सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 221–230

सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 221–230

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४०८ | श्रीसनातनधर्मालोक ( 4 ) ड़ा विगर्हिताचारान् अपाङ्क्तयान् नराधमान् । द्विजातिप्रवरो विद्वान् की स्थान उभयत्र विवर्जयेत् ' ( मनु. ३ | १६७ ) ' भस्मनीव हुतं हव्यं तथा सिद्धि कही पौनर्भवे द्विजे ' ( मनु. ३ | १८१ ) ' पौनर्भवस्तथा वयः ' ( प्रजापति-स्मृति ८२-८४ ) ' पौनर्भवस्तथा । षड् अदायादबान्धवाः ' ( मनु. जीते पर वहा ६।१६०-१६१ ) ‘ परपूर्वा ( पुनर्भू ) पतिस्तथा । वर्जनीयाः प्रयत्नतः ' हुए । कैसे लिख ( ३ | १६६ ) ‘ दिधिषूपपतिर्यः स्याद् अग्र े दिधिषुरेव च ।-- ' पूर्व-पूर्वस्तु गर्हितः ' ( महा. शान्ति. ३४ | ४ ) ' अप्रशस्तास्तु कानीन-माना गूढोत्पन्न - सहोढजाः । पौनर्भवश्च, नैवैते पिण्डरिक्थांशभागिनः ’ ( वीरोदयमित्रमें विष्णुका वचन ) । इस प्रकार बृहत्पराशरस्मृतिमें डाल ती, है खोप भी कहा है – ' आसां ( चार प्रकारकी स्वैरिणियोंका ) पुत्राश्च ये दिक जाताः ते वर्ज्या हव्यकव्ययोः । तथैव पतयस्तासां वर्जनीयाः प्रयत्नतः ' ( ५।३६५ ) । ‘ सर्ववर्णेषु तुल्यासु ' इस मनुपद्यकी पैदा व्याख्यामें मेधातिथिने भी कहा है- ' अक्षतयोनिग्रहणं पुनर्विवाहे खारीक पत्नीत्रमाशङ्क्यमानं निवर्तयति ' । अक्षतयोनिषु - परिणेतुरन्येन नहीं श्रसंस्पृष्टासु । एतेन पौनर्भवस्यापि अब्राह्मण्यमुक्तम् ' यह यहां तो राघवानन्दने कहा है । जावे? ' अस्या अपि न भोक्तव्यं पुनर्भूः कीर्तिता हि सा ' ( बृहत्परा. कार कही ५।६४ ) ‘ उपपत्न्याः सुतो यस्तु यश्चैव दिधिषूपतिः । परपूर्व - पतेर्जातः या है; । सर्वे वर्ज्याः प्रयत्नतः ' ( ५ । ३६७ ) । ' उपपतिः स्मृतो यश्च यश्चैव दिधिषूपतिः । परपूर्वापतिर्यश्च वर्ज्याः सर्वे प्रयत्नतः ' ( ३६८ ) । इस प्रकार नारदस्मृतिके व्यवहारपाद में भी देखा जा सकता है । उस ३ । १५५ ) ( १२।४६-४७ ) में पौनर्भव आदि पुत्रोंको जघन्य माना गया है । पौनर्भवपर विचार [ ४० ९ जब मनु आदियोंने इस प्रकार पौनर्भवकी निन्दा कही है; तब क्या वे वैसा करनेकी विधि कभी कर सकते थे? इससे स्पष्ट है कि यह विधिशास्त्र नहीं हैं । विधिशास्त्र तो इसे निषिद्ध करते हैं, जैसे कि- ' पूर्ववत्यामसंस्कृतायां वर्णान्तरे च मैथुनं दोष: ' ( आपस्तम्ब घ.सू. २।१३।३ ) तत्रापि दोषवान् पुत्र एव ' ( ४ ) । ' नहीदृशमनायुष्यं लोके किञ्चन विद्यते । यादृशं पुरुषस्येह परदारोपसेवनम् ' ( ४ | १३४ ) यहाँपर मनुजीने परस्त्रीका सेवन निषिद्ध एवं निन्दित ठहराया है । तब जो लोग कहीं ' पौनर्भव ' तथा ' पुनर्भू ' शब्दोंको देखकर अपने पक्ष विधवाविवाहकी पुष्टि देखते हैं; उनका अभिप्राय सिद्ध न हुआ । वैसे उल्लेखमात्रसे वैसी विधि सिद्ध नहीं हो जाती, किन्तु विधिवाक्यसे ही विधि हुआ करती है । नहीं तो नाम तो चोरका भी स्मृतियोंमें आता है, तथा चाण्डाल आदिका भी, कुण्ड - गोलक आदिका नाम भी आता है; पर उससे वैसी विधि नहीं हो जाती । पुनर्भू, पौनर्भव आदियोंकी · शास्त्रोंमें निन्दा दीखनेसे ' पुनर्भ ' शब्दमात्रसे विधवाविवाहकी सिद्धि नहीं हो सकती । जो कि कई व्यक्ति कहते हैं कि - ' या पत्या वा परित्यक्ता ' इत्यादि पुनर्विवाहकी सन्तान अन्ययुगमें ' पौनर्भव ' भले ही कही जावे, परन्तु कलियुग में भगवान पराशर उसे औरस ही मानते हैं । यदि वह उसे औरस न मानते; तब औरस, क्षेत्रज, दत्त ( कृत्रिम ) इन तीन सन्तानोंको बता कर वह चतुर्थ संख्या में ' पौनर्भव ' को भी अवश्य रखते, पर नहीं रखा; इससे स्पष्ट है कि-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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४१० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( E ) कलिकेलिए व्यवस्थापित पराशरस्मृतिमें पौनर्भव औरसमें ही अन्तर्भूत होता है ' । यह कथन ठीक नहीं । विधवाके पुनर्विवाहमें उसकी संज्ञा ' पुनर्भू ' और उसके पुत्रकी संज्ञा पौनर्भव कही जाती है । स्मृतिकारोंने दोनोंकी निन्दा की है- ' भस्मनीव हुतं द्रव्यं तथा पौनर्भवे