सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 391–400
सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 391–400
पृष्ठ 391
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ७४३ ७४४ ] विना । ब्राह्मणको नमस्कार कराया । ' वामनो द्द विष्णुरास ' ( शत. ऋषि ( ५ ) इससे वामनको यज्ञपुरुष - विष्णु बताया गया है । ( १२/२ छलवाला व्यवहार करके अपने देशको स्वतन्त्र घे इससे छलियोंसे 1 चाला चाहिये, उस समय बड़े बने रहनेकी टें छोड़कर छोटा कराना भी बनना पड़े; तो इसमें घबराना नहीं चाहिये - यह शिक्षा भी सुममें भगवान्ने सूचित कर दी है । गत्मा में ( घ ) इसी भांति वराहावतारकी भी कृतज्ञता प्रकाशित की ना है । गई है कि उसने प्रलय के जलमें डूबी हुई पृथ्वीका उद्धार करके ) कोई उसे हमारे निवासके योग्य बनाया । तभी तो ( कृ.यजुः तैसं, पर १ ९ १ / ३० ) में कहा है- ' उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना ' । समय इस प्रकार ब्राह्मणभागात्मक - वेद शतपथमें भी कहा है बझया है । ' अथ वराहविहृतम् । इयती ह वा इयमग्रे पृथिवी रम्भमें रमा- श्रास प्रादेश- मात्री, तामेभूष इति वराह उब्जघान । = देना सो ( वराहो ) ऽस्याः पतिः प्रजापतिरिति ' ( १४ | १ | २ | ११ ) यहां भी पृथिवीका वराहावतार - द्वारा उद्धार तथा इससे प्रजा के संरक्षण-तथा बश वराहुको प्रजापति बताया गया है । इस स्मृतिकेलिए यज्ञ में कारण वराइकी उखाड़ी हुई मट्टीको यज्ञमें प्रयुक्त करना पड़ता है । दैत्य- इसलिए ही वराहावतारको यज्ञवराह ( मत्स्य. २४७ | ७७ ) यज्ञरूप नकर ( मत्स्य. २४७ / ६७-७०, वायुपु. ६।१५-२७, विष्णुपु. १।४४।३२-३३ ) ( शु.यज्ञपुरुष ( अग्नि. ४ ( २ ) कहा गया है । बल्कि यज्ञकी सारी -उसकी सामग्रीको करीनेसे जोड़कर रखें, तो वराहकी आकृति बन: सिन- जावेगी; पर वादीका इन रहस्योंसे क्या सरोकार? उसने तो CC - 0. Ankur Joshi कन्याओं का दान | ७४५ केवल पुराणकी निन्दा ही करनी है । ' चिह्नणो वृपणायते समान यह वादी प्राचीन साहित्यके ' के भीतरी - रहस्यमें ऊपर - ऊपर तैर रहा है, उसका ज्ञान नहीं पहुँचता, जिससे उसे आनन्द मिले । सो जलोत्थित - वराह तथा वराहोदधृत सिर पर रखाना - यह पृथिवीके घरणी ( मट्टी ) का तथा उसके प्रति कृतज्ञता उद्धारक वराहावतारकी स्मृत्यर्थ - प्रकाशनार्थ है । वराहावतारके विषय में अधिक ' आलोक ' ( ७ ) में तथा गत २८ वें प्रघट्टकमें चाहिये | देखना ( ३१ ) जो कि अध्यात्मरामायण में रामके आनेके संवाद कहते हुए हनुमान्को भरत - द्वारा शतसहस्र गौयोंका दान तथा १६ कन्याओं के दानकी घोषणा कही है, वह सम्मानकेलिए कथनमात्र होता है, सचमुच देना नहीं; नहीं तो भला केवल सन्देसामात्र देनेकेलिए आया हुआ हनुमान् १ लाख गायको कहां रखता? इसके अतिरिक्त हनुमान्का ब्रह्मचारी रहना भी प्रसिद्ध है; वह लड़कियोंको क्यों लेती? अतः वहां तो यह सम्मानार्थ कथनमात्र ही होता है । इस विषय में याज्ञ.स्मृ.के १ । ५ । १०६ पद्यकी मिताक्षराका मनन करना चाहिये । इस विषय में ' आलोक ' ( ६ ) पृ. ३३२-३३ देखो । अभिषेक - समय में भी १६ कन्याओंका लाना वैदिकविधिसे सम्बद्ध होता है । जैसे कि महाभारतमें भी लिखा है- ' राजन्या राजकन्याश्च श्रान-TA यन्त्वभिषेचनम् ' ( उद्यो. १४०/१५ ) यह व्यभिचारार्थ वा देनेके-लिए नहीं होतीं, यह तो अभिषेकार्थ होती हैं । यह तो वाल्मी. में Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 392
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
७४६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) भी है - ' सकुण्डलाः शुभाचारा भार्याः कन्यास्तु षोडश ' ( ६।१२७ । ४४ ) यहां ‘ भार्याः’का अर्थ ‘ भरणयोग्याः ' है । ' शुभाचाराः ' कनेसे वादीका प्यारा ' व्यभिचार ' कट गया । हनुमानजी की स्वीकृति भी वहाँ नहीं बताई गई है । अतः उन कन्याओंका देने के लिए कहना - सम्मानार्थ कथनमात्र है, वस्तुतः देनेकेलिए नहीं । कोई लण्डनका ' ह्वाइटपार्क'का रहनेवाला वादी जैसा दिमाग फिरा भारतमें आया हुआ व्यभिचारी, नवरात्रों में पूजनार्थ बुलाई हुई कन्याओंको देख वा सुनकर, उसका वास्तविक मर्म न समझकर उसमें व्यभिचार समझ ले, वैसे ही नियोगके वायुमण्डलमें विचरनेवाले वादीका भी हाल है । उसे सर्वत्र सोते - जागते व्यभिचारके स्वप्नदोष ही हुआ करते हैं । ( ख ) देवीभा. ( ३।