सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 251–260
सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 251–260
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श्रीसनातनधर्मालोक ( E ) ४६८ ] देखकर पालीरत्नजीका गलत थ न मानकर उक्त मन्त्रमें बात वादीको गङ्गा आदि नदियोंका नाम ही मानना चाहिये; और वेदमें कह डियोका उनका नाम भविष्यत् - दृष्टिसे मानना चाहिये । यदि हमारा यह वाद इन नाहि वादीको पसन्द न हो; तो हम उसे स्वा. द. जीका कहा समाधान जिस - इट यही समाधान बताते हैं । स्वा. द. जी श्रृभाभू. में लिखते हैं— गप्रदीपिक ईश्वरस्य त्रिकालदशित्वात् । ईश्वरो हि त्रीन् कालान् जानाति ’ लाद दी ( पृ. ८६ ) ' इस मन्त्रमें वेदोंके कर्ता त्रिकालदर्शी ईश्वरने भूत, प्रतीत होता भविष्यत्, वर्तमान तीनों कालोंके व्यवहारोंको यथावत् जानके कहा नोदिता दि है ' ( पृ. ८७ ) तब गङ्गादि नदियोंका नाम भी भविष्य में जानकर प्रातकनाश्ट्र परमात्माने वेदमें गङ्गा आदि नदियोंका नाम लिखा | त्रिविध-ह कहा प्रक्रिया भी आप लोग मानते ही हैं; तब गङ्गा आदि नदियोंके देते है कि अर्थको भी नहीं छिपाया जा सकता । मारेलिए नस - नाडियाँ तो लोहूसे सनी हुई होती हैं, ध्यानके समय उनके कचोर में लहू और हड्डी आदिका ध्यान भी आ सकता है, पर एक, बैंसे पत्थर की शुद्ध मूर्ति में वह बुरा ध्यान नहीं आ सकता । अतः ३. नाड़ीपूजा छोड़कर वेदोक्त नदीपूजा वा मूर्तिपूजा मान लो । थ ' माना है ( त ) ' हिन्दु ' शब्द मुसलमानोंके यहाँ धार्मिककेलिए प्रयुक्त भी परि होता है । इस मतका हम चतुर्थ पुष्पमें ( पृ. ११-६५ ) खण्डन · जीने वैदिक कर चुके हैं । उन्हींके कोष में ' आर्य ' शब्द ' घोड़ेके पिछले भाग ' का नाम है; तो फिर ' आर्य ' शब्दको भी छोड़ दीजिये । नयाँ मुसलमानोंसे भिन्न कोई भी हो; उनकेलिए वह काफिर ( भिन्न-नहीं । मं धर्मी ) हैं । यदि जातिवाचक ' हिन्दु ' शब्द नहीं आता; तो जाति-CC - 0. Ankur Joshi वादीकी ' वैदिक दृष्टि ' मारी गई [ ४८० वाचक ' आर्य ' शब्द भी नहीं आता । पहले प्रायः चार वर्णोंक निर्देशका प्रचार था, समूचा एक जातीय नाम प्रायः नहीं होता था । वादीसे उल्लिखित डा ० गौरी. ओमाने मूल शब्द ' सिन्धु ' ही माना है, वादी भी उसे मान ले । ' आर्यपुत्र ' ससुरको कहा जाता था, इसमें क्या ' आर्य ' शब्द ' हिन्दु ' जातिवाचक है? वस्तुतः यह सब मत सुधारकोंके हैं; इन सबका प्रत्युत्तर हम ४ र्थ पुष्पमें दे चुके हैं, पर वादी उन प्रत्युत्तरोंको छिपाकर पूर्व-पक्षका पुनः पिष्टपेषण कर देता है । ' वैदिकधर्म ' में छपा हमारा लेख संक्षिप्त था, ४ र्थ पुष्पमें हमने सब शंकाओंका समाधान कर दिया था; वादी उसे देखे, तो उसकी सब शंकाएँ मिटेंगी । ( थ ) स्वा. दु. का मत वादीने दिया है कि- ' आर्यो ब्राह्मणकुमारयोः ' ( पाणिनि ) उस समय ब्रह्मचारी और ब्राह्मणका नाम आर्य था ' । अब भ्रान्त - पथिक बेचारा ' आर्य ' नहीं रहा; क्योंकि - न तो वह ब्राह्मरण है, न ब्रह्मचारी । क्या यहाँका ' आर्य ' शब्द जातिवाचक है? क्या ‘ प्रायवितं ' शब्द वेद में है? क्या आर्यावर्त सारे भारतका वाचक है? इस प्रकार वादी की ' हिन्दुशब्द की व्याख्यापर वैदिक ' दृष्टि ' बेचारी मारी गई, वह वेदसे भारतवाचक ' आर्यावर्त ' शब्द तथा ' अन्त्यजान्त सबका नाम ' आर्य ' है ' यह सिद्ध न कर सका । तब हमारा पक्ष अक्षत रहा । ( द ) हमने ' आयँसमाज ' वेदमत नहीं, किन्तु ' दयानन्दमत ' है, इसमें प्रत्यक्ष प्रमाण ' नीरक्षीर विवेक ' को दिया था । फिर Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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४७० | श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ' प्रत्यक्षे किं प्रमाणान्तरेण; अन्य प्रमाणकी क्या आवश्यकता थी? अभी तक तो वादीको यह भी मालूम नहीं कि वेद क्या वा कितना है? जो भी बात वादी पुराणसे भी बता दे; तब तो वह वेदकी हो जाती है । यदि हम वेदसे कोई बात बतावें; तो वह उसके अनुसार पुराणकी बन जाती है; अतः स्वा. द. के अनुसार हो वेदका