सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 231–240
सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 231–240
पृष्ठ 231
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
| श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) ४२८ दीनद महामद मुसलमानी मुहम्मदसे भिन्न हैं, स्वा. द. का उदाहरण अप्रतिम भी हमने दिया था; वादी बेचारा इसपर चुप्पी लगा गया; तव वे वर्तमान मुसलमान कैसे सिद्ध हुए? श्रार्गे वादीने श्रार्यसमाजी - रविवार जयदेवजीका प्रमाण दे दिया, इसे हम क्या करेंगे? इसी प्रकार रको मूसा तथा ईसामसीहका वर्णन भी भविष्यकालमें समझना खता है कि... हिये । यदि वहां कहीं भूतलकार है; तो वहाँ पृष्ठ ८६७-६८ षा प्रचलि ' आलोक ' ( ७ ) में हम प्रत्युत्तर दे चुके हैं । इस विषय में आगे यह वादी भी समझ लेना चाहिये । यपुराण ' कालिदासके समय वर्तमान मुसलमान नहीं थे । स्वामीने इस प्रा वेदमें ‘ तरुतारं’में ‘ तारं'का ' ताराख्यं यन्त्र ' अर्थ कर दिया; तब उसने क्या वेद अँग्रेजी ज़मानेमें बनाये गये? क्या वेद ' तार ' इस मैं देखते. शब्दको भी जानते थे? जब पुराणका नाम ' भविष्यपुराण ' है, होने तब उसमें भविष्यका वर्णन भूतवत् भी आ जावे, तो सम्भव सकता है । हो सकता है । देखिये- ' परिणामत्रयसंयमाद् श्रतीतानागतज्ञानम् ' हस्राब्दे ( योग. विभूति. १६ ) इसमें योगी की भविष्यद् - दृष्टि भी कही है । - ' पुराण इसमें आश्चर्य भी नहीं । पर जहाँ वह अर्थं सम्भव न हो; जैसे था, १००० कलियुगमें उत्पन्न महामदका ३६८१ कलिके पैदा मुहम्मद हैं? " व से कालभेदवश कुछ भी सम्बन्ध नहीं हो सकता, वहाँ बलात् T वह अर्थ करना युक्त नहीं । विलसन आदिका मत उनके नार्थसमा अनुसन्धान - तत्परता से लिखना पड़ता है; क्योंकि आप लोग ' अँग्रेजी मतको शीघ्र मान लेते हैं । अँग्रेजी मतको ही वेदपर र्यपुराएक लाद देते हैं । हमने पर्वतोंके पंख वेदसे बताये थे, पर वादीने CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. गर्म शिखाछेद गलत [ ४२६ नहीं माना, और लिखा कि - साइन्सदान ( अँग्रेज ) इसे कहीं नहीं मानते । यदि वादीके इस मतको माना जावेगा, तो श्रार्य-लोगों को भी विदेशी मानना पड़ेगा । ( ४ ९ ) शिखा छेदनके विषयमें जितने प्रमाण वादीने दिये हैं; वे स्वा. द. जीके पक्ष ( गर्मी के कारण चोटी कटाना ) को सिद्ध नहीं करते; अतः वे व्यर्थ उपन्यास होनेसे अनादरणीय हैं । गर्मी के लिए चोटी नहीं कटानी पड़ती, वह तो उल्टा गर्मीसे रक्षा करती है । बाल तो बाहरी गर्मीको रोकते हैं, गर्मी करते नहीं । तालुके स्थान पर तो शीतलताकेंलिए बाल भले ही कटाए जाएं, पर शिखावाले स्थान पर तो उल्टा, बालोंकी गर्मी अपेक्षित है । स्त्रियोंके यद्यपि तालुपर बाल नहीं कटाये जाते; तथापि वे तालुवाले स्थान पर माँग इसीलिए निकालती हैं कि वहां के तालुके स्थानको शीतल वायु पहुँचती रहे, पर शिखावाले स्थान में उनकी भी माँग नहीं होती; और निकल सकती भी नहीं, क्योंकि- वहाँ शीतलताकी आवश्यकता नहीं होती; अत: वहाँपर गर्मीका प्रश्न ही नहीं उठता; तव वहांपर उष्णतावश चोटी कटाना बिल्कुल असम्बद्ध बात है । विशेष पञ्चमपुष्प में शिखा-रहस्यमें देखना चाहिये । क्या अफ्रीका में सिरमुण्डे श्रार्यसमाजी दिखला सकते हो? यदि वे बड़े - बड़े बाल रखते हैं, तो चोटी भी रख सकते हैं । इस विषय में हम आलोक ' ' ( ७ ) तथा ( ५ ) में कह चुके हैं; पर वादी में प्रत्युत्तरकी शक्ति कहाँ? प्राचीन वचनों में कहाँ लिखा है कि - गर्मीसे चोटी कटाओ? श्रीमहीधरादिके An eGangotri Initiative
पृष्ठ 232
