सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 41–50
सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 41–50
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५२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) सुश्री उसमें असम्भवकी क्या बात? जो बात अपनी संकुचित - बुद्धि में न जम सके; तब क्या उसे मूल लेखकसे विरुद्ध अपनी इच्छा-लेखक मात्र से विरूप कल्पित कर देना -- क्या यह ' सङ्गत मार्ग ' है? रामद महाभारत में अर्जुनका ध्वज ' हनुमान'का प्रसिद्ध हैं; वहां उसे का ' कपिध्वज ' लिखा गया है, वहां कोई बनवासी मनुष्यका संकेत मी कित तक नहीं; अतः हनुमान्की वानरता स्पष्ट सिद्ध हुई । एक - दो ( ३६ ) जो कि वादियोंको ' हनुमानादिकी वानरतामें वेद-ना है । विद्वत्ता, राजभवन आदिकी सत्ता समझमें नहीं आती; वह उनकी अपनी समझका दोष है । ' विद्वाँ सो हि देवाः ' ने उसे ( शत ० ३ | ७ | ३ | १० ) देवता जन्मसे ही विद्वान् होते हैं; इस लखना विषयमें ' आलोक ' ( ४ र्थ पुष्प ) मंगाना चाहिये । सो उन्हीं ऐसा देवताओंका जो रंगढंग, वेष, सुवर्णादिके मुकुट पहरना, गुण, ऐसा पराक्रम आदि था; वह देवावतार ( दिव्य ) वानरोंमें भी आना स्वाभाविक था । इस प्रकार ठीक - ठीक समाधान प्राप्त हो जाता ३८६ ) है; तब उसमें अविश्वासकी दृष्टि रखना प्रच्छन्न - बौद्धको विण- अपनाना है । देवताओंको यदि न माना जावे; तो वेद, पुराण, या- इतिहास आदि सारे प्राचीन साहित्यको हमें छोड़ना होगा । नर आर्यसमाजी देवताओंकी सत्ता नहीं मानते; इसीलिए वे नई संगतियां लगाने को तैयार रहते हैं । वे विद्वान् - मनुष्यों का नाम ही देव कहकर संगति लगाने को उद्यत रहते हैं, पर यह निर्मूल पर्य बात है; इस विषय में हम आलोक ' ' ( ४ र्थ पुष्प ) में स्पष्टता कर चुके हैं, शङ्ककोंको उसे भली - भांति देखना चाहिये; पर सनातन-तब CC - 0. Ankur Joshi Colection हनुमानादि वानर नर थे? [ ५३ धर्मी भी यदि उन्हीं के प्रवाह में बह जाएँ, तो यह खेदका विषय है । ( ४० ) कई नये खोजी यह कहते हैं कि- जब ' हनुमान् लङ्कामें सीताके पास पहुँचा; और उसे अपने कन्धेपर चढ़ाकर श्रीरामके पास ले जानेका उसने प्रस्ताव रक्खा; तव सीताने कहा कि- मैं पर - पुरुषके शरीरको स्पर्श नहीं करूंगी । इससे स्पष्ट सिद्ध होता है कि – हनुमान् मनुष्य था । बन्दर होनेपर मनुष्य- स्पर्शका कोई प्रश्न ही नहीं । ' यहाँपर पूर्वपक्षीको ' भर्तुर्भक्तिं पुरस्कृत्य रामादन्यस्य वानर! नाहं स्प्रष्टुं स्वतो - गात्रमिच्छेयं वानरोत्तम! ' ( ५ | ३७ | ६२ ) यह पद्य इष्ट प्रतीत होता है; पर यह पद्य तो पूर्वपक्षीका पक्ष काट देता है । यहाँपर ' हनुमान ' को ' वानर, वानरोत्तम ' यह दो सम्बोधन दिये गये हैं; तब यहां हनुमान की मनुष्यताका प्रश्न ही नहीं हो सकता । यहां पर ' रामातिरिक्तस्य ' कहा है कि- मैं भर्ता रामकी भक्ति के कारण ‘ रामसे भिन्न ' चाहे कोई भी हो, उसके शरीरको स्वतः स्पर्शं नहीं करना चाहती । ' रामादन्यस्य नामि संसर्गम् ' ( ५ । ३८ । ४ ) यह भी पद्य पूर्वोक्त पद्यका अनुवादक है । तव हनूमान् भी तो ' रामाऩिरिक्त ' थे । तब वह उसके शरीरका ही स्पर्श स्वतः क्यों करती? उसका भाव यह है कि- रामके अतिरिक्त चाहे कोई देवता हो, चाहे दैत्य हो, चाहे मनुष्य हो, चाहे पशु हो, चाहे पक्षी हो; उसके शरीरका स्वतः स्पर्श नहीं करूँगी । तब Gujarat. An पृष्ठ उपस्थित होता था कि उसने रावणके शरीरका स्पर्श ही
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५४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) हनुमानादि वानर नर थे? कैसे किया; जब कि वह उसे उठा ले गया था । वह भी तो ' रामातिरिक्त ' था । इसपर उसने ६३ वें पद्य में स्वयं उत्तर दे दिया कि — ' यदहं गात्रसंस्पर्शं रावणस्य गता बलात् । अनीशा ( स्त्रीत्वात् स्वयं किमपि कर्तुमसमर्था ) किं करिष्यामि विनाथा विवशा सती ' कि - उस समय में मैं विवश थी । जब वह रामाति-रिक्त किसी के भी शरीरका स्पर्श नहीं करना चाहती थी. तब इससे हनुमान्की मनुष्यता सिद्ध न हो सकी । मूलमें ' मनुष्य ' शब्द तो दूर, ' पुरुष ' शब्द भी नहीं है; और ' वानर ' शब्द प्रत्यक्ष है, तब वादीका पक्ष कट गया । ( ४१ ) एक प्रश्न यह है कि - रावणने तपस्या से प्राप्त वरमें देवता आदि सबसे अवध्यता मांगी, केवल मनुष्यको छोड़ दिया; ' मानुषान् न गणे देव! ' ( ६।