अर्थ करना यह दयानंन्दीपन है । वेदका तो ' लेबिल ' मात्र है । यही बात आलोक ' ' ग्रन्थमालासे हम सिद्ध कर रहे हैं । ( ५६ ) आगे वादी देवीभागवतसे कुछ पद्य उद्धृत करता है । वहाँ लिखा है - ‘ स्मृतयश्च श्रुतेरर्थं गृहीत्वैव च निर्गताः । मन्वादीनां श्रुतीनां च ततः प्रामाण्यमिष्यते ' ( ७/३६/१७ ) इसमें लिखा है कि — स्मृतियाँ वेदके अर्थको लेकर गिकली हैं, अतः मन्वादि-स्मृतियों का भी प्रामाण्य है । आगे पाठ है- ' क्वचित कदाचित् तन्त्राथः कटाक्षेण परोदितम् । धर्मं वदति सोंशस्तु नैव ग्राह्योस्ति वैदिकैः ' ( १८ ) यहाँ इस पद्यका अर्थ अन्य है, और वादीने अन्य अर्थं कर दिया । वह लिखता है - ' परन्तु उसमें भी कहीं-कहीं बुरी भावनासे अन्य लोगोंने प्रक्षेप कर दिया है, और उसे लोग धर्म कहते हैं, वैदिक उन्हें ग्रहण न करें ' । यहाँ तो यह अर्थ है कि कहीं तान्त्रिक पुस्तक कटाक्षसे दूसरे से कहे हुए धर्मको भी कहते हैं, वैदिक उनको ग्रहण न करें " । ' यहाँ स्मृतिकेलिए यह बात नहीं, यहाँ तो श्रुति - स्मृति इन दोनोंको ही ' योऽवमन्येत ते मूले ( श्रुतिस्मृती ) ' ( २।११ ) इस CC - 0. Ankur Joshi Collection पथिकका भ्रम ४७ मनुवचनकी भांति प्रमाण माना गया है । इस मनुवचनका ' वेदविरुद्ध मतखण्डन ' ( शता. सं. पू. ८०३ ) में स्वामीने श्री प्रम है- जो ' तर्कशास्त्र के श्राश्रयसे वेद और धर्मशास्त्रका अपमान है, श्रेष्ठ पुरुषोंको योग्य है कि उसको अपनी मण्डली से का ( व कर बाहर कर देवे, क्योंकि वह वेदनिन्दक होने से नास्तिक निद्या, देवी यह बात युक्तिवादी आप लोगोंपर पूरी घटती है । श्रीदे भागवतमें यही कहा है- ' श्रुतिस्मृतिभ्यांमुदितं यत् स ग्ला प्रकीर्तितः ' ( ७ । ३६ । ५ ) । हाँ, तन्त्रके विषयमें दे.मा.में कहा ि कि- उसकी कई बातें ग्राह्य नहीं । है; ७ | ३६ | १६ वें श्लोकमें कहा है – ' मैं ' ( देवी ) सर्वज्ञ तथा देवी शक्तियुक्त हूँ, वेद मुझसे निकला है; सो मुझे अज्ञान न होनेसे के मान तो प्रमाण है ही । फिर १७ वें पद्यमें कहा है- ' स्मृतयश्च अ गृहीत्वैव च निर्गता: । ( अर्थात् स्मृतियां भी श्रुतिके ही अर्थ निकली हैं; अतः मनु आदियों की स्मृतियाँ भी प्रमाण है- पूजा ' मन्वादीनां श्रुतीनां च ततः प्रामाण्यमिष्यते ' ( १७ ) यहां ' श्रुर्वी वैदि का अर्थ ' श्रुतिस्वरूप स्मृतियां ' हैं, अतः स्मृतियोंमें वेदविरुद्ध भूधर कुछ भी नहीं कही गई । इसलिए वे. वि. म. खं. में जिसका उद्धार संधि हम पूर्व कर चुके हैं, वहां तर्कके द्वारा धर्मशास्त्र ( स्मृति ) अपमान करनेवालेको भी ' वेदनिन्दक ' ही माना गया है ' यन्स १८ वें पद्यमें तन्त्र - ग्रन्थोंमें कहीं - कहीं वेदविरुद्धता सूचित की चर है, जैसेकि - अन्यत्र भी सूचना दी गई है- ' वेदाऽविरोधि के दिया तन्त्रं तत्प्रमाणं न संशयः । प्रत्यक्ष - श्रुतिरुद्धं यत् ( तत्र ) देवी Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ४७२ 1 वनका प्रमाणं भवेन्न च ' ( देवी. ११।१।२५ ) । ने लिख श्री वादीने बड़ी श्रद्धासे देवीको श्रज्ञानरहित तथा श्रुति मान ( वेद ) को उस देवी से उद्गत मान लिया । देवीने स्मृतिको भी से निधन अर्थ होनेसे ' श्रुति ' शब्द से श्रुतिरूप मान लिया । अब श्रुतिका नास्तिक देबीजी स्वयं कहती है ' मदाज्ञारक्षणार्थं तु · ब्रह्मक्षत्रियजातयः - श्री ( २१ ) सृष्टाः, ततो ज्ञेयं रहस्यं मे श्रुतेर्वचः । यदा यदा हि धर्मस्य स ग्लानिर्भवति भूधर! ( २२ ) अभ्युत्थानमधर्मस्य तदा में बिभर्म्यहम् ' ( २३ ) यहां देवीने अवतारवादको वैदिक बता दिया है; ओर इसे श्रुति ( वेद ) का वचन कह दिया है । जब प्रतिपक्षी तथा से. देवीके वेद में अज्ञान नहीं मानता, तब वह अवतारवादको भी होनेसे के मान ले; और अवतारवादका अपना साम्प्रदायिक खण्डन नव ने अज्ञानमूलक मान ले । वादीने जिस प्रकरण से यह पद्य दिये हैं; वहां देवी की माण है- पूजाका वर्णन चालू है । जैसे कि - ' द्विविधा मम पूजा स्यात्... श्रुती वैदिकी तान्त्रिकी तथा ( ३ ) वैदिक्यपि द्विविधा मूर्तिभेदेन दवि भूघर! वैदिकी वैदिकैः कार्या ' ( ४ ) तन्त्रोक्तदीक्षावद्भिस्तु तान्त्रिकी का उद्वा संश्रिता भवेत् ( ५ ) स्मृति ) फिर देवीने. अपनी दो प्रकारकी पूजाकी स्पष्टता की है— गया । ' थन्मे साक्षात्परं रूपं दृष्टवानसि भूधर! अनन्तशीर्षनयनमनन्त-ती चरणं महत् ( ७ ) यहां भी देवीने अवतारवाद वैदिक सिद्ध कर रोषि दिया है । ' तदेव पूजयेन्नित्यं नमेद् ध्यायेत् स्मरेदपि ' ( ८ ) इस तन्त्र ) देवी के साक्षात् अवताररूपको नमस्कार, ध्यान, स्मरण करके CC - 0. Ankur Joshi स्वामी भी दुर्गापूजा मान गये । ४७३ मूर्तिपूजा बताई गई है । २१ में श्रुति स्मृतिप्रोक्तको धर्म माना गया है । ' मूर्ती वा स्थण्डिले वापि तथा सूर्येन्दुमण्डले । जलेऽथवा वाणलिङ्गे यन्त्रे वापि महापटे ' ( ३८ ) यह मूर्तिपूजा भी बताई है, और यह भी बताया है कि - जब तक भीतरी पूजामें अधिकार नहीं हो जाता, तब तक बाह्यपूजा करता रहे । पीछे [ परमहंसावस्थामें ] वाह्मपूजाका छोड़ना कहा है- ' यावदा-न्तरपूजायामधिकारो भवेन्नहि । तावद् बाह्यामिमां पूजां श्रयेद्, जाते तु तां त्यजेत् ' ( ४३ ) यह भी स.ध.का पक्ष है । श्राशा है-अब वादी भी दुर्गापूजा शुरू कर देगा । स्वा. द. जी भी दुर्गा ( शक्ति ) पूजा मान गये हैं । उन्होंने पञ्चमहायज्ञविधिमें लिखा है- ' भद्रकाल्यै नमः ' भद्र - कल्याणं कालयितुं शीलमस्या: सा भद्रकाली ईश्वरशक्ति: ' ( शता.सं. पृ. ८८७ ) यहां स्वामीजीने ईश्वरीशक्तिको नमस्कार कराया है । शक्ति जड़ - पदार्थं हुप्रा करता है, उसको नमस्कार करना ( सिर झुकाना, एम प्रहृत्वे ) उनके मतमें मूर्तिपूजा है । जैसा कि-स.प्र. में लिखा है- ' किसी जड़ पदार्थके सामने शिर झुकाना वा उसकी पूजा करना सब मूर्तिपूजा है ' ( ११ पृ. २३० ) । ' पूजा ' की स्पष्टता स्वामीने ऋभाभू.में की है- ' पूजनं- पूजा, सत्कारः, प्रिया-चरणमनुकूलाचरणं च इत्यादयः पर्याया भवन्ति । इयं पूजा चक्षुषोपि सर्वैर्जनैः क्रियते ' ' जो दूसरेका सत्कार. प्रियाचरण अर्थात् उसके अनुकूल काम करना है, इसी का नाम पूजा है ' ( शता. सं. पं. ३४४-४५ ) Collection ' Gujarat. An eGangotri Initiative
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४,४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) जब वादी देवीको पूर्णज्ञानवाली और अज्ञानसे रहित मानता है, तो मूर्तिपूजा वा अवतारको अपना सिद्धान्त मान ले । पर अब वादी देवीको अज्ञानिनी मान लेगा; यह तो है इन लोगोंका हाल! यहाँ वादीने पूर्वापर - प्रकरणको छोड़कर लिखा है । प्रकरण देवीपूजाका चला हुआ था । अतः वादीका उन पद्योंका उद्धरण व्यर्थं ही गया । देवीभा का पूरा प्रकरण यदि वादी मान ले; तो यह स ध का पक्ष सिद्ध हो जायगा । ( ६० ) ' अनावृताः किल पुरा ' इसपर हमने आलोक ' ' ( ७ ) में ५ पृष्ठों में मीमांसा लिखी थी, वादी उसे ' वाग्जाल ' शब्द कहकर टाल गया । जब उसे कुछ उत्तर नहीं सूझता; तब ' वाग्जाल ' शब्द कहकर अपनी जान छुड़ा लेता है । फिर वे ही पद्य उसने लिख भर दिये, जिनकी व्यवस्था हमने लिख दी थी; उसपर कुछ प्रत्युत्तर नहीं दे सका । ' उस समय भाई - बहिनों का मेल हुआ था ' क्या यह ऐकदेशिकता नहीं थी? उस समय कामभाव न होनेसे व्यवस्था नहीं थी । जब कामभाव शुरू हुआ; तब श्वेतकेतु - द्वारा व्यवस्था बनाई गई । आगे श्रीचलदेवजी उपाध्यायका लेख वादीने व्यर्थ ही उद्धृत कर दिया । इससे तो वादीने अपनी ' स्वयंवरपद्धति ' का खण्डन कर दिया । पथिकके गुरु श्रीधर्मदेवजी वैदिककाल में परस्पराभिलषिततामें स्वयंवर मानते हैं; आशा है - वादी उन्हें भी अव भत्सना देंगा । ' पिता यत्र दुहितुः ' इस वादीसे उद्धृत वचनका तो यह अर्थ है ' अभ्रातृका - कन्याकी सन्तान विषय में CC - 0. Ankur Joshi Collection पथिकका भ्रम [ उसके पतिको अनुकूल करके लड़कीके पिताने उसे: बनाकर सुख की साँस ली । ऐसा निरुक्तकारने प्रकरण अपना २ यदि वादी चाहे तो वह इसपर श्रीचन्द्रमणिपाली दिया I रत्नका निरुक्त ( ३ अध्या ) में देख सकता है । यहाँ वरके भत्र प्र प्रचन् बात नहीं । वैदिककाल भी कोई छोटा - मोटा काल नहीं होता I प्रजा प्रकृतिका