सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 241–250
सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 241–250
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श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) 885 1 तो भूदेव वह शूद्र ( अनार्य ) हो, चाहे आर्य ( शूद्रातिरिक्त ), कहा, चाहे त्रैवर्णिक हो -- इस प्रकार यह मन्त्र ठीक सम्बद्ध हो बा अर्थात् सो जाता है । ताके वल्कि पूर्वार्धमें ' देव ' शब्द के ' भूदेव ' अर्थ, और ' राजन् ’ समय है । क्षत्रिय अर्थ करनेपर भी ' उत शूद्र उत आये ' यही छेद शब्दका २० / १ ९६५- ठीक है; क्योंकि पहले तो प्रधान होनेसे ब्राह्मण - क्षत्रियोंकी रणवि प्रियताकी प्रार्थना की गई है । फिर कहा गया है कि - सबका मुझे के प्यारा बना, बाद में ' सर्व ' की स्पष्टता चतुर्थपाद ' उत शुद्र में की गई है, अर्थात् चाहे वह शुद्र ( अनार्य ) हो, चाहे स्य परस आर्य । इससे सारे संसारकी पूर्ति होगई; क्योंकि सभी की गई । एवं अनार्य में अन्तर्भूत हो जाते हैं । ' मुझे सबका प्यारा बना, गये हैं- चाहे वह शूद्र हो, वा अयं ( वैश्य ), इस अर्थ में ' सर्वस्य ' वह शब्द हो, तथा दो बार प्रयुक्त किया हुआ ' चाहे ' अर्थवाला ' उत ' शब्द अस्वारस्यवाला हो जाता है; क्योंकि - वादीके अनुसार पहले नको ब्राह्मण - क्षत्रियका नाम आ ही चुका है, तब वैश्य और शूद्रका नाम भी आ गया; तब तीसरे पाद में ' सर्व ' शब्द और चौथे ना जा पादमें दो बार प्रयुक्त किया गया ' उत ' शब्द व्यर्थ होता है । चमरूपे इसी कारण ‘ रुचं नो घेहि ब्राह्मणेषु, रुचं राजसु नस्कृधि । रुचं वह छ विश्येषु शूद्रषु मयि घेहि रुचा रुचम् ' ( यजु. माध्यं. १८४८ ) जाता इस मन्त्रमें चारों वर्णोंका नाम कहा है, तभी यहाँपर न तो ' सर्व ' शब्द कहा गया; और न ही दो बार ' उत ' शब्दका प्रयोग का प्यार किया गया; परन्तु ' प्रियं मा कृणु ' मन्त्रमें देव और राजाक़ा CC - 0. Ankur Joshi Collection स्वा.के मतमें भी ' श्रायें ' छेद [ ४४६ नाम लेकर तत्र ' सर्व ' शब्द लिया, फिर चतुर्थपाद में ' उत्त ' शब्दका दो बार प्रयोग किया; इससे वेदको स्वयं भी ' आर्य ' यह छेद इष्ट है । अन्य मन्त्रों में भी शुद्र वेदको प्रायेसे भिन्न इष्ट है - यह हम आगे दिखलावेंगे । जिनके दिखलाये मार्गका अनुसरमा करके वादी ' आर्य ' शब्दके प्रसारणार्थ उत्साहित है; चे स्वा. द. जी भी स.प्र. में उक्त मन्त्रमें ' उत शुद्रे, उत आये ' यही छेद स्वीकार करते हैं; उसी के अनुसार ही स्वामीने हिन्दीमें अनुवाद किया है । जैसे कि - ' द्विज विद्वानोंका आर्य, और मूर्खोका शुद्र और ' अनार्य " नाम हुआ ' ( स.प्र. ८ पृ. १३६ ) । अन्य भी कहा है-' उत शुंद्र े उतार्ये ' ( अ. १६/६२ ) यह लिख चुके हैं. ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य द्विजोंका नाम आयें, और शुद्रोंका नाम अनार्य... है । जब वेद ऐसे कहता है, तो दूसरे विदेशियोंके कपोल-कल्पितको बुद्धिमान् लोग कभी नहीं मान सकते ' ( स.प्र. ८ पृ. १४० ) भाभू. के वर्णाश्रमविषय ( पृ. २६८ ) में स्वामीने लिखा है- ' उत शूद्र उतायें ' इस मन्त्रमें भी आर्य ब्राह्मण - क्षत्रिय-वैश्य और अनार्य ( अनाडी ) जो कि शूद्र कहाते हैं, ये दो भेद जाने गये हैं ', इस प्रकार शूद्र अनार्य ( श्रार्यभिन्न ) सिद्ध हुआ । तत्र क्यां चांदी स्वा.दु.जीके इस ' आर्ये ' छेद तथा अर्थको मूर्खता-मूलक मानता है? कहां किया है यहाँ स्वामीने ' यें ' छेद और ' वश्य ' अर्थ, उन्होंने हमारे अनुकूल ' आर्ये ' ही छेद किया है । वादी स्वयं बतावे - देखे । तब क्या पं ० गङ्गाप्रसादजी पौराणिक स ० ध ० २६ Gujarat. An eGangotri Initiative