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४६० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) अर्थ पर हम ५ म पुष्पमें लिख चुके हैं । श्रीमहीधरको यदि गालीवक्ता वादी वाममार्गी मानता है; तो उसे स्वयं भी वाममार्गी बनना पड़ेगा । चोटी कटाना फिर वादी के शब्दों में ' वाममार्ग ' हो जायगा । बधाई । ( ५० ) आगे वादीने निकम्मी बातें लिखी हैं कि - ' श्री-अखिलानन्द तथा श्रीकालूराम इसलामका प्रचार करते थे ' । वादी बतावे कि - उन्होंने इस्लामका क्या प्रचार किया? क्या मूर्तिपूजाका उन्होंने खण्डन किया? क्या मथुराके मन्दिरकी मूर्तियोंको हाकियां मारीं मरवाई, क्या ईश्वरकी साकारताका खण्डन किया, क्या चोटी कटानेकी प्रेरणा की? क्या छुवाछूतको इटवाया? यह उन लोगोंका काम आप लोगों ही ने तो सम्भाल रखा है: तब आप क्या लियाकत अली वा अयूब एवं भुट्टोके नौकर हुए? ' चाँद ' ने जो हसननिजामीकी चिट्ठी प्रकाशित की थी; वह ' भारतधर्म ' से दी थी । उसके सम्पादक तथा शुक्ल दोनोंने नोटिस देनेपर क्षमा मांगी थी । इस हमारे लिखने पर वादीने चुप होकर स्वीकार कर लिया । ' वेदत्रयी - समालोचन ' यह पुस्तक कविरत्नजीने आर्यसमाज में रहते हुए लिखी थी । यह उन्होंने ' सत्यार्थप्रकाशालोचन ' की भूमिकामें स्वयं लिखा है । भा.ध. महामण्डलका उन्होंने कई वैयक्तिक कारणोंसे विरोध किया । श्रीराजनारायणजी पहले आर्यसमाजी रह चुके थे । यदि उन्होंने ' शिवलिङ्ग ओंकारात्मक नहीं है ' यह कहा है, तो इससे उनकी शिवपुराणसे अनभिज्ञता CC - 0. Ankur Joshi Collection पथिकका भ्रम [ रूपष्ठ है I । शिवपुराणमें तो यहू बात स्पष्ट लिखी है, इसपर ७ म पुष्पमें सप्रमाण लिख चुके हैं । जब वादीकी कोई बात किसी सुधारक- सनातनधर्मी अनुकूल हो, तब तो वह उसे ' सनातनधर्मी - विद्वान् ' शब्द से है । प्रतिकूल हो; तो उसे ' पौराणिक ' लिख दिया कहना राजनारायणजीने कलियुगकी समाप्ति सं. २००० में ' चेतावनी करता है । मानी थी । क्या वादी उनकी यह व्यवस्था मानता है ! केवल उनने अखिलानन्दजी वा श्रीमाधवाचार्यजी की निन्दा थे । इसीलिए वादी उन्हें स ध का विद्वान् मानने लगा । श्रीराजनारायणजी लिखते हैं- ' कुछ वाममार्गी मये पण्डितोंकी... पहचान यह है कि वह भगवान्की भक्ति और विशेषकर कीर्तन के विरुद्ध कहा करते हैं ' । डा. श्रीराम श्र भांतिवादी भी कीर्तनके विरुद्ध होगा । तब वादी तथा ह श्रीराम भी राजनारायणजीके शब्दोंमें वाममार्गी हो गये । क्या उसे यह स्वीकार है? ( ५१ ) ' अष्टादशपुराण वेदके भाष्य नहीं ' यह वादीका कर कपोलकल्पनामात्र है । निष्पक्ष तटस्थ विद्वान् भी पुरा वेद की व्याख्या मान चुके हैं । इस बार मैं वाराणसेय राजकी संस्कृत विश्वविद्यालयमें ( १२६ / ६५ ) ' पुराणगोष्ठीमें ' आहूत हुआ था । समय पाकर श्रीवासुदेवशरण अग्रवालसे मिला थ जिनका आर्यसमाजी भी आदर करते हैं । प्रसङ्गमें उन्होंने इ कि - पहले मैं भी पुराणोंको गप्प मानता था; पर अब मु Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 233
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ ४३२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) मा इसपर हम अनुभव हुआ कि -पुराणोंके बिना वेदार्थ खुल ही नहीं सकता । उन्होंने ' प्रथमं सर्वशास्त्राणां पुराणं ब्रह्मणा स्मृतम् । अनन्तरं च तनधर्मी वक्त्रभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः ' यह पुराणवचन भी सर्वथा दसे कहना ठीक माना । ब्राह्मणभाग तो वेद है, उसमें जो वादीने स्वामी के वेद करता है । न होनेके हेतु दिये हैं, उनका हम ' आलोक ' ( ६ ) में खण्डन कर वाचनी चुके हैं । यदि पुराण, नाराशंसी आदि ब्राह्मणग्रन्थोंके नाम हैं, ना है! तौ वधाई हो । मन्त्रभागमें भी इनका वर्णन है, सो मन्त्रभाग निन्दा की भी वादी के अनुसार उनसे पीछे की वस्तु होगई । यसमाजी भाष्यकार श्रीजयदेवजी विद्यालङ्कारने भी ' ऋचः सामानि म छन्दांसि पुराणं यजुषा सह । उच्छिष्टाज्जज्ञिरे ' ( अ. ११/७/२४ ) भक्ति श्रीर इस मन्त्रका अर्थ करते हुए लिखा है- ' यजुषा सह पुराणं-धाक यजुर्वेद कर्मप्रवर्तक मन्त्रोंके साथ सृष्टि, उत्पत्ति, प्रलय आदिके थाहा वर्णन करने हारे मन्त्र और ब्राह्मणभाग... उस सर्वोत्कृष्ट परमेश्वरसे हो गये! उत्पन्न होते हैं ' ( ३ य खण्ड पृ. २५५ ) इससे यजुर्वेदके साथ ब्राह्मण भी सृष्टिकी आदिमें परमात्मासे उत्पन्न हुए बताये गये का कध हैं । उसी ब्राह्मणभागमें उससे भिन्न पुराणोंका नाम भी आया पुरा है - ' एवमिमे सर्वे वेदा निर्मिताः... सब्राह्मणाः... सेतिहासाः, राजकीय सपुराणा: ' ( गोपथ. १।२।