१६ / ४२ ); तब वानर यहां कहां टपक पड़े? " इसपर जानना चाहिये कि - यहां रावणको नन्दिकेश्वरका शाप था । नन्दी वानररूप किये हुए था; उसे देखकर रावणने उसका उपहास किया, तब उसने रावणको शाप दिया कि - वन्दर उत्पन्न होकर तेरे कुलका विध्वंस करेंगे— ' तं ( नन्दिनं ) दृष्ट्वा वानर- मुखम् अवज्ञाय स राक्षसः । प्रहासं मुमुचे ( चकार ) तत्र ( ७ | १६ | १४ ) तं क्रुद्धो भगवान् नन्दी शङ्क-रस्यापरा तनुः । अब्रवीत् तत्र तद् रक्षो दशाननमुपस्थितम् ' ( १५ ) यस्माद् वानररूपं मामवज्ञाय दशानन! अशनी पातसंकाशमपहासं प्रमुक्तवान् ( १६ ) तस्माद् मद्वीर्य - संयुक्ता मद्रूप - समतेजसः । उत्पत्स्यन्ति वधार्थं हि कुलस्य तव वानराः । ( १७ ) नख- दंष्ट्रायुधाः क्रूरमनः - सम्पातरंहसः । युद्धोन्मत्ता बलोद्रिक्ताः शैला विसर्पिणः ' ( १८ ) ते तव प्रबलं दर्पमुत्सेधं च पृथग्विधम् । व्या नेष्यन्ति सम्भूय ' ( १६ ) यह शाप उत्तरकाण्डमें ही केवल बल्कि उसे सुन्दर - काण्डमें भी वतलाया गया है - ' किमेष मद f बान् नन्दी भवेत् साक्षाद् इहागतः । येन शप्तोस्मि कैलासे मर T प्रहसिते पुरा । सोऽयं वानरमूर्तिः स्यात् ( ५२५० २-३ ) यह राया ल सोच रहा है । स जब रावण नरोंको कुछ नहीं समझता था; तव वानरों क्या समझता? अतः उसने अपने अवध्यत्वमें देव - दैत्यों क लिए कहा; पर नर - वानर छोड़ दिये । तब उसके मारने के लि नर - वानर - रीछ आदि रूपसे ही देवताओंको अवतीर्ण हो क था । वरके कारण वे देव- रूपमें तो रावण को मार सक अ नहीं थे । उसमें विष्णुदेवको राम - लक्ष्मणादि मनुष्य रूप अ तथा अन्य देवोंको जाम्बवान्- हनुमानादि रीछ - वानरा ( हे अ अवतीर्ण होना पड़ गया । इस प्रकार वाल्मीकिरामाया अव महाभारतादिके बाह्याभ्यन्तरिक प्रमाणोंसे हनूमान् आदित ( देव वानरता स्पष्ट सिद्ध हो गई । इसमें हनुमान् तो अमर शरी जाम्बवान्, मैन्द, द्विविद आदि अन्य भी कई रीछ - वार शरी चिरंजीवी रहे; इसलिए वे महाभारत - कालमें भी दीखते हैं । मनुष द्विविद वानरको श्रीचलरामने मारा था । जाम्बवान्की कार रूपिणी लड़की जाम्बवती से श्रीकृष्णने विवाह किया था; ' नम वादियोंका उस पर प्रश्न व्यर्थ है । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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५६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ( ४२ ) अवशिष्ट प्रश्न यह है कि ' रामायण में जो | व्या वानरोंने किया, वह वानरगण- साध्य नहीं कार्य से सम्बन्ध क्यों है, तब वहाँ वानरों-न जोड़ा जाता है; उन्हें मनुष्य ही क्यों न मान प भ लिया जावे? ' इस पर उत्तर यह है कि यदि वह मर गरण साध्य नहीं; तो वह मनुष्य जाति से भी साध्य कार्य वानर-लोग उन्हें साधारण वन्दर नहीं । आप इराव मानते हैं; पर यह स्मर्तव्य है कि - वे साधारण बन्दर नहीं थे । वस्तुतः वे अप्राकृत वानर अर्थात् नान देवावतार ही थे । देवताओंने ही श्रीरामके कृत्यकेलिए दैत्य कथनानुसार विशिष्ट वानररूपता स्वीकृत की थी । विष्णुके नेकेलि देवताओंकी शक्ति अनन्त होती है; ऐसा वेदादि - शास्त्रोंका हो कथन है । इसलिए वेदमें मरुत् नामक देवोंके लिए जिनके रसक अवतार हनूमान् थे- कहा है- ' अनन्तशुष्मा ' ( ऋ ० १।६४ । १० ) वे रूपों अनन्त बल वाले होते हैं । ' अपारो वो महिमा ' ( ०५ । ८७ । ३४ ) नरसा ( हे देवविशेष मरुतो, तुम्हारी महिमा अपार है । ) इस विषय में माया अधिक हम किसी अन्य पुष्पमें रखेंगे । तब मरुत्देवके आदि अवतार हनुमान् भी अनन्तबलशाली थे । तभी तो उन मरुतों-मर ( देवों ) के अवतार वानर भी कामरूप - ( अपनी इच्छानुसार शरीर बना सकने वाले ), हाथी, पहाड़ आदिके छ - बार शरीर वाले, देवभाषा समान बड़े ते है ( संस्कृत ) बोलने वाले, वेद - वेदाङ्गप्रवीण, कार मनुष्य की भान्ति गति - चेष्टा वाले रामायण में कहे गये हैं । ना देवविशेष मरुतोंको वेदमें ' मर्या इव ' ( ऋ. ५ / ५६।