सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 211–220

सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 211–220

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) [ s ३८८ ] तब उसके २१ पति कैसे हो गये? अव वादी स्वयं बतावे ट गया कर्म, । कि उसका पक्ष खण्डित हो गया, या नहीं? दृष्टान्तो ( ख ) आगे वादी अपनी इस निरुत्तरताकी झेंप मिटानेके-लिए हमें डाँटता हुआ लिखता है— ' आपने यहाँ भी पाठभेद करके जघन्य पाप किया है; और अपने पक्षपुष्टि करनेका कुप्र-हगढ़ यास किया है । ' उद्वाहिताया: ' पाठ है, जिसे आपने ' अनुद्वद्दित ' चुके है । में परिवर्तन कर दिया है । आनन्दाश्रम में ' उद्वाहितायां कन्याया-वह मुद्वाहः क्रियते बुधैः ' यह पाठ है ' । सम अब पाठक देखेंगे - भ्रान्त पथिकका पक्ष अभी - अभी कट कि - मैत्र जावेगा । वादीसे प्रष्टव्य है कि वह ' उद्वाहितायाः कन्याया-विवाह-उद्वाहः क्रियते बुधैः ' यह पाठ ठीक मानता है, अथवा ' अनुद्वाहित-' आदि कन्याया उद्वाहः क्रियते बुधैः ' इस पाठको ठीक मानता है? यदि ना था । वह ' उद्वाहितायाः कन्याया उद्वाहः क्रियते बुधैः ' इस पाठको है, वह ठीक मानता है; तो उसका अर्थ क्या करता है? उसका अर्थ तो प्रकरण जमाना यह होगा कि - ' पण्डित लोग विवाहित हुई लड़कीका विवाह किया करते हैं ' । पूर्वापर जाती है, यदि वादी इसका यही अर्थ मानता है; तो अपने सम्प्रदायमें ने पक्के यह घोषणा कर दे कि -'महाशयो! आप लोग कुमारी- ( अवि-राप वाहिता लड़की ) का विवाह न करके विवाहिता - स्त्रीका विवाह किया करो ' । फिर आर्यसमाजी भी इस बातको मानकरकुमा-मा रीका विवाह कराने वाले स्वा. द. जीकी तथाकथित ' महर्षि ' चतुर्थी पदवी छीनकर इस ' पथिक ' को वह पदवी दे डालें, जिसकेलिए CC - 0. Ankur Joshi ब्याही हुईका विवाह नहीं [ ३८६ Collection Gujarat यह पथिक समय - समयपर स्वा.द.जीकी बातोंको भी काटकर उसमें अपनी इच्छा ही रख दिया करता है । अब वादी बतावे कि - ' अनुद्वाहितायाः कन्याया उद्वाह: ' पाठ संगत हुआ, या ' उद्वाहितायाः कन्याया: '? क्या वह विवा-हिताको ' कन्या ' माना करता है? व्याही हुई स्त्रीका विवाह कोई भी नहीं करता । स्वामी भी व्याही हुई विधवाका नियोग तो कराते हैं; विवाह नहीं । सो यहाँ अब वादी बतावे कि - नु-द्वाहितायाः कन्याया विवाहः ' पाठ संगत हुआ; या ' उद्वाहितायाः कन्याया: ' पाठ? अब वह जैसा पाठ कहे; उसपर हम उसे समझा देंगे । यदि वह कहे कि - ' उद्वाहितायाः कन्याया उद्वाहः क्रियते ' बुधैः ' पुराण में यह पाठ है, क्योंकि - श्रीवदरीदत्त जोशी, मनसा-राम आदिने यही पाठ दिया है; तब वादी बतावे कि वह इसका अर्थ क्या करता है? क्या यह कि - ' पण्डित लोग विवा-हित हो चुकी लड़की का विवाह किया करते हैं ' । क्या वादी इस अर्थको मानता है? अविवाहिताका विवाह तो सर्वसम्मत है, विवाहिताका विवाह भला कैसे हो? । अथवा मान भी लिया जावे कि यहाँ ' उद्वाहितायाः कन्याया उद्वाहः क्रियते बुधैः ' यह पाठ है; तब भी ' अनुद्वाहित-कन्यायाः ' वाला ही तात्पर्य निकला । क्योंकि - सप्तपदी हो चुकने पर उसे ' कन्या ' नहीं कहा जाया करता; किन्तु ' भार्या ' वा ' वधू ' • कहा जाता है; और उक्त पद्यमें ' कन्यायाः ' यह पाठ है, क्या . An eGangotri Initiative

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३ ९ ० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) वादी यह स्पष्ट बात भी नहीं समझ सकता? । सो वहाँ ' विवाहिताका विवाह ' अर्थ तो असम्भव है; उसमें ' उद्वाहिताया: कन्यायाः ' का यह अर्थ होगा कि - ' उद्वाहयितुमारब्धायाः ’ ' जिसका विवाह शुरू होनेवाला है ' पूरा विवाह न हो चुका हो । यहाँपर ' त ' प्रत्यय भूतकालमें नहीं है, किन्तु आदि - कर्म में है । जैसे कि -'सम्प्रस्थितो वाचमुवाच कौत्सः ' ( रघुवंश ५।