सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 381–390

सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 381–390

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ९ ) ७२४ ] उसकी प्रामाणिकतापर एक भीषण प्रहार किया रिदानेर भविष्यपुराणने भागवत में कृष्णको गोपियोंका सुरतनाथ ' ( १० | ३२ | २ ) है । : बदनाम किया गया है; अतः यह बात कुछ जँचती भी है । बताकर शुक्राचार्य ही उसके बनानेवाले होंगे । - दैत्यगुरु ला उ ० — जब पुराणोंका वनानेवाला एक व्यक्ति नहीं है, यह करके भी वादी मानता है; तो इसीसे ही तो पुराणोंका अनादित्व सिद्ध कोडीदा हो रहा है । यह सब पुराणोंके प्रवक्ता हैं । श्रीव्यासजी भी जो प्रवृत्तिको पुराणसम्पादकोंकी उपाधि है; उन पुराणोंके प्रणेता नहीं, जानेपर । किन्तु संयोजक हैं । वेदानुसार देवताओंका बाहुल्य होनेसे वचन- वेदोंके भाष्य पुराणोंमें भी अपने - अपने देवताके विषयमें दृढ-कर्मा सि निष्ठास्थापनार्थ अन्य देवकी निन्दा केवल अर्थवादमात्र प्रति-से ही फलित होती है; पर यह बात ' नहि निन्दा निन्द्य ं निन्दितुं प्रवर्तते, किन्तु निन्दिताद् इत्तरं विधेयं स्तोतुम् ' इस मीमांसाके न्याय जाननेसे ज्ञात होती है, अन्यथा नहीं । नारायः भागवतको दैत्यगुरु - शुक्रसे प्रोक्त बताना वादीकी सममकी नरं - व कमी है । वहां ‘ दैत्यगुरु - शुक्राचार्य ' यह कहां कहा है? ' शुकप्रोक्तं १२ ) मे भागवत ' में ' शुक्रप्रोक्तं ' यह लिपिकरकी वा छापेकी भूल है । प्रत्युत्तर जैसे कि - वादीकी श्रीमद्भा. समी. पृ. १६ की ३ री पंक्ति में ' शुक ' का ' शुक्र ' छप गया है । वहां ' विज्ञानं च शुकस्य ह ' के स्थान ' शुक्रस्य हु'मैं छन्दकी गलती श्रनेसे स्पष्ट छापेकी भूल है; पर ' शुक्रप्रौक्तं चलाने भागवतं ' इस भविष्यपुराण के वचन में ' शुकप्रोक्तं भागवतं ' होने पर व्याकर भी छन्दकी गलती नहीं पड़ती है; अतः वहां ' शुक्रप्रोक्तं ' यह CC - 0. Ankur Joshi Collection ' शुक्र ' नहीं, स्पष्ट छापेकी गलती है । भागवतमें है, ' शुक्र उवाच ' नहीं । वे व्यासके ज्ञान नहीं । व्यासजीका शुक्रसे कुछ ' अवताररहस्य ' ( पृ. १०२ ) में हिमायत की थी; अव यहां उस शुक [ ७२५ सर्वत्र ' शुक उवाच ' मिलता लड़के थे, इतना भी चादीको भी सम्बन्ध नहीं । चादीने दैत्यगुरु - शुक्रकी शुक्रकी निन्दा ' पुराणोंके कृष्ण ' में वादीने ' गीता ' की प्रशंसा करता है । विवेचन ' में गीताकी की थी, अव ' गीता-भरपेट निन्दा की है, इसलिए यास्कमुनिको निरुक्तमें लिखना पड़ गया - ' पुरुषविद्याऽनित्यत्वात् समय - समयके ' । यह वादी के हथकण्डे हैं, अथवा श्रीराम दो हैं । अथवा उसके कई वचन किसी अन्यने उसकी पुस्तकोंमें प्रक्षिप्त किये होंगे? भागवतमें ' उसके प्रवक्ता दैत्यगुरु शुक्र थे ' इसका कहीं स्पष्ट वा अस्पष्ट संकेत्त भी नहीं हैं । क्या दैत्यगुरु शुक्र व्यासजी के लड़के वा शिष्य थे, जोकि व्यासजी उसके पीछे भागे थे । यह है वादीका ' भारी ज्ञान ' । ' सुरतनाथ ' का समाधान वादी ' आलोक ' ( ७ ) पृ. २११-२१२ में देखे! ' तामस पुराणोंका रहस्य ' ' आलोक ' ( ७ ) पृ. २६६-३०२ तथा पृ. ६३३, ६६७-६६८ पृष्ठकी टिप्पणीमें देखो । इस प्रकार वादीके ' पु.कि.ब. ' ट्रैक्टके आक्षेपोंका समाधान आमूलचूड़, तथा पौ. ग. दी. के कुछ आक्षेपोंका समाधान भी आ चुका; शेषका समाधान आगे दिया जाता है । ( २६ ) ' ब्रह्माजीका गौसे मैथुन करना ' ( ४ ) उपक्षिप्त करके वादीने निम्न पद्य दिये हैं - ' या रूपार्धवती पत्नी ब्रह्मणः काम-रूपिणी । सुरभिः सा हिता भूत्वा ब्रह्माणं समुपस्थिता । ततस्ताम-Gujarat. An eGangotri Initiative