३,५ ) ' न मर्या अरेपसः ' ( ऋ ० १०७८/१४ ) १०७७/३ ) इत्यादिस्थलोंमें CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. हनुमानादि वानर नर थे? [ ५७ मनुष्योंकी तरह कहा है । ' बृहदेवता ' ( ५६७ ) में भी उन्हें पुरुषों ( मनुष्यों ) के शरीरवाला कहा है । ' ताँस्तुल्यवयसो दृष्ट्वा देवान पुरुषविग्रहान् ' ( ५।६७ ) ' ततः स मरुतो देवान रुद्रपुत्रान अबुध्यत ' ( ६८ ) । तव यदि रामायण में उन देवोंके अवतार अप्राकृत ( दिव्य ) षानर आदि मनुष्योंकी भान्ति राज्यकार्य तथा अन्य कार्य करते भी थे; तो इससे वे मनुष्य नहीं हो जाते । इससे पूर्वपक्षियोंका देवावतार वानरोंके मनुष्य - जैसे कार्य ढूंढनेका परिश्रम व्यर्थ गया । अव उन्हें हमारे कहे रामायणीय वचन देखकर वानरों-को मनुष्य न मान कर उन्हें देवावतार- विशेष वानर जानना चाहिये । इस प्रकारके मानुषी व्यवहारके अभिज्ञ वानरादि जो होते हैं; उनपर भी मानुषी व्यवहारकी मर्यादा कुछ - कुछ चलती है, जिससे श्रीराम द्वारा उसके उल्लंघनकर्ता वालीको मारा गया । उनसे किया हुआ लोकोत्तर कार्य वनवासी - मनुष्यों द्वारा भी सम्भव नहीं । रामायण में वर्णित वानरोंकी पूंछ, उनकी मुखाकृति, शरीरपर बाल, कूदना - फांदना, दान्त पीसना, नखों-दाढ़ों द्वारा काटना - नोचना, किलकिला शब्द आदि स्पष्ट सिद्ध करते हैं कि वे श्राकृति और शरीर में वानर - योनि वाले ही थे, पर से बहुत सी विशेषताओं वाले थे । ( ४३ ) उन वानरोंका देवावतारत्व वाल्मी. रा. में देखिये-' पुत्रत्वं तु गते विष्णौ राज्ञस्तस्य महात्मनः । उवाच देवताः सर्वाः स्वयम्भूर्भगवान् इदम् ( चाल. १७/१ ) ( जब विष्णु भगवानने दाशरथि बनना स्वीकार किया; तव ब्रह्माने सब देवताओंको An eGangotri Initiative
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५८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) कहा ) ' विष्णोः सहायान् बलिनः सृजध्वं कामरूपिणः ( २ ) मायाविदश्च शूरांश्च वायुवेगसमान् जवे । नयज्ञान् बुद्धिसम्पन्नान् विष्णुतुल्यपराक्रमान् ( ३ ) । असंहार्यान् उपायज्ञान् दिव्यसंहनना-न्वितान । सर्वास्त्रगुणसम्पन्नान् अमृतप्राशनानिव ( ४ ) ' अप्सरःसु च मुख्यासु गन्धर्वीणां तनूषु च । यक्षपन्नगकन्यासु ऋक्षविद्या-धरीषु च ( ५ ) किन्नरीणां च गात्रेषु वानरीणां तनूषु च । सृजध्वं हरि ( वानर ) रूपेण पुत्रान् तुल्यपराक्रमान् ( ६ ) ( तुम देवता लोग देवस्त्रियों गन्धर्वी, यक्षिणी, वानरी, किन्नरी आदि अप्सराओंसे बन्दर रूपमें दिव्य शरीरवाले अतुल बलशाली पुत्रोंको पैदा करो ) । ' पूर्वमेव मया सृष्टो जाम्बवान् ऋक्षपुङ्गवः । जृम्भमाणस्य सहसा मम वक्त्रादजायत ( ७ ) वानरेन्द्र महेन्द्राभम् इन्द्रो वालिनमात्मजम् । सुग्रीवं जनयामास तपनः तप्यतां वरः ( १० ) ( जाम्बवान् ऋक्षकी ब्रह्माके मुखसे, तथा इन्द्रसे बाली तथा सूर्यदेवसे सुग्रीवकी उत्पत्ति हुई ) । वृहस्पतिस्तु ' तारं नाम महाकपिम् ( ११ ) ' विश्वकर्मा त्वजनयद् नलं नाम महाकपिम् ' ( देवशिल्पी विश्वकर्मासे नल वानर पैदा हुआ; इसी कारण अपने पतृक गुण शिल्पके कारण उसने समुद्रकी पुल बनाई ) । ' वरुणो जनयामास सुषेणं नाम वानरम् ( १७/१५ ) । मानुषं रूप मास्थाय विष्णुः सत्यपराक्रमः । सर्वैः परिवृतो देवैर्वानरत्वमुपागतैः ’ ( ६।११३।१३-१४ ) ( विष्णु भगवान्ने मानुषरूप ( रामावतार ) बनाया । देवता सब वानररूप बना कर उनके पास ठहरे ) वानराश्च CC - 0. Ankur Joshi Collection हनुमानादि वानर नर थे? स्विकां योनिम् ऋक्षाश्चैव तथा वपुः । येभ्यो विनिःसृताः सुरेभ्यः सुरसम्भवाः । तेषु प्रविविशे चैव सुग्रीवः सूर्यमण्डल बुद्धि परि ( वाल्मी ० ७ | ११०।२०-२१ ) ( वानर रीछ जिस - जिस देवता बला उत्पन्न हुए थे; अन्तमें उसी में प्रवेश कर गये ) । मन इस उपक्रम - उपसंहार तथा अभ्यास, अपूर्वता, फल यस्य तात्पर्य - निर्णायक लिङ्गोंसे वानरोंका देवतावतार होना स्पष्ट तेन, तभी ' आत्मा वै पुत्रनामासि ' ( मन्त्रब्राह्मण १।५।१६- ॥ उन्नत गोभिलगृ. २।८।