३२ ) यहाँ ' क ' का अर्थ ‘ सम्प्रस्थास्यमानः ' ( चलनेको तैयार है, न कि ' चल चुका हुआ ' । इसी प्रकार ' उद्वाहिताया: ' का अर्थ भी ' उद्वाहयिष्य-माणायाः ' अथवा ' उद्वाहयितुमारब्धायाः ' है; सो यहाँ वही ' अनुद्वाहितकन्यायाः ' का अर्थ निकला । बात वही हमारी निकली । ' भक्षितेपि लशुने न शान्तो व्याधिः ' वादीका इष्ट ' उद्वाहितायाः कन्यायाः ' का पाठ भी उसके पक्ष अर्थवाला न होकर हमारे ही कहे अर्थवाला हुआ ।.. इसपर यदि वादी पूरा ज्ञान प्राप्त करना चाहे, तो ' आलोक ' ( ८ ) ( पृ. ६२३-६२९ ) देखे । उसको पूरा समाधान प्राप्त हो जायगा । अव पूरा प्रकरण देते हुए वादीके पद्य में ' प्रथमे वयसि सा च वर्तते ' ( ५६ ) यहाँपर दिव्याकी छोटी आयु में विवाहकी तैयारी सिद्ध होती है । वहीं ' तस्या विवाहकाले संप्राप्ते ' कहा है कि-विवाह शुरू होनेका समय जब होने लगा, ' मृतोऽसौ चित्रसेनस्तु ' यहाँ विवाह समाप्त होनेपर दिव्याके ' पतिकी मृत्यु न कहकर, विवाहकाल प्राप्त होने के समय मृत्यु कही गई है । पूरे प्रकरणने बादीके पक्ष की कमर तोड़ दी है । पूरे प्रकरण में वादीने अनुद्वा-CC - 0. Ankur Joshi Collection दिव्याका विवाह पूर्ण नहीं हितायाः कन्याया उद्वाहः क्रियते बुधैः ' पाठ देकर हमारा पक्ष सिद्ध करके अपने पक्षका निराकरण कर दिया है । बधाई । पर उसका ८५ पृष्ठमें ' विवाहिता ३ बुद्धिमान् लोग फिर दूसरेके साथ विवाह कर देते हैं । कन्यार य कर दिया है । ' अनुद्वाहितायाः ' का ' विवाहिता ' अर्थ ह कैसे किया? और ' फिर ' अर्थका वाचक ' पुनः ' शब्द भी मूलपाठ में कहाँ पड़ा है कि उसने ' फिर ' अर्थ कर दिया उप वादीको बताना पड़ेगा । था। वस्तुतः इन लोगोंने असत्य अर्थोंका व्यवहार करके में भाले लोगों को अपने षड्यन्त्र में फँसा लिया है? । पृ.६ उस. वादीने ‘ विवाहके समीप ही रूपसेनका मरना कहा है । इसे हुआ वादीका ही पक्ष कटा; क्योंकि दिव्याका विवाह श्रमी है । पहले नहीं पाया था; तब वह ' अनुद्वाहिता ' ही सिद्ध हुई । ' विह महाराज उद्यमं कृतवान् नृप! ' में राजाका दिव्याकेलिए ६ हार्थ उद्यम तो कहा है, पर वादीका लिखा ' दिव्या देखी यहाँ बार ' विवाहं चक्र ' ' ऐसा पाठ हमें कहीं नहीं मिला, तत् ' विवाहका पूर्ण हो चुकना ' अर्थ सिद्ध होता है । इसरे तो व वादीसे किया हुआ प्रक्षेप मालूम होता है । सप्तपदीसे पर्याप्त विवाह होना नहीं माना जाता; तब वहाँ ' अनुहि अपने कन्यायाः ' पाठ ही संगत सिद्ध हुआ । जो पूनाका ' पत्र पुराण छपवाया है, वहाँ भी ‘ अनुद्वाहितायां ' यह पाठान्तर स्त्री अक्षर दिया है; तब भी बादीका ही पक्ष खण्डित है । ' जब जा ' ज Gujarat An eGangotri Initiative

पृष्ठ 213

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३६२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) ८४ पं. दिव्यादेवीका विवाह करता; तब - तब समय पर ही पति मर रण जाता । ' यह वादीका अर्थ ' प्रवचनापूर्ण ' है । यहाँपर ' जब - जब हिता कन्या राजा विवाह करने लगता; तब - तब विवाह के समय श्रर्थात् हैं ' यह आरम्भमें ही उसका भावी पति मर जाता ' यही अर्थ वहाँपर है । बहीं ६६ पद्यमें ‘ भर्ता च म्रियते काले प्राप्ते लग्नस्य सर्वदा ' में बाद भी वही हमारी बात सिद्ध होती है कि उसका विवाहलग्न अभी कर दिया उपस्थित ही होता था कि उनका वर उसी समय मर जाता था; लग्न पूरा ही नहीं हो पाता था । करके भी ( ग ) श्रागे जो श्रीशिवस्वामीका उद्धरण वादीने १ । उसमें · लिखा है कि- ' परन्तु इन स्वार्थी जीवोंको दिया है, इतना ज्ञान नहीं है । इससे हुआ कि -'अनुद्वाहितायाः कन्याया: ' यहां पर ' छन्दोभङ्ग ' होगया । अभी पहले चरणमें ८ मात्राएँके स्थान ६ मात्राएँ होगई " । विद्वान् पाठक शिवस्वामीजीका छन्दोज्ञान भी देखें कि -केलिए अक्षरोंके स्थान ६ मात्राएँ लिखते हैं । यहाँ मात्राएँ कहाँ हैं? या देख यहाँ तो अक्षरोंकी बात है । सो ' विषमाक्षरपादं वा... गाथेति मिला, हि तत् सूरिभिः प्रोक्तम् ' इसके अनुसार कहीं ६ अक्षर - इसमे तो वहां ' गाथा ' छन्द माना जाता है आ जावें; । इस प्रकारके पद्य पुराणोंके पदीसे पर्याप्त मात्रामें दिखलाये जा सकते हैं । जैसे कि इसी पथिकने अनुहि अपने वैसिमा ( पृ. ३७ ) में ' गालीदानं व्यदधुर्मुदा' यह शिव-पत्र पुराणका पद्य दिया है । इसमें वादी स्वयं गिन ले कि - यहाँ र अक्षर हैं या नहीं? ६ जब जा - जिस ' उद्वाहितायाः कन्यायाः ' पाठको वादी छन्दः - शास्त्रके CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat छन्दकी शुद्धता अशुद्धता (? ) [ ३ ९ ३ अनुसार शुद्ध मानता है, उसमें भी दोष आता है- ' श्लोके पष्ठ ' गुरु ज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम् । द्विचतुष्पादयोर्ह स्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः ' ( श्रुतबोध ) इस नियम के अनुसार पांचवां अक्षर ' लघु ' आना चाहिये । वादीसे सम्मत पाठमें पांचवाँ अक्षर ' या: ' गुरु है, तब वादिसम्मत पाठमें भी छन्दकी शुद्धता न रही; तव यदि ' अनुद्वाहितायाः कन्याया: ' में छन्दमें त्रुटि आती है; तब ' यश्चोभयोः समो दोषः परिहारोपि वा समः । नैकः पर्यनुयोक्तव्यस्तादृगर्थ-विचारणे ' इस न्यायसे समान उत्तर है । उक्त पद्यमें यदि वृत्त-रत्नाकर अथवा पिङ्गलसूत्र के अनुसार ' पथ्यावक्त्र ' छन्द भी माना जावे; तब ' उद्वाहितायाः कन्याया: ' में चतुर्थ अक्षर के बाद ' गण ' न आनेसे छन्दका दोष आता है; तब छन्द: - शास्त्रके नियमानुसार ' अनुद्वाहित कन्याया: ' यह पाठ ही शुद्ध रहेगा; जिसे हमने लिखा था । या फिर ' अनुद्वाहितायाः कन्यायाः ’ पाठ भी ठीक रहेगा; उसमें ' गाथा छन्द ' रहेगा । गाथा च्छन्द में किसी पादमें नौ अक्षर भी हो सकते हैं । या फिर ' उद्वाहितायाः कन्याया: ' पाठ भी मानें; वहाँ वादीका कहा अर्थ न होकर ' उद्वाद्दयितुमिष्टायाः, अथवा प्रवृत्तायाः ' यह अर्थ होगा । वादीका किसी भी ढंग से पक्ष सिद्ध नहीं हो सका । यह जो शिवशर्माजीने लिखा है- ' भला यह तो सोचिये कि- ' फेरे फिर गये, लाजाहोम हो गया, सप्तपदी होने को है कि-आपत्तियों का पहाड़ टूट गया ' इसपर वादी जाने कि-' पाणिग्रहणिका मन्त्रा नियतं दारलक्षणम् । तेष्ठां निष्ठा तु विज्ञेया . An eGangotri Initiative

पृष्ठ 214

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३६४ ] श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) विद्वद्भिः सप्तमे पदे ' ( २२६-२२७ ) यह वादिप्रतिवादिमान्य मनुका वचन है, जिसके लिए कहा गया है - ' यः कश्चित् कस्य-चिद्धर्मो मनुना परिकीर्तितः । स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ' ( मनुः ) ( २७ ) । पूर्व पद्य पर श्रीमेधातिथिने लिखा है-' तेषां [ पाणिग्रहणिकदार - लक्षणमन्त्राणां ] निष्ठा- समाप्तिः, सप्तमे पदे ( सखा सप्तपदी भव ) विज्ञेया । तस्मिन् प्रक्रान्ते कन्यायाः पदे प्रक्रान्ते कन्यापितुर्वोदुर्वाऽनुशयो नास्ति ' । इसी प्रकार अन्य टीकाकारोंने भी लिखा है । आर्यसमाजी श्रीतुलसीरामजीने भी लिखा है- ' पाणिग्रहणके मन्त्र निश्चय स्त्री होजाने के लक्षण हैं । उन मन्त्रोंकी समाप्ति सप्तपदीके ७ वें पदमें विद्वानोंको जाननी चाहिये ' ( पृ. ४४१ ) इससे वादीका आक्षेप कट गया । सो सप्तपदीसे पूर्व तक विवाह पूर्ण नहीं माना जाता । सप्तपदी हो जानेपर वह भार्या ( भर्तव्या ) हो जाती है । वह पति भी पूर्ण हो जाता है । तब “ किसी शास्त्र में सप्तपदी से पूर्व विवाह पूर्ण नहीं होता ' ऐसा नहीं लिखा है " यह वादीकी बात कट गई । हम मनुजीका प्रमाण दिखला चुके हैं । अब शिवशर्माजी का पक्ष छिन्न - भिन्न हो गया । जब विवाह ही पूर्ण न हुआ; तो स्वयं ही ' अपूर्णपति, तथा अविवाह अथवा अपूर्ण विवाह ' सिद्ध हो गया । ' वाचा सत्ये कृते पतिः ' ( मनु. ६६६ ) का भी यही आशय है कि- वाग्दान होने पर भी उसे ' पति ' कहा जाता है । श्री तुलसीराम स्वामीने भी इसका वही अर्थं किया है- ' जिस CC - 0. Ankur Joshi Collection पथिककी भ्रान्ति कन्याका सत्य वाग्दान ( कन्यादान संकल्प ) करनेके । पश्चात् मर जावे; उसको इस विधानसे देवर प्राप्त हो ' ' प्रदानं स्वाम्यकारणम् ' ( मनु. ५/१५२ ) इस कथ ( पृ. ५०० ) कालीन प्रदानसे उस पुरुषका लड़कीपर स्वामित्व वाग्दार जैसे कि - इसपर श्रीकुल्लूकभट्टने लिखा है- ' प्रथमं हो जाता है । न प्रदानं वाग्दारा त्मकम्, तदेव भर्तुः स्वाम्यजनकम् । ततश्च वाग्दानादारण्यक्षे भर्तृ - परतन्त्रा ' । का सो उसकी मृत्युमें भी उसे गौणरूपसे ' विधवा ' था-सकता है, तब दिव्यादेवी को इस रीतिसे ' विधवा ' -धवर हैं-कहा जा सकता है । ' इति तिष्ठामि दुःखेन