६ ) में परमात्माको यदि ' निर्गुण ' कहा गया है, इससे परमात्माकी साकारताका खण्डन नहीं हो जाता । ' निराकार ' आदिका भाव अनिवर्चनीय ( दिव्य ) आकारवाला होता है । आकारका सर्वथा निषेध हो; तो परमात्मामें शून्यापत्ति दोष हो जावे । अतः ' निराकार'का सूक्ष्मतम आकारवाला ही अर्थ होगा, आकार - रहित नहीं । स्वा. द. जीने स.प्र. ( ७ पृ. ११३ ) में परमात्माको प्रकृति और आत्माकी अपेक्षा सूक्ष्म और आत्मा तथा प्रकृतिको परमेश्वरसे स्थूल माना है, वादीने भी ' कवीरमतमर्दन ' पृष्ठ ५ पं. ६ में लिखा है- ' निराकारका अर्थ है जिसकी कोई स्थूल आकृति न हो ' इसलिए परमात्मा भी स्थूलोंसे अपेक्षाकृत सूक्ष्मतम आकारवाला होनेसे साकार - सा हुआ । CC - 0. Ankur Joshi Collection निराकार भी साकार Luxy यदि सर्वथा निराकार होता; तो उसमें अपेक्षाकृतता ७ जाती । न कही ' निर्गुण'का भाव भी यदि ' सर्वथा गुणहीन ' माना उस तो ' ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभावसे अपने गुण - कम जावे प 2 - स्वभ सुधारना ' ( स.प्र. ७ पृ. १११ ) इस स्वामीजी के ' बहुत स्थानोंपर कहे हुए वचनका वादी फिर स्वयं खण्डन करे; और आप देव लोग तथा स्वामीजी प्रार्थनामें भगवान्के ' दयालुता निष्पक्षता वि ,, । सर्वज्ञता आदि गुण कहते हैं; वह अवैदिक हो जायगा पूर्व । सो । वहाँ ' निर्गुण ' का अर्थ ' गुणोंसे ऊपर उठा हुआ ' यह भाव है, गुणों के सर्वथा निषेध तात्पर्य नहीं । सभ सृष्टिंकी आदिम अवस्थामें ' आत्मा वा इदमेक एव अम ता आसीत् ' ( ऐत. २ | ४ | १ ) कहा जाता है, और ' प्रसद् वा इदमत्र कि आसीत् ' ( तै.आ. ८ । ७ ) यहाँ असत् होना भी कहा है । सो जैसे च यहाँ ‘ असत् ' का अर्थ सर्वथा ' शून्यपरक ' नहीं है, किन्तु वहाँ का ( ४ ) ‘ अव्यक्तपरकता’का तात्पर्य है, जैसे कि - ' नेति नेति ' ( बृह. ४१४२२ ) ताल में परमात्मा के लिए कहा हुआ न ' ' शब्द उसके निषेधको न बताकर उसकी ग्रहण में अशक्यता को बताता है; वैसे ही ' निराकार ' में भी ' निर'का शून्यपरक अर्थे न होकर ' अव्य ं ' चा ( अज्ञेय सूक्ष्म ) आकार ' जानना चाहिये । यह ( ३२ ) पू ० - महाभारत ( अनुशा. २ ) में सुदर्शन की खीने यह पतिके कहनेसे इतना अतिथिसत्कार किया कि - अतिथिने उससे था विषयभोग माँगा; तब उसके देने में भी वह नहीं मिलती- उस Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 393
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
| ७४७ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ७४८ ] न कही ) । म. भा. ने इस व्यभिचारको धर्म माना है, पर शिवपु. ने ( २ ( ५७ है - ' स पुत्रोपि हतो भार्या पुंश्चलीं कृतवान् द्रुतम् । उसे पाप माना जावे; - स्वपित्रा परिभर्त्सितः ' ( कोटि. १३।३५ ) । पश्चात्तापमनुप्राप्य भावका ० - वादी जो भी आक्षेप करता है, उसमें पूर्वापर छिपा 30-नानोपर देता है । वास्तविक तात्पर्यको छिपाकर बाह्ररी बातें अनुसन्धान-प लोग बिरहित भोली जनताके वञ्चनार्थ लिख देता है । जनता भी पक्षता, पूर्वापरका पता न होनेसे उसपर आश्चर्य करती है । सो. वस्तुत: यह कथा अतिथिपूजनका श्रर्थवाद है । अर्थवादमें भव है सभी शब्दोंका अर्थ ग्राह्य नहीं होता; केवल विवक्षित अर्थमें तात्पर्य ग्राह्य होता है । सो यहाँ विवक्षित अर्थ केवल इतना है व कि - ‘ अतिथेः प्रतिकूलं ते न कर्तव्यं कथचन ' ( २।४२ ) येन - येन इदमत्र चतुष्येत नित्यमेव त्वयाऽतिथिः । अध्यात्मनः प्रदानेन न ते वैसे कार्या विचारणा ( ४३ ) नातिथिस्तेऽवमन्तव्यः प्रमाणं यद्यहं तव ' तु वहाँ ( ४६ ) अर्थात् अतिथिको खूब प्रसन्न करो - इतना ही इसमें ( ४२ ) तात्पर्य है । शेष अर्थवादमात्र हैं । कोन ·.. इस अर्थवादमें एक और भी तात्पर्य है । वह यह कि - जो प्रतिज्ञा की हुई हो; चाहे वह जैसी भी हो, उसे पूर्ण करना अव्यक्त चाहिये । पूर्ण न करने पर उसकी अकालमृत्यु हो जाती है । यह इस सारी कथाका निष्कर्ष है । इस कथाका अन्य तात्पर्य खीने यह भी है कि - पतिव्रता पतिके व्रतको पूर्ण करे । पति जैसी भी उससे आज्ञा दे; ‘ आज्ञा गुरूणां ह्यविचारणीया ' ( रघुवं. १४४६ ) पत्नी भी-उसपर विचार ही न करे । उसका उत्तरदायित्व पति पर रखे; CC - 0. Ankur Joshi सुदर्शनकी कथा । [ ७४६ स्वयं केवल पतिके व्रतकी अनुवर्तिनी होवे, इससे जीत लेती है । जब इस दृष्टिसे इस आक्षिप्त वह परलोकको जावेगी; तव वादी के आक्षेप में कथाकी परीक्षा की वहाँ लिखा दियासलाई लग जावेगी । है कि - मृत्यु सुदर्शनकी उक्त प्रतिज्ञांको ' गृहस्थस्य हि धर्मोऽययः संप्राप्तातिथिपूजनम् कि-त्मनः प्रदानेन ( ४३ ) ' प्राणा ' ( २२६६ ) ' अप्या-हि मम दाराश्च यच्चान्यद् विद्यते वसु । अतिथिभ्यो मया देयमिति मे व्रतमाहितम् अतिथिको सभी ( ७१ ) कि- मैं कुछ ( स्त्री तक भी ) देनेकेलिए तैयार हूँ-यह मेरा व्रत है । जैसे कि कठोपनिषद् यम अतिथि - नचिकेता-को ' इमा रामाः सरथाःआभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व ' ( १ | १ | २५ ) सेवा करवानेकेलिए स्त्रियाँ भी और स्त्रीको भी जब उसने उक्त देनेकेलिए कहा था; व्रतकी आज्ञा दे दी, ' अध्यात्मनः प्रदानेन न ते कार्या विचारणा । एतद् व्रतं मम सदा हृदि सम्परि-वर्तते ' ( २।४३-४४ ); तब उस सुदर्शन के ब्रतकी तथा पतिव्रताके पतिव्रतकी परीक्षा के लिए धर्मराज ब्राह्मणरूप धरकर प्राया कि यह सुदर्शन प्रतिज्ञा पूरी नहीं कर सकेगा । सो वह देखने आया कि- इसकी स्त्रीका स्पर्श करनेपर यह ईर्ष्या वा क्रोध करता है, वा नहीं । यदि यह अपनी प्रतिज्ञासे विचलित हुआ; तो मैं कूटमुद्गरसे इसे मार डालूँगा ( २।४८, ६७ ) । सो ऐसी कड़ी परीक्षा में, अपनी प्रतिज्ञाकी पूर्तिरूप सत्यतामें सुदर्शन फर्स्ट डिंवीयन और फर्स्ट पोजीशनमें पास हुआ ( २ | ७५ ) वहाँ कोई साधारण व्यक्ति परीक्षार्थं नहीं गया था, किन्तु ' सवै IT A Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 394
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
७५० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) च भूमिं च व्याप्य वायुरिवोद्यतः ' ( २ | ७७ ) द्विजः । वपुषा द्यां गया था । उसने स्वयं कहा भी भगवान्का दूसरा रूप धर्मराज तवानघ! प्राप्तः सत्यं च ते था - ' धर्मोऽहमस्मि भद्र ं ते जिज्ञासार्थं प्रीतिमें परमा त्वयि ' ( ७६ ) ( मैं धर्मराज ( मृत्यु - यमराज ) ज्ञात्वा तेरी परीक्षार्थ आया था; और तू, तेरी स्त्री सत्य-- हूँ, केवल प्रतिज्ञ निकले । साध्वीं तवोद्वीक्षितु-फिर यह भी कहा कि- ' पतिव्रतामिमां मप्युत । न चास्ति शक्तिः त्रैलोक्ये कस्यचित् पुरुषोत्तम! रक्षिता त्वद्गुणैरेषा पतिव्रतगुणैस्तथा । श्रधृष्या यदियं ब्रूयात् तथा भवेत् ( ८२ ) ( यह पूर्ण पतिव्रता है, त्रिलोकी में भी तन्नान्यथा पुरुष इसे कुदृष्टिसे नहीं देख सकता ) और कहा कि तूने कोई काम - क्रोधको जीत लिया है ( ८७ ) । इससे तात्पर्य यहाँ स्पष्ट हो गया कि - पतिव्रताको पतिका व्रत पूरा करना चाहिये । यहाँ तो केवल परीक्षामात्र थी; सचमुच विषयभोग नहीं था । अब आक्षेप्ता वादी ही यदि इन कामासक्तिकी बातों में लगा हुआ नपुंसक हो जावे; और वह अपने स्वामीके व्रतको पूर्ण करता हुआ अपनी युवति स्त्रीको आज्ञा दे कि - ' अन्यमिच्छस्व सुभगे! पतिं मत् ' ( हे सुभगे! मुझसे दूसरे पतिकी इच्छा कर । [ अपने परंम स्वामीका व्रत पूरा कर । ] तव स्त्री दूसरे से मैथुन करके सन्तानोत्पत्ति करे ) ( स.प्र. ४ पृ. ७३ ) तब वह वादीकी पतिव्रता स्त्री वादी के गहरे दयानन्दी मित्रसे वा आगन्तुक अतिथिसे वादीकी आज्ञानुसार सुस्त कर ले अव उसे वादी सुदर्शनकी कथा का समाधान पतिव्रता कहेगा, या व्यभिचारिणी ( बदमाश )? इसका उत्तर देगा; वही इस कथाका भी हो जावेगा वह बो । हमारे तो इस कथाका निष्कर्ष केवल अतिथि सेवा तन- अनुसार है; यह नहीं कि वह अन्यसे मैथुन भी करा लें मनसे करनेमें ; क्योंकि भी पति अपनी स्त्रीको अन्यसे मैथुनकी आज्ञा कोई । - शेष जो वादीने शिवपु. के अनुसार नहीं देता । सुदर्शनकी व्यभिचारिणी बताया है; इसमें पुराणका स्त्रीको । कुछ भी दोष नहीं यह वादीकी वाणी ही व्यभिचारिणी होने का दोष; भिन्न व्यक्तियों को उसने एक बता दिया है । दोनों ॥ महा. में सुदर्शनकी स्त्रीका नाम ओघवती और उसे अच्छे कुलमें उत्पन्न बताया है । ( २।३६ ); पर शिव. ( कोटि. ) में सुदर्शनको स्त्रीका नाम दुला तथा उसे ‘ दुष्टकुलोद्भवा ' ( १३/२१ ) कहा है । वहां सुदर्शनका स्त्री-सङ्ग करके बिना स्नान किये शिवरात्रिमें शिवपूजन करना कहा है; यह उसका पाप बताया है ( १३।