२१-२५ हनुमानादि वानर पू. १०६ ) इस वेद ( २१ ) वचन द्वारा उनमें भी लोकोत्तर दिव्य बल था, क्योंकि -देव सुमह योनिवाला व्यक्ति जिस भी रूप में अवतीर्ण हो; पर अप दर्पण बलको नहीं छोड़ता । नाटकमें पुरुष यदि स्त्री बने; तव नखदंष उनमें पुरुषवाला वल रह ही जाता है । देवावतार होनेसे भेदये हनुमानादि वेदवेदाङ्गोंके विद्वान थे; क्योकि - ' विद्वा ँसो हैं, देवाः ' ( शत. ३ | ७ | ३ | १० ) अर्थात् देवता जन्मसे ही विद्वान हो संग्रह हैं । इसकी स्पष्टता ' आलोक ' ( ४ ) में की गई है । इससे श्र तथा वानर होनेपर भी देवांशके अक्षत होनेसे हनुमान् आदिर बलशा वेद - वेदाङ्गोंमें पाण्डित्य दिखलाया गया है । तव स्त्री रूपधारी अलौक पुरुष - नटकी भांति, देवावतार - वानर भी देवी बलको करें छोड़े? तभी तो कामरूप ( अपनी इच्छानुसार रूप बना पद्भ्या सकनेवाले थे । तोयदा ' मारुतस्यौरसः श्रीमान् हनुमान् नाम वानरः । य तदमान संहननोपेतो वैनतेयसमो जवे ' ( १।१७ / १६ ) सर्ववानरमुख्ये कामर । Gujarat. An eGangotri Initiative
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[, ६० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ता: बुद्धिमान् बलवानपि ' ( १७ ) ( यहाँ हनुमानके वल - बुद्धिका मण्डल परिचय दिया गया है । अन्य बन्दरोंका बलवृत्त यह है- ) ' श्रप्रमेय-देवताएँ बला वीरा विक्रान्ताः कामरूपिणः । ते गजाचलसंकाशाः वपु-मन्तो महाबलाः ( १८ ) ऋक्षवानरगोपुच्छा: क्षिप्रमेवाभिजज्ञिरे । यस्य देवस्य यद् रूपं वेषो यश्च पराक्रमः ( १६ ) अजायत समं स्पष्टतेन, तस्य - तस्य पृथक् - पृथक् । गोलाङ्गलेषु चोत्पन्नाः केचिद् १६-१ ( उन्नतविक्रमाः ( २० ) ऋक्षीषु च तथा जाता वानराः किन्नरीषु च ( २१ ) चारणाश्च सुतान् वीरान् ससृजुर्वनचारिणः । वानरान् - देव सुमहाकायान् सर्वान् वै वनचारिणः ( २४ ) सिंहशार्दूलसदृशा अफे दर्पेण च वलेन च । शिलाप्रहरणाः सर्वे सर्वे पर्वतयोधिनः ' ( २५ ) तवनखदंष्ट्रायुधाः सर्वे, सर्वे सर्वास्त्रकोविदाः । विचालयेयुः शैलेन्द्रान् नेसे भेदयेयुः स्थिरान् द्रुमान् ' ( २६ ) इनमें कई पद्य हम पहले दे चुके _हैं, और उनका अर्थ भी कर चुके हैं । यहाँपर सब पद्योंका हो संग्रह कर दिया गया है । इससे श्रीरामके सहायक हनुमान् से तथा अन्योंको स्पष्टतया बन्दर देवावतार और अलौकिक-नादिक बलशाली बताया गया है । शेष पद्य निम्न हैं, जो उनका - पारलौकिक बल बताते हैं-7 ' क्षोभयेयुश्च वेगेन समुद्र ं सरितां पतिम् । दारयेयुः क्षितिं -पद्याम् आप्लवेयुर्महार्णवान् ' ( २७ ) नभस्तलं विशेयुश्च गृह्णीयुरपि तोयदान् । गृह्णीयुरपि मातङ्गान मत्तान् प्रव्रजतो वने ' ( २८ ) यक्ष देनपातयेयुर्विहङ्गमान् । ईदृशानि प्रसूतानि हरीणां मुख्य कामरूपिणा । ( २६ ) शतं शतसहस्राणि यूथपानां महात्मनाम् । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. हनुमानादि वानर नर थे? [ ६१ ते प्रधानेषु यूथेषु हरीणां हरियूथपाः ( ३० ) बभूवुर्यथपश्रेष्ठान् वीराँश्चाजनयन् हरीन् ' ( बालकाण्ड १७३१ ) । युद्धकाण्डमें भी उन वानरोंकी देव, गन्धर्व श्रादिमें उत्पत्ति बताई गई है-हरयो देवगन्धर्वैरुत्पन्नाः कामरूपिणः ' ( २८ | ५ ) ' किष्किन्धाकाण्डमें भी कहा है-: देवगन्धर्वपुत्राश्च वानराः कामरूपिणः ' ( ३८,२६ ) । युद्धकाण्डमें भी यही स्पष्ट हैं ( ६ ११३ १४ ) ' सर्वैः परिवृतो देवैर्वानरत्वमुपागतैः ' ( १५ ) । यदि प्रतिपक्षियोंको वानरोंकी देवोंसे उत्पत्ति और देवोंकी मनुष्यसे भिन्न योनि और लोकोत्तर दिव्यशक्तिशालिता समझमें आ जावे, तो उन्हें कोई भी दीघं वा लघुशङ्का तंग न कर सके । आर्यपथिकने ( पृ. ६५ ) में लिखा है - ' इतने गुणोंसे युक्त तो बन्दर क्या, सर्वसाधारण मनुष्य भी नहीं होते हैं ' । सो मनुष्य - भिन्न देवयोनि - जिसके यह वानर अवतार थे - वादी रामायणकी भांति मान ले, तब उसको कोई भी इस विषयकी शंका भ्रान्त न कर सके । श्रीवाल्मीकिका स्वाभाविक अभिप्राय छिपानेसे काम नहीं चलेगा । ' सुरैर्हि सृष्टाः ' ( ७७३६।४६ ) यहाँ वानरोंकी देवताओं द्वारा सृष्टि ‘ देवर्वानरत्वमुपागतैः ' ( ६ | ११३ | १५ ) तथा देवताओंका वानररूप धारण करना श्रीवाल्मीकिमुनिने कहा है । पूर्ववचनका ' सुग्रीव आदिको विद्वानोंने विद्वान् बताया है ' ( पृ. ७६ ) यह आर्यपथिकका अर्थ ठीक नहीं । असङ्गत है ' सुर'का अर्थ ' देवयोनि ' है, ' विद्वान् मनुष्य ' नहीं ॥ पूर्व लिखित श्लोकोंसे स्पष्ट है कि वे साधारण आजकलके An eGangotri Initiative