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४५० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) वादीके महर्षिसे अधिक वेदके विद्वान् हैं? यदि ऐसा है, तो अल्पज्ञ तथा अवैदिक स्वा. द. जीका सम्प्रदाय भी अवैदिक सिद्ध हुआ? आर्यसमाजी विद्वान् श्रीराजाराम शास्त्रीजीने भी अपने अथर्ववेदभाष्यमें ' चाहे शूद्र हो, चाहे आर्य ' ( १६६२ | १ ) यह अर्थ करके यहाँपर ' आर्य ' ही छेद स्वीकार किया है । ' अस्पृश्य-निर्णय ' में श्रार्यस्वराज्यसभा के मन्त्री श्रीरामगोपाल शास्त्री वैद्यभूषण ( लाहौर ) ने भी ' उत शुद्रे उतायें ' का ' चाहे शूद्र हों; अथवा द्विज ' ( पृ. ४ ) यह अर्थ किया है । उनके मतमें भी यहाँ ' आर्ये ' छेद इष्ट हुआ । आये ' ' शब्दका अर्थ उन्होंने ' द्विज ' किया है; ' अर्य ' शब्दका अर्थ ' द्विज ' नहीं होता । इसलिए उनके मतमें भी शुद्र आर्य सिद्ध न हुआ । इस प्रकार आर्यसमाजी चतुर्वेदभाष्यकार श्रीजयदेव विद्यालङ्कारने भी ' सबके देखते हुए चाहे वे शूद्र हों, चाहे वे आर्य हों ' यह अर्थ करके ' आये ' यही छेद यहाँ किया है । यद्यपि आर्यसमाजी - भाष्यकार श्री क्षेमकरणदासने अपने अथर्व-वेदभाष्यमें छेद तो ' आर्ये ' ही किया है; और वहाँ ' अत्र ब्राह्मण-राजन्यशब्दयोः श्रवणाद् वैश्यवाचकः ' ' आर्य ' शब्दको यहां परिशिष्ट वैश्यका वाचक माना है; तथापि उनके मतमें भी शूद्रं आर्य सिद्ध न हुआ । इसलिए वहाँ उनने आर्य ' ' इति ब्राह्मण-क्षत्रियवैश्यानां पर्यायवचनम् ' कहकर त्रैवर्णिकको ही आर्य माना है, शुद्रको आर्य नहीं माना । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat, धन्य विद्वान् भी ' आर्य ' छेद मानते हैं [ mi इसीलिए ही ' यश्च शूद्र उत श्रयः ' ( अ. ४/२०१४ श्री क्षेमकरणजीने ' जो कोई शोचनीय शूद्र ) यहाँ मं अथवा आर्य करने योग्य आर्य अर्थात् विद्वान् ब्राह्मण क्षत्रिय - म अर्थ किया है । इस प्रकार ' न मे दासो नायों , ', वैश्य रह ( अ. ५११३ मन्त्र में भी उनने ' दासः - शूद्रः, न आयें: -न प्राप्तुं योग्यः ) यही किया है । इसी प्रकार श्रीजयदेवजीने भी, श्रनार्थः ' चाहे शूद्र हो, व आर्य - उससे उच्च कोटिका पुरुष ' यह अथ. इस प्रकार अथवें. १६/३२/८ में भी उनने शूद्र और किया है । आर्य पुरुषोंका ' यह अर्थ करके शूद्रको अनार्य सिद्ध कर दिया । इस प्रकार श्रीपाददामोदर सातवलेकरजीने भी ' छूत श्री अछूत ' के पूर्वार्ध ५६ पृष्ठमें लिखा है- ' उत शुद्र उत श्रार्यः ' ।( च ) ४ । २० ) के सदृश प्रयोग वेदमें कई स्थानोंपर नजर आते है । इससे स्पष्ट होता है कि - ‘ आर्य त्रैवर्णिक लोग हैं, और श्रमार्च शु है ' । श्रीनरदेवशास्त्री, श्रीदेवशर्मा आदि आर्यसमाजी परि भी अपने - अपने ग्रन्थोंमें उक्त मन्त्र में ' आर्य ' यही छेद स्वीच कर चुके हैं । श्रायसमाजी श्रीविश्वेश्वरानन्द तथा श्रीनित्यानन्दः
स्वामीकी वेदपदसूचीकी साक्षी हम पूर्व दिखला ही चुके हैं ।
शूद्रके आर्य न होनेमें दूसरे वेदमन्त्रों की साक्षी भी लीजिये ॥
जैसे कि- ' शूद्राय चार्याय च ' ( अ. १६३२८ ) यहां भी पूर्वकी है । ६ भांति ' शूद्राय च आर्याय च ' यही छेद है । आर्यसमाज श श्रीराजाराम शास्त्रीजीने भी ' शूद्र और आर्यकेलिए ' यही ( किया है । श्रीविश्वेश्वरानन्द - नित्यानन्द स्वामियोंसे संगृही An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) [ ४५२ । 3 ) यहाँ के ४४ पृष्ठमें भी ' शूद्राय च श्रार्याय च ' यही पद आर्य में अथर्ववेदपदसूची किया है, इसी प्रकार श्रीजयदेव - विद्यालङ्कारजीने - अम नित वैश्य भी । इस प्रकार शूद्र वेदके मतमें आर्य न रहा । प .५११११३ इसी तरह ' न मे दासो नार्यो ' ( अ. ५ | ११ | ३ ) में भी पूर्वकी -, श्रनारे ) ही भांति ' आर्य ' छेद है । इसलिए श्रीराजारामजी शास्त्री ने भी ' चाहे ' न दास, न आर्य ' यही अर्थ किया है । दास शुद्रको कहते हैं । किया है । इस प्रकार श्रीपाददामोदरसातवलेकरने भी ' छूत और अछूत ' आर्य पुस्तकके प्रथमभाग ( २४ पृ. ) में ' न दास - शूद्र समर्थ और न या । आर्य ' यह अर्थ किया है । इस प्रकार श्रीविश्वेश्वरानन्द ' छूत और नित्यानन्द स्वामीसे संगृहीत अथर्वेपदसूची ( पृ. ४४ ) में भी उक्त आर्य ( मन्त्रका आर्य ' ' यही पद स्वीकृत किया है । ' यो नो दास श्रार्यो जाते है वा ' ( ऋ. १० | ३८ | ३ ) यहाँ ' दास ' का अर्थ ' शूद्र ' है, इसलिए अनार्य शुद्रका नाम दासान्त रखा जाता है, यहाँपर तो ' आर्य ' शब्द स्पष्ट है ही । इस प्रकार शूद्र आर्यसे इतर सिद्ध हुआ । ' यश्च शूद दुखीचा उत आर्यः ' ( अ. ४ | २० | ४ ) यहाँ श्रीराजाराम शास्त्री ने लिखा है-ित्यानन्द ' जो शुद्र, और जो आर्य है ' । इस प्रकार बहुत मन्त्रोंकी साक्षी. के हैं । दीखनेसे सिद्ध हुआ कि वेदको शूद्र आयँसे इतर इष्ट है । लीजिये । ' यथा वशं नयति दासमायें: ' ( ऋ. ५।