सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 51–60
सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 51–60
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[ ७ ७२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) उस उद्धरण दिये संक्षेपसे समाधान दिया जा रहा है । सेल ( ४८ ) ' मन्त्रविद् विजयैषिणी ' ( ४/१६ १२ ) यहाँ विजयकी इच्छुका ताराका ' मन्त्र ' विचार अर्थवाला है । ' सानुगाय इन्द्राय कोई नमः ' आदि वेदभिन्न भी मन्त्र कहे जाते हैं । अथवा ' वेदमन्त्र ’ है - अर्थ भी हो; तो ' देवांशत्वात् स्वस्त्ययनमन्त्रवेत्त्री ' ( रामाभिराम ) बागे आदि जान लेना चाहिये कि - देवावतार होनेसे वे उन मन्त्रोंको दियो विना पढ़े स्वतः ही जानती थीं । जबकि सन्त ज्ञानेश्वरने भसेके धार सिर पर हाथ रखा, तो वह भैंसा भी वेदमन्त्र बोलने लग गया क्षत्रिय था, तो देवांश वानरोंका तो कहना ही क्या? नशास ( ४६ ) जब वन्दरोंका भी भवन वना हुआ हो; तब वे उसी में श्री रहते हैं, फिर वृक्षोंकी शाखापर क्यों रहें? ऐसा वर्णन वाली-चिपय सुग्रीव, हनुमान् अङ्गद आदि विशेष थोड़ेसे राजारूप वानरोंका आया है; सभी रामायणस्थ वानरोंका नहीं । ' इमां गिरिगुहां थी! रम्यां ' ( कि. २६ | ७ ) ' तस्य तु शैलस्य महती शोभते गुहा ' इन ( कि. ७३३ ९ ) ( कि. ३३ ४ ) इस प्रकार अन्य भी बहुतसे पद्योंमें नमा पहाड़ी गुफाका वर्णन आया है; वहां निवास होनेसे वानरोंका बन्दा नगर उसे कह दिया जाता है । वह जंगलमें था, जहाँ बहुत - से या वृक्ष थे ' ( कि. ३३।५ ) इससे उनकी वानरता स्पष्ट है 1 । ' वने त्रस्तौ ' व्यवहा ( कि. ५१२३ ) यहाँ वनमें एक किलेरूप खोह में रहना लिखा है । ३२।१ ( ५० ) ' शुक्लैः प्रासादशिखरैः ' ( ४ । ३३ । १५ ) के ' शुक्ल'का अर्थ खाय ' चूने- कलईसे पोते जाना ' वादीकी अपनी कल्पना है, ' सुधा ' उनक शब्द साथ नहीं है । सुफेदी स्वाभाविक भी हो सकती है । CC - 0. Ankur Joshi हनुमानादि वानर नर थे? [ ७३ Collection Gujarat. ( ५१ ) बाली सुग्रीव आदिके राज्याभिषेक आदि इन्द्र - सूर्य देवोंके अंशसे उत्पत्तिवश राजा होनेके कारण दिखलाये गये हैं । ( ५२ ) ' विधिवत् अन्त्येष्टि ' पर रामाभिरामने लिखा है- ' देवांश-त्वेन स्वयं ज्ञातवेदत्वात् तिर्यग्देहोचित - विधिवद् ' ( ४/२/५० ) श्रारूढपतित पशुदेहकेलिए जो विधि होती है, तदनुसार यह अन्त्येष्टि है । अपसव्यता वस्त्र ( अंगोछे ) के दाहिने कन्धे पर रखनेसे भी होती है- यह गोभिलगृह्यसूत्र आदिमें स्पष्ट है । द्विजोंसे भिन्नों का यह हो सकता है, इस विषयमें ' आलोक ' * ( ३ ) में देखना चाहिये । ( ५३ ) अज्ञ वानरियोंका रुदन अपने बच्चे आदिके मर जानेपर अव भी होता है । अभिज्ञ वानरियों ( देवतावतारों ) के लिए तो क्या कहना? ( ५४ ) ' उदकं कर्तुं ' ' ( कि. २५/५१ ) का ' जलसे मृतकका तर्पण ' अर्थ है, स्नान नहीं । सो अभिज्ञ देवावतार जो मनुष्यलोकमें आये हुए हैं, उनकेलिए कोई आश्चर्य नहीं । स्नान तो साधारण वन्दर भी तालाबों में अथवा वर्षा होनेपर गढ़ों में छलांगें लगाकर अब भी करते रहते हैं । ( ५५ ) ' पर्वतेन्द्र ं समाश्रिताः ' ( ४/२/१२ ) ' वानरेण मया सह ' ( ४ | ५ | १० ) ' वने त्रस्तो ' ( ४ / ५ / २-३ ) इत्यादि लिङ्गोंसे उनकी वानरयोनिता स्पष्ट हैं । ( ५६ ) ' सन्ध्योपासनतत्परम् ' ( ७ । ३४ । १२ ) ' जपन् वै नैगमान् मन्त्रान् ' ( १८ ) ' सन्ध्याकालमवन्दत ' ( २७ ) * ' आलोक ' तृतीय पुष्प समाप्त हो चुका है, समय पाकर उसकी द्वितीयावृत्ति होगी । An eGangotri Initiative
