सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 311–320

सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 311–320

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श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) १८४ ] कोई ( १२ ) टं. प. के सम्पादक ' द्विर्वचनेचि ' सूत्रमें श्रीदीक्षित कसूत्रमें 1 न ' पदान्त ' सूत्रसे ' न ' की अनुवृत्ति मानकर पहले गुण-द्वारा निषेध करनेपर उसे भाष्यानभिज्ञ एवं मूर्ख बताते जातिय वृद्धि आदि क्योंकि हैं और भाष्यानुसार परत्वसे गुणवृद्धि करके रूपातिदेशपक्ष 7 अर्थ? ठीक मानते हैं ' । होता है इसपर हम कहते हैं कि - यदि भाष्यकार अपनी शैली से जातिए किसी बातको लिखते हैं; और कौमुदीकार सुगमतार्थ उसे - तब उस कचित् अन्य शैलीसे कह देते हैं, तो इसमें हानि क्या है? इसमें एक साहिल काशिकाकार तथा स्वाद जीका हम भाष्यकारसे भिन्न शैली-वह चित्र्य उदाहृत करते हैं । ' आख्यातिक ' ( पृ. ३८७ ) में स्वामी-जाविल्स ने ' वा यौं ' ( २।४।५७ ) सूत्रका अर्थ कौमुदी कारके अनुसार लिखा इस पु है - ' यु ( ल्युट् ) हो तो अजधातुको ची विकल्पसे हो । प्रवयणम्, पुंयोग प्राजनम् ' । जाि परन्तु भाष्यकार ने इसपर लिखा है- ' नेयं विभाषा, किं तर्हि? - माना है । आदेशोऽयं विधीयते । वा इति प्रयमादेशो भवत्ति, अजेय बदला परतः । वायुरिति ' । तब भाष्यसे विरुद्ध उक्त सूत्रकी भिन्न - साहिल व्याख्या करते हुए ' स्वा. द. जी क्या भाष्यानभिज्ञ एवं मूर्ख हैं? । आष्टा पर हम तो कौमुदीकारका इसमें यह अभिप्राय समझते हैं कि-' वायु ' को ' कृपा ' इस औणादिक सूत्रसे उण और युक् करनेमें डी अधिक लांघव है । भाष्योक्त प्रकारसे ' यु ' प्रत्यय किसी से प्राप्त नहीं; उसे बाहुलकसे करना पड़ेगा । फिर ' यु ' को ' अन ' का निषेध बाहुलकसे करना पड़ेगा यह गौरव है । " बा ' का ' विकल्प ' CC - 0. Ankur Joshi ' द्विवचने चि ' के अपर विचार [ ५८५ ' थें करनेपर ' प्रवयणम् ' प्रयोग भी बन जावेगा । इसी लाघवकेलिए ' द्विर्वचनेचि ' से पूर्व ठहरे हुए ' न पदान्त ' सूत्रसे ' न ' की अनुवृत्ति श्रीदीक्षितने ली; और ' अचः परस्मिन ' उसे ' अच ' की; तथा ' स्थानिवदादेशः ' से ' श्रादेशः ' की अनुवृत्ति ली । अव अर्थ हुआ - ' द्वित्वनिमित्तेऽचि परे च आदेशो न स्याद् द्वित्वे कर्तव्ये ' । तब चाहे ' अजादेश स्थानिवत् ' हो, यह रूपातिदेशपक्ष स्वीकृत कर लिया जावे, चाहे प्रदेशनिषेघपक्ष मान लिया जावे; फल दोनों स्थान तुल्य है । आदेशनिषेधपक्ष भी भाष्या-रूढ है | देखिये - वहाँका भाष्यका एवं तर्हि प्रतिषेधः प्रकृतः, सोऽनुवर्तिष्यते । क प्रकृतः? ' न पदान्तद्विर्वचनेति द्विर्वचन- निमित्ते अचि श्रच प्रादेशो न भवति ' ( ११२५६ ) इससे ' न ' की अनुवृत्ति ' मान ली गईं, ' स्थानिवत् ' की अनुवृत्ति नहीं मानी गई । जैसाकि इस चतुर्थपक्ष के स्वीकार - भाष्यपर श्रीकैयटने प्रदीप में लिखा है — ‘ एवं तर्हीति— । ' स्थानिवदिति नानुवर्तते इति भावः ' । बात भी ठीक है, नहीं तो श्रीप्रारिणनि ' द्विर्वचनेचि ' सूत्रको ' न पदान्त ' ' इस निषेध - सूत्रसे पूर्व लिखते । न लिखनेसे स्पष्ट है कि-श्रीपारिपनिने भी ' द्विर्वचनेचि ' को निषेधसूत्र रखा । " यदि यह पक्ष भाष्य में सर्वथा न होता; तब उससे विरुद्ध ' प्रदेशनिषेधपक्षको लिखना श्रीदीक्षितका स्वेच्छाकंल्पित कहा " जा सकता था, पर अब भाष्यमें उसका मूल मिलनेसे उसे " निर्मूल नहीं कह सकते । यदि फिर भी उसे प्रमाणित न माना Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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५८६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) जावे; तो आख्यातिकमें स्वाद जीने ' अभूत् ' में भाष्यकार ' भवतेश्चापि [ ईट् - प्रतिषेधो ] न वक्तव्यः । द्वि - सकारको निर्देशः ' इस कथनसे प्रत्याख्यात ‘ आहिभुवोरीट्प्रतिषेध: ' इस वार्तिकको भाष्यकारसे विरुद्ध प्रवृत्त कर दिया । यदि इसे ' अस् ' के ' भू ' के लिए माना जावे; तब भी भू धातुपर उक्त वार्तिकका प्रवर्तन ठीक न हुआ; और ' द्विसकारको निर्देश: ' इस भाष्यका अनादर करके ' अस्ति - सिचः ' का भाष्यप्रोक्त अर्थ न करके उन्होंने क्यों . उसके विरुद्ध उक्त वार्तिक प्रवृत्त कर दिया । इसमें अद्वितीय- वैयाकरण म.