सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 411–420

सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 411–420

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J श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) ७५४ न कहकर ' शव ' ही कहा जाना ठीक समझा ' इस महाभाष्यके उदाहरण में ( ४ | १ | ४८ ) कुलम् प्रदेशको भी ' कूप ' कहा गया है । वस्तुतः हुए आत्मा ही काम कर रहा था । गया । ' कृपे ग-कूपके साथ ठहरे वहाँ उस शवका हमने ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ३०५ में शरीररहित आत्माकी अतिशयित शक्ति बताई थी; क्योंकि उसका न्यायदर्शनादिप्रोक्त-सिद्धान्तवश विभुत्व उसी समय ही प्रकट होता है । हम इसमें साक्षीरूप स्वा. शङ्कराचार्यके वेदान्तदर्शन के भाध्यके शब्द भी रखते हैं - ' देद्दयोगाद् वा सोपि ( ३ २ ६ ) ( देहके योगसे आत्मा-की परमेश्वरता छिपी रहती है ) इस सूत्रका भाष्य करते हुए आचार्य कहते हैं - ' सोपि तु जीवस्य ज्ञानैश्वयेतिरोभावो देहयोगाद् देहेन्द्रिय - मनोबुद्धिविषय वेदनादियोगाद् भवति । अस्ति च अन्न उपमा - यथा अग्नेर्दहनप्रकाशनसम्पन्नस्यापि अरणिगतस्य दहन-प्रकाशने तिरोहिते भवतः, यथा वा भस्मच्छन्नस्य, एवं... देहाद्यु-पाधियोगात्... जीवस्य ज्ञानैश्वर्यंतिरोभावः ' ( जीवके ज्ञान और ईश्वरता ( सामर्थ्यवत्ता ) का तिरोभाव देहके योगसे होता है । जैसे अग्निमें यद्यपि दाह और प्रकाश है; तो भी अग्निके अरणिमें स्थित होनेपर अथवा भस्मसे श्राच्छन्न होने पर उसकी प्रकाशमानता और दहन -सामर्थ्यं छिपी रहती है, इसी प्रकार देहादियोगसे आत्माकी ईश्वरता ( सामर्थ्य ) छिपी रहती है ) । इससे स्पष्ट हुआ कि - जैसे दीपक घड़े में पड़ा हो; उसका · प्रकाशन वा ज्वलन - सामर्थ्य छिपा रहता है । घड़े से बाहर निकले CC - 0. Ankur Joshi Collection ग्रात्मासे सन्तान [ ७८५ हुए दीपककी शक्ति बहुत बढ़ जाती है; वैसे आवृत आत्माकी परमेश्वरता कमवश देहबन्ध आनेपर उसमें अपनी छिपी रहती है; उससे बाहर असीमित शक्ति विभुत्वशक्ति प्रकट हो जानेसे उसमें . आत्माको हो जाती है । तव वहां शवके निकटस्थित भी यहां ' शव ' शब्दसे कहा गया है, ' शवतिर्गतिकर्मा ( निरुक्त निर्बंचन प्र. ) । तब उस स्वतन्त्र आत्मामें ' स्वाभाविक होनेसे उसी मनोबल आदि उत्पन्न किये; तब इसमें आत्माने यदि रानी भद्रामें ७ पुत्र . जिनमें खण्डनव्यसनवश कोई भी अनुपपत्ति नहीं पड़ती है । उन्हें यह बात समझ मानसिक - शक्तिमें दुर्बलता होती है; नहीं आ सकती है । इसमें हम आजकलके स्वतःप्रमाण समाचारपत्र - संसारमें छपी ऐसी हो रखते हैं, इसे भक्त रामशरणदासजीने हमारे पास ' साप्ताहिक, सन्देश ' मेरठ, ता ० ३ मार्च १६६६ उसका हम पूरा उद्धरण देते हैं-' क्या रूहों ( श्रात्मा ) के मिलापसे सन्तान उत्पन्न हो ' पुरुषके सहयोग के बिना वच्चोंकी पैदायश चकित | घटनाको भी NAN भेजा है । पृ. ३ में देखो । सकती है? ' पर डाक्टर • प्रकृतिकी लीला न्यारी है । अब तक स्त्री - पुरुषके मिलापसे ही सन्तान उत्पन्न होना माना जाता रहा; मगर ऐसे कुछ उदाहरण भी हैं; जब बहुत शरीफ और चरित्रवान लड़कियोंने - शादी से पहले ही पुरुषके मिलापके बिना बच्चे को जन्म दे दिया । , यह सब कैसे हुआ, इसपर डाक्टर चकित हैं । स ० ध ० ५० Gurat An eGangotri Initiative

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७८६ ] ' श्रीमनात धर्मालोक ( ६ ). हाल हीमें एलविन ब्रारलोके यहाँ जो कि वलफास्ट में रहती. हैं, बच्चा पैदा हुआ है, और आश्चर्यकी बात यह है कि - नं तो... ‘ एलविन वारलो ' का विवाह हुआ; और न ही किसी पुरुषसे उसके अनुचित सम्बन्ध थे । कुछ दिनोंसे उसे बदहजमी की शिकायत थी । उसे रातको नींद बहुत कम आती थी । जंब नींद आ जाती; तो स्वप्नमें उसे कोई यह कहता कि - ' मैं पिछले जन्ममें तुम्हारा पति था । मैं तुमसे बहुत प्रेम करता था । यह मुहब्वत ही मेरी मृत्युका कारण बनी । मैं रातको आता हूँ, आज भी आया हूँ । तुम्हारे साथ सो गया हूँ, इसलिए कि तुम मेरी पत्नी हो । मेरा नाम विलियम जोजफ है । जल्दी ही तुम एक बच्चेकी माँ बननेवाली हो । उसका नाम विलियम रखना ' । जब एलबिन वारलोकी आंख खुली; तो स्वप्न उसे साकार दिखाई देने लगा | उसे महसूस होने लगा कि उसके पांव भारी हैं । उसने अपने पिताको बताया कि प्रतिदिन कोई मेरे सपनों में आता है, और कहता है कि - जल्दी ही तुम माँ बननेवाली हो; और यह स्वप्न वास्तविकता का रूप धारण कर रहा है । वारलोका पिता उसे डाक्टरके पास ले गया, जिसने पुष्टि की कि वह छः महीने के गर्भ से है । तीन महीनेके बाद उसको वच्चा उत्पन्न हो गया । अव इङ्गलैंडके प्रसिद्ध डाक्टरोंका बोडे इस वातकी जांच कर रहा है कि क्या शादीके बिना [ अक्षतयोनि-च्छद वाली लड़कीका ] बच्चा पैदा हो सकता है? एक सदस्यका ' भगलिङ्गामृत ' रहस्य [ USU मत यह है कि - रूहें यद्यपि दिखाई नहीं देतीं • शक्ति ज़रूर है कि वह औरतके मिलापसे, परन्तु उनमें इतनी बच्चा पैदा कर हैं ' । सकती इससे २०-२२ वर्ष पूर्व भी हमने ऐसी घटना पढ़ी थी; इस प्रत्यक्ष- घंटनासे अवं व्युषिताश्वके समाचार - पत्र में आत्मा उसका पत्नी में सन्तान होना असम्भव न होकर द्वारा गया | यह हमने ७ म पुष्पमें पूर्व ही लिख डाला था सम्भव हो । इस प्रकार प्रतिपक्षीका आरोप सर्वथा निरस्त हो गया । देइयोगवाली जीवितावस्था में यदि आत्मामें वैसी शक्ति न थी मृतकतामें स्वतन्त्र ऐश्वर्यशाली आत्मासे; पर अब वह घटना घट गई । ' अघटितघटितानि घटयति,, घटितघटितानि विधिरेव तानि घट्यति, यानि पुमान्नैव चिन्तयति गं ' दुर्घटीकुरुते , नोस्तिकता । छोड़नेपर ही यह बातें समझमें वेंगी । ' नवभारत ' ( ४-५-६६ ) में ( ६ मासकी बालिका भी माँ क्ताई गई हैं । पृ. ३ ) यई अपवाद घटनाएं पुराणोंकी बातोंको सिद्ध करती हैं ।: . ( ३६ ) भगलिङ्गामृत रहस्य । हमने वाममार्गके पञ्च मकारोंकी षरिभाषाएँ ‘ सिद्धान्त ' ( १० ३२- ४० ) में एक लेखमें लिखी थी; उन्हें हमसे ‘ दयानन्द - रहस्य ' के प्रणेताने लिया, और उसमें बताया कि- वाममार्गेमें साधारण मद्यपान वा मांसाहार वा लोकप्रसिद्ध - मैथुनका ग्रहण नहीं है, ' किन्तु ' व्योमपङ्कजनिस्यन्दसुधापानरतों नं.. नरः । मधुपायी. स मे प्रोक्तस्त्वितरे मद्यपायिनः ' ( कुलार्णवतन्त्र ) वाममार्गका साधक ब्रह्मरन्ध्र में स्थित सहस्रदल कमलसे टपकने-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 413

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श्रीसनातनधर्मालांक ( 4 ) ] ७८७ मद्य पीता है, साधारण मद्य नहीं । इसी मद्यको पीते - पीते मैं इतनी • वाला जानेवालेका पुनर्जन्म न होना ' पीत्वा पीत्वा सकती 1. बेसुध हो पुनः पीत्वा ' इत्यादि वचनमें कहा गया है, इस पर ' दयानन्द - सिद्धान्त-के कर्ताने खण्डनकी चेष्टा करते हुए भी सफलता प्राप्त पत्र प्रकाश नहीं की, केवल यह लिखा कि - वाममार्गका अर्थं भी ' उल्टा मार्ग ' द्वारा ' लोकमें लिया जाता है । ' मातृयोनिं परित्यज्य विहरेत् सर्वयोनिषु । हो प्रकार • लिङ्गं योन्यां तु संस्थाप्य जपेन्मन्त्रमतन्द्रितः ' इसका भी अर्थ करना चाहिये था । यदि यह आपकी व्याख्या सत्य है, वाली • तन्त्रों में ऐसी ज्ञानमयी बातें भरी पड़ी हैं; तो फिर यह भी गई । बताना पड़ेगा - कि - नीचे लिखे तन्त्र- वाक्य में कौनसा आध्यात्मिक कुरुते ।. और योगसम्बन्धी रहस्य भरा है ---तकता रजस्वला ' पुष्कर तीर्थं चाण्डाली तु स्वयं काशी । चर्मकारी २६ ) में प्रयागः स्याद् रजकी मथुरा मता । अयोध्या पुक्कसी प्रोक्ता ' पवाद ( रुद्रयामलतन्त्र ) यहाँ सभी तीर्थों की कैसी सुन्दर स्थिति इस तन्त्रमें दिखला दी हैं । रोंकी एक दूसरे वादीने कुलार्णवतन्त्र के ' तं तुष्यामि वरारोहे भगलिङ्गामृतं विना ' इस वचनपर भी आक्षेप किया है । इसपर ताया इन वादियोंको ' आलोक ' ( ५ ) पू. ७६६-८०५ का भलीभांति सिद्ध मैंनन करना चाहिये । " वादियोंको याद रखना चाहिये कि यह तन्त्रशास्त्रके पारिभाषिक शब्द है- ' मातृयोनि परित्यज्य ' भी एक पारिभाषिक " शब्द हैं, यह शब्द परोक्षरूपसे कहे गये हैं । जैसे- पिता दुहितु-' भगलिङ्गामृत ' रहस्य [ ७८ ९ ० गर्ममाधात् ' ( ऋ. १ । १६४ । ३३ ) ' स्वसुर्जारः शृणोतु नः ' ( ऋ. ६।