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७२६ ] श्री सनातन धर्मालोक ( 1 ) गमद् ब्रह्मा मैथुनं लोकपूजितः । लोकसर्जनहेतुज्ञो गवामर्थाय सत्तमः ' ( मत्स्य. १६७।३४-३६ ) । पशुमैथुनकी प्रथा पौराणिक देवताओंकी विशेषता रही है । कभी - कभी पशुओं के मनुष्याकृति बच्चे पैदा हो जाते हैं, इससे सनातनी विद्वानोंमें ऐसी प्रथा होनेका अनुमान होता है । उ ० – प्रतिपक्षीको पुराणों, देवताओं तथा सनातनधर्मियोंको कलङ्कित करने तथा उनसे घृणा कराने में बड़ी उत्कण्ठा रहा करती है; इसके लिए वह ग्रन्थोंके पूर्वोत्तर - प्रकरण छिपानेरूप छलका सहारा लेने में भी कुण्ठित नहीं होता । यहां तो इस पद्मके आरम्भमें ' सुरभि ' नामकी स्त्री तो ब्रह्माकी पत्नी बताई गई है, उसे ' कामरूपिणी ' ( ३४ ) ( इच्छानुसार सभी प्रकार के रूप बना लेनेवाली ) कहा है; और फिर यहां ' लोकसर्जन हेतुज्ञः ' ( ३६ ) से सृष्टिका प्रारम्भ बताया गया है कि गौवोंकी सृष्टि कैसे हुई? श्रव प्रतिपक्षी बतावे कि इसमें क्या दोष है कि ब्रह्माने अपनी पत्नी जिसका नाम सुरभि जो गायका वाचक है. - से दिव्यशक्ति-वश ( क्योंकि ब्रह्मा कोई मनुष्य तो नहीं थे ); और फिर इसमें सृष्टिकी आदिका काल है, जिसमें कोई भी मर्यादा नहीं होती, उसमें तो: ( एकसे उत्पन्न होने के कारण ) भाई - बहनों का विवाह तथा उनका सन्तान उत्पन्न करना भी आता है, जिसे वादी के स्वामी भी समर्थित करते हैं, गौयोंको पैदा कर लिया हो । : वेदमें लिखा है- ' तस्माद् अश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः । गावो ह जज्ञिरे तस्मात् तस्माज्जाता अजावयः? ( यजुः माध्यं ३१ ) गौश्रोकी उत्पत्ति कैसे हुई!? [ ७२० पर ' तस्मात् ' का अर्थ है ' यज्ञात् ' जो पूर्वमन्त्रोंसे उसका अर्थ वेदोत्पत्ति में स्वा. द. जीने लिखा है- अनुवृत्त है । ' सर्वशक्तिमत परब्रह्मण: ' ( सब सामथ्यसे युक्त परब्रह्म ( परमात्मा: । परमात्मा स्वामीने घोड़े ऊँट गधा ) से 1 ) सो उस ,,, गाय, छेरी भेड़ों आदिकी उत्पत्ति बताई है । अब वादीको चताना होगा कि - परमात्माने बिना गाय, घोड़े, छेरी आदि कैसे पैदा कर दिये? यदि स्त्रीके । सर्वशक्तिमान् होनेसे; यह भी ठीक नहीं । स्वामीजी कहो कि. । ' क्या सर्वशक्तिमान् वह कहता है कर सके? ' ( स.प्र. ८ पृ. १३३ ) । परमेश्वर कार्यको नहीं कर सकता जब ऐसा है; तो गाय आदि कार्यके परमात्माकी स्त्री गाय भी माननी स्वामीने ( यजुः २१।६० में ) ' छेरी मेंढासे; परमैश्वर्य के लिए बैल ( गाय ) लिखते है-कि जो असम्भव बातको भी ( प्रश्न ) क्या कारणके विनो ? ( उत्तर ) नहीं ( वही पृष्ठ ) पैदा करने के लिए कारणरूप पड़ेगी 1 । तंभी शायद वादीके आदि पशुसे; वाणीकेलिए से भोग करें लिखकर ' वैत ' शब्दको जातिवाचक मानकर ' गाय से भोग वा उसके उपयोग से परमात्माका परमैश्वर्य ( परमेश्वरत्व ) बताया हो # * ' यथेमां वाचं ' के अर्थ में स. प्र. ( पृ. ४४ ) में स्वामी में लिखा है-' परमेश्वर स्वयं कहता है कि हमने... अपने भृत्वा स्त्रिया यहांपर परमेश्वस्की स्त्री भी मानी है; तब उस स्त्री से परमात्मा " प ' गायें ' उत्पन्न कीं । अब वादी बतावे कि वह स्त्री गायकी शक्ल म की थी, वा मानुषी स्त्री की शक्ल की थी? पैदायश मैथुमसे हुई । " CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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७२८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) नुवृत्त बिना मैथुनके? मैथुन प्राकृतिक ढंगसे हुआ वा दिव्य ढंगसे? क्तिमतः है वा दोनों देव - देवी के अङ्ग क्या मनुष्य - दम्पती के समान थे? उन वा दिव्य? । यदि दिव्य; तब शिवलिङ्ग भी दिव्य सिद्ध हुआ । आादिकी उस यदि वह स्त्री मानुषी जैसी थी, तब उससे गायें आदिका उत्पन्न होना मानना क्या वादी सम्भव मानेगा? | यदि हां, तो कश्यप स्त्रीके निकी स्त्री से भी सर्प तथा अन्य पुराणोक्त उत्पत्तियां, सरमासे हो कि सारमेय आदि की उत्पत्ति सम्भव माननी पड़ेगी । खते है- • यदि गायकी शक्लकी स्त्री मानो, तब परमात्माने भी गाय से को भी मैथुन किया, यह दूसरेका चक्र उतर कर वादी के माथेपर आ विनेश पड़ेगा । उसको स्वयं इसका उत्तर देना पड़ेगा । जो उसका इस पर उत्तर होगा; हमारा भी वही उत्तर होगा । ' यश्वोभयोः सम रणरूप दोषः परिहारोपि वा समः । नैकः पर्यनुयोक्तव्यः तादृगर्थे-वादी के विचारणे ' । पुराणों के अनुसार ब्रह्मा भी सृष्टिकर्ता परमात्मा ही केलिए हैं । वस्तुतः जैसे परमात्माकी स्त्री प्रकृति आलङ्कारिक रूपसे • मानी जाती है. और उसमें आलङ्कारिक गर्भाधान भी माना जाता योग है; जैसे कि - ' मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् । F सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत! ' ( गी. १४ ३ ) ' सर्वे-[ गवांदि ] योनिषु कौन्तेय! मूर्तयः सम्भवन्ति याः । तासां ब्रह्म यादि महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ' ( ४ ) और उससे स्वामी भी त्माने परमात्माकी प्रेरणा से विविध पशु - पक्षी - मनुष्योंकी उत्पत्ति शक्ल मानते हैं, और वह प्रकृति कामरूपिणी ( इच्छानुसार रूप कर 3 सकनेवाली ) होती है, इसी प्रकार ब्रह्मा ( परमात्मा ) ने भी CC - 0. Ankur Joshi Collection प्रारम्भ में गोनोंकी उत्पत्ति [ ७२ ९ कामरूपिणी अपनी पत्नी प्रकृतिसे जो वादीके ( गोरूपवाली ) थी, उससे अपनी सर्वशक्तिमतासे अनुसार सुरभि किया, तब यह स्थल आक्षेप्य गौओंको पैदा नहीं रह जाता । अब इसमें यजुर्वेदमाध्यं, के भाष्य, स्वाद के अपने शब्दोंमें उनके भाष्यकी कसौटी – शतपथत्रा की साक्षी भी लीजिये इस प्रकरणकी आदिमें लिखा । उसके है - आत्मैव ' इदमग्र आसीत् पुरुषविधः ' ( १४ | ४ | २ | १ ) अर्थात् सृष्टिके श्रारम्भमें पुरुषाकृति था । उसने सृष्ट्य त्पादनार्थं अपनेको परमात्मा बनाया । और फिर उस स्त्रीसे ही पुरुष - स्त्री योग किया, उससे मनुष्य उत्पन्न किये, ‘ ता ँ समभवत् । ततो मनुष्या अजायन्त ' ( १४ । ४ । २।४-५ ) । स्त्रीने यह सोचकर कि यह मुझे अपनेसे उत्पन्न करके भी मुझसे संयुक्त होता है, मैं अपना रूप बदल लूँ, वह गाय बन गई, और वह परमात्मा बैल बन गया- ' सा गौरभवद् वृषभ इतरः । स ता ं संमेवाभवत्, ततो गावोऽजायन्त ' ( ६-७ ) उनके संयोगसे गाय - बैल पैदा हुए । वादीको याद रखना चाहिये कि यह माध्यन्दिनी यजुर्वेदसं का ब्राह्मण है, और ' गावो ह जज्ञिरे तस्मात् ' ( ३१८ ) इस मन्त्रका भाष्य है । ' एवमेव यदिदं किञ्च मिथुनम् आ पिपीलिकाभ्यः, तत् सर्वमसृजत् ' ( शत. १४४/२/६ ) इस प्रकार पिपीलिका तक समूची सृष्टि हुई । इस विषयमें ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ४२२-४२३ ) देखो । वादीको याद रखना चाहिये कि उसके मतप्रवर्तकने इसी प्रकरणका ' ततो मनुष्या अजायन्त ' यह वचन यजुर्वेदके नामसे स.प्र. ( पृ. १३६ ) में दिया है । Gujarat. An eGangotri Initiative NT S

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७३० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) सो यहाँपर परमात्माने ( क्योंकि इस अध्यायके आदिमें यही लिखा हैं, यह हम पूर्व लिख चुके हैं - ) अपनी बनाई स्त्रीसे संयोग करके मनुष्य उत्पन्न किये; तो वह लज्जित होकर गाय बन गई. फिर परमात्माने बैलका रूप धरकर उससे गाय - बैल-की सृष्टि की । पुराण के वादीसे आक्षिप्त प्रकरण में भी वही सृष्टिका प्रकरण है ' लोकसजनहेतुज्ञः ' ( मत्स्य. १६७/३६ ) ' तस्या-मेव -सुरभ्यां च गावो यज्ञेश्वराश्च वै ( ४० ) श्रोषध्यः पुनरन्याश्च सुरभ्याः ताः समुत्थिता: ' ( ४२ ) सो अब पुराणका उक्त वचन मन्त्र - ब्राह्मणात्मक वेदके अनुकूल होनेसे आक्षेपयोग्य न रहा । वादीके माथेपर ही वह आक्षेप - चक्र जा चढ़ा । पूर्वोक्त प्रकार से यहाँ ब्रह्माका भी बैलरूपका धारण समझ लेना चाहिये; तब मनुष्यका प्रश्न न रहा । शेष रहा - पशुओं से मनुष्याकृति बच्चे पैदा होते दीखना, सो पुराणों में वैसी उत्पत्ति पढ़कर यह वादी लोग पहले उस पर ' गपोड़ा ' कहकर कहकहे लगाते थे । पर जब प्रकृतिने उसे प्रत्यक्ष " दिखलाकर इन निन्दकों के मुँहपर करारा थप्पड़ मारा, तब यह वादी उसमें मनुष्यद्वारा मैथुन कारण बताता है; तो क्या ऐसा वह सम्भव मान सकता है? वस्तुतः यह नासमझी है । आज कलंके ' अल्पशक्तिकें मनुष्योंसे पशुओंमें कभी गर्भ हित नहीं हो सकता । यह प्रकृतिकी विलक्षण महिमासे स्वयं ही, विलक्षण उत्पत्तियाँ हुआ करती हैं, जो पुराणों में उल्लिखित ऐसी उत्पत्तियों " ( गोकर्णादिकी गाय से उत्पत्ति ) पर आक्षेप करने वाले प्रति-प्राक्षेप परिहार | ७३१ पक्षियोंके मुँहपर करारा तमाचा मारकर आक्षेपोंका प्रत्युत्तर देने वाली हैं । अब उक्त शंकाकर्ता अपने ही गुरुभाइयों पर, इसे सम्भव मानने वाले वादीने ही थप्पड़ मार दिया हमें