द्विजे ' ( मनु. ३ | १८१ ) विधवाविवाह माननेवालोंके सामने यह प्रश्न बड़ा विकट होता है; उसका उत्तर कोई भी विधवाविवाहप्रेमी आज तक नहीं दे सका । उस निन्दित पौनर्भवको पराशरस्मृतिसे उडानेकेलिए वादियोंका यह प्रयत्न है । इससे वादियोंके मतमें भी पराशरस्मृतिसे भिन्न अन्य सभी स्मृतियोंमें पौनर्भवकी सत्ता तथा निन्दितता सिद्ध हो चुकी । अवशिष्ट रही पराशरस्मृति, उसमें केवल दत्तक पुत्रका लक्षण लिखा है, औरसका नहीं लिखा । और वहाँ यह तीन पुत्र उप-लक्षणमात्र हैं, केवल इतनी इयत्ताकेलिए नहीं हैं कि इससे भिन्न न हों । जैसे कि उसकी व्याख्या पराशरमाधवमें कहा है-' श्ररसः क्षेत्रजश्चैव ' एतश्च द्वादशविधानां पुत्राणामुपलक्षणम् । ते च मनुना दर्शिताः, ' औरसः क्षेत्रजश्चैव ' इत्यादि । तब उसके मतमें भी पौनर्भव पुत्रकी सिद्धि हो जानेसे उसकी औरसता खण्डित हो गई । इस प्रकार ' पौनर्भवेन भर्त्रा सा ' यह मनुपद्य व्याख्यात होगया । ( ४४ ) धागे बादीने भविष्यपुराणंसे एक त्रिपाठीकी स्त्रीका . CC - 0. Ankur Joshi Collection + ऐतिहासिक श्राचरण प्रमाण नहीं व्यभिचारं दिखलाकर उसका नियोग बताया था; इसपर क लिखा था कि- ' तब तुम्हारा नियोग भी व्यभिचार सिद्ध हो हरे शु इसपर झपकर वादी कहता है कि- ' मैंने उसे ' विचित्र रा नियो लिखा था; पर भविष्यपुराण ' में ' विचित्र नियोग ' शब्द भी स्वा वहाँ तो ' बुभुजे कामपीडिता ' लिखा है, तब ' कामपीडित नही स्त्र पुरुषका अन्य व्यभिचार भी यदि ' नियोग ' है; तो वादीको हूँ. के को... हो । आर्यसमाजियोंका ' आचार्य ' ( उसके शब्दोंमें अचारत वह स्वयं जब व्यभिचारको भी नियोग कह रहा है; तब: ताि समाजियोंको भी व्यभिचार ( नियोग ) के प्रचारकी बधाई हो इसी इस व्यभिचारके आदेशका श्रेय वादीके तथाकथित ' महात तीस देना पड़ेगा; भविष्यपुराणको नहीं, क्योंकि -स्वामीने वादी लिख दिया है ' यदि स्त्रीसे न रहा जाय ( वह कामपीडित मनुस जाय ); तो किसी से नियोग ( पथिक के शब्दों में व्यभिचार ) को तथा सन्तान पैदा कर ले ' । भविष्यपुराण में विधि नहीं । चन्द्रि ( ख ) हमने लिखा था कि - ' इतिहासका आचरण प्रमादा सारा नहीं होता ' । इसपर वादी कहता है कि - ' यह ठीक नहीं पञ्चम अर्थात् वादी मतमें इतिहासका सभी प्रकारका आचरण क्यों होता है; तब तो रावण जो ब्राह्मण था, उसका आचए हो, च वादी ग्राह्य मानकर दूसरोंकी स्त्रियोंको चुराया करता ह होता युधिष्ठिरका ऐतिहासिक - आचरण जुआ भी खेलता है घोषा स्वा.द.जीका आचरण मानकर हुक्का भांग पीया करता है । ' नारः नसवार सूँघा करता होंगा । अपने बच्चोंको मूर्तिपूजा क Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ४१२ / सपर करता होगा । छोटी आयु में अपने घरसे भाग द्ध होगया शुरू से ही संन्यासी बन गया होगा । स्वामीजी चित्र निवोर राक्षस तो थे नहीं; कि उनका आचरण ग्राह्य न खामीके ऐतिहासिक आचरणको क्यों नहीं भी नही मपीडित स्त्रियोंको ( कामिनीवाला ) ऐतिहासिक श्राचरण हूँ. दीको वर के लिए तैयार है? गया होगा; और वादीके अनुसार हो; वादी अपने लेता? अपनी वह क्या कराने-प्रचार सनातनधर्म तो यह कहता है कि- ' यानि अस्माक V सुचरि-तव तानि; तानि त्वया उपास्यानि नो इतराणि ' ( तै. उ. शि. ११।२ ) बधाई ह इसीलिए ' ' वेदः स्मृतिः सदाचारः ' ( मनु. २।१२ ) में ' सदाचार ' को ' महा तीसरा पद दिया गया है, प्रथम द्वितीय नहीं । इसी विषय में मीने बादीको ' आलोक ' ( ७ ) ( पृ. ३१-३६, ४३-४७ ) में देखना चाहिये । कामपीलि मनुस्मृतिके परिशिष्ट में ' धर्मव्यतिक्रमो वै हि महतां साहसं भचार ) को तथा । तदन्वीक्ष्य प्रयुब्जानः सीदत्येव रजोबलः । ' यह स्मृति-चन्द्रिकामें मनुपद्य उद्धृत किया गया है । तब इतिहासाचरण सारा ग्राह्य नहीं होता । प्रमा ठीक नहीं ( ग ) बादी लिखता है — ' आपके विश्वास के अनुसार तो पुराण आचरण पञ्चम वेद है, फिर इस प्रमाणको माननेमें आप आनाकानी आचरण क्यों करते हैं? ' वादीको याद रखना चाहिये कि कोई भी ग्रन्थ हो, चाहे वेद भी; उसमें विधिवाक्य ही प्रमाण एवं अनुसरणीय करता है होता है, विधिभिन्न अनुसरणीय नहीं होता चलता है योषा जारमिव प्रियम् ' ( भृ. ६६३२ । बेदमें करवा हो | ५ ) जारं ' न कन्या ' ( ६ | ५६ | ३ )् तिपूजा क ' जारः कनीन इव ' ( १ | ११७/१८ ) ' प्रियां न जार: ' ( ६ | ६६ ( २३ ) CC 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. पथिकको भ्राति [ ४१३ " यह लिखा है; तब क्या इस वेदवाक्यसे कोई वादीकी स्त्री वा कन्या जारका प्रहण कर ले, कोई दयानन्दी ' एत्यभि सख्युर्न जामिम् ' ( ऋ. ६६६।