म. पं ० शिवदत्तजीकी भी . साक्षी देखें । वे तत्त्वबोधिनीकी टिप्पणी में लिखते हैं- ' भाष्य-कृता प्रत्याख्यातेन ' ' आहिभुवोरीट - प्रतिषेघः ' इतिवार्तिकेनात्र - ईंट वारयन्तो वेदाङ्गप्रकाशकर्तारो भाष्यमर्मानभिज्ञा एव । • भाष्ये स्थानिवद्भावदूषणप्रकरणे अस्य वार्तिकस्य पाठाद् आदादि-के अस्त्यादेश - भूधातावेव स्थानिवद्भावेन अस्तित्वात् प्राप्तस्य ईंटो वारणायैव तद्वार्तिकवचनात् । सिनिमित्तकवारणाय तदा-रम्भे तु अगात्, अपात् इत्यादौ ईंटो दुर्वारत्वापत्तेर्भाष्योक्तस्य ' विद्यमानादित्यर्थकसकारान्तादिति सिचो विशेषणस्यैव अवश्य-मङ्गीकारः करणीयः । श्रात्थ - इत्यत्र दीक्षितोक्तेरेव स्वयमङ्गीकृत-त्वाद् अभूद् - इंत्यत्र दीक्षितोपन्यस्तभाष्योक्तप्रत्याख्यानरीत्यनङ्गी-- कारः, आत्थ इत्यत्र दीक्षितोपन्यस्तभाष्योक्तप्रत्याख्यानरीत्यङ्गी-: - कार इत्यर्धजस्तीयत्वाद् हेयैव वेदाङ्गप्रकाशरी तिरिति दिक् ' । इस - प्रकार- यदि दयानन्दी उक्त भाष्यविरोध सहा करते हैं, तब श्री-' द्विर्वचनेचि ' पर विचार दीक्षितका ‘ द्विबँचनेचि ' सूत्रका अर्थ क्यों सह्य नहीं? फलतः श्रीदीक्षितने आदेशनिषेधपक्षको ही स्वीकृत किया है, क्योंकि आदेश करके फिर स्थानिरूप सुगमताई जावे; उसकी अपेक्षा आदेशनिषेधपक्ष मानकर पहले माना ही आदेश न किया जावे- इस पक्ष में लाघव है । बिना कारण की हाथ काले करके फिर उन्हें धोनेकी अपेक्षा कीचड़को चड़वे लगाना ही ठीक है । हाथ र इसके प्रकृतसूत्र के आख्यातिक ' ' में दिये गये उदाहरणसे मं हमारी बात स्पष्ट हो जावेगी । ' दधतुः ' में पहले स्वा. द. जीरे ' धा - अतुः’में ‘ आतो लोप ' ( ६ | १ | ६४ ) से. ' अ ' का लोप करें .‘द्विवेंचनेचि ' से ' आ ' को फिर लाकर द्वित्व किया । फिर दूसरे ' धा ' के ' आ ' का लोप किया । इससे अच्छा यही था कि पहले - ' आ ' का लोप ही न किया जाता । द्वित्वके बाद ही पर - का लोप कर दिया जाता । - इस प्रकार ' द्विर्वचने चि'का ' न पदान्त ' इस निषेधसुतां । : अनन्तर पढ़ने का लाभ भी सिद्ध हो जाता है कि - यह भी निषेद-सूत्र वन गया । सबकी अपनी - अपनी शैलियां वा रुचियां हुआ करती हैं । इस प्रकार ' एधाञ्चक्र ' में भी ' आख्यातिक ' में द्विर्वच को बाधक परत्वसे यणादेश करके उसको स्थानिवत् मान पुनः द्विर्वचन होता है ' ( पृ. १७ ) इसमें भी वही गौरव है । वह तो इस लाघवका महाभाष्यकारने चतुर्थपक्षमें स्वयं अङ्गीका किया है - यह हम पूर्व वह भाष्यपाठ उद्धृत कर ही चुके हैं । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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[ 5 ] श्रीसनातनधर्मालोक ( C ) ५८८ महान् वैयाकरण तत्त्वबोधिनीकार श्रीज्ञानेन्द्र-इसपर सुगमताबे सरस्वती ने भी स्पष्ट ही लिखा है- ' यद्यपि इह वृत्त्यादौ ' अजादेशः रूप माना स्थानिवत् स्यात् ' इति रूपातिदेशपक्षः स्वीकृतः, फलं च उभयत्र ही आदेश तुल्यम्; तथापि आदेशनिषेघपक्षोपि भाष्यारूढः - इति, स एबात्र कीचड़ स्वीकृतः । किञ्च - ' आदेशमङ्गीकृत्य पुनः स्थानिरूपाश्रयणापेक्षया को हावर निषेधपरतया व्याख्यानमेव लघुः ' प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरम् ' इति न्यायात् । ' न पदान्तेति निषेधानन्तरं पाठोपि एवं रसे में सति श्रनुगृहीत इति श्रेयान् श्रयं ' पक्षः ' । जब एक विद्वान् वाद. बरे वैयाकरणने भी इसका समर्थन किया है, तब इसमें श्रीदीक्षितका पक भाष्यविरुद्धता नाम देना ठीक नहीं । फिर दूसरे परम - वैयाकरण श्रीभैरवमिश्र ने भी ' तन्निषेघे ' इस लघु-कि पहले शब्देन्दुशेखरके प्रतीकको लेकर लिखा है- " एवं व्याख्यानेन पर मृलोक्तं ' द्विर्वचननिमित्ते अचि योऽजादेशः प्राप्तः, स नेति व्याख्यानमेव युक्तम् - इति ध्वनितम् । अतएव ' नं पदान्तेति नषेघसूत्र सूत्रानन्तरमस्य सूत्रस्य पाठः साधु सङ्गच्छते । ब्थानिवद्भाव-नी निषेव- परत्वेन व्याख्याने द्विर्वचनात् प्राकू तत्तदादेशस्य प्रवृत्तिः चियां हुआ स्वीकार्या । पश्चात् स्थानिवद्भावेन रूपातिदेशपर्यवसायिना द्विर्वच तन्निवृत्तिः कार्या । रूपातिदेशे अचीत्यस्य ज्ञापकता स्वीकार्या । मानका क्लृप्तस्य शास्त्रातिदेशस्य कार्यातिदेशस्य वा त्यागः स्वीकार्यः । है । बह ' प्रक्षालनाद्भि पङ्कस्य ' इत्यस्य लोकप्रसिद्धन्यायस्य विसेधश्च श्रङ्गी स्वीकार्य इति महागौरवमिति भावः । फलतः दयानन्दीका उक्त के हैं । पक्ष गौरवग्रस्त होने से हेय ही है । CC - 0. Ankur Joshi स.