अनुवर्तन करती है, फिर गड़बड़ी । प व नियन्त्रण चलता है | चलनेष ) तो ( ख ) ' विवाह सर्वथा युवक - युवतिका हुआ करता था ': व उप वादीने लिखा है । यह किसीके लिखनेमात्र से सिद्ध नहीं । जाता । १६ वर्षका लड़का भी युवा होता है - यह पथिकनेसी वर्ष की विवाहावस्था में स्वयं माना था । हमने ' आलोक ' ( s ) वाद लिखा था कि- स्वा. द. जी की संस्कारविधिके उपनयनमें भी सुवासाः ' मन्त्र ८-११-१२ वर्षके वटुकेलिए पढ़ा गया है, ब्रह्म ८-११-१२ वर्षका वटु भी वेदानुसार ' युवा ' सिद्ध होगया । इस शुर पथिकने ' वेदवाणी ' ( १५/११ ) पृ. १५ स्तं. २ पं. १२ से २० पं न जा लिखा था - [ ' युवा सुवासाः ' मन्त्र के संस्कारविधिके उपनर उप संस्कार में ] महर्षिजी के उद्धरणसे यह कहाँ सिद्ध होता है कि किन ८ वर्षके वटुकेलिए यह मन्त्र प्रयुक्त किया गया है? यह यह आपकी कपोलकल्पनामात्र है उन्हों [ स्वामीजी ] ने उपनवर्क अन्तिम आयु लिखी है - ' ब्राह्मण के १६, क्षत्रियके २२, और वह बाई के २४ वर्ष पूर्व - पूर्व यज्ञोपचीत होना चाहिए, क्या ' युवा ' ह Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) ४७६ ] अपना २४ वर्षकं वटुपर प्रयुक्त नहीं माना जा सकता है; श्रातः दिया २२, कुतर्क व्यर्थ है ' । है आपका का मान यहाँ पथिक २०, २४ बर्षसे पूर्व १६ वर्ष लिखना भूल गया प्रवन्न हैं, क्योंकि उसके दिये स्वामी के उद्धरणमें ब्राह्मणकेलिए अन्तिम श्रायु १६ वर्षकी लिखी है । सो जैसे उसके अनुसार २२, २४ ता । वर्ष ' युवा ' अवस्था है; वैसे १६ वर्ष भी युवावस्था होगी । नहीं चलनेव तो १६ वर्षकी ब्राह्मणकी अन्तिम उपनयनावधि जो स्वामीने बताई है, वह वेद- विरुद्ध सिद्ध हो जायगी । और स्वामीने या ' ज्ञ उपनयनकी पूर्व आयु ८-११-१२ वर्षकी लिखी है, उसमें भी द नहीं है ' युवा सुवासाः ' जब प्रयुक्त होता है; तब वे भी ' युवा ' हुए । १२ कने ' सीह वर्षकी विवाह्यमाना लड़की भी तदनुसार ' युवति ' हुई । अव क ' ( ७ ) वादीको १६ वर्षके लड़के और १२ वर्षकी लड़की का विवाह नमें भी ‘ यौवन - विवाह ' मानना पड़ेगा । स्वा. द. जी लड़केका ९ वर्षका क्या है ब्रह्मचर्यं भी स.प्र. ३ ( पृ. २५ ) में मान गये हैं, ८ वर्षमें उपनयन इस शुरू होने पर ६ वर्षका ब्रह्मचर्य करनेसे लड़का १६ वर्षका हो २० जाएगा । उस समय ब्रह्मचर्य समाप्त हो जानेसे उसका विवाह उपनर उपस्थित होगा । उसे लड़की १६ वर्षकी तो दी नहीं जायेगी, ता है किन्तु १२ वर्षकी । तब वादीके तथा उसके स्वामी के अनुसार यह यह विवाह युवक - युवतिका सिद्ध हुआ । इस विषय में हम ' सीता-उपनव विवाह ' में पहले ( पृ. ११४- १४८ में ) स्पष्टता कर चुके हैं । तब और बादीका अभिप्राय कट गया । युवा श ( ६१ ) ' सनातनमेन माहु: ' में ' सनातन ' जब ' परमात्मा ' का CC - 0. Ankur Joshi पथिकका भ्रम | ४७७ नाम वादी भी मानता है, वा. द. जी भी स.प्र. ३ में ' सनातन श्रर्थात् वेदद्वारा परमेश्वर - प्रतिपादित ' ( पृ. ३१ ) अर्थ कर गये हैं, तब सनातन ( परमेश्वर ) का धर्म स्वयं ' सनातनधर्म ' सिद्ध हो गया । वादी इस विषय में श्रीगङ्गाप्रसाद उपाध्यायजी का ' सनातन-धर्मे ' ( पृ. ७ ) देखे । स ध के सिद्धान्त उत्सगँ - अपवादसे युक्त होते हैं । अनभिज्ञोंकी उसमें गति नहीं होती । ( ख ) आलारामजी ' सागर'ने स्वा. द. जीकी परस्परविरुद्धता बहुत दिखलाई है, उसका किसीने भी उस रूपसे प्रत्युत्तर नहीं दिया । उनके वचन स.प्र. आदिसे उद्धत हैं; क्या उन स.प्र.के वचनोंको वादी साध्य मानता है, जो कि - उसने ' सागर'जी के स.प्र. आदिके उद्धरणोंको साध्य लिख दिया? स.प्र.का खण्डन पं ० ज्वालाप्रसादजीने, भास्कर - प्रकाशका ६ समु. तक पं ० कालूराम जीने, उसके आगे मूर्तिपूजा आदि पर उन्होंने पृथक् रूपमें स.प्र.-का खण्डन कर दिया है । स.