२२ ) इस मन्त्रके निर्देशसे मित्रकी स्त्रीके गमनको वैदिक मान ले, तो यह क्या वैदिक हो जायगा? ' रहसूरिव ' ( ऋ. २।२६।१ ) कोई २४ वर्षकी आर्यसमाजिन कुमारी गुप्त प्रसव कर ले; तब वह क्या वैदिक हो जायगा? हमारे मतमें तो उक्त पुराणवचन वा वेदवचन भी विधिवाक्य न होनेसे प्रा नहीं । स्वा. द. जीने ऋभाभू. में लिखा है- ' यथा मांसाहारी पुष्टं पशु ं दृष्ट्वा तन्मांसभक्षणेच्छां करोति ' ( शता. पृ. ६७५ ) ' यथा मांसाहारी पुष्टं पशु दृष्ट्वा तं हन्तुमिच्छति ' ( पृ. ५५१ ) ' जैसे मांसाहारी - मनुष्य पुष्ट पशुको मारके उसका माँस खा जाता है ' ( पृ. ६८० ), तब क्या वादी स्वा. द. जीके इस लेखमात्रसे इसे ग्राह्य मान लेगा? वस्तुतः ऐतिहासिक आचरण ग्राह्य नहीं होता । जैसे कि-श्रीमद्भा. में लिखा है- ' नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वरः । विनश्यत्याचरन् मौढद्याद् यथा रुद्रोब्धिजं विषम् ' ( १०! ३३।३१ ) ईश्वराणां वचः सत्यं तथैवाचरितं क्वचित् । तेषां यत् स्ववचो युक्तं ( धर्मशास्त्रसिद्धं ) बुद्धिमान् तत् समाचरेत् ' ( ३२ ) तब व्यर्थ बातें लिखनेवाले भ्रान्त पथिकका भटकना ही सिद्ध हो गया । ' ब्रह्माके मुखसे कामिनीका विचित्र नियोग ' कहीं भी नहीं निकला, हाँ, स.प्र. में वादीकै तथाकथित ' महर्षि ' के मुखसे ही विचित्र An eGangotri Initiative

पृष्ठ 224

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४१४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) नियोग निकला है कि - ' पुरुषसे... वा स्त्रीसे न रहा जाय, तो किसीसे नियोग ( मैथुन वा व्यभिचार करके ' ( पृ. ७४ ) सो कामिनीकी कथाका उदाहरण मानकर वादी स्त्रियाँ भी अपने उपदेशक पतिके किसी अन्य नगरकी समाजमें जानेपर, न रह सकनेपर विचित्र ' नियोगधर्म ' पूरा कर ही लिया करती होंगी । ' जारं न कन्या ' इन पूर्वोद्धृत वेद - मन्त्रानुसार वादीकी कन्याएँ जार - सम्बन्ध वैदिक समझकर अनुसृत कर लेती हैं-क्या? हमारे यहाँ तो इतिहासका आचरण प्रमाण नहीं होता; नहीं तो नल - युधिष्ठिर आदिका जुआ खेलना भी अनुकर्तव्य हो जावे? मालूम होता है कि - पथिकके पास इन निकम्मी बातोंके-लिए समय बहुत है । उसका वह प्रमाण विधिशास्त्र न होनेसे अनुचित है । ' लोकव्यवहार व्यवस्थापनं धर्मशास्त्रस्य विषयः ' ( न्याय. ४ | १ | ६२ ) यह व्यवस्था धर्मशास्त्र के अधीन होती है, लोकवृत्त बनानेवाले इतिहासके आचरणके अधीन नहीं । ( घ ) वादीने स्वाद के भाष्यपर म.म. गिरिधरशर्माजीकी सम्मति देते हुए म.म.जीका वास्तविक अभिप्राय बिन्दियों में छिपा दिया था; हमने उस रहस्यको खोल दिया । अब वादी बतावे कि- उनका पूरा उद्धरण उसने क्यों नहीं दिया? बिन्दियोंमें क्यों छिपाया? अब म.म. द्वारा स्वामीके भाष्यकी आलोचना भी विन्दियोंमें छिपानेसे वादीका अपने शब्दों में क्या ' छिछोरपन ' प्रकट नहीं हो गया । इस प्रकार श्रीरामगोविन्द त्रिवेदी ने भी जो पृ. ३३६ के ३८ ४ र्थ पैरेमें तथा पृ. ४०३ पं. १४ आदिमें CC - 0. Ankur Joshi Collection ऋतुमती विवाह प्रशास्त्रीय स्वा. दु. के भाष्यका विरोध किया था; उसे छिपा दिया वादीकी प्रकृति पूर्वापरके छिपाने की सिद्ध हो जाती । इ है । ( ४५ ) वादीका पृ. ६२ में यह कहना गलत है कि- ' आश्वार श्रापस्तम्ब आदि ऋतुमती - विवाह चाहते हैं ' । यह ठीक नह सभी शास्त्र ऋतुमतीत्वसे पूर्व ही विवाह बतलाते हैं, यह अन्यत्र सिद्ध कर चुके हैं । ' अष्टवर्षा भवेद् गौरी ' से ए वर्षकी कन्याका विवाह सिद्ध नहीं होता । इससे मृदुगवीन कुछ पूर्व विवाह सिद्ध होता है । यह हम गत निक्ल लिख चुके हैं । सो जब कन्या पति घर आकर ऋतुमती हो, तभी चतुर्थ दिनके बाद श्राश्वलायन आदि गर्भाधान आदिष्ट करते । परन्तु स्वामीने बिना किसी निमित्तके, ऋतुमती होने कम से कम चौथे वर्ष बाद, अथवा १४४ बार रजस्वला हुई-विवाह माना है - यह शास्त्रविरुद्ध है । शेष है गान्धवेविवाह, वह ' निर्मन्त्रो रहसि स्मृतः ' ( म आदि. ७३ | २७ ) बिना मन्त्र के माना जाता है, पर स्वा, दुई विवाहसंस्कार मन्त्रमय माना है, अतः वह गान्धर्वविव विषय नहीं । तब उसमें सत्यवती के विवाहका संघटन नहीं सकता । उसमें तो दिव्य संयोग हुआ, उसी समय व्यास भी हो गये, और उसी समय पिता के साथ चले भी गये । E वादी इसे सृष्टिक्रमविरुद्ध होनेसे यदि नहीं मानता, तब बो इतिहासका उद्धरण वादी कर भी नहीं सकता । ' सति कुछ Gujara An eGangotri Initiative

पृष्ठ 225

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श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) ४१६ ] दया । भवति ' । है । ( ख ) अब तो वादी आगे सनातनी बन गया । सप्तपदीके ' आवलाल समय पतिकी मृत्युमें वह लड़कीका विवाह कराने लगा है । ठीक नहीं सनातनधर्मी भी तो यही शुरूसे कहते चले आ रहे हैं । उस हैं, यह समय तो वह ' यथा कन्या तथैव सा ' होती है; पर क्या वादी ' से एक " उस समय उसे विधत्रा मानता है? यदि वादी आर्यसमाज में ऋतुमती पुनर्विवाहका अवसर कम मिलना मानता है; तब आर्यसमाजी विधवाविवाह क्यों कराते हैं? नियोग क्यों नहीं कराते? हमारे शास्त्रोंमें विवाह ऋतुमतीत्वसे कुछ पूर्व ११-१२ वर्षकी अवस्थामें तभी उन् कन्याका माना जाता है । हाँ, गुणवान् वर मिलनेमें देरी हो िष्ट करते । जानेपर, अथवा विशेष परिस्थितिवश लड़कीका १५-१६ वर्षमें हो भी विवाह माना है ( मनु. ६।१० ) एक - दो वर्षकी कन्याओंका जा हुई विवाह कोई भी सनातनधर्मका ग्रन्थ नहीं मानता; तब उसपर उपालम्भ व्यर्थ है । मृतः ( यह हर्षकी बात है कि - वादीने विवाह होजानेपर अपने यहां स्वाद ' अक्षतयोनि लड़की कोई नहीं मानी; क्योंकि उनमें तुरन्त धर्व विवाह ऋतुदान हो जाता है । तव आर्यसमाजियोंसे चालू किया विधवा-नहीं विवाह भी खण्डित हो गया; क्योंकि - स्वा. द. जीके अनुसार वह व्यास ज शूद्रोंमें होता है, द्विजों में नहीं । तब जो क्षतयोनिका विवाह गये । करनेवाले आर्यसमाजी हैं; वे स्वामीके अनुसार शूद्र हुए । वे तो , तब तो सन्तानवाली विधवाओंका विवाह भी कर रहें होते हैं, तब तो कुछ अतिशूद्र होंगे । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat याज्ञवल्क्य वचन [ ४१७ ( ग ) जो कि वादी याज्ञवल्क्यके वचनसे क्षता और अक्षता दोनों स्त्रियोंका विवाह सिद्ध करता है, उसका यह कथन तो व्यर्थ है । याज्ञवल्क्यने तो ' विप्लुत - ब्रह्मचर्यो लक्षण्यां स्त्रियमुद्वहेत् । स्तन्यपूर्विका कान्ताम् ' ( १३३५२ ) यहाँ पर ' अनन्यपूर्विका ' लड़कीके विवाहका आदेश दिया है । फिर वहाँ बताया है कि-' अनन्यपूर्वा ' से विरुद्ध ' अन्यपूर्विका ' क्या होती है? उसीकेलिए उसने लिखा है- ' अक्षता च क्षता चैव ' । यह वचन किसी विधिके-लिए नहीं दिया गया । यही बात प्रकृतपद्यकी अवतरणिकामें मिताक्षरामें भी दी है । देखिये- ' अनन्यपूर्विकाम् ' इत्यत्र अनन्यपूर्विका परिणेया ( विवाहनीया ) उक्ता; तत्र ' अन्यपूर्वा ' कीदृशी - इत्याह- ' अक्षता-' चेति ' ) श्रीयाज्ञवल्क्यने अनन्यपूर्विकाका [ जो पहले और की न रही हो ] विवाह कहा है, तो ' अन्यपूर्विका ' क्या होती है; अब यह चताते हैं - ' अक्षता च इति ' । ) सो वह तो ' पुनर्मू ' ( अन्यपूर्वा ) का लक्षण है, पुनर्भूत्वकी विधि ( आज्ञा ) नहीं । नहीं तो उसीके उत्तरार्धमें ' स्वैरिणी या पतिं हित्वा सवर्णं कामतः श्रयेत् ' ( आचारा. ३।६७ ) यह लिखकर स्वैरिपी ( स्वेच्छाचारिणी, व्यभिचारिणी ) का लक्षण भी किया गया है; तब क्या व्यभिचार भी वादीका ‘ वैदिकधर्म ' होगा? वादीने जो यहाँ उच्छृङ्खल भाषण किया है, ऐसी स.ध.के किसी ग्रन्थमें आज्ञा नहीं । यह तो वादियोंके स.प्र. में लिखा मिलता है कि - ' न रह सके ' इत्यादि । सो उसीके प्रचार होते रहनेसे, इस विषय में शास्त्रार्थ करते रहने से, स्त्री-स ० ध ० २७ . An eGangotri Initiative

पृष्ठ 226

