सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 31–40

सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 31–40

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३२ ] श्रीसनातन धर्मालोक ( ६ ) होने से इससे उनकी वीरता भी उपपन्न हो सकती है । उनकी इससे निन्दा नहीं हो जाती । तब उनकी वानरता सिद्ध हो ही गई । ( २५ ) ' हनूमन्! दूरमध्वानं कथं मां नेतुमिच्छसि । तदेव खलु तं मन्यं कपित्वं हरियूथप! ' ( सुन्दर. ३७/६ ) ( सीता कह रही हैं, ऐ हनुमान्, तू मुझे दूर रास्तेमें उठाकर कंसे ले जाना चाहता है; वही अपना बन्दरपन दिखला रहे हो? ) यहां रामा-भिरामने लिखा है - ' तदेव - दृश्यमानमेव ' | यहां पर श्रीवाल्मीकि-ने हनुमान्की शक्तिसे अपरिचित श्रीसीताके मुखसे उपहासद्वारा हनूमान्का दास्तविक वानरत्व दिखलाया है । ( २६ ) यांद श्रीवाल्मीकिको वनवासी- मनुष्य होनेसे रामायणके बन्दरोंका वानरत्व इष्ट होता; तो ' तौ शोणिताक्तौ युध्येतां वानरौ वनचारिणौ ' ( ४ | १६ | ३० ) इत्यादि बहुत स्थलों में युद्ध संलग्न वाली सुग्रीव आदिकेलिए ' वनचारिणौ वानरौ ' पर वादीके अनुसार पुनरुक्ति न की गई होती, आयँपथिकने अपनी पुस्तक ( पृ. १२७ ) में लिखा है कि- ' वानर और वनचारी एक ही हैं ' । पृथक् - पृथक् ग्रहणसे वानर स्पष्ट पशु - योनिविशेष सिद्ध होते हैं । ( २७ ) तलेनाभ्यहनत् कांश्चित् पादैः कांश्चित् परन्तपः । नुष्टि-भिश्चाहनत् कांश्चिद् नखैः कांश्चिद् व्यदारयत् । ( ५४५।१२ ) यहाँपर हथेली वा परोंकी ठोकरोंसे वा मुक्कोंसे मारना, नाखूनोंसे फाड़ना कहा गया है; यह सब बन्दरोंका ही स्पष्ट CC - 0. Ankur Joshi Collection हनुमानादि वानर नर थे? [ ३३ स्वभाव है । मानुषी सेनाका ऐसा वर्णन होनेपर उनकी निन्दा थी, और उनके नेता की भी, परन्तु यहां पर स्वाभाविकता स्पष्ट रखी गई है, निन्दा नहीं । स्वाभाविकताके हनुमानादि सिद्ध होनेसे वानर सिद्ध हुए, मनुष्य नहीं । ' नत्वेवं वानरा हन्तुं शक्याः पादपयोधिनः ' ( ६।३३।६ ) यहाँपर वानरोंका वृक्षों तथा अन्यत्र पहाड़ों एवं पत्थरों द्वारा युद्ध दिखलाया द्वारा ऐसा युद्ध नहीं करते । है, मनुष्य ( २८ ) ' नहि ते वानरं तेजो रूपमात्रं तु वानरम् ' ( ५ | ५० | १० ) यह प्रहस्त हनुमानको कह रहा है कि - तेरी शक्ल तो वन्दरों वाली है, पर ताकत उनसे बढ़कर है । यही बात रावणने सोची थी - ' वानरोऽयमिति ज्ञात्वा नहि शुध्यति मे मनः । नैवाहं कपिं मन्ये यथेयं प्रस्तुता कथा ' ( ५२४६।६-७ ) ' महत् तं ज्ञेयं कपि - रूपं व्यवस्थितम् ' ( ५/४६ १४ ) यहाँपर श्रीवाल्मीकिने सत्त्वमिदं हनुमान्को स्पष्ट ही बन्दररूपवाला बताया है, मनुष्य नहीं इसी प्रकार ' जातिरेव मम त्वेषा वानरोऽहमिहागतः । ' ( ५।५०।१४ ) यहाँपर उसकी वानर जाति दिखलाई है । इस पर रामाभिरामने स्पष्ट किया है - ' एषा वानराकृतिर्मम जातिरेव जन्मकृतैव , अतो वानर एव अहम् इह आगतः ' । ( २६ ) ‘ केचित् किलकिलां चक्रुर्बानिरा वनगोचरा: । प्रास्फोटयंश्च पुच्छानि संनिजघ्नुः पदान्यपि ' ( ६ | ४ | ६४ ) ' भुजान् विक्षिप्य शैलाँ-श्च द्रुमान् अन्ये बभञ्जिरे । आरोहन्तश्च शृङ्गाणि गिरिगोचराः ' ( ६५ ) ' महानादान् प्रमुञ्चन्ति गिरीणां दवेडमन्ये प्रचक्रिरे । स ० ध ० ३ Gujarat. An eGangotri Initiative

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३४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) ऊरुवेगैश्च ममृदुर्लताजालान्यनेकशः ' ( ६६ ) ' जृम्भमाणाश्च विक्रान्ता विचिक्रीडुः शिलाद्र ुमैः ' ( ६७ ) ' नर्दतां कपिमुख्यानां ' ( सं. ३६।५० ) इत्यादि श्लोकोंमें बन्दरोंका किलकारी मारना, पूँछ फटकारना, पैरोंकी ठोकरें मारना, वृक्षों वा पहाड़ोंको तोड़ना, जोरसे चीखना - चिल्लाना, पहाड़ों तथा वृक्षों की चोटियों पर चढ़ जाना, लताओंको मसलना, ऐसे स्वाभाविक रूपसे चित्रित किया गया है कि उनका मनुष्य सिद्ध होना सम्भव भी नहीं हो सकता । ६४ वें पद्यमें पूँछका फटकारना बनावटी पूँछ-वालोंका काम नहीं हो सकता । इसी पद्यमें ' वानरा वनगोचराः ' यह भिन्न - भिन्न शब्द रखना भी बता रहा है कि यहाँ वनवासी मनुष्योंका वर्णन नहीं, किन्तु वनवासी वन्दरोंका है । ' शैल-शृङ्गाणि शतशः प्रवृद्धांश्च महीरुहान ' ( कि. ३१/१८ ) डरे हुए वानरोंका पहाड़ोंकी चोटी तथा वृक्षों पर चढ़ जाना उन्हें स्पष्ट बन्दर बता रहा है । ' अयं प्रकृत्या चपलः कपिस्तु ' ( कि. ३३।