सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 401–410

सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 401–410

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श्रीसनातनधर्मालांक ( C ) ७६४ ] श्रतः ' ( ३।२६ ) । इस विषय में पूरी स्पष्टता आलोक ' ' ( ६ ) में अज्ञानाम् में ' क्या प्राचीन भारत में गो - वध होता था ' यह चाहिये । पू. ३११-४७१ देखें | होनेसे विषयं पूराका घूरा में उसके ३३ ( ख ) ' विलक्षण लोकविज्ञान ' में वादीने ग्रहों आदिकी ( वाल्मी दूरीमें वर्तमान - विज्ञानसे भेद बतलाया है । यह जो दूरियां उसने ५ ); वैसे लिखी हैं, वह स्वयं तो उन्हें देख वा नाप नहीं आया; केवल प्राजकल के विज्ञान की बात उसने लिख डाली है । सो आजकल के प्रकारकी विज्ञानने भी अनुमान ही लगाये हैं । सो उसके सिद्धान्त भी समय - समय पर बदलते रहते हैं । अतः हम उसे ' सिद्ध बात ' परन्तु न्य नहीं नहीं कह सकते । तत्र पुराणपर उससे आक्षेप भी व्यर्थ है । नियोको ( ग ) शेष जो वादीने ब्रह्माकी नाकसे सुवरका ( भाग ३ । १३ । र दिया १८ ) निकलना, तथा जांघसे असुरोंका पैदा होना, भ्रुकुटीसे कार महादेवका होना आक्षिप्त किया है, वह व्यर्थ है । ब्रह्मा वादी-ब्राह्मएका जैसे मानुष - व्यक्ति नहीं । उनके अङ्ग भी दिव्य हैं, अत: उनमें विशेष उत्पत्तियां भी सम्भव हैं । वादीका नाक केवल मैल को स्मृति निकालता है, मुँह थूक वा कफ निकालता है, उसका सिर जुएं क्योंकि पैदा करता है; पर दिव्यों में दिव्यतावश, अष्ट सिद्धियोंपर वपा - भेद अधिकारवश विविध प्रकारकी उत्पत्तियां भी हो सकती हैं । करामात. यह सिद्धियोंसे रहित वादीको स्वयं समझने का यत्न करना मम । चाहिये । वेद में भी परमात्माके मन, आंख, कान, मुख, नाभि, द्गी सिंर, पांव आदि से चन्द्रमा श्रादिकी उत्पत्ति बताई गई है, देखो ई जनदेर् पुरुषसूक्त - ' नाभ्या आसीद् ' इत्यादि ) ।. CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. स्वामीका चरित्र [ ७६५ ( घ ) स्वा. दु.जी पृथ्वी से ऊपर होते - होते गैससे भरी हुई फूकनी की भांति छतके साथ जा लगते थे, वे एक घोड़ा - गाड़ीको रोकने में सफल हुए थे, वे विषको पचा गये थे, बड़े - बड़े पहलवानोंको उन्होंने पछाड़ दिया, निचोड़े हुए गीले अंगोछेसे स्वामीने दो-तीन बूँदें पानी निकाल ही दिया, जिसे पहलवान भी नहीं निकाल सके थे; वे शुरूसे ही संन्यासी हो गये थे, यह बातें दयानन्दके चरित्रकी पुस्तकें बताती हैं; पर वादी उन कर्मोको नहीं कर सकता, तब क्या वह स्वामी के उन चरित्रोंको जो ऋषि - मुनि वा देवोंके मुकावलेमें नगण्य हैं- गप्प मान लेगा? यदि नहीं, तब लोकोत्तर ऋषि - मुनि वा देवोंके लोकोत्तर चरित्रोंपर असम्भव दोषको थोपना वादीकी अल्पज्ञता, अल्प-श्रुतता, निन्दनप्रकृति एवं केवल खण्डन- व्यसनिता बता रहा है । . स्वामीजी भांग पीया करते थे, इतनी कि दूसरे दिन होश आता था | एक वार उनको इतना नशा हुआ कि वे नन्दी बैलमें गुदा के रास्ते घुसकर उसमें लेट गये, एक स्त्री नन्दीकी पूजा करने आई और उनको खट्टा दही खिलवाया, इससे उनका नशा उतरा । स्वामी जी हुक्का पीया करते थे. स्वामीजी नसवार भी सूघा करते थे, संन्यासी होते हुए भी कामवर्धक, मारी हुई धातुओंके. भस्म खाया करते थे, खूब गालियां दिया करते थे, वेदोंके अशुद्ध एवं अपनी इच्छानुसारी अर्थ किया करते थे । आर्यसमाजानुसार अन्य भी उनमें बहुतसे दोष थे, जैसे बचपन में आ.स.के सिद्धान्तसे विरुद्ध मूर्ति - पूजा, रुद्राक्ष पहरवा, शैवोंवाली An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) ७६६ ] आदि स्वामी के अपने ही अनुसार ' जंगली- व्यवहार ' भस्म लगाना - चरित्र की पुस्तकें ही बताती हैं; क्या यह बातें उनकी जीवन करना वादी गालियाँ देना तथा अशुद्ध अर्थ करके जनवचन अन्य दोषोंका अनुसरण करता है, वा उनसे छोड़कर उनके करता है? यदि नहीं; तब अलौकिक-स्वा. द. जीकी निन्दा देवताओंके सामर्थ्यशाली ऋषि - मुनियों तथा भोगयोनि लोकोत्तर चरित्रोंपर कर्मयोनि तथा सीमित शक्तिशाली मनुष्यों उनकी निन्दा करनेमें वादी कैसे अधिकृत है? वाले दोष लगाकर