सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 371–380

सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 371–380

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श्रीसनातनधर्मालोंक ( ९ ) 1 जन्माग्ने!... ' गुरुकुलके स्नातक आर्यसमाजी रमात्मा ' श्रभवत् । परमत्र - विद्यालङ्कारजीने अपने ' संस्कारप्रकाश ' कैसे कर विद्वान् * श्रीरामगोपाल कलकत्तासे प्रकाशित ) में किया हैं-नमात्मा गोविन्दराम ( - हासानन्द ! तेरा नाम सब जग जानता है । तू जगमें मदकारी प्रसिद्ध लखने का ' हे काम कन्या तेरे मद करनेका एक साधन है । इसकी तू प्रतिष्ठा - सर्वत्र है । यह पंडिताने कर । हे कामाग्नि! तेरा उत्कृष्ट जन्म इसा स्त्रीजातिमें हुम्रा है ।... ' अब उसी कामके साधन स्त्री के अङ्गके लिए स्वाजीजी आगे वादीका मन्त्र लिखते हैं- ' इमं ते उपस्थं मधुना स ँ सृजामि, प्रजापते-मित्र मुखमेतद् द्वितीयम् । तेन पु सोऽभिभवासिं सर्वान् अबशान् को भी वशिनी असि राज्ञी ' ( वहीं ) इसका अर्थ वही विद्यालङ्कारजी वादी लिखते हैं - ' हे स्त्री, मैं तेरे उपस्थेन्द्रियको प्रेमसे युक्त करता हूँ । कामकी सन्तानोत्पत्तिका यही द्वितीय - द्वाररूप है । ' तू इसी ( अपन महिमा उपस्थेन्द्रिय ) के द्वारा वशमें न होनेवाले पुरुषोको भी नीचा दिखाती है दात् [ काबू कर लिया करती है ] । हे घरकी स्वामिनी, तू सबको वश करनेवाली है । ' इत्यादि । विवाह- इसलिए गीता में ' काम ' को भी भगवान्का रूप दिखलाया मन्त्रका गया है - ' प्रजनश्चास्मि कन्दपैः ' ( १०।२८ ) ( प्रजा उत्पन्न करनेवाला वा काम मैं ( परमात्मा ) हूँ, ) ‘ धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोस्मिं भरतर्षभ! ' ( ७/११ ) जब ऐसा है; तो काम के भी सर्वव्यापक जगदीश्वर के वाघन रूपमें होनेसे उक्त वेदमन्त्रमें कामकी ही प्रबलता सिद्ध हुई । जो दिया चक्क मात्रमें देवताओंका भी कामका पार न पा सकना कहा है, चुराते वह श्री. ठीक है, क्योंकि - भोगयोनि होनेसे ( जैसा कि - ' कबीर-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat ' काम ' - मन्त्रका प्रथ 1 ७०५ मतगर्वमदेन ' ( पृ. ३६ पं. १३-१४ ) में वादीने भी स्वीकार है कि - ' मानव - योनि कर्म व भोग - योनि है, शेष सभी किया भागयोनियां हैं ', सो देवयोनि भी मनुष्ययोनिसे योनियाँ केवल ( देखो इसपर ' आलोक ' ४ र्थ पुष्प ) भोगयोनि भिन्न योनि होनेसे देवताओं में संयमी स्वाभाविकतावश सिद्ध हुई । उनको ब्राह्मणभागात्मक वेदमें ' द द द ' कहा गया था, कि - ' तुम अपनी इन्द्रियोंका दमन करो ' ( शत. १४/८/२/२ ) जिसमें वादी वेदविरुद्धता उस उपनिषदात्मक - वेदमें भी असंयमी नहीं मानता, - भोगयोनि देवताओंको ' द द द दाम्यत ' कहा गया है, देखो बृहदारण्यक उपनिषद् अतः देवताओं में भोगयोनितावश ( ५।२।१ ) कामकी प्रबलता होती है, यह हमारा ही पक्ष यहां सिद्ध हुआ । इसलिए स्वा.द.जीको भी लिखना पड़ा - ' ईश्वरके सृष्टिक्रमानुकूल स्त्री - पुरुषका स्वाभाविक व्यवहार [ काम ] रुक ही नहीं सकता, सिवाय वैराग्यवान् पूर्ण-विद्वान् योगियोंके ' ( स.प्र. ४ पृ. ७० ) । फलतः काम की ' विश्वहा ' इस वैदिक विशेषण से सब जगत् के हनन ( हराने ) में शक्ति सिद्ध होनेसे कामकी प्रबलता वेदके मतमें भी सिद्ध हुई, तब ' देवोंसे भी कामका पार न पा सकना ' हमारा पक्ष सिद्ध हो गया । शेष रहा कामका अर्थ बदलकर ' संकल्पमय जगदीश्वर ' अर्थ कर देना; तो भी इससे ' काम ' तो हटा नहीं । अर्थ तो स्वाद का भी बदल सकता है । ' स्वामिदयानन्देन आर्यसमाजः सृष्टः, तेनैव वैदिकः सत्यार्थप्रकाशः कृतः, तेनैव ॠग्वेदादिभाष्य-भूमिका प्रारब्धा, तेनैव व्यवहारभानुः, संस्कारविधिश्व प्रकाशितः । स ० ध ० ४५ . An eGangotri Initiative