५७ ) वानरकी चंचलता बहुत स्थलोंमें बताई गई है; अतः उनका वास्तविक वानर होना सुस्पष्ट है । ( ३० ) ' यस्य ( रामस्य ) शाखामृगा मित्राण्यृक्षाः कालमुखास्तथा । जात्यन्तरगता राजन्! एतद् बुद्धयानुचिन्तय ' ( वनपर्व. २६२/१२ ) इस महाभारतके वचनसे स्पष्ट है कि- राम के सहायक बन्दर वा लंगूर जात्यन्तर ( मनुष्य से भिन्न जातिवाले ) हैं । यदि वे क्षत्रिय जातिवाले होते; तो श्रीरामके भी क्षत्रिय होनेसे, अथवा यदि वे मनुष्य थे, तब रामके भी मनुष्य होनेसे, अथवा यदि वे हनुमानादि वानर नर थे? ३६ चनवासी थे; तब रामके भी वनवासी होनेसे - जैसेकि रामके ' मानुषो वनगोचरः ' ( ६।१ ९ ३।६ ) ' वनगोचर ' शब्द रा श्राया उनकेलिए महाभारतकार ' जात्यन्तर ' शब्दका प्रयोग न क शर ' अन्या जातिर्जात्यन्तरम् ' यह उक्त शब्दका विग्रह है । व्यंसकादयश्च ' ( पा. २ | १/७२ ) इस पाणिनिसूत्रसे समा म कि है । दूसरी जाति जात्यन्तर होती है । ( डो. ला. शा. ) ( ३१ ) जोकि प्रतिपक्षी कहता है- ' यस्य देवस्य यट् । पुत्र पुल वेषो यश्च पराक्रमः । अजायत समं तेन तस्य तस्य पृथक् - पृमा ( वाल्मी. १ | १७ | २० ) ( जिस - जिस देवका जैसा जैसा ध्यान प्रकार वेष वा पराक्रम था; उसका पुत्र भी उसी रूप, आइ ' वन वा पराक्रमबाला हुआ ॥ स्पष्ट है कि- इन्द्रका पुत्र वाली इन ही समान रूपवाला था - आदि ) किसी की भी आकृति बन्दरों जै है । नहीं थी, सभी मनुष्याकृति मनुष्य थे, ( हनुमान आदि वा तव पृ. ११० ) । प्रति रक्षियोंके छल पर बड़ा खेद आता है । वे पूर्वा हो; प्रकरणको छिपाकर अपनी मनमानी बातें प्राचीन म अथ अर्थों में ठूस दिया करते हैं । वान वहाँ तो लिखा है - ' अप्सरःसु च मुख्यासु... ऋक्षविद्याधरं हाँ, च । किन्नरीणां च गात्रेषु वानरीणां तनूषु च । सृजध्वं हरि ( वानर थी रूपेण पुत्रान् तुल्यपराक्रमान् ' ( १।१७।५-६ ) यहाँपर ब्रह्मा द्वार देवों को आदेश दिया गया था कि - रीछ - वानर च्यादिकेशरी टीक वाली अप्सरा ( जो देवस्त्रियां थीं ) देवों द्वारा रीछ - वार बता रूपज़ारी लड़कोंको उत्पन्न करो । जैसे कि प्राचीन टीकाका विर CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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३६ ] श्रीसनातनधर्मालिोक ( ६ ) मकेर रामाभिरामने लिखा है- ' वानरीणां रानूषु वानरीशरीरसदृश-जाया शरीरासु अप्सरः प्रभृतिषु ( ६ ) ऋतीषु ऋक्षशरीरासु ( २१ ) उसी आदेश के अनुसार देवताओं द्वारा वानररूपधारी लड़के पैदा -भ किये गये । जैसेकि - रामायण में ही स्पष्ट किया है-सहु ' ते ( देवाः ) तथोक्ता भगवता ( ब्रह्मरणा ) तत् ( वानरादिरूपवतां पुत्त्राणामुत्पादनरूपं ) प्रतिश्रुत्य शासनम् । जनयामासुरेवं ते यद् । पुत्रान् वानररूपिणः ' ( १/१७/८ ) ( देवोंने भगवान् ब्रह्माकी आज्ञा - पूर्व मानकर बन्दररूपवाले पुत्रोंको उत्पन्न किया ) । ' ऋषयश्च महात्मानः याक सुतान् वीरान् ससृजुर्वनचारिणः ' ( वानरान् ) ( ६ ) प्रतिपक्षी भी ' वनचारी ' का ' वानर ' अर्थ बताता है- ' वानर और वनचारी एक इन ही हैं ' ( हनुमान् आदि पृ. १२७ ) यह ' वनौकाः ' का दूसरा शब्द रों है । जब ' वानरान् वनचारिण; ' दो शब्द पद्यमें इकट्ठ े हुआ करें; दिवा तव तो ' वनचारी ' यौगिक हो जाता है । जब केवल ' वनचारी ' पूर्वा हो; तत्र बन्दरका रूढ नाम हो जाता है । हनुमान की माता ग्रन्थ अञ्जना ' कपित्वे कामरूपिणी । दुहिता वानरेन्द्रस्य ' ( ४ । ६६ ६ ) वानरी तथा वानरकी लड़की तथा वानरकी पत्नी थी ( ८-१० ) व्याघरी हाँ, कामरूपिणी थी; अतः मनुष्य- शरीर भी बना लिया करती वानर थी चाद्वारा इन पूर्व लिखे पद्योंको प्रतिपक्षीने छिपा दिया है । एक और शरी टीकाकार आर्यसमाजीने रामायण में इस विषयमें बहुतसे प्रक्षेप छ - वार