वैधव्येन समि . ( ८८ | १३ ) यहां पर भी ' वैधव्य ' का अर्थ ' धवरहित पनि इस दुःखिनी ' है; अपने गत जन्म के पापोंसे बेचारी दिव्याको ि पहल पूर्ण पतिकी प्राप्तिके भी औपचारिक वैधव्य भोगना पड़ा क उसका विवाह न हो सका, पर ऐसी अपूर्णंपतिका स्त्रीकेलिए बुधैः ' कलि - व्यवस्थापक ' पराशरस्मृति ' में विवाहका विधान है । तकुमार शिवशर्माजीका पण्डितोंको गाली देना उसके पक्षकी शिथिलता य प्रमाण है, और पथिकको उसे उद्धृत करना उसकी धर रहा भिज्ञताका प्रमाण है | है; . ' शेष जो श्री शिवशर्माने वैधव्य में भ्रूणहत्या के पापसे जनदार प्रवृत्ता पक्ष में डराया है, सो यह भ्रूणहत्याएँ तो वाद के सम्प्रदाय द्वारा १४० कोई भ वर्षकी अविवाहित लड़कियोंमें भी हो रही हैं; तब क्या श्राप लें । पति म को कन्याओंकी विवाहायु बढ़ानेपर दुःख होता है या न Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 215

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] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ३६६ पश्चात् तो सधवाएँ भी सन्तान के भारसे अपने को बचानेके-आजकल ( पृ. ५०० लिए भ्रूणहत्याएँ कर रही होती हैं; अपने गर्भ गिरवा रही होती ) सेवादार हैं । इसमें भी श्राप पाप मानते हैं वा नहीं? फिर इन्हें क्यों हो जाता है नहीं रुकवाते? नं वाग्दास G आगे वादी लिखता है - ' कविरत्न - अखिलानन्द जी और दारम्य नं. शिवशर्माके मध्य विधवाविवाहपर शास्त्रार्थ हुआ था; उसमें कविरत्नजी बुरी तरह पराजित हुए थे । शिवशर्माजीने कहा कहार था –११ दूने २२ के लगभग तो पुराणोंमें दिव्याके खसम बताये -हूँ- ' एकविंशति - भर्तारः काले - काले मृतास्तदा ' ( यहाँ वादीने ११ के समन्निद दूने २१ करके अपना गणितशास्त्रका अच्छा परिचय दिया है । ) - इसपर कविरत्नजी ने कहा था कि- ' दिव्या के २१ पति फेरे फिरनेसे, न्याको दिन पहले मर गये थे ' यह उत्तर बिल्कुल ठीक था । आगे शिवशर्माजी-गना ने कहा - ' यहाँ पद्मपुराणमें ' उद्वाहितायां कन्यायामुद्वाहः क्रियते जीके केलिए है बुधैः ' ऐसा पाठ है- ' उद्वाहिता ' के अर्थ ' व्याही हुई ' के हैं, न कि है । कुमारीके ' । शिथिलता यह लिखने वाला पथिक कविरत्नजीका पराजय दिखला सी रहा है । हम पहले दिखला चुके हैं कि - जहाँ ' उद्वाहिता ' भी पाठ है; वहाँ आदिकर्म में निष्ठा है, उसका अर्थ है - ' विवाहयितुं जननं प्रवृत्ताया: ' इसमें हम मीमांसा कर चुके हैं, और फिर हमारे रा १ पक्षमें इतिहासका प्रत्यक्ष अनुग्रह भी है । दिव्यादेवीका आप हो कोई भी विवाह पूर्ण नहीं बताया गया; पुराणमें यथा नहीं पति मर जाता था । क्या किसी सप्तपदीसे पूर्व ही उसका आर्यसमाजी में शक्ति है कि-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. ' पतितेपती ' पर विचार [ ३ ९ ७ दिव्याका पूर्णविवाह पुराणसे १०० वर्षतक भी, अथवा १०० जन्मों तक भी दिखला दे? जब नहीं दिखला सकता; तब ' उद्वाहिता'का ' क्त ' प्रत्यय आदि - कर्म में सिद्ध हुआ । जैसे कि-गीतामैं ' प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते ' ( १।२० ) में ' क्त ' प्रत्यय आदिकर्म में है कि – ‘ प्रवर्तिष्यमाणे ’ । तभी तो अर्जुनके ' योत्स्यमानानवेक्षेऽहं ' ( ११२३ ) इस वाक्यमें भविष्यत् काल है । तब शिवशर्माजीके आर्यसमाजी पक्षका सदाकेलिए पराजय हो गया; और कविरत्न-जीके सनातनधर्मी पक्षका सदाकेलिए विजय हो गया । अब पथिकजीकी प्रसन्नता हट गई, इसमें वह स्वयं साक्षी है । यदि वह यह नहीं मानता; तब प्रत्यक्ष असत्यवक्ता है । ( ४३ ) आगे वादी ' पतितेपतौ ' पर लिखता है - ' आप ' अपतौ ' पाठभेदका घृणित प्रयास करके वाक्छलसे वाग्दत्ता कन्याकेलिए विवाह मानते हैं । सभी विद्वान् ' पतौ ' को शुद्ध पाठ और ' आप ' प्रयोग मानते हैं ' । वादीको पता होना चाहिये कि - ' आप ' का अर्थ ' ऋषि ' ( वेद ) का ' यह होता है । जैसे- ' सम्बुद्धौ शाकल्यस्येतावनार्षे ' ( पा. १ । १ । १६ ) में ' आर्ष ' का अर्थ ' वेदका ' यह है । वैदिक - प्रक्रियामें ' षष्ठीयुक्तः छन्दसि वा ' ( १ | ४ | ६ ) षष्ठी पूर्वपदवाले ' पति ' की ' घि ' संज्ञा मानी जाती है । जैसे- ' क्षेत्रस्य पतिना वयम् ' ( ऋसं. ४ । ५७ । १ ) यहाँ ' क्षेत्रस्य ' षष्ठयन्त ' होनेसे पतिकी ' घि ' संज्ञामें ' टा'को ' ना ' हुआ । अन्यत्र घिसंज्ञा नहीं होती । इसी प्रकार ' ब्रह्मणस्पतेः ' (. २ ( २४/१४ ) आदि में भी । An eGangotri Initiative