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७०६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) तेनैव नियोगः, कमेणा वरणैः, जीवितमातापितृश्राद्धं च जनेषु शिक्षितम्, श्रीरामादयस्तस्यैवांशा: ' इस वाक्यका भी अर्थ बदल सकता है कि - ' दयासे जिसको आनन्द आता है, ऐसे उन स्वामी ( प्रभु ) जगदीश्वरने आर्योंके समाजकी सृष्टि की; उसी ब्रह्मने जगत्में वेदके सत्य अर्थका प्रकाश कर दिया । उसी भगवान्ने ऋग्वेदादि - वेदोंके माष्योंकी भूमिका शुरू कर दी । उसीने व्यवहारकेलिए भानु ( सूर्य ) को प्रकाशित किया, और अपने संस्कारोंको प्रजाके हृदयमें डाला । उसी परमेश्वरने अपनी आज्ञा ( नियोग ), पूर्वजन्म के कर्मोंसे वरणका निर्माण, और जीते माता - पिता आदि पर श्रद्धा ( ' श्रद्धा एव श्राद्धम्, स्वार्थिक अण ' ) लोगोंको सिखलाई, श्रीराम उसी भगवान्‌ के अवतार हैं ' । तब क्या · स्वा.द. आदि ' तथा सत्यार्थप्रकाशादि ईश्वरसे भिन्न सत्ता नहीं रखेंगे? क्या वादी इस अद्वैतवादको माननेकेलिए है तैयार? । ' रेतो मूत्रं विजहाति योनिं प्रविशदिन्द्रियम् ' ( यजुः १६/७६ ) ' यस्यां बीजं मनुष्या वपन्ति । या न ऊरू उशती विश्रयाति यस्यामुशन्तः प्रहरेम शेप: ' ( अ. १४/२/३८ ) यौगिकतावाद मानकर वादी एतदादिक मन्त्रोंका भी अर्थ परमात्मपरक कर सकता है, और किया भी जा सकता है; अतः अर्थ बदलने की नीति से कुछ भी उसका सिद्ध नहीं हो सकता । जब वे वेदमें त्रिविध अर्थ - प्रक्रिया मानते हैं; तो इस मन्त्रका दूसरे अर्थ में कामकी प्रबलतासम्बन्धी अर्थ भी छिपाया नहीं जा सकता । ' इश्क, मुश्क, खांसी खुश्क ' ' कभी छिपाये नहीं छिप सकते ' । CC - 0. Ankur Joshi Collection काम - मन्त्रका अर्थ वस्तुतः उक्त मन्त्रका ' काम ' का हमारा किया अर्थ यहां कामकी पैदायश सबसे पहले बताई ही ठीक है । गलत नहीं है; देखो - भगवान् तो पैदा गई है । यह बात ' होते नहीं; तब उनका पहले पैदा होना क्या? यदि भगवान्‌का प्रकट होना मानोगे; तो यह भगवानका अवतार सिद्ध होगा । अव्यक्त से व्यक्त होना ही अवतार होता है । जगदीश्वरको यदि सङ्कल्पमय मानोगे; संकल्पकी भगवान् के साथ ही उत्पत्ति होनेसे, उसकी सबसे वेद की कही हुई ठीक निकली, जिसे हमने लिखा प्रथम उत्पत्ति ' संकल्प ' ' काम ' को कहते हैं- ' संकल्पोध्यवसायश्च था; क्योंकि-मष्टाङ्ग ' और ' काम'से सब प्रकारका काम गृहीत.. एतन्मैथुन । हो जाता है । मनुस्मृतिमें भी कहा है - ‘ संकल्पमूलः कामो हि ' ( २ ( ३ ) । मनुजीने यहां कामको संकल्पमूलक बताया है । ' नचैवेहास्त्यका मत्ता ' ( २।२ ) यहां कहा है कि- इस संसार में कामको अतिक्रान्त नहीं किया जा सकता । कामकी प्रबलता बताते हुए मनुजीने स्पष्ट कहा है - ‘ श्रकामस्य क्रिया काचिद् दृश्यते नेह कहिचित् । यद्द बंद् हि कुरुते किञ्चित् तत्तत् कामस्य चेष्टितम् ' ( २।४ ) । हम पहले कह चुके हैं कि - ' काम में सब प्रकारका काम श्रा जाता है, उस कामकी प्रबलता दिखलाने के लिए ही मनुजीको कहना पड़ा - ‘ अविद्वांसमलं लोके विद्वांसमपि वा पुनः । प्रेमदा ह्युत्पथं नेतुं कामक्रोधवशानुगम् ' ( २।२१४ ) मात्रा स्वना दुहित्रा वा नः विविक्तासनो भवेत् । वलवान् इन्द्रियग्रामो विद्वांसमर्षि Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ९ ) ७०८ ] | ७०० कर्षति ' ( २१५ ) ' न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । ठीक है । कृष्णवमेव भूय एवाभिवर्धते ' ( २६४ ) इन पद्योंका अर्थ यह बात हविषा स्पष्ट है । यह काम की प्रबलता सिद्ध हुई । उनका भगवान्को भी पहले काम ही पैदा हुआ कि - ' सोका बहु स्यां प्रजायेय ' ( शत. ११ ॥ ८।१ ) सृष्टिकी आदिमें भगवानकी वानका कामयुक्तता देखो शतपथमें - ' स वै नैव रेमे... स द्वितीय मैच्छत्.. होता पतिश्च पत्नी चाभवताम् ।... ता ५ · समभवत्; ततो मनुष्या अजायन्त । कल्पकी साह इयमीक्षा - कथं नु माऽऽत्मन एव जनयित्वा सम्भवति उत्पत्ति , क्योंकि- हन्त तिरोऽसानीति ' ( १४ । ४ । २।