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४१८ ] श्री सनातनधर्मालोक ( 8 ) पुनर्भूको निन्दा पुरुषोंपर उसके दुष्प्रचार पड़ते रहनेसे उसके दुष्परिणामस्वरूप में उन्हीं को देखकर यह गड़बड़ियाँ कहीं - कहीं होती हैं; पर वादी के सम्प्रदायमें स्त्रियोंकी ' शुद्धि ' तथा उनसे जो ' वैदिकधर्म ' उनकी विधवा - संस्थाओंोंमें कर लिया करते हैं - यह कोई छिपी हुई बात नहीं - यह समाचारपत्रोंमें प्रकट है । इस प्रकार के लैक्चर करके आप लोग शान्त - विधवाओं और पुरुषोंको उत्तेजित करके और लड़कियोंके विवाहकी आयु बढ़ा - बढ़वाकर उनसे ' आर्यसमाज ' करके भ्रूणहत्याओं के कारण बनकर ' स्वयमक्षि आकुलीकृत्य अश्रुकारणं पृच्छसि ' के उदाहरण बन रहे होते हैं । ( ४६ ) याज्ञवल्क्यने ' अविप्लुतब्रह्मचर्यो लक्षण्यां स्त्रियमुद्वहेत् । धनन्यपूर्विकां कान्तामसपिण्डां यवीयसीम् ( अपने से छोटी ) " ( ११५२ ) इस विधिवचनसे अन्यपूर्विका ( जो पहले दूसरेकी रही हो ) से विवाहका निषेध किया है, तब श्रीयाज्ञवल्क्यके मत में पुनर्भू ( अन्यपूर्विका ) के विवाहकी विधि न होनेसे उसका आदेश सिद्ध न हुआ । इसी प्रकार वसिष्ठने भी लिखा है- ' अस्पृष्टमैथुनां यवीयसीं ( आयुमें छोटी ) सदृशीं भार्यां विन्देत ' ( ८१ ) यहाँ भी स्पृष्टमैथुनासे विवाहका निषेध कर दिया गया है । इससे स्पृष्ट-. मैथुना आर्यसमाजी विधवाओंका विवाह कभी नहीं हो सकता, तब यदि कहीं पुनर्भूका वर्णन या जावे, उससे पुनर्भूत्वकी विधि नहीं हो जाती है । धर्मशास्त्रोंमें ' चाण्डाल'का वर्णन भी प्राता है । पति शूद्र और ब्राह्मणी स्त्री होनेपर चाण्डालकी उत्पत्ति कही है; तब क्या मनुस्मृति आदि में चाण्डालका वर्णन दिखलाकर CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. उससे वादी ब्राह्मणीकी शूद्रसे विवाहकी विधिको लेगा? शास्त्रों में तो पुनर्भू अन्न खानेका भी न्याम्य जैसे कि- ' अन्यदत्ता तु या कन्या पुनरन्यस्य निषेध । दीयते । अपि न भोक्तव्यं पुनर्भूः सा प्रकीर्तिता ' ( बृ. पराशर. ५५६ ) पा पतिस्तथा ।... वर्जनीयाः प्रयत्नतः ' ( मनु. ३/१६६ ) ' भस्मनीश व्यं तथा पौनर्भवे द्विजे ' ( मनु. ३१८१ ) इत्यादि अन्यपूर्विका स्त्रीकी निन्दा की गई है । व वेदमें भी ‘ ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम् ' ( श्र. ) ५।१८ ) कन्याका विवाह कहा है, पूर्व - विवाहिता का नहीं, क्यों कन्या नहीं रहती । सो विवाहिताका विवाह वेदविष्ट है । गौतमस्मृतिमें भी ‘ भार्यां विन्देत अनन्यपूर्वी यवीव ( छोटी आयुकी ) ( ४ । १ ) । व्यासस्मृति में भी ' अनन्यपूर्विकास ( २।३ ) ' अनन्यपूर्विकाम् ' इति, दानेन उपभोगेन चा पुरुषान्त गृहीताम् ' । अनेन पुनर्भूर्व्यावर्तते । याज्ञ. मिताक्षरों में भी कि है – अनन्यपूर्विकाम् ' - दानेन उपभोगेन वा पुरुषान्तरापरिजृं ताम् ' । वात्स्यायनकामसूत्र में भी लिखा है- ' सवर्णायाम् पूर्वायाम् ' । तब क्या वादीके अनुसार स्वा. द. जीने पौराि टीकाकारको प्रमाण मानकर विधवाविवाह लिखकर बाई शब्दों में ' छिछोरपन ' किया है? अब ' वैदिक ' ( १ ) जीने पौराणिकोंके आगे माथा टेक दिया!!! ( ४७ ) अब आगे वादी ' नारदस्मृति ' से ' अष्टौ वर्षायुती ब्राह्मणी प्रोषितं पत्तिम् । अप्रसूता तु चत्वारि परतोऽयं स An eGangotri Initiative

पृष्ठ 227

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ४२० ] न्याय्य ' ( १२/६८ ) इत्यादि पद्यसे क्षतयोनिका पुनर्विवाह दिखलाता निषेध | श्रयेत् क्या स्वा. द. जीने नारदस्मृतिसे ही क्षतयोनिका पुनर्विवाह | अपि है माना, तब है? स्वामी तो क्षतयोनिका पुनर्विवाह शूद्रमें मानते हैं; २६ ) पर द्विजोंमें नहीं । और वे मनुस्मृतिके अतिरिक्त अन्य किसी भी स्मृति-भस्मनीत को नहीं मानते । तब इन वचनोंको शूद्रों में चरितार्थ माना जा दिव सकता है । नारदस्मृतिके विषय में यह जानना चाहिये कि - इसमें धर्म नम् ' ( अ. ) प्रधान नहीं, किन्तु राजनीति प्रधान है; तब राजनीतिका वचन नहीं, तो धर्मशास्त्रोंसे बाँधा जाता है । श्रीयाज्ञवल्क्यने अपनी स्मृतिमें वेदविरुद्ध लिखा है- ' अर्थ - ( राजनीति ) शास्त्रात्तु बलवद् धर्मशास्त्रमिति 7 यवीय स्थितिः ' ( व्यवहारा. २१ ) । पूर्विका कादम्बरीमें राजकुलका श्लेषसे वर्णन करते हुए लिखा है— पुरुषान्त ' नारदीयमिव वर्ण्यमानराजधर्मम् ' । इससे सिद्ध होता है कि-में भी कि नारदीय- शास्त्र में राजधर्मका वर्णन है । नारदस्मृति स्वयं भी न्तराप यही बताती है । उसमें १ व्यवहार- दर्शन १ ऋणादान, २ औप-या निधिक, ३ सम्भूयसमुत्थान, ४ दत्ताप्रदानिक, ५ अभ्युपेत्य ने पौराहि शुश्रूषा, ६ वेतनस्य अनपाकर्म, ७ अस्वामिविक्रय, ८ विक्रीया-कर बड़ी सम्प्रदान, ६ क्रीत्वानुशय, १० समयस्यानपाकर्म, ११ क्षेत्रविवाद, १ ) जीने १२ स्त्री - पुंसयोग, १३ दायविभाग, १४ साहस, १५ वाग्दण्ड-पारुष्य, १६ द्यूतसमाह्वय, १७-१८ प्रकीर्णक आदि १८ विवादपद वर्षारयुक्त हैं । इन विषयोंसे ही स्पष्ट हो रहा है कि - नारदस्मृति धर्मशास्त्र 7s न्यं स नहीं, किन्तु उसमें राजनीतिशास्त्र ही प्रधान है । स उसका CC - 0. Ankur Joshi धर्मशास्त्र प्रबल [ ४२१ Collection Gujarat. वचन जब धर्मशास्त्रोंसे विरुद्ध हो, तो बाधित हो जाता है । स्वयं नारदस्मृतिमें भी लिखा है- ' मनुः प्रजापतिर्यस्मिन काले राज्य मबुभुजत् । धर्मैकतानाः पुरुषास्तदासन सत्यवादिनः ' ( १ ) अर्थात् मनुजीके समय तो लोग धर्मपरायण थे; परन्तु ' नष्टे धर्मे मनुष्येषु व्यवहारः प्रकल्पितः । दृष्टा च व्यवहाराणां राजा दण्डधरः कृतः ( २ ) अर्थात धर्म नष्ट होनेपर राजव्यवहार चालू किया गया । नारदस्मृतिमें यह भी स्वयं लिखा है - ' यत्र विप्रतिपत्तिः स्याद् धर्मशास्त्रार्थशास्त्रयोः । प्रर्थशास्त्रोक्तमुत्सृज्य धर्मशास्त्रोक्त-माचरेत् ' ( व्यवहार ३३ ) धर्मशास्त्रविरोधे तु युक्तियुक्तोपि धर्मतः । व्यवहारो हि बलवान् धर्मस्तेनापचीयते ' ( ३४ ) अर्थात् - जहाँ धर्मशास्त्र और अर्थशास्त्रका विरोध हो, वहाँ अर्थशास्त्रकी बात छोड़कर धर्मशास्त्रकी बात माननी चाहिये । व्यवहार ( अर्थशास्त्र ) की प्रबलता माननेपर धर्म क्षीण हो जाया करता है । कौटलीय अर्थशास्त्र में भी यही कहा है- ' संस्थया धर्म-शास्त्रेण शास्त्रं वा व्यावहारिकम् । यस्मिन्नर्थे विरुध्येत धर्मेणार्थं विनिर्णयेत् ' ( ३ | १ | ५६ ) ' तस्य [ धर्मस्य ] अतिक्रमे हि लोकः सङ्कराद् उच्छिद्येत ' ( ११३।१५ ) अर्थात् धर्मशास्त्रका उल्लंघन करनेपर लोगोंमें संकरता प्रसक्त होनेसे लोकोच्छेद हो जावेगा । सो नारदस्मृतिका जो वचन वादीने दिया है, वह विवाहोच्छेद-को बताने वाला है । विवाहोच्छेद धर्मशास्त्रसे विरुद्ध है । धर्मशास्त्र कहता है - ' न निष्क्रयविसर्गाभ्यां भर्तुर्भार्या प्रमुच्यते ' ( मनु. ६।४६ ) तो जब धर्मशास्त्र विवाहोच्छेदका निषेध करता An eGangotri Initiative

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४२२ ] श्रीसनातन धर्मालोक ( 8 ) है; तब वह स्त्री प्रोषित ( परदेसी ) भर्ताका उल्लंघन करके उसे छोड़ कैसे सकती है? ' वेदविरुद्ध मतखण्डन ' में स्वा. द. जीने लिखा है - ' येन यया सह यस्य यस्याश्च विवाहो जातः, तयोः परस्परं समर्पणं जातमेव, नान्यथेति ' ( शता, पृ. ८०५ ) ' जिसका जिसके साथ विवाह हुआ, उनका परस्पर समर्पण हो ही गया, [ व ] अन्यथा नहीं हो सकता ' ( वे.वि.म.ख. ) स.प्र. ११ समु. में लिखा है- ' तन तो विवाह- समयमें स्त्री का पतिके समर्पण हो जाता है, पुनः मन भी दूसरोंके समर्पण नहीं हो सकता; क्योंकि मन ही के साथ तनका भी समर्पण करना बन सकता, और जो करें, तो व्यभिचारी कहावेंगे ' ( पृ. २३६ ), तब एक पुरुषको तन - मन दे चुकी हुई स्त्री फिर विधवा होकर दूसरेको तन - मन दे; तो स्वा. द. जीके अनुसार भी व्यभिचारिणी मानी जावेगी; क्या वादीको यह व्यभिचार पसन्द है, जो कि वह उसकी पुष्टि करता है? वस्तुतः वादीको इन बातोंका अपना ज्ञान तो है नहीं; वह दूसरोंका लेख बिना - विचारे ही उद्धृत कर लिया करता है । नारदस्मृति ही स्वयं कहती है कि- ' सकृत् कन्या प्रदीयते ' ( १२/५८ ) अर्थात् कन्या एक बार ही दी जाती है, फिर दूसरी बार उसे नहीं दिया जाता । तब वादी ' क्षतयोनिका पुनर्विवाह ' उक्त वचनसे कैसे सिद्ध करता है? उसमें पुनर्दान उसका कैसे होगा? आगे स्मृतिकार स्वयं कहता है- ' ब्राह्मादिषु विवाहेषु पञ्चस्वेष विधिः स्मृतः ' ( १२।