बता दिये हैं; उसमें यह अद्भुतता की हैं कि जहाँ अपने मतकी काका विरुद्धता मालूम पड़ी; वहाँ एक आधे को तो अप्रमाण एवं CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. हनुमानादि वानर नर थे? [ to प्रक्षिप्त मान लिया; कहीं पद्यके आधे पादको ही प्रक्षित मान लिया, शेषको प्रक्षिप्त । इससे इनके गलत प्रयास पर हँसी थाती है । इन लोगोंका पूर्वापर छिपा देने, या प्रक्षिप्तताका च्याविष्कार करनेका शब्दोंके अर्थ में तोड़ - मरोड़ किये विना पक्ष सिद्ध ही नहीं होता; अतः इस वाणी- स्तेयरूप पापसे जिसकी मनुजीने ( ४/२५६ ) भारी निन्दा की है; नहीं डरते । इन अनृतवक्ताओंकेलिए वेद भी वरुण के पाशोंको बताता ही है-' ये ते पाशा वरुण! सप्त सप्त... विनन्तु सर्वे श्रनृतं वदन्तं यः सत्यवादी अति तं सृजन्तु ' ( श्रथर्व. ४४१६।६ ) । कितना स्पष्ट रामायण में लिखा है- ' ऋक्ष - वानर - गोपुच्छाः ( रीछ, बन्दर, लंगूर ) क्षिप्रमेवाभिजज्ञिरे ' ( २११७/१६ ) ईदृशानां प्रसूतानि हरीणां कामरूपिणाम् ' ( ४/१७/२६ ) ( वे वानर आदि इच्छानुसार रूप बदल सकते थे ) । सो वहाँ बन्दर रूपवाला शरीर होते हुए भी अप्राकृतता ( दिव्यता ) वश उनका रंगरूप एवं वेष ध्यादि उन देवताओंके समान था तभी वाली सुग्रीव आदि राजा उन देवताओं वाले मुकुट तथा वेष तथा रंगढंग और बल रखते थे । शेष बाहरी आकृति बन्दरोंकी ही थी । इस रामायण-प्रोक्त सत्यको ' इश्क, मुश्क, खांसी खुश्क ' की भांति कभी छिपाया नहीं जा सकता । छिपानेवाले यमलोक में यातनायें प्राप्त करेंगे; जिनका वेदमें संकेत है । ( ३२ ) अब कुछ जाम्बवान् तथा उसकी सेनाके विषयमें भी देख लेना चाहिये - ' पूर्वमेव मया सृष्टो जाम्बवान् ऋक्षपुङ्गवः ' An eGangotri Initiative

पृष्ठ 34

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३८ ] श्रीसनातन धर्मालोक ( 8 ) ( १।१७१७ ) यहाँ जाम्बवान्‌को रीछ कहा है । रीछोंकी योनिज उत्पत्ति पहले दिखलाई ही जा चुकी है - ' राक्षसानां च सदृशाः पिशाचानां च रोमशाः । एतस्य सैन्या बहवः ' ( युद्ध. २७/१४ ) यहाँ जाम्बवान्के सैनिक ' रोमश ' बताये गये हैं । रोम सबके हुआ करते हैं. पर ' रोमश ' का अर्थ है- ' बहुत वा बड़े - बड़े रोमोंवाले ' । ' रोमश ' में मत्वर्थीय ' श ' प्रत्यय है ( पा. २ १०० ) मत्वर्थीय प्रत्यय ' भूम- निन्दा - प्रशंसासु नित्ययोगेऽतिशायने । संसर्गेऽस्तिविवक्षायां भवन्ति मतुबादय: ' इन अर्थों में हुआ करते हैं । इनमें पहला अर्थ है ' भूमा ' बहुतायत; अन्य अर्थ है अति-शायन - बड़े - बड़े । बड़े - बड़े बहुत रोमों ( बालों ) वाले । तब उनकी मनुष्यता भी खण्डित हो गई क्योंकि मनुष्य ' रोमश ' नहीं होते । रीछोंके तो बड़े - बड़े रोम प्रत्यक्ष हैं । कई महाशय कहते हैं कि - ' उन्हें ' ऋतवान् ' पर्वतमें रहने के कारण ऋक्ष ( रीछ ) कहते थे, वास्तवमें वे मनुष्य थे ' यह भी ठीक नहीं । उस पहाड़में रीछ बहुत रहा करते थे, इसलिए उस पहाड़ का नाम ' ऋतवान् ' हो गया था । ऋक्षाः ' सन्ति अस्मिन् ' इस अर्थमें ‘ तदस्याऽस्त्यस्मिन्निति मतुपू ' ( पा ० ५ | २ | ४ ) इस अर्थ-में ' ऋक्ष'को मतुप् प्रत्यय होता है; और ' मादुपधायाश्च मतोर्वः ’ ( पा ० ८ । २ । १ ) सूत्रसे मतुपूके ' म ' को ' व ' हो जाता है । यदि ऋक्षवान् पर्वतमें रहनेसे ' ऋक्ष ' नाम हो जावे; तो ' अन्ये ( हरयः ) ऋक्षवतः प्रस्थान उपतस्थुः सहस्रशः ' ( वाल्मी १/१७/३१ ) यहाँपर वन्दरोंका भी ऋक्षवान् नाम वाले पहाड़में रहना कहा CC - 0. Ankur Joshi Collection हनुमानादि वानर नर थे? ४० है, पर उन्हें ' ऋत ' नहीं कहा गया, किन्तु हरि ( चार ) कहा गया है । तत्र रीछोंको मनुष्य बताने वाले खण्डित तव गये । वा ( ३३ ) पक्ष - तुण्ड ( चञ्चु ) प्रहारैश्च शतशो जर्जरीकृतम ' ( महा था वन पर्व २७६ ५ ) यहां गृधराज जटायुका पंख वा चोच मारन ३ । १ कहा है, सो मनुष्यका भला चोंचे वा पंख मारना कैसे हो सके । सो वह जटायु भी पक्षी था; तभी उसे २७२।६ पद्यमें पतत्री ( पक्षी ) या कहा गया है । आगे ' छिन्न पक्षद्वयं खगम् ' ( २७६।