४-६ ) । शतपथ ब्राह्मणभागात्मक वेद है; तब मन्त्र- ब्राह्मणकी इस मैथुन-विषय में एकवाक्यता सिद्ध हुई कि काम प्रवल है । क्योंकि है । अपनेसे उत्पन्न स्त्री में भगवान्ने भी कामक्रीड़ा की । अब देखिये-नुजीने कामता भगवान् भी कामको छोड़ नहीं सके; भगवान्‌से उत्पन्न स्त्रीको तो इस ' काम'से शमे आ गई; इसलिए उसने रूप बदल लिया; नहीं ने स्पष्ट तब भगवान्ने भी रूप बदल लिया, और उससे संयोग कर लिया; क्योंकि - सृष्टि तो पैदा करनी थी? वादी भी परमात्माको दू बंदू सृष्टिकर्ता मानता होगा; तब बिना स्त्रीके वादी भी परमात्मा-काम द्वारा सृष्टि पैदा कर सकना नहीं मानता होगा; क्योंकि - वह जीको बादियोंके मतमें पूणेशक्तिमान् नहीं, किन्तु अपूर्ण- शक्तिमान् है; श्रमदा श्रुतः विना स्त्री के सृष्टि कैसे कर सके? उस स्त्रीको चाहे प्रकृति हि कहो, चाहे अन्य कुछ; जब वह परमात्मा ही कामका उल्लंघन समर्पि न कर सका; तब देवता, पितर तथा मनुष्य कामका अतिक्रमण CC - 0. Ankur Joshi Collection काम - मन्त्रका प्रर्थ [ ७०६ कैसे कर सकते हैं? । तत्र वही हमारा अर्थ आकर ठीक निकला | ' एनं ' से उक्त वेदमन्त्र में ' कामम् ' इष्ट है, पर वादीने इससे अपना पक्ष कटते देखकर ' उसके समान पदको ' यह बनावटी वा गलत अर्थ कर दिया; ' एनम् ' पुंलिङ्ग है, और ' काम'का प्रतिनिर्देशक पद हैं; वहां नपुंसकलिङ्गान्त ' पद ' शब्द कैसे गृहीत हो सकता है? ' उसके समान पदको सूर्यचन्द्रादि देवगण वा विद्वान् पुरुष और मां - बाप या ऋतुएँ और मनुष्यादि प्राणी प्राप्त नहीं होते ' यह वादीका अर्थ कितना गलत है! विद्वान मनुष्य, मां वाप, और मनुष्यादि प्राणी क्या अलग - अलग होते हैं? क्या मनुष्योंमें मां - बाप तथा विद्वान् पुरुष नहीं गृहीत होते थे; जो कि वादीने उनको पृथक् गृहीत किया? यह गलत अर्थ करनेका परिणाम है । यहां मां - बाप क्या परमात्माके बताये गये हैं? वस्तुतः देवता तथा पितर मनुष्यसे भिन्न योनि हैं; इसलिए उक्त मन्त्र में उनका पृथक निर्देश है । इस विषय में ' आलोक ' ( ४ ) पृ. ४०५-४२०, ४२१-४३७ देखो । अन्य इस वादीके अर्थकी अशुद्धताका कारण यह है कि-वादी के स्वा. द. जी लिख गये हैं कि - ' ऐसी प्रार्थना कभी न करनी चाहिये, और न परमेश्वर उसका स्वीकार करता है कि जैसे है परमेश्वर! आप मेरे शत्रुओंका नाश करो ' ( स.प्र. ७ पृ. ११३ ) इत्यादि; और इस कामसूक्त ( अथर्व ६२ ) में शत्रुनोंके नाशकी ही प्रार्थना भरी पड़ी है; तब वादी अपने ऋषिके प्रतिकूल इस सूक्तमें Gujarat. An eGangotri Initiative

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७१० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) परमात्माका अर्थ नहीं कर सकता । ' देवता आदि उस परमात्माका पद प्राप्त नहीं कर सकते '; इस वादीके अर्थके अनुसार देवताओंका परमात्माके समकक्ष होना तो सिद्ध हो गया । इत्यादि रूपसे इस अर्थ में वादी के पक्षमें बहुत दोष आते हैं; अतः वह अर्थ उपेक्षणीय है । जब उसका अर्थ खण्डित हो गया; और हमारा ही अर्थ वेदको इष्ट सिद्ध होगया; तब पुराणोंकी भोग - योनि देवताओं पर वादियों द्वारा किये जाते हुए आक्षेप वेद - द्वारा ही समाहित हो गये । इसलिए यमी द्वारा देवताओंके लिए कहा गया है- ' उशन्ति घा ते अमृतास एतद् एकस्य चित् त्यजसं मर्त्यस्य ' ( ऋ. १०/१०/३ ) इसका अर्थ यह है कि- अमृतासः ( वे प्रसिद्ध देवता, अमृत देवताओंका नाम होता है ) एतत् सर्वस्य त्यजसं ( एक योनि होनेसे मनुष्य के त्यागयोग्य भी स्त्रियोंकी ) उशन्ति ( कामना करते रहते हैं, वश कान्तौ ) । ' मरुतः ( देवा: )... कामिनः ' ( ऋ. ७७५६।३ ) यहां देवताको ' कामी ' बताया गया है. काममें भोगयोनि होने से देवताओंके सभी काम आ जाते हैं । देवोंके कामी होनेका संकेत मन्त्रब्राह्मणभागात्मक वेदमें भी देखिये । वृद्ध च्यवनकी स्त्री सुकन्याको अश्री देवता कहने लगे कि तू इस बूढ़ेके पास क्यों रह रही है, आ हमारे साथ । पर उस मानुषीने यह स्वीकार नहीं किया और कहा - जिसे मुझे पिताने दिया है; उसे मैं जीते - जी नहीं छोडूंगी । ( शत. ४/१/५/१ ) । उर्वशीको देखकर मित्र- वरुण देवताका शुक्रक्षरण हो गया ( निरु. ५/१३/१. CC - 0. Ankur Joshi Collection काम - मन्त्रका अर्थ [ o ७ ५१४१ ) । ' तां च प्राप्तयौवनां मेनां स्वयमेव इन्द्रःचकमे ' । रह १५१/१३ के भाष्यमें शाठ्यायन - ब्राह्मण तथा ताण्ड्यवाहारास वचन ) | ' कामी हि वीरः ' ऋ (. २/१४/१ ) ' जारमिन्द्र ४२।