प्रत्युत्तरकी क्या आवश्यकता?, फिर सो उन पशुओंसे दयानन्दी नियोग किया करते होंगे. क्योंकि उनमें सनातनियोंका नाम तो कोई लिखा नहीं | एक स्वर्गीय दयानन्दी - शास्त्रार्थ महारथीका ' कुतिया से नियो प्रसिद्ध है ही, स्वामी भी नन्दी बैलमें उसकी गुदां वाले रास्तेये घुस ही गये थे । आशा है - वादी भी गौसे उत्पत्तियाँ करके अपने आर्योंकी संख्या बढ़ावेगा, क्योंकि - दिन - रात उसे मैथुन भगशिश्न के सपने ही आया करते हैं, और प्राचीन ग्रन्थोंमें वह उसी भग - लिङ्गामृत के ढूंढने में व्यस्त रहता है, और उसके आचार्यने बैलसे भोग जिसका जातिपक्ष के कारण गाय अर्थ होगा, तथा छेरी आदि भोग वा उनके उपयोग लेनेकी श्राज्ञा अपने वेद - भाष्यः ( यजुः २१।६० ) में दे ही रती है; वह उसका अनुसरण करके पूरा ' वैदिक ' ' बनेगा । पर पुराण के वचन में तो बैल रूप वालेका माय रूप वाली अपनी स्त्रीसे संयोग इष्ट होने से कोई दोष नहीं रहा । इसके अतिरिक्त यह भी याद रखना चाहिये-किः देवयोनि भोगयोनि होती है; वह यहांके कर्मका फल बह भोगने जाते हैं । वह कर्मयोनि नहीं; जैसे कि वादी मुक्त - पुरुषों को मुक्तिलोक में भोगयोनि मानते हैं, कर्मयोनि नहीं । व उनपर कर्मयोनि वाली व्यवस्था लागू भी नहीं हो सकती । इस CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ९ ) ७३१ ७३२ ] दोषोंका वादी से भोगयोनियर किये गये आक्षेपोंमें दिया - सलाई । प्रकार भाइयों लग जाती है । फिर ( २७ ) पू - अपने ' विचित्रमुखाधान ' में वादीने भविष्य पुराणके पद्य दिये हैं- ' तन्त्र स्थिता प्रिया संज्ञा वडवारूपधारिणी ' ( प्रति, होंगे, ) अश्वरूपेण मार्तण्डः तां मुखेन समासदत् ' ( ब्रह्म | I एक ४/१८/२८ ७६।५५ ) सा तं विवस्वतः शुक्र ' नासाभ्यां समधारयत् । देवौ नियोग ' अजायेताम् अश्विनौ भिषजां वरौ ' ( ५६ ) । शिव. ( उमा. तस्याम् ३५ ) मत्स्य ( अ. ११ ) में भी यह कथा बताई है । यहाँ सूर्यकी करके स्त्री संज्ञाका घोड़ीरूप धारण करना, उसके मुखमें शुक्रका प्रधान और उस घोड़ीका उसे नाकसे धारण करना और नाकसे ही अश्विनीकुमार, जिनके नाम नासत्य और दस्र थे-• उसके की उत्पत्ति हुई । यह सम्भव भी नहीं, और घृणित भी है - वह होगा वादीका अभिप्राय है । अपने उ ० – यही बात वादिप्रतिवादि - मान्य निरुक्तमें भी लिखी नुसरण है । देखिये- ' नासत्यौ - अश्विनौ नासिकाप्रभवो बभूवतुः ' ( ६ । १३ । १ ) रूप- यहाँ अश्विनोंकी उत्पत्ति नासिकासे बताई है; तब उस पौराणिक-इतिहासकी समूलकता सिद्ध हो गई, उत्तर भी दोनों स्थान बराबर होगा । वह निरुक्तने इस विषय में ' अपगूहन्नमृतां सवर्णामददु-पुरुषों. विवस्वते । उताश्विनौ अभरत् द्वा मिथुना सरण्यू: ' ( ऋ. I १०/१७/२ ) यह वेदमन्त्र भी इस विषय में दिया है । यहां पर ' अश्विनौ, अभरत् ' का भाष्यकार श्री दुर्गाचार्यने अर्थ लिखा CC - 0. Ankur Joshi Collection प्रश्वियोंकी उत्पत्ति [ ७३३ है - ' तां त्वाष्ट्रीं सरण्यूम् धश्वां कृत्वा तथा सति श्रश्विनोर्जन्म.... अन्तर्हितां चक्रुः । उत्तरान् कुरून् प्रति निन्युः । ततश्च अन्यां तत्सवर्णां छायाप्रभवां कृत्वा ताम् श्रददुः विवस्वते ( सूर्याय ) । यत् प्राश्वं तदा रूपम् आसीत्, तेन सा सरण्यू: अश्विनौ जनयत् । द्वौ अन्यौ मिथुनौ यमं च यमीं च इति ' । यहां वादी देखे-वहीका वही इतिहास है । केवल श्रीदुर्गाचार्यने ही ऐसा लिखा हो; यह भी नहीं है, किन्तु वादिप्रतिवादिमान्य श्रीयास्कने भी निरुक्तमें ऐसा ही लिखा है । वादी देखे - ' त्वाष्ट्री सरस्यूः विवस्वत आदित्यात् ( सूर्य से ) यमौ मिथुनौ जनयाञ्चकार । सा सवर्णाम् अन्यां प्रतिनिधाय आश्वं रूपं कृत्वा ( घोड़ीका रूप बनाकर भाग गई ) प्रदुद्राव । स विवस्वान् आदित्यः ( सूर्यने ) श्राश्वमेव रूपं कृत्वा ( घोड़े-का रूप बनाकर ) तामनुसृत्य सम्बभूव ( उससे संयोग किया ) । ततोऽश्विनौ जज्ञाते ( उससे अश्विनीकुमार पैदा हुए ), ' सवर्णायां मनुः ' ( १२ । १० । २ ) । सो यहां सरस्यूँका घोड़ीका तथा सूर्यका घोड़ेका रूप धरकर संयोग द्वारा अश्वियोंका पैदा करना लिखा है । अब यहाँ आक्षेपकी बात न रही । सूर्यकी पत्नीसे ही सूर्यका संयोग कहा है, दोनोंका अश्वका रूप धारण करना अवश्य लिखा है । पर यहां मनुष्यका कोई वन नहीं । यह देवताओंका वर्णन है; सो यहां वीर्य भी लौकिक नहीं है, किन्तु दिव्य तेज है । घोड़ीसे घोड़े तथा गायसे बैलके संयोगमें दोषकी कोई बात नहीं होती । भोगयोनि देवता तथा लोकोत्तर- शक्तिशाली ऋषि-Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 386