३४।६ ) यहाँपर भी पूर्वकी है । ' दास ' शब्द शूद्रपरक है । यहाँपर आयें स्वतन्त्र होनेसे कर्ता है, यसमा शुद्र परतन्त्र होनेसे कर्म है । ' दासस्य वा मघवन् । आर्यस्य वा ' यही ( ऋ. १०।१०२।३ ) ' दासमार्यं ' ( अथर्व ४ | ३२ | १ ) यहाँपर भी संग्रही आर्य और दासके अलग - अलग कहने से शूद्र आर्यसे भिन्न सिद्ध CC - 0. Ankur Joshi शूद्र प्रातर [ ४५३ Collection Gujarat हुआ । ' आर्याय वा पर्यवदध्यात्, अन्तर्धिने वा शूद्राय ' ( १३ श ४०-४१ ) यह आपस्तम्बधर्मसूत्रका सूत्र भी शुद्रको आर्यसे भिन्न कह रहा है । जब इस प्रकार शुद्र आर्यभिन्न सिद्ध हुआ; तब दस्युकोटिमें अन्तर्भूत हो जाता है, इसीलिए ' विजानीहि श्रार्यान ये च दस्यवः ' ( ऋसं. १ ९ ५११५२ ) इस मन्त्रकी सार्थकता हुई । इसमें आर्य तो त्रैवर्णिक है - यह स्पष्ट ही है, सो दस्यु त्रैवर्णिक भिन्न शुद्र - अन्त्यजादि सिद्ध हुए । दास - दस्यु पर्यायवाचक हैं । इस प्रकार ऋसं. में अन्यत्र भी कहा है - ' न यो ररे आर्य नाम दस्यवे ' ( ऋसं. २० । ४६।३ ) ( मैं - इन्द्रने दस्यु - दास ( अनार्य ) को चार्य नाम नहीं दिया ) । स्वा. द. जीने भी यह स्वीकार किया है - ' यह लिख चुके हैं । कि आर्य नाम धार्मिक, विद्वान, श्राप्त पुरुषोंका और इनसे विपरीत जनोंका नाम दस्यु है, तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य द्विजोंका नाम आयें और शुद्रका नाम अनायें है ' ( स.प्र. प पृ. १४० ), ' विजानीहि आर्यान् ये च दस्यवः ' यह ऋग्वेदका चचन है । श्रेष्ठोंका नाम आयें और दुष्टोंके दस्यु नाम होनेसे आये और दस्यु दो नाम हुए ' ( स.प्र. पू. १३६ ) । ठीक भी यही है, क्योंकि - त्रिगुणात्मक सृष्टिमें शूद्र तमोगुणसे बनाया गया है । तब तमः प्रधानतावश वह दास, वा दस्यु वा आर्येतर कहा जा सकता है । ' प्रियं सर्वस्य पश्यत उत शूद्रे उतायें ( अ. १६६२।१ ) इस मन्त्रमें प्रेमभावकी प्रार्थनासे शूद्रसे समान व्यवहार वैदिक . An eGangotri Initiative
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४५४ ] श्रीसनातनधर्मानोक ( ह ) नहीं हो जाता । प्रेमवाद अन्य वस्तु है, और व्यवहारवाद अन्य । ' यो दासं वर्णमधरं गुहाकः ' ( ऋ. २।१२।४ ) इसमें दास वर्ण ( शूद्र ) को अधर ( निम्न ) तथा गुहा ( अन्धेरे ) में स्थित कहा है । इससे सब वर्णोंका साम्यवाद वेदको ष्ट सिद्ध न हुआ । तब शूद्रको भी द्विजके समान श्रेणी में रखना जो पूर्व-पक्षीसे अभिमत था, वह वेदविरुद्ध ही सिद्ध हुआ । तभी भगवद्ग, तामें भी ' ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप । ( १८ | ४१ ) में शूद्रोंको ब्राह्मणक्षत्रिय - वैश्य के समाससे विच्छिन्न कर दिया गया । जब वेदमें शूद्रवरणं ही आयं सिद्ध न हुआ; तब अवणं अन्त्यज तो स्वयं अनार्य एवं दस्यु सिद्ध हो ही गये । इसलिए मनुजीने भी कहा है- ' मुखबाहूरुपज्जानां या लोके जातयो बहिः । म्लेच्छवाचञ्चायं वाचः सर्वे ते दस्यवः स्मृताः ' ( १०/४५ ) बहिर्जातिका अर्थ है बाह्यजाति चाण्डाल आदि । आर्यसमाजी श्रीरघुनन्दनशर्माने भी अपनी ' वैदिकसम्पत्ति ' ( पृ. ४१८ ) में कहा है ' वर्णाश्रमहीन जातियाँ चाहे श्रायेभाषा बोलनेवाली हों, चाहे म्लेच्छ भाषा बोलती हों, सब दस्यु हैं ' । पं ० नरदेव शास्त्री वेदतीर्थने भी ' आर्यसमाजका इतिहास ' ( प्रथमभाग पृ. ४३ ) में लिखा है- ' आर्यसे इतर दस्यु कहलाते हैं ' । उस दस्युको ऋसं ( १।३३।४-५ ) में अयन्वा और व्रत कहा है, तब वैदिक-यज्ञ तथा बेदमन्त्रसंस्कृतमूर्ति में उसका अधिकार नहीं । हाँ, पुराणमन्त्रोंसे संस्कृत भैरव आदिके दर्शन में तो उसका CC - 0. Ankur Joshi Collection ' उतायें ' में ' उत प्रायें ' छेद है [ अनधिकार नहीं । इस प्रकार चारों वर्षों में साम्यवाद वेदविरुद्ध सिद्ध हुआ । ( ख ) इस मीमांसा से श्री शिवशङ्करकाव्यतीथका भी समझ हो गया । उन्होंने ‘ आर्ये’के स्थान जो ‘ अवे ' यह छेद यह - पदपाठसे, स्वाद से तथा अन्य विद्वानोंसे तथा स्वयं विरुद्ध है । यह अपने वैयक्तिक मतको सिद्ध करने के लिए वेदसे वेद किया हुआ सीधा आक्रमण है । काव्यतीर्थजी ऐसे स कार्य कर डाला