प्र. की वास्तविकताको हम दूसरों की आंखोंसे क्यों देखें; दूसरेके चश्मेसे देखनेसे आपको कुछ नहीं दीख सकेगा । ( ६२ ) सारस्वत - ब्राह्मणोंको वादीने राक्षसका अवतार कहा था, वहाँ हमने दिखला दिया था कि उसमें सारस्वतोंका नाम तो है नहीं, वहां उनके लक्षण ' अनृतवादिनः ' आदि दिये गये हैं; वे लक्षण जब तथाकथित औदीच्य ब्राह्मण स्वा. द. जी तथा उनके अनुयायी ब्राह्मणम्मन्योंमें घटते दीखते हैं; यह ' आलोक ' ( ७ ) में पृ. १७५-२१५ में हमने दिखलाया था, वादीने उसे मान Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( e ) ७८ ] उसका समाधान नहीं किया; तब उन्हें ही उक्त लिया; क्योंकि वादी मान लें । न केवल पुराण, बल्कि स्वा. द. भी अवतार ' असुर ' मान गये हैं - जैसे कि भाभू. शता. अनृतवादियोंको सं.पू. ६२० में स्वामीने लिखा है- ' ये अनृतकारिणः, अनृत-; ते मनुष्या असुरा एव ' । ' जो अविद्वान् झूठ बोलने, मानिनश्च मानने और मिथ्याचार करने वाले हैं; वे असुर कहाते हैं ' झूठ अनृत भी हमने इसमें तथा ' आलोक ' ( ७ ) ( पृ. ६२२ ) वादीके में बहुत दिखलाये हैं; इसलिए वह अपनेको उस पदवीका अधि-कारी मान ले । ' ब्राह्मण कुत्ता हाथी ' आदि अपनी कही हुई हुई बातें वादी अपने औदीच्य ब्राह्मरणमें मान ले । यदि नहीं मानता, तो सब • ब्राह्मणोंके लिए यह बात सिद्ध न हुई । ( ख ) गौतमका शाप जो वादीने देवीभागवत से उद्धृत किया है; उसका उद्धरण व्यर्थ है, वह शाप तो विशेष ब्राह्मणोंको व्यक्तिगत था, सबको नहीं । आप लोग भी उस उद्धरण के अनुसार शक्ति-की उपासना नहीं करते; अतः ' कुम्भीपाके पुनः सर्वे यास्यन्ति निजकर्मभिः ' ( ६७ ) यह वादीकी स्वयं लिखी गति सम्भव है । वस्तुतः यहां देवीकी उपासनाका प्रशंसार्थवाद है, और कापालिक और कौलिक आदियोंका निन्दार्थवाद है । शास्त्रका तात्पर्य समझना चाहिये - ‘ नहि निन्दा निन्द्य निन्दितुं प्रवर्तते, अपितु • निन्दितादितरत् प्रशंसितुम् ' । ब्राह्मण सभी गायत्री जप, जपयज्ञ आदि करते ही हैं; अतः उनकेलिए उक्त पद्य नहीं हैं । ( ग ) जो कि - वादी उपालम्भ देता है कि- ' आप लोग पुराण-CC - 0. Ankur Joshi Collection पथिकका भ्रम .को आद्योपान्त नहीं पढ़ते हैं, इस पर उत्तर यह है पुराणादि सभी को खूब अच्छी लोगों छिपाये हुए उनके पूर्वापर लोगोंको निरुत्तर कर देते हैं? अवश्य हैं, पर केवल दोषदृष्टिसे; प्रकरण छिपाकर असत्य - प्रकृति तरह देखते हैं कि इस ; तभी तो प्रकरणको हम प्रकट करके आप लोग पुराणोंको देख् उसमें भी आप लोग पूरे अपनाते हैं । पुराण तो दाई दृष्टि रखते हैं; अतः उन्होंने दिखला दिया कि कौन: नरक आये हुए हैं । देखिये दे. भा. के पद्योंमें - १२/६/५८ में शिव शिवजीके मन्त्र तथा शिवशास्त्रमें जो आस्था नहीं रखते । देवीका मन्त्र, देवीके आयतनकी उपासना नहीं करते । • देवीका मन्त्र गायंत्री से भिन्न है; क्योंकि - गायत्रीका तो १४ पद्यमें वर्णन आ चुका है ( ६१ ) । ' जो देवीके भक्तक नहीं रहते, जो शिवजीके उत्सवको नहीं देखना चाहते ( इ ) जो रुद्राक्ष, बिल्वपत्र आदिसे दूर रहते हैं, उनका खण्डन क रहते हैं, उन्हें जंगली कहते हैं ( ६४ ), जो अद्वैतवादका स करते रहते हैं; इसपर देखो वादीके मित्रका ' श्रीमद्भागवतसम तथा ' गीताविवेचन '; उसमें निष्ठा नहीं रखते ( ६६ ) तथा ि ( मृतक - पितरोंका श्राद्ध पुराणको इष्ट है, जीवितोंका नहीं । ह आस्था नहीं रखते ( ६६ ) जो कृच्छ चान्द्रायण एवं प्रायश्चि उ - नहीं मानते ( ७० ) जो देवीभागवतवाली देवी में विश्वास द रखते ( ७१ ) जो तीन ( प्रातः, मध्याह्न एवं सायं ) काल की स नहीं मानते ( ६३ ) जो अपने सम्प्रदाय में ही भक्ति रहते Gujarat An eGangotri Initiative
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४८० | श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) किन्दप वेद नहीं । ( वेद, पुराणके मतमें सभी शाखाएँ हैं ) ( ६४ ) भी तो जो स्वधा ( मृतपितृश्राद्ध ) से विवर्जित हैं ( ६४ ) अग्निहोत्र भी, करके जिनका नहीं, केवल आगमें घी या सुगन्धित सामग्री डालनेसे को वायुकी शुद्धिमात्र मानते हैं, जिसका नाम अग्निहोत्र ही नहीं । रोग पू जो कामाचाररत ( अपनी इच्छानुसार करनेवाले, अथवा विधवाविवाह - नियोगादिमें परदारलम्पटता प्रचलित करके कामको प्रोत्साहन देते हैं ) ( ६५ ), जो शक्तिकी उपासना ही नहीं शिव मानते ( ६६ ) ऐसे नारकी जीव