२२ ) उसे प तथा रावण द्वारा उसके दोनों पंखों का काटना कहा है । इसी सिद्ध पृ ० रामायणमें उसे ‘ तीक्ष्णतुण्डः ( चञ्चुः ) ' ( ३२५०१२ ) गृध ( ३ | १४ | १६ दीख कहा है । हां, यह भी उक्त दिव्य रीछ - वानरोंकी भांति दिव्यो पक्षी थे, साधारण रीछ, बन्दर, पक्षी नहीं थे । कश्यप व्य विनतामें उत्पन्न गरुड़ भी पक्षी प्रसिद्ध है, वह विष्णुका वाह सिंह वैनतेय नामसे प्रसिद्ध है । ' वृन्द “ गरुड़ उसका नाम था, उसकी जाति गरुड़ पक्षी नहीं थी उसन यह प्रतिपक्षियोंका कथन छल - पूर्ण तथा असत्य एवं निर्मूल है ( ५ ) उसे बड़े पंख होनेसे ही मत्वर्थीय अतिशायन अर्थवाले म उदा प्रत्ययसे ही ' गरुत्मान् ' कहा जाता है । उसी ( गरुड़ ) के बड़े भाई वान अरुणसे सम्पाति तथा जटायु — ये दोनों दिव्य गीध पर आय रूपमें उत्पन्न हुए थे । हां, कामरूप ( अपनी इच्छानुरूप वदल सकने वाले ) ( वाल्मी ० ४।६० / १६ ) अवश्य थे । सम्पाति मिि भी सूर्य द्वारा अपने पंख जलने का वृत्त वानरोंको सुनाया था? ( पुरु Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 35

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४० ] श्री सनातन धर्मालोक ( ६ ) हनुमानादि वानर नर थे? [ ४१ तब इनको मनुष्य बताना वादियोंका निर्मूल ही है । हों, देव वा ऋषि अंश होनेसे दिव्यतावश इन पक्षियोंमें भी बड़ा बल था । तभी जटायुको दशरथका सखा ( सहायक ) ( वाल्मी ० महा ३ | १४ | ३५ ) कहा गया । भारत ( ३४ ) कई लोग ब्रिटिश - सिंह, रूसी - भालू, चीनी - चीता सके । आदि तथा सिंह, सिंह- पुरुष, नृसिंह, व्याघ्र, पुङ्गव, पुरुषषेभ, ( पक्षी आदि शब्दों का मनुष्यों में प्रयोग दिखाकर ( हनुमानादि ० पृ ० १३३ ) रामायणमें वानर - रीछ - पक्षी आदिको भी मनुष्य इसी सिद्ध करना चाहते हैं, और वानर - शब्द रखनेसे जहां छन्दोभङ्ग १४११ दीखा, वहां कपि, प्लवङ्ग आदि उससे मिलते - जुलते शब्दोंका दिन प्रयोग रखना रामायणमें मानते हैं ( पृ ० १३२-१३३ ) ऐसे छली श्यपरे व्यक्तियों की बुद्धि दयनीय है । उन्हें यह जानना चाहिये कि चाह सिंह, कुञ्जर, ऋषभ, पुङ्गव आदि शब्द अवश्य प्रशंसावाचक हैं-' वृन्दारकनाग - कुञ्जरैः पूज्यमानम् ' ( पा ० २/१/६२ ) यह सूत्र थी उसमें ज्ञापक है । जैसे इसी रामायण में ' कपि- कुञ्जर ' ल है ( ५/५७/४२ ) शब्द आया है । ' सिद्धान्त - कौमुदी ' में उक्त सूत्रके न म उदाहरणमें गोनागः, गोकुञ्जरः ' ( श्रेष्ठ बैल ) आया है, परन्तु भावानर, ऋक्षं गृध्र पक्षी आदि शब्द कहीं प्रशंसावाचक नहीं - आये । ' वानर ' ( बन्दर ) निन्दा में तो आता है, प्रशंसा में नहीं । रूपरू ' नृसिंह ' तो अवतार थे, जिसमें पुरुष और सिंह दोनोंकी = पाति मिश्रित आकृति थी । या किसी पुरुषका नाम हो; तो वहाँ ' ना नाथा ( पुरुषः ) सिंह इव ' यह विग्रह होता है, वहां ' उपमितं व्याघ्रा-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. दिभिः ' ( पा. २/१/५६ ) से समास होता है, ' गोव्याघ्रः ' आदि इसीके उदाहरण हैं । पुङ्गव, ऋषभ आदि बैलवाचक होते हुए भी समासमें श्रेष्ठ - वाचक हैं । पुरुषसिंहमें भी ' पुरुषः सिंह इव ' यही विग्रह है । ' सिंह- पुरुष ' आदिमें गुण - सम्बन्ध वश गौणी लक्षणा है । ' सिंहो माणवकः, गौर्वाहीकः ' यदि इसी के उदाहरण हैं, पर यह भी क्वाचित्क होते हैं, हर समय इनका प्रयोग नहीं होता; पर वानर शब्द इन अर्थों में कहीं भी प्रयुक्त नहीं; और समास - बद्ध भी नहीं । रामायणादिमें हनुमानादिकेलिए ' वानर '. शब्दका क्वाचित्क प्रयोग होता; और वे धड़ल्लेसे रामायण में मनुष्य कहे गये होते; तब तो रामायण में वानर उनकेलिए लाक्षणिक प्रयोग भी कथञ्चित् माना जाता, पर वहाँ तो उनकेलिए ' वानर ' शब्द बार - बार आता है, और वहाँ स्पष्टतया उन्हें ' वानर ' बताया भी गया है, नर उन्हें कहीं भी नहीं कहा गया, तब उक्त शब्दों-का समाधानार्थ यहां प्रयोग देना ' विषम - उपन्यास ' है । ( ३५ ) जो कि आर्यपथिकने ' सुग्रीवने अपने आपको मनुष्य कहा ' यह कहकर उसमें ' अरयश्च मनुष्येण विज्ञेयाश्छन्नचारिणः ' ( कि. २ ( २२ ) यह रामायणीय प्रमाण दिया है, यह उसकी दयनीय दशा बता रहा है, और सिद्ध होता है कि - उसने बड़ा प्रयत्न किया है कि — कहीं हनुमानादिकेलिए ' मनुष्य ' शब्द मिले; पर उस बेचारेको निराशा ही हस्तगत हुई । यहाँ पर ' मनुष्येण ' यह सामान्य शब्द है, यह उसके अपनेलिए नहीं है, किन्तु अन्यकेलिए हैं, तभी यहाँ ' मया ' आदि रूपसे ' अस्मद्'-An eGangotri Initiative