प्र. में अशुद्धियाँ [ ५८६ इस प्रकार स्वा.द.के आख्यातिकमें तो ' पिपूधि ( जु. ), लीढासि ( अ. ), ' सास्मयैते ' ( ‘ गुणोर्ति ' से गुण ) व तामास, वर्तृ तिष्यति, स्तरिषीष्ट - स्तृषीष्ट ( ऋचादि ), जिगेथ - जिगिथ ( पृ. १०२ ) आदि बहुतसी अशुद्धियां हैं, हमने ' लोकालोक में उनका दिग्दर्शन करा दिया है । आख्या के छठे संस्करण में कई दयानन्दियोंने उन अशुद्धियोंके संशोधनका प्रक्षेप करके स्वा. द. जी की परमवैया-करणता पर चोट मारी है । उनकी अन्य पुस्तकोंकी अशुद्धियों-का भी हम स्थालीपुलाक - न्यायसे दिग्दर्शन करते हैं । ( १३ ) स. प्र के. १ म समुल्लास ( पू. ११ ) में ' न्याय ' की सिद्धि कर हुए स्वामीने लिखा है- ' णी पणे ' इस धातुसे ' न्याय ' शब्द सिद्ध होता है ' । कितनी व्याकरणानभिज्ञता है । ऐसा मानने पर ' नाय ' बनता है, ' न्याय ' नहीं । यहां तो परिच्यो-र्नीणोद्यूता श्रेषयोः ( ३।३।३७ ) से निउपसर्गपूर्व इण धातुसे घबू में रूप बनेगा- ' नियमेन ईयते इति न्यायः ' । ( १४ ) ' सविता ' में स.प्र. ( पृ. ७ ) में सुनोति और सूते धातुका प्रदर्शन किया गया है, सो ठीक नहीं । यह धातुएँ, अनिट् वा वेट् हैं । वेद ' सविता ' में ' धू प्रेरणे ' धातुका प्रयोग मानता है ' सुवतु-प्रचोदयात् ' आदिरूपमें । यह नित्य इट्वाली धातु है - इस धातुका उक्त प्रयोग है । इस विषय में ' आलोक ' ( ५ ) पृ. १७३-१७६ देखना चाहिये । *. ( १५ ) स.प्र. ( पृ. ( १२ ) में ' महादेव'का विग्रह ' महतां देवः ' किया है, ऐसा होनेपर - समानाधिकरणता न होनेसे आकार नहीं Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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५६० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) हो सकता; ' महद्दवः ' बन जायेगा । ' यह विग्रह नहीं है ' यह वादीका बहाना ठीक नहीं; फिर संस्कृतमें लिखनेकी क्या आवश्यकता थी, हिन्दीमें अर्थमात्र लिख देते । ' महा ' यह प्रकृत्यन्तरकल्पना अपाणिनीय है; अनुमानिक होने से व्यभि-चारिणी है । स्वा. द. जीने पाणिनिसे भिन्न व्याकरणोंको कभी आश्रित नहीं किया । वेदमें ' महा ' यह ' छन्दसि तु दृष्टानुविधिः ' को चरितार्थ करता है, लोकमें वह गृहीत नहीं । ( १६ ) ' वरेण्यं -वर्तुमर्हम् ' ( स.प्र. ३ पृ. २१ ) यहां ' वरीतुं ' चाहिये । अनित्यताके समाधान ' न ह्येषा इष्टि: ' इस भाष्यवचनसे बाधित हैं । इस प्रकार ' दीव्यते ' आदि अन्य भी अशुद्धियां हैं । ( १७-१८ ) अब कुछ ऋग्वेदादिभाष्यभूमिकाकी अशुद्धियाँ भी दी जाती हैं - ' ईश्वरस्य सहायेन प्रयत्नोऽयं सुसिंध्यताम् ' यहां ' साहाय्येन ' चाहिये | अन्तरेणापि भावप्रत्ययं गुणप्रधानो भवति निर्देश: ' यह भाष्यकथन एकदेशी है; नहीं तो ' तस्य पाण्डित्यं सुप्रसिद्धम् ' के स्थान ' तस्य पण्डितं सुप्रसिद्धम् ' पाठ भी ठीक हो जावे । ‘ सिध्यताम् ' यह आत्मनेपद भी अशुद्ध है । ( १८ ) ' प्रेरयित्वा ” ( पृ. १८ ) यहां ' ल्यंपू ' चाहिये । कई किये जानेवाले समाधान ' न ह्य ेषा इष्टिरस्ति ' इस भाष्यवचनसे बाधित हैं । ( १६ ) ‘ विधत्तः ’ ( पृ. ३६ ) यहां क्तमें ' विहितः ' चाहिये, ' दा'को तो ' दद्द् ' कां विधान ' है, ' धा ' को नहीं । ( २० ) ' प्रतिपादितुम् ' ( शता. पृ. ३३ ) यहांपर इंट होनेसे शिका लोप नहीं हो सकता । ( २१ ) ' मित्राणि ' ( पृ.७६ ) शाखापत्र ( पृ. ४०४ ) इन प्रयोगों में ' तू ' का लोप नहीं हो सकता । CC - 0. Ankur Joshi Collection ऋभाभू. में अशुद्धियाँ इस प्रकार ' शीददाति, सन्तानानि कुर्यावहि, श्रयमाशीनंद ददामि, संस्कृता - प्राकृताभ्यां यद् ' न्यायेति, मातृपितृ वादियोंके शब्दों में अद्वितीय - व्याकरणद्रष्टा स्वामीकी शुद्धियाँ हम ' लोकालोक ' में दिखला चुके हैं । १ ९ यह अशुद्धियां दिखलाना न चाहते थे; पर हम स्वा दु.