५५ ५ ) इत्यादि वेदमन्त्रोंमें यह शब्द बाहरसे असभ्य श वा अश्लील. दीखते हैं । वस्तुत: यह परोक्षरूपमें कहे गये हैं, वैसे तन्त्रग्रन्थोंके उक्त शब्द भी परोक्षरूपसे कहे गये हैं । वहाँ ' मातृयोनि ' एक मण्डलविशेष वा मुद्राविशेष है, उसे छोड़कर शेष अन्य योनि-मण्डलों वा मुद्राओंमें यथेच्छ विहरण करे ' यह पूर्वार्धमें आशय है; उत्तरार्धमें - ' योनि ' शब्द जलहरीका नाम है शिवजीकी सफियाना निर्गुण मूर्तिका वाचक है यह है कि उस आधारवेदीमें शिवकी मूर्तिको फिर मन्त्रको पढ़े । ' रजस्वला पुष्करं तीर्थ ' का ' स्वा. दु.जीने तथा अर्थ समझा है, वहां तो यह अर्थ है कि - तन्त्रमें गमनसे मुक्ति लिखी हो; वहां पर पुष्करतीर्थके , ' लिङ्ग ' शब्द । इसका भाव. प्रतिष्ठित करके 5 वादीने उल्टा: जहां रजस्वला--गमनसे वैखाः " फल समझना चाहिये । जहां लिखा हो कि चाण्डालीगमनसेही मुक्ति मिलती है; वहां समझना चाहिये कि काशीगमनसे मुक्ति मिलती है- इत्यादि । इस विषय में ' आलोक ' ( ५ ) पृ. ७६८-८०० देखो । कोई बड़ेसे बड़ा व्यभिचारी भी हो, वह भी रजस्वला-गमन वा चाण्डालीगमन आदिको श्रेष्ठ नहीं समझताः श्रतः वहां वह पारिभाषिकःशब्द हैं- ' शिवशक्तयोश्च चिन्हस्य मेलनं लिङ्गमुच्यते ' इत्यादि । इस विषय में ( ६ ) ६७७-६७८ पृष्ठ भी देखो । ( ख ) कुलार्णवतन्त्र में ' भगलिङ्गामृतपान से रजवीर्थका पान इष्ट INAN CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 414

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७६० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) नहीं; क्योंकि कोई भी उसे अच्छा नहीं समझता है; तब भला तन्त्रशास्त्र उसे क्या अच्छा समझेगा? सो वहां भी यह पारिभाषिक शब्द है । कुलार्णुवतन्त्र में ' अदीक्षितैरनाचारैरतत्त्वज्ञैर दैवतैः । दूषकैः समरभ्रष्टैनैं कुर्याद् द्रव्यसङ्गतिम् ' ( ८८ ) में आचारभ्रष्टों के साथ सङ्गति करनेका जब निषेध किया है; तब वहाँ रजवीर्येपान जो अनाचारका दूसरा चिन्ह है- कैसे इष्ट हो सकता है? इसलिए वहां कहा है- “ विकृतिं मनसो हित्वा य ' उल्लासं प्रकुर्वते । तदा तु . देवताभावं भजन्ते योगिपुङ्गवा: ' ( ८६६ ) अर्थात् मनके विकारों-को छोड़नेसे ही देवत्व मिलता है; तब रज़वीर्यं जो मनके विकारसे ही प्राप्त होता है, वहाँ कैसे इष्ट हो सकता है? ' वाम ” केवल ' टेढे ' अर्थमें नहीं होता है, ' सुन्दर ' अर्थ में भी होता हैं । जैसे कि अमरकोषमें ' वामौ वल्गु - प्रतीपौ द्वौ ' ( ३ | ३ | १४४ ) यहाँ ' ' वाम'का अर्थ ' बल्गु ' ( सुन्दर ) भी किया गया है । इसलिए:, विश्वकोषमें भी ' वामं सव्ये प्रतीपे च द्रविणे चाऽतिसुन्दरे ' अति-सुन्दर भी ‘ बाम’का अर्थं बताया गया है । मेदिनीकोषमें भी '.. " वामं घने पुंसि हरे कामदेवे पयोधरे । वल्गु प्रती पसव्येषु त्रिषु, नार्या स्त्रियाम् ' यही माना है । इसलिए ' वामोरू: ' इस स्त्रीके. नाम में ' सुन्दर ऊरुओं वाली ' यह अर्थ भी इष्ट है । इस प्रकार शङ्कर - वाचक ‘ वामदेव ' शब्द में भी ' वाम ' शब्द सुन्दर - वाचक.. है । इसीलिए कुलार्णवतंन्त्र में ' भवपाशनिवृत्त्यर्थं ज्ञानपानं समा-चरेत् । यः सेवते सुखार्थाय मद्यादीनि स पातकी ' ( ५८ ) यहाँ मद्य, मांस, मैथुनका, अर्थ [ vet ' ज्ञानपानको ही तन्त्र में मद्यपान माना है । लौकिक यहां निषिद्ध किया गया है । इसी प्रकार वहीं ' मनसा चेन्द्रियग्रासं मद्यपान सम संयोज्यात्मनि घोगवित् । मांसाशी स भवेद् देवि! शेषाः -प्राणिहिंसकाः ' ( ५११० ) मनसे. इन्द्रियोंका दमन ही मांसभक्षण यज्ञ /... माना है; शेष / मांसभक्षणको $ हिंसामूलक होनेसे वहां निषिद्ध देह भाग ठहराया गया है । ‘ परंशक्तूयात्म मिथुनसंयोगानन्द निर्भरः । य आस्ते मैथुनं तत् स्याद् अपरे स्त्रीनिषेवका: ' ( ५।११२ ) यहाँ पर शक्ति और आत्मा के योगके आनन्दको ही मैथुन बताया गया है. शेष प्राकृत मैथुनको वहां इष्ट नहीं किया गया । एतदादिक पद्योंमें " कुलार्णैवतन्त्र आदिमें इस मार्गमें य योगियों, सदाचारियों, मन और इन्द्रियोंके संयम करने वालों को अधिकृत बताया गया है । इसलिए वहां उक्त पद्योंमें मांस, मद्य, मैथुन आदिकी भिन्न परिभाषा सिद्ध होती है । नहीं तो मच्द्य-मैथुन आदिके उत्तम आचार होनेपर उस तन्त्रके वचनकी यहां सिंह असङ्गति उपस्थित होजायगी । जैसे यहां मद्य, मैथुन, आदिकी उक्ततन्त्र में तथा विजयतन्त्र, भैरवयामलतन्त्र, गन्धर्वतन्त्र, मेरु- मस्त तन्त्र, अगससार, योगिनीतन्त्र, पुरश्चर्यार्णव, भावचूडामणि, किय . तन्त्रसार आदि तान्त्रिक ग्रन्थोंमें परिभाषाएं कही गई हैं; ' बसो वैसे ही भगलिङ्गामृत भी इसी रूपमें पारिभाषिक हैं । मैथुन से ही दूर्षिक तो रजवीर्य निकलते हैं । मेरुतन्त्र में लिखा है - ' इडापिङ्गलयोः प्रारणान् सुषुम्णायां प्रवर्तयेत् । सुषुम्णा शक्तिरुद्दिष्टा जीवोऽयं तु परः शिवुः । तयोस्तु सङ्गमो देवि! सुरतं नाम कीर्तितम् । वीर्यपातस्य मर्ग CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 415

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ह ) VEL ] द्यपान समये सुषुम्णासन्नमारुते । उत्पद्यते तु यत् सौख्यं शतकोटिगुणं यमासं तेंदू । एतदेव रतं प्रोक्तम् अन्यत् स्याद् रासभं रतम् ' । यहां यह ' मैथुन ' की परिभाषा दी गई है । भक्षण विजयतन्त्रमें भी लिखा है --- ' कुलकुण्डलिनी शक्तिर्देहिनो निषिद्ध | देहधारिणी । तथा शिवस्य संयोगो मैथुनं परिकीर्तितम् ' । योगिनी-। य सत्र भी कहता है – ' सहस्रारोपरि यद् बिन्दौ कुण्डल्या मेलनं डॉ पर शिवे! मैथुनं शयनं दिव्यं यतीनां परिकीर्तितम् ' | ' भैरवयामल-ताया तन्त्र " भी कहता है - ' या नाड़ी सूक्ष्मरूंपा परमपदगता सेवनीया सुषुम्णा, सा कान्ताऽऽलिङ्गनार्दा न मनुजरमणी सुन्दरी बार-में योषित् । कुर्याच्चन्द्रार्कयोगे युगपवनगते मैथुनं नैव योनौ, योगीन्द्रो जोंको विश्ववन्द्यः सुखमयभवने तां परिष्वज्यं नित्यम् ' । मद्य, " सो इस पारिभाषिक मैथुन से निकले हुए पराशक्तिरूप भग मद्य- और आत्मरूप लिङ्गको मिथुनतासे प्राप्त हुए ध्यानरूप भग-यहां मृतसे, अथवा सुषुम्णा तथा सहस्रदल - कमलके मेलसे प्राप्त दिकी से रूप भगलिङ्गामृत से - जिसके आनन्द आँखें भी अपने आप मेरु- मस्त होकर बन्द होजाती हैं - से ' महादेवजी ने ' अपना तोष व्यक्त -णि, किया है, प्राकृत रज - वीर्य तो मल माने जाते हैं, देखो ' ' मनुस्मृति " इहैं सौ- शुक्रमसृङ्मज्जा - मूत्र - विड् प्राण- कविट् । ' श्लेष्माश्रु ---ही दूर्षिकास्वेदा द्वादशैते नृणां मलाः ' ( १ ९ ३५ ) अतः वै अपवित्र ' ं नयो: होते हैं, तवं ' वे भला अमृत कैसे हो सकते हैं, दोषैकदर्शी प्रति-परः पत्ती ' इतना भी समझने की योग्यता नहीं रखता । " " अण्डे में भी न्तस्य भर्ग - लिंङ्गके रज - वीर्यका मेल होता है, पर वे न तो पवित्र होते श्री यम - यमी पति - पत्नी (? ) । ७६३ हैं, न अमृतस्वरूपः अतएव वे इस कठिन एवं पवित्र योग मार्ग में ग्राह्य नहीं हो सकते । इस मार्गके विषय में ' आलोक ' ( ५ ) पृ. ७६८-८०५ तक का अच्छी तरह मनन करने से प्रतिपक्षीको ज्ञान प्राप्त हो सकता है । अथवा इस विषय में ' शक्ति एण्ड शाक्त ' ( जानवुडरूफ ) पुस्तक ' गणेश एण्ड कम्पनी, त्यागराज भवन, मद्रास ' १७ से मँगाई जा सकती है; उसमें इन शब्दों वा व्यवहारोंके रहस्य बताये गये हैं । ( ४० ) पूर्वपक्ष - यम - यमीसंवाद । इस सूक्तमें भाई - बहन का संवाद नहीं हैं, किन्तु यम - पति, यमी - पत्नीका संवाद है । पति नपुंसक होनेसे सन्तान उत्पन्न नहीं कर सकता है, वह उसे अन्यसे सन्तान उत्पन्न करानेकी प्रेरणा करता है । यम दिनका नाम है; यमी रात्रिका । तैत्तिरीयारण्यक ( १।१० ) में दिन और रात्रिको पति - पत्नी माना गया है, भाई - बहन नहीं । इस प्रमाणको कोई भी पौराणिक काट नहीं सकता है । ऋग्वेद-मन्त्र के ऊपर जो वैवस्वतो यमः, वैवस्वती - यमी लिखा है, वह भी ठीक है । विवस्वान् सूर्यसे यम ( दिन ) की उत्पत्ति होती है । सूर्यकी अपेक्षासे दिन तथा दिनकी अपेक्षा रात्रि ( यमी ) का अस्तित्व होता है, न कि सूर्यसे रात्रिकी उत्पत्ति होती है । सूर्यसे रात्रिका विनाश तो होता है, जन्म नहीं । जब दिन प्रातः ( जन्म ) से लेकर मध्याह्न ( यौवन ) की समाप्तिके बाद तृतीय. चतुर्थाश्रम ( वार्धक्य ) को प्राप्त होता है, यमी ( रात्रि ) उससे मिलने नहीं आती है, वह छिपी रहती है । पर जब यम ( दिन ). ANAN CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 416

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II ] - श्रीसनातनघलोक ( L ) की वृद्धावस्थामें क्षीणता - सन्तानोत्पत्तिकी असमर्थता होती है; तभी यमी ( रात्रि ) बड़े जोशके साथ पूर्ण - यौवनावस्थामें उससे मिलनेकी इच्छासे आती है । इस आलङ्कारिक वर्णनको वेदने, बड़े सुन्दर ढंगसे यम - यमी सूक्तमें दिया है । यमी यमसे मिलनेकी इच्छा रखती है, असमर्थ पति यम उसे इन्कार करता है । यमी उसे उलाहना देती है तू नामदेसा लगता है, तू अन्य औरतोंसे फँसा है, जिससे मुझ -: - पत्नीसे मन हटाता है । यम कहता है कि तू किसी अन्यसे सम्बन्ध पैदा करा ले । असमर्थ पति वा चतुर्था-' श्रमी अपनी को अपनी बहिन कहता है कि तू अब मुझे -भाईके समान समझ, मैं तेरे साथ शरीरसम्वन्ध नहीं करना चाहता हूँ । वेदके इस सूक्तपर ऋषि - दयोमन्दका अर्थ उचित है, पौराणिकोंकी भाई - बहनके संवादकी कल्पना अशुद्ध तथा वेदकों कलङ्कित करनेवाली है । जब भ्राता स्वयं प्रथम पति ही नहीं है, तव ' अन्यमिच्छस्व मद्य ' म 7 : सुभगे पतिं मत् ' अन्यको दूसरा ' पति कहना ' बन ही नहीं सी सकता ।; जो व्यक्ति अपनेको पैति मानता है, वह सकता है, मुझसे अन्य पतिकी इच्छा कर । जब पहला भ्राता है, पति नहीं; तब वह दूसरा पति कैसे कह सकता है? 1 जैसे कि एक वैद्य रोगीसे कहू देता है कि तू मेरे सिवाय दूसरा- " वैद्य ढूंढ लें, पर एक वकील रोगीको नहीं कह सकता किं -.: . दूसरा वैद्य ढूँढ ले । नरकी स्त्री. नारी, ठाकुरकी ठकुरानी, ? J CC - 0. Ankur. Joshi Collection यम - यमी दिन - रात्रि नहीं । U खिडकी पण्डितानीकी भांति यमकी पत्नी भी यमी होसकती यम है, यमकी बहिन यमी नहीं हो सकती 1 । यम - यमी भाई -बहनका इतिहास वेदमें नहीं आ सकता है । मन्त्रोंके अर्थ जयदेवादिके भाष्यके अनुसार समझ लेने चाहियें ( एक पत्रमें ) बता उत्तरपक्ष- ( क ) हमने बाद इन सभी आक्षेपोंका, उत्तर ' आलोक ' ' ( ८ ). पू. ५६५-६२२ में दे दिया है; वादी वहीं देखे । • यम दिन है; और यमी रात्र - इसका वादीके पास कोई भी अच प्रमाण “ नहीं । दिन - रात कभी इकट्ठे नहीं रहा करते, और न तव 7इकट्ठे कभी रह सकते हैं । अत: उनकी आपस में संवादकी श्राइ कल्पना ही निर्मूल है । रात कभी दिनको सम्भोग के लिए कई ॥ कैसे • सकती? ही नहीं; और न कभी दिन अपनी नपुंसकता बंता ' सकता है । जब दोनोंका एक स्थानपर कभी निवास ही सम्भव पति-नहीं; दोनों परस्परविरुद्ध गुण - कर्मस्वभाववाले हैं, तब परस्पर नहीं सह॑शे गुणकर्मस्वभाववालोंका विवाह करानेवाले स्वाद जी के विरुद्ध कट " उनका पति - पत्नीभाव ही कैसे हो सकता है? - स्वाद. जीने भी: अहो वहां - दिन - रात अर्थकी कल्पना नहीं की । जब दिन रहेगा; - एव : युवति रात उसके पास या सकती ही नहीं; और जब युवति राव. रात्रि रहेगी; तब दिन उसके पास कभी फटक सेकता ही नहीं । दिन क्रम रातको मारकर आता है, और रात, दिनंको मारकर आती है विवस्व 1 तब उनका पति - पत्नीभाव कैसे सम्भव है? और रात्रिकी दिनसे. तब व सन्तान उत्पन्न करने की बात कहां हो सकती है? अतः यह बादी वादीका पक्ष निर्मूल - निष्प्रमाणं एवं निरुपपत्तिक है । यह लोग वह भी Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 417

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BEX ७६६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) कती यम - यमी सूक्तके मन्त्रोंका अर्थ भी तोड़ - मरोड़कर करते हैं जिसकी सङ्गति कभी लग भी नहीं सकती ।, नका दिके जब वादी तैत्तिरीयारण्यकके वचन से दिन - रात्रिको पति - पत्नी बताता है; तब वह बतावे कि रात्रिने अपने पति दिनको तलाक देकर अन्य कौनसा पति चुन लिया? दिन क्या पहले उस = से रात्रिसे विवाहित था, और उससे मैथुन किया करता था; और ध्रुव नपु ंसक होगया? इस विवाह में क्या प्रमाण? जब नहीं; तब जब ' पति सन्तानोत्पत्ति में असमर्थ हो; तब अपनी स्त्रीको दक श्राज्ञा दे '. इस स्वा.द.जीके वाक्यका दिन - रात्रिमें संघटन वादी कैसे करेगा? बंता. - ( ख ) वादी जोकि तै. आ. ११० के वचनसे दिन - रातको पति - पत्नी बताता है, पर वहाँ यम यमी शब्द तो कहीं प्राया ही स्पेर नहीं; तव ' यमं यमी दिन - रात्रि हैं ' यह वादीसे अभिमत अर्थ कट गया । वहाँ तो लिखा है- ' तयो: [ द्यावापृथिव्योः ] एतौ वत्सौ ' भी: अहोरात्रे । पृथिव्या अहः, दिवो रात्रिः । ता अविसृष्टौ दम्पती हेगा एव भवत: ' ( १ | १० | ५ ) यहाँ दिनको पृथिवीका लड़का और राव... रात्रिको चुका लड़का कहा है; पर सं. के उक्त ' सूक्तकी अनु-दिन ) क्रमणिका में ' वैवस्वतो यमः, वैवस्वती यमी ' यम - यमी दोनों ही - विवस्वान् के लड़का - लड़की बताये गये हैं । द्यावा- पृथिवी के नहीं, नसे तववादीका यम यमीको दिन - रात्रि बताना कट गया । जब यह । वादी स्वयं मानता है कि- विवस्वान् सूर्यका नाम है; और वह लोग यहभी मानता है, कि सूर्यसे रात्रिकी उत्पत्ति नहीं होती; और यम - यमी दिन - रात्रि नहीं । [ ७६७ वह यह भी मानता है कि - सूर्य तो रात्रिका विनाश कर देता है; तव विवस्वान् - सूर्य से उत्पन्न यमी भी रात्रि सिद्ध न हुई; यमीको रात्रि बताने वाले वादीका पक्ष कट गया । • तैत्तिरोयके वचन में तो दिन - रातको द्यावा- पृथिवीका लड़का - चताया है; विवस्वान्का नहीं । पर यम - यमी सूक्तमें यम यमी दोनोंको वैवस्वत - विवस्वान‌के लड़का - लड़की कहने से दोनों भाई-बहन सिद्ध होगये । तै. के वचनमें तो दिन - रात्रि भिन्न - भिन्न पितानोंसे उत्पन्न होनेसे पति - पत्नी कहे गये हैं । अतः वादी के • दिये हुए ही है.. के वचनसे उसीका पक्ष कट गया । फिर वहीं दिन - रात्रिका लड़का अग्नि - आदित्यको बताया है- ' तयोरेती वत्सौ - अग्निश्च आदित्यश्च 1. रात्रेवेत्सः श्वेत- आदित्यः । पह्नो-• इग्निः ताम्रो अरुणः ' ( १/१६/५ ) सो ' दम्पती भवतः ' का अर्थ आरण्यकने पहले लिख दिया है- ' अहरहर्गर्मं दधाते ' ( १११०१४ ) अर्थात् दोनों - गर्भ धारण करते हैं; ' सेय रात्री- गर्भिणी पुत्रेण : [ सूर्येण ] संवसति ' ( १ | १० | ७ ); पर दयानन्दी वादीका यम ( दिन ) तो नपुंसक है, और यमी ( रात्रि ) सन्तानहीन है, इससे उष्ट्र-लगुड न्यायसे वादीका पक्ष वादीके दिये हुए वचनसे ही कट गया । ( ग ) यमी ( सत्रि ) तो- वादी के अनुसार यम ( दिन ) की जवानी में छिपी रहती है, तब यह लड़का क्या उसने व्यभिचार से ANA अन्यसे पैदा करवा लिया? जब दिन नपुंसक है; तब उसने # भी लड़का: कैसे पैदा कर लिया? जब दिन नपुंसक है; तो ..मैं तेरे साथ शरीर - सम्पर्क नहीं करना चाहता हूँ यह कहना ही CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 418

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७६८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) ‘ यावज्जीवमहं मौनी ' ' की तरह व्याघातका उदाहरण है । अत: स्पष्ट है कि - वेदमें यम - यमी दिन - रात्रि रूप पति - पत्नी नहीं; ' किन्तु भाई - बहन हैं । भाई गर्भ करनेके सामथ्य में भी · भगिनीत्व-वश ' न वा उ ते तंनूं ' तन्वा सं पिपृच्याम् ' यह कहकर शरीर -संगका निषेध करता है; उसमें कारण भी बताता है - ' पापमाहुयेः स्वसारं निगच्छात् ' - ( अ. १८/१/१४ ) अर्थात् भगिनी - गमेन.. करने वालेको पापी कहा जाता है । नपुंसक पति तो व्याघात-प्रसक्तिवश कभी ऐसा कह भी नहीं सकता । ' वादीद्वारा यमका तृतीयाश्रमी वा ` चतुर्थाश्रमी अर्थ करना स्वाद से विरुद्ध है; क्योंकि स्वामीने तो यमको गृहस्थी बताया है, वनी वा संन्यासी नहीं । अतः स्पष्ट है कि - यम- यमीका दिन - रात्रि अथं नहीं । · जो कि वादी › कहता है कि - यमी ( रात्रि ) यम ( दिन ) के युवा रहने तक ' उससे मिलने नहीं आती है, छिपी रहती है, उसकी वृद्धावस्थामें वह स्वयं युवति उससे जोश से मिलने आती है । तब क्या चादी क्री यमी युवा अपने पति यमको नहीं चाहती? बूढा होनेपर ही उसे चाहती है? क्या उसका दिनसे विवाह • बाल्यावस्थामें हुआ था? 1. यह है वादीकी रिसर्चे! उसकी रिसर्च द्वारा वेदने सिद्ध किया कि -पत्नी, पतिके यौवनमें तो उसके पास न जावे, वह पहले से ही अन्यसे आनन्द करती रहे; पर जब वह पति बूढा हो जावे; तब उसके पास बड़े जोश - खरोशसे जावे; जिससे वह पति उसे अन्य व्यक्तिसे सम्भोगकी आज्ञा दे । रात्रि, दिनकी युवावस्था में क्या नामदं भी और औरतोंसे फंसता है? भी उससे न मिले और अपनी युवावस्था में दिनसे भी न मिल क्या यही दयानन्दी पति - पत्नीमाच है? क्या यही बयान वैदिकधर्मकी शिक्षा है? ( घ ) जो कि वादी के अनुसार यमी कहती है किन्तु नामद॑सा लगता है, तु अन्य औरतोंसे फँसा है, युम्, पत्नीसे ते हटाता है '; तब जो अपनी औरतसे तो न मिलैः परं मन दूसरी स्त्रियोंसे फँसा हो; वह क्या दयानन्दी वैदिकधर्म के ' नामर्द ' हैं, व्यभिचारी नहीं! ' अव मुझे भाई के समान अनुसार । सम यह वादीने वेदके किस मन्त्रका अर्थ किया है? दिन तो अन्य औरतोंसे फँसा रहे; और रात्रि, अन्यं पतियोंसे फँसी रहे, यही क्या दयानन्दी. वैदिक धर्म है? भ्रातृ - भगिनी संवादको हटाकर “ बलात् पति - पत्नी संवाद ’ बनाते हुए वादियोंने इन अनुपपक्षियों पर ध्यान न देकर वेदपर कलङ्क लगाया है; यह कृत्रिमताका ' फल है । वेदमें तो एक घरमें रहने वाले भाई - बहिनों में कोई अवाञ्छनीय काण्ड न हो जावे; इस रोककेलिए निषेधाज्ञा जारी कर दी है; इससे वेदपर कुछ भी कलङ्क नहीं आता | वेदने इससे स्त्री की अधीरता भी व्यक्त की है । जब दिन - रात इकट्ठे कभी रह सकते नहीं, वृद्ध दिनके • सामने कभी यौवन वाली रात्रि आ सकती ही नहीं; दोनों • एक - दूसरे से विरुद्ध गुण - कर्मों वाले हैं, स्वाद के विरुद्ध न उनमें ' कभी पति - पत्नीभाव बन सकता है, और न उनका संवाद बन सकता है । जब यमी कहती है- ' गर्भे नु नौ जनिता दम्पती क CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat An eGangotri Initiative

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] श्री सनातनधर्मालोक ( 8 ) ८०० न सिंह देवः ' ( अथर्व. १८ | ११५ ) कि- ब्रह्माने हमें एक गर्भमें इकट्ठा व्यानन्दी रखकर पति - पत्नी कर दिया था, इसलिए इकट्ठे पैदा हुओं को श्राज भी ' यमज ' कहते हैं, तब एक गर्भसे इकट्ठ े पैदा हुए भाई-केतू हमें वहन ही कहाते हैं, पति - पत्नी नहीं, दिन - रात्रि इकट्ठे तथा से मन स्थानमें नहीं पैदा होते । तब वादीका यम यमीका निमूल दूसरी दिन - रात्रि अर्थ करना खण्डित हो गया । अनुसार ( ङ ) ' यमी यमं चकमे, तां प्रत्याचचते ' ( ११ | ३४ | १ ) में यह समम आख्यान निरुक्तकारने स्पष्ट माना है; वहां दिन - रात्रि अर्थ तो अन्य कहीं नहीं किया गया । नैरुक्त- अर्थ में भी यमीका ' माध्यमिक ' वाणी ' अर्थ. किया गया है, रात्रि अर्थ कहीं नहीं । ' जासय: हटाकर - कृणवन्नजामि ' ( ऋ. १०/१०/१० ) में ' जामि ' का अर्थ ' भगिनी ' है, पत्तियों और ' अजामि'का अर्थे, भगिनीत्वसे विरुद्ध कर्म ( मैथुन ) विवचित वसताका. है । स्वा. द. जीने भी यहां दिन - रात यह अर्थ नहीं माना । उनने में कोई अशक्त प्रति तथा शक्तः पत्नी का संवाद माना था; पर उक्त वैदिक-1. प्रकरण के प्रतिकूल होनेसे यह उनकी भूल है । वहां यम यमी वेदने ऐतिहासिक व्यक्ति न भी माने जावें; पर उससे सामान्य-भ्रातृभगिनी संवाद तो स्पष्ट है । इतिहास - पक्षमें भी कोई हानि दिनके नहीं- ' त्रय्यामेव विद्याया सर्वाणि भूतानि अपश्यत् ( शत. दोनों १०/४/२/२१ ) ( प्रजापतिने वेदमें सब विशेष प्राणियोंको देखा न उनमें था । परमात्मा त्रिकालदर्शी होनेसे जैसे कि - खा. द. जी भाभू के बन वेदविषयविचार पू- ८६-८७ में लिख चुके हैं । ऐतिहासिक विशेष-तीक व्यक्तियोंका - जो‘वैदिककालमें सदा हुआ करते हैं । वेद अपनी CC - 0. Ankur Joshi Collection यम - यमी पति - पत्नी नहीं | ८०१ इच्छानुसार निर्देश कर सकता है । यमन्यमीको दिन - रात मानें तो वे दोनों वैवस्वत ( विवस्वान्के भी बहिन हैं, स्त्री - पुरुष नहीं लड़के ) होनेसे भाई-अर्थ स्पष्ट । ' पापमाहुर्यैः स्वसारं निगच्छात्'का है कि जो भगिनीगमन करे, उसे पापी ' यः'का ' जो ऐसा करे ' यह वादीका कहते हैं । यह अर्थ ' यः ' का नहीं हो अर्थ ठीक नहीं । ऐसा करे-अर्थ सकता । ' भ्राता ' का ' तेरा भाई -सा ' यह वादीने कैसे किया, जबकि यहां ' भ्रातेव ' नहीं है ' भ्राता है । अतः स्पष्ट है कि - यम - यमी भाई - बहन हैं, पति - पत्नी ' वादीकी अपनी स्त्री जो