पृष्ठ 216

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३६८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) पर वेदमें भी जहाँ ' पति ' से पहले षष्ठयन्त पद नहीं होता; वहाँ ' घ ' संज्ञा नहीं होती । जैसे- ' पत्यो मे लोक उत्तमः ' ( सं. १० / १५६।३ ) में तथा ' पत्यौ ' ( ऋ. १८२४ ) ' पत्ये ' ( अ. ३ | ३० | ३ ) ' पत्युः ' ( अ. १४/१/४२ ) आदि स्थलोंमें ' घि ' संज्ञा न होनेसे ' पतौ ' नहीं आया । इससे ' पतितेपतौ ' में भी षष्ठयन्त-पूर्वपद न होनेसे इसमें आर्षत्वकी कल्पना कट गई । अब इसमें वादी फड़फड़ा नहीं सकता । हमने पाठभेद नहीं किया; पूर्वरूप होनेसे ' अपतौ ' का ' पतौ ' दीख रहा है । सो ' क्लीवे च पतितेपतौ ' में भी षष्ठयन्त पूर्वपद न होने से ' घि ' संज्ञा नहीं हो सकती है । तब यदि यह आर्ष प्रयोग माना जाता, तो वादीसे मान्य म.म. पं. शिवदत्तजी तथा तत्त्ववोधिनी-कार जिनको वादीने सम्मानकी दृष्टिसे देखा है - इसकी अन्य प्रकारसे सिद्धि न करते । सीधा इसे आषं मान लेते; पर उन्होंने वैसा नहीं माना; बल्कि किसी भी प्राचीनने ' पतितेपतौ ' में ताकी कल्पना नहीं की । अकेले ' पतौ ' की अशुद्धता प्राप्त होने पर ही उन्हें यहाँ ' वाग्दत्तापति ' के अर्थका बोध हो गया । तभी तो उन्हें अन्य प्रकारकी सिद्धि करनी पड़ी । ( ख ) जो कि पथिक इसमें म.म. पं ० शिवदत्तजी की सम्मतिको सम्मान - दृष्टि से देखता है; तो वह यहाँ अपने मान्य उनका भी मत सुने, जिससे वह फिर चीं - चपड़ नहीं कर सकेगा । वे लिखते हैं - ' क्लीवे च पतिते पतौ ' इत्यत्र तु ' अकृत-चतुर्थीकर्म ' इति पूर्वपदस्य ' विनापि प्रत्ययं पूर्वोत्तरपदलोपो CC - 0. Ankur Joshi Collection अपने साक्षीसे वादीकी हार ४ वक्तव्यः ' इत्यनेन लोपे, ' अकृतचतुर्थीकर्म ' इति पूर्वपदान्तर्ग ' चतुर्थीक में ' त्युत्तरपदस्य शाकपार्थिवादेराकृतिगणत्वेन ' पती ' इति वा समास एव इति न घिसंज्ञाऽनुपपत्तिः ' लो, से ( सिद्धान्त श्रीवेङ्कटेश्वरप्रेस में सं. १६८२ में मुद्रित सटिप्पण पृ. ३६. शब्द पर ) यहां वादीसे अपने साक्षी कियेहुए म.म. कर शिवदत्तजीने भी ' अपतौ ' मानकर बादीके पक्षका का तो निकाल दिया है । अब तो वादीका दावा उष्ट्रलगुडन्यावसे तव अपने ही साक्षीसे बुरी तरह खारिज होगया । श्राव तत्त्वबोधिनीकी टिप्पणीमें भी वादी से अपने साक्षी त्रि कार हुए म. म. पं ० शिवदत्तजीने हमारी भांति घिसंज्ञा मानी है । वास्त सुने वादी म. म. जी का सिंहनाद - ' वस्तुतस्तु पराशरस्मृती पति ' अपतौं ' इत्येवच्छेदः । तथाच ईषदर्थकेन नत्रा सह समासे पिसा थी? निर्वाषैव । सप्तपदीतः प्राग् ईषत्पतित्वस्यैव सत्त्वेन ' ' ' ( पृ. ८७ ) वहां ' पति पर पथिकजी का अपने ही साक्षीने उसका पक्ष गिराकर पथिकजी. । ' पति को बुरी तरह पराजित कर दिया । फिर उसे अपील करने अथ लायक भी नहीं रखा । इसमें हमारा पक्ष पूर्णरूपेण सिद्ध हो नहीं रहा है । है, ( ग ) अब शेष रहा वादी द्वारा तत्त्वबोधिनी कारके मतका गौणप उद्धरण । आश्चर्य तो यह है कि - जिस विषय में वादीको ज्ञान वाग्द नहीं है, उसमें भी वह अपनी टांग अड़ाता है । उसमें ' बहुर् सरक प्रत्ययवाले ‘ बहुपति ’ - शब्दका उद्धरण तो अप्रकृत है । अव आगे उन्हें का तो ' क्लीबे च पतितेपतौ ' यह पराशरका वचन प्रकृत है । बादी द्वारा Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 217