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७३४ ] श्रीसनातनधर्मा लोक ( 1 ) मुनि · कामरूप होनेसे भिन्न भी रूप बना लिया करते थे । घोड़ी दिसे पुराणोक्त इस बातका अनुसन्धान करके पशुशास्त्रज्ञ लोग संयोग हो जानेपर उस स्रुत शुक्रको घोड़ी वा भैंसके गर्भाशयसे अंजलिसे निकाल कर फिर विशेष - विधिसे उस गॅस वा घोड़ीकी नासिकामें टपका देते हैं, जिससे अपने मनचाहे रंगवाला कटरा वा बछेड़ा पैदा हो जाता है । सो चेदकी तरह पुराणोंमें भी आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक तीन प्रकारके भाव और समाधिभाषा, परकीया और लौकिकी तीन प्रकारकी भाषाएँ प्रयुक्त होती हैं । इन सबको गप्प कह देने से यह रहस्य पता नहीं लग सकेंगे; उनका अनुसन्धान करने से कई रहस्य निकलेंगे । अतः यहां भी आक्षेपका कोई अवकाश न रहा । वस्तुतः देवचरित्रोंका पूरा रहस्य अल्पश्रुतोंको ज्ञात हो ही नहीं सकता । वेद भी संकेत देता है- ' को श्रद्धा वेद क इह प्रवोचद् देवाँ अच्छा ' भृ (. ३५४ | ५ ) ।: -... ( २८ ) पू- ' यज्ञ वा विवाहमें सुअरका -दान ' । इसे भविष्य-पुसण बताता है - प्रादिवराहदानं ' ते कथयामि युधिष्ठिर! घरण्यै यत् पुरा प्रोक्तं वराहवपुषा मया । १ । पुण्यं पवित्रमायुष्यं सर्वदानोत्तमोत्तमम् । यज्ञोत्सव विवाहेषुः दुःस्वप्नाद्भुतदर्शने । ३ । देयं पुराणविधिना ब्राह्मणाय कुटुम्बिने | ६ | ( १६४. ) ग्रहां सुअरका दान - पौराणिक पडितको देनेसे महाप्रापांदि दोष दूर होना कहा है । वे पौराणिक डण्डा 15 हाथमें लिकर पालिक शौचालयों पर ले जाया करेंगे । शाम को उनका! दूध पिया वराहावतार पर समाधान [ ७३५ करेंगे । उ०- वादी पुराणोंका पूरा शत्रु है; अतः उनपर उपहास किया करता है, पर उसका संस्कृतज्ञान बहुत न्यून है अशुद्ध कर दिया करता है । पुराण में पाठ है- ' आदिवराहदान ; अतः श्रर्थ वह शायद नहीं जानता कि- ' आदिवराह ' किसको ' । वह कान खोलकर सुन ले । आदिवराहका अर्थ है - ' कहते हैं । वराहावतार ' | सो वराहावतार तो हो चुका; उसने पृथ्वी ( धरणी ) का प्रलय के बाद कर दिया । उसका दान कैसे हो सकता है उद्धार यहाँ अर्थ है - ' वराहावतारक्री मूर्ति ' । ' इवे प्रतिकृतों '? सो । ( पा. ५३६६ ) इससे मूर्ति अथैमें शब्दको कन् प्रत्यय होता है । अश्व इव प्रतिकृतिः अश्वकः; ' यह वहां उदाहरण दिया गया है । इसी प्रकार ‘ आदिवराह इव प्रतिकृतिः- आदिवराहकः ऐसा प्रयोग बनेगा ।

परन्तु मूलमें -पाठ है ' आदिवराह ', वहां ' आदिवराहक ' नहीं है ।

इसके बाद सूत्र लगता है- ' जीविकार्थे चापश्ये ' ( ५ । ३ ॥

इससे देवमूर्ति अथेंमें कन्का लुक् होनेपर ' आदि - वराह ' बना है । सो आदि वराह की सोने - चान्दीकी बनी मूर्तिका दान विवक्षित है । हम आलोक ' ( ७ ) ( पृ. ३६३-३६६ ) में लिख चुके हैं कि - वराहका जो अवतार हुआ था, वह वन्य ( वनका ) घा देखो श्रीमद्भा. - अग्रदंष्ट्र्या । वनगोचसे मृगःः ( वराहः ) ( भाग ३ । १८/२ ) ग्राम्य ( ग्रामका ) नहीं । ग्राम्य सुधर विठा खाता है, वन्य नहीं । “ वन्यक्की बाहर, बढ़ी हुई दंष्ट्रा होती है । ग्राम्यक्की नहीं । तभी तो ' दुर्गा सप्तशती में जो. मार्कण्डेय पुरा एसे CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat An eGangotri Initiative

पृष्ठ 387