२ ) यहां इन्द्रको कामी एवं जार बताया गया ' है ( ऋ ।. ( ५ ) विषय में ' आलोक ' ( ६ ) पू. ४७६-४८१, ४६५-४६८ स ) देखो सत्त्वमिश्रित रजोगुणसे उनकी उत्पत्ति एवं भोगयोनि होनेसे उनमें काम अनिवार्य है । जब ऐसा है; तय वेदोंके भाष आ पुराणों में वर्णित भोगयोनि - देवचरित्रोंपर आक्षेप करना वादीश दिव अपने - आपको वेदानभिज्ञ सिद्ध करना है । बल ( ग ) ‘ केदारकल्प ' से जो ' वीर्य ' पीने का विधान वादी देश है; इस पर पूरा उत्तर ' आलोक ' ( ७ ) प्र. १७०-१७४ में इसने रे के दिया है, वादी उसपर चुप है । ( घ ) राजा प्रियव्रत का ११ भरत राज्य वादीने दिखलाया है, वहाँ ' अचुद ' का ' अरब ' अर्थ काल उस गलत है, इसपर ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ८५-८६ में वह देखे । इन प्रियव्रतके रथके पहियोंकी लकीरसे ७ समुद्र बने, इसे वाहीरे करव पौराणिक गपोड़ा माना है; पर वह याद रखे कि नाश उत्ता प्रियव्रत ब्रह्मा देवताके वंशान्तर्गत थे; उसने अपने रथसे सूर्व रूपस ७ बार परिक्रमा की । इससे उसके रथकी विशेषता समभी ज उसम पुरान सकती है, वह रथ वादीके रथकी भांति नहीं था । आजक मोटरकार और बसें तथा रेलगाड़ी भी रथ - विशेष हैं । इसे ५३२-कितनी शक्ति हैं, इनमें अग्नि देवता इन्द्रदेवता ( विजली ) व परम दिव्य बल है, बारूदोंमें, वमों में यहीं अग्नि - देवता काम अ Gujarat An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) ७१२ ] है । कितने हज़ारों मनके भारको उठा कर अग्नि-रहा होता देवता भागता जा रहा होता है । पहाड़ोंको भी तोड़ कर अग्नि-ब्राह्मणश गिरा देता है, जमीन को भी जल्दी ' काटकर नदी वा ऋ (. १५ देवता समुद्र बना देता है । ऐसे बम हैं, जो ऐसी गहरी मार करते हैं है । कि- पृथ्वी में गहरे घुस कर उसे खोदकर पाताल का पानी तक = ) देखो देते हैं । राकेटों में इतनी शक्ति है कि वे सीधा चन्द्रलोक नि होटसे निकाल के भाक आदि जो बहुत ऊँचे लोक हैं, उन तक पहुँच जाते हैं यह सब दिव्यवल है । वादी यदि इस अग्नि, इन्द्र आदि देवताओंके वादीश ' बलका मनन कर लेगा तो फिर उसकी शक्ति नहीं हो सकेगी दीदे कि - फिर वह राजा प्रियव्रतके रथपर शङ्का कर सके । आजकल-के राकेट भी जिस सूर्यको नहीं पा सके; उस सूयँकी सात हमने दे ११ परिक्रमा में प्रियव्रतके रथकी विशेषता व्यक्त हो रही है; तब नर्थ करना उसके रथकी लीकसे समुद्रोत्पत्तिमें कुछ असम्भव नहीं । वादी ह देखे । इन बातोंके खण्डनसे कुछ पा नहीं सकेगा; किन्तु उनका मनन वाहीरे करके वैज्ञानिक शक्तिका रहस्य ज्ञात कर सकेगा 1 । उसीके भ्राता किन उत्तानपादका लड़का ध्रुव अपने नाम से ख्यात ध्रुवलोक में तारे से सू रूपसे अब भी विराजमान है । आजकलके वैज्ञानिक पता नहीं, सभी उसमें कितनी लक्षाब्दियों के बाद पहुँचें । सो आजकी तराजू से जल पुरानी बड़ी वस्तुओं का तोलना बुद्धिमत्ता नहीं । ( ङ ) गोपियोंकी चीरहरण - कथा पर - आलोक ' ' ( ७ ) पृ. जली ) १३२-३३, ६५७-५६ देखने चाहियें तथा इस पुष्पमें भी अन्यन्त्र । काम परमात्मा अब भी गोपियों तो क्या, सभी स्त्रियोंको नङ्गी देख CC - 0. Ankur Joshi प्रणिमा प्रादि सिद्धियोंका प्रभाव [ ७१३ रहा है, उससे कपड़ेका भी क्या कभी श्रावरण हो सकता है? श्रीकृष्ण वहां पर लौकिक बालक तो नहीं है, किन्तु दिव्य विष्णु-भगवान्‌के अवतार हैं; लौकिक दृष्टिमें भी वे ६-७ वर्षके बालक थे; अतः वहाँ चाहे ब्रह्मदृष्टि हो, चाहे मानुषी दृष्टि, किसी दोष-का लेश भी नहीं हो सकता । ( २२ ) वामनपुराण ( १७.२ - १० ) में महादेवसे कदम्ब, कुवेरसे वट, कात्यायनी के शरीरसे शमी आदि वृक्षोंकी उत्पत्तिमें वादी-ने गप्प मानी है; इसपर वादी याद रख ले कि - देवताओंमें अणिमा - महिमा, प्राकाम्य - प्राप्ति आदि अलौकिक सिद्धियां हुआ करती हैं, उनसे जैसी उत्पत्तियाँ वे चाहें, कर सकते हैं । अणिमा आदि सिद्धियोंको प्रतिपक्षीके स्वामी भी अपने यजुर्वेदके भाष्य में मान गये हैं । यह सिद्धियाँ जिनके पास श्री जावें; वहाँ असम्भव - शब्दकी प्रवृत्ति कभी हो योगदर्शन विभूतिपादका अध्ययन में वादी अपने स्वामीकी भी स्वामीजी से निवेदन किया कि विभूतिपाद क्या सच्चा है? उन्हों यों ही सन्देह करते हैं । योगशास्त्र यानन्दप्रकाश प्र. ४६५ ) । शतपथन्ना. जिसे स्वा.द.जी बताकर उसे प्रमाण मान गये हैं, बताई गई हैं ( १२ / ७ / १ / १-६ ) ही नहीं सकती । जरा वादी करे । इस योगदर्शन के विषय-सम्मति सुने- ' एक सज्जनने भगवन्! पातञ्जल - शास्त्रका [ स्वामीजी ] ने कृपा की- ' आप तो अक्षरशः सत्य है ' ( श्रीमद्द-अपने वेदभाष्यकी कसौटी उसमें भी ऐसी उत्पत्तियाँ Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 376