२६ ) अर्थात् यह दानादि विधि ब्राह्म, प्राजापत्य, CC - 0. Ankur Joshi Collection विवाहोच्छेद धयं नहीं 17 आर्ष, दैव, गान्धर्व इन पाँच विवाहोंमें होती है , अन्य की सुर, राक्षस, पैशाचोंमें नहीं । क्योंकि पहले चार विवाह होते हैं, श्वाँ गन्धर्व साधारण होता है, शेष आसुर धर्म धर्म्य होते हैं; जैसाकि स्वयं नारदस्मृतिमें कहा है- श्री ' ए चत्वारो ब्राह्माद्याः समुदाहृताः । साधारणः स्याद् गान्ध त्रयो s धर्म्यस्त्वतः परे ' ( १२।४४ ) इससे स्पष्ट है कि - धर्म्यविवाह न विवाहोच्छेद नहीं हुआ करता । मन्त्र- संस्कार भी धम्यविवाह जा ही हुआ करता है । इसलिए कौटल्य अर्थशास्त्र में भी I है — ' श्रमोक्षो धर्मविवाहानाम् ' ( ३ | ३ | २२ ) अर्थात् धर्म्यचिवा तो विवाहोच्छेद नहीं हुआ करता । सो वादीसे दिये हुए क तथ पैशाच आदि अधर्म्य विवाहों में चरितार्थ हो सकते हैं । प्रमाणाश्चत्वारः पूर्वे धर्म्याः ' ( कौट. ३ २ १० ) पितृप्रदानक धर्म श्रा विवाहोंमें नहीं । इस विषय में स्पष्टता ' आलोक ' ( ८ ) पृ. उस ७६४ में देखनी चाहिये । वादीका पक्ष अधर्म्य- विवाहविरि मुख्य होनेसे, श्रधर्म्यविवाहोंके वैध न होनेसे गिर गया । अ । मुख ने यह है कि - वादीका तथाकथित ' ऋषि ' क्षतयोनिका पुनर्वित केवल ' अवैदिक ' मानता है, और वेदविरहित शूद्रों में मानता है; में स्वाम ' यहाँ वादी. ऐकदेशिक क्वाचित्क वचनोंको देकर अपने ' लिख भी खण्डन कर रहा है, हमने उनका समाधान कर दिया है ।इसक वस्तुत: इन लोगों में भी कुछ भी धर्म - कर्म नहीं 1 । विधवाविवाह समर्थन कर व वादी स्वाद के अनुसार ' शूद्र ' तथा नहीं धर्मका विरोधी बनने " जा रहा है । ' न विवाहविधावुक्तं विद्या Gujarat. An eGangotri Initiative

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४२४ | श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) अन्य वेदनं पुन: ' ( ६/६५ ) इस मनु - पद्य के अनुसार स्त्रीके विवाह-विवाह ब संस्कार में पुनर्विवाह नहीं कहा गया, तब ' विधवाविवाह ' धर्म दिखलाता हुआ वादी स्वर्यं खण्डित होगया । सुर श्रा ( ख ) स्वा. द. जीसे आदिष्ट की हुई ' वीर्याकर्षणविधि ' वादीको वेदमें मिल गई, बधाई हो, पर यह सिखोंको मत बतलाना नहीं तो ' मुखसे मुख ' करते हुए उनकी दाढी पत्नीके मुखमें चली, विवाह जाया करेगी । छोटे - बड़े कदके दम्पतियोंको भी न बताना, नहीं भी तो फिर ' मुखसे मुख आदि ' नहीं हो सकेगा । ऋ. ७७६७१६ में तो केवल अपने शुक्र होनेकी निव तथा ’ ' ' को संकोच कर ' के हुए क विधिकी तो गन्ध भी नहीं । ते हैं । ि दानक श्रादि कुछ भी नहीं । यजुः १६ । उसमें भी ' नाकसे नाक मुखसे मुख्य अङ्गका नाम तो स्वामीने वाि' मुखसे मुख ' होकर आकर्षण हो ने अनजानको सिखलाने के लिए केवल इतनेमात्रसे तो सन्ततिसे ता है; प्रार्थना है । इसमें ' नाकसे नाक आकर्षण की स्वामीजीकी प्रिय ऋ. १०/८/२ में भी संकोचन ७६ का उल्लेख भी व्यर्थ ही है, मुख ' नहीं लिखा । और फिर लिखा नहीं; तब क्या केवल जायगा; यह विधि यदि स्वामी-लिखी; तब तो स.प्र. कां पाठक वञ्चित रह जावेगा? यदि यह स्वामी न लिखते, तो क्या लोगोंको ज्ञान होता? वा स्वामीके दिवा लिखनेसे पहले जनसाधारणको ज्ञान न था? फिर स्वामीको इसका ज्ञान किसने कराया? वाविरहा ( ग ) वादी कहता है - ' यदि आप विधवाविवाहका तथा समर्थन चुके बि नहीं करते हैं, तो शुद्र हैं ' । ऐसी कहीं राजाज्ञा तो लिखीनहीं; स्वा.द. और विधवाविवाह [ ४२५ उल्टा ' नान्यस्मिन् विधवा नारी नियोक्तव्या द्विजातिभि: ' ( ६६४ ) इस मनुके पद्य में विधवाका अन्य पुरुष ( देवर वा सपिण्ड आदि ) में नियोजन द्विजोंको निषिद्ध कहकर शूद्रों में विधवाविवाह सूचित कर दिया गया है । बल्कि - वादी के राजाकी श्राज्ञाके अनुसार विधवाविवाह करनेवाले आर्यसमाजी लोग शूद्र हैं, और उसके समर्थनकर्ता पथिकजी भी शुद्र हुए । यह हम नहीं कह रहे, स्वयं वादी से तथाकथित वैदिक स्वामीजी कहते हैं । देखिये- भाभू. ( पृ.