करते थे; जैसे कि - बृहदारण्यक उपनिषद् व ' मांसौदन ' पाठ था; जिसकी व्यवस्था हमने ' आलोक ' ( ६ ) भ बताई है, उनने ' माषौदन ' कर डाला । यह वेदके अभिप्रा विरुद्ध वेदपर छुरी चलाना है । जो कि उन्होंने कहा है-चेदमन्त्रोंमें सबकेलिए एकसी प्रार्थना है कि ब्राह्मण शुर चारोंमें प्रकाश स्थापित करो ' । यह बात भी काव्यतीर्थजी गलत है, न यह वेदको इट हैं, नहीं तो उनमें चार संख्या का होती । चारोंमें रुक् ( प्रकाश ) अपने - अपने ही ढंगका हो इसलिए व्याख्या करते हुए श्रीउवटाचायने भी यह धार ( या दिखलाया है - ' अनुत्सन्नधर्माणो यथाशक्यं दीप्ता भवेम, क्षा कुरु ' । ' रा वेद में भी ज्योति आयेको देना कहा है, अनायं शूद्रासि वैश नहीं । ' उरु ज्योतिश्चक्रथुरार्याय ' ( ७/५/६ ) शूद्र आये नहीं पहले कह चुके हैं । बल्कि शूद्रादिको दासरूप में आये करना बताया है - ' आर्याय विशोऽवतारीदसी ' ( ६२५ श २ ) बेद Gujarat An eGangotri Initiative
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T श्रीसनातनधर्मालक ( ६ ) ४५.६ वेदविरुद स्पष्ट है कि उक्त मन्त्रमें जो शूद्रोंकेलिए ' रुकू ' कही है वह त्रैवर्णिककी रुक् ( दीप्ति ) से भिन्न है ।, भी खण्ड ' तो जैसे ' ब्राह्मणस्य तपो दानं, तपः क्षत्रस्य रक्षणम् । वैश्यस्थ द किया तु तपो वार्ता, तपः शूद्रस्य सेवनम् ' ( ११।२३५ ) इस मनुस्मृतिके - स्वयं के पद्यमें समान भी तपस्या- शब्द भिन्न - भिन्न वकेलिए भिन्न - भिन्न लिए वेद अर्थको धारण करता है कि- शुद्रका तप सेवा है - इत्यादि, जैसे साहस कि- चाणक्यनीति में ' बलं विद्या च विप्राणां राज्ञां सैन्यं बलं तथा । निषद् उ वलं वित्तं च वैश्यानां शूद्राणां परिचर्यिका ' ( २६ ) यहाँ समान क ' ( ६ ) भी ' बल ' भिन्न - भिन्न वर्णोंकेलिए भिन्न - भिन्न माना गया है, अभिशा उसमें शूद्रोंका बल परिचर्या ( सेवा ) बताया गया है । जैसे कि-हा है- ' कोकिलानां स्वरो रूपं, नारीरूपं पतित्रतम् । विद्या रूपं कुरूपार्णी, क्षमा रूपं तपस्विनाम् ' ( चाणक्य ३६ ) यहाँ भिन्न - भिन्नकेलिए यतीर्थ रूप भी भिन्न - भिन्न बताया गया है; वैसे ही उक्त मन्त्रोंमें ' तेज ' र संख्या का पर्यायवाचक ' रुक् ' शब्द भी चारों वर्णोंकेलिए भिन्न - भिन्न हो अर्थको रखता है । सो ब्राह्मणके लिए ' ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी ' यह ( यजुः माध्यं. २२/२२ ) ब्रह्मवर्चस वा शिमो दमः तपः शौचं, भवेम में क्षान्तिः, आजेव ( गीता १८४२ ) आदि तेजकी, क्षत्रिय के लिए ' राजन्यः शूर इषव्यः ' ( यजुः माध्यं. २२/२२ ) बलरूप तेजकी, येशूद्रा वैश्यकेलिए धनरूप शक्तिकी, और शूद्रकेलिए सेवारूप शक्तिकी नहीं आवश्यकता उक्त मन्त्रमें इष्ट है- ' ब्रह्मणे ब्राह्मणं, क्षत्राय राजन्यं, ये मरुद्रथो वैश्यं, तपसे ( सेवायें ) शुद्रम् ' ( यजुः माध्य, ३० | ५ ) यह २२ ) वेद की भी साक्षी है । CC - 0. Ankur Joshi काव्यतीर्थं वेदानभिज्ञ [ ४५७ है. इसके अतिरिक्त ' नः ब्राह्मणेषु ( हमारे ब्राह्मणों में ), नः राजसु ( हमारे क्षत्रियोंमें ) यह कहकर उनको श्रेष्ठ बताया गया है । शुद्रको सब वर्णोंके अन्त में रखकर उसे निम्न सूचित किया गया है । ' इत्वी दस्यून् प्र आय वर्णम् श्रावत् ' ( ऋ. ३।३४।६ ) ' विजा-जीहि आर्यान् ये च दस्यव ' । ( ऋ. ११५१८ ) यहाँपर आता Collection Gujarat हन्न ( ताडन ) और आर्योंकी रक्षा कही है । ' वधीहिं दस्यु ' धनिनं घनेन ' ( ऋ. १ | ३३ | ४ ) ' ज्योतिरिद् आर्याय ' ( ऋ. ११५६/२ ) ' अभि दस्युं वकुरेणा धमन्ता उरु ज्योतिः चक्रथुः श्रर्याय ' ( ऋ. १ | ११७/२१ ) ' अपावृणोः व्योतिरार्याय नि सव्यतः सादिः दस्युरिन्द्र! ” ( २।११।१८ ) इत्यादि पचासों वेदमन्त्रों में आयेकी रक्षा और ज्योतिकी प्राप्ति कही है; और दास वा दस्युको सूर्यकी ज्योति प्राप्त न हो; दासको गुफामें रखा गया है [ ' यो दासं वर्णेमधरं गुहाऽकः ' ( ऋ. २।१२।४ ) इत्यादि कहकर वेदने ही आर्य और आर्यतरों में साम्यवादके व्यवहारकी जड़ ही काट दी है । जो कि काव्यतीथंजी ने कहा था कि यदि शुद्र अधम ( निम्न ) होता, तो उसके लिए प्रकाशकी प्रार्थना न होती, उसकेलिए तो यह प्रार्थना होती कि - ' शूद्रोंको मेरा दास बनाओ ' यह कथन भो शिवशंकर - काव्यतीर्थजीकी वेदानभिज्ञता बता रहा है । यह हम पूर्व कह चुके हैं कि - आर्य त्रैवणिक होता है, और तर दास वा दस्यु | जब शुद्रका नाम दास हैं; तो अपने आप उसकी दासता होगई; फिर दासताकी उसकी प्रार्थना कैसी; तभी तो स्वा. द. जीके शब्दोंमें सृष्टिकी आदि में बनी हुई ( स.प्र. ११ . An eGangotri Initiative