कौनसे सम्प्रदाय के हैं; यह रखते । वादीका हृदय स्वयं जानता होगा । करते । हमारे अनुसार तो यहां शक्तिकी उपासनाका अर्थवाद है-का तो ' तस्मात् सर्वात्मना राजन्! संसेव्या परमेश्वरी ' ( १२२६६ ) ' नित्या चोपासना शक्तेर्यां विना तु पतत्यधः ' ( ६६ ) । इन पद्योंमें चाहते (. ) तथा ' कृष्णावतार- पर्यन्तं कुम्भीपाके भवत्स्थितिः ' ( ८८ ) में मण्डन श्रवतारसिद्धि, श्रीकृष्ण भगवानका अवतार होना, तथा दका स कुम्भीपाक आदि नरक भी सिद्ध हो रहे हैं । वादी भी नरकलोकको सम मानता है; तभी उसने पं. अखिलानन्दजीको ' नरकगामी ' यापि ( नी.क्षी. वि में. ) लिखा है । सो वादी पुराणविरुद्ध वादोंमें आस्था T नहीं होने से अपना स्वप्रमाणित पद्योंमें कुम्भीपाकसे आना और नाय उसके संस्कार अभी तक भी रखना सिद्ध कर रहा है । देखिये-िश्वास पुराणकी कितनी दूरदृष्टि है । पुराणविरोधियोंको उसने पहले से की ही भांप रखा है, कि - यह किसीको भी नहीं मानते ।.. र ईंट - पत्थर कोई भी नहीं पूजता । पूजक लोग शिव तथा CC - 0. Ankur Joshi मूर्ति पूजाका रहस्य [ ४८१ देवीको उसके माध्यमसे पूज रहे होते हैं । साकारमूर्तिपर साकार पुष्प आदि चढ़ता है; उसमें स्थित निराकार - सत्तापर निराकार श्रद्धा चढ़ती है । वादी यदि अपने गुरुके गलेमें पुष्पमाला चढ़ाता हैं; तो क्या माना जावे कि वह गुरुके हाड - माँस चमड़े नस-लहूपर फूल चढ़ा रहा है क्या यही उसका लक्ष्य होता है? स्वा. द. जीने भी स.प्र. में लिखा है- ' जिनको तुम बुतपरस्त समझते हो; वे भी उन मूर्तीको ईश्वर नहीं समझते, किन्तु उनके सामने परमेश्वरकी भक्ति करते हैं ' ( १४ समु. प्र. ३४५ ) । वादी जव सन्ध्याके अन्तमें ' नमः शम्भवाय च ' यह नमस्कारमन्त्र पढ़कर महादेवको वारम्वार नमस्कार करता है; तो उसके सामने या तो दीवार होती है, या पृथ्वी, या श्राकाश । तब वह क्या उस ईंट - पत्थर की दीवार, वा जड़ तेज वा आकाशको नमस्कार कर रहा होता है? यदि ऐसा हो तो बधाई हो; वादी भी मूर्तिपूजक, * ईंट - पत्थरपूजक बन गया; जोकि जडको माथा टेककर नमस्कार कर रहा होता है । यदि वह कहे कि - नमस्कार ' के समय ईंट - पत्थर सामने होनेपर भी वे हमारे नमस्कारके लक्ष्य नहीं होते; किन्तु ईंट-पत्थर आदि में व्यापक परमात्मा ही ' नमः शम्भवाय च ' से नमस्कारका विषय होता है, क्योंकि अङ्गीकी पूजा बिना श्रङ्ग-पूजाके हो ही नहीं सकती । गुरुकी आत्मा पर पुष्पमाला चढ़ ही नहीं सकती, इसलिए अङ्गी उस आत्माके चंङ्ग गले आदि पर ही. पुष्पमाला सम्मानार्थ डाली जाती है; इसलिए उस परमात्मा के . स ०६० ३१ Collechon Gujarat. An eGangotri Initiative
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४८२ | श्रीसनातनधर्मा लोक ( ६ ) अङ्ग पृथ्वी - तेज - आकाशादिको उनके सामने उपस्थित होनेसे अनिवार्यतया उनको नमस्कार हो जाती है, पर लक्ष्य व्यापक परमात्मशक्ति ही होती है '; तो भैया, आप भी तो हमारे मार्गपर पहुँचे हुए मूर्तिपूजक ही हैं । केवल मुँहसे वह सिद्धान्त नहीं मानते, कि कहीं हमारी किरकिरी न हो जाय । देखिये आपकी दूसरी मूर्तिपूजा - स्वा. द. जीके ' मनसा-परिक्रमा मन्त्रोंके अनुसार जब वादी ' प्राची दिगग्निः ' मन्त्र बोलकर सामनेकी दिशांमें मुख करके अग्नि- परमात्माका ध्यान करता है, उस समय वह भी मूर्तिपूजा जैसा हो जाती है, क्योंकि उस समय वादी अन्य दिशाओं में व्यापक परमात्माका ध्यान न कर सकनेसे उस परमात्माको केवल अपने सामने की दिशामें पधराता है । जब वह दाहिनी ओर इन्द्रदेवका ' दक्षिणा दिगिन्द्रो ' से ध्यान कर रहा होता है; उस समय सामने, वा पीछे, वा वाएँ व्यापकका ध्यान न कर सकनेसे परमात्माको दक्षिणमें ही पधरानेसे मूर्तिपूजक - सा हो जाता है, क्योंकि-सर्वव्यापकको वह एक दिशाके भी नियतस्थान में पधरा देता है । इस प्रकार जब वह अपने पृष्ठभाग में वरुणदेवका, वा बाई ओर सोम देवताका, और पृथिवीमें विष्णु - देवताका और आकाश में वृहस्पतिका ध्यान करता होगा; तब उस समय सर्वव्यापकको उस एकदेशमें ही सीमित कर देनेसे उस एक समयमें अन्यत्र ध्यान न कर सकनेसे वादी- द्वारा यह मूर्तिपूजा ही हो जाती है । आप लोग जो झण्डाभिवादन, भण्डेके आगे प्रार्थना कर CC - 0. Ankur Joshi Collection पथिकका भ्रम हे होते हैं; तब क्या वह कपड़े को नमस्कार वा प्रार्थना -होते हैं? ला लाजपतराय की प्रतिमापर फूल चढ़ा रहे का में ..