पृष्ठ 36

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४२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) हनुमानादि वानर नर थे? शब्दका प्रयोग नहीं आया । इसी प्रकार हितोपदेश आदि में गीदड़ - बिलाव आदि की कथाओं में भी ' मनुष्य ' शब्दका प्रयोग आता है, पर इससे वे मनुष्य नहीं हो जाते । पञ्चतन्त्रमें शशक-ने भासुरक सिंहकेलिए कहा है- ' स्वभूमिहेतोः परिभवाच्च युध्यन्ते क्षत्रिया: ' पर इससे सिंह क्षत्रिय मनुष्य नहीं बन जाता । ' न सोस्ति पुरुषो लोके ' ( ११२६४ ) यहाँ दमनकने पिङ्गलक के लिए ' मनुष्य ' वाचक ' पुरुष ' शब्दका प्रयोग किया है । ' वरं व्याधि-मनुष्याण ' ( १।३०३ ) यहाँ सब्जीवक बैल अपने लिए कह रहा हैं । इससे यह पञ्चतन्त्रका बैल मनुष्य नहीं बन जाता । ‘ किमङ्गवाग - हस्तवता नरेण ' ( सित्रभेद ) में दमनक शृगालने यह पद्य अपने लिए कहा है, इससे वह शृगाल ' नर ' ( मनुष्य ) नहीं बन जाता । इस प्रकारके सैकड़ों पद्य दिये जा सकते हैं । फलतः ' वानर ' शब्द किसी प्राचीन ग्रन्थ में प्रशंसा - अर्थ में प्रयुक्त नहीं; हनूमानादिकी वहां पर प्रशंसा ही ग्रन्थकारको अभिमत है; तब वहां ' सिंह ' आदि शब्दों का काचित्क प्रयोग न करके ' वानर ' वा उसके पर्यायवाचकोंका सार्वत्रिक प्रयोग क्या हनुमानादिकी निन्दा करने के लिए लिखा है? ' देवदत्तो वानरः ' यह लाक्षणिक प्रयोग, मनुष्योंकी ' बन्दर - घुड़की ' आदि लाक्षणिक प्रयोग निन्दार्थक ही तो हैं । किसी लड़केको कहें कि – ' अरे बन्दर! ' तो वह लड़का भी उस शब्दको बुरा मनाता है । वहां अन्य भी कोई उसकी प्रशंसा ' वानर ' शब्दसे नहीं समझता । तब महाकवि मुनि वाल्मीकि द्वारा हनुमानादि प्रशंसनीयपात्रोंको CC - 0. Ankur Joshi Collection बार - बार वानर वा उसके पर्यायवाचकों से बुलाने से स्पष्ट है । कि— श्रीवाल्मीकिको वहां उनकी वस्तुतः पशु - जातीयता ही अभिप्रेत है; मनुष्यता नहीं । स्वाभाविकता में कुछ भी नहीं होती । क्या मनुष्य एक वृक्षसे दूसरे वृक्षपर या एक शाखासे अन्य प शाखा पर स्वाभाविकतासे उछल - कूद किया करते हैं? अथवा कटकटा शब्द करते हैं? किलकारियाँ मारते हैं? वीर पुरुष स क्या दाढ़ों से दूसरेको काटते हैं, वा नाखूनोंसे स्वाभाविकतया व नोचते हैं! यदि ऐसा नहीं, परन्तु रामायणमें वैसा उनके लिए व मिलता है, जिसके प्रमाण हम पूर्व उपस्थित कर चुके हैं, तब ह स्पष्ट है कि वे वहां वानर हैं, नर नहीं । यदि रामायणका यह व निर्णय श्राजकलके सुधारकोंको मान्य नहीं है, ' तब हनुमानादि भी कोई थे ' इस विषयमें भी वादियोंके पास रामायण, महा भारत, पुराणोंके अतिरिक्त कोई प्रमाण नहीं । आधार होनेपर यह ही तो चित्र होता है । क ' छन्दोभङ्गके भय से कविने ' वानर ' के स्थान पर ' प्लवर्ग आदि शब्द रखे; वानरकी पर्यायवाचकता के नाते नहीं ' इस इस प्रतिपक्षीकी वातसे तो बड़ी हँसी आती है । कवि इतना कमजोर हैं; नहीं होता कि - मनचाहा शब्द न रख सके । जहां ' प्लवग रखा जाता है, वहां ' वानरर्षभ ' भी अनुष्टुप् जातीय ( पथ्याववत्र का छन्दमें जहां - तहां आ सकता है, कोई छन्दोभङ्ग की बात नहीं अव अतः यह वादीका हेत्वाभास उसके पक्षकी निर्मूलताका प्रभार नही Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 37