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I श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) ७३५ ७३६ ] हुई है - कहा है, ' तुण्डप्रहारविध्वस्ता दंष्टाग्र क्षतवक्षसः । उपहास निकली च च विदारिताः ' ( ८ | ३६ ) यह बाराह - मूर्त्या ग्राम्यकी नहीं होती, वन्यकी होती है । वराहने इसी इदान ' । ट्रा पृथिवीको रखा था । वादीका आक्षेप प्राम्य - सूकर पर दंष्ट्रा पर हते हैं । है । और यह तो जंगली - सुबर भी नहीं, किन्तु दिव्य - वराह था; वारे । बहाँ भी बराह आकृतिमात्र थी, वस्तुतः तो वह विष्णु - भगवान् T डद्वार थे, तब इसमें वादीके सब आक्षेप उड़ जाते हैं । वादी अछूतो-? सो द्वार- प्रेमी है, इसलिए अस्पृश्यता भी नहीं मानता होगा । तब ३२६६ ) भंगीका काम भी वह प्रेमसे करता होगा । श्रयँसमाजमन्दिर-विकृतिः की टट्टी भी साफ करता होगा । मैले की भरी हुई बाल्टी वा प्रकार टोकड़ी भारी होती है, बेचारे अकेले भंगी से नहीं उठती, अत: बनेगा । प्रतिपक्षी वह मैलेकी बाल्टी भी उसे हाथ लगवा कर उठवा ही ही है । देता होगा । जब ऐसा है; तो भंगीके सेवनीय सुवरोंको वह | ३ | ६६ ) चरा आता होगा । यदि ऐसा नहीं करता; तो फिर वह छुवा-चनता छूतको मानने वाला सिद्ध होता है । दान पर हमारा वराहावतार तो दिव्य है, यज्ञ - वराह है, ख चुके यह पुराण - प्रसिद्ध है, उसमें वादिप्रोक्त प्रक्षेपका कोई अवसर नहीं । वराह अवतार यहाँ भोजन के लिए नहीं आये थे, किन्तु वराहः ) पृथ्वीका उद्धार करने आये । उस समय मनुष्य भी अभी उत्पन्न नहीं हुए थे; अतः मनुष्य - मलका कोई प्रसङ्ग भी नहीं । होती है यह ग्राम्य सूकर भी नहीं, वन्यके आकारका है । वस्तुतः वह राइसे विष्णु हैं । विष्णुका भोजन पेड़ा - बर्फी ही होता है । यज्ञ - वराह-CC - 0. Ankur Joshi Collection वराहावतार पर समाधान [ ७३७ होनेसे ' यज्ञो देवानामन्नम् ( शत. २४/२/१ ) उनका यज्ञवि भी भोजन हो सकता है । शेष है - वराह भगवानको वादीका भोग लगवाना कहना; इसपर यह याद रखना चाहिये कि मनुष्यका जो भोजन होता है, भगवान्को भी वह वही अर्पण करता है । वाल्मीकि - रामायणमें कहा है- ' इदं मुङ्दव महाराज! प्रीतो यदशना वयम् । यदन्नः पुरुषो भवति तदन्नास्तस्य देवताः । ( २।१०३ । ३० ) सो वादीका यहां मलविषयक आक्षेप पनप ही नहीं सकता । हमने वादी के आक्षेपकी कमर तोड़ दी है, दिव्य यज्ञ-वराहकेलिए वहां उसका आक्षेप गर्भ में ही मर गया । हाँ, यदि वह छुआछूत न माननेवाला होनेसे मल का भोजनरूपमें प्रयोग किया करता हो, और भंगियोंसे सहानुभूति वाला होनेसे अपने आपको भंगी कहलवाने में अपना गौरव समझता हो, गांधीजी-का प्रेमी होनेसे दूसरोंकी एवं अपनी भी टट्टी उठाया करता हो; तब वही अपने यहां अन्य ऊखल - मूसल ( जिनको वह परमात्मा के नाम से ग्रास दिया करता होगा ), पटेला ( जिसपर घी - शक्कर चढ़ाकर उससे अन्नकी प्रार्थना करता होगा ), जूता, छत्री आदियों-से समावर्तनमें रक्षा करनेकी प्रार्थना करता होगा, इन जड मूर्तियों की भांति बराह भगवानकी भी मूर्ति रख छोड़े; उन्हें ST कभी ‘ आर्याभिविनय’के अनुसार गुर्चका भोग भी लगा दिया करे; और दूसरें अपने प्रिय भोजनको जिसका चार - चार वृखान करता रहता है, भोग भी लगा दिया करे; तव यदन्न स ० ध ० ४७ Gujarat. An eGangotri Initiative

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७३८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) पुरुषो भवति, तदन्नास्तस्य देवता: ' इस पूर्वोक्त वचनका वह उदाहरण बन सकेगा । वादी सदाकेलिए याद रखे, जिससे फिर कभी भी उसे वराहावतारपर उपहास करनेकी आवश्यकता नहीं पड़ेगी कि - प्रलय के समय अग्नितत्त्वके नष्ट होजानेसे सम्पूर्ण पृथिवी जलमग्ना होगई थी । जल भी बर्फ - रूपसे था । उसके उद्धारार्थ यज्ञाग्निरूप वराहने अवतार लिया ( वराहपु. ६।१५-२७ ) । उस दिव्याग्निस्वरूप वराहने जलका शोषण करके पृथिवीको प्रलयके जलसे निकाला ( ब्रह्मपु. ३६ / १६-२१ ) । प्रजापतिने वराह--रूप धार कर अपनी दिव्याग्निमें हुत जलराशिद्वारा सम्पादित दिव्य यज्ञ किया; उसीसे पृथिवीपरसे लुप्त अग्नितत्त्वको पुनः अतिष्ठापित किया । उसी स्मृत्तिकेलिए कहीं उस वराहमूर्तिकी स्थापना होती है । उसी वराहमूर्तिका दान उक्त पद्यमें इष्ट है । वराहका रूप तो नाट्य है, वस्तुतः वह विष्णु भगवान् हैं! यदि हमारा विपक्षी समलीलामें रावणका पार्ट अदा करे; तब वह क्या सचमुच रावण हो जाएगा; दूसरी स्त्रियोंका सचमुच ही वह सतीत्वभङ्ग करने शुरू हो जायगा? यदि कहो; वह तो नाट्य होता है; तो यहाँ भी कोई वैसा खाना आदि नहीं होता । यदि वह