२७-२८ ) और शिवरात्रिवाले दिन भी वह नहीं रह सका; इसी पापसे उसके पिताने उसकी स्त्रीको निन्दार्थ पुचली ' ( १३ ३५ ) कहा है; सो महाभारत तथा शिवपुराण की कथाका भेद होनेसे यह भिन्न व्यक्तियोंकी कथा सिद्ध हुई; तव वादीके कथनका स्वयं खण्डन हो गया । हमारे पास भी एक ' श्रीराम ' रहते हैं, उनकी स्त्री भिन्न नाम वाली है । वे पुराणोंकी कथा करते हैं । वादी जैसे पुराणशत्रुओंका वे प्रवल खण्डन किया करते हैं; तब क्या वे वादी द्वारा चादीकी स्त्रीके प्रति मान लिये जाएँगे? CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 395
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोक ( e ) ७५२ / वह ( ३३ ) पू ० - कात्यायन - स्मृतिमें वेदविरुद्ध गोवध | - ' उक्त जो अन्तिम अध्यायमें कहा है- ' चालनं दभंकूर्चेन सर्वत्र स्मृतिके पशोः ।... वपार्थ पाणेदारुणी ' ( १ ) यज्ञका पात्र जिसपर स्रोतसां के कोई पशुकी वपा ( च ) पकाई जाती है, पत्तों वा काष्ठका होना ग । चाहिये । ' गोस्रोतांसि चतुर्दश ' ( २ ) गायके शरीरमें १४ स्रोत होते स्त्रीको हैं । ' क्षुरो मांसावदानाथः [:...... व वपामादाय जुहुयात् ' ( ३ ) छुरा मांस प नहीं; काटने के लिए होता है । वपा लेकर हवन करे । ' हृज्जिह्वाक्रोड-दोनों मस्थीनि... पश्वङ्गानि प्रचक्षते ' ( ४ ) हृदय, जिह्वा आदि पशुके र्शन की १४ अङ्ग होते हैं । ' चरितार्था श्रुतिः कार्या... अतोऽष्टर्चेन होमः नाया है स्यात् छागपते चर।वपि ' ( ५ ) प्रत्येक कल्पाक्त कमे में श्रुतिको चरितार्थ करना चाहिये । इससे बकरा और चरु दोनों पक्षों में दुकूला स्त्री- आठ ऋचाओं से होम करना चाहिये । ' अवदानानि यावन्ति कहा क्रियेरन् प्रस्तरे पशोः । तावतः पायसान् पिण्डान् पश्वभावेपि निवाले कारयेत् ' ( ७ ) पशु न हो; तो उतने खीर के पिण्ड बनाकर उन्हें उसकी कुशों पर रखकर होम करे । ऊहनव्यञ्जनार्थं तु पश्वभावेपिं भारत पायसम् । सद्द्रवं श्रपयेत् तद्वद् अन्वष्टक्येपि कर्मणि ' ( ८ ) कहन क्योंकी और व्यञ्जन कर्म के लिए भी पशुके अभाव में पायस ही को ढीला गया । एकावे ' यह सनातनधर्मियोंका धर्म है । ( एक दयानन्दी डाक्टर ) नाम उत्तरपक्ष - यह आक्षेप दयानन्दियोंकी ओरसे दिया जाता ओंका है, अतः हम उन्हें उत्तर भी उन्हीं की सम्मत पुस्तकोंसे देते हैं । कात्या, स्मृ के ५ वें पद्य में! इस कर्मको श्रुतिसम्मत बतलाया गय है । श्रुति वेदका नाम है । स्वाद, जी भी लिख गये हैं- ' श्रुतिस्तु ” CC - 0. Ankur Joshi Collection वैदिक हिंसा हंसा ७१३ चेदो विज्ञेयो ' इति मनुस्मृती पर्यायौ स्तः ' ' निगम [ २/१० ], श्रुतिर्वेदो मन्त्रच इति जब कात्यायनस्मृतिमें और श्रुति वेदोंके नाम हैं ' ( भाभू, पृ. है; तब वैदिकम्मन्य उक्त कर्मको श्रुति ( वेद ) से समर्थित ६१ ) चादी उक्त कर्मपर आक्षेप माना वैदिक कर्मका जितना उत्तरदायित्व कैसे करता है? ही वैदिक्रम्मन्य दयानन्दियोंपर हमपर आता है; उतना वेदों पर श्रद्धा रखते भी आता है; क्योंकि दोनों पक्ष हैं । ( ख ) मनुस्मृतिमें लिखा है- ' या वेदविहिता स्मिँश्चराचरे । श्रहिंसामेव तां विद्याद् हिंसा नियता-( मनु. ५ | ४४ ) मनुस्मृतिमें वेदाद् धर्मो हि निर्बभौ ' तुलसीराम प्रक्षेपोंके मानने वाले दयानन्दी श्री-- स्वामीने भी इस पद्यको प्रक्षिप्त इसका अर्थ उनने यह किया नहीं माना है । हिंसा है- ' इस जगत् में जो वेदविहित चराचर [ चर - अचर ] में नियत है, उसको महिसा क्योंकि वेदसे धर्मका ही प्रकाश ही जानो; का पाठ हुआ है ' । हमने उनका मैकेट-नहीं दिया; क्योंकि वह मनुके पदोंका अर्थ स्वा. द. जीने भी संस्का.वि. पू. ११३ की नहीं है । लिखा है, ' जो ब्राह्मण टिप्पणी में प्रकारान्तरसे वा सूत्र वेदविरुद्ध हिंसापरक हो; उसका प्रमाण न करना ' । इसका भाव यह हुआ कि - जहाँ हिंसा हो; उसे अप्रमाणित मत करना वेदानुकूल । निरुक्तकार ने भी स्पष्ट लिखा है - ' आम्नाय - वचनाद् अहिंसा प्रतीयेत ' ( १ | १६ | ६ ) ( अर्थात् वेदोक्त हिंसा भी अहिंसा हुआ करती है ) इस विषय में स्पष्टता ' झालोक ' ( ६ ) पृ. ४४-४५१ में देखो । तव वैदिकम्मन्यं वादी स ० घ ० ४८ Gujarat. An eGangotri Initiative STA
पृष्ठ 396