१० ) इससे भिन्नतासे कहने से पुराण-हूत इतिहास ब्राह्मणभागसे भिन्न भी हैं । मन्त्रभागमैं भी पुराणका नला बहुत वर्णन है— ' तमितिहासश्च पुराणं च ' ( अथर्व. २५ | ६ | ११-१२ ) होंने इत्यादि । मु न्यायदर्शन में भी पुराणोंका नाम मन्त्र ब्राह्मणसे भिन्न कहा CC - 0. Ankur Joshi Collection पुराण श्रादिम साहित्य [ ४३३ गया है- ' प्रमाणेन खलु ब्राह्मणेन भ्यनुज्ञायते - ‘ ते वा खल्वेते अथर्वाङ्गिरस इतिहासपुराणस्य प्रामाण्यम-भ्यवदन् पञ्चमं वेदानां एतद् इतिहासपुराणम-लोकवृत्तमितिहास वेदम् ' ( ४११६२ ) ' यज्ञो मन्त्रब्राह्मणस्य - पुराणस्य ' ( ४/१/६२ ) । इससे पुराण, आदिके ही हैं । इस विषय में ' आलोक सृष्टिके देखना चाहिये । कोई ' ( ७ ) ( पृ. ३७७-३८५ ) लीजिये, उसमें भी प्राचीनसे प्राचीन धार्मिक साहित्य ले पुराणका नाम श्राता है । वाल्मीकि रामायणको लीजिये, जो त्रेतायुगकी मानी जाती है, उसमें वर्णन स्पष्ट है - ' पुराणेषु मया भी पुराणोंका श्रुतम् ' ( १ | ६ | १ ) । रामका नाम राघव श्राया है, सो इस सारे वंशका रामायणमें वर्णन न होकर पुराणों में ही पूरा वर्णन भी पुराणसे ली गई है । पुराण वेद है, रामायण परस्पर के भाष्य हैं । यदि पुराणोंमें विरोध वादीको दीखता है, तब वेदोंमें भी उसको विरोध दीखने लग सकेगा; क्योंकि- वेदमें भी भिन्न - भिन्न अतिशयोक्तिसे वर्णेन है ( आलोक ( ७ ) पृ. १२६-१३० देवोंका वसिष्ठ आदिके इतिहास ) । जो वेदमें हैं, वही पुरावामें भी । जोकि वादी वेदमें उनका अर्थ बदल लेते हैं, वह पुराण में भी जा सकता है । बदला ( ५२ ) यदि आजकलका विज्ञान पर्वतोंके विषयमें आदिका उड्डयन नहीं जान सका है, इससे प्राचीन सृष्टिकी नहीं हो जाता I । वेदमन्त्रों में तोड़ - मरोड़ तो बादी विज्ञान गलत हैं, हम नहीं । यह तो वादीका लोग ही करते स ० ध ० २८ उल्टा उपालम्भ हैं । इम इस Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 234
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ४३४ ] सम्बन्ध में ' पर्वतोंके पंख ' विषयपर आगे लिखेंगे । वादी कहता है - ' श्रीक्षेम, श्रीजय. दोनोंके ही अर्थ उचित प्रतीत होते हैं; क्योंकि- ' इन्द्र ' का जो अर्थ मैंने लिखा है, उसके अनुसार ही इन विद्वानोंने अर्थ किया है ' । इसका तात्पर्य यह हुआ कि - वेदोंके अर्थोंकी कसौटी होती है - ' दयानन्दी ' पथिक'का किया अथं । जो पथिकसे विरुद्ध अर्थ करे उसको कुछ भी ज्ञान नहीं होता । सकती है ' । स्वर्गलोक - जिसे द्युलोक कहा जाता चन्द्र आदि हैं, उनमें माना जाता है । पहाड़ हैं; सो सुमेरु पहाड़ कोई इस मर कर तो स्वर्गमें पहुँचता ही है, युधिष्ठिरादि की भांति सशरीर भी जा , उसका भाष्य गलत!! उसे डाँट पिला दी जा है, वह जहाँ तारे, सूर्य, उन ग्रह श्रादियों में भी लोकका प्रसिद्ध नहीं है । विशेष - शक्तिशाली लोग सकते हैं । आजकल वह कार्य राकेटों द्वारा करनेका प्रयत्न हो रहा है । ( ५३ ) ' ये ते पूर्वेतेभ्यो घृतस्य कुल्यैतु ' ( श्र. १६८ | ३ | ७२ ) में इस लोकका वर्णन नहीं, किन्तु पितृलोकमें मृतक के लिए घृत-प्रवाह दिया जाता है । ' सुरोदकाः ' में यदि वादीसे उल्लिखित ' निघण्टुके अनुसार ' सुरा ' जलका नाम है, तो ' सुरोदकाः ' में पुनः ‘ उदक ' शब्द पृथक् क्यों आया? क्या वादी में इतना सममनेकी भी बुद्धि नहीं है? निघण्टु ( १।१५ ) में वादीने ' सुरा ' का अर्थ ' जल ' माना है । मालूम होता है - वादीने निघण्टु कभी देखा नहीं, वा किसी अन्यकी चोरी करके लिखा है । निघण्टु ( १ । १२ ) CC - 0. Ankur Joshi Collection ' सुरा ' पर विचार में जलके नाम हैं, १५ में नहीं । मूलपाठ ' सिरा नहीं । देखो श्रीवेङ्कटेश्वरप्रेस बम्बईके निरुक्तमें ' है, ' से वैदिकप्रेस अमेरका ' निघण्टु वैदिककोश ' ' निघण्टु ' । ' सूरा ' भी है । निरुक्त ( १ । ४ । १० ) में तथा देखो । पाठ अर्थ ' मद्य ' है । वेदमें सुरा, मधु आदिका जो १११११२ में ' S वादी वही पुराणों में भी मान लें क्योंकि- अर्थ वादी सुरार म भाष्य हैं ।