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४४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) है, उन युक्तियोंका प्रत्युत्तर न दे सकनेका यह स्पष्ट चिह्न है । ही यदि कवि अपना स्पष्ट शब्द नहीं रख सकता; तो यह उसकी निन्दा कमज़ोरी होती है । उसे ' कवि ' ही नहीं कहा जा सकता ' एतेषां कपिमुख्यानां ' ( कि ० ३३।१२ ) में ' एषां वानरमुख्यानां ' यह । अन्य पाठ स्पष्ट रखा जा सकता है । ' हरिभिः संवृतद्वार ' ( कि ० ३३।१६ ) में नथवा " वानरैः संवृतद्वार " यह पाठ बिना किसी बलात्कारकेआ पुरुष सकता है, कुछ भी छन्दोभङ्गका अवसर नहीं श्राता; तव कतय!! वानरके विविध पर्यायवाचकोंके देनेसे स्पष्ट है कि - यह सब लिए वन्दर थे । हाँ, दिव्य वन्दर थे, साधारण नहीं । जो वानर हूँ, तब ही है, उसके भिन्न - भिन्न पर्यायवाचक दिये जा सकते हैं । जो यह वन्दर नहीं है, केवल ' वानर ' किसीका विशेष नाम है, जैसे नादि ' अमरसिंह ' वहां उसका पर्याय वाचक- - देव- केसरी ', अथवा महा- ' देवता - शेर ' आदि नहीं दिया जा सकता । ' नामग्रामयोर्न संस्कृतम् ' होनेपर यह लौकिक एवं शास्त्रीय व्यवहार है । इससे प्रतिपक्षीका पक्ष कट गया । लवर्ग ( ३६ ) वादियोंका वानरोंको नर सिद्ध करने में प्रयत्न - इस इसलिए है कि उनके जो कार्य रामायण में किये दिखलाये गये मज़ोर हैं; उन्हें उनके मतानुसार वन्दर कभी नहीं कर सकते, इसलिए नगम वे उन्हें ' मनुष्य ' सिद्ध करते हैं; पर महाशयो! वहां का वर्णित वक्त्र कार्य मनुष्य भी तो नहीं कर सकते । वस्तुतः वे वानर देवताओं के नहीं अवतार थे; अतएव उनके लिए रामायण वर्णित कृत्य असम्भव प्रमाद नहीं थे - यह हम आगे कहने वाले हैं । यदि यह पक्ष वादी CC - 0. Ankur Joshi हनुमानादि वानर नर थे? Collection Gujarat. लोग मान लें, तब उनको बार - बार लघुशङ्काएँ न हों; जो उनकी दुर्बलता की निशानी हैं; पर देवतावाद मान लेने से उनके साम्प्रदायिक - सिद्धान्तका भङ्ग होता हैं; तभी वे कुतर्कों का सहारा लेकर पृथ्वी आकाशके कुलावे मिलाकर असम्भूत विचित्र कल्पनाएँ किया करते हैं । वस्तुतः देवतावाद न मानने से सारा वैदिकसाहित्य एवं पौराणिक, ऐतिहासिक और लौकिक साहित्य व्यर्थ हो जाता है । ( ३७ ) यदि हनुमानादिको लौकिक वानर भी मान लिया जाय; तब भी दोष नहीं आता? बन्दरोको प्रयत्नपूर्वक सिखलाया जावे; तब वे सब प्रकारके कार्य कर सकते हैं । ' आर्यपथिक'की ' हनुमान आदि वानर ' पुस्तकके पृ. ४ पं. ६-१४ में उन्होंने स्वयं लिखा है— ' एक बन्दर पिछले दिनों एक चित्रपट पर भी काम करता दिखाया गया था । उसकी मासिक वेतन भी इतनी थी कि-उसपर इनकमटैक्स लगता था । वह ' इन्सानियत ' नामक फिल्म में काम करता था । वह वन्दर अनेक सुन्दर वस्त्र पहनता था ' । यहाँ वादीका यह लिखना व्यर्थ है कि - ' ये वन्दर मलमूत्र-त्याग स्वयं करते हैं, खाना स्वयं खाते हैं, पर वस्त्र स्वयं नहीं पहनते हैं । इनको कोई वस्त्र पहनाता है, तो पहनते हैं । हनुमान् आदि स्वयं वस्त्र पहनते थे ' । महाशय जी; अभ्यासकी महिमा बड़ी है । उससे सभी कार्य किये कराये जा सकते हैं । श्री कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकरने ' ब्राह्मण- सर्वस्व ' ( पुराणाङ्क ) में An eGangotri Initiative

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४६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) लिखा था कि- ' एक बन्दर अपना नाम लिखा करता था । कई चन्दर दुकानोंसे कई वस्तुएँ पैसा देकर ले आया करते थे; यह समाचारपत्र - संसारमें प्रसिद्ध है । आजकल सर्कसोंवाले रीछसे साईकल चलवाते हैं; हाथीको चौकीपर बड़े प्रयत्नसे बैठवाते हैं; जो उस समय पूरा गणेशजी लगता है । इस प्रकार पक्षियोंसे, पशुओंसे अन्य बड़े काम लिये जाते हैं; और लिये जाते रहेंगे । हम गाज़ियाबाद में एक बगीची में रहते थे; उसमें वृक्षोंपर बन्दर रहा करते थे । एक बार एक बन्दर कहींसे एक चुन्नी उठा लाया; और शीशा भी । शीशेमें वह बार - बार अपनी शकल देखता था । सिर पर चुन्नी रखकर घूँघटसा निकालता था । बन्दर बड़ा नक्काल होता है, वह जैसा दूसरेको करते देखे; वैसा करता है । यदि गतजन्मका वह आरूढ़ - पतित हो, और उसे पूर्व जन्मकी भी स्मृति हो; तो उसे वस्त्र पहननेमें भी कोई कठिनाई न पड़े । आर्यसमाजके श्रीराजेन्द्र ( अतरौली ) जीने ' पूर्वजन्मस्मृति ' ( पृ. ३४ ) में एक सर्पको पूर्वजन्मकी स्मृति दिखलाई है । और पृ. ६०-६१-६२ में एक जीवित वृद्धकी आत्माका एक मृतक युवा के