरोंका वचनमात्र दे देते हैं । उसपर ऊहापोह होनेपर फिर चुप्पी धारण कर लेते हैं, क्योंकि यह तथा इनके उपजीव्य लोग पूर्वापर - प्रकरणको छिपा देनेके अभ्यासी हैं, इसीसे अपने निर्वाह करते जा रहे हैं । गरुड़-पुराण जब शूद्रको उपनयन देना नहीं मानता; यह हम ' आलोक ' ( ७ ) में दिखला चुके हैं; यदि वादी उसका प्रत्युत्तर नहीं दे सकता; तब उसका नाममात्रसे स्पर्श करना क्या आवश्यक हो जाता है? क्यों हमसे लिखे हुए गरुड़पुराणके शूद्रके उपनयन के अनधिकार पर उसने लेखनी नहीं चलाई? इसलिए कि उसका पक्ष निर्मूल है । वादी कहता है कि- ' सूत्र ' का अर्थ यज्ञोपवीत भी होता है, यह कहकर वह प्रमाण मनुका देता है- ' शरणसूत्रमयं राज्ञः, वैश्यस्याविकसौत्रिकम् ' पर हमें उसकी संस्कृतविद्वत्ता (? ) पर बड़ी दया आती है । यहाँ ' शण- सूत्र'का अर्थ ' सनका धागा ' है, ' जनेऊ ' अर्थ नहीं । आविक ' सौत्रिकम् ' में भी ' सूत्र'का अर्थ ' धागा ' ( तन्तु ) है, जनेऊ अर्थ नहीं । तब वादीका प्रश्न हमपर होगा कि यदि मनुके उक्त पद्य में ' सूत्र'का अर्थ जनेऊ नहीं है, तो उक्त पद्यमें ' सूत्र ' से पृथक् जनेऊवाचक कौन - सा पद है? तब वादी सुन ले, वह है, इसके पूर्वार्धमें ' उपवीत ' CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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३५८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) शब्द । पर गरुड़पुराणमें सूत्रसे पृथक् ' उपवीतं ' शब्द नहीं । कुल्लूकभट्टका नाम भी वादी असत्य लिखता है, वहां तो लिखा है - ' शणसूत्रमयं ' मेषलोमनिर्मितम् ' । ' सूत्रका अर्थ जनेऊ यहां उसने कहीं नहीं लिखा । ' सूत्र'का अर्थ उसने ' सूत ' ही रखा है, जनेऊ नहीं । जो गोभिल - सूत्र वादीने दिया है, उसमें भी ' यज्ञोपवीतं कुरुते सूत्रं ' ' सूत्र ' शब्द ' यज्ञोपवीतसे भिन्न ' है । इस प्रकार श्रीसामश्रमीके अर्थ में भी । वादीसे प्रमाणित ठा ० उदयनारायणने भी ' सूत्र ' का अर्थ ' सूत ' किया है, यज्ञोपवीत नहीं । ' यज्ञोपवीत ' शब्द वहां पर पृथक् है, पर गरुड़पुराणके वचनमें ' यज्ञोपवीत ' शब्द तक नहीं । जब गरुड़पुराणके वचनमें ' शणसूत्रमयम् उपवीतं राज्ञः ' इस मनुवचनकी भांति, ' कुशसूत्र-मयम् उपवीतं ' शब्द ही नहीं; और गरुड़पुराणने ( ४६१४, ६६ २८, ८४।२४-२५-२६, ६३/१०, ६४/१ ) इन पद्योंमें शूद्रको जनेऊ, का अधिकार नहीं दिया, यह हम आलोक ( ७ ) पृ ० ४३०-४३१-४३२ में स्पष्ट निर्देश कर चुके हैं, जिस पर बेचारे पथिककी लेखनी टूट गई, तब उसका पक्ष सदाकेलिए छिन्न - भिन्न हो गया । पाठकोंने देख लिया कि- यह लोग प्रत्यक्षमें भी साधारण-जनताकी दृष्टिमें धूल झोंकते हैं, तब ' सम्भवतः उस कालमें कुश-रज्जु आदिके जनेऊ पहनते हों '; यह वादीका कथन ' अभित्ति-चित्र ' है । ब्राह्मणोंका कुशका जनेऊ कभी सुना वा देखा नहीं गया । कुशका रस्सा हो सकता है, जनेऊ नहीं । वादी कहता है-' आपने ' पवित्रा ' की कोरी कल्पना कर ली है ' हमने यह कल्पना CC - 0. Ankur Joshi Collection शूद्रका अनधिकार | [ ३ कहां की है; यह तो वादी के मान्य गरुड़पुराणने स्वयं ही है- ' ये मर्त्या नार्चिष्यन्ति पवित्रकै ' ( ४३।