२२२ ) ' पुनर्विवाहस्तु खलु शूद्रवर्णं एव विधीयते, तस्य विद्याव्यवहार-रहितत्वात् ' । ' इत्यनेनापि एकस्याः स्त्रिया, एक एव पतिर्भवतुः एकस्य पुरुषस्य एकैव स्त्री चेति । अर्थाद् अनेक स्त्रीभिः सह विवाहनिषेधो नरस्य, तथाऽनेकैः पुरुषैः सह एकस्याः स्त्रियाः । सर्वेषु मन्त्रेषु एकवचनस्यैव निर्देशात् ' ( पृ. २२० ) अव वादी विधवा-विवाहका समर्थन करता हुआ विधवाके एकबार पूर्व विवाहित होनेसे अब उसका पुनर्विवाह कह रहे होनेसे स्वामीके अनुसार वेदविद्याके ज्ञानसे शून्य शूद्र सिद्ध होगया -यह हम नहीं कहते, वादीके तथाकथित ' महर्षि ' कह रहे हैं, वधाई!!! अथवा ' सर्वेषु मन्त्रेषु एकवचनस्यैव निर्देशात् ' यदि स्वामीके इस वचनको वादी वेदविरुद्ध मानता है; तब वादी उनकी ' ऋषि ' पदवी छीनकर स्वयं उसका प्रयोग करे । यह हमें अनिच्छा होते हुए भी वादीके कुव्यवहारवश कहना पड़ा । ( ४८ ) भविष्य - पुराणके ‘ म्लेच्छ ' का अर्थ ' मुसलमान ' नहीं CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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४२६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) हो सकता, न उसमें शुद्धि अर्थ है- यह हम ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ८६३-८६६ में, तथा तृतीय पुष्पमें लिख चुके हैं, उसका उत्तर देनेकी शक्ति वादी में नहीं हो सकी । जब उसमें शुद्धिकी बात ही नहीं; तब वादीने शुद्धि - विरोधियोंको ' राष्ट्रका शत्रुसदृश ' कैसे बना दिया? कीजिये आप शुद्धि, हम निषेध थोड़े ही करते हैं; पर शास्त्रका झूठा नाम लेकर मत करो । जब हमने वादीसे दिये पुराणके वचनपर ऊहापोह दिया; तब वादी ब्र. प्रभुदत्तजीकी दुहाई देता है, इससे स्पष्ट सिद्ध हो रहा है कि-वादीको स्वयं इन बातोंका ज्ञान नहीं; केवल दूसरोंकी चोरी करके अपना निर्वाह किया करता है । हम उनसे क्यों पूछें?! वादीने ही वह प्रमाण उपस्थित किया; तो उत्तरदायित्व भी उसपर उसीका है, अब दूसरों की दुहाई देना सिद्ध कर रहा है कि — उसका मत गलत है, निराधार है । वे ब्र. प्रभुदत्तजी के व्यक्तिगत विचार हो सकते हैं; पर भविष्यपुराणके वचन में वैसा कुछ भी नहीं लिखा । मालूम होता है, उन्होंने श्रीरामचन्द्रकी ' शुद्धि ' पुस्तकसे वह प्रमाण विना विचारे ही उद्धृत कर लिया । ( ख ) जब वादीके अनुसार भविष्यपुराण में १००० वर्ष संख्याके कलियुगके वर्षमें कश्यपमुनिने म्लेच्छों ( अशुद्ध बोलने वालों, जैसे कि - महाभाष्य में कहा है- ' म्लेच्छा मा भूम - इत्यध्येयं व्याकरणम् ' इसका क्या वादी यह अर्थ करेगा कि- हम ' मुसलमान न होजाएँ, इसलिए व्याकरण पढ़ना चाहिये ) को संस्कृत सिखलाई; तब ३६८१ कलिमें होनेवाले मुसलमान यहां CC - 0. Ankur Joshi Collection भविष्यपुराण में ' सण्डे ' ' म्लेच्छ ' शब्द से कैसे गृहीत हो सकते हैं - यह सका । तब बेचारा वादी अपने दिये हुए ही प्रमाणसे वादी न अप्रतिम निग्रहस्थानमें निगृहीत होगया । फिर एक लघुशङ्का बादी के मुखसे निकलती है कि च सण्डे च फाल्गुने चैव फर्वरी ' अर्थात् रविवारको - ' रवि फाल्गुनको फर्वरी कहेंगे यह अर्थ करके वादी लिखता स क्या उस समय अँग्रेज थे, तथा उनकी अँग्रेजी भाषा है प्रचि हि थी? क्या आपके व्यासजी अँग्रेजी जानते थे? " भ यह वादीक भारी विद्वता पाठकोंने देखली । जबकि यह ' भविष्यपुराण वादीने भी इसका अर्थ ' रविवारको ' सण्डे ' कहेंगे ' इस प्र ' है । भविष्यत्में दिया है; तब छोटे बच्चोंवाली यह लघुशङ्का उसने मे क की? इस विषयमें वादी ' आलोक ' ( ६ ) पृ. ६४६-४७में देख ते. श हमने लिखा था कि - पुराणानुसार १००० कलिमें होनेवार तव महामद ३६८१ में उत्पन्न हुआ मुहम्मद कैसे हो सकता है? हो यह स्पष्ट ही तो वादीसे दिया हुआ प्रमाण है- ' सहस्राब्दे प्राप्ते ' ( भविष्य, प्रति, ४२११५ ) तव वादीका कहना कि - ' पुरा इस महामद कौन था, इसमें प्रमाण देना चाहिये था, १०० ' लिङ्गच्छेदी शिखाहीन मुसलमान नहीं तो कौन हैं? " ब से वादीने हमारे प्रश्नपर प्रश्न कर दिया, तब क्या स्वा वह अनुसार शिखाहीन, विधवाविवाह करनेवाले श्रार्यसम वादी के ' अनुसार ' मुसलमान ' हो जाएँगे? हम इसपर ' आ लाद ( ७ ) पृ. ८६६-८६६ में उत्तर दे चुके हैं कि भविष्यपुरांक Gujarat. An eGangotri Initiative