शरीरमें योगविद्या द्वारा प्रवेश दिखलाया है, तब कोई योगी भी वन्दरके मृतक शरीरमें अपनी आत्माका प्रवेश कराकर फिर सब काम मनुष्यों जैसे कर सकता है; उसमें क्या असम्भव है? बताया जा चुका है कि - जन्मसिद्ध योगी देवोंने अपनी आत्माएँ वानरशरीरोंमें डाली थीं, तब वे अप्राकृत ( दिव्य ) बन्दर उन CC - 0. Ankur Joshi Collection हनुमानादि वानर नर थे? जन्मसिद्ध योगी - देवताओंकी महान शक्तिवाले कार्य करें, इसमें क्या असम्भव है? एक कुत्तेका वृत्त हम आगे लिखेंगे । गत हिटलरी महायुद्धमें जापान वालोंने बन्दरोंसे का लिया था; लङ्कापर आक्रमण भी किया था । लाहौर के दैनिक ' विश्वबन्धु ' ( २४ | ११ | ४४ के डाकसंस्करण ) में यह घटना प्रकाशित हुई थी- जापानियोंने ' वानरोंकी सेना तैयार कर ली । जापानियोंने मध्य - वर्मा में वानरोंको सिखानेकेलिए स्कूल खोल रखे हैं । साधारण रंगरूटोंकी भांति ट्रेनिङ्गके पश्चात् वे ' शिक्षा सैनिक ' बन जाते हैं । ' वृक्षों में छिपकर बैठते हैं, और शत्रुपर हस्तबम फेंकते हैं । वानरोंको खच्चरोंपर चढ़नेकी शिक्षा भी दी जा रही है । वे उनपर चढ़कर वारूद आदि दूसरे स्थान पहुँचा आते थे ' । जब इस प्रकार गतयुद्धमें - साधारण वानरों का उपयोग लिया गया; तव युद्धकलाविशारद श्रीरामने भी यदि युद्ध में आरूढ पतित दिव्य वानरोंको शिक्षित करके उनसे सहायता ले ली हो उनसे बड़े - बड़े काम ले लिये हों, तव लौकिक दृष्टि से भी इसमें क्या आश्चर्य? तभी तो रामायण में ' तथा सर्वाणि भूतानि तिर्यग्यॊनिगतान्यपि । प्रियं कुर्वन्ति रामस्य त्यक्त्वा प्राणन यथा वयम् ' ( वाल्मी. ४५६ | १० ) में जटायु आदि गीध तथा हनुमान् आदिको तिर्यग्योनि ( पशु - पक्षी ) बताया है, इससे हमार इ पक्ष पूर्ण पुष्ट होकर वादियोंका पक्ष सर्वथा कट जाता है । तभी २ तो एक कविका पद्य भी इस विषय में प्रसिद्ध है- ' यान्ति न्याय भ Gujarat An eGangotri Initiative

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४८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) प्रवृत्तस्य तिर्यञ्चापि सहायताम् ' । शेष रहा बन्दरोंका बोलना-चालना | बन्दर की भी एक भाषा हुआ करती है, जिससे वे परस्पर बातचीत किया करते हैं । तभी तो इकट्ठ े हो जाते हैं, इकट्ट े भाग भी जाते हैं । उस भाषाका रूस आदि देशोंके वैज्ञानिकोंने उनके शब्दोंको ग्रामोफोन में भरकर और उनके सामने बजा - बजाकर ज्ञान प्राप्त कर लिया था, और समाचार-पत्रोंमें उन शब्दोंका संग्रह भी अर्थों समेत किया था । आर्यमुसाफिर श्रीलेखरामके वने ' पुनर्जन्म ' ( पृ. ५७ ) में ' सुबह-सादिक मदरास ' पत्रके २०-१०- १८६५ के अङ्कसे उधृत किया गया है कि- हैदराबाद और करनौल के बीचमें फर्रुखनगरमें एक हाथी मनुष्य की भांति बातें करता है । फिर वहीं लिखा है- ' यदि अँग्रेजी डाक्टर जो पशु - सम्वन्धी खोज करते हैं, इस ओर ध्यान दें; तो वे पशुओकी बातचीतको बहुधा समझ लें ( पंजाब अखवार लाहौर १-१२-१८६५ ) ( पुनजेन्म श्रीलेखराम आय-मुसाफिर पृ. ५६ ) आर्यपथिकको आर्यमुसाफिरकी वातपर ध्यानं दे देना चाहिये | और योगी तो योगविशेष के वलसे ' सर्वभूतरुत-ज्ञान ' ( योग - विभूति १७ ) कर सकता है । जबकि सन्त ज्ञानेश्वर द्वारा सिरपर हाथ रखनेमात्रसे एक भैंसा भी ' सहस्रशीर्षा ' आदि वेदमन्त्र बोल उठा था, यह उस इतिहासमें तथा चित्रपट - संसार में प्रसिद्ध है, तब अवतारी पुरुष श्रीरामने भी उन आरूढपतित दिव्य वानरोंको भाषाका व्यापार भी सिखला दिया हो; तो इसमें क्या आश्चर्य? इस विषय में CC - 0. Ankur Joshi हनुमानादि वानर नर थे? [ ४६ ' पशुपक्षियोंका भाषण ' निबन्ध श्रागे दिया जा रहा रामायणीय वानरोंको है । तब नर बताते हुए वादी प्रायश्चित्तीय सिद्ध हुए । वस्तुतः वानरगण देवताओंके अवतार श्री वाल्मीकिके अनुसार थे - यह यह न माननेपर माननेसे सब सङ्गतियां लग जाती हैं । फिर रामायणकी काट - छाँट करनी पड़ जाती है । कई उसके बचन छिपाने पड़ जाते हैं; कहीं प्रक्षेष पड़ता है; जैसा कि आजकलके सुधारक चाहे वे सनातनधर्मी बताना वा आर्यसमाजी करते चले