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श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) ४०० J पदान्तर्गर अपने साक्षी बनाये हुए इस तत्त्वबोधिनीकारकी की हुई सिद्धि-से भी वादीका पक्ष अभी विच्छिन्न हो जायगा, यह विद्वान् सिद्धान्तको ' आलोक ' पाठक कौतुक देखें।— ३६ ' पति ' ( घ ) वादीने ' पती ' को शुद्ध पाठ तथा श्रर्ष प्रयोग सिद्ध . न.म. करने के लिए तत्वबोधिनीका उद्धरण दिया है । यदि ऐसा होता; तो तत्वबोधिनीकार लिख देते कि - ' पतौ ' यह आर्ष प्रयोग है; कचूमा डन्यावसे तव फिर उन्हें ' तत्करोति ' इस णिचूसे सिद्ध करनेकी क्या श्रावश्यकता थी? इससे स्पष्ट सिद्ध हो रहा है कि - तत्त्वबोधिनी-कार श्रीज्ञानेन्द्रसरस्वतीने ' क्लीवे च पतिते पतौ ' में ' पत ' को मानी है । वास्तविक ( पूर्ण विवाहित ) पति नहीं माना, किन्तु उसे अपूर्ण पति माना है; नहीं तो उन्हें इतने विस्तारकी क्या श्रावश्यकता थी? तभी तो तत्त्ववो, में उस ' पति ' का विग्रह किया है कि-' पतिरित्याख्यातः पतिः ' और अन्तमें लिखा है- ' इति निष्पन्नोऽयं ७ ) यहाँ थिकजी- ‘ पति ’ शब्द: ‘ पतिः समास एव ' इत्यत्र न गृह्यते, लाक्षणिकत्वात् ' । करते अर्थात् यह ' पति ' वह प्रतिपदोक्त ( वास्तविक, पूर्णविवाहित ) सिद्ध हो नहीं है; वह लाक्षणिक ( अपूर्ण - विवाहित ) है, ' पतिशब्द - व्यपदेश्य ' है, नामधारी पति है, ' पति ' इस नामसे कहा जाता है, सो वह मतका गौणपति है, वास्तविक पति नहीं है । इस प्रकार उसका भाव भी ज्ञान वाग्दत्ता पतिसे है, पूर्णविवाहित पतिसे नहीं । नहीं तो श्रीज्ञाने. सर को सुगम सिद्धि छोड़कर इस कठिन सिद्धिकी आवश्यकता नहीं थी । ' बहुरे उन्हें यह प्रक्रिया- गौरव इसलिए ही करना पड़ा कि पूर्णपति आगे बी द्वारा - का तो सप्तमीमें ' पत्यौ ' बनता है, पर पराशर के वचनमें उन्हें CC - 0. Ankur Joshi ' पतिते पती ' और श्रीदीक्षित [ ४०१ यह पति इष्ट नहीं, किन्तु अपूर्ण, लाक्षणिक पति इष्ट उन्हें यह प्रक्रियागौरव है; अतः करना पड़ा कि यह वह विवाहित, प्रतिपदोक्त ' पति ' नहीं है, किन्तु उन्होंने बताया है कि-पद्यमें ' लाक्षणिक - पति ' ( वाग्दानकालीन पति ) अर्थ पराशरके समास एव ' में गृहीत नहीं है, जो ' पतिः । इससे स्पष्ट है कि - तत्त्वबोधिनीकार पराशरके उक्त पद्यके ' पति'को ' विवाहित - पति ' का वाचक नहीं मानते; और उसे ' आर्ष ' प्रयोग भी नहीं भी चादीने समझ लिया होगा मानते । श्रब कि उसका पक्ष कैसी प्रबलतासे विध्वस्त होगया । यह नामघातुका लाक्षणिक - पति अर्थ बताने-वाला प्रयोग है, वास्तविक - पतिवाचक नहीं । वह होता तो उसे ' पत्यौ ' लिखा जाता, ' पतौ ' लिखनेपर वहाँ अशुद्धि वहाँ होती । ( ङ ) आगे वादी उस समयके आर्यसमाजी श्री अखिला-- नन्दजीका मत लिखता है, उसे हम क्या करेंगे? यदि वादी कहे कि उसका खण्डन करो, तो वादी कान खड़े करके उसका खण्डन सुने । श्रीदीक्षितने मनोरमामें यही जो समाधान किया हैं, इसलिए कि वे इस लाक्षणिक पतिको वाग्दानकालीन पदीसे पूर्वतकका ) मानते हैं; तभी तो अपने ' चतुर्विंशतिमतसंग्रह'- ( सप्त-में श्रीदीक्षितने स्पष्ट ही लिखा है- ' दुष्टे तु पूर्वे वरे वाग्दत्ताऽपि वरान्तराय देया । तथा च पराशरः - ' नष्टे... पतिते पतौ ' अस्यार्थः-' वाग्दानानन्तरं पाणिग्रहणात् प्राक् पतौ - सम्भावितोत्पत्तिक - पतित्वे पूर्वस्मिन् वरे नष्टे ' इत्यादि ( पृ. ८७ ) श्रीदीक्षितने इस पतिको बारदानुकालिक मानकर वादीके पक्षका खण्डन कर दिया है । Colle on Gujarat स. ० An ध ० eGargotri २६ Initiative

पृष्ठ 218

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४०२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) ( च ) जो कि आर्यसमाजी अखिलानन्दजीने लिखा था ---' अकारको यदि अव्यय मानो गे; तो उसका पूर्वरूप नहीं होगा । इसलिए ' नन ' का लगाना ठीक नहीं है ' यह पथिकसे उद्धृत पाठ तो मूल - लेखक ( श्रीअखि. ) का आर्यसमाजके समयका व्याकरणमें अज्ञान सिद्ध कर रहा है । यदि ऐसा है; तो ' समु-दाङ्भ्यो यमोऽग्रन्थे ' ( पा. १ ३७५ ) में श्रीपाणिनिने नत्र अव्यय-का अकार सामने होनेपर पूर्वरूप कैसे कर दिया? यदि वादी चाहे तो इस विषय में हम स्वा. द. जीके भी कई उद्धरण दे सकते हैं । ( छ ) ' अविधीयते ' इस श्राख्यातिक - क्रियामें ' नव ' का सम्बन्ध नहीं होता, यह वैयाकरणोंका सिद्धान्त है ' यह पथिकका उधृत आर्यस. अखि.