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६२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) से वानर नहीं थे । तभी तो श्रीसीताने भी हनूमान्को कहा था - ' न हि त्वां प्राकृतं ( साधारण ) मन्ये वानरं वानरर्षभ! यस्य ते नास्ति संत्रासो रावणान्नापि सम्भ्रमः ' ( सुं. ३६६ ) यहाँ हनुमानको साधारण वानरोंसे विलक्षण बानर कहा गया है । ‘ प्राकृतोऽन्यः कथं चेमां भूमिमागन्तुमर्हति । उदधेरप्रमेयस्य पारं वानरपुङ्गव! ' ( ५ | ३७ | ४१ ) अर्थात् इस अपार समुद्रको साधारण वानर भला पार कैसे कर सकता है? इस प्रकार हनूमान् अप्राकृत वानर सिद्ध होते हैं । पहले श्रीसीताने भी उसे प्राकृत वानर समझा था - ' हनूमन्तं कपि व्यक्त ' मन्यते नान्यथेति सा ' ( ५/३५८७ ) पीछे उसकी शक्तिका परिचय पाकर उसे अप्राकृत वानर माना । ( ४४ ) इस प्रकार प्राकृत ( साधारण ) वानरोंने भी हनुमानको साधारण ( प्राकृत ) वानर समझकर अपनी जातिके स्वभावानुसार जब हनुमान् विशल्यकरणी आदि औषधियोंवाला पहाड़ लाने गया था, उस समय स्वयं भी उछलनेका यत्न किया; पर वे गिर गये । जैसे कि - ' स वृक्षखण्डान् तरसा जहार, शैलान् शिलाः प्राकृतवानरांश्च | बाहूरुवेगोद्धतसम्प्रणुन्नाः ते ( प्राकृत वानराः ) क्षोणवेगाः सलिले निपेतुः ' ( युद्ध ७४ । ४६ ) । इससे हनूमान अप्राकृत ( दिव्य ) वानर सिद्ध हुए । यदि हनुमान् वन्दर न होते; मनुष्य होते; तव अन्य वन्दर अपनी जातिके स्वभावानुसार उसके पीछे न कूदते; क्योंकि उनका एक मनुष्यके साथ उछलनेका कुछ भी सम्बन्ध नहीं था । इससे वे भी बन्दर ही थे; पर CC - 0. Ankur Joshi Collection हनुमानादि वानर नर थे? II हनूमानादि विशेष दिव्य वानर सिद्ध हुए । वहीं पर ही हनुमानक ' स पुच्छमुद्यम्य भुजङ्गकल्पं विनम्य पृष्ठं श्रवणे निकुच्च कि-विवृत्य वक्त्रं पुप्लुवे व्योम्नि स चण्डवेगः ' ( ६१७४१४५ थे, पूछ उठाना, पीठको झुकाना, कानोंको सिकोड़ना, आकाश ) धार उछलना कहा है, यह मनुष्यों में नहीं हो सकता । दिव्य वानरोध प्रति द्दी हो सकता है । इस प्रकार देवावतार अन्य वन्दर भी ऐसे थे । रूप वे कामरूप होनेसे मनुष्यरूप भी धारण कर सकते थे, इसलिए नर वे मनुष्य - शास्त्रके बन्धनमें भी कुछ आ सकते थे, परन्तु युद्धों इस श्रीरामने उनके मनुष्यशरीरधारणका निषेध कर दिया था । जैसे कि— ' न चैव मानुषं रूपं कार्य हरिभिराहवे । एषा भवतु नः संज्ञ रह युद्धेस्मिन् वानरे बले । वानरा एव वश्चिह्न ं स्वजनेस्मिन् भविष्यति । उन क्य वयं तु ( रामलक्ष्मणादयः ) मानुषेणैव [ रूपेण ] सप्त योत्स्यामहे तथ परान् ( ६ | ३७ | ३३-३४ ) यहाँपर रामाभिरामने लिखा है— ' श्रम हो वानराणामपि कामरूपतया रूपान्तरकरणे युद्धे स्वीय - परकी का यविवेकाऽसम्भवाद् आह - ' न चैवेति । संज्ञा - नित्यवानररूप-वह धारणसंकेतः । एवञ्च श्रस्मान् सप्त हित्वा - मन्त्रिचतुष्टयसहितं सा विभीषणं च त्यक्त्वा मनुष्याकारो निःशङ्क ं वध्यः । वानररूप-धारी वानरैर्युध्यते; तदा वध्य एव । वो युष्माकं स्वजने -स्वजनत्व म ज्ञाने वानरा एव - वानरत्वविशिष्टा एव चिह्न, तदुद्वैशिष्टचमेव व चिन्हमित्यर्थः ' । ( हम सात आदमियोंके अतिरिक्त कोई उ वन्दर युद्ध में मनुष्यरूप न वनाचे ) इससे स्पष्ट सिद्ध होता है । प Gujarat. An Gangotri Initiative
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६४ ] श्री सनातनधर्मालोक ( 8 ) मानका कि - वानर वानराकृति ही थे, प्रतिपक्षियोंके अनुसार मनुष्य नहीं कुच्च २४४५ थे, न मनुष्याकृतिके थे । हाँ, कामरूप होनेसे मनुष्य रूप धारण कर सकते थे, पर उसका निषेध किया गया । यदि काश निरोग प्रतिपक्षियोंके से थे । रूपका निषेध नर - वानरका इसलिए इस विषयका अनुसार वानर मनुष्य ही थे, तब उनके मनुष्य व्यर्थ ही ठहरता है । केवल कपड़े पहननेके भेदसे भेद कभी नहीं हो सकता । इससे प्रतिपक्षियोंका पक्ष कट गया । युद्धो ( ४५ ) इस प्रकार जब देवावतार होनेसे रामायणके वानरों-ा था । की विशेषता सिद्ध हुई; तब उनमें ऐसा कार्य कौनसा अवशिष्ट रहा; जो असम्भव हो? जब ऐसा है, तब वानरयोनिसे