यह केवल उसकी या तो अल्पश्रुतता है, या पक्षपात है । वादीने ' कबीर... मर्दन ' इस अपनी पुस्तक ( पृ. ३६. पं. १३-- १४ ) में लिखा है - ' मानव - योनि कर्म वा भोग - योनि है, शेष सभी योनियां केवल भोगयोनियां हैं ' । सो देवयोनि मनुष्य योनि से · भिन्न होनेसे ( देखो इसपर ' आलोक ' ४ र्थ पुष्प पृ. ४०५-४३७ ) वह भोग - योनि हुई । कर्मयोनि तथा भोगयोनिकी व्यवस्था वादी भी • समान नहीं गायों से मैथुन मानकर उसे देवयोनि भी , उसमें मानुषी सिद्ध हुआ । मानता होगा । बैलके अपनी मातासे वा अन्य करनेपर क्या - वादी- उसे मनुष्यकी भांति पापी मनुष्यों वाला दण्ड दिलावेगा? यदि नहीं; तब मनुष्य - योनिसे भिन्न होनेसे भोगयोनि हुई, तब दृष्टिकोणसे आलोचना करता हुआ वादी नासमझ कर्म करके उनका केवल देवता- लोग मनुष्य योनिमें भोग करने ही स्वर्गादि - लोकोंमें जाते हैं; भोग पूरा हो जानेपर CC - 0. Ankur Joshi Collection स्वर्ग पतन LUEG फिर इस लोकमें वापिस आ जाते हैं, जैसा कि उपनिषदोंकी सारभूत गीता में कहा है --- ' यज्ञैरिष्ट्रा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान् दिवि देवभोगान् । ( २० ) यहां यज्ञोंसे स्वर्गप्राप्ति और स्वर्गेमें देव बनकर ' भोगोंकी प्राप्ति कहकर गीता कहती है- ' ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ' ( गीता ६२१ ) इस विषय में उपनिषदोंके वचन ' भी देखिये- ' तद् यथा इह कमैजितो लोक क्षीयते, एवमेव ं अमुत्र ं ( परलोके ) पुण्यजितो लोकः ( स्वर्गः ) क्षीयते ' ( छान्दो. ८ । १ । ६ ) । यहां पर स्वर्ग के क्षीण होने का तात्पर्य स्वर्गसे गिरकर मनुष्यलोकमें आनेका है । अव अन्य वचन देखिये - ‘ इष्टापूर्तं ( यज्ञादिकं ) मन्यमाना वरिष्ठ... ( यज्ञादिना प्राप्तस्य ) नाकस्य ( स्वर्गौलोकस्य ) पृष्ठे ते सुकृते अनुभूत्वा इमं [ मानुष ] लोकं हीनतरं वा विशन्ति ' ( १ | २ | १० ) यहाँपर भी यहां के कर्मयोनि मनुष्योंका फलभोगार्थं परलोक स्वर्गादिमें जाना कहा है, सो वे वहाँ भोगयोनि देव बनकर कम समाप्त - प्राय होनेपर स्वर्गसे गिरकर फिर इस मनुष्यलोक में आ जाते हैं, और कर्म-' योनि बनकर कर्म करने लग जाते हैं । यही बात बृहदारण्यकमें भी कही है - ' प्राप्य अन्तं कर्मणः [ स्वर्गलोके फलं प्राप्य ] तस्य यत् किञ्च [ कर्म ] इह [ अस्मिन् मनुष्यलोकें ] करोति श्रयम् [ कर्मयोनिर्मनुष्यः ]; तस्माद् [ स्वर्गद् ] ' लोकात् पुनरेति अस्मै ' लोकाय [ अस्मिन् मनुष्यलोके प्रत्यथे-कर्मणि " ( पाः २ | ३ | १२ ) इति चतुर्थी ] कर्मणे [ कमकरणर्थम्, Gujarat. An eGangotri Initiative

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] श्री सनातनधर्मालोक ( 1 ) ७६७ ७६८ ' क्रियार्थोपपदस्य, ( पा. २।३।१४ ) इति चतुर्थी ) ( ४ । ४ । ६ ) ( कर्मयोनि दोंकी मनुष्य इस मनुष्यलोकमें जो कर्म करता है; उनका फल परलोक 1. स्वर्ग में भोगने जाता है; अर्थात् ' दिवि देवा: ' ( अ. ११/६ ( ७ ) २३ ) नेमान गोंकी स्वर्गलोक में जाकर देवता बनता है, ' देवा वै नाकसद: ' ( शत. विशालं ८ | ६ | १ | १ ) ' द्यौर्वै सर्वेषां देवानामायतनम् ' ( शत. १४ | ३ | २२८ ); तब उस फलको देवयोनि में भोगकर फिर जीव उस स्वर्गसे पयलोक गिरकर इस मनुष्यलोक में मनुष्य बनकर पुनः कर्मकरणार्थं : आता है । ) वादी उपनिषदों में बेदविरुद्धता नहीं मानता । स्वर्ग:) तात्पर्य इससे सिद्ध होता है कि मनुष्य तो कर्मयोनि है; मनुष्यसे वचन भिन्न देवता केवल भोगयोनि हैं । यदि वे कर्मयोनि होते, तो उन्हें कर्म करनेकेलिए इस लोकमें न आना पड़ता; इससे भी इमं स्पष्ट है कि - स्वर्ग भोगस्थान है, और देवता भोगयोनि ही हैं । इस प्रकार पशु भी केवल भोगयोनि हैं; वे मनुष्यलोकमें रह सकते हैं, स्वर्गादि - लोकमें भी । देवता उच्च भोगयोनि हैं, पशु नेपर अधम भोगयोनि हैं । सो प्रकृतिकी व्यवस्थासे भोगयोनि देवता कम- तो स्वर्गसे गिरकर मनुष्यलोक में ब्राह्मणादि उच्च योनि में जन्म लेते हैं, और भोगयोनि पशु प्रकृति - व्यवस्थावश मनुष्यलोकमें र्मणः. निम्न शूद्र - अन्त्यजादि योनिमें जन्म लेते हैं ॥ स्मिन् जैसे बच्चा - बूढ़ा समान माना जाता है; इस प्रकार देवता [ ग ] तथा पशु भोगयोनित्व रूपमें समान हैं । पर वृद्ध उच्च होनेसे येथे- सम्माननीय होता है, दोष होनेपर भी उसे बच्चे वाला दण्ड थप्पड़ मारना आदि नहीं दिया जाता; उसके दोषमें भी उपेक्षा CC - 0. Ankur Joshi Collection भोगयोनि तथा कर्मयोनिका भेद [ ७६६ ( चश्मपोशी ) करनी पड़ती है, इसी प्रकार देवताओं में मानुषी दृष्टिकोणसे उच्च - भोगयोनि होनेसे दण्ड्य नहीं दोष होनेपर भी वे भोगयोनि माने जाते । यदि कहीं उन्हें दण्डित किया भी जाता है; तो इसलिए कि अन्य लोग ऐसा · वा शापादि विशेष कारण न करने लग जावें । होनेसे होता है । परन्तु पशु निम्न - भोगयोनि दोष उसका भी उपेक्षित ही किया जाता देवताओं वाला सम्मान नहीं है; पर वह सम्मान नहीं पाता; जैसे कि बच्चा वृद्ध वाला पाता । उसमें गाय आदिका सम्मान अपवाद जैसे कि बच्चेका भी समय पर प्याररूप है; करता है । सम्मान हो जाया फलतः भोगयोनि तथा कर्मयोनिकी व्यवस्था होनेसे भोगयोनि समान न ANA जीव कर्मयोनि के दृष्टिकोणसे दोषी होनेपर भी उसका दोष सामान्यतया आलोचनीय वा दण्डनीय नहीं हुआ करता । तव भोगयोनि - देवताओंको कर्मयोनि- दृष्टिकोण से आक्षिप्त करता हुआ वादी वस्तुतः अज्ञानी वा अल्पश्रुत ही सिद्ध होता है, यह पाठकोंने जान लिया होगा । जिस स्थान में पेशाब करनेपर मनुष्यको जुर्माना किया जाता है, उस स्थानपर पेशाब करते हुए गाय - बैल आदि पर जुर्माना करना नहीं आता । आशा है वादी अपना ज्ञान इस वादी के पुसणविषयक आक्षेपोंका हमने है; अब उसमें शक्ति नहीं कि वह उठ सके । • देते हैं कि वह जनताको पुराणोंकी बातोंके स ० ध ० ४६ Gujarat. An eGangotri Initiative कानूनकी पुस्तकों में विषय में बढ़ावेगा । परिहार कर दिया हम उसे धन्यवाद समझने का अवसर

पृष्ठ 404

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श्रीसनातन धर्मालोक ( 8 ) ७७० ] जो भी नये आक्षेप करे, हमारे पास भेजता जावे, देता है । वह हम भूमण्डलभर के हम उनका पूर्ण उत्तर दिया करेंगे । बल्कि प्रेरित करते हैं कि वे अपनी बनाई सनातन-आर्यसमाजियोंको पुस्तकें हमारे पास भेज दें; हम उनका खण्डन धर्मकी खण्डक कारण यह है कि-" क्रम - क्रम से कर देंगे । ऐसे आत्मविश्वासका सिद्धान्तभित्ति प्रायः असत्य एवं पूर्वापर - प्रकरण इन वादियोंकी है; अतः बालूकी है; तब उसके गिरते छिपानेपर आधारित दीवार गिरानेमें पाँचकी एक हुए देर नहीं लगती । उस वालूकी ही काफी हो जाती है । आशा है - संशयग्रस्त लोग हमारे ठोकर प्रत्युत्तरोंका उनके आक्षेपोंसे मिलान करके निष्पक्ष अन्तःकरण-से मनन करेंगे; तो उनके सब संशय दूर होंगे । ( ३४ ) वादी के पौराणिकगप्पदीपिका, पुराण किसने बनाये, का प्रत्युत्तर प्रायः हम दे चुके । उसके शेष आक्षेपोंका जो 1 ट्रेक्टों प्रत्युत्तर दे चुके हैं; उनका विवरण देते हैं।- = गत पुष्पों में हम आज्ञा ' वादीने लिखी है, १ ' माँ, बहिन, बेटी से विवाह की वहाँ विधि नहीं है, अतः श्राज्ञा न होनेसे ग्राह्य नहीं है । उसका • वास्तविक तात्पयें ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ६८-७२ में हम बता चुके हैं, वादी उसपर कुछ भी नहीं बोल सका; न उसका इतिहास कहींसे दिखला सका । इसी प्रकार विवस्वान्की ' भ्रातृजा ' भी एक प्रकृतिविशेष है, जिसे भविष्यपुराणने इतिहासका रूप दे • दिया है, नहीं तो न विवस्वान् का कोई सहोदर भ्राता था; न -संज्ञा उसकी लड़की थी । वस्तुतः भोगयोनि - देवताओं एवं CC - 0. Ankur Joshi Collection भोगयोनि एवं कर्मयोनिका भेद अमैथुनयोनिमें उत्पन्न हुओंमें यह लौकिक से नहीं होते । कहीं यदि औपचारिकता - सम्बन्ध वास्तचिच्या वह कर्मयोनि - मनुष्योंको से कह दिये जायें ग्राह्य नहीं, तो मर्यादायों का अतिक्रमण मानुषी दृष्टिसे आक्षिप्त जा सकता है, और न उन्हें शापादिविशेषकारण नहीं किया । दण्डित किया जाता है । के विना कधी देवता भोगयोनि हुआ करते हैं, और • तो यहाँ किये हुए कर्मोंका स्वर्गलोक में पशु भी । देवता स्वतन्त्रतावश वे मनुष्यलोक फल भोगने जाते हैं; ' में भी आ - जा सकते हैं । टि क्षीणे पुण्ये मत्यलोकं चिशन्ति ' ( गीता से गिरकर ब्राह्मणादिवर्णमें. ६२१ ) देवत्व-मनुष्य आकर बनते हैं । मुक्तिलोकमें स्वामी मुक्तोंको भोगयोनि मानते हैं; और उनका रमण करना, सुखभोग भोगना मानते हैं; और हमारे स्वर्गको वे. मुक्ति कहते हैं, सो दोनों स्थान बराबरबात सममनी चाहिये । छातः उनके चरित्रोंको कर्मयोनि मानुषी दृष्टिकोणकी तुलासे कभी तोला नहीं जा सकता । इस प्रकार पशु भी भोग-योनि होते हैं; वे भी यहांके किये हुए कर्मोंकोपशु बनकर इस लोक में ही भोगते हैं; उनमें भी भगिनी - गमन, मातृ-गमन आदि होते हैं, पर वे मानुषी दृष्टिकोणसे न तो आलोचित किये जाते हैं; न किये जा सकते हैं, न किये जा चाहियें । वे अपने कर्मोंके क्षीण हो जाने पर प्रकृत्तिके नियम-वश मनुष्ययोनि में अतिशूद्रादि बनकर फिर कर्मसे क्रमशः Gujarat An eGangotri Initiative

पृष्ठ 405

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ७७२ चिकता- करते हैं । वें, उन्नति देव तथा पशुओं में भोगयोनितावश किये नौकिक इस प्रकार व्यवहारकी मनुष्य के लिए कर्तव्यता जानेवाले स्वेच्छाचारिताके किया तव वादीके किये श्राक्षेप कुण्ठित होगये । कहीं नहीं रहती में, हम पूर्व स्पष्टता कर चुके हैं । केवल दोनों भोग-इस विषय भी उनमें इतना अन्तर है कि - भोगयोनि पशु देवता योनि होनेपर है; और भोगयोनि देवता उच्च योनि । जैसे श्रधमयोनि ते हैं; बाल - वृद्धकी तथा बच्चे एवं संन्यासीकी शक्ति में अन्तर होते हुए भी निर्मर्यादतामें साम्य है, वैसे पशु और देवोंमें भी । बत्व- बच्चा अज्ञानवश कर्म नहीं करता, मर्यादाओंमें नहीं रहता, होनेपर भी यौवन वाली सामर्थ्य न रहनेसे पर बूढा ज्ञानयुक्त उनका मर्यादाओं में नहीं रहता । मर्यादा केवल जवानों में होती है, उन्हींके लिए विधि - निषेध हैं । वैसे ही पशु - बच्चे, मनुष्य - जवान, देवता-मनी वृद्ध दोनों रूपमें लेने चाहियें । इस विषय में हम पूर्व स्पष्टता रणकी कर चुके हैं, अथवा ' आलोक ' ( ६ ) पृ. ४७२-४६१ देखो । ओग- २ देवताओंको गर्भ रह गया - इस विषय में इसी निबन्ध नकर ( सं. ७ ) ( पृ. ६६१ ) में कह दिया गया है । ३ कानसे वा नाकसे नातू. उत्पत्ति हुई, इस विषय में गर्भाधानका कोई प्रश्न ही नहीं, यह तो अमैथुनिक उत्पत्तियाँ हैं । वादी के सिरसे जुएँ वा लीखें पैदा होती हैं; कई रोगियोंके पेटसे साँप जैसे बड़े - बड़े कीड़े पैदा होते हैं; म. अणिमा आदि सिद्धियाँ जिन्हें स्वाद भी अपने शः देवताओंमें ( यजुः १७ | ६७ ) में मान चुके हैं, उनकी स्पष्टता योगदर्शन-भाष्य CC - 0. Ankur Joshi Collection गत समाधानों के पृष्ठ [ ७७३ विभूतिपाद में है । अतः वहाँ असम्भवका कोई रह जाता । ४ विष्णुका प्रश्न शेष ही नहीं व्यभिचार वा अन्योंकी प्रेरणाविषय में ' आलोक ' ( ६ पृ. ५७०-५८१ ) में देखो । उत्पत्ति में ' आलोक ' ( ७ पृ. ७४, ५ बालखिल्यों की ' शिवजीका पार्वतीको १३६-१४३ ) में देखो । ६ विचित्र आदेश ' इसी निबन्ध ( सं. ६ पृ. ६६२-६६४ ) में देखो । ७ ' ब्रह्माजीकी मुसीबत ( पृ. ६२६ ) तथा इसी पुष्प ( पृ. ५२६ ) में देखो ' पर ७ म पुष्प । ८ ' मढ़ेके पेटसे वच्चा जन्मा ' विषय में अभिमन्त्रित जलकी महिमा समझनी चाहिये । इस प्रकारका समाचार - पत्रों में प्रकाशित वृत्त भी प्रसिद्ध है । परिशिष्ट में देखो । ६ ' इन्द्रके आचरण ' में ७ म पुष्प ( पृ. ६०७-६०९ ) में देखो । ऐ. ब्रा. ( ७/२८ | १ ) तथा तै.सं. ६ २७ ५ में आता है - ' इन्द्रो यतीन् सालावृकेभ्यः प्रायच्छत् ' । कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् में इन्द्रने अपना चरित्र सुनाया है - ' त्रिशीर्षाणं त्वाष्ट्रमद्दनम्, श्रवाङ्मुखान यतीन् सालावृकेभ्यः प्रायच्छम् बह्वीः सन्धा ( प्रतिज्ञा:) अति-क्रम्य दिवि प्रह्लादादीन् तृणम्, अहमन्तरिक्षे पौलोमान, पृथिव्यां कालकाब्ज्यान् [ श्रहनम् ], तस्य मे तत्र लोम च नामीयत ( नाऽहिंस्यत ) ' ( ३१ ) इन उपनिषद् वा ब्राह्मण वा संहिता - वचनोंका पुराणों में अनुवाद किया गया है । अव वादियोंकी इष्ट संहितामें भी इन्द्रके कर्म सुनिये - ' यस्याऽवधीत् पितरं यस्य मातरं यस्य शक्रो [ इन्द्रो ] भ्रातरं नात ईषते । " न किल्विषादीषते ' ( पापाद् न विभेति ) (. ५३४४ ) ' त्वं माया-ANA Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 406