५ ) अब वादीको तो लज्जा करनी ही चाहिये । हमने ' आलोक ' ( ७ ) ह ४३३ पृष्ठ तक इसमें विवेचन दिया था; वादीने उसे पृ. ४२ द नहीं, और कहता है कि हमारी पुस्तकका कोई उत्तर छुचा दे द सकता । ' निरस्तपादपे देशे एरण्डोपि दुमायते के न्यायके नहीं म में ना लोग उदाहरण बन रहे हैं । यह सोचते हैं कि - ' जो हम कि देते हैं; अविद्या - महारानी की कृपासे दयानन्दी- भाई उन वेदवाक्य ही समझ लेते हैं । सनातनी यदि नहीं मानते, बोए तो उन्हें दो - चार गाली देदेंगे, वा उनपर पक्षपात थोप देंगे । वा ( २७ ) वादी लिखता है - ' अष्टादश - पुराण केवल आपकी व सम्पत्ति नहीं हैं ' इससे दयानन्दी पत्रिकने १८ पुराणोंको अर्थ सि सम्पत्ति भी माना है । उसे बधाई हो । अपने आपको पथिक ' पौराणिक ' भी लिखा करे । जो १८ पुराण वादीकी इस पुस्तकों पित टाइटल २ य पृष्ठ में छपी ' महर्षिजीकी वैदिक तोप से उड़ उन थे, वे ही १८ पुराण वादीके गलेके भी अब ' हार ' बन कह इससे वादीके तथा उसके ऋषिके गोले ' घास - फूस ' के वि तिव हो गये । स्वार ( २८ ) आगे वादी व्यर्थकी उट्टङ्गना करता है । - ' ग्यारह का समाजी विद्वानोंके शूद्रों के यज्ञोपवीत होनेके प्रमाण साध्य कस्वार हैं, और जियालाल - आलाराम आदिके वंचन प्रामाणिक हैं शङ्क वादीकी कितनी विषम वात है? सिद्धान्त के सम्बन्ध में व्यक्ति कह Gujarat. An eGangotri Initiative
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३५ श्रीसनातन धर्मालोक ( १ ) ३६० ] ही कभी माननीय नहीं होती । उसमें शास्त्रीय प्राचीन प्रमाण दीको बात मान्य होंगे । शेष है जियालाल आदि की बात; उनको हम ही प्र. ४२ सिद्धान्तके सम्बन्धमें कब प्रमाणित करते हैं? उनका तो इस-छुआ लिए वचन दिया जाता है कि उन्होंने भी स्वा.द. जीके सम्बन्ध-न देन में यह खोज की थी । यदि बादी उनमें विद्वेषके कारण मान्यता 1 नायके नहीं समझते; तब आप लोगोंके वचनोंकी भी तो मान्यता नहीं हम लि हो सकती । आप लोग स्वामीके चेले - चांटे बने हुये हैं; आप - भाई उन्हें चढ़ावेंगे ही । अब देखिये स्वा. द. जीके यदि तीन बाप नहीं: नते, तो तो दो बाप तो सिद्ध हो ही गये । थोड़े दिनों तक कोई तीसरा । प भी शायद निकल पड़े । ' परोपकारी ' में उनकी भिन्न जन्म-की वर्ष भूमि भी बताई गई है । अतः आप लोगों के स्वामिविषयक वचन कोप सिद्ध नहीं । पथिका श्रीरामचन्द्र देहलवीजीकी तो यह धारणा है कि- ' किसीके स पुस्तक पिता का पता किसी प्रमाणसे लग ही नहीं सकता ' ( देखिये हापुड़ में E उनका छुपा हुआ इश्तिहार ) तब वादी ही यह निश्चयपूर्वक कैसे वन कह सकता है कि - वे अम्बाशङ्करके लड़के हैं, वा कर्शनलाल जी सके कि तिवारी के? या किसी तीसरेके? ' पौराणिकोंके भ्रम में पथिकने स्वामी