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
७५४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) इसपर श्राप कैसे करता है? ( ग ) अब इसी पशुकी वपाका हवन वादी अपने वैदिक-ऋषि स्वा.द.जी की पुस्तकों में भी देखे – ' प्रेष्यत्र वोर्हविषो देवता-सम्प्रदाने ' ११० ( अ. २ ( ३६१ ) यहाँ स्वामीजीने देवताके सम्प्रदानमें कर्मों हविको ब्राह्मणग्रन्थ में प्रेष्य और ब्रून् धातुओं-के योग में षष्ठी विभक्ति बताई है । इसमें स्वामीजी ने ' कारकीय ' ( पृ. ३२ ) में उदाहरण दिये हैं-‘ इन्द्राग्निभ्यां छागत्य हविषो वपाया मेदसः प्रेष्य अनुत्र हि ' ' यहाँ स्वामीने छागं ( बकरें ) की हवि, ( जिसका पर्यायवाचक - ' पा ' दिया है, उसी की स्पष्टता ' मेदः ' शब्दसे की है, जिसका ' वादी ' चर्बी ' अर्थ करता है ) वपा वा मेदः को इन्द्र और अग्नि नामक देवताओं को अर्पण कराया है । ' अग्नये छागं हविर्वपां : मेदो जुहुधि ' में भिन्न - धातु होनेसे षष्ठी न कराकर स्वामीजी ने - द्वितीया कराई है । यहां छागकी वपा वा मेद - जिसका अर्थ . वादीने कात्या. स्मृ. में ' चर्ची ' किया था - का स्वा. द. जीने अग्नि में हवन अपने ' कारकीय ' ( सं ० १६३८ ) में बड़े स्पष्टरूपमें बताया है । यहाँ दयानन्दी वादी वपा वा मेद का जो अर्थ करेंगे, वही कात्या. स्मृ में भी हो जायगा । सो यदि वे दूसरोंकों पशुभक्षी कहते - हैं; तो उन्हें भी छागभक्षी बनना पड़ेगा; क्योंकि- स्वा. द. जीने • अपने यजुर्वेदभाष्य ( १६/२० ) में लिखा है-योऽत्र बहुपशुहविर्भुग् वेदवित् सत्क्रियों मनुष्यों भवेत् '; स प्रशंसां प्राप्नोति ' । इसका यही तो अर्थ होगा कि जो वेदन कात्या. स्मृतिके वचनका समाधान [ o बहुत पशुओं की आहुतिका शेष भाग खावेगा; उसकी प्रशंसा होगी । अव इसपर स्वामीजी की हिन्दी वेदानुसार क • वाला होम करके हुतशेषका भोक्ता वेदवित् देखो- ' बहुत प -स मनुष्य प्रशंसाको . होता है । ( १६/२० ) । प्रा स . ( घ ) यदि दयानन्दी लोग कात्या. स्मृ. में ' श्रुति ' क •. छाग वा गोकी वपा का हवन साक्षात् वेदमें देखना शब्द देखकर | . तो निम्न मन्त्रों में देखें- चाहते हो | व 27 ' दसां पृथक् स्वाहा ' ( यजुः २१।४० ) ' होता छागस्य वपाया मेदसो जुषेत्ताम् ' ( ४१ ) ' होता यक्षत् सरस्वती यक्षद् श्रश्विने | घ मेवान .. वपाया मेदसो जुषताम् । होता यक्षद् इन्द्रम् ऋषभस्य ६ . मेदसो जुषताम् ' ( २१ | ४१ ) ' होता यक्षद [ गोः ] वपाया अश्विनौ खागस्य हविष • श्रात्तामद्य मध्यतो मेद उद्धृतं घस्तां नूनं पार्श्वतः, श्रोणि शितामतः [ यहाँ निरुक्त ( ४/३/२ ) में श्रीयास्कने यह पशु के ग्रह माने हैं, यह दुर्गाचार्यके उक्त मन्त्रके भाष्य में स्पष्ट है ] उत्सा दत:, श्रृङ्गाद् श्रृङ्गाद् अवत्तानां [ अवदानानां ] कर्वे एव अश्विमा -द जुषेताँ इविर्होतर्यज ' ( २१ | ४३ ) ' होता यक्षत् सरस्वती मेस वि • हविष आवयदद्य मध्यतो मेद उद्भूतम् ( शेष पूर्वेकी तरह है २१ | ४४ ) ' होता यक्षद् इन्द्रम् ऋषभस्य [ गोः ] हविष आवयदुद्द मध्यतो मेद उद्भूभृतम् ' ( शेष पूर्वकी तरह २१/४५ ) । * यहांपर वेदमें छाग, मेष तथा ऋषभ [ गो ] की वपा एवं · मेदका, अङ्गोंके अवदानों का पूरा - पूरा वर्णन आया है । देवध ( क्याभि [ गोभि ] यजते ' ( ऋ. ६२८३ ) यहां गौवोंसे भी देववह CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat: An eGangotri Initiative
पृष्ठ 397
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) वेदानुसार है, क्योंकि यहां गौएं देवता हैं । यही श्रुतिके मन्त्र कात्या. ' बहूत कहा पद्योंका मूल हैं । जो वेदमें अर्थ होगा, वही कात्या. नाको पपु • स्मृ. के में. उक्त भी हो जावेगा । सो छाग ( बकरे ) ऋषभ ( बैल ) आदि मात्र की बपाका स्वा.द.जीके अनुसार बकरा मेढा, बैल आदि पशुओं-द देखकर के बीचका ( मेदः ) चिकना भाग घी - दूध लेवें ' तथा वपाका बीज, चाहते हो वाघढ़ने वाली रीति, ( यजुर्भाष्य २१।