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७७४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ह ) भिरनवद्य मायिनं''अर्दय: ' ( ऋ. १०/१४७/२ ) इत्यादि मन्त्रोंमें इन्द्रका पाप वा माया करनेपर भी उसे निर्भय वा निष्पाप कहा गया है । सो पाप करनेपर भी इन्द्रको अनवद्य ( निष्पाप ) कहना इन्द्रादिदेवोंके भोगयोनित्ववंश कहा गया है । सो पुराण स्थित देवचरित्रका मूल भी वेद होनेसे वैदिकम्मन्य वादीका खण्डन हो गया । वादी तोड़ - मरोड़ करके अर्थ भले ही बदले; पर पुराण में यही अर्थ इष्ट था । अर्थ तो हर एक बातका बदला जा सकता है । तब तो वादी के नामका भी अर्थान्तर करके उसकी सत्ता भी उड़ाई जा सकती है । तब क्या वह अपना अभांक मान लेगा? १० श्रीकृष्ण की ३० करोड़ पत्नियों पर छठे पुष्प-( पृ. ६०७ - ६० ९ ) में देखे । ११ ‘ शिवजीके चार मुंह'मैं ' तिलोत्तमा की सुन्दरताका अर्थ-वाद है । अनुशासनपर्व ( १४३. ) में उन चार मुखोंकें अन्य भी प्रयोजन बताये गये हैं । शिवलिङ्ग के विषय में पूर्व कई बार बताया गया है कि - निर्गुण - निराकार मूर्ति के लिए सफियाना अण्डाकार मूर्ति रखना पड़ती है । इसी प्रकार की विष्णुकी भी मृति होती है, जिसका नाम ' शालग्राम ' होता है । जैसे उसका विशेष नाम ' शिला ' होता है, वैसे शिवकी सफियाना निर्गुण-निराकारमूर्तिका नाम ' लिङ्ग ' होता है । इसपर ' ' आलोक ' ( ७ ) पृ. २२६, पृ. ६१० की टि. पं ० ७-१४ में स्पष्टता की जा चु है । । जैसे कि गृह्यसूत्र में ' अहत - वस्त्र ' का विधान आता है । ' हत- ' वस्त्र ' सफियाना कपड़ेका नाम होता है; और ' हृत - वस्त्र ' वह ' कैवर्ती श्वपाकी ग्रादि होता है जिसे फाड़कर कमीज आदि बना दी जावे निर्गुण मूर्ति सफियाना ( अण्डाकार, लिंग मूर्ति । इस प्रकार कर होती है । चतुर्भुज, पञ्चानन, वा शिला मूर्ति ) । वा मुख बाहु आदि वास म सगुण मूर्ति होती है; यह समझ लेने पर फिर भ्रमकी सम्पादन नहीं रहती । भाग १२ ' पौराणिक ऋषियोंकी माताएं ' कैवर्ती श्वपाकी उलूकी, मृगी, गणिका, नाविका, मण्डूकी आदि , जो, शुकी हैं । जाती हैं, इनमें भविष्य - पुराणमें पूर्वपक्ष वर्णित किया गया दिखलाई है, ॥ रह सिद्ध बातें नहीं, किन्तु साध्य हैं । व्यासजी की माता कवतके नहीं थी, किन्तु कैवर्तसे पालित थी, इसपर हम ' आलोक वंशकी ' ( ७ ) श्रा पृ. ६१७-६२० में तथा अन्यत्र कई वार स्पष्ट कर चुके हैं । तद पराशरकी श्वपाकी से उत्पत्ति इतिहास से समर्थित नहीं, अन्यथा श चादी उस पर इतिहासका प्रमाण दे । शुककी शुकीसे तो उत्पत्ति राज नहीं आई है, किन्तु अरणिसे 1 । वसिष्ठकी उत्पत्ति उर्वशीके. VI शरीरसे न होकर उसके मनसे हुई है । वह कोई मानुषी कर गणिका भी नहीं थी, दिव्य अप्सरा थी, यह विषय है व ऋसं. ( ७ | ३३ | ११ ) में स्पष्ट है, हमने ४ र्थ पुष्प तथा अन्यत्र करव इसी निबन्ध में विवेचन दिया है । शेष कई पशु-पक्षिणियोंमें जो दिव्य थीं, कई. उत्पत्तियां ऋषियोंकी शक्त अमोघ - वीर्थतावश हुई हैं, उनमें बीजकी प्रधानताका अत अथैवाद है । उस बीजकी श्रेष्ठता के कारण उनपर क्षेत्रका ( जो प्रभाव नहीं पड़ सका, यह तात्पर्य है । इसीको मनुजीने, थ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 407

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श्री सनातनधर्मालोक ( 8 ) E 1 स प्रकार कर दिया है ( १०/७२ ) । देवताओंके चरित्र के विषय में ' आलोक ' ( ७ ) में आर-मूर्ति ) '१३ झोंवाली क निबन्ध ( पृ. २-५६ ) तथा २२०-२२४ पृष्ठ देखो । १४ देवी-म्भिक स्भावना भाग में शिव - विष्णु आदिका रागवान् दिखलाना - देवीके माहा-कार्थवाद है, यह हम म पुष्प ( पृ. ६३७ ) में दिखला चुके शुकी हूँ । १५ ‘ सुरतनाथ ' ' व्यभिचारदृष्टाः ' आदि भागवतस्थ पदोंका दखलाई हम ' आलोक ' ( ७ ) ( पृ. २१०-२१२ ) में दिखला चुके हैं । रहस्य न है, वे ( ३५ ) प्र ० - व्यासके लड़के शुकदेव राजा परीक्षित्के गर्भ में वंशी से पूर्व मर चुके थे । ' कैलास - पृष्ठादुत्पत्य स पपात दिवं क ' ( ७ ) तदा । अन्तरिक्षचरः श्रीमान् वायुभूतः सुनिश्चितः ' ( महाभा. है । शान्ति, ३३२।