, पुराण मी ग ‘ वास्तविक स्वर्गलोक ' गृहस्थाश्रम है, यह f चादीका ४ ' अपना देश ही वास्तविक - कश्मीर है ' की भांति हैं, इन कश्मीरकी भिन्न सत्ता लुप्त नहीं हो जाती । नहीं तो बाह अपना देश कानपुर, कश्मीर बन कर उसपर भी शेख श्रबट ज की पार्टी अपना आधिपत्य समझ ले सकती है । ' सुरोदकाच श्री क्षेमकरणजीने ' ऐश्वर्य वा तत्त्वमथनका सेवन करनेवाली ' य स्त्रीलिङ्गान्त- अर्थ कर दिया । कितना यह श्रुतिपर बलात्कार वै तब पुराण में भी अर्थ वदल सकते हो, उसपर आक्षेप क्यों! क ( ५४ ) ' गवां द्वादशलक्षाणां आदिपर जो वादीने श्राइ किया है, पूर्वापरसंगति दिखलाकर उसका अर्थ हम ' आ द्व ( ६ ) में दिखला चुके हैं । उससे वादी हमें ' वेदानभिज्ञ तथा । न बताकर आर्यसमाजमें कुख्यात होने के लिए गालिप्रदान करता है । क और अपने अर्थको वह ' नितान्त सही ' बताता है, पर जब तक क हमारे अर्थका सोपपत्तिक खण्डन न करेगा, तब तक वह ल अपने शब्दों में वेदानभिज्ञ ' धूर्त ' बना रहेगा । क्योंकि जब से न Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 235
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) ४: ६ ] दोनों गायको ' अनन्या ' कहते हैं; तब गायको ' है, और पुराण सुयज्ञकी प्रशंसा भला कैसे कर सकते? चटु ' । मरवानेसे महादेवजी भी ज्ञान वादीको नहीं यह बड़ा आश्चर्य है! वेदमें में पाठभेद इतना ' का वर्णन आया है कि- ' श्रातिथ्यर्था गावो यस्य सः ' ' सुरार ' अतिथि वादी ' जिसकी गौएँ अतिथियोंकेलिए हैं '; तब क्या वादी वेदानुसार मी अतिथिको खिलाना मान लेगा? इसी अतिथिग्व'का गायका विस्तीर्ण भाष्य पुराणोंमें है । इस विषय में ' आलोक ' ( ६ ) पृ. ४१६-४३६ में देखना चाहिये । वादीने ब्रह्मवैवर्तके १५ वें श्लोक तक तो लिखा है; १६ वें पद्यमें इ तो वाढी जहाँ ' सगव्यं माँसर्वाजितम् ' पाठ लिखा था; उसे वादीने जान-अबदु बूझकर छिपा लिया है कि किसी प्रकार पुराण कलङ्कित होवें । रोदना सो जब पुराण वहाँपर माँसरहित खीर आदिका वर्णन कर रहा निवाली ' है, वहाँ वादीका बलात् गायको मरवाना- क्या यही उसकी त्कार वैदिक सभ्यता है? वस्तुतः पुराणों को झूठ - मूठ किसी भी प्रकार क्यों! कलङ्कित करना - यह वादीका मुख्य कार्य रहता है; क्योंकि-इससे आर्यसमाज में लीडरशिप मिलती है । जब पूर्वापर प्रकरण-' आलो द्वारा हम सिद्ध कर चुके हैं कि - पुराण में यहाँ गोवधका वर्णन तथा नहीं है, तो पुराण के पूर्वापरको छिपाकर बलात् पथिकका गाय-करता को मरवाना उसको क्या वधिक सिद्ध नहीं कर रहा? | ' पच-व तक कोटि गवां मांस ' पर ' आलोक ' ( ६ ) पृ. ४३०-४३८ को देखनेके-= वह लिए हमने प्रेरित किया था; पर वादीने उसका कुछ भी प्रत्युत्तर जब न देकर अपना पक्ष स्वयं खण्डित सिद्ध कर दिया । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat गाय श्रवध्य [ ४३७ इसके अतिरिक्त यह हम पहले कह चुके हैं कि - पुराण वेदसूत्रोंके भाष्य हैं । जैसे भाग्य में सूत्रोंके उदाहरण - प्रत्युदाहरण रहते हैं; वैसे वेदसूत्रोंके भाष्यभूत पुराणोंमें भी वेदसूत्रोंके उदाहरण - प्रत्युदाहरण हों, यह स्वाभाविक है । वेदमें एक मन्त्र श्राता है- ' मुग्धा देवा उत शुना अयजन्त उत गोरङ्ग: पुरुधाऽयजन्त' ( अ. ७ | ५ | ५ ) यहाँ बताया गया हैं कि कई ( मुग्ध ) मूढ ( देव ) यज्ञकर्ता अथवा देवयोनि के अधम राक्षस - पिशाच श्रादि अथवा वैसे मनुष्य ( शुना अयजन्त ) अत्यन्त गर्छित और अखाद्योंकी परम अवधि कुत्तेसे यज्ञ किया करते हैं, और कई मूढ ( गोरङ्गः ) अवष्योंकी परम अवधि गायके अङ्गोंसे भी यज्ञ करते देखे गये हैं, सो इस वेदसूत्रोंके अर्थवादरूप पुराणों में भी कहीं मुग्धोंके ऐसे उदाहरण दिखलाये गये हों; वहाँ उनकी मूढता बताना व्यङ्ग्य हुआ करता है, वह विधि नहीं हुआ करती । इसीलिए उपवेद - घ्रायुर्वेदकी चरकसंहिता ( चिकित्सितस्थान १६/३ ) में गौओंके यज्ञसे अतीसार व्याधिकी उत्पत्ति भी बताई गई है । पर जहां उस यज्ञकर्ताकी मुग्धता न बताकर प्रशंसा हो, वहाँ परोक्ष वर्णन समझकर पूर्वापर - प्रकरणके औचित्यानुसार वास्तविक तात्पर्य को समझने का प्रयत्न करना चाहिये । उसके-लिए व्यापक तथा वैदुष्यपूर्ण दृष्टिकोणकी आवश्यकता रहा करती है, उसमें आपाततोदर्शी तथा केवल अभिधावृत्तिका उपासक पुरुष स्खलित हो जाता है । यही बात यहाँ वादीकी है । जब वेद और पुराण दोनों गायको ' अघ्न्या ' मानते हैं, तब उसी . An eGangotri Initiative