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४५८ ] श्रीस्वाराची ( ९ ) समुल्लासका आरम्भ ) मनुस्मृतियें शुद्रकेलिए कहा है - शा तु कारयेद् दास्यं दास्यायैव हि सृष्टोऽसो स्वयमेव स्वगय्युवा ' ( ८४ ९ ३ ) ' दास्यं शूद्र ' द्विजन्मनाम् ' ( ८४१० ) ' पद्भ्यां शुद्रो अज्ञायत ' उसमें वादियोंके अनुसार ' दोनों पैर शूद्र हैं ' यह अर्थ है, सो पाँचका कर्म द्विनोंकी सेवा होता है; पांव सारे शरीरको उठाकर चल पड़ता है । इसलिए वहाँ भी शुद्रका वरणन आया है, वहाँ उसका सेवाका कार्य बताया गया है । जैसेकि - पञ्चविंश - ब्राह्मणमें सदस्य व कांचन देवया, शूद्रो.. तस्मात् शूद्र उत बहुष्णुः पर्याशयः, विदेवो हि तस्मात् पादौ अवनेजयन् वर्धते, फ्तो हि सृष्ट ' ( ६ ( १/११ ) यहाँपर शुद्रका पाँववाला काम ( दास्य ) बचाया गया है । ऐतरेयत्रा में - शुद्रकल्पः, अन्यस्य प्रेष्यः ( दास. ) कामोत्याभ्यः यथाकामवष्य: ' । यहाँपर शुद्रको दास ( परिचारक ) बताया गया है । इसीको लक्ष्य करके चौधायनधर्मसूत्र में कहा है- ' शुद्रेषु पूर्वेषां परिचर्चा ', गौतमधमसूत्र में भी कहा है- ' परिचर्या च उत्तरेषाम् ' - ( ( १ १० | १८ | ५७ | ५ ) ) इस प्रकार वशिष्ठधर्मसूत्रमें - तेषां परिचर्या शुद्रस्य ' ( २२० ) मनु... ( १ | ६१ ) याज्ञव. ( १ | १२० ) ` दासः शूद्रस्य कारयेत् ' ( यम ) ' प्रजा-पतिर्हि वर्णानां दासं शुद्रमकल्पयत् ' ( महा. शान्ति ६०/२८ ) इत्यादिमें शुद्रका दास्य स्पष्ट हैं । उसी शुद्रको वेद ' दासं वर्णमधरं गुहाकः ' ( ऋ. २।१२।४ ) दास एवं निम्न तथा अन्धेरेमें कहता है । इससे श्रीशिव-शंकरकाव्यतीर्थके ' जातिनिर्णय ' का भी खण्डन होगया । शेष CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. वेद में योगरूढि भी जे.पी. चौधरीकी पुस्तक हमें मिली नहीं । उसमें भी यही प्रमान होंगे, ' प्रधानमङ्गनिबर्हण ' न्यायसे उनका भी हो • यदि वादीको चौधरीजीकी पुस्तकपर अधिक विश्वासहै वह उसे हमारे पास भेज दे, हम उसका खण्डन करते क्योंकि यह लोग पूर्वापर छिपाकर असत्य लिखा करते ( ५७ ) ( ख ) आगे वादी लिखता है कि- ' हिन्दु ' शब्दकी है । व्यास्था ... पर जो आपका लेख ' वैदिकध में ' में निकला था - कायुि उत्तर मैंने ‘ आर्यमित्र ' में छपवाया था, जिसपर आपकी लेखन नहीं उठी ' । यदि वादी उसे ' वैदिकधर्म ' में देता; तब तो हमें स लगता; उसपर प्रत्युत्तर भी दिया जाता | ' आयेमित्र ' मेरे ए आता नहीं, मुझे क्या पता चल सकता था? तब उन ' आपकी लेखनी नहीं उठी ' यह वादीका कथन असत्य हुआ । यह वादीका तरीका और चालाकी रहती है, वह नि पत्र में कुछ लिख देता है, जिसका हमें पता नहीं होता; फिर प्रत्युत्तर न देनेका उपालम्भ दे देता है । अब हम उ प्रत्युत्तर यहीं देते हैं । ( ग ) वादी कहता है कि- ' वेदोंके सभी शब्द यौगिक है । यह गलत है, वेद में योगरूढ शब्द भी आते हैं । वादी स्वामी ने लिखा है- ' यह सब वेद में यौगिक और योग हैं, केवल रूढि नहीं ' । ( निघण्टु वैदिककोष - भूमिका ) । भगवद्दन्तजी आर्यसमाजी लिखते हैं- ' मन्त्रों के पद यौगिक । योगरूढ़ हैं. ऐसा ही सब वेदवित् मानते हैं, ( वैदिक वाह AneGangotri Initiative
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४६० ] यही प्रमान इतिहास २ य भाग होगया । तब वादीकी इष्ट यस है ' आलोक ' ( ८ ) पृ. श्रीसनातनधर्मालोक ( e ) पृ. १०६ ) । जब योगरूढ भी शब्द वेदमें है; केवल यौगिकता कट गई । इस विषय में १४ ९ -१६६ देखना चाहिये । योगरूढिता हुई, कर दे तो इतिहास - भूगोलादि सभी उसमें सिद्ध होगया । फिर ' सिन्धु ' करते हैं । शब्द भी उसमें भारतवर्षं वाचक सिद्ध है । की व्याख्या ( घ ) हमारे देश के साहित्य में ' हिन्दु ' शब्द थोड़ा मिलता हैं, का युक्ति विदेशी साहित्य में अधिक- इसमें कारण हम ' आलोक ' ( ४ ) में पकी लेखन दे चुके हैं । साधारण