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७१४ j श्री सनातनधर्मा लोक ( 8 ) ( ख ) विष्णुपुराण ( २।२।५- १२ ) के भूगोल के वर्णनको वादीने गलत बताया है । जैसे आजकलके परिणाम अनुमानपर आधारित हैं, वैसे पहले भी होते थे; तथापि पहले द्युलोककी भूमियोंका वर्णन भी कर दिया जाता था, पातालका भी; अतः अदृष्ट - भूमियोंके परिमाणपर वादीका कुछ न बोलना ही अच्छा है । वह यह बातें स्वयं तो जानता नहीं; दूसरों के कहने से कहता है । आजकल बहुतसे यन्त्र बन गये हैं; पहले बिना यन्त्रोंके विविध वस्तुओं का परिमाण किया जाता था । योग-दर्शनके व्यास - भाष्यमें ( ३।२६ ) में भी इसी प्रकारका वर्णन है । अभी - अभी हमने स्वा.द. जीका भी प्रमाण दिया है कि वे योग-दर्शनका अक्षर - अक्षर मानते थे उन्होंने योगदर्शन के व्यास -भाष्य के विषय में भी लिखा है- ' शारीरकसूत्र, योगशास्त्र के भाष्य यदि व्यासोक्त ग्रन्थोंके देखनेसे विदित होता है कि व्यास जी बड़े विद्वान्, सत्यवादी, धार्मिक, योगी थे ' ( स.प्र. ११ पृ. २०६ ) । इसलिए ही स्वामीने योगसूत्रों पर व्यासभाष्यको स.प्र. ( ३ पृ. ४२ ) सं.वि. ( प्र. ११२ ) तथा ऋभाभू. ( पृ. २६३ ) में ग्राह्य तथा प्रामाणिक माना है । अब दयानन्दी वादी स्वा. दयानन्दको झूठा सिद्ध करके अपनेको सच्चा बनावे । ( २३ ) पू ० - पुराणों में तीर्थों, व्रतोंकी कथाओं एवं उनके - माहात्म्योंकी भरमार है । नानाप्रकारकी गप्पें उनका महत्व दर्शाने एवं भक्तोंको भ्रम में डालनेकेलिए गढ़ - गढ़कर पुराणों में भर दी गई हैं । किसी भी देवता के नामस्मरणसे, किसी भी अर्थवादका तात्पर्य समझो तिथिको व्रत रखनेसे, गंगा आदि नदियों में स्नान बल्कि उनका नाम लेने मात्रसे, किसी भी देवता ही नहीं, का की मूर्ति पूजन व दर्शनसे, माथेंपर त्रिपुण्ड्र, ऊर्ध्वपुण्ड्र आदि साईन बोर्ड लगाने से, शरीर में केवल भस्म मात्र लगानेसे तिलक | क आदि अथवा एक लोटा जल शिवजी पर चढ़ा देनेसे,, वेलपत्र | हुथ बनवानेसे, मन्दिर में झाडू लगा देनेसे, पुराणोंके मन्दिर वा पाठ ही नहीं, केवल एक - दो लोक सुन लेनेमात्रसे सस्ती मुक्ति प्राप्त करनेवा विधान पुराण में मिलेगा । बड़ेसे बड़ा पाप कर डालनेपर मी | उससे छूटनेकी सरलतम विधियाँ पुराणों में दी हैं; तो फि बा कौन व्यक्ति होगा, जो सदाचार, स्वाध्याय, ' ईश्वराराधन, योग, जिन यज्ञ, तप आदिके अनुष्ठान में समय लगावेगा । पाप उ ० — इसे अर्थवाद कहा जाता है । अर्थवादमें सभी शब्दों व्यप का अर्थ नहीं देखना पड़ता, किन्तु उसका तात्पर्य देखना पड़ा । तव है । देहली में एक पाचन चूर्णं बिकता है, उसका नाम है । सम ' लक्कड़हजम, पत्थरहज़म ' । तब क्या वादी इसका हाइमे गाव तात्पये न समझकर शब्दों के अर्थमात्र देखता हुआ उक्त सद खाकर फिर पत्थर तथा लकड़ी भी उठाकर खाने शुरू हो अख जायगा? अथवाद तो वेदके ब्राह्मणभागका भी विषय है । पुङ्ग इसमें गुणवाद, अनुवाद और भूतार्थवाद - यह तीन भेद हो सं हैं । किसी बुरी इल्लतको छुड़ाने के लिए गुणवादका भ जान वचन- जिसे निन्दार्थबाद कहा जाता है, किसी शुभ का है । प्रवृत्तिकेलिए रोचकं ' वचन - जिसे प्रशंसार्थवाद कहाँ जाता है- पर CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालांक ( 8 ) ६ ] काम देता है नहीं, का प्रयोग बड़ा जिनमें मूर्तिक एवं सारे सम्प्रदाय, तिलक है । उसीसे वह कई डे करता सारे जन्म में बेलपत्र हुआ है । इसमें । ऐसे व्यवहारको सारा संसार दयानन्दी - समाज भी शामिल है-लाख अनुयायी बनाने में सफल गोभक्षक, गोहिंसक रहा मुसलमान भी पाँच मिनटके छटांक भर घृतके दयानन्दी संस्कार-मन्दिर ईसाई मन्त्रों द्वारा चाहे वे वेदसे भिन्न भी हों, अग्निमें डालने-ही नहीं, विधि से शुद्ध हो जाता है । पाँच मिनट आँखें बन्द करके चुस्त होकर करनेवा बैठनेसे मुक्तिका अधिकारी बन जाता है । कोई बड़ी तपस्या तो श्री । वा योगकी आवश्यकता नहीं । मनुजीने सन्ध्या करनेपर योग जिसे आयसमाजी ५-६ मिनटमें कर लेते हैं, रात और दिनका पाप दूर हो जाना कहा है- ' पूर्वी सन्ध्यां समासीनो नैशमेनो शब्दो व्यपोहति । पश्चिमां तु समासीनो मलं हन्ति दिवाकृतम् ' ( २।१०२ ) ना पड़ा तब क्या वादी यह मनुजीकी गप्प मान लेगा? स. प्र. की ११ वें नाम है समु. की गाली - वर्षा में स्नान करनेसे तथा अन्य सम्प्रदायोंपर हाजमेरें गाली देनेका ढंग आ जाने से, दयानन्दी - समाज में चार आनेका चूर्ण सदस्य बन जानेसे, उसका लैक्चर अटैण्ड कर लेनेसे, उसका शुरू हो । अखवार मँगा लेनेसे, स्वामी के वेदभाष्य पढ़ लेनेसे वह वैदिक-पय है । पुङ्गव मुक्तिके द्वारका पथिक वन जाता है । न तो तब उसे नेद होते संस्कृत भाषापर माथापच्ची करनेकी ज़रूरत है, ( संस्कृत भाषा न जाननेपर भी देहलवी आदि ' शास्त्रार्थंमहारथी ' बना दिये जाते का है । हापुड़ सनातनधर्मे सभा द्वारा संस्कृत में पत्र - व्यवहार करने-ता है- पर उनने उत्तर देना ही बन्द कर दिया था ) और न उसे वेद CC - 0. Ankur Joshi वेदमें भी प्रर्थवाद [ ७१७ वा दर्शनोंपर परिश्रमकी आवश्यकता है । उसका सुधार होगया । दूसरोंके केवल दोष खोद - खोदकर निकालते चलो, दूसरोंको गन्दी गन्दी गालियाँ देते चलो, ज्ररा कुतर्क तथा दुराग्रह पकड़ लो, बहस करनेका ढंग सीख लो, दूसरोंकी सुननी नहीं, इटको छोड़ना नहीं, अपने ही पूर्वजोंको गाली देते चलो, लैक्चर देनेका ढंग सीख लो, मेजपर हाथ पीटकर, होहल्ला मचाकर, जनताको खींच लो, छोटे - छोटे उत्तेजक ट्रेक्ट बनाकर पुराणोंके दोष चुनते चलो, गुण छिपाते चलो, फिर पौ बारह हैं । यह ' वैदिक प्रकाशन ' हो जाता है । फिर वह उस सम्प्रदायका नेता हो जाता है, बड़ा भारी विद्वान् हो जाता है । महाशय! यह अर्थवाद कहाँ नहीं होता । यह वेदमें भी प्रयुक्त है, पुराण उसी वेदका विस्तीर्णे भाष्य ही तो है । वेदकी पावमानी ऋचाओं ( सं. के नवममण्डलमें अथवा सामवेद-सं. के पवमानपर्वमें आई हुई ) के पाठमात्र वा स्मरणमात्रका माहात्म्य वेदमें देखिये, क्या लिखा है- ' पावमानीर्यो अध्येति ऋषिभिः सम्भृत् रसम् । तस्मै सरस्वती दुह्रे क्षीर ँ सर्पिर्मधू-दकम् ' साम. उत्त. १०/७/२ ) यहाँपर पावमानी ऋचाओं के केवल स्मरण कर लेनेसे भी दूध, घी, मधु, सोमकी स्वयं प्राप्ति हो जानी लिखी है । ( यही मनु. २।१०७ में वेदपाठका फल बताया है ) ‘ पावमानीः स्वस्त्ययनीः, ताभिर्गच्छति नान्दनम् । पुण्याँच भक्षान् भक्षयति अमृतत्वं च गच्छति ' ( साम. उत्त. १०/७/६ ) यहाँपर पावमानी चाओंसे स्वर्ग वा मुक्ति तक हो जाना - लिखा Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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७१८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ह ) है । इस प्रकारके बहुतसे मन्त्र हैं । कहीं वेदमें दर्भकी ही भारी महिमा दिखलाई है ( श्र. १६।३३।३ ) । कहीं सोमका ही बड़ा माहात्म्य दिखलाया है । ( ऋ.६६६५ ) । कहीं मेखलाकी ही भारी प्रशंसा आई है । ( अ. ६१३३।३ ) । कहीं ओषधिविशेषका ही बड़ा माहात्म्य है ( अ. ४/२०१२ ) । मधुकशाके लिये ही वेदमें अत्युक्ति देख लीजिये ( अ. ६१४ ) । फलतः वेदसे ही पुराणोंने देवतावाद तथा अत्यन्त माहात्म्य सीखकर उसका प्रयोग किया है । भूतार्थवाद तो पुराण - इतिहास स्वयं हैं ही, इससे वैदिक सिद्धान्तों में प्रवृत्त करने में बड़ी सहा-यता मिलती है । पुराण प्रत्येक के चरित्रके अनुकरण में कभी विधि नहीं करता; वह लोकोत्तरशक्ति वालोंके आचरणोंका अनुकरण करनेका बलपूर्वक निषेध करता हैं । उनमें कई तो भोगयोनि होते हैं, भोगयोनिके सभी चरणोंका अनुकरण कर्मयोनियोंके लिए कर्तव्य नहीं हुआ करता; और कई कर्मयोनि होते तो हैं; पर लोकोत्तरशक्तिवश उनका भी सारा आचरण ग्राह्य नहीं होता । लोकोचर शक्ति वाले जो धर्मशास्त्रानुकूल आज्ञा दें; वह ग्राह्य होती है । इसलिए ही न्यायदर्शन ( ४/१/६२ ) में पुराण-इतिहासका मुख्य विषय धर्मव्यवस्थापन न होकर लोकवृत्त-प्रतिपादनमात्र रखा गया है । धर्मव्यवस्थापना तो धर्मशास्त्रका मुख्य विषय कहा गया है । 1. सो वादीको इन बातोंका ज्ञान करके केवल खण्डन, वा पुराणोंकी महिमा निन्दन वा गाली देने में प्रवृत्ति हटाकर गुणज्ञतामें प्रवृत्ति चाहिये; तब तो पुराणाँसे उसे मोती मिलेंगे; तव पुराणादिके करनी मन्थनसे उसे अमृत भी मिल सकेगा नहीं तो ऊपर मनसे उसी पुराण - समुद्र से उसे विष मिलेगा उससे - ऊपर के , वह जल जायगा । फिर उसे महादेवको ढूँढना पड़ेगा । इन्हीं पुराणोंका ही महत्त्व समझो कि मुसलमानी कर ज़माने में तुम्हारे हमारे पूर्वजोंने मरना वा जलना मन्जूर किया; फिर भी उनके सम्प्रदायको नहीं अपनाया । अपनी स्थिति मजबूत रखी । यद्द सभी मानत हैं । ईसाइयोंके इस मोहक युगमें भी यही पुराण ही तुम लोगोंको बचाये हुए हैं, नहीं तो तुम सब अँग्रेजी पढ़ें-लिखे व्यक्ति ईसाई बन गये होते । कृतघ्न मत बनो । तुम अभी तक भी दयानन्दी बने हुए हो, यह दयानन्दी अर्थवादोंका ही परिणाम है । सो उन पौराणिक - अर्थवादोंका भी तात्पर्य समझने का प्रयत्न करो । उनपर रिसचे करो । वहां जिस - ब्रिस् वस्तुका अत्यन्त माहात्म्य लिखा हो, वह वस्तु अत्यन्त लाभप्रद् प्रमाणित होगी - यह तात्पर्य समझ रखौ । जैसे कि -तुलसी - श्रांबला आदि । इनके पुराणोंमें अत्यन्त माहात्म्य देखने पर अनुसन्धानसे यह बहुत लाभप्रद प्रमाणित हुए हैं । इसी प्रकार विल्वफल तथा बिल्वपत्र शिवपर चढ़ते हैं; और शिव ( कल्याण ) देने में, पुरुषके स्वास्थ्य रखने में, अपना अचूक प्रभाव दिखलाते हैं । असली रुद्राक्षकी माला गले में पहनने और छाती के साथ लगे रहने से रक्तचापकी बीमारी रुकती है । ऐसे लाभको प्राप्त करने के लिए CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) ७२० 7 उसकी प्रवृत्ति करानेकेलिए ' लक्कड़ हज़म, पत्थर हज्रम ' जनता श्रादि पाचक चूर्णोंकी तरह वहुतसे अर्थवाद भी किये जाते हैं । ऊपर के अर्थवादों में सभी शब्दोंका अर्थ ग्राह्य नहीं होता; किन्तु उसका इजल तात्पर्यही प्राह्य होता है । क्या बादी उक्त चूर्ण खाकर लकड़ियां पत्थर खाना भी शुरू कर देगा? यदि नहीं; तब वहां हमारे वा ग्राह्यता तात्पये समझना चाहिये, उनकेलिए कहे हुए रुद्राक्षकी उनके सभी शब्दों का अर्थ वहां नहीं लिया जाता । यह हज़ारों वर्षकी विश्वामित्रादिकी तपस्यायें पुराण ही वत्ताते पुराण हैं, जिन्हें तुम गप्प मानते हो; तब यह कहनेका साहस कैंसे करते हो कि पुराणोंने मुक्ति सस्ती कर दी है? वे पात्राऽपानका मजो विचार करके अधिकारभेद कहते हैं । योगमहिमा, ईश्वराराधन, दोंका सदाचार आदि वे ही बताते हैं । यज्ञोंकी महिमा, वेदाध्ययनकी वात्पर्य वा मन्त्रकी महिमा तुम लोगोंने पुराणोंसे ही तो सीखी है । - जिस शेष रहे पुराणप्रोक्त चरित्र । पुराण स्वयं सूचित करते हैं कि भप्रद उनके वेदधर्मशास्त्र से अविरुद्ध चरित्र ही अनुकृत करो, सभी नहीं । महादेवको विषपान करते देखकर तुम भी विषपान करोगे; तो तुम मरोगे - जलोगे । बे ईश्वर ( लोकोत्तर ) होने से तथा उनको पचा जाते हैं; पर तुम पचा नहीं सकते । इस विषय में ' आलोक ' ( ७ ) में ' पौराणिक चरित्रलोचन ' का मनन करो । संब समाधान प्राप्त होंगे । तुम क्या स्वाद के चरित्रों- भांग पीना, हुक्का पीना, नसवार सूँघना, मारी हुई धातुएँ खाना, रुद्राक्षकी मालाएँ पहरना, शुरूमें ही संन्यासी बन जाना, संन्यासमें ही CC - 0. Ankur Joshi Collection मूर्तिपूजाका कारण [ ७२१ कामवर्धक घातुओंकी भस्में खाना आदि शुभाशुभ सभी कर्मों को अनुकृत करना ठीक समझते हो? वा उनके व्यसनोंसे उनकी निन्दा करते हो? पुराणोंकी निन्दा करनेका प्रबल प्रायश्चित्त फरो; तब तुम्हें सभी रहस्य धीरे - धीरे प्राप्त होते जाएँगे, कुछ प्राप्त हो भी चुके हैं - यह जरा पक्षपातसे ऊपर उठकर देखो । देवता अङ्गी - भगवान्के अङ्ग हैं । अङ्गीकी पूजा श्रङ्गों द्वारा ही हुआ करती है; तब देवपूजासे श्रात्मस्वरूप भगवान् ही फल दिया करते हैं । पुराणोंमें जो देवपूजा बताई गई है; उसका मूल वेद है । उसमें प्रवृत्ति करानेकेलिए यदि पुराणमें अर्थवाद प्रयुक्त किये हैं. तो उनका तात्पर्य समझो । गीता कहती है कि-उन अर्थवादों में न लगे रहो; उनमें प्रोक्त कमको निष्काम होकर करो । तब तुम्हें सीमित नहीं, किन्तु असीमित फल मिलेगा | भस्मका वा चन्दन लंग्रानेका लाभ आलोक ' ' ( ५ ) में देखो । शिव श्रादिकी मूर्तिपर जल वा चन्दन आदि लगाना देवपूजा है । उसमें श्रद्धा हो और उसे भगवानका पूजन हृदयसे समझो; तो बड़ा फल मिलेगा । तुम भी तो भगवान् की उपासना मानते हो । केवल भेद यह है कि तुम लोहू, चमड़ा, हड्डी आादिसे- आवृत जड हृदयकी मूर्ति में उस भगवान्को पधराते हो; और दूसरा पक्ष भी हृदयमें पघरानेकी मनाही तो नहीं करता है । पुराण ही ने तो तुम्हें हृदय में भगवानकी उपासना सिखलाई है । देखो - अर्चायां ( मूर्ती ) - स्थण्डिलेऽग्नौ चा, सूर्ये स ० ध ० ४६ Gujarat. An eGangotri Initiative

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७२२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) वासु, हृदि, द्विजे । द्रव्येण भक्तियुक्तोऽर्चेत् स्वगुरु माममायया ' ( श्रीमद्भा. ११ / २७ / ८-६ ) यहां मूर्ति के अलावा अपने हृदय में भी, अग्नि में भी, सूर्यमें भी भगवान्‌की पूजा पुराणने कही है । यह भी मूर्तिपूजा ही है । पत्थरकी भांति जड़ हृदय में तुमने भगवान्की पूजा की, वा ध्यान किया; पर दूसरा पक्ष वेदमन्त्रसे प्रतिष्ठापित पत्थर आदिकी मूर्ति में भी भगवान्‌को पधराताः है । :: तुम यदि लहू - चमड़े यादिका ध्यान न करके हृदय में पधराये हुए भगवान्‌को ध्यान करते हो; इसी प्रकार दूसरा पक्ष भी पत्थर आदिका विचार न करके उसमें प्रतिष्ठापित भगवान् का ध्यान करके यह सूचित करता है कि भगवान् केवल हमारे अन्दर वहीं हैं, वे बाहर भी हैं, सर्वत्र भगवान्‌की महिमा देखो । तब उसपर निन्दा क्या? गाली - गलौजकी वर्षा क्या? जड़ हृदयमें भगवान्‌के पूजक तुम भी मूर्तिपूजक; वे भी पत्थर की मूर्ति में भगवान्को पूजते हुए '. मूर्तिपूजक हैं । दोनोंमें पूरी समानता है । पूजाके भी कई प्रकार होते हैं । सो योग, स्वाध्याय, ईश्वरासन भी पुराण ही बताता है, पर अल्पश्रुत वादी यह नहीं समझ पाता, कि - पात्रभेदसे अधिकार भेद होता है । सो उच्च पात्र, योग्य अधिकारी, योग एवं कठिन तपस्या आदि कठिन आराधना करेंगे, और साधारण लोग, कामकाजी लोग नामस्मरण, कीर्तन आदि, जिसे वेद भी स्तोत्रमिन्द्रायः गायत ' ( ऋ. ८।४५।२१ ) इत्यादि सैकड़ों मन्त्रों में गायत आदिरूपसे बताता है- करेंगे । इस प्रकार पहली सीढ़ीपर आक्षेपोंका परिहार चढ़कर क्रमशः अन्तिम सोपान तक भी पहुँच दोनों स्थान बराबर ही होता है । कहा भी है- ' ईश्वरा जाएँगे ॥ लभते फलं किल । दरिद्रस्तच्च काकिण्या प्राप्नुचादिति भूरिदानेन । ( पञ्चतन्त्र ) । नः श्रुतिः । ( साहूकार लोग लाखोंका दान करके जो करते हैं; उसी फलको गरीब लोग कौडीका फल प्रश दान करके भी पा सकते हैं । ) तुम दान देना सिखलाओ । यदि कोई दान करता है, तो तुम उसका उपहास करके उसकी कौडीका । प्रवृत्तिको न हटवाओ; उसे उत्साहहीन मत करो, सामथ्यं आजानेपर कभी वह भी बड़े दान करेगा । याद रखो गीताका । ' न बुद्धिभेदं जनयेद् अज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् । जोषयेत् सर्वकर्माशि वचन | विद्वान् युक्तः समाचरन् ' ( ३ २६ ) । आशा है - वादी इतने से ही सब समझ जावेगा । न समझेगा; तो फिर यह समझना पड़ेग कि - वह न तो अज्ञ है, न विज्ञ है किन्तु ज्ञानलवदुविंदश्य है । तब वैसेको तो ब्रह्मा भी नहीं समझा सकता । ' अज्ञः सुखमारायः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः । ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्मापि नरं च रञ्जयति ' ( भतृहरि ९ ३ ) । ( २४ ) ' देवीभागवत ' ( ५६१६।१२ ) में लिखा है - पुराण अनेक धूर्तोंने बनाये हैं । इसका प्रत्युता ' आलोक ' ( ७ ) पृ. १२१-१२५ में देखो । ( २५ ) पू + पुराणों का बनानेवाला कोई एक व्यक्ति नहीं रहा है, अतः किसी का यह दावा करना कि - पुराण चेदव्यासने बनाने हैं, एकदम गलत है ।: भागवतको दैत्यगुरु शुक्राचायेकृत चमकने CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat: An eGangotri Initiative