बी . इन दयानन्दिके हमें वैसा करने को विवश किया है । यदि यह कहा जावे कि - ' स्खलनं हि मनुष्यधर्मः न्यायसे स्वा.द.जीसे यह भूलें हो गईं, यह हम भी मानते है । तब इससे यह भी सिद्ध हो जाता है कि जो स्वामीजीने ‘ वैदिक - सिद्धान्त ' रखे हैं; वे भी स्खलनमूलक हो सकते असे अतः वे सभी ठीक हों, यह आवश्यक नहीं । उनमें भी । स्खलित हो गये । जो दयानन्दी विद्वान् स्वामीजी की भूलें देखा इन वेदाङ्ग - प्रकाशोंको स्वा. द. जीसे बनाया हुआ नहीं मार्ग घ तब क्या वे यह सिद्ध करना चाहते हैं कि -स्वा. द. जीसे मूर्त ते ही नहीं सकतीं? ऐसा सम्भव नहीं; इसलिए उन्हें ' व्याकरले ल द सूर्य ' आदि बताना यह सब व्यर्थकी बातें हैं । च उनके अनुयायी यह सब इसलिए करते हैं कि कई सि स्वा. द. जी की हम लोगों से बनाई ' दुकानदारी ' को धक्का न ले, दा और चेलोंके पेट भरते चलें । यदि वे पुस्तकें स्वा. द. जीसे नई दा बनाई गई हैं, किन्तु उनके शिष्य श्री भीमसेनजी द्वारा बनाई रख गई हैं; जो बादको सनातनधर्मी होगये थे; और उनने स्वामीर्ड की गलत बातोंका ख़एडन किया; तो फिर यह सममना पड़ेग Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 315

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५६२ / श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) कि - सत्यार्थप्रकाश तथा भाभू. आदि अन्य पुस्तकें भी स्वा.द.-यमाशी शेंद जीकी बनाई हुई नहीं हैं, किन्तु श्रीभीमसेनजी पितृ श्र बनाई हुई हैं । अब यह दयानन्दी - साहित्य दयानन्दजीका आदि कीन की १२ होकर श्रीभीमसेनजी आदिका ही मान लेना चाहिये । श्री-भीमसेनजीको ही आर्यसमाजका सर्वे सर्वा मानना चाहिये । मानन्दिवारी क्या आर्यसमाज इस घोषणा के लिए तैयार है? पर श्री भीमसेन-जी जब इसे भ्रम समझकर छोड़ गये; और स.ध. की शरण में चले गये; अब आर्यसमाजियोंको भी इस भ्रान्त- साहित्यको मानते हैं । छोड़कर स.ध. की शरण में आ जाना चाहिये । सम्भव है, कहीं-जीने कहीं हम भी गलती में हों; पर तथाकथित महर्षिकी गलती सकते है । तोन होनी चाहिये । इस प्रकार दयानन्दी - पथिककी भी समाप्त होनेसे हम उसका प्रत्युत्तर भी समाप्त करते हैं । पुस्तक चूल देखकर जो कि वादीकी पुस्तकके सम्पादक हमारे ही मान ' विद्यार्थी ' जीने यह हम पर दोष लगाया है कि आप अपनी पुस्तकों का मूल्य से भूल लागत के दुगने से भी अधिक रखते हैं, वैसे व्याकर दानियोंसे प्राप्त कर लेते हैं ' । यह लिखा पुस्तककी लागत आ गई । वादीसे सम्पादित देखकर हमें भी हंसी कि कई सिलाई भी जुजबन्दीकी उक्त पुस्तककी पृष्ठसंख्या २३२ है, कान दाताओंसे नहीं है, जिल्द भी उसपर नहीं है । उसे ६५० ) मिले हैं, पुस्तकका खर्च जीसे में दाताओंसे सारा मूल्य प्राप्त उसका ९ ०० ) है । रा बनाई रखा है; और कहते करके भी उनने पुस्तकका मूल्य २ ) स्वामीजी हैं. कि - यह लागतमात्र है । अब वह कि उसने अपना दोष भी हम पर थोप बतावे प दिया है, वा नहीं? | CC - 0. Ankur Joshi Collection भ्रान्त पथिकं एक सहस्रके लगभग पृष्ठवाली तथा जुज्रवन्दीकी सजिल्द, सुन्दर छपाई -सफाई सिलाई, और होनेसे थोड़ी संख्या वाली, जो रखनेका स्थान न में छपती है, विशेष - विद्वानोंके पास भी जाती है । स्थायी ग्राहकोंको अमूल्य अक्षेताको हम कमीशन कमीशन भी दिया जाता है; ५-६ कापियां भी देते हैं; सरकारी पुस्तकालय अमूल्य ले लेते हैं, जिनका डाकखर्च भी हम लगाते हैं, तब उनका मूल्य लागतके मूल्यसे वह हिसाब करके बतावे । वल्कि दुगना कैसे है- यह पड़ता है; फिर भी इसमें तो ग्रन्थमालाको घाटा ‘ किमाश्वर्यमतः बादी अपना दोष हम पर ही देता है, परम् । ’ वस्तुतः इन लोगोंका काम ही सनातनधर्मियोंको करनेका रहता है; इसलिए यह कई कलङ्क कलङ्कित देते हैं, चालाकियोंके लगाते हैं, गालियां अनुभवी हथकण्डे अपनाते हैं, परन्तु विद्वान एवं तो जान ही जाते हैं कि इनका रहस्य क्या है अले लोग इनके सब्जबागोंको । पर 1. फँसते हैं; तथापि हम देखकर इनके षड्यन्त्रों में जा इन प्रतिपक्षियोंको धन्यवाद देते हैं कि-यह हमें शास्त्रचर्चाका अवसर देते हैं, पुराने दयानन्दियोंकी परिश्रम से बनी हुई - पुस्तकोंके सनातनधर्मपर को - जो हमारे पास नहीं थे किये गये आक्षेपों-उनसे दुहकर हमारे सामने विचारार्थ उपस्थित कर रहे होते हैं, और हम उनसे छिपाये पूर्वापर - प्रकरणको जनता के सामने रखकर इनके हुए उन षड्यन्त्रोंको छिन्न - भिन्न कर देते हैं, जिससे जनता इनके सथार्थ - रहस्यको स ० घ ० ३८ Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 316