कारण यह है कि- पूर्व समय में एक समष्टि तो इस नामके उच्चारणकी शैली नहीं थी । पहले तो चार वर्णोंके नामकी मेरे पर ही प्रवृत्ति थी । इधर अपनी जातिका नाम जितना इतर जातियों-तब उन के साहित्य में मिल सकता है, उतना अपनी जातिके साहित्य में सत्य नहीं मिला करता । यह वात स्वाभाविक है । आर्य ' ' शब्द भी वह नि ' शुद्र - अन्त्यज ' आदि सभी जातियोंका नाम किसी भी प्राचीन-होता साहित्य में नहीं मिलता, किन्तु श्रेष्ठवाचक अथवा त्रैवर्णिक-हम वाचक मिलता है, अतः यह शब्द भी एकदेशी होनेसे वादीका पक्ष गलत सिद्ध होगया । वादी यदि ' हिन्दु ' यह नाम विदेशियों-गिक है की देन मानता है; तो इसका मूल कहांसे लिया गया, यह वादी के बतावे । वह यही ' सिन्धु ' शब्द ही तो है; और वह वैदिक है । योग ( ङ ) वादी कहता है- ' वेदमें देशका नाम नहीं हैं ' पर वह मका ) । देखे कि ' किं ते कृण्वन्ति कीकटेषु ' ( ऋ. ३५३ । ५४ ) यहाँपर योग श्रीयास्कने ' कीकट ' को अनार्योका देश लिखा है- ' कीकटा नाम देशोऽ बाबु नार्यनिवासः ' ( नि. ६ । ३२ । १ ) । वैदिककाल में इतनी छूतछात थी CC - 0. Ankur Joshi सिन्धुसे ' हिन्दु ' [ ४६१ कि -अनार्थीको आर्यदेशमें रहनेकी आज्ञा भी नहीं थी; तत्र ' सिन्धु ' यह ' आदेश ' था । कीकटका वर्णन पुराण में भी आता हैं । देखो ' कीकटे देश श्रागत्य ' ( भविष्य, ३४/२०१८४ ) जब वेदमें अनार्यदेश ' कीकट'का नाम आता है; तब आर्यदेश ' सिन्धु ' का नाम वेद में क्यों न आवे? श्रीसत्य व्रतसामश्रमीने भी ' सिन्धु ' को वैदिककालका प्रार्यावर्त माना था ' । देखो ' आलोक ' ( ४ ) पृ. ६७ । ( च ) ' हिरा, सिरा ' का एक ही अर्थ नस - नाड़ी है, ' सरित: -हरितः ' का एक ही अर्थ है ' नदी ' | ' श्रीच ते लक्ष्मीश्च के स्थान जहाँ ' ह्रीश्च ते लक्ष्मीश्च ' यह पाठान्तर है, वहाँ ' ही ' का ' श्री ' ही है । इस पर ४ र्थ पुष्प देखो । इससे श्री वेदानन्द-जीका भी खण्डन होगया । ( छ ) हिन्दु जव ' सिन्धु ' का बिगड़ा रूप है, तो ' सिन्धु ' तो ' वैदिक ' देन है, ' विदेशी ' नहीं । शेष रहा ' स'को ' ह ', हम वहाँ सिद्ध कर चुके हैं कि - ' स ' को ' ह ' अपना देशी भी है, इस विषय में ४ र्थ पुष्पमें हमने स्पष्टता की है, वादी उसका खण्डन नहीं कर सका । जोकि वादी कहता है कि ' सिन्धु'का अर्थ ' नदी ' है; तो पहले नदीके नामोंसे देशका नाम होता था, जैसे कि - पन्जाब, पञ्चनद । इस विषवमें हमने ४ र्थ पुष्पमें ' वैदिक - धर्म'के अपने लेखकी अपेक्षा बहुत विशेषता की है, वादीको सब प्रश्नोंका उत्तर इसी पुष्पमें मिलेगा । ( ज ) मुहब्जोदाड़ोकी खुदाई जिनकी अध्यक्षतामें हुई थी, उन्होंने अपना जो अभिप्राय लिखा था, वह हमने लिख दिया Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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४६ ९ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ९ ) था । अब जो वादीने अन्य कई ऐतिहासिकों के प्रमाण दिये हैं, उसमें उसने अपने पक्षका खण्डन स्वयं ही कर दिया है, बधाई हो । उन लोगोंने लिखा है- ' इन्द्र लिङ्गपूजकों ( शिश्नदेवों ) को घृणाकी दृष्टिसे देखता था ' ये ' शिश्नदेवाः ' शिश्न और शेषकी पूजा करते थे ' । ' वैदिक - साहित्य में शिश्नदेवताओंकी निन्दा की है ' । ' ऋ. ७/२११५ में प्रार्थना की गई है कि — ‘ शिश्नदेव ' ( लिङ्ग देवत ) हमारे यज्ञको न बिगाड़े " । जब वेद उन ' शिश्नदेवों ' की इन लोगोंके अनुसार ' निन्दा ' कर रहा है, तो लिङ्गोपासना वैदिककालसे प्राचीन अथवा वैदिककालकी सिद्ध हो गई । तब मुहब्जोदड़ोसे निकले शिवलिङ्ग भी वैदिककालके हो गये । तब वादीका पक्ष भी उष्ट्रलगुडन्याय से कट गया । इन्द बातोंसे ‘ सिन्धु - इन्दु'की समता निर्मूल न हो सकी । ( झ ) ' हि कृण्वती दुहाम् ' से हमने जो ' हिन्दु ' शब्द सिद्ध किया था, उसमें उपपत्तियाँ भी दी थीं । उसमें वेदत्रयके ' अ, उम् ' से निष्पन्न ' ओम् ' का उदाहरण भी दिया था, वादी उसपर कुछ भी न बोल सका । स्वार्थपर वादीको सायणाचार्य भी याद आ जाता है । क्या वादी सायणाचार्यकी लिखी बातें मानता है? ' अघ्न्या ' का अर्थ ' अहन्तव्या ' नहीं है - यह हमने कब कहा है? सायण आदिका यहाँ कोई विरोध नहीं है । सबकी सूझ एक-जैसी नहीं होती । जहाँ ' गो'को मारना अर्थ प्रतीत होता हो, ' वहाँ ' गो ' शब्द ' पशु ' वाचक होता है, यह हम ' आलोक ' ( ६ ) में स्पष्ट कर चुके हैं । ' गो ' का अर्थ ' अन्य पशु ' शेष रहा- देवराजने ' अन्या ' वाले मन्त्रमें' हिन्दु कल्पना नहीं की; कल्पना तो ' द्वादश प्रधयः ' मन्त्रमें स्वा.इ.से की हुई हवाई जहाजकी श्रीयास्कने भी नहीं की; देवराज यज्वाने भी नहीं की; तब क्या वादी स्वा. द. जीका हवाई-जहाजका अर्थ • माननेको तैयार है? सबको समान स्मृति नहीं हुआ करती । ( ञ ) शेष जो कई मन्त्र ' मांसमुपसिच्य उपहरति ' इत्यादि लिखे गये हैं, उसका यह तात्पर्य है कि वेद में जो ' मांस'का । श्र होगा, वही वेदके भाष्य पुराणों में भी 1 । गायके ' अघ्न्या ' विषय तो हम वादी के लेखसे पहले ही लिख चुके थे कि जहाँ ' वर ' अथेंमें ‘ गो ' शब्द दीख रहा हो, वहाँ गायके ' अघ्न्या ' होतेये ' गो ' शब्द अन्य - पशुवाचक है । जैसे कि वेदमें आया है- ' रास्ते न गावः ' ( ऋसं. १० । ८६।१४ ) यहाँ हिंसास्थान में आये हुए को शब्दका क्या वादी ' गाय ' अर्थ करेगा; वा पशु? आर्यसमा भाष्यकार श्रीजयदेवविद्यालङ्कारने भी ' हत्यास्थानमें वे पशुष तुल्य मरकर ' यही अर्थ किया है । श्रीसायणने भी ' विशसनस्थारे पशव इव ' यह अर्थ किया है । तब क्या वादी यहाँ बलात् ' गोध ' गाय ' अर्थ करके वेदोंको भी इससे वाममार्गका ग्रन्थ देगा? वादी एक अन्य मन्त्र भी देख ले - ' वि पवेशः चकतं प इव असिः ' ( ऋ. १०।७६ ६ ) यहाँ तलवारसे ' गो'का टुकड़े म देना वेदने कहा है; तव क्या इससे वादी गायका तलवासे । काटना वेदसम्मत मान लेगा? यदि नहीं; तब बेदानुसारी CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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४६४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ' हिन्दु पुराणोंमें भी वेद - जैसा ही अर्थं होगा । शं स्वा दु.वे. ( ट ) जो कि वादीने श्रीनरदेवजी शास्त्रीका अपना मत दिया ; देवरा है कि - ‘ सिन्धुप्रदेशवासियोंको ईरानी आदि उच्चारणकी असमर्थता-हवाई के कारण ‘ हिन्दु ' कहते रहे । पहले यह ' हिन्दु ' शब्द निर्दोष मनस् रहा ', इससे वादीका ही खण्डन होगया; क्योंकि - शास्त्रीजीने इससे यह स्वयं सिद्ध किया है कि इस देशका नाम ' सिन्धु ' था । ' इत्यादि तब ' सिन्धु ' इस देशका मूल नाम सिद्ध हुआ, ' हिन्दु ' उसका का श्रर्थ ) शास्त्रीजीके मतमें ईरानी आदियोंकी असामथ्यैवश उच्चारण ' विषय सिद्ध हुआ । तथा - - ' ' हिन्दु ' शब्द उस समय निर्दोष सिद्ध रहा । जहाँ ' ' तब इसमें ' हिन्दु ' शब्दकी सिद्धि तो हो ही गई । परन्तु हम ' स ' होनेसे का उच्चारण ‘ ह ’ होनेमें देशीपन ४ र्थं पुष्पमें लिख ही चुके हैं । है - ' शसने ( ठ ) आगे वादीने श्रीनरदेवजी का मंत यह लिखा है कि-पहले - पहल ' हिन्दु ' शब्द निर्दोष रहा, फिर कालान्तरमें इसके अर्थ विपरीत हुए ।... ' सिन्धु ' से बने हुए ' हिन्दु ' शब्द के विकृत वे पशुप अर्थं चोरआदि हो गये ' । इससे उष्ट्रलगुडन्यायसे वादीका ही खण्डन होगया । पं ० नरदेवजीने भी ' सिन्धु ' शब्दसे ही ' हिन्दु ' तू गोष माना । सो ' सिन्धु ' शब्द तो विदेशियोंसे रखा नहीं गया; वह तो ग्रन्थ का वैदिककालका शब्द सिद्ध हुआ । ' आर्यावर्त ' या ' आर्यदेश ' वेदमें चकर्त कहीं नहीं आया । यदि आया है; तो वादी उसे वेदसे दिखलाए? टुकड़े का ( ड ) ' पृथ्वीराजरासो'को भले ही किसीने जाली ठहराया हो, तलवार पर उसमें स्थित ' हिन्दु ' शब्द जाली कैसे होगया? । फिर तो दानुसारी उसमें स्थित राजा पृथिवीराज भी जाली हो जायगा । पर यह CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदसे गंगा श्रादिको उडाया [ ४६५ अनिष्ट है । समाजके अनुसन्धाता श्रीभगवद्दत्तजी' भारतवर्षे का बृहद् इतिहास ' ( प्रथम भाग पृ. ३० ) में ' पृथिवीराज रासो ' को प्रामाणिक ठहराते हैं, अब क्या वादीकी शक्ति है कि वह अपने अनुसन्धाता आर्यसमाजीजीका खण्डन कर सके? ( ढ ) जो कि वादी कहता है कि- ' इमं मे गङ्गे! ' आदि मन्त्रोंमें न तो नदियोंका वर्णन है, न देशोंका, यह स्वा. द. जीका प्रमाण देता है - ' इडापिङ्गलादीनां कहकर वह तब क्या स्वा. द. जीका वचन प्रमाण होगया गङ्गादिसंज्ञाऽस्तीति ' लिख दिया; वह ठीक है? जब स्वामीजी कि उन्होंने जो तथा वादी वेदमें संज्ञा-शब्द ( रूढ ) नहीं मानते; तो वहां स्वामीने नाड़ी में रूढ अर्थ वेदमें कैसे कर दिया? श्रीचन्द्रमणि विद्यालङ्कारका गलत है । यहां ७ नदियों ( गङ्गा, यमुना, सरस्वती भी अर्थ , शुतुद्री, परुष्णी, मरुदुवृधा, आर्जीकीया [ व्यासा ] ) तथा असिक्नी, वितस्ता, सुषोमा तीन उपनदियोंका वर्णन है, इससे अग्रिम मन्त्रमें सिन्धु, गोमती आदि नदियोंका वर्णन है । पर चन्द्रमणि-जीने इनमें इडा, पिङ्गला, सुषुम्णा इन तीन नाडियोंका वार - बार वर्णन किया है; और उसमें भी प्रमाण कुछ नहीं दिया । शुतुद्री ( सतलुज ), परुष्णी, ( रावी ), सरस्वती भिन्न - भिन्न नदियाँ हैं, यहां उन्हीं की स्तुति की गई है, यहां परमेश्वरकी स्तुति कहांसे आगई? । और यह तीन नदियां एक ही सुषुम्णा नाड़ी कैसे चन गई? और ‘ शृणुहि ' नाड़ियां परमेश्वरकी स्तुति क्या सुनेंगी? करें स्तुति परमेश्वरकी; पर उस स्तुतिको परमेश्वर न सुन कर स ० ध ० ३० Gujarat. An eGangotri Initiative
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४६६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) ही सुनें - यह कैसी बात? क्या जड़ नाड़ियां भी नाड़ियां स्तुति सुनती हैं? यदि ऐसा है, तो पत्थर भी फिर परमेश्वरकी सुनेगा ऐसा मान लो । इसमें ' परमेश्वर ' की परमेश्वरकी स्तुतिको नहीं है, किन्तु इन नदियोंकी - वादी के स्तुति तो कहीं आई में परमेश्वर की उपासना अनुसार नाडियोंकी स्तुति, अथवा नाडियों आई है; सो यह जडपूजा होनेसे मूर्तिपूजा वैदिक सिद्ध होगई? एक बातको बचाते हुए वादी दूसरे जाल में फँस गया! फिर तरह मूर्तिमें भी परमेश्वरका ध्यान क्यों नहीं हो नाडीकी? अथवा मूर्ति के सामने परमेश्वरकी स्तुति पाली रत्नजी क्यों सकता नहीं सुनाते? क्या इसलिए कि स्पष्ट मूर्तिपूजाके आगे सिर झुकाना पड़ता है!! जब इस मन्त्रकी देवता नदियां हैं, ( देखो वैदिकयन्त्रालयकी मूल ऋग्वेदसंहिता ( पृ. ५६४ ). नाडियां देवता नहीं, निरुक्तमें भी ' नद्यः- नदना इमा भवन्ति शब्दवत्यः ' ( निरु. २२२४ | ५ ) ऐसा ही है, क्या ' नदी ' का अर्थ ' नाडी ' होता है? तब नाडियाँ अर्थ कैसे किया जा सकता है? क्या वेदमें वादी कहीं दिखला सकता है कि - गङ्गा आदि १० नदियाँ इडा आदि तीन नाडियोंका नाम है?. वादी तो वेद में ' संज्ञा - शब्द ' ( नाम ) मानते नहीं; तव ' नाड़ियोंकी गङ्गा आदि संज्ञा कहांसे आगई? अतः वादीका यह ' प्रमाण - हित कथन निर्मूल है । ( ण ) ' वेदमें कहीं देशविशेषका नाम नहीं है ' यह वा लिखता है - फिर श्रीयास्कने निरुक्तमें ' कीकट ' अनार्य देशका CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat हठयोगप्र. को भी मान लिया नाम ( संज्ञा ) वेदमें कैसे माना? बादी वेदमेंसे आदि नाम रखना कहता है; यह वादी विरुद्ध देखकर है । जब उसके अनुसार वेद में गङ्गादि शब्द यात बद्द नाडियांका हैं, तो ' गङ्गा ' यह नदीका नाम क्यों रखा गया नाम गङ्गा आदि लोकमें क्यों नहीं रखा गया? इन नाहिसे ? जिस -१ प्रदीपिका ' को प्रमाण माना जाता है, उसी हठयोगप्रदीपि ' इडा भागीरथी गङ्गा ' ( ३६ ) परिभाषा वेद में कैसे फिर पुराणों में भी जहाँ वादीको ' गोमांसभक्षण लाद दी ' प्रतीत होत वहाँ वह ' हठयोगप्रदीपिका ' के अनुसार ' गोशब्देनोदिता तत्प्रवेशो हि तालुनि । गोमांसभक्षणं प्रोक्तं शि महापातकनाशन यह परिभाषा क्यों नहीं मान लेता? पर जब यह तो ‘ हठयोगप्रदीपिका’को ‘ आर्यपथिक’जी गाली दे देते कहा हैं । ' हठयोगप्रदीपिका'का आपने यह प्रमाण दिया; हमारेलिय कुछ भी मान्य नहीं । ' जैसे उदई वैसे भान, उनके चोटी उनके कान ' । हमारे लिए जैसे पुराण अप्रामाणिक, वैसे प ' हठयोगप्रदीपिका ' ( दो शास्त्रार्थ पृ. १६ ) । स.प्र. ३ पृ. ८ स्वा. द. जीने ' योगमें हठयोगप्रदीपिकादिको जालग्रन्थ ' माना उसी जालग्रन्थ हुठयोगप्रदीपिकाकी गङ्गा यदिकी भी परित ह ( ३ ) वेदमें मान ली गई । इससे वेदने वा स्वा. द. जीने वैदिक ममन्योंके सिद्धान्तकी नाक काट ली । व फलतः वादीने जो मत लिखें हैं; यह आर्यसमाजियों म और अपने दृष्टिकोणके हैं; अत: साध्य हैं, सिद्ध नहीं । इ ६ An eGangotri Initiative