पृष्ठ 236
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४३८ ] श्रीसनातन धर्मालोक ( 8 ) दृष्टिकोणसे वेदमें तथा पुराणमें अर्थ समझना चाहिये । यदि उसमें केवल शब्दकी वृत्तिसे काम लिया जायगा; तब उससे जैसे वेदके अर्थ वा तात्पर्य में सफलता नहीं मिलती; वैसे पुराण में भी उस साधारण पुरुषकी गति स्खलित हो जाया करती है । आशा है - पथिक पुराणनिन्दाका व्यसन छोड़कर जब पुराणों में भी वेदार्थ वाली दृष्टि रखेगा; तब उसे पुराण समझने में भी कठिनता नहीं रहेगी, अन्यथा तो पद - पद में वह ठोकरें खाता रहेगा; और स्खलित होता रहेगा । ( ५५ ) आगे राजघनवारके शास्त्रार्थ में श्री अमरसिंहजी की छपाई ' दो शास्त्रार्थ ' पुस्तकसे वादीने कुछ उद्धरण दिया है, वह श्रीमाघवाचार्यजीकी पुस्तक छपनेके बाद उसीका मैटर अपने ढंग पर रखकर छपाई गई है, पर अपने पक्षको उसमें बढ़ा - चढ़ा दिया है, पं ० माधवाचार्यजी की जो जोरदार बातें थीं, उसे आर्य-पथिकजीने बदलकर ढीला कर दिया है, या बिल्कुल छोड़ ही दिया है; अन्य भी कई पूर्वापर - विरुद्ध परिवर्तन उसमें वादीने कर दिये हैं, इस विषय में हमने अपने पास तुलनात्मक समालोचना कर रखी है; अतः उस पुस्तकका कुछ भी महत्त्व नहीं । प्रमाणोंके अर्थोंपर याद रखना चाहिये कि जहाँ जो अर्थ प्रकरणानुकूल हो, वहाँ वही अर्थ करना पड़ता है । ' सैन्धवमानय '. का सवारीके समय लवण अर्थ नहीं किया जा सकता । ' गोभिः श्रीणीत मत्सरम् ' ( ऋ. ६ ४६ ४ ) में ' गौओंके साथ सोमरसको CC - 0. Ankur Joshi Collection प्रख्यातजत्व सार्वत्रिक [ Y पका ' अर्थ नहीं हुआ करता, वहां ' गौ ' का अर्थ दूध ' मुनोमधेनुः ' ( रघुवंश २/३६ ) में क्या वादी यह ही होग अ कि - मुनि गायका होम किया करता था? ' गोमांस अर्थ करेगे भी भक्षयेन्नि हठयोग प्रदीपिकाने इस वचनमें क्या वादी ' हररोज गोमां खाया करे, यह अथ करेगा? फलतः सर्वत्र एक जैसा अथ हुआ करता | तब उपालम्भ कैसा? कथ ‘ सर्वाणि नामानि आख्यातजानि यह सिद्धान्त देस और बन चेदकेलिए नहीं है, न ही श्रीयास्कने ऐसा कहीं लिखा है । तेभ्य महाभाष्यकार भी इसी सिद्धान्तको मानते हैं । लोक में यौगिक उस यदि सर्वथा न होती; तो अमरकोषकी सुधा - टीकामें उनन्न इस पदोंकी व्युत्पत्तियाँ न की जातीं । ' मांस ' शब्दका अर्थ यदि यी वादी प्रकरणवश पुराणमें यौगिक किया जाता है, इसका यह तो या जिन नहीं कि - युधिष्ठिर आदिका भी यौगिक अर्थ करते चलो । ' मां ' था-तो ऐतिहासिक शब्द नहीं, सो उसका ' सारभाग ' अर्थ हो । यह सकता है । कादम्बरी जो वैदिकग्रन्थ नहीं है - लौकिक है । मन्त्र आश्रमके वर्णनमें ' हनुमन्तमिव शिलाशकलप्रहार- संचूर्णितः सन्दे ' क्षाऽस्थिसञ्चयम् ' यहाँपर आश्रमपक्ष में बहेड़ेकी ' अस्थि ' ही पाला मानकर ' गुठली ' ही मानी गई हैं, इसी प्रकार ' मांस ' का शिशु अर्थ समझ लें । तव व शेष रहा ‘ रुक्मीका कथन ' ( ब्रह्मवै. ४ २०६१६१-६३ ); वह इकट्ठी दैत्यप्रकृतिका था, दैत्योंका संग्री था, अतः वहाँ ' मांस ' अर्थ है ' सद्धम बहु सम्भव है, वहाँ ' खोया ' अर्थ घट भी नहीं सकता, शब्दाने गौओ Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 237
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ re श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ४४० ] ही होग में ' संयोगादियों ' में ' चौचिती ' के अनुसार उचित श्रथे नवधारण अर्थ करेंग भी रखना पड़ता है, परन्तु उसके पिताने जो सात्त्विक प्रकृतिका क्षयेनिर था; अपने तमोगुणी पुत्रकी कोई भी बात कार्यरूपमें पुण्यात्मा गोमा परिणत नहीं की । न तो अपनी लड़की रुक्मिणी अपने पुत्र अयं कथनानुसार शिशुपाल दैत्यको दी, न ही दैत्योंवाला भोजन बनवाया; किन्तु श्रीकृष्णको ही रुक्मिणीकेलिए बुलाने भेजा, न्त केस और वहाँ भोजन भी खीर आदिका दिया- ' ददौ योग्याश्रमं लिखा है । तेभ्यो भक्ष्यपूर्ण सुघोपमम् ' ( १०७ ३३ ) । ' अमृतं क्षीरभोजनम् ' । यौगिक उसमें मांस नहीं आया । शिशुपाल आदिको भगा दिया गया । उन- इस विषय में ' आलोक ' ( ६ ) पृ. ४३३-४३६ ) में देखना चाहिये । यदि