के पिता का नाम करसनजी तिवारी लिखा है; और स्वामी-बारह का नाम दयाराम | ' दयानन्द सिद्धान्तप्रकाश ' में उसके प्रणेताने साध्य के स्वामी के पिताका नाम अम्बाशङ्कर और स्वामीका नाम मूल-कहैं शङ्कर बताया है । अब वादी बतावे कि ये दो लड़के, ये दो पिता में व्यक्ति कहां से आ गये? इनमें कौन सा ठीक है, कौन सा ना - ठीक? CC - 0. Ankur Joshi ' यथेमां वाचं ' का अर्थ [ ३६१ Collection Gujarat. श्रीलेखरामकी बात को भी काट दिया गया । इससे तो स्पष्ट है कि कुछ दाल में काला है ' । आप लोग स्वामी के सम्बन्धमें अभी अन्धेरेमें हैं ' । श्रतः दोनों ही ठीक नहीं । यदि ठीक हैं; तो फिर जीयालालका कथन भी ठीक हो सकता है? ( २६ ) " यथेमां वाचं ' का दयानन्दका अर्थ सही है " इस अपने कथनमें वादीने न तो इस अपनी पुस्तकमें, न ही गत पुस्तक में कोई प्रमाण दिया है । और न वह हमारे आलोक ' ' तृतीय-पुष्पकी आलोचना की प्रत्यालोचना कर सका । ७ म पुष्पमें भी ८७६ पृष्ठमें जो वादीकी शङ्काओंका समाधान हमने किया था; वादी उसपर भी चुप्पी लगा गया । कुछ बोल नहीं सका । श्रीगङ्गाप्रसादजी के वादीसे लिखे विचार उनके व्यक्तिगत विचार हैं; अतः मान्य नहीं । हम ३ य पुष्पमें उनका भी खण्डन कर चुके हैं । वादीने जब उनका मत अपनाया था; तब हमसे किये हुए उनके खण्डनका उसे उद्धार करना उचित था; पर तब न, जब कुछ उसके अपने पास होवे । केवल नकल करना ही आता हैं । दिल्ली के पाँच सवारोंमें अपनी गिनती चाहता है । बड़े लोगोंके साथ जूझने और पस्त होनेमें भी अपना वह गौरव समझता है ' दन्तभङ्गो हि नागानां श्लाघ्यो गिरिविदारणे ' । ( ख ) यह जो कहा जाता है कि - ' यही उपदेश महाभारत ( शा. अ. ३२७ ) में व्यासजीने वैशम्पायन आदिको दिया है ' इसका प्रत्युत्तर हम ' आलोक ' ( ३ ) पृ. ४३ से पृ. ४८ तकमें दे चुके हैं । An eGangotri Initiative
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३६२ । श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ( ३० ) शूद्रके मुँहपर पट्टी बान्धना - इस विषय पर हम ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ८७६ पर लिख चुके हैं, उसका प्रत्युत्तर वादीने कुछ भी नहीं दिया । मूर्खके श्वासमें अशुद्धताका कोई प्रमाण नहीं । श्वास तो मूर्ख - विद्वान् सभी का भी अशुद्ध होगा; तब आप पनी स्त्रियोंके मुखपर भी पट्टी क्यों नहीं बंधवाते? स्वा.द. रसोइया ब्राह्मण रखते थे; मूर्ख होनेपर भी उसे शूद्र नहीं मानते थे; तभी तो उसके मुखपर कभी पट्टी नहीं बंधवाते थे । मुखपर पट्टी बाँधनेकी व्यर्थता हमने स्वा. द. जीके ही शब्दों में बताई थी, वादी उसपर भी चुप्पी साध गया । ( ख ) ' योऽनधीत्य द्विजो वेदम् ' की आलोचना हम अन्यत्र करेंगे । इसमें वादीने ' शूद्र - ब्राह्मण ' मानकर नई वर्ण - व्यवस्था बना कर अपने पक्षका खण्डन कर दिया, क्योंकि उसे ब्राह्मण भी माना और शुद्र भी । ( ३१ ) आपस्तम्बके वचनमें भी जिसे वादीने स्पष्टतया नहीं लिखा, क्योंकि उससे शूद्र आर्योंसे भिन्न सिद्ध होता था और इससे आर्यसमाजके पक्षका खण्डन होता था - में ' संस्कर्तारः ' का अर्थ झाडू देना आदि है; अथवा गेहूँका झाड़ना - बुहारना साफ करना आदि है, वह भी केवल वैश्वदेववलिमें । स्वयं भोजनकेलिए नहीं; क्योंकि — उसका आपस्तम्बमें निषेध है । जैसे कि- ' अप्रयतोपहत-मन्नमप्रयतम् ' ( १ | १६ | २१ ) यहांपर अशुचिसे स्पृष्टं अन्नको भी शुचि कहा है, और ' अप्रयतेन तु शूद्र ेण उपहृतमन्नमभोज्यम् ’ ( १।१६।२२ ) यहाँपर स्वभावसे अशुचि शूद्रका अन्न अभोज्य कहा CC - 0. Ankur Joshi Collection शूद्रादिका अन भोज्य । ३० है । ' अमेध्यैरवमृष्टम् ' ( १।१६।२५ ) में भी यही बात है श्रमेध्य होता है । जैसे कि- ' ऊर्ध्वं नाभेर्यानि खानि , शूद्र मेध्यानि सर्वशः । यान्यधस्ताद् श्रमेध्यानि ' ( मनु. ५१३२ घ नाभिसे नीचे के पाद आदि अङ्गको श्रमेध्य कहा है सो ) ; प उत्पन्न होनेसे ( क्योंकि - मनु शूद्रको पज्ज ( पादज १३१,१५० कहते हैं ) मेध्य है 1 । ' ऊर्ध्वं नाभेर्मेध्यतरः पुरुषः परिकीर्ति स्वा तस्मान्मेध्यतमं त्वस्य मुखमुक्तं स्वयम्भुवा ' ( मनु. ११६२ ): गृ. मुखसे उत्पन्न होनेसे ब्राह्राणको मेध्यतम कहा है । ' शुना जि अपपात्रेण दृष्टम् ' ( १ | १६ | ३० ) यहाँपर अपपात्र ( चाण्डाली श्रा आदि ) से दृष्ट भोजन भी निषिद्ध माना गया है । ( ' चारहाल पचानां तु बहिर्ग्रामात् प्रतिश्रयः । अपपात्राश्च कर्तव्याः ' । १० | ५१ ) यहाँ चाण्डाल आदि अन्त्यजोंको ' अपपात्र ' कहा? से उ है ) १ | १७ | १ में भोजन करते हुए शूद्र स्पर्श करले; तब अन्त भोजनका निषेध कर दिया गया है । ' सर्ववर्णानां स्वधर्मे वहा मानानां भोक्तव्यं शूद्र - वर्जमित्येके ' ( १११ = १३ ) में शुद्रके थोड़ ( गान तीनो का निषेध कहा है । ' तस्यापि धर्मोपनतस्य ' ( १४ ) सूत्र आरत लीन है, क्योंकि - ' कृष्णधान्यं शूद्रान्नं [ वर्जयेत् ] ' ( २ | दार ) व व्यप शूद्रान्नका निषेध कहा शूद्रके पात्र तथा उसके न खावें ' ( पृ. १६६ ) । ' न खाना ' ( स.प्र. १० कॉण्ड नवम सर्ग पृ. है । स्वा. द. जीने भी स.प्र. में लिखा है- अथव नाम घरका पका हुआ अन आपत्काल यह ‘ चाण्डालादि नीच भङ्गी - चमार श्र शुद्ध प पृ. १६६ ) | श्रीमद्दयानन्दप्रकाश ( संप होने स ३६७ ) के अनुसार स्वा. द. जी ने कृपाराह Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) | ३६३ ३६४ ] है, शुद से यह सुनकर कि घोष महाशय के घर पर भङ्गिन पाचिका है, खानि भोजन पीछे लौटा दीजिये । महाराजने उसी समय ५१३२ I इसका घोषमहाशयका थाल लौटा दिया ' । आशा है - अब वादीको हैं, सो ) नं कुछ समझ आ जायगी । पार ३१,१६७ ( ३२ ) गोभिलगृ.में हवनमें शूद्रकी अग्निका निषेध है, इसपर हमने परिकीर्ति • वा. द.का वचन, गोभिल. का तथा, उसीके अनुवादक खादिर-श ६२ ) गृ. का ' बहुयाजिनो वा आगारात् शूद्रवर्जम् ' ( १२५१५ ) दिया था, । ' शुना जिसमें शूद्रकी अनिका निषेध किया था । उसमें हमने साक्षीरूप वाण्डाल श्रार्यसमाजी श्रीतुलसी रामस्वामीका वचन भी दिया था; उसका ' चारहात प्रतिपक्षी उत्तर न दे सका । तब उसका खण्डन स्वयं होगया । व्याः ' ( ( ३३ ) आगे जो वादीने श्रीगङ्गाप्रसाद जी का तीन वेदोंके कथन-' कहा से उसमें चौथे वेदके अन्तर्भावकी तरह तीन वर्णोंमें चौथे व शुद्रका लेब अन्तर्भाव बतलाया है, इसमें दृष्टान्तमें वैषम्य है । तीन वेदोंका स्वधर्मे वहाँ भाव तीन प्रकारके मन्त्र हैं, ऋचा ( पद्य ), यजु: ( गद्य ), साम के भो ( गान ) । चौथा इनसे भिन्न मन्त्र कोई नहीं होता । अथवेमें तीनों हैं । शेषमें एक - एक प्रधान है, अतः वहाँ ' प्रधानेन हि २८२ ) ३ व्यपदेशा भवन्ति ' इस न्यायसे उनका ऋग्वेदादि नाम है, पर में लिखा है अथर्वमें किसी एककी प्रधानता न होनेसे उसका मन्त्रके नामसे कालके नाम नहीं; किन्तु उसके द्रष्टाके नामसे नाम है; पर चातुर्वर्ण्य में मार यह बात नहीं घटती । शूद्रका वैश्य में अन्तर्भाव कभी नहीं होता । श शुद्र पादज है, और वैश्य ऊरुज । दोनोंका कारण भिन्न - भिन्न होनेसे भेद है । " अयमेव हि भेदो भेदहेतुर्वा यद् विरुद्धधर्मा-कृपाराम CC - 0. Ankur Joshi शूद्रका वंश्य में अन्तर्भाव (? ) [ ३६५ ध्यासः कारणभेदश्च ' यह न्याय इन्हें एक नहीं होने देता । वैश्य द्विज है, शुद्र एकज । इसलिए गीता में ' ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप! ' ( १८ | ४१ ) में शुद्रको ब्राह्मणादि तीन वर्णोंसे पृथक कर दिया गया । वैश्य, शूद्रके गुण - कर्म भी भिन्न - भिन्न हैं । शुद्रका सेवाके अतिरिक्त कुछ भी कर्तव्य नहीं । श्रतः वैश्यमें शूद्रका अन्तर्भाव कभी नहीं हो सकता । स्वा.द., भी यह कल्पना नहीं मानते । श्राश्चर्य हैं कि- दयानन्दी पथिक एक पौराणिककी निर्मूल कल्पना में फँस गया, शायद उसको यह रोचक लगी । हम उसका खण्डन कर चुके हैं । उसमें खादिरगृ.की तथा श्री तुलसीराम स्वामी की मनुटीकाकी साक्षी भी हम दे चुके हैं । शास्त्रों में भी यह स्पष्ट है- ' नाऽघीयीत प्रतिषिद्धोस्य ( शुद्रस्य ) यज्ञः। एवं स्मृतः शूद्रधर्मः पुराणः ' ( महा. उद्यो. २६।१६ ) ' तस्मात् शूद्रो यज्ञेऽनवक्लृप्तः ' ( कृ. य. तैत्ति. सं. ७४६ ) इस विषय में हमने ' आलोक ' ( ६ ) पृ. २५० - २५४ में स्पष्टता की है । अतः वादीका यह पक्ष भी कट गया । गोभिल, शूद्रका यज्ञोपवीत नहीं मानते । ( ३४ ) ‘ अथास्य वेदमुपश्शृण्वतः ' पर हमने ' आलोक ( ६ ) पृ. ८७३ से ८७७ तक लिख दिया था, वादी उसका प्रत्युत्तर नहीं दे सका । श्रीधर्मदेवजी के लेखको ही देखकर वादीने सब कुछ लिखा | थोड़ासा यदि उसमें परिवर्तन कर दिया, तो इसमें यह सिद्ध नहीं होता कि - वादीने श्रीध. दे. जीका लेख सर्वथा नहीं देखा । अपना लिखना ' यह उसके अपने ही लेखसे चोरी सिद्ध Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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३६६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) हो