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५६४ ] श्रीसनातनधर्मालोक समझ जाती है । हम परमात्मासे सुमति- प्रदान करें, जिससे यह लोग गालीगलौज आदिका प्रयोग करके पथभ्रष्ट न करें । 24 परिशिष्ट- हमने पृ. ५७६-५८६ में ( 1 ) प्रार्थना करते हैं कि इन्हें छल - कपट एवं असभ्यतासे भोली - भाली जनताको स्वा. द. जी की ' श्राख्यातिक ' व्याकरणकी अशुद्धियां दिखलाई थीं । उसपर एक दयानन्दीने की फिर टं. प. में कुछ लिखा है । उसने स्वा. द. जीकी तथा अपनी प्रत्युत्तर न देकर उनको मान ही लिया । बहुत - सी अशुद्धियोंका टं. प. के सम्पादकजी ने भी टिप्पणी में माना कि आख्यातिक-अशुद्धियोंकी शुद्धताका आग्रह नहीं करना चाहिये । आदिमें उनकी अशुद्धियोंका कहाँ तक समाधान किया जायगा? शुरू में ही देखिये- बभूविथ, बभूविवमें स्वामीने ' बभूव - थ, व’में पहले वुक् करके फिर इट् किया है, कितनी अशुद्धि है? ' चक्लृम्महे, चक्लृब्महे, जुगुब्व- जुगुम्म ' में उनका अनुनासिक और जश्त्व कर देना कितनी भारी भूल है? अपने अष्टाध्यायी - भाष्य में ‘ इण ' प्रत्याहारके उदाहरणमें ' इगो यण ' सूत्र दे दिया, जबकिं इसमें इण धातु है, प्रत्याहार नहीं । अशुद्धि सिद्ध होनेपर -स्वाद के लेखमें ' स्वार्थियों द्वारा प्रक्षेप ' कह देना यह वादी के पक्षकी निर्वलता है । यह ' अणु - वन्ति, लेयात् ' आदि अशुद्धियां उनके आदिम संस्करणसे शुरू करके ५ म संस्करण तक हैं; अतः वादीकी ' उक्त बात कहनी ' उसके पक्षकी निर्मूलताका प्रमापक है । 1 - ( १ ) अणुवन्ति ' में जबकि हमने ' तनादि ऋणु ' धातु स्पष्ट CC - 0. Ankur Joshi Collection परिशिष्ट लिख दी थी; तब उसे ' ऊणु ' का प्रयोग लिखना १६ • जनता की आंखों में प्रत्यक्ष धूलिनिक्षेप है । छठे यह बड़ी संस्करणमें उसे ठीक कर दिया गया है, इससे स्वामीजीकी से सिद्ध होगई । ( २ ) ' सुषुविषे ' में टं. प. के सम्पादकजी । अशुदि 1 कारानुसार ' युकः ' की प्रवृत्ति मानी है तब भी ने भी म रख , बादी कट कर ( ३ ) ' द्विवचने चि ' में वादीने भाष्यका उद्धरण व्यर्थ गई ' कर जबकि हमने भी लिखा था- इसमें स्थानिवत्पक्ष ही दिवा-भी है, आ अस निषेधपक्ष भी । प्रदेशनिषेधपक्षका भाष्यने कहीं किया है; हां, ' स्थानिवत् ' को ' ब्यायः ' अवश्य खण्डन कि-कहा है चतुर्थपक्षका खण्डन नहीं किया । यदि इसे भाग्यविरो मूर्खता माना जावे; तो ' वा यो'का भाष्यविरुद्ध श्रर्व ते आ उसे अपने स्वामीजीको भी ' मूर्ख ' कहना पड़ेगा । ( ४ ) ६ त्वर ' में यदि ' क्ङिति ' की अनुवृत्ति आनेन्न श्रनेके चिषव विश्व पक्ष हैं; पर स्वा.द.ने तो केवल ' कूङिति ' ही रखा है, तब बादी और ' जोज़ूर्ति ' में उनका उक्त सूत्रका प्रवर्तन अशुद्ध हुआ पाठ नहीं? पहले वादी भी अनुवृत्ति मानता था; अब हमारा iP मानकर अपनी अशुद्धि भी उसने मान ली । ( ५ ) ममार्ज - ममर्ज Tre स्वा. द. जीकी अशुद्धिको भी वह भाष्यसे शुद्ध न कर का ( ६ ) इस प्रकार लेयात् - लायात्, ( ७ ) ब्राह्मणी आदि की खास प्रश्न अशुद्धिको भी वह शुद्ध न कर सका । यहाँ स्थान न हो अधिक नहीं लिखा जा सकता । यदि आवश्यकता देखी ह आगे किसी टिप्पणी में लिखा जा सकेगा । अब हम कि Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 317