४३ ) आदि अर्थ करके ; अकवर राजासे वीरबल - द्वारा मंगाये गये बैलके दूधकी तरह श्रधिकरे, मेढे और बैलंके बीच के चिकने भाग दूध - घी आदिका तीं मेयर श्रर्थं वादी करते चलें [ क्योंकि घी - दूध बकरी वा गायका होता [: ] चपाय है, बर्करे वा बैलका नहीं ], इसी प्रकार विपक्षी कात्यायनस्मृतिमें य. इसि मी वही अर्थ समझ ले, फिर उपालम्भ कैसा? ' यश्चोभयोः समो श्रोषि दोषः परिहारोपि वां समः । नैकः पर्यनुयोक्तव्यस्तादृगर्थविचारणे ' हाके ( जब दोनों में वह बात बराबर हो, संमाधान भी दोनोंका उत्सा - बराबर हो; तब एंकको उलहना नहीं दिया जा सकता । वेद में अश्विमा ' ऋषभ ' शब्द है, स्वा. द. जीने उसका अर्थ ' बैल ' ( २१ | ४१ ) नेपस किया है, ' कात्यायन- स्मृति में उसीका पर्यायवाचक ' गो ' शब्द की तरह है । यह हमने स्वा. द. जीका पक्ष दिखलाया है; अब अपना पक्ष वियद्रय दिखलाते हैं-1 ( ङ ) वस्तुतः हम तो समझते हैं कि- कात्या. स्मृ. में ' गो'-उपा. ( २६/२ ) शब्दका पशु - सामान्य अर्थ है, गाय - बैल नहीं; क्योंकि - वे दिनांध ( गाय - बैल ) वेद - पुराणादिमें सर्वत्र अन्य- अघ्न्या ( अहन्तव्य, न देवा मारने योग्य ) कहे जाते हैं । इसीलिए कात्या. स्मृ. ( २६।१ ) में CC - 0. Ankur Joshi Collection ' गो ' शब्द के बहुत अर्थ [ ७५७ ' स्रोतसां पक्षो: ' यह पूर्वमें भी ' पशु ' शब्द आया ' पश्वङ्गानि चतुर्दश ' ( २६ | ४ ) में तथा उम हम पद्य में है भी, आगे ' पशु ' शब्द आया है; सो पूर्वोत्तर- साहचर्यवश मध्यस्थित ' गो ' शब्द भी जातिपक्षवश ' स्त्री - पशु ' वाचक है । ( च ) ' गो ' शब्दके बहुत अर्थ हुआ करते हैं, यह महाभारत-के एक ही पद्य ( कर्ण पर्व ६० ४२ ) में ७ बार कहे गये ' गो ' शब्द-से स्पष्ट है । इस विषय में ' आलोक ' ( ६ ) पृ. ३१५, पृ: ३६१ देखो । सं. ( १०।१४६।३ ) में श्रीसायणाचार्य ने ' गाव'का अर्थ ' यवयाद्या मृगाः ' किया है, ' गोसदृशो गवयः ' यह प्रसिद्ध ही है । स्वा. द. जीने भी अपने वेदभाष्य ( यजुः १३।४६ ) में उस नीलगायका मारना लिखा है ।. ( १।१२४ । ११ ) में श्री सायणने ' गव ' का अर्थ ' अश्वानां ' भी किया है । इसी प्रकार निरुक्तके अनुसार ' गो ' शब्द पशुसामान्यका वाचक होनेसे - ( इसपर देखो ' आलोक ' ( ६ ) पं. ३१५ ) तब उससे महिष वा महिषी आदि अन्य भी पशु गृहीत हो सकते हैं । जैसे कि. ( ६ । ३३ । १ ) में श्री सायणने ' महिषाः ' का ' प्रवृद्धा मृगाः ' अर्थ किया है । इसीलिए कात्या. स्मृ. के ( २६६ ) पद्य में ' छाग ' शब्द आया है, सो उक्त स्मृतिमें भी निरुक्तके पूर्वोद्धृत वचनानुसार ' गो ' शब्द छाग तथा जातिपक्षमें ' बागी ' वाचक अथवा अन्य स्त्रीपशु - वाचक सम्भव है, ' गाय - बैल ' वाचक नहीं; क्योंकि - गाय - बैल वेदादि - शास्त्रानुसार ' अघ्न्य- अघ्न्या ' होते हैं । IT A इसपर देखो ' आलोक ' ( ६ ) । सो अब उक्त स्मृतिमें ' गो ' शब्द गाय - बैल वाचक न रहा । पशु - वध भी सनातनधर्मानुसार कलि-Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 398
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
७५८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) वर्ज्य होनेसे अब कर्तव्य नहीं रहा; वहां घृतपशु वा पिष्ट-( आटेका पशु गृहीत हो जाता है । ' अज ' आदिको भी ' अज इति अन्नं वीजं वीरुद् ( लता ) वा, तमालभ्य - उपयुज्य प्रजाः पशून् प्राप्नोतीति गौणाः शब्दाः ' ( ११२/१० ) इस मीमांसा - दर्शन के शाबरभाष्यानुसार अन्न, बीज आदि अर्थ किया जा सकता है । ' घाना धेनुरभवद् वत्सो अस्यास्तिलोऽभवद् ' ( अथवं. १८ | ४ | ३२ ) ' श्रश्वाः करणा गावस्तण्डुलाः ' ( अथर्व. ११ | ३ | ५ ) इत्यादि मन्त्रोंके अनुसार ' ' गो ' शब्द तण्डुलादि - वाचक भी हो जाता है । पारस्करगृ. ( १।३।२६ ) के भाष्य में श्रीजयराम ने लिखा है-' यज्ञ - विवाहयोरेव आलम्भस्य आवश्यकत्वेन विधानात् कली च गवालम्भस्यैव ' प्रतिषेघाद् गोप्रतिनिधित्वेन पश्वन्तरं स्मार्त पशुः पायसं वा भवतीति ' । गदाधर ने भी लिखा है- कलौ गोपशोनिंषेधात् तत्स्थाने अजालम्भः पायसं वा ' । इस प्रकार पायसपशु भी रखा गया है । वही पशुका प्रतिनिधि बन जाता है । जैसे कि विवाहों-में गोदानकी दक्षिणाके स्थानापन्न गोदुग्धदानकी दक्षिणा दे दी जाती है । इसी कारण निरुक्तमें ' अथाप्यस्यां ताद्धितेन कृत्स्न-वन्निगमा भवन्ति ' - ' गोभिः श्रीणीत मत्सरम् ' ( ऋ. ६ ४६ ४ ) इति पयसः ' ( २ । ५ । ४ ) ' गो ' शब्दका अर्थ ' गायका दूध ' भी आया है । ' कुर्याद् घृतपशुं सङ्गे कुर्यात् पिष्टपशुं तथा । न त्वेव तु वृथा हन्तुं पशुमिच्छेत् कदाचन ' ( ५।