आ रहे हैं । हों, ( ३८ ) ' हनुमान् आदि वानर नर थे या मनुष्य ' ( पृ. १५८ ) प्रतिपक्षीकी पुस्तक सन् १६५६ में प्रकाशित हुई । उसकी उपजीव्य ' क्या रामसेना बन्दर थी? ' यह पुस्तिका थी; जिसे प्रतिनिधि सभाके सनातनधर्मी स. ध. होते हुए भी लेखकने अमृतधाराके आविष्कारक जो आर्यसमाजी थे - सम्भवतः उन्हें प्रसन्न करनेके-लिए लिखा था । वह सन १६५५ में श्रीठाकुरदत्तजी प्रकाशित हुई थी । उसीका सब कुछ लेकर द्वारा पुस्तकमें उसका अपने ढंगसे भाष्य प्रतिपक्षीने उक्त किया था, जिसके आक्षेपोंका समाधान हम वीच - बीचमें कर चुके हैं; और आगे भी करनेवाले हैं । उसी उपजीव्य पुस्तिकाके पृ. १२-१३ में सनातनधर्मी लेखक - महोदयने दुलमुल नीतिसे कुछ लिखा है, जिसका यह है- " दक्षिण - भारतमें रहनेवाली एक सार सेनाकी जाति थी; उसकी सहायतासे ही श्रीरामचन्द्रजीने लंकापर विजय Collection Gujaran Gangotri Initiative प्राप्त

पृष्ठ 40

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५० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) की थी; वाल्मीकि श्रीरामके समकालीन थे । उन्होंने रामके राज्यकालमें रामायणकी रचना की थी । इसलिए उसमें रामकी उस सहायक जातिका जो वर्णन किया गया है, वह अधिक विश्वसनीय है ' ( पृ. १ ) ' इन जातिवालोंकी इतनी ऊँची सभ्यता और संस्कृतिके होनेपर भी महर्षि वाल्मीकिने उन्हें नर न कहकर वानर कहा तो है, परन्तु वानर नाम सुनते ही हमें जिन प्राणियोंका बोध होता है, शायद वाल्मीकिका अभिप्राय उनसे न हो, क्योंकि - हम जिन्हें वानर कहते हैं, वे पशु हैं । वे रामायण-वर्णित काम नहीं कर सकते । ' यह बातें लेखकने श्रीपं ० शालग्रामशास्त्रीजीकी ' रामायण में राजनीति ' ( सं. १६८८ ) के १११ - ११२ पृष्ठसे लेकर फिर उन्हीं सूत्रोंका भाष्य किया है । आगे वे लिखते हैं - ' जो लोग रामायण-को केवल एक शिक्षाप्रद कथामात्र समझते हैं, उन्हें वाल्मीकिके इस ' वानर ' शब्दपर विचार करनेकी आवश्यकता नहीं, परन्तु जो उसे ऐतिहासिक ग्रन्थ मानते हैं, उनकेलिए यह बात अवश्य विचारणीय है ' ( पृ. १३ ) यह लिखकर वे आगे लिखते हैं- ' यह बात न थी कि इस जातिको वानर कहना बाल्मीकिको खटका न हो । खटका उन्हें भी, और उन्होंने ' यस्य देवस्य यद् रूपं तेजो यश्च पराक्रमः ' ( वाल्मी. १७/१६ ) ‘ अजायत समं तेन तस्य तस्य पृथक् - पृथक् ' ( २० ) देवगन्धर्व-पुत्रैश्च वानरैः कामरूपिभिः ' ( कि. ३३।६ ) देवसन्तान कहकर उसका सांकेतिक समाधान भी कर दिया गया, किन्तु यह समाधान CC - 0. Ankur Joshi Collection हनुमानादि वानर नर थे? ५ श्रद्धालु भक्तोंकेलिए भले ही हो, परन्तु इतिहासके जिज्ञासुओं लिए यह उत्तर सन्तोषजनक न होगा ' ( पृ. १३ ) उ पाठकोंने लेखक - महोदयका मत देख लिया । जब लेखको न अनुसार वाल्मीकि श्रीरामके समकालीन थे; उन्होंने इतिहास लिखा, और उसमें रामकी सहायक उस जातिका रामक म II वर्णन किया, वह यदि अधिक विश्वसनीय है, तो श्रीवाल्मीकि त तो उन्हें बड़े धड़ल्लेसे वानर ( बन्दर ) बताया है, एक - से स्थानमें नहीं, किन्तु सभी स्थान, यह लेखक भी मानता है । f श्रीवाल्मीकि जब लेखकके अनुसार श्रीरामके समय के थे; उ तव उन्हें उस समयका पूरा इतिहास ज्ञात था और उन्होंने उसे स्वयं लिखा भी, तब हनुमानादिका वानर होना वा लिखना भला महामुनिको क्यों खटकता? कोई एक स्थानपर ऐसा उन्होंने थोड़े ही लिखा है? उन्होंने तो स्थान - स्थान पर ऐसा G लिखा है । एक - दो प्रमाण यह भी देख लीजिये । - स ' हनूमन्तं कपिं व्यक्तं मन्यते, नान्यथेति सा ' ( ५ | ३६ | ८६ ) अर्थात् सीता हनुमान्को वास्तविक बन्दर मानने लगी, रावण-प्रोषित माया - वानर नहीं । तब हनुमान्ने स्पष्ट किया— ' ततोस्मि वायुप्रभवो हि मैथिलि! ऐरावतस्तत्प्रत्तिमश्च वानरः ( ८ ) अर्थात् मैं वायुपुत्र वानर हूँ । ग्रन्थके तात्पर्यनिर्णयमें ' अभ्यास ' ( फिर - फिर उसीकी आवृत्ति ) भी एक लिङ्ग होता है, उस अभ्यास से स्पष्ट तात्पर्य व निर्णीत होगया कि वे देवावतार अप्राकृत ( दिव्य ) बन्दर थे, तब Gujarat An eGangotri Initiative