जीका लेख कुछ भी महत्त्व नहीं रखता । इस विषय में ' आलोक ' ( ८ ) पृ. ६४७ में देखना चाहिये । हम वहाँ पूर्ण समाधान कर चुके हैं । वादीने श्रीमेधातिथिके ' ये श्रविद्वांसः सम्यक् शास्त्रमजानते ' ( पृ. ७१ ) में इस वाक्यमें भी ' जानते ' क्रियाके साथ नव - समास ' अजानते ' के रूपमें कर डाला है । इसपर अब वह स्वयं अपने अखिलानन्दजीको उत्तर दे । अब पथिक बतावे कि -अव होगया न ' वैधव्यविध्वंसनचम्पू- ' का विध्वंस! उसने जिसका खण्डन असम्भव समझ रखा था: अब वह सम्भव होगया । श्रव वादी के पास उत्तर नहीं । अब वादीके दिव्यादेवीके २१ विवाह तो कहाँ, एक भी पूर्ण - विवाह वा पूर्ण - पति सिद्ध न हो सका । अपूर्ण विवाह होने CC - 0. Ankur Joshi Collection ' पौनर्भवेन भसा ' ४ पर भी फिर भी बेचारी दिव्याको पति प्राप्त यदि प्राप्त हुआ हो; तो वादी प्रमारण बतावे नहीं हो स ' कथासे ' विधवा विवाह ' के स्वप्न देखना वादियोंके । तव दिव्य न कल्पित दा की निराधारता बता रहा है 1 । वादी किसी आर्यसमाजी भी ११ पतियोंसे विवाह न दिखला सका । वाक्ष आदिके नियोगसे वा विधवा - विवाहसे दस पति न दिखला ईश्वरचन्द्र - विद्यासागरका ' पतौ ' को ठीक सका । पूर्व मानना भी शा होगया । उनके विधवा - विवाहका तो स्वा. द. जीने ही क्य “ कर दिया; फिर हम किसलिए खण्डन करें । क्या बादी है अथ ' चन्द्रजीको स्वा.द.जीसे अधिक विद्वान् मानता है? चदि से है; तो अल्पज्ञ स्वा. द. जीका सम्प्रदाय वादी छोड़ दे । ( ज ) नीक्षीवि. ( पृ. ८३ ) में वादीने विधवाविवाहको सिद्धितर्फ है । -लिए ' सा चेदक्षतयोनिः स्याद् गत- प्रत्यागतापि वा । पौनके कार भर्त्रा सा पुनः संस्कारमर्हति ' ( ६/१७६ ) यह स्वा.द.जी वह लिखा हुआ मनुवचन दिया था । सप्तमपुष्प ( पृ. ८१३ ) में स्थान न होने से इसपर अन्य पुष्पमें लिखनेकेलिए प्रतिज्ञा ' चुके थे । अव स्थान यहाँ भी न होनेपर भी ' यह प्रमाण विध चिनासे छूट न जाय ' - इस विचारसे इसपर हम कुछ लिख ( मन स्वयं हैं । कई अन्य व्यक्ति इससे मिलता - जुलता ' निसृष्टायां हु यस्या भर्ता म्रियेत सा । सा चेदक्षतयोनिः स्याद् गतप्रत्यान कही सती पौनर्भवेन विधिना पुनः संस्कारमर्हति ' ( ४/१/१८ ) द यदि बोधसू का वचन भी दिया करते हैं । Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ९ ) ४०४ 1 इसमें बोधायनका वचन तो स्पष्ट है । इसमें सन्देह कुछ भी हीं हो सक यहां निसृष्टायां ' ' का अर्थ है- ' उदकपूर्व प्रत्ता ' ( कन्या-नवदिल नहीं । कल्पित दानसंकल्पमें जल - द्वारा दान दी गई हुई ) । ' हुते ' का अर्थ ' होमे ’ नमाजी है ( जब हवन हो जाए ), उस समय भर्ताकी मृत्यु हो जावे; तो आदिले - मंद इसका फिर संस्कार हो सकता है ' । सो यह बचन भी सप्तपदीसे सका पूर्वताका बोधक है; उस समय तो उसका अन्य पुरुषसे विवाह । शास्त्रीय है । सनातनधर्म मनुजी के अनुसार सप्तपदीके बाद-भी सरि क्योंकि मनुजी सप्तपदी में विवाह की पूर्णता मानते हैं ( ८ २२७ ) श्रथवा जो गृह्यसूत्रोंके अनुसार चतुर्थीकर्मको ही विवाद्दकी बाद ? यदि ऐसे पूर्णता करनेवाला मानते हैं, तदनुसार चतुर्थी - कर्मके बाद मृत-पतिका स्त्रीका पुनर्विवाह वैध नहीं मानता; उससे पूर्व तो मानता की सिद्धिह है । क्योंकि वह उस समय वास्तविक विधवा नहीं होती; - 1 पद कारण उस समय उसका विवाह पूर्ण ही नहीं होता । अतएव दु.जी वह विवाह्यमान पति भी पूर्ण पति ( धव ) नहीं होता । श्रवशिष्ट है - मनुपद्य, इसपर हम लिखते हैं । -- ३ ) में उक्त मनुपद्यसे पूर्वका पद्य यह है - ' या पत्या वा परित्यक्ता प्रतिज्ञा विधवा वा स्वयेच्छया । उत्पादयेत् पुनर्भूत्वा स पौनर्भव उच्यते ' माण ( मनु. ६।१७५ ) इसका अर्थ यह है कि - जिस बालाको पतिने लिख यां हु स्वयं छोड़ दिया है; इसलिए औपचारिक विघवा ( पति - रहिता ) कही जा रही हो; अथवा अपनी इच्छासे ही जिस बालाने पति-गतप्रत्याड को छोड़ दिया हो; इसलिए उपचारसे विधवा कही जा रही हो; | १ | १८ ) यदि वह क्षतयोनि नहीं है; संस्कारमात्रजिसका हुआ हो; वा CC - 0. Ankur Joshi ' या पत्या वा परित्यक्ता ' [ ४०५ वह भी न हुआ हो; वह स्त्री यदि अन्य पुरुषसे विवाह करके जिस लड़केको पैदा करती है; उस लड़केका नाम पौनर्भव हुआ करता है । यह ' पौनर्भव ' की परिभाषा है । इस प्रकारकी स्त्रीका पुनर्विवाह भी सर्वसाधारणसे नहीं हुआ करता; बल्कि ऐसी स्त्री से पैदा हुए पौनर्भव ( पारिभाषिक पूर्वोक्त ) पुरुषसे हुआ करता है । स्पष्ट है कि - यह पद्य भी सप्तपदी वा चतुर्थी - कर्मसे पूर्वताका बोधक है । कई वर ऐसे होते हैं; जब विवाह हो रहा होता है, तब ‘ परस्परं समब्जेथाम् ' के समय जब उस स्त्रीका मुख देख लेते हैं, क्योंकि तब ऐसी विधि है- - उस समय उसे अपने अनुसार सुन्दर न जानकर उस समय अपना हो रहा हुआ विवाह उससे कैन्सिल कर देते हैं; इसी प्रकार कई निर्लज्ज लड़कियां भी उसी ' समञ्जन ' के अवसरपर पतिको सुन्दर न समझ कर उससे अपना विवाह तोड़ देती हैं; ऐसे दोनों ही अवसरों पर ' प्रदानं स्वाम्यकारणम् ' ( मनु. ५।