३७ ) इस मनुके वचन में पशुके स्था-नापन्न घृतपशु तथा पिष्ट ( याटेका ) पशुका निरूपण आया है । कात्या स्मृ में भी यह कहा है- ' अवदानानि यावन्ति क्रियेरन् क्षुर वा खांडा [ upe U प्रस्तरे पशोः । तावतः पायसान् पिण्डान् पश्वभावेति ( २६/७ ) ऊहन - व्यञ्जनार्थं तु पश्वभावेपि पायसम् कारवेत ( ८ ) यहाँ अभाव में पायसका प्रयोग लिखा है । सो पशु पशु I - यज्ञ कलिवनि होने से - जैसे कि बृहन्नारदादिके कलिवज्ये - प्रकरण में कलियुगमें पशुका अभाव स्पष्ट ं होने से वहां पायस सुप्रसिद्ध पिण्ड दिये है-जा सकते हैं । ( च ) शेष है- ' चुरो मांसावदानार्थः ( २६/३ ) कि-अवदान ( काटने के लिए छुरा होता है, यह दयानन्दी माँसके ह आक्षेप । यहाँ वादीने ' अवदान ' का अर्थ कदाचित्. ' दो वादीश श्रव । इ या खण्डने’के अनुसार ‘ काटना ' अर्थं किया हो; सो यह के fa स्वा.द.जी भी लिख वा मान गये हैं । देखो उनकी संस्कारविधि, यह वहाँ एक ‘ शृतावदान ' एक याज्ञिक शस्त्र है, वहां भी अर्थ होगा-त शृत ( पक्च ) का अवदान ( काटने वाला ); और फिर यज्ञपात्रोंयें रा उनका ' खाँडा २४ अंगुलका प्रत्यक्ष है, वह छुरा ही है, संस्कार मा विधिमें उसका चित्र ही देख लो । ' खाँडा ' यह खङ्ग ' का अपभ्रंश है, जो पुरानी हिन्दी में प्रसिद्ध है । स्वा. द. जी भी पहले यज्ञमें हर पशु तथा उसका काटना मानते थे, देखो प्रथम ' सत्यार्थप्रकाश ' । इस पर देखो ' आलोक ' ( ६ ) पृ. ४३४ - ४३६ ) । मीमांसादर्शनमें भी भी ' मांसं तु सवनीयानां चोदनाविशेषात् ' ( ३ | ८ | ४२ ) द्वारा कृप मांसका प्रयोग बताया गया है । स य एवं विद्वान् मांस मुप्रसिच्य भी उपहति ' ( अ, ६/६/७ ) यहाँ वेदमें अतिथियज्ञमें तथा यन्त्रासं सम निष्पृणामि ते '; ( अथव १८ | ४ | ४२ ) ' अपूपधान् मांसत्रान् चन्द श CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat: An eGangotri Initiative
पृष्ठ 399
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) [ ore II ७६० ] कारवेत् ' ( अ. १८/४/२० ) इन वैदिकस्थलोंमें भी ' मांस ' शब्दका सीदतु है उसका जो अर्थ किया जायगा; वही स्मृति - पुराणादि-पशु I प्रयोग, भी वैदिकम्मन्योंको लिव जिन के आक्षिप्त स्थलोंमें कर लेना चाहिये, सद्ध है- फिर आक्षेप कैसा? । ( छ ) अबकी उनकी संस्कारविधि ( पू. २७७ ) में स्वा.द.जीने दिने तरीयारण्यक १०/६४ वचनसे यज्ञकी सामग्री उद्धृत की - माँसके है । यह आध्यात्मिक यज्ञ है । उसमें ' मन्युः पशुः, दमः शमयिता ' वादीका इसे रूपकालङ्कारसे लिखा है । इसका भाव यह है कि इस यज्ञमें क्रोध ' पशु ' स्थानीय होता है, और ' दम ' द्वारा मन्यु यह वे ' पशु'को मारा ( शान्त किया जाता है । जब आध्यात्मिक-रविधि यज्ञमें दम से क्रोध - पशुको मारना सूचित किया गया है; होगा- I तव लौकिक यज्ञमें भी पशु तथा उसका मारना स्वतः - सिद्ध हो पात्रों गया; चाहे उस पशुको हमारे अनुसार पिष्ट ( श्राटेका ) पशु संस्कार- मान लिया जावे; इस विषय में ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ८१०-८१७ अपभ्रंश देखो । वादी लोग इस पशुवधकी जो सङ्गति लगाएंगे; वह यज्ञमें हमारे पक्षमें भी लग जावेगी । काश ' । सोवादी लोग उस खांडेका जो समाधान करेंगे; वह यहां दर्शन में भी हो जावेगा I । जैसे सिख लोग अपने सम्प्रदायके अनुसार द्वारा कृपाणसे कड़ाहप्रसादको संस्कृत करते हैं, वैसे ही संस्कृत - पायस के सिच्यु भी तुरसे चाहे वह काठका ही बना हुआ हो; तात्कालिक यत्तांव सम्प्रदायके अनुसार १४ भाग किये जाते थे । स्मार्त ' अवदानं'-चहरेह शब्दका स्थानापन्न शब्द वेद में ' अवत्ता: ' ( यजुः २१ | ४३ ) यह ' मांस ' का अर्थ [ ७६१ निष्ठान्त प्रयोग श्राया है । धातु दोनों ही स्थान ( ज ) ' मांस ' चिकनी वस्तुका समान है । आम, केला श्रादिके नाम भी होता है, इसलिए शब्दसे आता गूदेका नाम भी आयुर्वेद - शास्त्रोंमें ' मांस ' है । उससे दूधके चिकने भाग पायस, मलाई भी गृहीत हो जाते हैं । जैसे कि शतपथमें आदि द्द वै परममन्नाद्य ं यन्मांसम् कहा गया है - ' एतदु ' ( ११/७/१/३ ), इसपर ' यज्ञे पशुबलिर्वेद-विरुद्धः ' यह आर्यसमाजी श्रीनरदेवजी सो यहां ' परमान्न ' तु पायसम् शास्त्रीका ट्रैक्ट देखो । ' ( अमर. २७/२४ ) के अनुसार परमान्न ( पायस ) को भी ' मांस ' शब्द से कहा गया है, वैसे यहां पर भी वादी समझ ले 1 । आर्यसमाजके म.