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श्री सनातनधर्मालोक ( 1 ) १ ९ ६ ] यह बा करते हैं । स्करणमे भ्रम'का उपसंहार कई कठोर शब्दोंसे घबराएँ; तो उन्हें याद अशुदि: यदि वादी चाहिये कि वे भी ' आत्मवत् सर्वभूतानि'का पाठ याद नेमी रखना उनकी ओरसे हुआ करती है, फिर हमें वैसा न्दी कट गई करें । पहल होना पड़ता है । नहीं तो उसका अथ यह हमारी ही दिव करनेको बाध्य लगाने लग जाते हैं । पथिकजी अपनी पुस्तक है, प्रकाशित सामथ्यं होनेसे पूर्व हमें मिले थे; और विश्वास दिलाया था खण्डन कि - हमने इसमें गालियां नहीं रखी हैं; परन्तु पुस्तक देखनेपर कहा है फिर वही गालियाँ मिलीं, जिनमें कुछ को हमने दिखलाया है । प्यविरो आशा है कि - आगेसे वादी कोमलतासे लिखेंगे; हम भी उन्हें करते " यज्ञानुरूप वलिः ' के अनुसार कोमल - व्यवहार करनेका ( ४ ) विश्वास दिलाते हैं । अब आगे इस ' ' कण्टक - शोधन ' में अन्य चिषद वादीकी शङ्काओं व आक्षेपोंका समाधान दिया जा रहा है । तब छ । पाठकगण मनोयोग से उन समाधानोंका मनन करें । द्ध हुआ, --हमारा ( १२ ) अवतारवाद - सम्बन्धी शङ्काओं का -म अवतारवाद पर ३१ प्रश्न ' पुस्तिकाके लेखक कीस्वारां ' का पेशा ही यह रहता है कि कई क्षुद्र निबन्ध ( समाधान एक दयानन्दी-ट्रैक्ट ) लिखकर प्रश्नोंके बहाने सनातनधर्म या पुराणोंपर आक्षेप किये जायँ । देखी ईर्ड्ससे प्रकाशित सभी साधं, विरोधी ट्रैक्टोंके आक्षेपोंका प्रत्युत्तर हम एक म ' श्री सनातन धर्मालीक ' ( ६, ७, ८ ) में दे चुके हैं । अब उसके ' अवतारवाद पर ३१ प्रश्न के उत्तर दिये जा रहे CC - 0. Ankur Joshi Collection, Gujarat. अवतार - सम्बन्धी शङ्काश्रोंका समाधान [ ५६७ हैं । प्रश्नोंकी यह ३१ संख्या उसने बलात् बनाई है । इसमें ४, १०, १२, १३, १४, १५, २०, २५, २८, २६ ये दस प्रश्न वादीने उन्हीं पुराने अपने ट्रैक्टोंसे लिये हैं । इनका उत्तर ७ म पुष्प में दिया जा चुका है । शेष प्रश्नों का उत्तर यहां दिया जा रहा है । प्रश्नों में कुछ संक्षेप भी किया गया है । १ प्रश्न - गीता ( ४८ ) में अवतारके १ साधुओं की रक्षा, २ दुष्टोंका विनाश, ३ धर्मकी स्थापना काम बताये हैं । इससे गीताने अवतार जांचनेकी कसौटी पेश की है । जिसमें ये तीन काम न हों, वह भगवान् न होगा, मनुष्य होगा । तब बताया जाय कि २४ अवतारोंमें किस - किसने ये तीन कर्त्तव्य पूरे किये? पुराणानुसार तो इनमेंसे किसी ने भी ये तीनों काम पूरे नहीं किये । १ उत्तर - गीता में अवतारकेलिए धर्मकी ग्लानि, अधर्मका उत्थान, साधुओंका परित्राण, पापियोंका विनाश, धर्मकी स्थापना- ये भी कारण बताये हैं । पर वादीने -- ' यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ' ( ४ | ७ ) गीताके इस श्लोकको छिपा ही लिया! फिर, ये कारण भी दिङ्मात्र हैं । अवतारों के अन्य भी बहुतसे प्रयोजन हैं, पर ये प्रमुख हैं । अवतार भी अनेक होते हैं, और उनके कारण भी बहुत । वे सभी शास्त्रों में सूचित किये गये हैं । किन्तु प्रश्नकर्ता ' साधुओं की रक्षा, दुष्टों का विनाश और धर्मकी स्थापना ' ये तीन ही अवतारके कारण बताता और कहता है An eGangotri Initiative

पृष्ठ 318

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श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) ५८ ] अवतार है और कौन नहीं, यह जांचनेकी कि ' कौन व्यक्ति आता है उसकी अज्ञता पर । कसौटी गीताने पेश की है । ' तरस ऐसी बात नहीं । यह कहां लिखा है कि जो इन वास्तवमें न करे, वह मनुष्य होगा । देवदत्तके जिम्मे तीन कामोंको दिये गये हों, और यदि वह तीन नहीं तीन काम करनेकेलिए क्या वह देवदत्त न रहेगा? यदि करता, दो ही कर लेता है; तो उनको हल कर ले, तो क्या वह देवदत्त हो जायगा? यज्ञदत्त वादीके अनुसार तीनों काम पूरे न किये, यदि मत्स्य, कूर्मादिने तो क्या वे विष्णु के अवतार न होकर मनुष्य बन जायँगे? वादी पूछता है कि ' किस - किस अवतारने ये तीनों कत्तव्य पाले? ' वह याद रखे कि सभीने अधर्मी - दैत्योंको मारकर धमकी, वैदकी स्थापना की है, पृथिवीका भार उतारा है । आरम्भिक अवतारोंने प्रलयके बाद पृथिवीको स्थापित किया है । पृथ्वी होगी, तभी धर्मकी स्थापना भी होगी । उनमें संकेत कृ.य. तैत्तिरीयारण्यक ( १।११३० ) में आता वराहावतारका है - ' उद्घृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना ' । ' इयती ह इयम पृथिवी आस प्रादेशमात्री, तामेयूष इति वराह उब्जघान । सोऽस्यां पतिः प्रजापतिरिति । यह शतपथ ( १४/१/२/११ ) में आया है । मत्स्यपु. ( २४७/७७ ) में इसी के यज्ञवाराह, यज्ञरूप ( मत्स्य २४७ / ६७–७०, वायुपु. १५/२७ में ), विष्णुपु. में ( १ | ४४।३२-३६ ), यज्ञपुंरुष ( अग्निपु. ४/२ ) नाम आये हैं । यज्ञकी सारी सामग्री CC - 0. Ankur Joshi श्रवतार - सम्बन्धी शङ्कानोंका समाधान Collection Gujarat. An विशेष - क्रमसे जोड़ दी जाय, तो वह वराहाकी आकृति जाती है । इसलिए ' यज्ञो वै विष्णुः ' ( शत. ११११२/१३ वर । बता ३ | १७ ) यज्ञस्वरूप श्रीविष्णुने वराहावतार धारण किया, नि उद्ध । विन वाराहपु. ( ६,१५-२७ ) में लिखा है कि पृथिवीपरसे अग्नितत् के नष्ट हो जानेसे पृथिवी जलमें मग्न हो गई । यह ' यावेदि इस । सलिलमग्र आसीत् ( १२/१८ ) में भी कहा है । शीत बढ़ जानेये बिना सर्वत्र बर्फ हो गई । उसे पिघलाने के लिए पृथ्वी के उद्धारार्थ किय दिव्याग्निकी सत्ता आवश्यक थी । यह कार्यं प्रजापति - श्रीविष्णुरे । पांपि यज्ञाग्निरूप वराहाकृतिमें अवतीर्ण होकर किया ( अध्या, १ ), अव शतपंथ १४ । १ । २ । ११, तैत्तिरीयसं. ६ २ ४२ और वाराहोपनिषद् ) । अभ्य जलका शोषण हो जाने पर पृथ्वी जलसे बाहर ऊपर आ गई ( ब्रह्मः ३६ / १६-२० ) सो वराहावतार दिव्याग्निमें हुत की हुई ब जलराशि - द्वारा सम्पादित दिव्य यज्ञाग्निके अवतार थे | उन्हींसे पृथिवीपर लुप्त अग्नितत्त्वकी पुनः प्रतिष्ठा हुई, और सूर्य प्रकट परः श्री हुआ । इससे पृथिवी भी स्थिर हुई । उ श्रीविष्णु सत्वगुणके प्रतीक होने पर भी उन्हें ' कृष्ण ' कहा सारा गया है । इस कल्पको उन्हींके नाम पर ' श्वेतवाराह ' कहा जात नाभि है । बाराहनें जड़ोंकी खोज में दाढ़ोंसे पृथ्वीको खोदा, इससे वह स वह बीज होने योग्य बन भोजन ) समझना चाहिये कीचड़में जाना वराह में गया । " इस वराइके पाद eGangotri Initiative हो पर गई । यही उसका वर + आहार ( उच्चा । इसीलिए वे वराह हुए । जल घोर नदिय देखा जाता है; अतएव वही रूप पा वेद बताये गये हैं, यूपदेष्ट्रा ( द )

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• श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) कृति गई है ( मत्स्यपु. २४७ / ६७-७० ) । उस समय पृथ्वी के वर बताई ३, नि उद्वारमें बाधा डालनेवाले हिरण्याक्ष - दैत्यको मारकर उन्होंने ग ' विनाशाय च दुष्कृताम् ' इस गीता वचनको पूर्ण किया । ग्नितत्व इस प्रकार शेष अवतारों में भी समझना चाहिये । वैदि " पुराणानुसार मत्स्यावतारने तो वेदोंके अपहर्ता शंखचूड़ का ढ़ जानेसे विनाश करके वेदधर्मकी स्थापना की । कूर्मने पृथिवीको धारण उद्धार किया । उसके धारणसे धर्म की स्थापना हुई । शेष अवतारोंने श्री विष्णुने पापियोंको नष्ट कर धर्मकी स्थापना की, यह तो प्रसिद्ध है ही । घ्या. १ ९ अव Fit स्वयं बतावे कि किस - किस अवतारने धर्मका निषद् ) अभ्युत्थान तथा अधर्म की निवृत्ति नहीं की?..... ई प्रश्न - ईश्वरका कार्यक्षेत्र सारा भूमण्डल होता है; पर अवतारोंका कार्यक्षेत्र केवल भारतवर्ष और उसमें भी कुछ थोडा उन्हीं सां क्षेत्र क्यों रहा, जबकि मनुष्यों की आबादी सारीः पृथ्वी सूर्य प्रकट पर श्री उत्तर- - ईश्वरका कार्यक्षेत्र सारा भूमण्डल ही नहीं; किन्तु ' कहा सारा ब्रह्माण्ड हुआ करता है । परन्तु विश्व के केन्द्र भूमण्डलकी कहा जाता नाभि भारतवर्ष है, जिसकी प्रकृति पूर्ण है । केन्द्र में कार्य होने पर 7, इससे वह समस्त स्थान पर माना जाता है । राजाका राज्य सर्वत्र र ( उत्तर ) होनेपर भी उसकी राजधानी एवं कार्यक्षेत्र उस देशके केन्द्र में जल और । करता है । इसीलिए ईश्वरके वेद में भारतवर्षकी 3 रूप घरो नदियोक्ता,, धान्योंका देशोंका, पशुओंका नाम तो आता है; या दाह ( ) देवादि नदियों तथा यूरोप आदि विदेशोंका नाम नहीं CC - 0. Ankur Joshi अवतार - सम्बन्धी शङ्खानोंका समाधान [ ६०१ श्राता । वेद भी तो भारतवर्षमें अवतीर्ण हुए, भूमण्डलके विभिन्न भागोंमें नहीं । कोई देहली में जाता है; तो उसके एक देशमें ही जाता है । फिर भी उसका देहली में जाना कहा जाता है । इसी प्रकार यहां पर भी जान लेना चाहिए । ३. प्रश्न -गीताकी कसौटीके अनुसार रामावतारका उद्द ेश्य भी जगत् - कल्याण सिद्ध नहीं होता । रामका रावणके राज्यभाग-में जाकर वहां के शासकों और प्रबन्धकोंको मारना, विवाहकी इच्छासे आई हुई रावणकी बहन के नाक - कान काटनेसे सिद्ध है. कि रामने बिना कारण रावण से शत्रुता मोल ली । जब रात्ररनें देखा कि रामने उसके राज्यमें घुसकर उपद्रव करना प्रारम्भ कर उसकी बहनका अपमान किया है, तो उसने जवाब में सीताका हरण किया । इस छेड़छाड़ में आक्रान्ता होनेसे इस युद्धका दोष रामके ही सिर पर आता है । रावण विभीषण के विश्वासघात से मारा गया । विष्णुने देवी भागवत ( ४ । १८ ) में स्वयं स्वीकार किया है कि मैंने दैवयोगसे ही रामावतार में रावण पर विजय प्राप्त की थीं । मैंने रामावतारेमें महान् दुःख उठाये थे । पराधीन होनेसे ही मुझे रामावतार लेना पड़ा था । ये सब बातें रामका लोककल्याण - भावनासे स्वेच्छया ईश्वरावतार लेना सिद्ध नहीं करती उत्तर — बादी इस समय सक्षस - पक्षका हो गया है । वह सीमाविजयी नहीं थी । उसकी सीमा तो समुद्र पार थी । वहीं रामराज्य की सीमा थी । रावणने इस देश की सीमायें Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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६०२ / श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) आकर यहाँ के ऋषि - मुनियोंको खाकर उनकी हड्डियों के ढेर लगा डाले थे, स्त्रियोंका अपहरण कर लिया था । उसके खर, दूषणादि शासक भी यही कार्य किया करते थे । जब शूर्पणखा अपने विवाहार्थं सीता को खा जाना चाहती थी, तब आतता-यिनी होनेसे उसको दण्ड विधान आवश्यक था । फिर वादी इसे ' बिना कारण ' कहता हुआ क्या शूर्पणखाका भाई - बन्द बनना चाहता है? शूर्पणखा विधवा थी और वृद्धा थी, यह रामायणमें स्पष्ट है । वह युवतिका वेष बनाकर आई थी । सीताके रहते राम सुमसे विवाह न करेंगे, यह सोचकर सीताको खा जाना चाहती थी । अतः आततायिनी होनेसे मार डालने योग्य थी । परन्तु स्त्रीका दण्ड ‘ कर्ण - नासादिकर्तनम् ' धर्मशास्त्र में अनुशिष्ट होने से श्रीरामने वैसा ही किया । अतः वादीका कथन खण्डित हो गया । वादी जो यह कहता है कि ' बहन के अपमानके जवाब में रावणने सीताका हरण किया, इत्यादि; यह जनताकी आँखों में धूल झोंकना है । जब उसकी बहनका दोष था, तब राम आक्रा-मक कैसे हुए? वस्तुतः रावण सीता पर मोहित होनेसे ही उसे हर लाया था । यह न होता, तो वह भी बदले में श्रीरामकी पत्नीका नाकमात्र काटकर चला जाता । ' वादीका यह कहना भी कि ' रावण विभीषण के विश्वास-घातसे मारा गया, -ठीक नहीं । वह तो अपने कुकर्मोसे मारा CC - 0. Ankur Joshi Collection अवतार - सम्बन्धी शङ्कानोंका समाधान | ६०३ गया जिसके लिए उसे भ्रांताने भी छोड़ दिया था । किसी अप कविने ठीक ही कहा है- ' यान्ति न्यायप्रवृत्तस्य तिर्यञ्चोऽपि भी सहायताम् अपन्थानं तु गच्छन्तं सोदरोऽपि विमुञ्चति ' इस न्यायानुसार । चलनेवाले के पशु - पक्षी भी सहायक बन जाते हैं; और बुरे रास्ते पर चलते हुएको सगा भाई भी छोड़ देता है । तत्र भगव पुण्यात्मा विभीषरण पापीके पापका साथी बनकर जाना पसन्द करता, क्या वाढी यही चाहता है? जो वह लिखता है - ' विष्णुने ( देवीभा ० ४ । स्वीकार किया है कि ' मैंने दैवयोगसे ही रावण पर की थी, आदि, इनका प्रत्युत्तर हम ' आलोक ' ( ७ ) ४७८ पृष्ठ तक दे चुके हैं । ' दैव'का भाव अपनी शक्तिका आश्रय हैं । क्या अपना धमद मारा कारण ( जिन्ह १८ में ) स्वयं श्रातव विजय प्राप्त- श्रीन पृ ० ४७६ से होनेप ' देवी - महा- जाक पापकम ४. प्रश्न - देवी भाग ० ( १/४/५६ - ६१, ५ / १ / ४७-५० ) में लिखा परित्रा हैं कि विष्णुका कोई अवतार स्वेच्छासे लोककल्याणके लिए और नहीं होता । स्वेच्छया अवतार होना मानने वालोंको मूर्ख दुर्योधन बतलाया है । तब क्या सनातनी विद्वान देवी भागवतको झूठा धर्मकी प्रन्थ मानते हैं? महाभार उत्तर- इसका उत्तर आलोक. ( ७ ) पृ ० ४७४-४७८ में दे कंस दिया गया है । कालनेि ( प्र ० ५ - गीताकी कसौटी पर श्रीकृष्ण भी अवतार सिद्ध नहीं अपने प होते; उनके कार्य भी पारिवारिक शत्रुताका बदला कंससे लेना होनेसे व कौरव - पाण्डवोंमें सम्पत्तिके बटवारेमें हुए घरेलू झगड़ों Gujarat. An eGangotri Initiative