१५२ ) के अनुसार स्वामिहीन हो आनेसे स्त्री औपचारिकरूपमें विधवा कही जाती है, क्योंकि उस विवाहके मध्यकालमें पतिने उसे छोड़ दिया, वा पतिको उसने छोड़ दिया; दोनों ही प्रकारसे वह उपचारसे विधवा कही जाती है । यद्यपि सप्तपदीसे पूर्व पति मर जावे; उस विधवा तथा पूर्व-प्रोक्त विधवा में कोई अन्तर तो नहीं दीखता; तथापि अन्तर है-अवश्य । वह यह है कि उस अवसरपर सप्तपदीसे पूर्व उसका Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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४०६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) पति यमराजके कारण मरा; इसलिए वहां न तो उस लड़की का कोई कसूर है, और न मरनेवाले पति का । परन्तु जिसने अपनी इच्छासे ही उस पतिको छोड़ा; वह तो अपराधिनी है हो; और जिसे पतिने छोड़ा, उसमें भी कुछ विधिव्यतिक्रम उसने प्राप्त कर ही लिया । इसलिए वह कुछ दोष वाली है । उस अवसरपर सप्तपदीसे पूर्व मृत - पतिका बालाका विवाह तो स्मृतियों में माना गया है, यद्यपि उत्तम तो वह भी नहीं माना जाता; क्योंकि-' सकृत् कन्या प्रदीयते ' ( मनु. ६/४७, ६७१, ६६६ ) तथापि उसका अच्छे कुल वालेसे विवाह वैध माना जाता है । जैसेकि - वसिष्ठने कहा है-' अद्भिर्वाचा च दत्तायां म्रियेतोर्ध्वं वरो यदि । न च मन्त्रोप-नीता स्यात् कुमारी पितुरेव सा ' ( १७/६४ ) पाणिग्राहे मृते वाला केवलं मन्त्रसंस्कृता । सा चेद् अक्षतयोनिः स्यात् पुनः संस्कार-मर्हति ' ( ६६ ) इस प्रकारके पद्य सप्तपदीसे पूर्वताके बोधक हैं । परन्तु उक्त मनुदर्शित लड़कीका तो कुलीनसे विवाह नहीं हो सकता; इसी कारण पौनर्भव ( वैसे ही निन्दित ) के साथ विवाह-की अभ्यनुज्ञा दी गई है । परन्तु इसपर यह जानना चाहिये कि - इस प्रकारके पद्य विधिशास्त्र नहीं हुआ करते I । विधिशास्त्र ही धर्म होता है; जैसे कि कहा गया है— ' चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः ' ( मी. १ । १ । २ ) । विधिशास्त्र तो मनु आदिकी स्मृतिमें यह कहा गया है - ' न तु नामाऽपि गृह्णीयात् पत्यौ प्रेते ( मृते ) परस्य तु ' ( ५/१५७ ), ' न विवाहविधावुक्तं विधवा - वेदनं पुन: ' ( मनु. ' CC - 0. Ankur Joshi Collection पौनर्भव निन्दित ६६५ ) । इस प्रकारके व्यक्तियोंका समाजमें थोड़ा है - इसी बातको सूचित करनेकेलिए ही इनकी स्थान है अभ्यनुज्ञा आती है । इससे वादियोंकी भी इष्टसिद्धि क्योंकि – वे तो मृतपतिका बालाका विवाह चाहते हैं; कही विधवा तो वस्तुत: विधवा नहीं है, किन्तु जीते पर वह हुए । बाली है; तब उसके विवाहसे विधवाविवाह कैसे कि सकता है? यदि इस प्रकारके वाक्योंको भी विधिशास्त्र माना तब तो स्मृतियोंमें कानीन ( कारीका लड़का ), चाण्डाल, कुण्ड, गोलक आदिका भी वर्णन एवं व्यवस्था आती है । भी वर्णन तथा प्रायश्चित्त आता है; तब क्या एतदादिक कर कर्तव्य मान लिये जावेंगे? ऐसा कभी नहीं होता । कहती हैं कि - ब्राह्मणी शूद्रके सङ्गमसे चाण्डालको पैदा है, तब क्या स्मृतिमें इतने उल्लेखमात्रसे त्राह्मणीका! सङ्गम वा विवाह विधिशास्त्र हो जावेगा? ऐसा नहीं है न कोई ऐसा मान ही सकता है । ऐसा माननेपर तो वैसी सन्तानोंकी निन्दाके वचनोंका व्याकोप हो जावे!! पारिभाषिक पौनर्भव लड़केसे वैसी विधवाका संस्कार है, जिस उस जैसीका पुत्र ' पौनर्भव ' माना गया है । स वि विषयमें स्मृतियोंकी सम्मति देखिये कि वह उस पैस प्र विषयमें अपना क्या मत रखती हैं? - ( ' पौनर्भवश्च कारणश्च यस्य चोपपतिगृ है ' ( मनु. ३ ( १४३ ) " Gujarat. An eGangotri Initiative