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७४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) यहाँ सन्ध्याकालको उसका नमस्कार बताया गया है, जैसे कि-दूकानदार अव भी सायंके दीये जलनेपर उस समय हाथ जोड़ देते हैं, यह सन्ध्याकालको नमस्कार होता है । नैगम ( वैदिक ) मन्त्रोंका मनुष्यलोकमें आये देवावतार वानरों के लिए कोई आश्चर्य नहीं । वे तो उन्हें जन्मसे ही प्रतिभात होते हैं । तभी प्राचीन टीकाकार रामाभिरामने लिखा है- ' बाल्यादयो हि स्वयं प्रतिभातसकलवेदाः ' ( १८ ) स्वयं प्रतिभातता देवावतार होने के कारण है । ( ५६ ) ' क्षत्रियोऽहं कुलोद्भवः ' ( ४ । १८ २२ ) ' मैं कुलसे भी और गुण कर्म - स्वभावसे भी क्षत्रिय हूँ ' ( पृ. ८६ ) यहां ' गुणकर्मानुसार ' शब्दका वादी द्वारा अर्थ में प्रक्षेप ' आर्यसमाजी-पन ' है । ( ५७ ) ' वानरोंकेलिए धर्मशास्त्र - प्रमाणके विषय में रामाभिराम ( तिलक ) टीकाकार पहलेसे समाधान कर चुके हैं, इससे वादी की अनेक आपत्तियोंका समाधान होगा । वे लिखते हैं- ' न च मनुष्याधिकारस्य निषेधादिशास्त्रस्य कथं तिर्यक्षु ( पशु - पक्षिषु ) प्रवृत्तिरिति वाच्यम्, तिर्यग्योनेरपि मनुष्यवत् राजादिव्यवहार-दर्शनेन मनुष्यतुल्यज्ञानवत्त्वाद् अस्त्येवाऽयं [ अनुजपत्नीगमनरूपः ] दोषः । किञ्च धर्मेऽनधिकारिणामपि इन्द्रादीनां वृत्रवधादौ ब्रह्महत्यादिदोषस्मरणेन, निषेधेषु तदतिक्रम - प्रायश्चित्तादौ च देवानामधिकारवद् एषामपि अधिकारे वाधकाऽभावः ।...... तद्वद् ईदृशानां ज्ञानवतां तिरश्वाम् ( पशुपक्षिणाम् ) अधिकारे बाधकाऽभावः ।... श्रुत एव गृधराजस्य भगवता दाहादि कृतम् । CC - 0. Ankur Joshi Collection हनुमानादि वानर नर थे? [ ७५ ७ अग्रे च सम्पातिना तद्भ्रात्रा करिष्यमाणमुदकदानादि नाऽसङ्गतम् इति दिक् ' । ह निष्कर्ष यह है कि जो देवादिसे आये हुए रू. | र पतित इसका पशु - पक्षी भी मनुष्य के सदृश ज्ञान रखते हैं, उनका भी वि मनुष्याधिकार वाले शास्त्रका यदि कहीं आचरण दीखे, तो स उसमें कोई बाधक नहीं । इससे बाली आदिकी प्रत्यक्ष दीख न रही वानरयोनिताको छिपाया नहीं जा सकता । तभी श्रीरामने छ वालीको कहा था कि - ‘ यस्मात् शाखामृगो ह्यसि ' ( ४ | १८ | ४१ ) तुम बन्दर हो, तुम्हें मैंने दण्ड दिया है, तुमसे युद्ध नहीं किया । ( ५८ ) ' क्या वानरोंकी माताएँ बन्दरी थीं ' ( प्र. ६४ ) इस विषयमें पूर्व विचार कर चुके हैं । हनुमानकी माता अञ्जन । केसरी वानरकी स्त्री ( ४/६६/८ ) स्वयं वानरी परन्तु कामरूपिणी ( i ) वानरेन्द्र की लड़की ( १० ) थी । वह मनुष्यरूप वना लिया । भी ' न करती थी । कई अप्सराएँ वानराकृति वाली थीं, कई ऋक्षाकृति गत की. कई किन्नरियाँ ( अश्वमुख वाली ) थीं । अप्सरा देवस्त्रियों का होती हैं - ' ताभ्यो गन्धर्वपत्नीभ्योऽप्सराभ्योऽकरं नमः ' ( अ. २।२।५ ) यहाँ वेदमें भी अप्सराओं को देवविशेष गन्धर्वोकी पत्नी कहका कि उनको नमस्कार की गई है । जो अन्य आकृति वाली भी तुम अप्सराएँ थीं, तथापि यहाँ ब्रह्माजीका आर्डर था - ' हरिरूपेर कर * ' प्रारूढ - पतित ' वे होते हैं; - जो गत जन्म में तो उच्चयोनि से मा हों; पर इस जन्म में अपनी वा देवाधिपतिकी इच्छासे अथवा कर्मवश इस निम्न पशु आदि योनियों में आये हों । Gujarat. An eGangotri Initiative
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७ % ७६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) नादि ( वाल्मी १/१७/६ ) वानर - आकृति वाले देवांश पैदा करो । वैसा ही किया गया । वनवासी कोई प्राकृति- ग्राहक जाति नहीं है । तभी रूह- रामायण के वानर नर न होकर वानर ही सिद्ध हुए । हाँ, कभी विशेष वानर थे । यह यदि वादी जान लें; तब उनके समस्त , तो सन्देह दूर हो जावें । उन्हें इस तरह की पुस्तकें बनानेका कष्ट न करना पड़े । देवताओंकी विशेष शक्तिको न जान सकना रामने अथवा जानते हुए भी अपने साम्प्रदायिक- पक्षपातवश उससे ) अनजान बने रहना भी ऐसी पुस्तकें बनानेका कारण है । तुम 1 ' श्रृक्ष - वानर - गोपुच्छाः क्षिप्रमेवाभिजज्ञिरे ' ( १ | १७/१६ ) इस इस विषय में पूर्व लिखा ही जा चुका है । व्यञ्जना ( ५६ ) श्रीहनुमान्को क्षेत्रज पुत्र बताते हुए वादीने ' न त्वां रूपिणी हिंसामि ' इस श्लोकका वास्तविक पाठ नहीं दिया, और अर्थ लिया भी ठीक नहीं दिया । वास्तविक पाठ और अर्थ यह है कि-ताकृति ' न त्वां हिंसामि सुश्रोणि! मा भूत् ते मनसो भयम् । मनसास्मि वस्त्रियाँ गतो यत् त्वां परिष्वज्य यशस्विनि! ' ( ४ | ६६ १८ ) यहां ' हिंसाभि ' २/२/५ ) का अर्थ वादीने किया है- ' मैं तुमको मारता नहीं हूँ ' । यहां कोई उसे क्या जानसे मार रहा था कि निषेध किया गया है कह का ली भी कि — मैं तुम्हें मारता नहीं हूँ '! यहांपर तात्पर्य यह है कि – मैं रिरूपेल तुम्हारे धर्मका नाश नहीं करता हूँ । मैं तुमसे मानसिक गमन कर रहा हूँ । सो योनिभोगसे पतिव्रतधर्मका भङ्ग होता है, नि मानसिक गमन से धमभङ्ग नहीं होता -- यह यहां तात्पर्य हैं । क इसलिए तिलकटीका में लिखा है - ' योनिसम्बन्धेन तावकमेक-CC - 0. Ankur Joshi हनुमानादि वानर नर थे? [ ७१ 1 Collection Gujarat. पत्नीव्रतं न नाशयामि । अनेन चलात् परपुरुषेण आलिङ्ग-नादावपि न पातिव्रत्यभङ्गः, किन्तु योनिभोगेनैव इति सूचितय ' । १६ वें श्लोकके ' गतात्मा का अर्थ रामाभिराममें लिखा है-' तद्गर्भ - प्रविष्टात्मतेजा वभूव! देवत्वाद् विनापि योनिसम्बन्धं निजतेजः - प्रवेशनम् - इति बोध्यम् ' अर्थात् देवता लोग योनि-सम्बन्धके बिना भी मनोबलके योग द्वारा पुत्रोत्पत्ति कर सकते थे । इस विषयको विशेषरूपमें जाननेके लिए ' आलोक ' ( = ) में ' नियोग और मैथुन ' ( १ ) देखना चाहिये । वहां महाभारतके प्रमाणसे देवताओं द्वारा विना योनि - सम्बन्धके भी पुत्रोत्पत्ति प्रमाणित की गई है । ' मारुतोस्मि ' पाठ माननेपर ' वायु देवता ' अर्थ है । सो देवधर्मसे मानुषधर्मे दूषित नहीं होता, यह यहां सिद्ध हो रहा है । तब ' वायुके वीर्यज- वीर्यसे उत्पन्न ' यह लिखना गलत है । वायु या मरुत् कोई मनुष्य नहीं है, किन्तु देवता है । बादी लोग नामकरण - संस्कारमें द्वादशी तिथिके देवता तथा स्वाति-नक्षत्रके देवता ' वायु'को आहुति देते हैं । क्या यह मनुष्य है? यह तो वही है, जिसे ' हवा ' कहते हैं । इसीको वाल्मी. में ' हनूमज्जनकश्चैव पुच्छानलयुतोनिल: ' ( वायुः ) ( ५५३।२६ ) ' अनिल ' शब्दसे कहा है । यदि यह कोई मनुष्य व्यक्ति होता, तो इसके पर्यायवाचक न दिये जाते । ' अमरसिंह ' व्यक्तिको ' देवताकेसरी ' नहीं कहा जाता । अभिके साथ वायु हवा ही होती है । उसी वायुके अधिष्ठाता चेतन देवताको यहांपर An eGangotri Initiative
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७८ ] श्री सनातनधर्मालाक ( ६ ) हनुमान्का पिता कहा गया है । इसी प्रकार ' अथोर्ध्वं दूरमाप्लुत्य पितुः पन्थानमासाद्य जगाम विमलेऽम्बरे ' ( सु ० १।१२७ ) यहां हनुमान के पिताका मार्ग वायुमार्ग आकाश ही हैं, मनुष्य-विशेषका अर्थ यहाँ संघटित नहीं होता । इसी प्रकार पुच्छ-दहन के समय में कि- मेरे पिता वायु श्रनिके मित्र हैं - इसलिए मुझे अग्नि नहीं जलाता - ' पितुश्च मम सख्येन न मां दहति पावकः ' ( सुं ० ५३।३३ ) यहां पर भी वायुकी मनुष्यता संघटित नहीं होती । सो हनुमानके पिता के मनुष्य न होनेसे वादीका यह कथन निर्मूल है | जो कि प्रतिपक्षी ' मारुतस्यात्मजः श्रीमान् हनुमान् नाम वानरः ' ( १ | १७ | १६ ) यहांपर ' मारुतस्य आत्मजः ' के ' आत्मज ' शब्दसे ' वीर्योत्पन्न ' अर्थ करता है. यह असंगत है । वीर्योत्पन्न, मैथुनोत्पन्न न होनेपर भी लड़केको ' आत्मज ' कहा जा सकता है । ( क ) वाल्मी.रा.में सीता ' अयोनिजा ' थी, जनकके वीर्यसे उत्पन्न नहीं हुई थी । क्षेत्रकी पृथिवी में हलके उल्लेखनसे हुई थी, देखो वाल्मीकिरामायण | फिर भी उस अयोनिज सीताको जनकजीने ' आत्मजा ' कहा है । देखिये- ' वीर्यशुल्केति मे कन्या स्थापि-तेयम् अयोनिजा । भूतलादुत्थितां तां तु वर्धमानां ममात्मजाम् ' ( १।६६।१५ ) ( ख ) महाभारतमें धृष्टद्युम्न और द्रौपदीको यज्ञकुण्डमें उत्पन्न होनेसे ' अयोनिज ' ( ३।२७३५ ) कहा गया है । फिर भी उन दोनोंको ' धृष्टद्युम्नमुखा वीरा भ्रातरो द्रपदात्मजाः ' ( १ | १६४ | ४ ) CC - 0. Ankur Joshi Collection हनुमानादि वानर नर थे? [ ` ततस्तु कुन्ती द्रुपदात्मजां तां ( कृष्णाम् ) ' ( ११२१०।१५ ) यहां दुपदर आत्मज - आत्मजा कहा है । ( ग ) कर्ण सूतसे पालित था, सुख वीर्यसे उत्पन्न नहीं हुआ था; यह आबालवृद्ध प्रसिद्ध हैं । तथा महाभारतमें उसे ‘ सूतजः ’ ( कर्ण. ६।५१ ) ' सूतसुतः ' ( कर्ण. ८ ३ ' सूतात्मज: ' ( कर्ण. ८६।३७ ) कहा गया है । राधासे पालि प होनेपर भी, राधासे उत्पन्न न होनेपर भी उसे ' राधेय ' ( ११६२३ कहा गया है । ( घ ) ‘ सुतां कण्वस्य मामेवं विद्धि ' ( महा. आरि ७२ | १८ ) यहाँ शकुन्तला अपने आपको करवकी सुता का म रही है, पर वह कण्ववीर्योत्पन्न नहीं थी । ( ङ ) विवाह - संस्कारी स्वा.द.जीकी संस्कारविधि ( पू. १५४ ) में ' मरुतो ब्रह्म सोम इमां नारं प्रजया वर्धयन्तु ' ( अ. १४/१/५४ ) विवाहित हो रही नारी व्र म मातरिश्वा एवं मरुतों द्वारा सन्तानका उत्पन्न होना कहा गया । है; तब क्या उस विवाह्यमान नारीका लड़का मरुतों वा मातरिश्व अ ( वायु ) के वीर्यसे उत्पन्न होता है? यदि नहीं; तब यहाँ भी म तभ वा वायुका लड़का हनूमान् उसके वीर्यसे कैसे उत्पन्न मार मै जावेगा? यदि यहाँ अञ्जनासे वायुदेवताका वास्तविक संयोग ( मैथुन भी होता; तब वह अञ्जना - जोकि पहले धमका रही थी कि अ ‘ एकपत्नीव्रतमिदं को नाशयितुमिच्छति ' ( मेरे एक पति होने गय व्रतको कौन नष्ट करना चाहता है? ) फिर यदि उसी मरुतूक ' अ अञ्जनामें मैथुन माना जावे; तो धमका रही हुई वह ' एवमुख राम ततस्तुष्टा जननी ते महाकपे! ' ( २० ) कि- मैं तुम्हारा एकपतिकत Gujarat. An eGangotri Initiative
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८० J श्री सनातनधर्मालोक ( 1 ) धर्म मैथुनसे नष्ट नहीं कर रहा हूँ; मैं तुममें मानसिक गमन T, सूर कर रहा हूँ - यह कहनेसे अञ्जना तुष्ट कैसे हो गई? सो स्पष्ट तथा है कि - वहाँ वायु - देवताका मानस - संयोग हुआ । एक दवाई दहा १६ मुखके द्वारा अन्दर डाली जाती है. और एक इन्जेक्शन द्वारा । पालिए पहलेमें ' पान ' माना जाता है, दूसरेमें नहीं । अतः योनिमैथुन तो वास्तविक मैथुन होता है, पर मानस मैथुन जिसका उद्देश्य काम - विलास न हो; किन्तु सन्तानोत्पादन हो; वास्तविक . - आ. मैथुन वा पापकारक नहीं होता । ता तभी तो ' एकपत्नीव्रतमिदं को नाशयितुमिच्छति ' के उत्तर में संस्कारो ही तो वायुदेवने कहा था- ' न त्वां हिंसामि ( तव एकपतिकत्व-मांना व्रतधर्मं न विनाशयामि ) मनसाऽस्मि गतो यत् त्वां ' ( त्वया सह नारी मानससंयोगं करोमि ) तब मानसिक योगसे उसके एकपत्नीव्रत-हा को आघात न पहुँचनेपर ही तो वह तुष्ट हो गई । इससे तरिश्व अत्यन्त ही स्पष्ट है कि - वायुदेवताका वहाँ मैथुन नहीं हुआ था । नीम तभी तो तत्क्षण हनुमान्की वहीं उत्पत्ति हो गई ( ६६।२० ) । नमान मैथुन होनेपर प्रकृतिनियमानुसार प्रसव में १० मास लग जाते । वादी लोग वैधव्य में नियोग मानते हैं, यहाँ अञ्जना विधवा ( मधुर भी नहीं थी । केसरी वानर उसका पति विद्यमान था ही । थी कि अथवा वादियोंके अनुसार पति नपुंसक भी नहीं दिखलाया होने गया कि वह वादियोंके स्वामीजीसे अभिमत आज्ञा देता कि— मरुत्क ' अन्यमिच्छस्व सुभगे! पतिं मत् ' उसने पत्नीको कहीं ऐसी एवमुख रामायणानुसार आज्ञा दी भी नहीं । सो यहाँ वादिसम्मत पतिकत CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. हनुमानादि वानर नर थे? [ ८१ नियोग भी नहीं है । यदि नियोग होता; तो हनुमानको ' मारुतस्यैौरसः ' ( १ । १ । १६ ) ' औरस ' शब्दसे न कहा जाता । सो वह मारुत - देवकी दिव्य शक्तिसे उत्पन्न हुआ था यह स्पष्ट हैं, नियोगज नहीं था । ( ६० ) ' नरकी पूँछ तो वना ली, पर नारीकी पूँछ बनानेका साहस न हुआ । सारी रामायण में हमको एक स्थान पर भी वानरियोंकी पूँछका उल्लेख नहीं दिखाई दिया ' ( पृ. १०१-१०२ ) इस वादीके आक्षेपके विषयमें हम पूर्व लिख आये हैं । कूदने-फांदने आदिमें पूँछका भी उल्लेख करना पड़ता है; पर वानरियोंका कूदना - फाँदना कहीं नहीं दिखलाया गया; अतः पूँछका उल्लेख भी नहीं मिलता; पर रामायणमें उनकी पूँछका निषेध भी तो नहीं मिलता । नारीकी यदि पूँछ लिख देते, तो श्री वाल्मीकिकी क्या हानि पड़ती - यह प्रतिपक्षीने नहीं बताया । यदि पुरुषोंकी दाढ़ी - मूळ होती है, और लड़की तथा स्त्रियोंकी दाढ़ी - मूंछ नहीं होती; तब इसमें क्या कोई दोष हो जाता है? वैसे ही यदि उस समय उन देवावतार वानरोंकी पूँछ रही हो; और वानरियोंकी नहीं; तो इसमें आश्चर्यको कोई अवकाश नहीं । हिरनोंके सींग होते हैं, हिरनियोंके नहीं, मेषके सींग होते हैं, मेषी के नहीं । कई हाथियोंके बाहरी दाँत होते हैं, कई हथनियोंके नहीं । अतः उन अप्राकृत दिव्य विचित्र वानरोंके पूँछ होती हो; और वानरियोंके नहीं; तो इसमें न तो कुछ आश्चर्यकी बात है, न दोषकी । न साहसका कोई अवकाश है । स ० ध ० ६ An eGangotri Initiative
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८२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) शेष हैं ' देवोंकी पुच्छ, वानरोंकी आकृति कैसी थी ' इत्यादि विषय में पूर्व लिखा जा चुका है । ' हनुमानको ही ठोडी वाला नाम देना व्यर्थ है ' यह वादीका तर्क ही व्यर्थ है । मतुप् प्रत्यय यहां अतिशय अर्थमें है । उसका इतिहास ही प्रश्नका उत्तर दे देता है, उसकी हनुपर इन्द्रने वज्र मारा था; इससे हनु टेढी होकर बड़ी हो गई, उससे उक्त नाम है । ' क्षिप्तमिन्द्र ेण तं वज्रं --- वामो हनुरभज्यत । ततोभिनामधेयं ते हनुमानिति कीर्ति-तम् ' ( ४।६६।२३-२४ ) हर एकका हर एक नाम रखा जा सकता है । पर जब एकका रूढ हो; तब फिर दूसरेका नाम नहीं रखा जाता । ( ६१ ) पाण्डुकी स्त्रीके नियोगके विषयमें ' आलोक ' अष्टम पुष्पमें देखना चाहिये । स्वा. द. जीने तो नियोगमें भी दस - ग्यारह पति माने हैं, इसपर वादी स्वयं विचार करे । ( ६२ ) वादी कहता है कि - ' मैं तो मानता नहीं कि - सूर्य, इन्द्र, वायु, बृहस्पति, अश्विनीकुमार आदि नाम वाले जो रामायण - कालमें थे; वे ही महाभारतकालमें थे ', महाशय! आपके न माननेसे क्या होता है? वे तो स्वा.दु.के कालमें भी थे, अब भी हैं । वे अमर हैं । उन देवताओंको कोई हटा नहीं सकता । स्वामीसे कराये हुए विवाहमें वे भी नारीको सन्तान देते हैं । देखिये सं.वि.पृ. १५४ ' इन्द्राऽग्नी, द्यावापृथिवी, मातरिश्वा, मित्रावरुणा, भगो श्रश्विना उभा । बृहस्पतिर्मरुतो ब्रह्म सोम इमां नारीं प्रजया वर्धयन्तु ' ( अथर्व. १४ | १ | ५४ ) इसमें वादीसे आक्षिप्त इन्द्र, द्यावा ( स्वा.द.के CC - 0. Ankur Joshi Collection हनुमानादि वानर नर थे? दा अनुसार ) –सूर्य, मातरिश्वा - वायु, उभौ अश्विनौ - दोनों श्रभि कुमार विवाह्यमान नारीमें सन्तान उत्पन्न करने आते । बादीका यह तर्क कितना निकम्मा है कि - ' सूर्यके पुत्र क ब्रह पूँछ तो नहीं, पर सुग्रीवकी थी; वायु - पुत्र भीमकी तो क नहीं थी; पर हनुमानकी थी ' आदि । जबकि रावणको वार का मुखवाले नन्दिकेश्वरका शाप मिला कि - वन्दर तुम्हारी कु विध्वंस करने वाले होंगे ( ७/१६/१७ ) और ब्रह्माजीने: वा इसीलिए देवताओंको आर्डर दिया था कि - ' सृजध्वं हरिहरे ( १ । १७ । ६ ) ' ते तथोक्ता भगवता प्रतिश्रुत्य च शासनम् । जनया सुरेवं ते पुत्रान् वानररूपिणः ' ( १११७१८ ) तब वानरयोरि उत्पत्तिके कारण उनकी पूँछ भी होनी थी; पर भीमादिके सा वानररूपकी आवश्यकता नहीं थी; अतः वहाँ वानररूप य " पूँछका भी कोई काम नहीं था । कई पूँछधारिणी लड़कियों उत्पत्ति हुई है ( पढ़िये समाचारपत्र ), पर न तो उनके माता - पिता ३ की पूँछ थी; न उनके भाई - बहिनों की । तब उनके माता - पिता । वैसा प्रश्न करता हुआ वादी खण्डित है । ' देवोंको बन्दरोंकी ही योनि क्यों पसन्द आई ' ' वन्द वा a जाति सारी की सारी दूसरोंके घर बर्बाद करती है, । त रामायणमें उसने सँवारनेका कार्य किया ' वादियोंके ऐसे स तर्क निस्सार हैं । उन्होंने ही तो शत्रुनगरी लङ्काके घरोंको वर्ष ग किया । यह आजकलके साधारण वानर नहीं थे, कि देवावतार वानर थे । अतः वे ज्ञानशाली थे, उन पर यह प्र भ Gujarat. An eGangotri Initiative
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६४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) हनुमानादि वानर नर थे? [ ८५ श्र ही व्यर्थ है । वानर - योनि उनको पसन्द हो वा न हो, उन्होंने ब्रह्माके आदेश से नन्दिकेश्वरके शापवश वानररूप धारण करना ही था । आजका सिखलाया हुआ वानर भी संवारनेका तो काम करता ही है । को वार ' मनुष्योंके वीर्य द्वारा वन्दरियोंको गर्भ असम्भव है ' यह री कुल वादीका तर्क निस्सार है । ऐसी बातें मोघवीर्य पुरुषोंकेलिए हैं, जीने: अमोघ वीर्य वालोंकेलिए नहीं । अमोघवीर्योंके लिए तो स्त्री की हरि भी बहुत आवश्यकता नहीं । मछलीको भी उपरिचर - वसुके जनयारशुक्रसे गर्म हो गया था । अनेकधा ' कृताः पुत्रा ऋषिभिश्च नरयोरि पुरातनैः ' यह बृहस्पतिका वचन इन बातोंका संकेत दे रहा है । दिसा यहाँ मनुष्य कोई था ही नहीं । वे तो देवता थे । देवता लोग तो रूप ' सन्ति देवनिकायाश्च संकल्पाज्जनयन्ति ये ' ( महाभा. आश्रम. ड़कियों ३०।२२ ) संकल्प द्वारा अपनी मनचाही सन्तान पैदा कर सकते ता - पिता हैं । -पिता । ' वन संन्यासीका एक नाम है, वनोंमें रहनेवाले वन्य, वानप्रस्थाश्रमीको वनी, वनवासी ( मनु. ६।२७ ) कहते हैं, यह ' वन्द ठीक है; पर इन्हें ' वानर ' कहीं नहीं कहा जाता । श्रीहर्षचरित तथा दशकुमारचरित - आदिमें आटविक - सामन्तों, आरण्यक ऐसेस आदिका वर्णन आया है, पर उन्हें कहीं भी बन्दर नहीं कहा को गया । उनका अनन्तवर्मासे युद्ध भी हुआ था । कई जङ्गली भील थे, कि आदि श्रींहर्षकी बहन राज्यश्रीको ढूँढने भी गये थे । पर कहीं यह भी न तो उन्हें वानर कहा गया; न वानरके पर्याय वाचक CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. शब्दसे, न उन्हें नवदंष्ट्रायुध वा कपि आदि कहीं कहा गया है । तब जो कई दयानन्दी रामायणकी अपनी की हुई टीकामें ' वानर'का ' वनवासी ' अर्थ करते रहते हैं यह गलत सिद्ध हो गया । किरातार्जुनीयमें ' वनसंनिवासिनां पत्यों ' ( ११२६ ) ' वनेचरः ' ( ११ ) आदि, तथा कादम्बरी में ' वनचरोपि कृतमहालय प्रवेशः ' ( हारी तवर्णनमें ) इन स्थलोंमें ' वनचर ' आदि तो कहा है, पर ' उन्हें ' वानर ' वा उनके पर्यायवाचकोंसे कभी नहीं कहा, इसी प्रकार उन वानरोंको ' वनवासी मनुष्य ' माननेवाले योरोपियन स्कालरोंके आधारपर लिखनेवाले श्रीनानूराम व्यास आदिका भी पक्ष निराधार है । ( ६२ ) कई सुधारक सनातनधर्मित्रव, यहाँ अन्य कल्पना करते हैं । वे कहते हैं — ' हनुमान वानर कपिगोत्रके ब्राह्मण थे: और जाम्बवान् ऋक्षगोत्रके । पर वाल्मीकिने उनका काव्यमय वर्णन ' किया है । वे इसमें ' कपिज्ञात्योढक् ' ( पा. ५२१११२७ ) तथा ‘ कपि बोधादाङ्गिरसे ’ ( ४ | १ | १०७ ) कपिष्ठलो गोत्रे ' ( ३६१ ) आदि पाणिनिके सूत्र, तथा ' शौनक - कापेय ' ( छान्दो ० ४१३५ ) ' कैशोर्य-काप्य ' ( बृह. २ | ६ | ३ | ५ | १-३ ) ' पतञ्जलकाव्य ' ( बृ. ३/३/१, ३ ( १ ) इत्यादि प्रमाण उपस्थित करते हैं । यह सब निर्मूल कल्पनाएँ हैं । इसमें ' कपि ' शब्द तो लिखा है, पर वानरादि उसके पर्यायवाचक कहीं भी नहीं, अतः स्पष्ट है कि यहाँ का ' कपि ' शब्द नाम - विशेष है । जैसे- शाकटायन शकट का लड़का था; पर इससे ' शकट ' An eGangotri Initiative
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८६ ] श्रीमनातनधर्मालोक ( 8 ) गाड़ी नहीं ली जाती । चारणक्य चरणकका लड़का - चने का लड़का नहीं माना जाता । पूर्वोक्त छान्दोग्य के ही वचनमें ' शौनक ' आया हैं, जो ' शुनक ' का लड़का है, इससे ' शुनक ' कुत्तेका नाम नहीं हो जाता । यह सब तो नाम- विशेष हैं, इसी प्रकार ‘ कपि ' भी गोत्र रूढ़ नाम है; वानर - वाचक नहीं । हाँ, ' कपिज्ञात्योर्ढक्’में तो वन्दर ही अर्थ हैं, इसका उदा-हरण ‘ कापेय: ’ है | यहाँ ' कपेर्भावः कर्म वा ' यह अर्थ है । इसीका उदाहरण रामायणमें भी है, ' कच्चिन्न खलु कापेयी सेव्यते चल-चित्तता ' ( ६।१२६।२३ ) यहां बन्दर वाला भाव वा कर्म अर्थ है । यहां गोत्रका कुछ भी सम्बन्ध नहीं । दूसरे सूत्रमें आङ्गिरस -गोत्रमें ‘ काप्यः ' उदाहरण है, पर हनुमानादिकेलिये ' काप्यः ' न आनेसे, तथा कपिके अन्य पर्यायवाचक आनेसे वे स्पष्ट वानरादि सिद्ध हुए । कपिगोत्र वालोंकी पूंछ तथा पूंछको स्वाभाविक ऊपर उठाना कहीं नहीं होता, वा वर्णित होता । क्षगोत्रवालों के शरीरपर रीछों वाले बड़े - बड़े रोम नहीं होते । सो यह सब अर्वाचीन लोगोंकी निर्मूल कल्पनाएँ हैं । जो यह कहा जाता है कि- ' यदि वे वानर पशु थे; तो सुग्रीवकी स्त्री रखनेसे बालीको क्यों मारा गया ' । क्या धर्म-शास्त्रका कानून पशुओंपर भी चलता है? ' इसपर हम पहले निर्देश कर चुके हैं कि यह साधारण वानर तो नहीं थे, देव-ताओंसे वानरयोनिमें मनुष्यलोकमें आये हुए थे । जब उनमें मानुषी ज्ञान था; तथा मानुषी व्यवहार भी थे; तब वे भी कुछ CC - 0. Ankur Joshi Collection हनुमानादि वानर नर थे? दद 7 मानुषी वन्धनमें आ ही जाते हैं । यह तो देवता थे; जब देव - देव विष्णु भी मानुषी अवन परन्त प्रश्न में आते हैं, वे भी कुछ बन्धन में आते हैं । जब शेषावतार कैसे वलरामजीने रोमहर्षण सूतको कुशासे मार दिया; तत्र अवतार होनेपर भी मानुषी व्यवहारमें आ जानेके कारण का करनेकेलिए तीर्थयात्रारूप प्रायश्चित्त करना [ पशु हत्याके दूर । व्यवह पड़ा । वाल्मी.रा.के ४ । १८ १८ पद्मकी रामाभिराम - टीका में यात् स्पष्ट किया गया है- रखते ' ननु सुग्रीवस्यापि ज्येष्ठभ्रातुः पितृसमस्य भार्यावमा धर्मश तुल्यम् - इत्यत आह- ' अस्य त्वं धरमाणस्य ( जीवतः ) ' इ बन्धन धरम्पुणस्य - प्राणान् धारयत एव जीवतः त्वया निश्चीयम कारि जीवनस्यैव पत्न्यां तव स्नुषाभूतायां रुमायां यतो वर्तसे; तदति त्वं स्पष्टं पापकर्मकृत् । सुग्रीवस्तु तव जीवन - निश्चयाऽमार सूर्या त्वत्पत्न्यां तारायां प्राग् अवर्तिष्ट; अतः परं [ तव मरणे ] वलेकिन च । किं च— त्रैवर्णिकेष्वपि [ युगान्तरेषु, अत्र युगे वा शूद्रवर्षति देवरस्य मृतभ्रातृस्त्रियाम् पुत्रायां वृत्तिदर्शनात् तिर्यग्योना तस्यां वृत्तिर्न दोषः । तथा वृत्तौ च मरणज्ञानमेव प्रयोजकं! इति भगवदाशयः । अनेन त्रैवर्णिकेतर - ( शूद्रादिवर्ण ) स्त्रीणां वि भर्तृकाणां तरुणीनां स्वजातीयपुरुषाङ्गीकारो नाधर्म इति सूदिवाना दृश्यते च तथा व्यवहारः शूद्रादिजातिषु [ सो यहाँ ज्ञानवती धिकार पक्षी जातिमें त्रैवर्णिकोंसे भिन्नों वाला व्यवहार बताया गयतएव किं - जीवितभर्ता वाली स्त्रीको त्रैवर्णिकसे इतर लोग भी नहीं पार्थवा Gujarat. An eGangotri Initiative
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८८ ] श्रीमनातनधर्मालोक ( ६ ) परन्तु मृतभर्तृकाको त्रैवर्णिकों से इतर देवरादि ले लेते हैं । फिर -- अव प्रश्न होता है कि- पशुमें मानुष- नियमित धर्मशास्त्रकी प्रवृत्ति कैसे? इसपर टीकाकार स्पष्ट करते हैं- ] व ' न च मनुष्याधिकारस्य निषेधादिशास्त्रस्य कथं तियं [ पशुपक्षिषु ] प्रवृत्तिरिति वाच्यम्, तिर्यग्योनेरपि मनुष्यवद राजादि-ना । व्यवहारदर्शनेन मनुष्यतुल्यज्ञानवत्त्वाद् अस्त्येव अयं दोष इत्याश-यात् [ पशु भी यदि श्रारूढपतित हैं; और मनुष्यों वाला ज्ञान रखते हैं, तथा मनुष्यों - जैसा व्यवहार करते हैं; तो वे भी मानुषी म. धर्मशास्त्र के कुछ वन्धनकी सीमामें आ जाते हैं । अज्ञानी उतना ) ' इ बन्धनमें नहीं आता; जितना कि ज्ञानी । ] किंच — धर्मेऽनधि-श्रीयम कारिणामपि इन्द्रादीनां वृत्रवधादौ ब्रह्महत्यादि - स्मरणेन निषेधेषु से; तदतिक्रमप्रायश्चित्तादौ च देवानाम् अधिकारवद् एषाम [ इन्द्र-नाऽभाव सूर्याद्यवतारभूतानां वानराणाम् ] अपि अधिकारे बाधकाऽभावः । ] वर्त्मक [ इन्द्रादि ] देवानां स्वयजनीयेन्द्रान्तराऽभावाद् अनधिकार द्रवइति पूर्वमीमांसायां निर्णीतम्! । एवं च तदनपेक्षदानादिधर्मेषु चर्यम्यह्मविद्यायां च अधिकारोऽस्त्येव - इति उत्तरमीमांसायां स्पष्टम् । जकं सिद्व ईदृशानां ज्ञानवतां तिरश्चामपि अधिकारे बाधकाऽभावः । त्रीणां किश्च - ' सर्वदेवतावाचकपदानाम् ईश्वरवाचकत्वेन सर्वत्र दिवानामधिकारो ऽस्त्येव । न च ब्राह्मणत्वाद्यभावात् तेषामन-नवती धिकारः, तेषामपि क्षत्रियत्वाद् वैवस्वतमन्वादेरिव [ अधिकारः ], तएव चन्द्रवरुणादीनां यज्ञः स्मर्यते पुराणेषु; तत्र - तत्र कर्मणि 7 नहींर्थवादतः फलकल्पनंवत् पुराणस्थार्थवादैः तदधिकारस्यापि CC - 0. Ankur Joshi हनुमानादि वानर नर थे? [ = ε कल्पयितुं युक्तत्वात् । किन त्रैवर्णिकस्य अधिकार इति त्रैवणिकपदं वेदतदर्थज्ञानवत्परम् । अतः [ तादृग्विधानां ] देवादीनां तदधिकारः सिद्ध इति भगवतो व्यास बाल्मीकिप्रभृतीनां च आशयः । जैमिनेस्तु एतदंशे [ देवानधिका रोल्लेखे ] श्रज्ञानमेव । अतएव तद्दृरीकरणार्थं मार्कण्डेयेन यात्मानं प्रति धर्मान पृच्छतो जैमिने: विन्ध्यारण्यवासितत्त्वज्ञपक्षिमुखेन धर्मवोधनं कृतम् । तेन हि पक्षिणां ज्ञानानधिकार इति स्त्रोक्त अर्थे तस्य अप्रामाण्यग्रहो भविष्यतीति तदाशयः । अतएव गृध्रराजस्य भगवता दाहादि कृतम् । अग्रे च सम्पातिना तद्भ्रात्रा करिष्य-माणमुदकदानादि नाऽसङ्गतामिति ' । यह विषय पहले संकेतित किया जा चुका है । ' मया कपित्वं च प्रदर्शितम् ' ( ४ | २४ | १२ ) इसमें सुग्रीव द्वारा अपना स्पष्ट वानरत्व बताया गया है । कपिगोत्रकी यहाँ कुछ भी संगति नहीं लगती । ' क्या कपिगोत्र वाले भाईको मरवा दिया करते हैं । वस्तुतः आताओं द्वारा वानरोंका कपिगोत्र वा मनुष्य बताना निराधार है -यह सिद्ध हो गया । ( ख ) इस प्रकार यही सुधारक लोग जरा व्याध - जिसने श्रीकृष्णको पैरों में वाण मारा था - का अर्थ करते हैं कि - ' जरा ' नाम वृद्धावस्थाका है । सो वृद्धावस्थाने ही श्रीकृष्णको मारा, किसी पुरुषने नहीं । नहीं तो उस पुरुषका नाम स्त्रीलिङ्गान्त क्यों होता '? उन्हें यह जानना चाहिये कि पुरुषका भी स्त्री-लिङ्गान्त नाम हो सकता है - ' लुम्मनुष्ये ' ( पा. ५३६८ ) इस सूत्र के Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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६० ] श्री सनातनधर्मालांक ( ह ) उदाहरण ' चव्चेव मनुष्यः चञ्चा ' ' वर्धिकेव मनुष्यो वर्धिका ' स्त्रीलिङ्गान्त दिये गये हैं, जो पुरुषके हैं । इस प्रकार ' जरा -व्याघ ' का भी यदि स्त्रीलिङ्गान्त नाम है, तो ' जरेव जरा ' इस विग्रहवश कोई दोष नहीं । अतः इसमें आलङ्कारिकताका प्रयास व्यर्थ है । आजकल भी लड़कियोंके भी पुरुषों वाले नाम और लड़कोंके भी लड़कियों वाले नाम ( दुर्गा आदि ) देखे जाते हैं । ( ६३ ) कई सुधारक लोग आजकलके नवशिक्षितोंकी हनुमानादिकी वानरता में आस्था न देखकर कई प्रकारकी कृत्रिम कल्पनायें करके वानरोंको मनुष्य सिद्ध करना चाहते हैं । उनमें श्रीसातवलेकरजी देवताओं तथा भूत - प्रेतादिको भूटानके मनुष्य सिद्ध करनेकी चेष्टामें लगे रहते हैं । वे वानरोंको मनुष्य सिद्ध करनेकेलिए उपहासयोग्य कल्पनायें करते हुए कहते हैं-' प्राचीनकालमें कई जातियाँ अपने चेहरेपर किसी न किसी पशु - पक्षीके कृत्रिम मुख लगा लेते थे । जो पुच्छ दीखता है, वह ' पाश ' जो एक अस्त्र रस्सी जसा इनके पास रहता था, उसका अन्तिम भाग है । शेष पाशका भाग कमरेके चारों ओर लपेटा होता था ' ( बालकाण्डनिरीक्षण पृ. ४८१ ) ' वानरोंका पुच्छ यही पाश ही हैं । यह वानरोंके शरीरका भाग नहीं हैं । यदि वह इसके शरीरका भाग होता, तो मारुतिकी दुमको जब आग लगा दी गई; तो इससे उसको दुःख हो जाता, पर वैसा कष्ट नहीं हुआ । इससे स्पष्ट है कि मारुतिकी दुम उसके शरीरका भाग CC - 0. Ankur Joshi Collection हनुमानादि वानर नर थे? ६३ न था ' ( पृ. ४८२ ) वादियोंकी इन उक्तियोंका मूल्य हास्य- फि अधिक नहीं । यह बात रामायणसे सिद्ध नहीं होती, कि - जैसे दशहरे रो लोग हनुमान आदिका बन्दरोंवाला चेहरा लगाये हुए हो स्वा वैसे हनुमान आदि भी वानरोंके चेहरे लगाये होते थे । व विद्य वादीकी बनावट है । रामायण में तो वानरोंके दाँत न दिखलाक लोग दाढ़े ं दिखलाई गई हैं । पूँछ भी स्वाभाविक दिखलाई गई है सुम उस पूँछका ऊपर करना ‘ उच्छ्रितलांगूला: ' ( ५२५७१४२ ) श्रां जैस शब्दों में रामायण में स्पष्ट है । परन्तु पाश तो स्वाभाविकता नही स्वयं नहीं उठ सकता । वे राक्षस मूर्ख थोड़े ही थे कि- " बन्द. बात को अपनी पूँछ प्यारी होती है " यह सोचकर ( जैसा रामायणमें लिखा है ) उसके पाशको जलाते; और वह हनुमा सौमि उस पाशसे लङ्काको जला देता । महाव यदि वह पुच्छके स्थान पर पाश था; तब तो वह वाह ( लंगूर वस्तु थी; तव तो हनुमानको पीड़ा भी नहीं पहुँच सकती दीप्तते इतना क्या रावणको मालूम नहीं था? वस्तुतः हनुमान यहाँ देवावतार होनेसे उसकी पूँछ अग्नि लगे होनेपर भी उसे हैं । नहीं लग रहा था । इधर रामायण में यह भी लिखा है वि एव सीताकी अग्निसे प्रार्थना करने पर अग्नि हनुमान्को नहीं बनवास रही थी । ' यद्यस्ति पतिशुश्रूषा शीतो भव हनूमतः ' ( सुं. ५३ ९ मूह २७ ) । यदि पाशको अग्नि लगाई गई होती, तव हनुमान पाखानर अपनी कमर से उतार कर फेंक देते । Gujarat. An eGangotri Initiative