जबर्दस्ती संज्ञा उनकी मनुष्ययोनि सिद्ध करनेकी तथा वास्तविकताको छिपाने की ष्यति । क्या आवश्यकता? वस्तुतः यहाँ दोष प्रच्छन्न - बौद्धोंकी संकुचित त्याम तथा पक्षपात - कलुषित बुद्धिका है, जिसने ठीक सङ्गति लग रही होने पर भी असङ्गतिका शोर मचा रखा है । वे लोग इस मार्ग परकी को जानते अवश्य हैं, पर उसे छिपाते हैं । उसमें भी रहस्य है । ररूप वह यह कि -देवयोनि मान लेनेसे फिर उनके नेताओंके साम्प्रदायिक सिद्धान्तमें क्षति पड़ती है, क्योंकि — उनके नेता ररूप. देवयोनिको नहीं मानते; न ही उसमें अलौकिक सामर्थ्य मानते चनत्व मानते हैं । देवयोनि मान लेने पर उनको अपना सारा साहित्य - मेब बदल लेना पड़ेगा । परन्तु देवयोनि शास्त्रीय एवं वैदिक है । उसका कुछ विवरण हम ' आलोक ' ( ४ ) में कर चुके हैं, शेष अन्य ता है पुष्पों में करेंगे, उसमें उनकी अलौकिक शक्ति भी दिखलाई जायगी । CC - 0. Ankur Joshi ६५ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) Collection Gujarat. प्रत्यक्षदेव सूर्य आदिको ही देख लीजिये, जिनको उनके नेता भी देवता मानते हैं । उनमें कितना बल है, कितनी सामर्थ्य है? एक ही अग्निदेव हजारों मन भार उठाकर ट्रेन रूपमें दौड़ता दीखता है । एक ही सूर्यसे सारी पृथिवी अपनी शक्तिसे नियन्त्रित है । उसी कारणसे यह पृथ्वी आकाशमें स्थिर भी, नवीन- मतानुसार घूम रही भी, निराधार होती हुई भी नहीं गिरती । एक ही विद्युत् - रूप में इन्द्रदेव संसारमें कितने कार्य पूर्ण कर रहा है । रोटी आदि बना रहा है । पंखा चला रहा है । चक्की चला रहा है, कपड़े प्रेस कर रहा है । शरीर में बल बढ़ा रहा है । ट्रेनें चला रहा है 1 । रेडियो, टेलीप्रिन्टर, टेलिविजन, टेलीफोन, टेलीग्राम आदिका कार्य कर रहा है । देवोंमें कामरूपता भी जन्म - सिद्ध है; तब देवांश रामायणके वानर भी कभी मनुष्यका, कभी बिलावका, कभी हाथी वा पर्वत आदिका रूप भी बनाने में समर्थ थे । इसीलिए ' मानुषं धारयन् रूपम् अयोध्यां त्वरितं ययौ । अथोत्पपात वेगेन हनूमान् मारुतात्मजः ' ( ६ | १२५ / १६-२० ) यहां हनुमान्का मनुष्यरूप धारण करना और उडना बताया है । यदि हनूमान् मनुष्य होते; तब वे अन्य मनुष्य रूप कौनसा धारण करते । इसी प्रकार ' ते कृत्वा मानुषं रूपं वानराः कामरूपिणः ' ( युद्ध. १३०।४३ ) यहाँ शरभ, पनस आदि वानरोंका कामरूपता-वश मनुष्यरूप धारण करना दिखलाया है । यदि वे पहलेसे ही मनुष्य थे, तो फिर उन्होंने अन्य कौनसा मनुष्य - रूप धारण Aecigeri Initiative
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६६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ह ) किया? तब तो उनका ' कामरूपिण: ' विशेषण भी प्रसाभिप्राय हो जायगा; परन्तु वास्तविक बन्दर होनेपर भी फिर मनुष्यादि भिन्न योनिका रूप बनानेपर उनका ' कामरूपिण: ' यह विशेषण साभिप्राय हो जाता है । यदि या वे बन्दर थे, और मनुष्यकी भांति कपड़े पहिनें, इससे भी उनकी मनुष्यता नहीं बन जाती, क्योंकि - वादी भी मानता है कि कपड़े पहननेपर भी बन्दरका बन्दरपन छिप नहीं सकता । इससे सिद्ध हैं कि - हनुमानादि मनुष्य नहीं थे; किन्तु वानर ( बन्दर ) थे । साधारण बन्दर भी नहीं थे; किन्तु देवांश, बल्कि देवताओंसे सीधे आये हुए विशेष वानर थे । हम ' रामायणकी राजनीति ' ( पृ. ११२ ) के अनुसार यह भी माननेको तैयार नहीं कि - ' वानर एक वनेचर जाति थी । दक्षिण दिशाके जंगलों में इसका निवास था । इसकी सुन्दर राज्य - व्यवस्था थी. पढ़ने - पढ़ानेकी चाल थी । यह सब कुछ होने पर भी बहुत - सी बातें इन लोगोंमें जंगलीपनकी मौजूद थीं । यद्यपि यह प्रकृत जाति प्राचीनरूपमें आज नहीं दीखती; परन्तु यह सम्भव है कि-दक्षिण देशकी रहनेवाली अनेक जातियाँ इन्हीं रीछ- बन्दरोंकी सन्तान हों । ' वस्तुतः यह मत वाल्मीकि रामायण एवं महाभारत से विरुद्ध है । केवल यह मत कुछ दिमाग फिरे सुधारकों को प्रसन्न करनेकेलिए गढ़ा गया है । अस्तु! कामरूपता होनेसे हनुमानका ' ह्रस्वतां गतः ' ( २१४४ ) छोटा रूप तथा विलावका रूप CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri हनुमानादि वानर नर थे? ६८ बनाना भी दिखलाया है - ' सूर्य चास्तं गते रात्रौ देहं संक्षिप्यमा वृषदंशक ( विडाल ) मात्रोथ वभूवाद्भुतदर्शनः ' ( सुन्दर यद् . २ ) वनवासी मनुष्य अपने शरीरको छोटा - बड़ा करने वा बिलाव ( नि समर्थ नहीं होते; ' स संक्षिप्यात्मनः कार्य... " वभूवाङगुष्ठमात्र उस ( सुं. १/१५६ ) यहां हनुमानका अंगूठे इतना रूप धारण कर इसी कहा है । परन्तु देवावतार वानरोंमें स्वभावसिद्ध अणिमा गये अष्टसिद्धि अपने वश होनेसे वह शक्ति थी । रङ्गमञ्चमे श्र वि स्त्रीरूप धारण करके भी अपने पुरुषत्व वा वैसे चलको वा नहीं छोड़ दिया करता, वैसे देवता वानर - योनिको पाकर मनु अपनी दिव्यता वा शक्ति- विशेषको भला क्यों छोड़ दें? वार ( ४६ ) ' ज्येष्टो. हि त्वं तु सम्पाते! जटायुरनुजस्तव । मन रूपमास्थायाऽगृह्णीतां चरणौ मम ' ( कि. ६०/२० ) यहाँ क मन करत तथा उसके भ्राता सम्पातिके गीध - पक्षी होनेपर भी काम सभी ( इच्छानुसारी शरीर - निर्माण में समर्थ ) होनेसे मनुष्य - श धारणमें शक्ति थी । यदि वे मनुष्य होते, तो फिर उन भी कौनसा अन्य मनुष्यरूप धारण किया? इसी प्रकार जाम्बवा सांप भी. · कामरूप होनेसे उसने अपनी कन्या जाम्बवतीको नही मानुषी रूपमें करके उसका श्रीकृष्णसे विवाह कर दिया । ही इससे सिद्ध हुआ कि - देवतावतार होनेसे ही रामान वानर, रीछ एवं गीधोंमें बड़ी शक्ति थी । ' माहामान बता देवतायाः ' ( निरुक्त, ७४१८ ) देवताओं में अणिमा आदि मनु होता है, अतः वे कई प्रकारके रूप बना लिया करते हैं । विव Initiative
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६८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) हनुमानादि वानर नर थे? [ ६ ९ यद् रूपं कामयते, तत्तदेवता भवति- ' रूपं रूपं मघवा बोभवीति ' र. ( निरु. १०/१७/१ ) तब दूसरी योनिका रूप ग्रहण करनेपर भी नाव उसकी स्वाभाविक अपनी शक्ति नष्ट वा कुण्ठित नहीं हो जाती । उमात्र इसीलिए देवावतार हनुमान् वानर होनेपर भी विद्वान बताये कर गये हैं; क्योंकि- देवता जन्मसे ही विद्वान् हुआ करते हैं-मात्र ' विद्वा ँ सो हि देवाः ' ( शत. ३ | ७ | ३ | १० ) पर यह अदूरदर्शियों मनमें वा साम्प्रदायिकों की समझमें नहीं आता; अतः वे बलात् उन्हें चलको मनुष्य बताते हैं । दमयन्तीको हँसने नलके विषयमें मधुर पाकर वाणी से प्रेरित किया था; तब क्या उस दिव्य पक्षीको मनुष्य 2 बना दिया जावेगा? इस प्रकार दिव्य होनेसे वानरोंमें भी व मनुष्य- सदृशता, मनुष्योंवाले व्यवहार जिन्हें वादी उपक्षिप्त हाँ करते हैं - ब्राह्मणभोजनादि, दही बनाना, कपड़े आदि पहनना, काम सभी उपपन्न हो जाते हैं । ष्य - श इसी प्रकार पुराणोंमें भी जो कि कई सपका मनुष्याकार उन भी दीखता है, वहाँ देवांश होना कारण रहा करता है । सभी वा सांप - वानरादिको हम भी मनुष्यसदृश वा वैसी शक्तिवाले नीको नहीं बताते; किन्तु देवांश, देवावतार वा दिव्य पशुपक्षियोंको ना । ही वैसा बताते हैं । इस प्रकार उनकी स्त्रियां तथा गरुड़, जटायु माम आदि पक्षियोंकी भी दिव्यता होनेसे उनके अलौकिक व्यवहार सामान बताये गये हैं । इसी कारण ही दिव्यतावश अर्जुन आदिका दिऐ मनुष्याकृति नागकन्याओंसे, श्रीकृष्णका ऋक्षकन्या- जाम्बवतीसे हैं । विवाह भी आया है । इसी कामरूपतासे वानर - कन्याओं -CC - 0. Ankur Joshi रुमा, तारा यादिकी यदि पूंछ नहीं भी दिखलाई गई; उनका सुरा आदिका सेवन जो बताया जाता है वह भी उपपन्न हो जाता है । यह तो देवांश वानरादि हुए, विष्णु आदि भी जिन्हें परमात्मा माना जाता है और बन्धनरहित भी दिव्यतावश वे जब मनुष्य रामादिरूपमें अवतीर्ण हो जाते हैं; तब वे भी मानुषी व्यवहार करते हैं; कुछ वन्धनमें आते ही हैं । तभी Collection Gujarat. जो लोग कहते हैं कि - वाल्मीकिरामायण मे राम विष्णु भगवान्-के अवतार नहीं बतलाये गये; वे तो अपने प्रापको मनुष्य कहते हैं— ' श्रात्मानं मानुषं मन्ये ' ( वाल्मी ० ६।११६ ११ ) इसपर यह जानना चाहिये कि - यह वचन तो उनकी मर्यादापुरुषोत्तमताको बता रहा है; नहीं तो मनुष्यका अपने - आपको मनुष्य कहना क्या अर्थ रखता है? वे श्राकृतिमें गाय - भैंस तो लग नहीं रहे थे । वाल्मी. में तो श्रीरामका विष्णुका अवतार होना, श्रादिसे लेकर अन्त तक व्याप्त है । यह हम इस निबन्ध में वाल्मीकिके वचन द्वारा भी सकेतित कर चुके हैं । अन्य पद्योंकी कुछ सूची देते हैं- १११५१११-२१-२२ १२७६।