क्या उस समय वादी पत्थर की पूजा कर रहे होते होते । स्थान समान उत्तर होगा । हैं? दे ( ६३ ) अश्वमेध यज्ञ वैदिक है; तब क्या वेद भी वाममा प्रन्थ है? शेष रहा - अर्थ बदलना; वह तो स्वा. द. तथा श्रा समाज आदिका भी बदला जा सकता है । कभी शतपथ प्रमंत्र बन बैठता है, कभी वेदविरुद्ध । अपनी मर्जी है, जिसे ट चाहे माने, जिसे चाहे न माने । इस प्रकार तो छोटा बच्चा I दूसरेका खण्डन कर सकता है । शरीरसे दूध निकलना, मृत गन्ध आना अश्लील वा घृणित अर्थ कैसे है? यहाँ ज़ैमिनीय - अश्वमेधसे प्रमाण भी दे चुके थे; इसलिए उस पोखें ' मेध्य ' ( पवित्र ) कहा जाता था । उनकी रक्तादिरूपमें अपवि क नष्ट हो जाती थी । जैसे कि किन्हींके मतानुसार रक्त दूधह परिवर्तित होकर स्तनोंमें आकर शुद्ध हो जाता है । राष्ट्र अश्वमेघः ' आदि अर्थ नहीं हैं, किन्तु भक्तिवाद ( श्रर्थवाद ) कृत उसे वैसा कहा जाता है । यह ब्राह्मणभागकी शैली है, तभी क श्रीयास्कने भी ब्राह्मणभागकी आलोचना करते हुए लिखा है-" बहुभक्तिवादीनि हि ब्राह्मणानि भवन्ति ' ( ७/२४५६ ) । प्रान स्वा कहता है- ' आयुर्वै घृतम् ' ( कृ.य. तै.सं. २ शशश २ ); तब क्या बड़े मा घृतको आयुका पर्यायवाचक मान लेगा? न जोकि अश्वकी हिंसाका वादी निषेध बताता है, यह इति Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) ४८४ ] नाका वैदिक - हिंसा हिंसा नहीं हुआ करती - ' श्राम्नायवचनाद् पर रहे होते अहिंसा प्रतीयेत ' ( निरु. १/१६ | ६ ) यही बात वादीके स्वामीने. भी. हैं? दो ' अहिंसन् सर्वभूतानि अन्यत्र तीर्थभ्यः ' ( छान्दो. ८७ ) का अर्थ करते हुए लिखी है - ' तीर्थेभ्यो वेदादिसत्यशास्त्रविहितेभ्योऽन्यत्र नाममाक श्रहिंसाधर्मो मन्तव्यः ' ( शता. सं. पू. ६२७ ) मनुस्मृति में भी लिखा तथा श्रा ६- या वेदविहिता हिंसा नियतास्मिँश्चराचरे । अहिंसामेव तां पथ प्रमण विद्याद् वेदाद् धर्मो हि निर्बभौ ' ( ५।४४ ) इसपर श्रीकुल्लूकभट्टने जिसे प टीका की है— ' या श्रुतिविहिता कर्मविशेषदेशकालादि - नियता-बच्चा अस्मिब्जगति - स्थावरजङ्गमात्मनि, अहिंसामेव तां जानीयात्, बा, कपूरह हिंसाजन्याऽधर्मविरहात् ……………. यस्माद् अनन्यप्रमाणको धर्मो यहाँ वेदादेव निःशेषेण प्रकाशतां गतः ' । पूर्वोक्त निरुक्त - वचन पर श्रीदुर्गाचार्यने टीका की है- ' आह-श्रपरि कथमहिंसा? प्रत्यक्षतो हि छिद्यते वृक्षः? शृणु - इयमहिंसा, इयं दूधर्ष हिंसा - इति श्रागमाद् एतत् प्रतीयते । प्रतिविशिष्टश्च अयमेव वैदिक रा । आम्नाय श्रागमः एतत्पूर्वकत्वाद् अन्येषामागमानाम् । स एव र्थवाद || कृत्स्नस्य जंगतः प्रतिविशिष्टाय श्रेयसेऽभ्युद्यतः सन् हिंसायां तभी कर्तारं विनियोच्यत इति कुत एतत्? नूनमियम हिंसैव ' । लिखा है- वेदा. ३ | १ | २५ सूत्रकी व्याख्या करते हुए श्रीशङ्कराचार्य-71 प्रह्मा स्वामीने लिखा है- ' यत् पुनरुक्तम् - पशुहिंसादियोगाद् अशुद्ध-क्या मध्वरिकं कर्म तस्य अनिष्टमपि फलं कल्पते इति, तत् परिहिय़ते-न, शास्त्रहेतुत्वाद् धर्माधर्मविज्ञानस्य । अयं धर्म '; अयमधर्मः ही इति शास्त्रमेव विज्ञाने कारणम्, अतीन्द्रियत्वात् तयो; हिंसा भी हिंसा [ ४८५ ( धर्माधर्मयोः ) अनियतदेशकालनिमित्तत्वाच्च । यस्मिन देशे, काले, निमित्ते च यो धर्मोऽनुष्ठीयते, स एव देशकालनिमित्ता-न्तरेषु अधर्मो भवति । तेन शास्त्राद् ऋते धर्माधर्मविषयं ज्ञानं न कस्यचिदिति ' । गो. श्रीवल्लभाचार्यको छोड़कर शेष सभी श्राचार्योंने इस सूत्र की ऐसी ही व्याख्या की है । इसकी स्पष्टता हमने ' आलोक ' ( ६ ) ' याज्ञिकपश्वालम्भ ' तथा ' आलोक ' ( ७ ) ' वेदसंज्ञाविमर्शपर विचार ' के अन्तिमभागमें की है । · तात्पर्य यह है कि - जिसमें मारनेका उद्देश्य होता है, मानसिक द्रोह होता है, वह हिंसा हुआ करती हैं, पर जहां यज्ञ वा संग्रामयज्ञ उद्दिष्ट हो; वहां हिंसा नहीं मानी जाती । ' माहि सः पुरुषं ' ( यजु: १६ ३ ) यह वेदमें लिखा है; और फिर क्षत्रियकेलिए " लिखा हो कि युद्ध करो; शत्रुको, अत्याचारीको मारो; तो क्या यह विरोध हो जावेगा? युद्ध में हिंसा होती हुई भी न्याय्य होती है; तभी तो युद्ध करनेवालेको हिंसा करनेसे फाँसी न देकर इनाम ही दिया जाता है । पशुबलि देनेवाले भी प्रार्थना करते हैं कि इस पशुको मारो नहीं । जो कि - ' ये वाजिनं परिपश्यन्ति पक्वं मन्त्रका वादीने स्वा.