वादीने ब्रह्मवै. ४ | १०५ ६१-६३ पद्य देकर आगे ६४-६५ श्लोक इ तो भार जिनमें द्वारकामें श्रीकृष्णको आनेकेलिए ब्राह्मणको भेजा गया । ' म था - को छिपाकर फिर ६६ पद्य दे दिया । छिपाये हुए श्लोकों में नर्थ हो यह था कि - रुक्मी के पिताने रुक्मीकी वात न मानकर एकान्तमें किक है । मन्त्री के साथ विचार करके श्रीकृष्णके पास विवाह के लिए चूर्णितः सन्देसा भेज दिया । वैसे निमन्त्रण तो पुत्रके कहनेसे शिशु-ही पालादि सबको भेज दिया । पर जब उसके पिताने दैत्य ' का शिशुपाल के साथ पुत्र सम्मत कन्याविवाह ही नहीं माना; तब वह उसकी कही हुई दैत्य - सम्मत मांसादि सामग्री भी क्यों बहरे इकट्ठी करता? जैसे वादीने यह दो श्लोक छिपाये हैं, वैसे श्रर्य है ' सद्धर्म - प्रचारक ' में भी छिपा दिये हैं । पुराणमें तो दहेज में शब्दाने गौओंका दान कहा है, मारना नहीं ( ब्रह्म. १०६ ४२-४३ ) इससे CC - 0. Ankur Joshi पथिकका भ्रम [ ४४१ वादीका, आर्यपथिकका, तथा विवेकानन्द आर्यसमाजीका भली - भांति खण्डन हो गया । उनको मनचाही वात ब्रह्मवैवसे सिद्ध न हो सकी; और न अव वे कभी सिद्ध कर सकते हैं । आगे वादीने लिखा है कि- ' शास्त्रार्थ में कालुरामजी संस्कृत श्री अखिलानन्दसे लिखा रहे थे ' तब इसमें क्या हुआ? डीडवानाके शास्त्रार्थमें श्री लोकनाथजी की ओरसे संस्कृत श्री-हरिदत्त शास्त्री लिखते रहे । देखिये लेखबद्ध शास्त्रार्थ डीडवाना ( पृ. ३४ ) ' दो शास्त्रार्थोंमें ' नाम तो पं ० लोकनाथका रखा गया, परन्तु संस्कृत लिखना - पढ़ना सव काम श्रीहरिदत्त शास्त्री करते रहे । म ० लोकनाथ संस्कृतानभिज्ञ होनेके कारण मूललेखका अनुवाद न सुनाकर मनमाना व्याख्यान फटकारते रहे । अव वादी पं ० लोकनाथजी को क्या कहेगा? ( ख ) आगे वादीने वेद में एक मगके द्वारा ' गोमांस'का आभास दिखलाया है, इसी प्रकार पुराणों में भी उसका आभास ही है, अर्थ दोनों ही स्थान समान है । आगे महाभारतसे वादी मोक्षधर्मपर्वके कई पद्य देता है, सो मोक्षधर्म में भला हिंसा कैसे मानी जा सकती है? उसकेलिए तो अहिंसा ठीक ही है । वह भी एक राजा विचख्नुका वैयक्तिक वाक्य है, इससे इस पद्यकी कुछ विशेषता न हुई । ( ५६ ) आगे स्मृतिके संन्यासविषयक वचनकेलिए यह समझना चाहिये कि - ' श्रुतिस्मृतिपुराणानां विरोधो यदि दृश्यते । तत्र श्रौतं प्रमाणं तु द्वयोर्द्वधै स्मृतिवेरा ' ( व्यास, १/४ ) स्मृति Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 238
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४४२! श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) और पुराणके विरं धमें स्मृतिकी बात मानी जाती है । तदनुसार गङ्गाकी स्थिति तक संन्यासाश्रम अपवादवश हो सकता है; क्योंकि सामान्य - शास्त्रके अपवाद भी हुआ करते हैं; सो यदि निर्णयसिन्धुर्मे व्यवस्था लिखी गई है कि - अमुक तरहका संन्यास और अमुक प्रकारका अग्न्याधान कलिवर्ज्य में नहीं आता; तो ‘ नचोत्सर्गस्य अपवादान्निवृत्ति: ' ( योग, साधन, १३ ) इस न्यायसे कलिवज्यता में कोई त्रुटि नहीं आती । मयूखकारने यदि वह व्यवस्था नहीं मानी, सो यह उसका व्यक्तिगत विचार है, इससे दूसरोंका वचन बाधित थोड़े ही हो जावेगा? वाढोका यह कहना कि - ' ये संन्यास लेना आदि धर्म है वा पाप? यदि धर्म है, तो कलिमें इसका निषेध क्यों? यदि पाप हैं, तो सतयुग आदिमें इसका आदेश क्यों? ' इस विषय में ' आलोक ' ( ६ ) में ४५५-४५६ में तथा पृ. ४०३- ४१३ में तथा ' आलोक ' ( ८ ) पृ. ६३४-६३५ ६४० पृष्ठ तकमें देखना चाहिये । साधारण रूपसे वह जान लेना चाहिये कि - संन्यास कलियुग सवसाधारणसे यथावत् निभ नहीं सकता, इसलिए कई हानियाँ उपस्थित हो जाती हैं, एतदर्थ निषिद्ध कर दिया गया था । इसमें पापकी कोई बात नहीं । ( ५७ ) ' हिन्दु ' की व्याख्या ' । ' शूद्र आर्य नहीं ' इस विषय में ' आलोक ' ( ४ ) ‘ हिन्दुके महाभाष्य ' में देखें । ( क ) जो कि. वादी हमें लिखता है - चारों वर्ण गुणकर्म से आर्य हैं । ' शूद्र भी आर्य होता है - इस विषय में आप प्रसिद्ध CC - 0. Ankur Joshi Collection शुद्र श्रार्य नहीं [ g सनातनधर्मी विद्वान् पं ० गङ्गाप्रसादजी शास्त्री कृत ' ४४ शास्त्रीय अछूतोद्धार निर्णय ' वा पं ० शिवशंकर काव्य सनातनवर निर्णय ' तथा जे. पी. चौधरी काव्यतीर्थ कृत ' वैदिक - कृत ' जाति, कर व व्यवस् ग्रह पुस्तक देखें ' । चा इससे मालूम होता है कि वादी उनके लेखसे बहुत प्रभावि हुआ है, स्वा. द. जीने अधर्माचरण तथा मूर्खतासेशु माना है; तब क्या अधर्म तथा मूर्खता असत्यादि श्रार्यता श्र रुप वाले हैं? यदि नहीं तो स्वा.