१७, २०१७, ६.११३।११-१२-१३, ११६।१३, ७/१७/३५ हद १३, १०४।१५, ११०।१३ इत्यादि । महर्षि भारद्वाजने अपने आश्रम में आये भरतको भी यह संकेत किया था । चित्रकूटमें भी भरतके रामके लौटानेके अधिक प्राग्रह में बीच में बोलते हुए राक्षसवधाकाङ्क्षी ऋषि - मुनि - देवोंका इस रहस्यमें पूर्ण संकेत किया गया है । युद्धकाण्डमें बहुत स्थलोंमें रामका अलौकिक भाव प्रकट किया गया है । खर - दूषरणके वघके बाद प्रगस्त्य ऋषिने भी यही संकेत किया था । रावरणके मरनेके बाद मन्दोदरीने भी यही संकेत किया था । तब रामायण में रामके अवतार की कथाका कई संशयालुओं द्वारा प्रक्षिप्त मानना असङ्गत ही है । An eGangotri Initiative
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७० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) श्री बलरामने सूतवधके प्रायश्चित्तमें तीर्थयात्रा की । इसी प्रकार जब वे वानरादि भी मानुषी वारणी वा मानुषी ज्ञान रखते थे; तब कुछ - कुछ मानुषी शास्त्रके बन्धनमें आते हैं । दिव्यता भी साथ होनेसे अलौकिक ( लोकोत्तरःकभी लोकविरुद्ध ) कर्म भी वे कर डालते हैं; तब देवांश वानर- रीछ- गीध आदिका क्या कहना? तब दैत्य भी महिषासुर आदि वन जाते हैं, राजा भी बनते हैं: प्रजापर शासन वा नियन्त्रण भी करते हैं । यदि देवांश उन वानरोंने नगरियां भी बना रखी थीं; आदर्श मन्त्री एवं राजदूत भी उनके थे, धर्मशास्त्र वा कर्मकाण्ड भी यदि वे जानते थे; यदि अन्त्येष्टि क्रिया तथा सव्यापसव्य भी करते थे, जो कि अधिकारियोंका उपनयन - सूत्रसे तथा अनधि-कारियोंका गोभिल आदिके अनुसार केवल वस्त्रके बाएँ - दाहने कन्धे पर करनेसे हो जाता है । इसमें असम्भव कुछ भी नहीं रह जाता । हाँ, इनकी आकृति प्रायः वानरादिकी रहती है, पर अप्राकृततावश उसमें मानुषी - पुट तथा देव - पुट भी रहता है ।. जिस पुस्तक में जैसा वृत्त हो; उसकी तदुल्लिखित व्यवस्था भी माननी ही पड़ती है । श्रीवाल्मीकिने आजकलके साधारणं ( प्राकृत ) वानरोंकी यह घटना नहीं दिखलाई, जिससे उसमें असङ्गति प्रवृत्त हो, किन्तु देवावतारोंकी । देवताओंकी शक्ति उच्च- योनि होनेसे लोकोत्तर ही होती है, उनकी शक्तिको प्रतिपक्षी अपनी शक्तिसे न तोलें । तभी वानरोंके लिए कहा है-' कुलेषु जाताः सवस्मिन विस्तीर्णेषु महत्सु [ देवसम्बन्धिषु ] च । CC - 0. Ankur Joshi Collection हनुमानादि वानर नर थे? [ ७२ क्व गच्छत भयन्त्रस्ताः प्राकृता हरयो यथा ' ( ६६२१२१ ) ( तुम उसे उद्धर देवकुलोंमें पैदा होकर साधारण बन्दरोंकी भांति डरसेव भागे जा रहे हो? इस प्रकार विचार चतुं लगाकर और प इच्छ पातका काला चश्मा उतारकर वाढ़ी जब देखेंगे; तब कोई नमः शंका उन्हें अविश्वासके गढ़में गिरने नहीं देगी । आशा है- अर्थ आग्रहवाद छोड़कर वास्तविकताके अनुसन्धानमें लग जायेंगे आ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिके वचनोंके उपन्यास से तथा वादियां विना तर्कोंके उच्छेदसे सिद्ध होगया कि - हनुमानादि असाधारण सिर वानर थे । मनुष्य वा वनवासी अथवा वानरनामक क्षत्रिय था, जातिवाले मनुष्य नहीं थे । इस विषय में पहले युक्ति- विशास श्री पं ० कालूरामजी शास्त्रीने आवाज उठाई थी । फिर श्री हे रहते ला. शान्तिजीने । उनका अनुवर्तन करके हमने भी इस विषय सुग्रीव यह महाभाष्य किया है । आय - ( ४७ ) हम इस निबन्धमें ' क्या रामसेना बन्दर थी । रम्यां तथा ' हनुमान आदि वानर बन्दर थे, या मनुष्य ' इन ट्रे ( कि. पुस्तकों की आलोचना कर चुके । उनके प्रायः सभी तर्क - प्रमारो पहाड पर विचार किया जा चुका है । वे आजकलके साधारण वृन्दा नगर नहीं थे, किन्तु देवावतार विशेष ( अप्राकृत ) वानर थे । कृवृक्ष वानरोंकी, चेष्टायें भी उन्हींकी, पर बल, ज्ञान एवं व्यवहा ( कि. मनुष्यसे उच्च देवताओंका | ' शाखान्तरे लीनं ' ( सुं. ३२१ श्रादिसे उनकी वानर - प्रकृति भी स्पष्ट है, जिसे पूर्व दिखाया ' चुने-जा चुका है । कई अवशिष्ट आपत्तियों पर यहाँ विना उनक शब्द Gujarat. An eGangotri Initiative