होलियों में बन्दर या भालूका आकार बना ले; तब क्या संचमुच ही दूसरोंको नाखूनोंसे फाड़ खायगा? दोनों स्थान समान उत्तर होगा । वराहके दानको वादी पौराणिक मानता है, पर वह अपने आपको वैदिकसाहित्य - प्रकाशन संघका सर्वेसर्वा मानता है; वैदिक दान Twit सो वह वेदानुकूल कुत्तों -गधों वा ऊँटोंका दान लेके वैदिकधर्म पूरा करे 1 । आशा है - छाब वह वेदानुसार अपना तथा ऊँटों और बकरे बकरियोंका दयानन्दी वैदिकोंसे कुत्तों, गर्यो? मण्डन ग्रन्थमाला के उपलक्ष्यमें दान लेकर डण्डा खण्ड-जंगलमें जाया करेगा, और कुतिया तथा गधी , आदिका हाथमें लेकर पीया करेगा 1 । वे वेदमन्त्र कुत्ते आदिके दानके दूध भी यह हैं-( क ) ' शतं मे गर्दभानां ' शतमूर्गावतीनां ( सौ गधे तथा सौ भेड़ोंका वैदिकम्मन्य ऋ. ८५६६३ ) यहाँ मानता होगा । ( ख ) ' पञ्चौदनं ब्रह्मणे श्रजं ददाति वादी ' दान मिलना । १२ ) यहां बकरे का दान बताया है 1 । ( ग ) ' उष्ट्राणां ( अ. हाश ११. । ( ऋ. ८ ४६/२२ ) ' शतं शुनः, चर्माणि म्लातानि ' विंशविशन ' । यहां पर २००० ऊँटों, सौ कुत्तों तथा साफ किये (. ८५३ ) । हुए चमड़ेश | दान बताया है । वराह ही वैदिकजीको पसन्द हो; तो महिषान्‘'वराहम् ' ( ऋ. ८७७/१० ) सौ भैंसे वा सुअरको लेवे । ' वराहो वेद वीरुधं ' ( श्र. ८/७/२३ ) सुअर एक बूटीको जानता है । सो डाक्टर एक सुअर को अपने पास रख ले, जिससे ना जड़ी - बूटीको जंगलसे जल्दी ढुंढवा सकेगा । पुराण में वराह श्रो धरणी ( पृथिवी ) का सम्बन्ध बताया है, क्योंकि सृष्टिकी आदि वराह ही ने तो धरणी ( पृथिवी ) का उद्धार किया था । वेदों भी उसे देखो - ' वराहेण पृथिवी संविदाना ' ( अ. १२ । १ । ४८ ) । यजुः ( २४।४० ) के अनुसार गैंडा, कुत्ता, गधा, चीता, सुबर, शे, म गिरगिट, मृग, आदियों की जिनमें सुवर भी है, पशुशाला CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( e ) ७४० | मेडिकल हाल वा वैदिक - प्रकाशन भवन में खोल ले । अपना अपने उत्त, है- वैदिकजी यह सुन्दर वैदिक धन्दा शुरू करके, चमड़ा ग आशा फ्लैक्स आफिससे मँगाकर उन्हें अपने वैदिकको खण्डर पथिकके यसै ऊँचे दामों पर बेचकर मालामाल हो जावेंगे; फिर डाक्टरी न लेकर का चलने का इनका संकट भी दूर हो जावेगा 1 । यहां वादी सुअरोंका दूध श्री पीनेकेलिए भी लिखता है, यह उसपर अपने स्वामीका दूध ( ३ ) प्रभाव पड़ा मालूम देता है । स्वामीने ' छागस्य हविषः मध्यतो यहाँ मिलना मेदः ' ( यजुः २१।४३ ) में बकरेके वैदिक दूध - घीका इवन भी बताया ६५५१ है । सो स्वामीने बकरेका दूध लिखा; और उनके चेलेने ९-शक्शिता ' सुवरका दूध लिखा । तब वह अक़बर - राजाको मांगने पर कभी ८५३ ' बैलका दूध ' भी भेंट दे देगा । अछूतोद्धार के प्रेमी होनेसे ) की सहानुभूतिकेलिए विष्ठा ढोना, सुवर- सूरनी आदियोंको वो ' रा रखना, डण्डा लेके उनको जंगलमें चराना आदि धन्धा शुरू करके उनका दूध पी लिया करता होगा । है ॥ अब हम अधिक स्थान न होनेसे वादीके आक्षेपोंको ससे प्रायः पृथक् न लिखकर केवल उत्तर देते चलेंगे; उन उत्तरोंमें राह और श्राप स्वयं समझ लेने चाहियें । आदियें । ( २६ ) भाग. ६ २ ६-१० में पापमोचनका नुसखा जो नामो-। वेदों वारणसे वादीने उपहसित किया है, सो नामोच्चारण तो वैदिक १४८ ) । है । उसका पुराण में अर्थवाद दिया है । नामोच्चारण के कई र, शेद मन्त्र, ' आलोक ' ( ६ ) पृ. ६४६-६५० देखो । इसके अतिरिक्त वेदमें ' इन्द्राय गायत ' ( ऋ. १४/१०, ११५४, १/१०/१, १ | १०३ | ४, CC - 0. Ankur Joshi Collection ध्यानयोग 1 ७४१ ३।३७१३, ५/६८१, ८१५३१, ४२११ इत्यादिरूपमें, अथर्व. २०६२५ ) इन्द्रके गांन वा नाम - कीर्तनको वेद वैदिक बता रहा है । जहां वेदमें गान तथा कीर्ति ( कीर्तन ) श्रावे नामोच्चारण ही इष्ट होता है । नामोंमें, वहां होता है; सो उससे भी रहस्य छिपा हुआ नहीं । ' वेदेषु च पुराणेषु पापमोचनमें सन्देहकी कुछ भी गुञ्जायश साङ्गोपाङ्गेषु गीयसे ' ( महा. शान्ति, ३३४/२३ ) ' जप्यं जगी ' ३३७/२७, ३४२/७०, ८१ ) इत्यादि स्थानोंमें भगवान्का कीर्तन कहा जाता है । कीर्तन में गान हुआ बहुत करता है | गानका भक्तिमार्गमें महत्त्व होने सामवेदको गान - प्रधान भी भगवान्ने ' वेदानां सामवेदोस्मि ' ( गी. १०/२२ ) कहा है । तब इससे वादीका ' पौराणिक कीर्तन पाखण्ड ' है, यह ट्रैक्ट भी खण्डित हो गया । ( ३० ) वादीने देवी भा. ( ७ / ३५।२२-२४ ) में लिखे ध्यानयोग का जो उपहास किया है, तो कभी तो देवी भा. को वादी स्वतः-प्रमाण मान लेता है; कभी नहीं मानता । इससे स्पष्ट है कि-उसको निन्दा बहुत अच्छी लगती है । इससे वह अपनी इष्ट-सिद्धि समझता है । यदि इसे वह ध्यानयोग पसन्द नहीं है; तो स्वा. द. जीके ' पीठ के मध्य हाड़- रीढ़ की हड्डी में ( स.प्र. ७ पृ. ११४ ) जिसमें लहू - चमड़ा आदि है - ध्यान किया करे । यदि वह उसमें कोई रहस्य समझता वा लिखता है, इस प्रकार हठयोग-की पुस्तकों में लिखे उन अपनेसे आक्षिप्त व्यानोंमें भी रहस्य है, इनपर भी वादी रिसर्च करे; तब उसे उनमें भी रहस्य ज्ञात Gujarat, An eGangotri Initiative

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७४२ । श्रोसनातनधर्मालोक ( ६ ) हो जायेंगे । भग - लिंगका ध्यान तो वह प्रतिक्षण किया ही करता है; और उसमें उसका चित्त स्थिर भी होता है; तब वह उसपर उपहास क्यों करता है? वस्तुतः वादीसे आक्षिप्त योगमुद्रायें मनके स्थिरीकरणार्थं तथा अपान - शिश्नके संयमार्थ होती हैं । वादीको यह याद रखना चाहिये कि - पायु ( गुद ) और उपस्थके मध्य में ' चतुदैल मूलाधार चक्र ' होता है । उपस्थ ( गुह्यदेश ) में ' षड्दल स्वाधिष्ठान चक्र ' होता है । नाभि - प्रदेश में ' दशदल मणिपूर चक्र ' होता है । इत्यादि वर्णन ‘ गुदात्तु द्वचङ्गुलादूर्ध्वं मेढात्तु द्वचङ्गुलादधः । चतुरङ्गुलिविस्तारं ' कन्दमूलं खगाण्डवत् ' इत्यादि तन्त्र तथा हठयोग आदिके ग्रन्थोंके वर्णनोंका पूरा ज्ञान किये बिना वादी अपना अज्ञान दिखलाकर अभिज्ञ- जनता में अपना उपहास करा रहा है । जिस प्रकार वह नाभि और भृकुटी में ध्यान लगानेका रहस्य बताता है, वैसे मूलाधार एवं लिङ्ग आदिके ध्यानमें भी रहस्य है । इस प्रकार योगदर्शन ( १।३५ ) में नासिका के श्रग्रभागमें भी ध्यान बताया है, जिसे वादी ' गीताविवेचन ' में आक्षिप्त करता है । ( ख ) ' सृष्टिकी विचित्र उत्पत्ति ' ( महा. शान्ति १६६ । १७-२० ) पर वादीको जानना चाहिये कि - सृष्टिकी आदिमें ऋषि - मुनियों-में बड़ी शक्ति हुआ करती है । उस समय उत्पत्ति भी अमैथुनी होती है, उस समय असम्भवको प्रश्रय नहीं दिया जा सकता । स्वा.द.जी आरम्भमें ' जवान जोड़ोंका आकाशसे टपकना 9.4 CC - 0. Ankur Joshi Collection वामनको नमस्कार [ ७४३ मानते ही हैं । यजुः के मन्त्रां में भेड़ - बकरी आदिका मैथुनके यज्ञपुरुषसे पैदा होना लिखा ही है । उस समय, ऋष्टि बिना ब्राह्म लोग भी परमात्मासे एक हुए हुए थे । ' वीर्यमसि वीर्य ११२० चलमसि बलं मयि घेहि ' ( यजुः १६१६ ) में उनको परमात्मा मयि घेहि इसस लौकिक बल मिला हुआ था । स्वा. द. जीने इसका अर्थ चाला करा लिखा है - हे ' परमेश्वर! आप अनन्त बलयुक्त हैं; इसलिए यह भी बल धारण कीजिये ' ( स.प्र. ७ पृ. ११२ ) यहां परमात्मामें मुझमें भगव ( जो तेज वा वीर्ये वा बल है, वही ऋषिने अपने लिए मांगा है । गई ह । वेदके दोनों पदोंमें ( परमात्माके बल और ऋषिके बलमें ) कोई उसे भी अन्तर वेदने नहीं बताया है; तब जब ऋषियोंको भी पर. मात्मा वाला अनन्त बल सृष्टिकी आदि में मिला; तब उस समय इस असंम्भवको कोई अवकाश नहीं रहता; जब कि उनको परमात्मा- बताय वाली शक्ति प्राप्त हुई- हुई थी । सभी सम्प्रदाय सृष्टि के आरम्भ में आस विचित्र उत्पत्तियां वर्णित करते ही हैं; तब पुराणोंपर दोष देना सो ( व्यर्थ है । पृथिव ( ग ) महा. ( अनुशा १२६ । ४ ) में जो वामन - ब्राह्मणको तथा वश से निकले वराहको नमस्कार करना कहा है, उसमें कारण वराह है कृतज्ञता - प्रकाशन | भगवान्ने वामन - ब्राह्मण बनकर बलिदैत्य- इसलि से देवताओं तथा मनुष्योंका लोक- जिसे उसने छलसे छीनकर ( मत्स बन्धनमें कर दिया था; उसे ' मायाभिरिन्द्र! मायिनं ' ( शृ. १ | ११/७ ) इस वेद - समर्थित मायासे स्वतन्त्र कराया; उसकी स्मृत्यर्थं तथा कृतज्ञता - प्रकाशनार्थं वामनावतार - जैसे बामन-Gujarat. An eGangotri Initiative