द.जी विद्वान थे; वा रा भ श्रीगङ्गाप्रसादजी उनकी अपेक्षा अधिक विद्वान् हैं? वेदमें श्रा यह ज्योति देना लिखा है आर्यसे भिन्नको नहीं । वे सनातनधर्मी हैं, केवल इसलिए ऐसा लिखा करते हैं किन्या सुवार उत जैसे आर्यसमाजी उनके काबू में रहें । अब हम श्रीगङ्गाप्रसाद की स ' अछूतोद्धार - निर्णय ' तथा ' जाति - निर्णय ' से पूर्वपक्ष तथा घर उत्तरपक्ष लिखते हैं; अव वादीको आह्वान है कि वह इस श च प्रत्युत्तर लिखे- प्रि पूर्वपक्ष ( क ) — ' प्रियं मा कृणु देवेषु प्रियं राजसु मा शुप्र प्रियं सर्वस्य पश्यत उत शूद्र े उतायें ' ( अ. १६६२ । १ ) हे मनुषो धर तुम केवल ब्राह्मणका ही प्रिय न करो, किन्तु सभीका प्रिय हो ता चाहे वह शुद्र हो; चाहे वैश्य । यहाँपर ' उत अर्ये ' यह छे । जिसका अर्थ होता है वैश्य । ' उत आयें ' छेद तो ठीक क्योंकि ऋसं. में ' विजानीहि आर्थान् ये च दस्यवः ' ( ऋ. १५ ) क यहाँ आर्योंसे अतिरिक्तको ' दस्यु ' कहा गया है । ' उत आयें है Gujarat An eGangotri Initiative
पृष्ठ 239
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्री सनातनधर्मा लोक ( १ ) 888 सनातनवर ' दस्यु ' बन जायगा । जब उक्त मन्त्रमें चार वर्णोंका कृत ' आि करनेपर शूद्र मन्त्रमें वैश्यवाचक ' अ ' शब्द भी तो होना व्यवस्थ प्रहरण है, तब चारों वर्णोंका समानभाव और समान-चाहिये । इससे वेदने श्रेणीमें निवासका उपदेश दिया है । ( अछूतो. पृ. ११-१२ ) हुत प्रभाि पूवं. ( ख ) ' रुचं नो धेहि ब्राह्मणेषु रुचं राजसु नस्कृधि । से विश्ये शूद्र ेषु मयि धेहि रुचा रुचम् ' ( यजु. १८४८ ) ' हे नार्यता अ भगवन! ब्राह्मणों, राजाओं, वैश्यों तथा शुद्रोंमें ज्योति दीजिये ' । पाँरालि यहाँ सव वर्णोंकेलिए समान प्रार्थना है । इसी प्रकार ' प्रियं मा दा कृणु देवेषु प्रियं राजसु मा कृणु । प्रियं सर्वस्य पश्यत उत शूद्रे वे सुत उतार्य ' ( अ. १६१६२१४ ) ' हे भगवन्! ब्राह्मणोंमें, राजाओंमें, हैं किन्या सब देखनेवालोंमें मुझे प्रिय बनावें, उत शूद्र े उत अर्ये- शूद्र और प्रसाद वैश्योंमें मुझे प्रिय बनावें ' । ' प्रियं मा, दर्भ कृणु ब्रह्मराजन्याभ्यां तथा शूद्राय चार्याय च ' ( अ. १६/३२/८ ) ब्राह्मण क्षत्रियकेलिए शूद्राय वह इस च पर्याय च शूद्र और वैश्य केलिए अर्थात् सबके लिए मुझको प्रिय करो इन वेदमन्त्रों में सर्वोकेलिए एकसी प्रार्थना है कि-युमा शूद्रादि चारों में प्रकाश स्थापित करो । यदि शूद्र निकृष्ट, अधम, मनुष धर्मविहीन माना जाय; तो उसके लिए ऐसी प्रार्थना क्यों? तब प्रिय को तो ऐसी प्रार्थना होनी चाहिये थी कि शूद्रोंको मेरा दास बनानो ' यह ( जातिनिर्णय ११-१२ ) । ठीक. उत्तरपक्ष ( क ) - वादी लोग वेदमन्त्रोंका अर्थ कैसे छलसे . १ करते हैं; वहाँ यही प्रमाण पर्याप्त है । वेदमन्त्रोंके अर्थ करनेमें सृ आयें है वेदका स्वर तथा पदपाठ भी सहायक हुआ करता है यह बात CC - 0. Ankur Joshi ' उतायें ' में ' उत श्रायें छेद है । । ४४५ विद्वत्समाजमें प्रसिद्ध है । इस विषय में ' वैदिक - स्वरमीमांसा ' आदि पुस्तकें प्रसिद्ध हैं । उक्त ' प्रियं मा कृणु ' मन्त्रमें ' मा ' अनुदात्त है । वेदमें ' मा ' उदात्त भी मिलता है, अनुदात्त भी । उसमें निषेध वाची ' मा ' शब्द अव्यय होनेसे उदात्त हुआ करता है; परन्तु ' माम् ' ( मुझको ) अर्थको बतानेवाला ' त्वामाँ द्वितीयायाः ' ( पा. ८ | १ | २३ ) सूत्रसे निष्पन्न ' मा ' शब्द तो ' अनुदात्तं सवमपादादौ ' ( पा. ८ । १ । १८ ) सूत्रसे अनुदात्त हुआ करता है । ' प्रियं मा कृणु ' मन्त्रमें ' मा ' अनुदात्त ही है, इसमें पदपाठ तथा वेदपदानुक्रमणी देखी जा सकती है, तब ' मा ' का अर्थ ' नहीं ' कैसे हो सकता है? और वहाँपर ' केवल ' शब्दका निर्मूल अध्याहार कैसे हो सकता है? तब उक्त मन्त्रमें ' मा ' का अर्थ ' मु ' है, ' नहीं ' नहीं । और उक्त मन्त्रमें ' कृणु ' एकवचनान्त क्रिया होनेसे ' हे मनुष्यो! ' इस बहुवचनान्त पदका अध्याहार भी गलत है । इसके अतिरिक्त उक्त मन्त्रमें ' अ ' छेद नहीं हैं, किन्तु ' आर्ये ' ही छेद है 1 । इसमें पदपाठ तथा पदानुक्रमणी भी देखी जा सकती है । उसमें पदपाठ तो सायणभाष्यवाले अथर्ववेदमें L देखा जा सकता है । पदानुक्रमणी आर्यसमाजी श्रीस्वामी-विश्वेश्वरानन्द स्वा. नित्यानन्दजीसे संगृहीत ' अथर्ववेदपदसूची ' ( पृ. ४४ ) में ' आयें ' ( १६।६२।१ ) यही उक्त मन्त्रका पद स्वीकृत किया गया है ।.. ' चरणव्यूह ' की टीकामें पदपाठका तो इतना महत्त्व कहा Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 240
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
III ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ' गया है- ' यस्य मन्त्रस्य पदाऽभावः, तस्य खैलिकत्वं सिद्धम् ' ( जिस मन्त्रका पदपाठ नहीं, उस मन्त्रको ' खिल ' ( परिशिष्ट ) समझना चाहिये । इस प्रकार पदपाठ मान्य सिद्ध हुआ । इसी प्रकार वादियोंके मान्य श्रीसत्यव्रत - सामश्रमीने भी ' निरुक्ता-लोचन’के ‘ देवराजादीनां कालादि ' प्रकरण ( पृ. २८६ ) में कहा है - ' वस्तुतोऽस्याभिः सर्वत्र तथैव अर्थः कल्पनीयः, यथा न विरुध्येत पदपाठः । श्राषं पदपाठमवमत्य अर्थकरणं तु साहसमेव - इत्यत्र कास्ति वक्तव्यता ' ( हमें पदपाठके अनुकूल ही मन्त्रार्थ करना चाहिये; उसका उल्लंघन करके अर्थ करना तो साहसमात्र होता है ) । इस पदपाठकी भी असन्दिग्धताकेलिए क्रम, घन, जटा, माला, शिखा, लेखा, ध्वज, दण्ड, रथ आदि ६ पद्धतियाँ अन्य भी वेदरक्षार्थं नियमित हैं । यदि पदपाठको न माना गया; तो ' न तस्य प्रतिमास्ति ' के स्थान ' नतस्य ( सर्वलोकनमस्कृतस्य परमात्मनः ) प्रतिमास्ति ' पाठ किया जा सकता है, इसमें भी वादियोंकी ही क्षति होगी । उक्त मन्त्रके पूर्वार्धमें प्रधानतावश ब्राह्मण, क्षत्रियोंकी प्रियता की प्रार्थना की गई है । ' यत्र ब्रह्म च क्षत्त्रं च " ( यजुः माध्यं. २०।२५ ) ' नाऽब्रह्म क्षत्त्रमृध्नोति ' ( मनु. १२२ ) इत्यादि-श्रुतिस्मृतियोंमें ब्राह्मण - क्षत्रियोंकी प्रधानता प्रसिद्ध है । उसके वाद सामान्यरूपसे आर्यमात्र तथा शूद्र में प्रियता कही गई है । इससे शूद्रकी श्रार्यंसे भिन्नता सिद्ध हो रही है । तब यहां बलात् ' अ ' छेद अप्रामाणिक है । वस्तुतः उक्त मन्त्र में ' देवेषु ' का CC - 0. Ankur Joshi Collection ' उत प्रायें ' यही छेद ' ब्राह्मणोंमें ' यह अर्थ कैसे हो सकता है? ब्राह्मण तो भू मनुष्यदेव कहा जाता हैं, उसे केवल ' देव ' नहीं इस कारण यहाँपर ' देव ' शब्द ' देवता - वाचक कहा जा देवताओं में अपने प्रिय होने की प्रार्थना है । फिर है; सो देवताके अंतिमानुष राजामें अपने प्रिय होनेकी प्रार्थना सम विश्वजनीनस्य यो देवो मर्त्यान् अति ' ( अथवं है । .इत्यादि श्रौत - मन्त्रों तथा ' महती देवता ह्यषा नररूपेण . २० / १ ९ ६५ ) ( मनु. ७/८ ) इत्यादि स्मार्त - पद्योंमें राजाको देवता के निष् अतिमानुष कहना प्रसिद्ध ही है । सम उसके बाद उक्त मन्त्रके तीसरे पाद ' प्रियं सर्वस्य पावर में सारे मनुष्यसंसारमें अपनी प्रियता की प्रार्थना की गई है । आगे स्पष्टता के लिए मनुष्यसंसारके दो भाग कर दिये गये हैं-शूद्र े उतायें ' । इसका अर्थ है कि चाहे वह आर्य हो, वां शूद्र । इससे शूद्र आर्यभिन्न सिद्ध हुआ । इस प्रकार ' सर्वल पदकी व्याख्या हो गई । दो ' उत ' शब्द उस व्याख्यानको सुर ' करनेवाले हैं । यदि उक्त मन्त्रमें ' उत शूद्र े उत अर्ये ' यही छेद माना जा ' तब ' सर्व ' शब्द के ग्रहण में अस्वारस्य पड़ जाता है - यह सूक्ष्मरुप विचार करना चाहिये | ' मुझे सबका प्यारा बना, चाहे वह छ ' हो, चाहे वैश्य ' इस अर्थ में ' सर्व ' शब्द अपूर्ण ' हो जाता है । क्योंकि - वैश्य और शूद्रमें सर्वत्वकी पूर्ति नहीं होती है । कह " आर्ये ' यही छेद किया जाय, जो है; तब ' मुझे सबका प्यार Gujarat An eGangotri Initiative