वेदमन्त्रोंसे नहीं । उसकी धर्मपत्नी बन चुकी है, वह ' शब्द - बुद्धि - कर्मणां विरम्य व्यापाराऽभावः' इस न्यायसे विरुद्ध वादीकी बहन किन वेदमन्त्रोंसे हो सकती है? अतः ' वादीका ' भ्राता ' का मैं ' ' तेरा भाई ही सही ' यह अर्थ गलत जबकि वादी के अनुसार स्त्री पतिको भाई नहीं हैं, कर रही है, और पति भी उसे ' प्रिये ' ही कह रहा है । क्या वादी अपनी वहिनको ' हे प्रिये! ' इस शब्द से सम्बोधित करता है? इससे उल्टा ही वेदको कलङ्कित कर रहा है । वादी ( च ) वादीसे प्रष्टव्य है कि जब तुम नपुंसक हो जाओगे, तव तुम्हारी स्त्री विधवा रहेगी, या सधवा? यदि विधवा, तव क्या तुम उस अपनी स्त्रीका अन्यसे ' विधवाविवाह ' कर सकते हो? उस पत्नीका दान क्या तुम स्वयं करोगे, वा उसका पिता करेगा? इसमें प्रमाण क्या? यदि उसका अन्यसे नियोग कराओगे, तब वह उसका भाई होगा, वा पति १ बिना विवाह-स ० घ ० ५१ Gurat. An eGangotri Initiative

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८०२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) वह अन्य उसका पति कैसे हो सकेगा? यदि वह पति न संस्कारके उसे अन्य पति कैसे कहा जा सकता है? यदि वह होगा; तब; तब क्या वह तुम्हें अपने घरसे दूसरा व्यक्ति उसका पति होगा भ्राता होगये हो; निकाल नहीं देगा कि - ' अब तुम इस स्त्रीके चले जाओ; दूसरे घर में रहो? अब मैं इसका पति ही अब यहांसे हूँ । यदि ऐसा नहीं, और वह पति भी नहीं; इस घर में रह सकता कर सकेगा? फिर तो वह तब वह उस स्त्रीको वीर्यदान भी कैसे व्यभिचार हो जायगा । बिना विवाह - संस्कार किये, वह पर-स्त्री में वीर्यदान कैसे करने लग जायगा? उससे उत्पन्न लड़का भानजा बन जायगा; क्योंकि वह तुम्हारे कहे बेद-तुम्हारा तुम्हारी बहिन होगई । उस लड़के के तुम मामा बन वचनानुसार जाओगे; तब तुम्हारा वंश उससे न बढ़ सकेगा । स्वा.द.के कथनसे विरुद्ध तुम्हारा वंशच्छेदन हो जायगा । वस्तुत: यह सब अनुपपत्तियाँ वादीके मनघड़न्त निर्मूल अर्थसे ही उपस्थित हो जाती हैं । एक घरमें रहनेवाले भाई - बहनोंका कहीं आपस में संयोग न हो जावे; इसलिए वेदने एक संवादके द्वारा उसपर रोक लगाई । ( छ ) वादीने मन्त्रोंके अर्थ गलत पेश किये हैं, प्रकरणको उसने छिपा दिया है । पहले के भाई - बहिनों यम - यमीको तो उसने पति - पत्नी बना दिया; पर अपने माने हुए पहले पति-पत्नी को उसने भाई - बहन बना दिया! पति - पत्नी कभी भाई - बहन नहीं बन सकते । यह ठीक है कि सगे भाई - बहिन भी पति - पत्नी यम - यमी पति - पत्नी नहीं । नहीं बन सकते; पर यमी गर्भमें दोनोंके इकट्ठे तथा यमको पति - पत्नी समझने की भूलसे रहने से अपनेको पतिवाला व्यवहार मांग रही उसे उसके लिए निषिद्ध करके कर रहा था । इसलिए उसने निगच्छात्, न ते भ्राता सुभगे! भाईसे अधीरताव थी, पर यम समझदार दूसरेसे उसका विवाह होने से उसे कहा था- ' पापमाहुः अनुशिष्ट वष्टयेतत् ' ( ऋ. १०/१०/१२ स्वसारं १८ | १ | १४-१३ ) | जब यम यमी वादी के अनुसार, अ. त वह यमी कैसे कहती है कि- ' पत्युः जायेव पति - पत्नी थे; ' ' जैसे स्त्री पतिये व्यवहार करती है ' । यदि वे सचमुच पति - पत्नी थे; तब उसे इस उपमा देनेकी आवश्यकता क्यों पड़ी? इसका अर्थं वादीने छिपा दिया है; नहीं किया है । यदि वे पति - पत्नी हैं; तो बैच होनेसे वादीके अनुसार ' विद्वान् राजाओंके सिपाही ' और हमारे अनुसार ‘ देवताओंके सर्वत्र तथा सदा विद्यमान गुप्तचर ' ( अ. १८/१६ ) उन्हें कैसे रोक सकते थे? भाई - बहन होनेपर तो संयोगकी इच्छा होनेपर उन्हें वे देवताओंके जासूस पाप होनेसे रोक सकते हैं । इधर वादी यमीको नपुंसक पतिकी स्त्री होनेसे उसे पतिकी बहिन, और पतिको अपनी पत्नीका भ्राता कहता है, इधरसे वह तथाकथित बहिनको ' भ्राताको कटाक्ष करनेवाली ' और भ्राता द्वारा वहिनको ' प्रिये! ' ( अ. १८१६ ) कहलवा रहा है, क्या दयानन्दी भाई - बहिन भी घर में इसी प्रकार एक - दूसरे से कटाक्ष ( हावभाव ) किया करते हैं? वस्तुतः वादी स्वा. दु.जी.के गलत पक्षको सिद्ध करनेकेलिए अपनी आत्मा का हनन करके CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative