सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 201–210

सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 201–210

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ९ ) ३६८ ] कार बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विज- कर्मणः ' ( २/१०३ ) स्वा. द. जी की अम तथा शुद्रवद् उनके अनुयायी मनुजीके इस पद्यको प्रमाणित करते नहीं हूँ । कोई भी इस मनुपच्चको प्रक्षिप्त नहीं मानता । इससे शुद्र के नहीं सन्ध्या ( वैदिक - उपासना ) में अनधिकृत सिद्ध हो रहा है; तभी तो है, सन्ध्या ( उपासना ) न करनेवाले द्विजको शूद्रकी भाँति द्विजकर्मसे बहिष्कृत करनेका मनुजीने आदेश दिया है, तब शुद्ध वैदिक-II तपस्या भी नहीं कर सकता । उसके करनेसे उसको दण्ड होना गौतमसुक द्दी था; क्योंकि – ‘ शूद्राः स्वकर्मनिरताः त्रीन् वर्णान् उपचारिणः ' का उदाहर ( वाल्मी. १ | ६ | १६ ) यह रामराज्य में कानून था; फि - शूद्र केवल महाभारत तीन वर्णों की सेवा करें, अन्य कुछ भी न करें । और यही व वह त्रैवर्णिकोंकी सेवा ही शुद्रकी तपस्या थी, इससे भिन्न नहीं, न्यक आहे जैसे कि बादि - प्रतिवादिमान्य मनुजीने लिखा है- ' तपः शूद्रस्य था सेवनम् ' ( १११२३५ ) ' यद् अतोऽन्यद्धि कुरुते तद् भवत्यस्य मासि निष्फलम् ' ( मनु. १०।१२३ ) नाम वा ( ग ) फिर मनुजीने यह विशेष प्रेरणा की है कि- ' वैश्यशूद्रौ शत. १४ प्रयत्नेन स्वानि कर्माणि कारयेत् । तौ हि च्युतौ स्वकमभ्यः प्रा. २४ ) क्षोभयेतामिदं जगत् ' ( ८४१८ ) ( शूद्रादिको राजा प्रयत्नसे उनके ' श्रम कर्म ( सेवा कृषि आदि ) करावे । वे यदि अपने कर्मसे च्युत हुए; ' ( ३ ) तो जगत् में हलचल मची ) इसी मनुके नियमानुसार श्रीरामने बात शुद्रको दण्ड दिया; क्योंकि - श्रीराम मनुस्मृतिके अनुसार चलते थे; तभी तो उन्होंने बालिवधके समय मनुस्मृतिके दो पद्य पढ़े थे; माम् ॥ वे अब भी मनुस्मृतिमें मिलते हैं ( वाल्मी. ४ / १८ / ३०-३१-३२, CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. शूद्रोंको कड़ा दण्ड [ ३६६ मनु, ८३१६-३१८ ) । मनुजीने भी शूद्रको कड़ा दण्ड देना लिखा है | देखिये - जिह्वायाः ' प्राप्नुयात् छेदं ' ( ८२७० ) ' निक्षेप्योऽ योमयः शङ्कुर्व्वलन्नास्ये दशाङ्गुलः ( २७१ ) ' तप्तमासेचयेत् तैलं वक्त्रे श्रोत्रे च पार्थिवः ' ( ८ । २७२ ) । ( घ ) कड़े दण्डकेलिए स्वा. द. जीने भी लिखा है- ' जो इसको कड़ा दण्ड जानते हैं; वे राजनीति नहीं समझते; क्योंकि- एक पुरुषको इस प्रकार दण्ड होनेसे सब लोग बुरे [ निषिद्ध ] काम करनेसे अलग रहेंगे; और बुरे कामको छोड़कर धर्ममार्ग में स्थित रहेंगे ' ( स.प्र. पृ. १०६ ) ( ङ ) श्रीरामकेलिए रामायण में लिखा है- ' हन्त्येष नियमाद् वध्यान् श्रवध्येषु न कुप्यति ' ( वाल्मी. २२/४६ ) ( श्रीराम वधके योग्यको मार डालते थे । ) ' नाऽदण्ड्यो नाम राज्ञोस्ति यः स्वधर्मे न तिष्ठति ' ( मनु. ८ | ३३५ ) ( जो अपने धर्ममें नहीं रहता, वह कोई भी हो; राजासे दण्डित किया ही जा सकता है ) । ' तान् सर्वान् घातयेद् राजा शूद्रांश्च द्विजलिङ्गिनः ' ( मनु. ६।२२४ ) ( जो शूद्र द्विजोंका लिङ्ग तपस्या आदि धारण करते हैं, राजा उनको मरवा दे ) ' ये व्यपेताः स्वधर्माच्च परधर्मेष्ववस्थिताः तेषां शास्तिकरो राजा स्वर्गलोके महीयते ' ( अत्रि.१७ ) ( जो 1 शूद्रादि अपने धर्मको छोड़कर दूसरेके धर्मका श्राश्रयण करते हैं; उन्हें दण्ड देनेपर राजा सम्मानित होता है ); तब इससे द्विजोंके लिङ्ग तपस्या आदि रखनेवाले शूद्धको मार कर श्रीरामजीने मनु-स्मृति ( ६।२२४ ) की टेक रखी । इससे वादीका तथा आर्यसमाजी भूमित्रादिका पक्ष कट गया । स ० भ ० २४ An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) ३७० ] पक्ष मी गलत है । राजाके पापका ( च ) श्रीगङ्गाप्रसादजीका कर्तार " ( ८१८ ) फल प्रजाको भी मिला करता है । ' पापोऽधर्मस्य यहां प्रजाके पापका फल राजाको भी मिलना कहा है । ( शान्ति, १२६/११, आदिपर्व ८० | ३ ), मनु. ( ४ | १७३ ) में महाभारत भी स्पष्ट है । इसी प्रकार ' राजाके पापका फल प्रजाको मिलता " है ' यह बात स्वा. द. भी मान गये हैं । स.प्र. ६ समु. में स्वा. द. जीने अधर्मके चार विभाग माने हैं । एक भाग अधर्मके कर्ता, दूसरा साक्षी, तीसरा सभासदों ( प्रजा आदि ) और चौथा राजाको प्राप्त होना माना है ( पृ. १०२ ) राजाके पापका फल, भागनेवाले भृत्यको भी स्वा.द.ने ( प्र. ६२ में ) माना है । तब श्री. प्र. जी आदिका पक्ष कट गया । ( २७ ) वेदमें ' तपसे शूद्र ' ( यजु. ३०१५ ) जो लिखा है; यहाँ ' तपः शूद्रस्य सेवनम् ' ( ११।२३५ ) इस मनुकी व्याख्यानुसार त्रैवर्णिकोंकी सेवा ही शूद्रकी तपस्या है । श्रार्यसमाजी भी इसका ' कड़ा काम ' अर्थ करते हैं । इस विषय में आलोक ' ' ( ६ ) पृ. ८१-८२० में देखना चाहिये । ' तपसे शूद्र का वादिमान्य-' जातिनिर्णय ' में श्रीशि.शं. का. ती. जीमे ' बहुत परिश्रमी कठिन कार्य करनेवाला शूद्र ' यह ' तप ' का अर्थ किया है ( पृ. २८७ ) । ' आलोक ' ( ७ ) में पृ. ५० में इसका निर्देश होनेपर भी बादी उसपर चुप्पी लगा गया । इस प्रकार पृ. ८८१-८८२ में जो हमने लिखा था, उसपर भी वादी चुप है । इस प्रकार जहाँ - जहाँ हमने मीमांसा की है; वहाँ - वहाँ वादी चुप्पी लगा गया है, क्योंकि-शम्बूक शूद्रकी कथा [ जिसके पास अपना ज्ञान नहीं है; जो केवल दूसरोंकी चुरा - चुराकर लिखा करता है - वह तो थोड़ी ही ऊहापोह पुस्तक चुप हो ही जावेगा यह स्वाभाविक है, और कहता कर है - अपने पुस्तकको हमारी पुस्तकका उत्तर । भला निराधार पद्मवन - यह बेचारे जीव कहां तक उडान भरेंगे । हां, चे कई सुधारको ( नये साध्य वचन उपस्थित कर देता है, पर उससे उसका बन नहीं सकता 1 प्राचीन प्रमाण तो उसके पक्षमें हैं. यदि कहीं देता भी है, तो अपने आर्यसमाजियोंके ही नहीं । साध्य श्री उधृत भर कर दिया करता है, इससे अधिक बेचारा वादी प नहीं कर सकता । हमें लोग उसके प्रत्युत्तर देनेसे निषेध कारो इ हैं; और कहते हैं, कि इससे एक नगण्य बढ़ा हो जायगा; औ द उससे उसका महत्त्व हो जायगा, क्योंकि उसने यह ि अपना रखी है कि - ' महद्भिः स्पर्धमानस्य विपत्तिरपि शोभने । दिन्तभङ्गो हि नागानां श्लाघ्यो गिरिविदारणे ' उसे पराजय में में क लाभ है, पर हम सब्ध ० का पक्ष सुस्पष्ट करनेकेलिए यह मन्त्र ग माला निकाल रहे हैं । यदि एक नगण्यचा इससे कुछ नार ता चढ़ता है, इसमें कोई हानि नहीं । पर असत्पक्षको हमने काटा भ ' अवश्य है । व भ ( ख ) “ शम्बूक, ब्राह्मण के बालकको मारकर वनमें छुपकर करता होगा " यह श्रीगङ्गाप्रसादजीकी सन्दिग्ध एवं निराधार, श क वादी से उदधृत बात निष्प्रमाण है, केवल उनकी कपोलकलित श है । वे ऐसी कल्पनाएँ सुधारक जनताको प्रसन्न करने केलिए CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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[ श्री सनातनधर्मालोक ( 8 ) ३७२ / पुस्वर्थेष दिया करते हैं । रामायण में ऐसा कहीं नहीं लिखा । ह करने " लिखवा कह: है कि- इस निर्मूल पक्षको वादीने कैसे प्रमाण है - अप चर्य तो यह मान लिया? वादी अब उनके उत्तरदायित्वसे रामायणका पक्ष ऐसा प्रमाण दे कि - ब्राह्मणके बालकको उस शूद्रने मारा, और सुधारको वनमें छिप गया । हाँ, ' आत्मीये संस्थितो धर्मे शूद्रोपि स्वर्ग-उसका . मश्नुते । परधर्मो भवेत् त्याज्यः सुरूपपरदारवत् ' ( अत्रि. १८ ) - ही नहीं । इस श्रीगं.प्र.जीके इष्ट प्रमाणसे शूद्रने अपनी अनधिकृत, साध्य श्री परधर्मकी तपस्याको ग्रहण करके उस पापसे एक ब्राह्मणके बादी कुछ लड़केको मरवाया था । इसीसे श्रीरामने उस अनधिकृत - कर्म के षेध दण्डविधानार्थ उसे मारा था । देवता शूद्रको स्वर्ग में नहीं गा; और देते, इसका प्रमाण इतिहासकी वह प्रसिद्ध घटना है जिसमें यह नीति त्रिशङ्कु शापवश चाण्डाल बन गया था । विश्वामित्र द्वारां यज्ञ शोम करानेपर भी, उसे स्वर्ग में भेजनेपर भी वह स्वर्गसे ढकेल दिया जय में में गया था, वह वहीं अधर में लटका रह गया । इससे वह शुद्रकी यह ग्रन्थ तपस्या देवताओंको भी इष्ट नहीं यह सिद्ध होता है । मनुस्मृति में कुछ नाम भो लिखा है - ' दैवपित्र्यातिथेयानि तत् - [ शूद्रा- ] प्रधानानि यस्य काट तु । नाश्नन्ति पितृ - देवास्तद् न च स्वर्गं स गच्छति ' ( ३ । १८ ) । भविष्यपुराणसे वादी जिस प्रकरणसे पूर्वापर - प्रकरण छिपाकर कर शूद्रोंका यज्ञ आदि सिद्ध किया करते हैं, वहीं इन्द्र देवताने स्पष्ट निराघाट कहा है- ' तथा च शूद्रजनितैर्यज्ञैः तृप्ति न चाप्नुयाम् । मःम लकलित शत्रुर्वलिर्दैत्यः कलिपक्षमुपागतः । निस्तेजाश्च यथाऽहं स्यां तथा रने के लिए वै कर्तुमुद्यतः ' ( भविष्यपु. ३।२०।७४-७७ ) तब यह शूद्रोंका यज्ञ CC - 0. Ankur Joshi नियोग पर विचार [ ३७३ करना ' दैत्यमत ' सिद्ध हुआ, ' देवमत ' नहीं । इससे वादी के पक्ष-का कचूमर निकल गया, क्योंकि उसने भी ' दैत्यमत ' स्वीकृत ' कर रखा है । ' स्वर्गमाङ् नहि शूद्रोऽयं में शूद्रकी तपस्याका निवर्तन करके उसे स्वर्गसे गिरवाके यह ' आपने देवकार्य किया ' यह कहकर देवताओंने शूद्रकी तपस्या इष्ट नहीं मानी है । तभी तो चाण्डाल - त्रिशङ्कुके यज्ञमें कोई देवता नहीं आया । देवलोकमें भेजे गये त्रिशङ्कु- चाण्डालको देवेन्द्रने स्वर्गलोकमें नहीं आने दिया । ( ३८ ) ' दशास्यां पुत्रान् श्रा घेहि ' ( ऋ. १०८५४५ ) इस मन्त्रका स्वा.द. कृत अर्थ अशुद्ध था, यह हमने भली - भांति सिद्ध कर दिया था । उसपर वादीकी कमर टूट गई । अव उसने शेरसिंह-कृत ' नियोग - मीमांसा ' पुस्तक देखनेकेलिए कहा है । उसका यदि वादी उद्धरण यहीं दे देता; तो हम उसका खण्डन कर देते; क्योंकि इन लोगोंके पास चालाकीके सिवाय और कुछ आधार तो होता नहीं । असत्य - पक्ष शीघ्र ही गिर जाया करता है । यदि वादी उसकी बातों में कुछ महत्त्व समझता है; तो उसकी पुस्तक हमारे पास भेज दे, हम उसका प्रत्युत्तर दे देंगे । क्योंकि - इनका पक्ष निरा निर्मूल एवं असत्यके श्राश्रयपर हुआ करता है । अतः उसके काटनेमें कुछ भी प्रयत्न नहीं करना पड़ता । ‘ ऋग्विधान’के ‘ भ्रातुर्भार्यामपुत्रस्य ' का उत्तर हम अन्यत्र दे चुके हैं । इसके सिवाय तो वादीके पास अन्य कोई प्रमाण Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 204

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३७४ ] श्रीसनातन धर्मालोक ( 8 ) नहीं; और ' विधान ' वादीकी धर्मपुस्तक नहीं; अतः उसका पक्ष गिर गया । ' उदीर्ष्व नारि । " का अर्थ श्रीभीमसेनजी तथा श्रीअखिलानन्दजी यदि आर्यसमाज में रहकर नियोगपरक करते थे; यह सम्भव है; पर जब वे उस अज्ञानसे निकल आये; तब उन्होंने सनातनधर्ममें आकर उसका वास्तविक अर्थ लिखा है, वादी उसे मानकर अपना मत छोड़ दे । वह अब उनका आर्यसमाजके समयका अर्थ देकर उनके नामसे सनातनधर्मियों को धोखा क्यों देता है? यह उसकी बहुत बुरी असत्य प्रकृति है । ( ३६ ) नियोगविषयमें मनुजीने पूर्वपक्ष - उत्तरपक्ष लिखे हैं; तब क्या एक ही व्यक्तिकी लेखनीसे ऐसा नहीं लिखा जाया करता? देखिये न्यायदर्शनमें ' तदप्रामाण्यमनृतव्याघात - पुनरुक्तेभ्यः ' ( २।१।५७ ) ' न कर्मकर्तृ साधन - वैगुण्यात् ' ( २।१।५८ ) यह पूर्वपक्ष-उत्तरपक्ष | स्वा.द.जीने स. प्र. में नियोगमें पहले पापकी बात, वेश्याका धर्म आदि लिखा है; फिर दूसरा पक्ष लिखकर उस पूर्वपक्षका खण्डन कर दिया; तब क्या वादी यह एक ही स्वामीका, तथा श्रीगोतममुनिका परस्पर विरोध मान लेगा? ऐसे ही ' आचार्य ' ( वादी के शब्दों में ' अचारज ' ) आ.स. के भाग्य में लिखे पड़े हैं । श्रीतुलसीरामस्वामीजीने जो कि मनुजीके उत्तर-पक्षको प्रक्षिप्त माना है; वे तो नियोगके पक्षी हैं, तब वे नियोगके खण्डनको प्रक्षिप्त नहीं मानेंगे; तो और क्या करेंगे? तभी आप लोग प्रक्षिप्तता तथा स्वैराचारके अनुसार प्रामाण्याप्रामाण्य CC - 0. Ankur Joshi Collection नियोग और तुलसीराम । - विरहित जनतामें स्थिति ] [ ३७६ मानकर अनुसन्धान प्राप्त कर यदि जनता अनुसन्धानवाली होती; तो आप लोगोंको रहे ।. स्वाम छिपाने लायक स्थान भी कहीं न मिलता । हम निय इस विष अधिक स्थान न होनेसे संक्षेप में ही लिखेंगे । क्षत्रि ( ख ) पूर्वपक्षोक्त ‘ देवराष्ट्र वा सपिण्डाद् वा ' आदि प ' अन खण्डन ' नान्यस्मिन् विधवा नारी नियोक्तव्या द्विजाविधि रामर अन्यस्मिन् हि पद्यसे ' न ' शब्द के पूर्वपक्षोक्त ‘ देवर ' विधवाका भर्तासे है, शूद्र भले ही स्मिन् वर्णे ' अर्थ पूर्वपक्ष के पद्यमें ' नियुञ्जाना धर्म हन्युः सनातनम् ' ( ६६४ विध द्वारा शुरू होता है । इसमें ' अन्यस्मि ) ९ ) में भर । श्राद तथा ' सपिण्ड ' गृहीत होते हैं, सो द्विजाहिद अन्य देवरादिसे नियोगका निषेध किया म रहे ह नियोग करे । यहाँपर ' अन्यस्मिन ' का ' चाल गाम करना श्रीतुलसीरामजीका गलत है, क्योंकिनियोग वर्ण ' शब्द है ही नहीं, किन्तु उसमें हो!: तथा ' देवर वा सपिएड ' शब्द ही यहां अनुवृत्त हो रहे हैं । यहांअपन श्रीमेघातिथिने अवतरणिका बांधी है कि- पूर्वेण विहितस्यै निस हो ज प्रतिषेधोऽयम् ' । इसे वादीने छिपा लिया है । इससे नियोज ' अवि मेधातिथिके अनुसार खण्डन सिद्ध हो रहा है; फिर नियो श्री मेधातिथिको नियोगका मण्डक इन पद्योंमें कैसे सिद्ध आश्चर सकता है? यह लोग कब तक पूर्वापर छिपाकर अपने व उसमें पक्षको सिद्ध करते रहेंगे । अन्तमें तो कलई खुल ही जात ही है श्री तुलसीरामस्वामीका वर्णसंकरता में नियोगकी निदा हो; जबर्दस्ती अर्थ करना अपने स्वा. द. जीसे भी विरुद्ध है; क्यों विशेष Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 205

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ९ ) ३७६ ] कर रहे । ब्राह्मण वर्ण - श्रीव्यासजीका क्षत्रिय वर्ण वाली स्त्रियों से लोगोंको । स्वामीजीने है । वादी के अनुसार तथाकथित केवटजातिके शूद्रने इस विष नियोग वर्ण कहा वाली स्त्री से नियोग किया है; तब उक्त मनुपद्य में क्षत्रिय ' अन्यस्मिन्’का ‘ अन्यस्मिन् वर्षे न नियोक्तव्या ' यह श्रीतुलसी-नादियो अर्थ कैसे ठीक हो सकता है? द्विजों में नियोग तथा द्वजातिथि रामजीका विवाह निषेधका कारण ' नौद्वाहिकेषु मन्त्रेषु ' ( ६।६५ ) ( ६४ ) मनुजीने स्पष्ट कर दिया है । इस पद्यकी टीका भी श्री मेधातिथि न्यस्मिन् । श्रादि सभी भाष्यकारोंने नियोग - निषेधपरक ही की है । द्विनातिकी ( ग ) इस प्रकार जब इस स्थलमें नियोगके निषेधक पद्य चल न किया रहे हैं; तव ' अयं द्विजैर्हि विद्वद्भिः पशुधर्मो विगर्हितः । मनुष्या-णामपि प्रोक्तो वेने राज्यं प्रशासति ' ( ६६ ) इस अग्रिम पामें भी नियोगका निषेध ही सिद्ध है, विधान नहीं । वादी इससे पूर्वके पद्म में ठहरे तथा उनके भाष्य छिपाकर केवल इसी पद्यको जनताके सामने यहाँ अपना मनमाना अर्थ करके रख देते हैं; इसीसे जनता भ्रान्त हो जाती है । तव इस पद्य में पाठ चाहे ' विद्वद्भिः ' हो, चाहे से निक ' श्रविद्वद्भिः ', नियोगका निषेध चालू होनेसे इस पद्यमें भी फिर में नियोगके निषेधका ही अर्थ है, विधि कभी नहीं हो सकती । सेसि आश्चर्य है कि - वादी यह मोटी बात भी नहीं समझ सकता । अपने उसमें कारण पक्षपातके गदले आवरणका ' आँखों में आ जाना ही जारू ही है । जब वादीको किसी के वचन में अपने पक्षकी गन्ध आती नि हो; तब वह उसे ' प्रसिद्ध भाष्यकार ' श्रीमेघातिथिजी ' आदि है नौ विशेषण लिखने लग जाता है । अपनेसे विरुद्ध अर्थ हो; तो वह CC - 0. Ankur ' नियोग ' में विद्वद्भिः अथवा ' प्रविद्वद्भिः [ ३७७ उसे ‘ पौराणिकभाष्यकार् ' लिखकर उससे अपनी जान छुड़ा लेता है । वादी श्रीमेघातिथिका उद्धरण देता है - अर्थवाद ' एव नियोग-प्रतिषेधशेषः । ये अविद्वांसः सम्यक् शास्त्रं न जानते, तैरयं पशु-धर्मः । स च अत्यन्तगर्द्दितो मनुष्याणामपि प्रोक्तः प्रवर्तितः ' । वादीने इसे श्रीशिवशर्माके ' शास्त्रार्थमहारथी ' से उद्धृत किया है । इस उद्धरणका गलत अर्थ लिखता हुआ वादी अपनी संस्कृतानभिज्ञता सूचित कर रहा है । लिखता है - ' नियोग पशु-धर्म है - यह वे लोग कहते हैं, जो शास्त्रको नहीं जानते, ऐसे ही मनुष्य इसको निन्दित जानते हैं ' । यह वादीका अर्थ गलत और प्रकरण - विरुद्ध है । इसमें प्रमाण यही है कि अर्थवाद एव नियोगप्रतिषेधशेष: ' इस स्वलिखित मेधातिथिके वचनका वादीने अर्थं छिपा लिया है । यहाँ यह भाव है कि - ममुजी नियोगका निषेध - शेष बताते हुए अर्थवाद ( पुराकल्प ) देते हैं ' । इससे यह पद्म मेधातिथिके मतसे भी नियोगका निषेधक सिद्ध होगया । तब वादीका किया अर्थ गलत सिद्ध होगया । व हम बताते हैं कि - चाहे उक्त पद्यमें ' विद्वद्भिः ' पाठ हो, चाहे ' अविद्वद्भिः ' अर्थ यहाँ दोनों ही पाठोंमें नियोगके निषेधका ही है । ( घ ) पहले ' विद्वद्भिः पाठके अनुसार अर्थ देखिये ।– ' अयं-नियोगः, विद्वद्भिर्द्विजैः ' पशुधर्मः ' इति विगर्हितः । वेने राज्यं प्रशासति श्रयं पशुधर्मो मनुष्याणामपि प्रोक्तः ' । इस नियोगको Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 206

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३७८ | श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) विद्वान् ब्राह्मणोंने ' पशुओंका धर्म ' ( क्योंकि - इसमें बिना वेद-मन्त्रीय विवाह के किसीकी स्त्रीको ले लेना पड़ता है । ) कह कर निन्दित किया है । इस पशुओंके धर्म ( नियोग ) को राजा वेनके राज्यमें मनुष्यों में भी चालू किया गया था । इससे नियोगका पूर्वपक्ष राजा वेनसे चलाया हुआ था, और यह पशुओंका धर्म था - मनुष्योंका नहीं; पर वेनने उक्त पशुधर्मको मनुष्योंका धर्म बना दिया, यह सूचित किया गया है । इससे पाठकोंने नियोग-की पशुधर्मता, इसी कारण निन्दनीयता मनुजीके मत में जान ली । ( ङ ) अब ‘ अविद्वद्भिः ’ पाठके अनुसार अन्वय एवं अर्थ देखिये - ' अयं विगर्हितः पशुधर्मः ( नियोगः ) वेने राज्यं प्रशासति अविद्वद्भिर्द्विजैः मनुष्याणामपि प्रोक्तः । अर्थात् इस निन्दित पशु-धर्म नियोगको अविद्वान् द्विजोंने राजा वेनके शासनकाल में ' यथा राजा तथा प्रजा ' इस न्यायसे मनुष्यों में भी जारी कर दिया था । उन नियोग चालू करने वाले द्विजोंको अविद्वान् कहनेका भाव यह है कि था तो यह कामी पशुओंका धर्म ही, पर उन श्रविद्वानोंने उसे कामी वेन - राजाके संकेतसे मनुष्यों में भी चलवा दिया । ( च ) व विद्वान् पाठकोंने समझ लिया कि इस अर्थ में भी नियोगका मनुष्यों में निषेध ही सिद्ध हुआ । अब पाठक वादीसे ' दिये हुये श्री मेधातिथिके भाष्यका भी अर्थ देखें-' ये विद्वांसः - ( जो अविद्वान् हैं ) सम्यक् शास्त्रं न जानते CC - 0. Ankur Joshi Collection नियोग पशु धर्म ३८१ ( शास्त्रको ठीक - ठीक नहीं जानते हैं ) तैरयं पशुधर्मः जान - बूझकर विराम - चिन्ह दे दिया है, जिससे [ यहां बाहर होन निकल सके, पर अभी यह वाक्य समाप्त नहीं उसका इष्ट में क अविद्वानोंने इस पशुधर्म नियोगको ) स च अत्यन्तगर्हितः हुआ ] ( सकत अत्यन्त निन्दित था ) मनुष्याणामपि - प्रवर्तितः ( मनुष्योग चालू कर दिया ) । अव पथिकजीका कार्थ कहां चला इत्या ‘ नियोग पशुधर्म है, यह वे लोग कहते हैं, जो शास्त्रको गया कि. हो स्वयं छपा जानते । ऐसे ही मनुष्य इसको निन्दित जानते हैं ' । उसकी उल्टा शास्त्रको न जानने वाले लोग इसकी निन्दा में लिख करेंगे? वे तो गुलछर्रे उड़नेसे उसे उल्टा पसन्द करेंगे । शब्द है । उ लोग ही इसको पशुधर्म कहेंगे । वादीने ' मनुष्याणामपि प्रो. लक्ष्म प्रवर्तितः ' इसका प्रर्थं न करके इस मेधातिथिंके वाक्यको रं ' ऋषि असम्बद्ध कर दिया; तथा छिपा दिया । पहला वाक्य भी ि इस लिया ही था । अब वादीका ' शास्त्रार्थ - महारथी ' भी अता मालूम गया । उसके आगे पाठ था, ' स च इदानीन्तनो न । आदि कर भ राज्ञि प्रशासति - राष्ट्र पालयति [ सति ] ' इसे भी वादीने छिपा दिय संस्कृत इससे नियोग राजा वेनसे चालू होनेसे अर्वाचीन सिद्ध होता आर्यस यह वादी लोग प्राचीन प्रमाणोंके पूर्वापर छिपाकर अपने उधृत नाकको छिपानेका प्रयत्न किया करते हैं, पर जब वह पूर्वापर है । य कर दिया जाता है, तब वादी चुप्पी लगा जाते हैं? अव वाड़ी म • शक्ति नहीं है कि- इसपर कुछ लिख सके । यहां पूर्व - कल्पके से वहाँ ि - राजाका वर्णन किया है; सृष्टिके आदिम बहुतसे कल्प बीरे! तात्पये Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 207

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श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) ३८० ] यहाँ वेनका उद्धरण देनेसे मनुस्मृतिकी सृष्टचादिता-बार होनेसे पुराकल्पके काइट क्षति नहीं पड़ती; श्रतः प्रक्षिप्तता भी इन पद्योंकी नहीं हो में कोई हुआ ] ( सकती । गर्हितः ( छ ) आगे श्रीमेधातिथिका ' ननु च लिङ्गानि नैव सन्ति ' मनुष्यों इत्यादि रूपसे वादीने उद्धरण दिया है, वह उद्धरण बहुत अशुद्ध ना गया छिपा है । इससे मालूम होता है कि - वादीने मेधातिथिका भाष्य स्वयं नहीं देखा, श्रीशेरसिंहका अशुद्ध उद्धरण और अशुद्ध अर्थ उसकी पुस्तकसे उधृत कर लिया है । शेर सिंहजी की अशुद्ध बातें निन्दा में लिख देनेकी प्रकृति है । उनकी ' नमस्ते की प्राचीनता ' मेरे पास गे । रात है । उसके पृ. २६ में ' राम की सीता को नमस्ते ' पृ. २७ में ‘ राम को मपि प्रो लक्ष्मणको नमस्ते ', ' जनकको याज्ञवल्यकी नमस्ते ' । पृ. २४ में वाक्यको ' ऋषिकी राजाको नमस्ते ' आदि बहुतसे अशुद्ध उद्धरण दिये हैं; न्य भी कि इस विषय में ' आलोक ' ( १-२ ) में हम लिख चुके हैं । इससे बी मालूम होता है कि - शेरसिंहजी आर्यसमाजका पक्ष असत्य बोल-आदि कर भी सिद्ध करना चाहते हैं । पर वादी बेचारा भी क्या करे । छेपालि संस्कृतका स्वयं ज्ञान उसे होता श्रार्यसमाजी यदि अशुद्ध अपने उद्धृत कर दिया करता है; र्वापर है । यह नहीं समझता कि नवबादी मेधातिथिके भाष्यमें कल्पके से वहाँ छिपाकर ' अन्यत्र तु = पीने तात्पर्य यह है कि वैवाहिक बहुत न्यून है; सो जैसा कि दूसरा भी अर्थ कर दे; वह उसे गद्गद होकर और अपने पक्षकी सिद्धि समझ लेता अन्तमें असत्यका पर्दाफाश होगा । शङ्का ' नैव ' से शुरू होती है, वादीने दृश्यते ' से कर दिया । मेधातिथिका मन्त्रों में नियोग अथवा विधवाविवाह-CC - 0. Ankur नियोग और मेधातिथि [ ३८१ Joshi Collectory Gujarat. का वर्णन नहीं आता हैं, पर ' विधवेव देवरम् ' इस मन्त्रमें है, जो विवाहित - विधवाकेलिए नहीं है किन्तु वाग्दत्ता - विधवाकेलिए आया है । उसीका अनुवाद ' यस्या म्रियेत कन्याया वाचा सत्ये कृते पतिः । तामनेन विधानेन निजो विन्देत देवर: ' ( ६६६ ) इस मनुपद्यमें आया है । सो उस वाग्दत्ता - विधवाका नियोग ' विघ-वेव देवर ' के कथनसे हुआ करता है - यह मेघातिथिका अभिप्राय है | परन्तु उसी नियोगको कलियुगकेलिये व्यवस्थापित पराशर-स्मृतिने ' क्लीवे च पतितेपतौ ' द्वारा विवाहरूपमें परिणत कर दिया है, सो वह तो अब भी हुआ करता है । सगाई की हुई लड़कीका पति मर जावे; तो उसका विवाह तो अव भी यथासम्भव देवरसे कर दिया जाता है । ' प्रदानं स्वाम्यकारणम् ' ( ५/१५२ ) इस मनुवचन के अनुसार उस वाग्दत्ताके पति मर जानेपर भी वह विधवा होती है, सो उसका विवाह अभ्यनुज्ञात है । इससे वादीका पक्ष तो कभी सिद्ध होता नहीं । वादी तो अपना माना हुआ नियोग भी नहीं करते । वे तो स्वा. द. जीसे विरुद्ध शूद्रता-पादक विधवाविवाह कर दिया करते हैं । हमारे यहाँ नियोगको कलिवर्जित माना जाता है । इससे हमारे पक्षमें कोई भी दोष नहीं आता । आगे वादी ' अन्यैर्विद्वद्भिरिति पठितम् ' यह मेधातिथिका पाठ देता है, पर उसके आगे जो श्रीमेधातिथिने लिखा था--' गर्हितो मनुष्याणां प्रोक्तः । पशूनामेव धर्मो भ्रातृस्त्रीगमनं नाम । स च प्रवृत्तो वेनस्य राज्ये ' इस पाठको तथा अर्थको वादीने An eGangotri Initiative

पृष्ठ 208

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३८२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( E ) जान - बूझकर छिपा दिया; क्योंकि इससे उसका प्यारा नियोग पशुभोंका धर्म सिद्ध होता है, तथा राजा वेनके कालसे जारी होनेसे आदिमान् सिद्ध होता है । विना पूर्वापर छिपाये आर्यसमाजका यह पक्ष त्रिकालमें भी सिद्ध नहीं हो सकता; तब यह बेचारे वादी पूर्वापरको छिपा कर ही अपना निर्वाह किया करते हैं; और क्या करें । ( ज ) जो कि श्रीतुलसीराम - स्वामीने उक्त पद्योंको प्रक्षिप्त न माननेके पक्षमें वेनके जारी किये हुए नियोगको भिन्न वर्णोंमें जारी कर देनेकेलिए निषिद्ध ठहराया है, वह भी गलत है । वेद-व्यास ब्राह्मणके पुत्र ( पराशरोत्पन्न ) होनेसे ब्राह्मण थे, यह सर्वसम्मत है । अथवा वादी के अनुसार वह केवटकी पुत्री से उत्पन्न होनेसे जन्मना केवट थे - यद्यपि यह बात गलत है- हम इसका पहले खण्डन कर चुके हैं - फिर उनका अपनेसे भिन्न वर्णकी क्षत्रिया अम्बा - अम्बालिकासे जो नियोग बताया है, वह भी फिर वर्णसङ्करता होनेसे निषिद्ध सिद्ध हो गया, फिर स्वा. द. जीने उसे कैसे समर्थित किया? वस्तुतः यहाँ यह अर्थ नहीं है; वहाँ नियोगको ही - चाहे वह एक वर्णमें हों, चाहे भिन्न - भिन्न वर्णमें हो; सङ्करताकारक हो ही निषिद्ध ठहराया गया है । जैसे कि - ' अवेद्यावेदनेन च । ·· ' जायन्ते वर्णसङ्कराः ' ( मनु. १०।२४ ) ' परदाराभिमर्शेषु जायते चरणॆसङ्करः ' ( मनु -८ | ३५२-३५३ ) यहाँ अवेद्याके वेदनसे ही, चाहे वह अपने वर्णकी भी हो, तथा परस्त्री गमन दोनोंसे ही सङ्करता नियोग सङ्करतकारक [ s बताई गई है । क्योंकि छोटे भाईकी स्त्री बड़े भाई " समान होती है, और बड़े भाई की स्त्री छोटे भाईकी की बहडे । समान होती है । जैसे कि मनुजीने कहा है- ' भ्रातुज्येष्ठस्य मातादे या गुरुपत्न्यनुजस्य सा । यवीयसस्तु या भार्या भाषा स्मृताः । ज्येष्ठो यवीयसो भार्या यवीयान् वाग्रजस्त्रियम् स्नुषा ज्येष्ठस्य: सा । पहिले न भवती गत्वा नियुक्तौ अध्यनापदि ' ( ६।५७-५८ ) दोनोंके इतरेतरकी स्त्री गमन होने से पतितता होती है । इसी वेद्या ( गमन करने अयोग्य ) के वेदनसे तथा भिमर्श होनेके कारण नियोगसे वर्णसङ्करता तथा इसीलिए परदारा उसक • कर्तव्यता मानी जाती है । स्पष्ट है कि यहां श्रीतुलसीरामजी-की ' वर्णसङ्करता ' का व्याज गलत है । नहीं तो फिर वादी क्षत्रिया स्त्रियोंका महाभारत- द्वारा ब्राह्मणोंसे नियोग करना कैसे मानते हैं? वर्गसङ्घरता तो बिवाहमें भी अच्छी नहीं, तब नियोगमें शुद्ध उसका निषेध कुछ विशेषता नहीं रखता । इस विषय में हमने ' खा, वा दयानन्दीय नियोग निरीक्षण ' में विशेष विचार किया है; सम्भवतः अत्रम पुष्पमें निकलेगा । अतः श्री तुलसीरामजीका वह वाद अर्थ भी गलत है । नियोगको कुल्लूकभट्ट भी निषिद्ध मानते हैं । तथा इ श्लोकोंको नियोगका निषेधक मानते हैं । शेष जो कुल्लूक वे इस निषेधको कलिविषयक माना है, वह भी ठीक है । तभी ही तो स्वाद जी के बल लगाने पर भी, आर्यसमाज के इस विषय में कर शास्त्रार्थ करने पर भी नियोग कलिमें उनके सम्प्रदाय में भी चालू नीच श्रय हो सका ॥ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्री सनातनधर्मालोक ( ९ ) [ ३ ३८४ ] अन्य युगोंमें जो नियोग कुल्लूक मानते हैं, उन्होंने इस बहु विषयमें कारण बताया है — ' युगक्रमाद् श्रशक्योऽयं कर्तुमन्यैर्वि-मावावे धानतः । ' अर्थात् भिन्न युगोंमें तपस्वी लोग शक्तिशाली विधिपूर्वक स्य भार्या ( बिना मैथुन के ) नियोग कर सकते थे, पर इस युगमें वह शक्ति ष्ठस्य सा नहीं रही । तब कोई वैसा प्रयत्न न कर सके; अतः नियोग | पति निषिद्ध कर दिया गया । तभी श्रीकुल्लूकने बृहस्पति की साक्षी दी तरेतरकी. ड्दै – ‘ तपोज्ञानसमायुक्ताः कृतत्रेतायुगे नराः । द्वापरे च, कलौ तृणां शक्तिह्नानिहिं निर्मिता । अनेकधा कृताः पुत्रा ऋषिभिश्च परदारा पुरातनैः । न शक्यन्तेऽधुना क्रतु शक्तिहीनैरिद्रन्तनैः । इससे उसकी नियोगके सम्बन्धमें प्रकाश पड़ रहा है कि वह कर्तव्य नहीं, रामजी- विशेष कर कलियुग में । तब वादीका पक्ष गिर गया । किसीने क्षत्रिया भी नियोग को, विशेष करके कलिमें ठीक नहीं माना । तव से शुद्ध ' पौराणिक विद्वान् भी मनुस्मृतिसे नियोग सिद्ध कर रहे हैं ' यह नियोगम - वादीकी बात खण्डित होगई । ' स्वा, ( ४० ) ‘ उत यत् पतयः ’ के वादीके किये अर्थ में हमने ८८४ पृ.में वह वादीपर आपत्ति बताई थी; वादी उसपर चुप रहा । फिर हमने नजीका श्रीधर्मदेवजी का अर्थ दिया था, उससे भी उसका खण्डन होगया, वे तो अब भी लिखते हैं- ' मैं तो अब भी ब्रह्मविद्यापरक अर्थको कल्लूक ही वेदोंकी उच्च भावनाके अनुकूल समझता हूँ ', इससे ११ पति अर्थ तभी करनेको वादीके गुरुजीने भी नीच - भावना और वेदोंके लिए वषय में अयोग्य बतलाया है । अब वादीकी इच्छा है कि वह वेदसे भावनावाला अर्थ करे, वा उच्च भावना वाला । ' मेरा दिया CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. ब्राह्मणका अर्थ ' विद्वान् ' नहीं [ ३८५ हुआ अर्थ आधिभौतिक है ' इस वादी के वाक्यपर हंसी आती है, इसमें ' अधिभौतिकता ' कैसी है? हमने दश देवता आदि अर्थ किये थे; उसमें ' आलोक ' ( ८ ) में प्रमाणोपपत्तियाँ कई थीं, पर वादी इन प्रमाणोंको छिपा गया भी दी । यहां पर ' ब्राह्मण'का अर्थ वह ' विद्वान् ' करता है; वहाँ उसने प्राचीन प्रमाण न देकर आर्यसमाजी श्रीनित्यानन्दजीका वचन दे दिया । वह साध्य होनेसे सिद्ध नहीं । यदि ' ब्राह्मण ' का अर्थ ' विद्वान् ' होता; तो ' विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे ' ( गीता ५११८ ) ' विद्वांसं ब्राह्मणं ' ( अथर्व. १३ | ३ | १ ) ' मनीषी ( विद्वान् ) त्राह्मण: ' ( ऋ. १।१६४ | ४५ ) ' विदुषा ब्राह्मणेन ' ( मनु. १।१०३ ) यह शब्द इकट्ठ े न आते; और ' ब्राह्मणेषु च विद्वांसः ( मनु. १६७ ) यहांपर विभक्तिभेद न होता । अत: ' ब्राह्मण ' का अर्थ ' विद्वान् ' नहीं होता । यदि ऐसा होता; तो ' देवद्विज ' ( ब्राह्मण ) गुरु- प्राज्ञ - ( विद्वत् ) ( गीता ७/१४ ) में प्राज्ञ ( विद्वान् ) और ' द्विज ' ( ब्राह्मण ) इन दोनोंकी पुनरुक्ति न होती । श्रीनित्यानन्दजीके अर्थ में १० पतियोंकी संगति भी नहीं लगाई गई है । ( ४१ ) आगे वादी के लिखे ' मारिषा ' के दशपतिपर हमने लिखा था कि - न यह विधवाविवाह के थे, न नियोगके, तब १० पतियोंका नियोग इस दृष्टान्तसे कट गया । इस दृष्टान्तका उपन्यास व्यर्थ होगया । पुराणने जो कुछ लिखा है, उसकी व्यवस्था हमने दिखला दी । फिर वादी यदि पुराणको नहीं मानता, तब उसका प्रमाण देकर ' अर्धजरतीय ' क्यों करता है? हमने वादीसे दिये स ० ध ० २५ An eGangotri Initiative

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३८६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) हुए ही मारिषाके उदाहरणसे सिद्ध कर दिया था कि उसका छोटी प्रायु में विवाह हुआ था; और विधवा होनेपरभी उसने पुनर्विवाह नहीं किया; तब यदि वादी इस इतिहासको वेदविरुद्ध वा सृष्टिक्रम-विरुद्ध समझता है; तब तो उसके दस पति भी वेदविरुद्ध हैं, तब पुराणाश्रित उसका पक्ष गिर गया । हमने तो उसकी व्यवस्था बता दी है । मारिषाके ६३-६५ पद्यमें वादीने जान - बूझकर ५६-६० संख्या लिख दी थी; जिससे एक गलत सिद्धान्त सिद्ध होता था; पर अब उसने उसका दोष मुद्रकोंपर डाल दिया, यह असत्यता है । यही उसने १६३ पृष्ठमें ( उपयोग लें ) इस अपने लिखे ब्रकेटको जो नी. ती वि. के १७२ पृष्ठमें लिखा था कि उनके भाष्य में ' भोग करें ' के आगे ' ब्रकेटमें ' ( उपयोग लें ) लेख स्पष्ट दिया है, यह लिख कर भी उस अपने लेखमें ' ब्रकेट ' लिखनेका दोष मुद्रणालय पर डाल दिया है । यह है इन लोगों का सत्य-व्यवहार!!! मारिषा और वार्त्तीको वादी भिन्न - भिन्न मानता था; हमने जब उसका अज्ञान दिखलाया; तब वह उसपर चुप होगया । वार्त्तीको ' अयोनिजा ' पुराणने ही बताया था, वह हमने सिद्ध कर दिया । यह भी लिख दिया था कि - अयोनिज में योनिजों वाली व्यवस्था नहीं होती । इसमें हमने द्रौपदीका उदाहरण भी दिया था । इससे भी वादीका पक्ष कट गया; और चुप हो गया । अव भी कभी नहीं बोल सकता । जो कि वह वार्त्तीके ' अयोनिजा ' होने में सृष्टिक्रमविरोध मानता है; तब तो फिर वार्त्ती भी कोई नहीं CC - 0. Ankur Joshi Collection हुई । वादीका फिर स्वयं मरे १० ति नियोगसे कमर टूट गई । दिव्याका विवाह पूर्ण नहीं हुआ [ ३ = पक्ष वेदविरुद्ध दृष्टान्त देनेसे स्वयं कट हुए को क्या मारा जाए? और फिर गया । क इस दृष्टान् भी वह सिद्ध न कर सका । इसलिए उसके वह सदाकेलिये उठने योग्य न रहा पक्षी । लि । ( ४२ ) अब वह ' पद्मपुराण में २१ पतिका विधान ' यह क शीर्षक देता है, हम उसका ७ म पुष्पमें निराकरण कर ही गस था चुके है ॥ उसका वादी कुछ भी प्रत्युत्तर नहीं दे सका । केवल में वह विषयोंको फिर दुबारा - भर लेता है कि- जनता यह न सम कि कुछ भी प्रत्युत्तर नहीं दिया गया । अब कहता है कि-कोई पाठ नहीं छिपाया ' । ' विवाहसमये प्राप्त ', प्राप्त ' जाव विवाह-समये ', तस्या विवाहकाले तु, ' अनुद्वाहितायाः कन्यायाः ' आदि उद्वा पाठ उसने छिपा हो तो लिये थे; जिससे उसका पक्ष कटता था । कन्य वादी लिखता है - ' जितने पाठकी आवश्यकता होती है, वह वह प्रदर्शित कर दिया जाता है । आप तो व्यर्थका सारा प्रकारा ठीक लिखकर साधारण जनता में अपनी विद्वत्ताकी धाक जमाना यह चाहते हैं ' । यह वादीके सन्तप्त हृदयके उच्छ्वास हैं । पूर्वापर करते प्रकरण दिखलाने से ही तो ग्राप लोगोंकी चोरी वा चाल पकड़ी जाती है, और आप लोगोंका पक्ष गिर जाता है, पर आपलोग अपने प यह गिरने के डर से उन पद्योंको छिपा देते हैं; जिनसे हमारा प वाहि किया सिद्ध होता है । रीका अब वादी बतावे कि जब दिव्याका विवाह पूर्वके प्रमाणे पदवी द्वारा किसीसे सम्पन्न हुना ही नहीं; न सप्तपदी हुई, न चतुर्थी Gujarat. An eGangotri Initiative