१० ) तब महाभारतके ६६ वर्षोंके बाद शुकदेवने अन्यथा राजा परीक्षितको भागवत कैसे सुनाया? उत्पत्ति ( उ ० ) -इस विषय में साङ्गोपाङ्ग विवेचन तो हम १० म पुष्पमें वंशीके. करेंगे, यहां निर्देशमात्र कर देते हैं।-मानुषी योग आदि सिद्धि के द्वारा पुरुषमें ऐसी जीवन्मुक्तता हो जाती विषय है कि वह वायु जैसा शक्तिशाली तथा सूक्ष्म आकार भी धारण चन्यत्र करके आकाशको लांघकर ब्रह्मका समीपी हो जाता है | देखिये पशु. श्रीमनुजीने तीन वर्ष तक सावित्री के सिद्ध कर लेनेसे ही ऐसी योकी शक्तिकी प्राप्ति लिखी है- ' योऽधीतेऽहन्यहन्येतान् ' त्रीणि वर्षारिण काश्रतन्द्रितः । स ब्रह्म परमभ्येति वायुभूतः खमूर्तिमान् ' ( २/८२ ) नेत्रका ( जो ॐ, व्याहृति तथा सावित्री - गायत्री इन तीन त्रिकोंका तीन वर्ष लगातार जप करता है; वह वायुवत् स्वतन्त्रचांरी होकर CC - 0. Ankur Joshi शुकद्वारा भागवतका सुनाना [ ७७७ आकाशकी तरह सूक्ष्ममूर्ति धारण करके बन्धनरहित ब्रह्मके समीपी हो जाता है ) । तब क्या वादिप्रतिवादिमान्य होकर मनुवचन के द्वारा तीन वर्षके बाद पुरुषकी इस कर वादी तीन वर्षके बाद ऐसी सिद्धि न समझ काशयोः उस पुरुषकी मृत्यु मान लेगा? ' काया-सम्बन्धसंयमाद् लघुतूलसमापत्तेश्च ( योग. ३ | ४२ ) यहां पर योगप्रणालीविशेषके श्राकाशगमनम् ' द्वारा शरीर और आकाशका सम्बन्ध संयम करनेसे हलका होकर योगीका आकाश - गमन करना कहा है; तब क्या वादी उस पुरुषका मर जाना समझ लेगा? जैसे आजकल राकेटोंके द्वारा चन्द्रलोक के पास गये हुए मनुष्योंका राकेटसे बाहर निकल हलके होजाने से श्राकाशमें उडना कहा है, देखिये इसपर समाचार - पत्र, यही सिद्धि श्रीशुकदेवकी यहाँ यन्त्रद्वारा न बताकर योगशक्तिके द्वारा बताई गई है । तत्र जीवन्मुक्त शुकके द्वारा श्रीमद्भागवत सुनाना असम्भव नहीं । ( ३६ ) एक यह भी वादियोंका आक्षेप हुआ करता है कि-योगदर्शन ( १।२४ ) में कहा है- अविद्या आदि क्लेशों, शुभाशुभ कर्मों तथा उसके अच्छे - बुरे फलों तथा उसके संस्कार से रहित जीवसे भिन्न ईश्वर कहाता है । इसके व्यासभाष्यमें कहा है-' सं तु सदैव मुक्त ईश्वरः ', परन्तु पुराणेतिहास- वर्णित रामकृष्ण-आदिमें यह बात नहीं देखी जाती । रामा. में ' यदचिन्त्यं तु तद् दैवं भूतेष्वपि न हन्यते ' कहकर श्रीरामने वन जानेको अपने प्रारब्धका फल माना है । ' पूर्व मया नूनमभीप्सितानि ' ( अरण्य. ' ANA Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 408

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७७८ । श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ६३।४ ) में अपने पूर्वजन्मके पाप वर्तमान दुःखमें कारण बताये हैं । ' नत्वेवाहं जातु नासं ' ( गीता ) में श्रीकृष्णने अपनेको जन्म-मरण वाला बताया । ' वायुर्यथा घनानीकं ' ( भाग ) में गोपियों को परमेश्वरको ही मिलाने और बिछुड़ाने वाला माना । अतः रामकृष्णादि ईश्वर नहीं थे । उत्तर- इस आक्षेपका उत्तर पुराण में बहुत स्थलोंमें श्रा चुका है । ईश्वरने इस समय मनुष्यावतार धारण किया हुआ था, अतः उसने मनुष्यताका ही नाट्य करना था । नाटक में वास्तविकता वैसी न रहनेपर भी वैसा अभिनय करना ही पड़ता है । श्रीमद्भा. में इसे स्पष्ट कर दिया है- ' मायाविडम्वनमवेहि यथा नटस्य ' ( ११ / ३१-११ ) ऐन्द्रजालिक नट जैसे जीवितों को मरे वा जले हुएकी भांति दिखला देता है, वैसे ही भगवान् भी ' सृष्ट्रात्मनेदमनुविश्य विहृत्य चान्ते संहृत्य चात्ममहिनोपरत: स आस्ते स्वयं हीं सब लीलाओं की सृष्टि एवं क्रीडा करके उनका फिर संहार करके अपनी महिमामें विराजमान रहता है । भगवानके लीलानाट्य में अन्य भी कई प्रमाण देखिये- ' ततो ' मानुषभावं तु दर्शयन् सकलाज्जनान् । विचिन्वन् सर्वतः सीताम् ' ( आनन्दरामा. १ / ७ / १३४-३५ ) । इसी प्रकार रामायणकी तिलक टीका ( ३।६४.११ ) में स्पष्टता देखो । ' त्वया ( पार्वत्या ) प्रोक्तस्त्वहं ( शङ्करः ) पुरा । त्वया यस्य ( रामस्य ) जपो नित्यं क्रियते राघवस्य हि । सोऽयं स्त्री - विरहान्नाम मूढवद् भ्रमते वने ' ( आनन्द. १७ / १३८ ) तदा त्वामत्रयं त्वहम् । देवि! साक्षान्महाविष्णुस्त्वयं अवतारों में लीलानाट्य . रामो महीतले । शिक्षार्थं सकलॉल्लोकान् मूढवद् भ्रमते ( १३६-१४० ) । और देखिये- ' प्रपञ्च निष्प्रपञ्चोपि विडम्वयसि प्रपन्न जनतानन्दसन्दोहं प्रथितुं प्रभो! ' ( भाग ' । भगवन्, आप जगत् के बखेड़े से सर्वथा रहित हो. फिर १०।१४।२७ ) हे पृ. , भी अपने भक्तोंको आनन्दित करनेकेलिए लीलानाट्य करते हो । इसी बातको श्रीमद्भा तथा देवीभागवत में स्पष्ट कर दिया भ है- ' मर्त्या- ' यह तारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं... कुतोऽन्यथा स्याद् रमतः स्व आत्मनि सीताकृतानि व्यसनानीश्वरस्य ' ( भा. अर्थात् अपने आत्मामें ही रमरण वियोगका दुःख ही भला क्या हो शिक्षणार्थं भगवान्‌का नाट्य है । मानुष- चेष्टितम् ' ( दे. ४।२५।२१-२२, जैसे नाटकमें जब तक नटके दिखलाई पड़ती; तब तक दर्शकों के । ५ १६६५-७, दे. ८ १०११५-१७ ) करनेवाले रामजी को सीबाकें सकता है? यह तो पुरुषोंके ' मानुषं देहमाश्रित्य चक्रे ५।१।२० ) । अभिनय में असलीयत नहीं हृदय में आनन्द नहीं उदित होता; उसका सामाजिकों पर प्रभाव नहीं पड़ता । सती का पार्ट बन पूरा कर रहा हुआ नट ऐसे करुणस्वर से रोता है कि- जनताकी आंखों में भी वर्षाकी झड़ी - सी लग जाती है; तब क्या वादी यह मान लेगा कि इस नटको सचमुच ही दुःख हो रहा है! नाटकों में सीताका पार्ट वेश्याएँ भी पूरा करके पतिव्रत्यका प्रभाव स्त्रियोंपर डाल रही होती हैं; पर क्या वह स्वयं भाव पतिव्रतात्वसे प्रभावित हो जाती हैं? नहीं; उनका वह नाव्यमात्र CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat: An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) | ७७८ 1 नाट्यसे स्वयं कुछ होता है; उसका ' ( वेदा. २ । १ ' ' लोकवत्तु लीलाकैवल्यम् चाहिये । ही समझनी भूतले । लीलामात्र ४४२- ४४७ ) में देखो । - ३७ ) १, ३६७-३६६, ) यह कहा है । 7 अपने दिव्यं ' ( गी. ४/१६ नहीं होता । ' मायेत् सा ते ' भी सम्बन्ध नहीं होता । | ३३ ) इस प्रकार भगवान् की इस विषय में ' आलोक ' ( ७ ) इसीलिए ' जन्म कर्म च भगवान्‌का लौकिक जन्म-( ऋ. १००५४।२ ) हे भगवन्, इसी मरण तेरी मायामात्र है । गोपियोंको अपनेसे भिन्न परमेश्वर-- ' मय यह सब को संयोग - वियोग का हेतु बताना यह भी नाट्य है । जैसे वादी त्मनि वेदको परमात्मासे बनाया मानता है; वेदमें कहा है- ' अग्निमीलै २५-१७१ सीता पुरोहितम् ' ( ऋ. १ | १ | १ ) ( मैं अग्नि वा परमात्माकी पूजा करता के पुरुषों हूँ? ) यदि यह ऋषिका वाक्य है, तो वेद ऋषियोंका बनाया सिद्ध होता है । यदि परमात्मा का यह वचन है; तब वह क्या अन्य परमात्माकी पूजा करता है? क्या वह स्वयं परमात्मा नहीं? दोनों स्थान समान उत्तर है । नहीं उदित ( ३७ ) वादी यह कहा करते हैं कि - पुराण श्रीव्यासजीके पार्ट बनाये हुए नहीं; यह भिन्न - भिन्न पुरुषों के बने हुए हैं; क्योंकि-ताकी कई इनमें परस्पर विरोध वा असङ्गतियाँ मिलती हैं- इस यह विषय में कई बार हम पहले कह चुके हैं । यहाँ भी पुराण-- है! विषयका उपसंहार करते हुए हम कुछ लिखते हैं-त्यका पुराणके कर्ता विष्णु के अवतार श्रीव्यास हैं; यहां ' कर्ता ' का ' स्वयं ' भाव है ‘ प्रवक्ता’ः । क्योंकि – ' कृ ' धातुका ' प्रवचन ' अर्थ भी होता मात्र है; यह भी हम ' आलोक ' ( ६ ) में तथा अन्यत्र भी यत्र - तत्र कह पुराण अनादि, तथा कल्पभेद । ७८१ चुके हैं । उनको कर्ता वा प्रणेता इस प्रकार कि सिद्धान्तकौमुदीका कहा जाता है, जैसा कर्ता वा प्रणेता भट्टोजिदीक्षितको जाता है । श्रीदीक्षितने मुनित्रयकी उक्तियोंका कहा विन्यासमात्र अपने क्रमसे कर दिया, निर्माण नहीं । तथापि उपचारवश श्री दीक्षितको प्रणेता कहा जाता है, वैसे ही उपचारवश व्यासजी अनादि - पुराणोंका भी प्रणेता कहा जाता है को चुके हैं कि प्रतिकल्प । यह भी हम कह वा प्रतिमन्वन्तर में भिन्न - भिन्न व्यास उनका प्रवचन करते हैं, जैसा कि देवीभागवतमें स्पष्ट है - व्यास एक उपाधि है । अतः मन्वन्तरोंके भेदसे कहीं कुछ भेद भी हो जाता है । जैसेकि - हम स्वा.द.का भी एकवचन दे चुके हैं - ' मग्वन्तर पर्यावृत्तौ सृष्टेर्नैमित्तक - गुणानामपि पर्यावर्तेनं किञ्चित् किञ्चिद् भवति, तो मन्वन्तरसंज्ञा क्रियते ' ( भाभू. पू. नया - पुराना प्रतिमन्वन्तरमें बदलता जाता संज्ञा बांधी है ' ( पृ. २७ ) । सो इन भेदोंसे कोई पौराणिकताकी पुराणोंका अनादित्व सिद्ध हो जाता है भागवत इसको स्पष्ट करता है-' मन्वन्तरेषु सर्वेषु द्वापरे - द्वापरे युगे । पुराणानि यथाविधि ' ( १ | ३ | १८ ) द्वापरे २४ ) ' सृष्टिका स्वभाव है, इसीलिये मन्वन्तर-हानि नहीं है । इससे । वादिमान्य श्रीदेवी-प्रादुष्करोति धर्मार्थी द्वापरे विष्णुर्व्यासरूपेण सर्वदा । वेदमेकं स बहुधा कुरुते हितकाम्यया ( १६ ) । ' अल्पायु-षोऽल्पबुद्धींश्च विप्रानं ज्ञात्वा कलौ अथ । पुराणसंहितां पुण्यां कुरुतेऽसौ युगे - युगे ' ( २० ) यहां पर कलियुग के लोगोंको अल्पबुद्धि TANA at CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) ७८२ ] उनके हितकेलिए वेदके व्यास के बाद जानकर उपदिष्ट करते हैं - यह कहा प्रतिद्वापरयुगमें आगे स्पष्ट करते हैं-' मन्वन्तरे सप्तमेऽत्र शुभे वैवस्वताभिधे । श्रीव्यास पुराणको गया है । इसीको श्रष्टाविंशतिमे प्राप्ते धर्मवित्तमः । द्वापरे मुनिसत्तमाः । व्यासः सत्यवतीसूनुर्गुरुर्मे तथा द्रौणिर्व्यासो भविष्यति । श्रतीतास्तु एकोनत्रिंशत् सम्प्राप्ते कथितास्तु युगे युगे ' व्यासाः सप्तविंशतिरेव च । पुराणसंहितास्तैस्तु भिन्न - भिन्न ( २२-२४ ) यहां ७ वें वैवस्वतमन्वन्तर के २७ कलियुगोंमें भिन्न - भिन्न व्यासों द्वारा जिनका नाम देवीभागवत द्वापरोंमें प्रवक्ता बताया गया है; ( १ | झ२६-३२ ) में. कहा गया हैं, पुराणोंका कहा और २८ वें द्वापर में श्रीकृष्णद्वपायन व्यासद्वारा प्रवचन गया है, आंगेके २६ वें द्वापर में अश्वत्थामा व्यास पुराणवक्त्ता होंगे, यह बताया गया है - ' ततः शक्तिर्जातुकर्ण्यः कृष्णद्पायन-कथिता या मया श्रुता ' ( ३३ ) । स्ततः । अष्टाविंशतिसंख्येयं भेदोंके कारण इस प्रकार स्पष्ट हो गया कि मन्वन्तरोंके युगोंके भी सृष्टिके नैमित्तिक गुणोंका · इन मनुके स्वा.द.के अनुसार जाते रहनेसे जिसे कल्पभेद भी अन्तरोंमें परिवर्तन होते है- कई परिवर्तन हो जाया करते हैं, जैसे कि-..कहा जाता शतशिरा: ' ( आनन्द रामा, सारकाण्ड १३ | ४१ ) में . ' कल्पभेदात् किसी कल्पमें सौ सिरों वाला कहा है । • दस सिर वाले रावणको वदन्तीत्थं मुनयश्चापि केचन ' ( आनन्द. १३/२२ ) ' कल्पभेदाद् बात नहीं हो जाती । इससे न तो पुराणों-• तब यह कुछ विरोधकी CC - 0. Ankur Joshi Collection के अनादित्व में कुछ द्वारा प्रक्षेपका ही श्रीव्यासोंने यह सब है - इस बातके जान मुर्दे से सन्तान (? ) | ३. क्षति आती है; और नही भिन्न कुछ अवकाश है । भगवान्‌के - पुरुषों कल्पभेदवश भिन्न पुराणोंका अवतार लेनेसे सब सन्देह प्रवचन किया दूर हो जाते हैं । स्थल - स्थल पर इस विषय में सङ्केत दे चुके हैं हम ' आलोक ' के विद्वान पाठक इन बातोंको । आशा है संशयालुओं के संशयोंको छिन्न - भिन्न करते हृदयङ्गम करके आक्षेपोंका परिहार कर सकेंगे । हुए विपक्षियोंके । ( ३८ ) ' आलोक ' ( ७ ) केपृ. ३०३-३०६में ' मुर्देसे इस वादीसे मृतक व्युषिताश्व द्वारा आक्षिप्त सन्तान ( १ ) सन्तान पर हम सर्वाङ्गीण प्रकाश डाला था; उसका वह प्रत्युत्तर न दे सका; पर . कुछ आपत्तियाँ पत्र द्वारा लिखता है कि- ' जीवात्मासे विहीन - शरीर ही ' शव ' कहलाता है; यदि जीवात्माका संयोग रहता; तो वह ' शव ' न कहा जाता । सारी जिन्दगी तो राजा चुहिया भी रानीसे पैदा न कर सका, पर उसके ' शव ' से संभोग कराकर रानीने ७ लौंडे कैसे पैदा करा लिये? मनोबल मुर्दे में नहीं रहा करता । वहां ' शव ' शब्द लिखा है, जीवित राजा नहीं । यदि राजा योगी था; तो जीवित होनेपर क्यों नहीं सन्तान • पैदा कर सका । उत्तर- शवमें आत्माके फिर प्रकट होजानेपर भी उसे ' ब्राह्मणश्रमण ' न्यायसे वा लक्षणा से ' शव ' ही कहा जाता है; क्योंकि वहाँ वैधरूपसे शवमें प्रकट न होनेसे उसे. ' जीवित ' Gujarat An eGangotri Initiative