द. अथवा श्रीजयदेवका अर्थ दे दिया है, यह अपने दृष्टि-कोका अर्थ है, वह माननीय नहीं हो सकता । मैं किसी बातको किसी मन्त्रसे · सिद्ध करूँ, फिर लिख दूँ कि यही अर्थ श्री माधवाचार्यजीने भी लिखा है, तब क्या बादी उसे मान लेगा? इसी तरह वादी अपने पक्षवालोंका अर्थ देकर अपना CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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४५६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) पक्ष, सिद्ध - समझ लिया करता है, पर इसमें उसके पक्षका महत्त्व कुछ भी नहीं हो सकता । .. ( ख ) अश्वके साथ वादी के अनुसार कोई भी महिषीका प्रसङ्ग नहीं कराता । प्रसङ्ग हो सकता भी नहीं । घोड़ा उस समय मृतक होता है, सो उस समय सम्भोग कैसे हो सकता है; जबकि-वह जीते हुए से भी नहीं हो सकता । यह हम कई वार सप्रमाण कह चुके हैं । वादी कई बार समझाये जानेपर भी उसमें प्रत्युत्तरकी शक्ति न होनेसे दूसरेकी बात न सुनकर स्वयं ही स्त्रियोंका अश्वसे सम्भोग करानेपर लट्ट हैं । भला वह मरे हुए घोड़ेसे प्रसंग कैसे कराएगा? फिर वह विधवा - विवाह क्यों कराता है? उस स्त्रीका मरे हुए पतिसे प्रसङ्ग करा दे? स्वाद का वादीसे उद्धृत कथन भी झूठा है; जबकि घोड़ा मृतक होता है यह शास्त्र और इतिहास बताते हैं, जिसे हम ' आलोक ' ( ५-६ ) में सिद्ध कर चुके हैं, तब स्वा. द. की सुनी - सुनाई निर्मूल कहानी स्वयं घड़ी हुई गप्प प्रतीत होती है, अतः निष्प्रमाण होनेसे माननीय नहीं । घोड़ेकी उस समय मृतकता वादी इसलिए छिपाता है, कि -इससे उसके प्राक्षेप धराशायी हो जाते हैं, तब ' बलात् घोर राक्षसी कम कराने केलिए वह क्यों उत्कण्ठित होता है? मृतक - श्रश्वमें गणपतिका आह्वान है - उसीके तेजकी प्रार्थना है - यह हम ' आलोक ' ( ५ ) प्र. ७८०-८१-८४-८६ में लिख चुके हैं; वादीसे उद्धृत पं ० कालूरामजी तथा पं ० ज्वालाप्रसादजीके लेखसे भी हमारी एकवाक्यता हुई । श्रीमहीधरको भी अश्वमें CC - 0. Ankur Joshi Collection पथिकका भ्रम वहीं प्रजापतिरूप गणपति इष्ट है, तव वादीका श्री महीधर गाली देना दुस्साहस ही है । ( ग ) ' संज्ञपयति ' में हमने मित्संज्ञक ' ज्ञा ' भ ' मारण ' पाणिनि - धातुपाठ से स्वा. द. - संग्रहीत धातुपाठ धातुका श्री g आख्यातिकसे, सिद्धान्तकौमुदी भ्वादिगण से दिखलाया उ वादी उसे छिपा गया । बाकू कहती है- ' अहं संज्ञायामि था; प ' वाक्का ' प्रतिपादन ' अर्थ ठीक है, वहाँ ' मारना ' अर्थ कैसे ' में नि हो!! ' सैन्धव'का यात्राकालमें ' घोड़ा ' अर्थ हो; तो यह धानात श्र नहीं कि -- भोजनकालमें भी उससे घोड़ा लाया जाय । वादीका ' तेन संज्ञपयामि ' आदि उद्धरण व्यर्थ है । शतपस्य श्र भी हमने ' हनन ' अर्थ में प्रमाण दिया था । बा श्री जो कि वादी शतपथके ‘ संज्ञप्तेषु पशुषु ' इस स्थलको रू जि “ अश्वस्य शिश्नं महिषी उपस्थे निध ' इस वाक्यको मंत्र बात मानता है; सो उत्तरकी शक्ति न होनेसे यह न करेगा; वाद बेचारा और क्या करेगा? या तो यह लोग अर्थ बदल दल या प्रक्षेप कह देते हैं, या आलङ्कारिकता वता देते हैं, अन्य गयं बेचारों के पास है ही क्या? ' ऊपर के छादक वस्त्रसे से श्रीर आच्छादित करते हैं; ऐसा हो जानेपर अश्व का सबको वाद भांति ज्ञान कराते है । अवको आच्छादित कर उसका इ कराना - यह वादीका अर्थ तो सुवर्णपदक देने योग्य है । यजु ( अश्वमहिष्यौ ) अधिवासेन सम्प्रोग्णुर्वन्ति ' का ' महिषी त किन्न अश्वको पृथक् - पृथक् वस्त्र प्रदान कर ' यहाँ पृथक् - पृथक् क | महं Gujarat. An eGangotri Initiative