रही है । वादी वा उसका सम्पादक हमारी चोरी कभी सिद्ध नहीं कर सकते । प, भीमसेनजी आदिके विषय में हमने ' आलोक ' ( ५ ) में पृ. ( ग ) और ( च ) में इस विषय में उनके सम्मानार्थ लिख दिया था । पर वादी यह नहीं सिद्ध कर सकता । ( ३५ ) वादी लिखता है - ' वेदान्तके लेखक श्रीवेदव्यास स्वयं ब्राह्मण न थे, वरन् केवट ( कहार ) जातिके थे, जिसको वेदा-धिकार नहीं हैं ' यह लिखना वादीकी अज्ञताकी पराकाष्ठा है । क्या उनके पिता श्री पराशर केवट जातिके थे, जो कि - वादी उनके लड़के व्यासजीको केवट जातिके कहता है । वेदव्यासजी की माता भी केवट जातिमें उत्पन्न लड़की नहीं थी; केवटसे पालित होनेसे वह उस ज़ातिकी कैसे होगई १ स्वा. द. छः दिनके बाद लड़केको धाय द्वारा दूध पिलाना तथा पालना लिख गये हैं; तब दयानन्दजीकी माताको वैदिक माननेवाले सभी ' पथिक ', ‘ विद्यार्थी ' ' चौधरी ' आदि दयानन्दी तथा उनके वर्तमान लड़के जिन्होंने स्वामीके वैदिक मतके अनुसार छठे दिनसे घायका दूध पीया होगा; शुद्रा - धाय के लड़के हो जानेसे सभी क्या शुद्ध सिद्ध नहीं हुए? सभीको शुद्र हो जानेकी बधाई हो; अब समस्त आर्य-समाज पथिकजीकी मान्यताके अनुसार ' शुद्रसमाज ' सिद्ध होगया । स्वा.द.जीने भी शूद्रा धायका दूध अपने वैदिक वचना-नुसार पीया होगा; उससे पाले गये होंगे; वादीके अनुसार वे भी शुद्र सिद्ध होगये । इस उन्नतिपर बधाई!! पर हम यह बात CC - 0. Ankur Joshi Collection शम्बूक मोर शबरी । L16 स्वयं नहीं मानते, पर वादीको ऐसी गाली देनेपर धिक्कार देते हैं । केवट से पालित होनेसे लड़की केवट जातिकी अ जाती । इस विषयमें हुम अन्यत्र स्पष्ट कर चुके हैं न कि नहीं उपरिचर - वसुकी पुत्री थी; उपरिचर - वसु केवट जातिके यहाँपर वादी जाति - व्यवस्था जन्मसे सिद्ध कर नहीं है । रहा है, हो । फलतः वादीका पक्ष गिर गया । ( ३६ ) श्रीशि.शं. आदि दयानन्दियों के लिखनेसे कथा असत्य सिद्ध नहीं हो जाती । जव वादी गौतमसुक शम्बू प्रामाणिक मानकर शूद्रोंको दण्ड दिला रहा है; उसका उदहार भी रामायणमें शम्बूक- वध में मिल रहा है; और महामान ( शान्ति. १५३।६७ ) में भी उसका समर्थन प्राप्त है; तब वह घर सत्य सिद्ध होगई । जो कि वादी इसपर शवरी - विषयक या करते हैं; वे यह जानें कि शबरी तो उसका नाम था; व नहीं । जैसे कि - लड़केसे उपनयनमें पूछते हैं - ' को नामासि ' के ही रामायण में उसे ' श्रमणी शवरी नाम ' शबरी नाम श्रमणी ( तपस्विनी ) कहा गया है । ' श्रमणोऽश्रमणः ' ( शत. १४३ ) १।२५ ) ' वातरशना ह वा ऋषयः श्रमणाः वभूवुः ' ( तै.आ.२०१ ' कुमार श्रमणादिभिः ( पा. २/१/७० ) इत्यादि वचनों द्वारा ' श्रम क का अर्थ तपस्विनी ' ' है । इस विषय में वादी ' आलोक ' ( ३ ) [ तो ३१०-३१६ में देखे । दयानन्दियोंके कहने मात्र से यह बात नहीं कट सकती । ( ख ) ' न तिष्ठति तु यः पूर्वा नोपास्ते यश्च पश्चिमाम् । ' Gujarat. An eGangotri Initiative