म. श्रीश्रार्यमुनिजीने ३८ | ४२-४४ सूत्रोंके अपने ' मीमांसार्य भाष्य ' में माष आदि मांसल पदार्थो का नाम भी ' मांस ' माना है, उसे हमारे पक्ष में भी वादी समझ लें । ( झ ) कात्या.स्मृ.में जो पशुके अङ्ग कहे गये हैं- ' हजिह्वाकोड-मस्थीनि यकृद् वृक्को गुदं स्तनाः । श्रोणिस्कन्धसटा पार्श्व पश्वङ्गानि प्रचक्षते ' ( २६ | ५ ) उन गो ( पशु ) के अङ्गोंको वादी अथर्ववेदसं. के १०/६ सूक्तमें इन मन्त्रोंमें ढूँढ लें । ' हृदयं ' ( १५ ), जिह्वा ( ३ ), क्रोड ( २५ ), अस्थि ( १८ ). यकृद् ( १६ ), गुदा ( १६ ), स्तनाः ( २२ ), श्रोणी ( २१ ) अंस ( स्कन्ध ) ( १६ ), सटा ( वालाः ) ( २२ ) । अथवा स्कन्धकी अस्थि ( टांट ) ( २० ) । पार्श्व ( पर्शवः ) ( २० ) ' मांस ' ( १८ ) इत्यादि । ( ञ ) वस्तुतः यहां अन्य रहस्य है । वह यह कि -अथर्ववेदसं. के NT A CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 400
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
७६२ । श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) १० म काण्डके हम सूक्तमें ' शतोदना गौः ' के यज्ञका वर्णन आया है; वहां उसके सभी अङ्गका भी वर्णन आया है, जैसे कि अभी हम दिखला चुके हैं । ' शतौदना ' का अर्थ है शत - बहुतसे श्रोदन ( पके चावलों ) से बनी गाय । उसके लिए वहां शान्त करना ( मारना ), पाक ( पकाना ), स्वर्गगमन; अस्थि ( हड्डी ), लोहित ( लहू ), ' मांस ' शब्द भी उपचार रूपसे आये हैं ( अथवं. १०/६/७, १८ ); सो उसी व्रोहियों ( चावलों ) से निर्मित गाय अङ्गका वहां हवन आता है, जैसेकि महाभारतमें भी कहा है- ' श्रूयते हि पुरा काले ( वैदिककाले ) नृणां व्रीहिमयः पशुः । येनायजन्त यज्वानः पुण्यलोकपरायणाः ' ( अनुशासन:: ११५।५६ ) अर्थात् वैदिककाल में चावलोंका पशु बनाकर यज्वा लोग उसका हवन करते थे । इसपर देखो ' आलोक ' ( ६ ) पृ. ३५६-३६०, ४०४-४०६, ४५३-४५४ ) । ( ट ) अथवा ' गोधूम ' के ' धूम ' शब्दका ' विनापि प्रत्ययः पूर्वोत्तरपदलोप: ' ( वा. ५।३।८३ ) इससे लोप करनेपर ' गो ' बंचता है, सो गेहूँ के आटेकी बनी हुई गाय ( देखो - इसपर ' आलोक ' ( ६ ) पृ. ४०४ ) का ही वहां होम इष्ट है । इसलिए शतपथ में भी कहा है- ' अन्न 9 हि गौः ' ( ४।३।१,२५ ) । इस प्रकार कात्यायनस्मृतिकी भान्ति अन्यत्र भी तथा वेद-भाष्यादिमें जहाँ कहीं ऐसा भ्रम पड़े वहाँ भी वही पिष्टपशु वा व्रीहिपशु समझकर उसकी व्यवस्था समझ लेनी चाहिये; क्योंकि-वेदों तथा पुराणादि सभी शास्त्रोंमें, गाय - बैलको ' अघ्न्या - अघ्न्य ' एवं अवध्योंकी परम अवधि कहा गया है; सो जीवित - गायका कात्यायन के वचनका समाधान इन यज्ञमें, वा यज्ञसे बाहर कभी वन नहीं सकता; अतः वहीं विधिपूर्त्यर्थं पिष्ट - पशु वा ब्रीहि - पशु ही समझ लेना चाहिये । जैसे कि यज्ञोंमें पत्नीका भी साथ बैठना आवश्यक अश्वमेधयज्ञमें सीता के वनवासमें होनेसे उसके अभावमें होनेसे उसके स्थानापन्न सुवर्णकी वा कुशकी सीता बैठाई गई थी; देखो ( वाल्मी, ७६६७, कात्यायनस्मृ. २०/१, आनन्द रामा. १/७/१३७ ) वैसे यहां भी समझ लेना चाहिये ।; श्र ( ठ ) यद्यपि पिष्टपशु वा व्रीहिपशुके होममें भी एक प्रकारकी हिंसा - सी हो जाती है; पर वह यज्ञमें अभ्यनुज्ञात है; परन्तु कलिवर्जित होनेसे पिष्टपशु यज्ञ भी कलियुगमें कर्तव्य नहीं, न क्योंकि इससे बहुत - सी हानियोंकी आशङ्का है । उन्हीं हानियोंको लक्ष्यमें रखकर कलिमें ‘ यज्ञे पशुवधस्तथा ' वर्जित कर दिशा १० गया था । इसलिए पशुस्थानापन्न त्रीहि - यव आदि अन्नोंका र म भी होम हुआ करता है । देखो इसपर शतपथ एवं ऐतरेय ब्राह्मएका वचन ( आलोक ' ( ६ ) पृ. ४५३-४५४ ) । वि सो इस प्रकार व्यवस्थाको जानकर विपक्षियोंको स्मृति और पुराण पर व्यर्थ के आक्षेप नहीं करने चाहियें, क्योंकि उनका मूल भी वेद ही है । सो वेदमें वादी लोग वपाभेद भ्र आदिके अर्थ करने में जैसे अपनी तोड़ - मरोड़की करामात यह दिखलाएँ, वैसे स्मृति - पुंसणादि में भी वेदानुकूल अर्थ सममों । चा व्यर्थ ही सनातनधर्मेपर आक्षेप न करें । सदा भगवद्गीके सिं अपेक्षित इस पद्यके अंशको जान रखें कि -'न बुद्धिभेदं जनयेद् पुर CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative