सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 421–430
सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 421–430
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I श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) | 50 % ८०४ अपने नियाद कर रहा है । यदि यमी पत्नी होती; तो पतिको को ag रतावश क्यों न समझ पाती? जब जानती है कि - मेरा पति यम नपुंसक होनेसे है, तब ' तुझको दूसरी नारी आलिङ्गन करती है, जिससे तू मुझ अनुशिष्ट मीसे इस प्रकार अपना मन हटाता है ' ( अ. १८/१/१५ ) ' पति-स्वसारं पत्नीभावके योग्य स्थानमें एक साथ शयन करने केलिए मुझ यमीको १२ यमकी कामना हुई है ' ( अ. १८१८ ) यह कैसे कह सकती है? , अ. जब वह नपुंसक पति अपनी स्त्रीकी कामपूर्ति नहीं कर सकता, तब वह दूसरी स्त्रीकी कामपूर्ति कैसे कर सकता है; आश्चर्य है ब उसे कि यह मोटी बात भी वादीकी समझ में नहीं आती? अपनी वादीने स्त्री तो उस नपुंसककी बहन बन जावे; और परकीय स्त्री जो तो वैष उस नपुंसककी बहन जैसी होगी, वह उसकी पत्नी हो जावे, हमारे क्या यही दयानन्दी वैदिक - धर्म है? प्तचर ' ( झ ) आ ' घा ता गच्छान ' का वादीका किया यह अर्थ तो कितना गलत है कि- ' वे भविष्य के ( युगानि ) पति - पत्नियोंके जोड़े श्रने सम्भव है, जिसमें ( जामयः ) सन्तान उत्पन्न करनेमें समर्थ स्त्रियां, ( अजामि ) दोषरहित सन्तान उत्पन्न करेंगी ' । यह कितना असम्बद्ध तथा वेदके शब्दोंसे विरुद्ध अर्थ है? ' जामि अजामि ' वाली ' एक दूसरेके प्रतिद्वन्द्वी शब्द हैं; तब उनके अर्थ में ' अपने मनकी हा है, आह्ला गाना ' यह छल - कपट है । ' अजामि ' का ' दोष रहित सन्तान रेसे उत्पन्न करना ' यह अर्थ वादीने कैसे कर लिया? ' उत्तरा युगानि श्रागच्छान् ' यह यहाँ भविष्यत् काल है कि- ' आगे के पापमय युग आवेंगे; जहाँ बहनें न बहनों वाले कर्म भाईसे करेंगी ' पर CC - 0. Ankur Joshi Collection यमयमी सूक्त [ ८०५ वादीने उक्त सम्वद्ध अर्थ किस प्रमाणसे कर दिया? क्या वे जोड़े अव नहीं है, जो निर्दोष सन्तान उत्पन्न करें? क्या प्रति-पक्षीका अपना जोड़ा सदोष सन्तान पैदा कर रहा है? ' मत् ' का अर्थ ' पुत्र उत्पादन में असमर्थ ' यह अर्थ वादीने किस प्रमाण से किया? वह नपुंसक है - इसमें क्या प्रमाण? ' सुभगे! ' का वादीने ' सौभाग्यशालिनी ' अर्थ कर दिया । उसे तो वादीने ' नपुंसकपति ' से संयुक्त करके ' विधवा ' बनाकर ' दौर्भाग्य - शालिनी ' कर दिया; तब उसे ' दुर्भगे ' कहना चाहिये था । महाशय! जैसे ' भगिनी ' में ' भग ' शब्द होता है, वही ' मग ' शब्द यहाँ ' सुभगे ' में है । ' प्रथम - पति, द्वितीयपतिके दोषका समाधान ' आलोक ' ( ८ ) पू. ६०७-६०८ में कर दिया गया है, इस निबन्धमें भी किया गया है । यम यमीसूक्त ऋसं. तथा अथवें सं. दोनोंमें आता है; तत्र इस विषयमें दोनों संहिताओं-' वचन दिये जा सकते हैं । ' ते भ्राताका ' तेरा भ्राता ही सही ' यह वादी द्वारा अर्थ निकालना गलत है, जब कि पति - पत्नी पक्ष में यमी उसे पति ही कह सकती है; ' भ्राता ' नहीं । क्या यमीने यमको ' भ्राता ' कहा था? यदि कहा था; तो वह उसका भ्राता ही हुआ, पति कहाँ हुआ? ' गर्भाधान में असमर्थ भी पति ' अपनी स्त्रीको बहिन कभी नहीं मानता वा कहता? ' वानप्रस्थी गृहस्थाश्रमसे विरत होना AN चाहता है ' यह वादीका अर्थ निकालना भी गलत है, जब कि यहां न कोई ऐसा प्रकरण है, और न वादी के स्वामीने वैसा Gujarat. An eGangotri Initiative
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८०६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) प्रकरण वहां माना है । स्वामीजी पतिकी नपुंसकता बताकर उसकी स्त्रीको अन्यसे नियुक्त करके उस नपुंसक पतिकी सन्तान पैदा कराना चाहते हैं; स्वामी उन्हें भाई - बहन नहीं बनाना चाहते; पर वादी उनको भाई - बहिन बताकर उस स्त्रीको दूसरे पतिकी स्त्री बनाकर उस स्त्रीके पूर्व पतिका वंश उच्छिन्न करना चाहता है । तब स्पष्ट है कि - यम - यमीके लिए उक्त सूक्तमें भ्राता, स्पसा आदि शब्द आने से वे वस्तुतः ही भाई - बहिन हैं; अतः यह भ्रातृ - भगिनी संवाद है, पति - पत्नी संवाद नहीं । पति - पत्नी कभी भाई - बहन नहीं हो सकते । वादीके अनुसार वेदने जो उन्हें पति - पत्नी बनाया; वह पति - पत्नीभाव अब ' शब्दबुद्धि-कर्मणां विरम्य व्यापाराभावः ' न्याय के अनुकूल कभी दूर नहीं हो सकता । ( झ ) विस्तार भयसे सम्पूर्ण मन्त्र न देकर मन्त्रोंके अपेक्षित अंश ही हमने अष्टम पुष्पमें दिये थे । सम्पूर्ण मन्त्रोंसे तो हमारा पक्ष अन्य भी सुपष्ट हो जाना है । जब वहिन यमी भ्राता यम को एक गर्भमें स्थित होनेसे, भूलसे पति - पत्नी समझकर अब उसे लोक - दृष्टिमें भी पति बनाना चाहती है; तब यमका यह कहना कि तुम मुझ भ्रातासे अन्य पुरुषको पति बनानेकी चाहना करे-कहना सङ्गत ही है । जब एक रोगी भूलसे एक वकीलको ही अपनी समझमें वैद्य समझ ले; और उससे अपने रोग दूर करनेकेलिए दवाई मांगे, तब वह वकील कह सकता है कि-मैं तुम्हारा वैद्य नहीं बन सकता; तुम मुझसे भिन्न किसी वैद्यके यम - यमी भाई वहन । ८०७ पास जाकर अपनी रोग - निवृत्तिके लिए वह चाहना प्रकार ' भ्रातृ - भगिनीसंवाद में अज्ञानवश भ्राताको करो । इस बनाना चाहती हुई भगिनी यमीको भ्राता यम का ही संगत ही है कि तू मुझसे अन्य पतिकी चाहना कर ' । जब यह कहना होनेसे वादी के मतमें भी पति अपने को उस स्त्रीका ' भ्राता नपुंसक ' रहा है; तव दूसरेको वादी ‘ अन्य पति ' जिस युक्तिसे कह रहा बता है, वही युक्ति हमारे पक्षमें भी काम देगी । ( ञ ) ' यमस्य स्त्री यमी ' समझकर प्रतिपक्षी यदि यमको यमी-का पति माने, तो यह भी ठीक नहीं; ' स्त्री ' शब्दसे लड़की तथा बहिन भी गृहीत हो जाती है । देखो - यम यमीकी भांति ' देवक-देवकी ' भी शब्द हैं; तब क्या वादी देवकीको देवकको पत्नी मान लेगा? नहीं; वह तो देवककी लड़की थी, ( देखो श्रीमद्भा, १० । १ । ३२ ) । इस प्रकार ‘ रेवत - रेवती ' में भी क्या वादी रेवतीको रेवतकी पत्नी मान लेगा? नहीं; वह तो रेवतकी लड़की थी । ( देखो देवीभा, ७ / ७ / ४४,४६,८-१७ ) । कृप - कृपी में भी क्या वादी ' कृषी ' को कृपकी पत्नी मान लेगा, जबकि वह उसकी बहिन थी; जो द्रोणाचार्यको व्याही थी । ( देखो महाभारत ) । केकय - केकयी में केकयी केकयकी लड़की होती है, न कि उसकी पत्नी । श्याल-श्याली में ' श्याली ' श्यालकी बहन होती है; न कि उसकी पत्नी । इस प्रकार ' यम - यमी ' में भी यमी यमकी बहिन है, न कि उसकी पत्नी - यह इतिहास में भी सुप्रसिद्ध है । ( ट ) इसलिए निरुक्तके भाष्य में श्री दुर्गाचार्य ने भी लिखा है-CC - 0. Ankur Joshi Collection, Gujarat. An eGangotri Initiative
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८०७ 505 1 श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) । इस ' मी किल यमं चकमे भ्रातरम्, तॉ किल यमोऽनया चा पति प्रत्याचचते ' ( ११ | ३४ | १ ) इस प्रकार अन्य प्राचीन भाष्यकारों ने कहना भी उन्हें भाई - बहिन माना है । पुराणोंमें भी यम - यमीका नपुंसक भाई - बहिन होना प्रसिद्ध है । इस पर एक दयानन्दी लिखता बता है - ' सुताः कन्यास्तयोर्जाता मनुर्वैवस्वतस्तथा । यमश्च यमुना चैव ' हा है, ( भविष्य.प्रति.४।१६८।२६ ) यहाँ यमकी बहिन ' यमुना ' है, यमी नहीं । ( टंकारापत्रिका अक्टू. १६६२ पृ. २१ ) पर यह उस दयानन्दी की यमी- अनभिज्ञता है । ' यमी ' को यमकी स्त्री भी कहीं नहीं लिखा तथा गया । ' त्वाष्ट्री सरयू विवस्वत आदित्यात् यमौ मिथुनौ ( यमं यमीं देवक- च ) जनयाञ्चकार ' ( निरु. १२/१०/२ ) यहाँ भी सूर्य से यम - यमी मान इकट्ठे पैदा हुए बताये गये हैं । क्या पति - पत्नी एक माता-I II पितासे पैदा होते हैं? यमुना भी ' यमी ' का ही दूसरा नाम है, देखिये क त्रिकाण्डशेष - कोष ' तापी तु यमुना यमी ' ( १ । १० । २४ ) । अमरकोष में देखो भी यमुनाको ' सूर्यतनया ' ( १।१० ३२ ) कहा गया है । सो वही ' को यह यमी सूर्यतनया ( वैवस्वती ) ही यमुना नामसे कही गई है । अत: दयानन्दीका पक्ष कट गया । यी में ( ठ ) यम - यमीमें ' पुंयोगादाख्यायाम् ' सूत्रसे पुंयोगमूलक नाल- ङीष् प्रत्यय देखकर केवल पति - पत्नीत्व नहीं मान लेना चाहिये; किन्तु भ्रातृ - भगिनीत्व, कन्या- पितृत्व भी इस ङीष् प्रत्ययसे व्यक्त सकी होता है । इसीलिए ४ । १ । ४८ सूत्रके महाभाष्यके ' उद्योत ' में भी लिखा गया है- ' अतएव गोपस्य भगिनी गोपी - इत्यपि भवति, है- जन्यजनकभाव इव ईदृश - पुंयोगस्यापि ग्रहीतुं युक्तत्वात् ' । इस CC - 0. Ankur Joshi Collection यम - यमी भाई - बहन | ८० विषयमें ' आलोक ' ( ८ ) पृ. ६१६-६२२ में स्पष्टता देखो । ( ड ) अब पूर्वोक्त वादी या ' घाता गच्छान ' मन्त्रका अर्थ भी एक पत्रमें करता है - ' हे रात्रे! वे युग - अवसर अन्य कालीन आयेंगे; जबकि ( जामय:-) असमानजातीय तो प्रलय-व्यवधायक मेलमें रुकावट डालनेवाले ( अजामि ) असमानजातीयरहित अविरुद्ध कर्म करेंगे ( इसका क्या मतलव कि - प्रलयकाल में, वे अविरुद्ध कर्म करेंगे, पर अब प्रलयकाल न होनेपर तो वे विरुद्ध कर्म करें? यह वादीने मन्त्रका अर्थ किया; वा घास काटी १. यह अर्थ वहां कैसे संघटित हुआ? सीधा अर्थ क्यों नहीं किया कि वे पापमय युग आगे आयेंगे; जव ( जामयः ) वहिनें भाइयोंसे ( अजामि कृणवन् ) न बहिनोंवाला अर्थात् पत्नियों- AN वाला व्यवहार करेंगी । ' जामि ' का अर्थ निरुक्तकार ' वहन ' मानते हैं । देखो - ' न जामये - भगिन्यै ' ( ३ । ६ । १ ) । ' यहांपर भी ' असमान जातीय'का भाव श्रीदुर्गाचार्यने लिखा है- ' असमानजातीयो हि पुरुषस्य भगिन्याख्यो भ्राता । सा हि स्त्रीत्वादेव अतुल्यजातीयैव पुरुषस्य भवति ' अर्थात् - भाई - बहन स्त्री - पुरुष होनेसे भिन्न जातिवाले होते हैं । आगे वादीने लिखा था- - ' ' हे रात्रे! तब तक तुझ पुत्रा-भिलाषिणीसे ' बिना गार्हस्थ्यके ठहरना दुष्कर हैं ' यह वादीने वेदके किन पदोंका अर्थ किया है? ' रात्रि ' में यह अर्थ कैसे संघटित होता है? रात्रि, दिनसे कौनसा पुत्र उत्पन्न करना Gujarat. An eGangotri Initiative
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८१० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) चाहती थी? जब रात और दिन इकट्ठे मिल ही नहीं सकते, और युवति रात्रि वृद्ध - दिनके पास कभी आ ही नहीं सकती, तब उनके संयोग वा पुत्र पैदा करनेका कोई प्रश्न ही नहीं रहता । वादी रात्रिको गार्हस्थ्यधर्म कराना चाहता है; तब वह अपने स्वामीसे विरुद्ध नपुंसककी स्त्रीका नियोग न कराके उसका गार्हस्थ्यधर्म द्वारा सधवा - विवाह कराना चाहता है! नियोगमें पतित्व नहीं होता; देखो इसपर इतिहास; पर वादी नियुक्तको पति बनाना चाहता है । यह स्वाद के माने नियोगसे भी विरुद्ध बात है । जब वह पति ही नहीं है, तो उसे ' अन्य पति ' नहीं कहा जा सकता । ‘ इसलिए मैं पुत्रोत्पत्ति में असमर्थं होता हुआ तुझे आदेश देता हूँ ' यह वादीने इस मन्त्र के किन पदोंका अर्थं किया है? फलतः वादी यमयमीसूक्तमें दम्पति - संवाद सिद्ध करनेमें पूर्णतया असफल रहा है । इस विषय में पूर्ण स्पष्टता हम ' आलोक ' ( ८ ) में कर चुके हैं । इस प्रकार हमने प्रतिपक्षी के पुराणादि सनातनधर्मी साहित्य पर किये गये आक्रमणोंको पछाड़ दिया है- यह निष्पक्ष विद्वानोंने अनुभव किया होगा । शेष महादेवजी के वीयँको जोकि वादीने प्राकृत वीयँ दिखलाया है, इसपर वह जान रखे कि - पार्वती-महादेव कोई लौकिक मनुष्य पति - पत्नी नहीं हैं; अत: उनका मैथुन भी ग्राम्य नहीं; वह तो प्रकृतिपुरुषका रमण है; अतः उनका वीर्यं भी लौकिक - मल नहीं । कौतूहलवर्धनार्थ तथा सरसतार्थ उसे लौकिक ऐतिहासिक रंगत दी जाती है; अतः वादीके वेदोंकी अक्षरसंख्या [ दश आक्षेप पीस दिये गये । अब हम थोड़ी ' वेदचर्चा ' तथा आलोचना आदि एवं पौराणिक घटना देकर इस पुष्पको पूर्ण करेंगे 1 । शेष ' भागवत पुराणसमीक्षा ' दयानन्द - सिद्धान्तप्रकाश ' आदि जो पुस्तकें बच गई हैं ' आलोचना तथा सैद्धान्तिक चर्चा दशमपुष्पमें दी जावेगी; उनकी पाठकों का कर्तव्य आ पड़ता है कि इस ग्रन्थमालाका । प्रचार करें, स्वयं भी इसकी सहायता करें, दूसरोंसे भी करवायें खूब । व्यर्थके कामोंमें लोग हजारों रुपये खर्च कर डालते हैं; पर साहित्यसेवामें सनातनधर्मी लोग पिछड़े हुए हैं, उन्हें सनातन-धर्मी साहित्यके स्वयं खरीदने तथा उसके प्रचारमें सहयोग देना चाहिये | वेदचर्चा । ( १४ ) वेदों की अक्षरसंख्या । पूर्वपक्ष – आपने ' आलोक ' ( ६ ) में सारे वेदमन्त्रोंकी संख्या एक लाख लिखी थी, यह ठीक नहीं । शतपथने वेद चार माने हैं । ( १४ । ५ । ४ । १० ) । वेदका परिमाण भी शतपथने ' स ऋचो व्यौहत् द्वादश बृहतीसहस्राणि, एतावत्य ऋचो याः प्रजापतिसृष्टाः ' ( १०/४/२/२३ ) परमेश्वरने ऋग्वेदको १२००० बृहती छन्दोंमें उत्पन्न किया । यह ऋऋचाओं का परिमाण है । १२००० बृहती छन्दों-का परिमाण १२००० ३६ = ४,३२००० अक्षरोंका होता है । ' अथ इतरौ वेदौ व्यौहत् । द्वादशैव बृहती सहस्राणि, अष्टौ यजुष, CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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६ || श्रीसनातनधर्मालोक ( ९ ) ८१२ ] चत्वारि साम्नाम्, एतावद्ध एतयोर्वेदयोर्यत् प्रजापतिसृष्टम् ( २४ ) शिक ते सर्वे त्रयो वेदा दश च सहस्राणि अष्टौ च शतानि श्रशीतीनाम-मीचा ' ( २५ ) पुनः दूसरे वेदोंको प्रकाशित किया, जिसमें ८००० उनकी भवन में यजुःकी ऋचाएँ, जिसमें २,८८००० अक्षर बृहती छन्दपरिमाण हूँ । साम ऋचाएँ ४०००, जिनमें १,४४००० अक्षर हैं । इस प्रकार T खूब शतपथने वेदके सम्पूर्ण मन्त्रोंकी संख्या २४००० बृहती छन्द चायें । और उनकी कुल अक्षरसंख्या ( १०८०० ८० = कुल ८,६४,००० ) पर कही है । वेदक यह ऋचाएँ मन्त्रभाग अपौरुषेय है, इनमें रतन- न्यूनाधिकता सम्भव नहीं हैं; क्योंकि वेदोंके मन्त्र और अक्षर योग हुए हैं । ( ख ) वेदों का स्वर भाषिक नहीं होता, पर ब्राह्मणोंका स्वर भाषिक होता है, अतः वे वेद नहीं । वेदोंकी रक्षा घन माला जटा - पाठ आदिसे सुरक्षित है, ब्राह्मणोंका उस सुरक्षित - प्रक्रियासे कोई भी सम्बन्ध नहीं है । वेदोंके ऋषि, देवता, छन्द आदिका ख्या वर्णन अनुक्रमणिकामें सुरक्षित मिलता है; पर ब्राह्मणोंका कोई ने उल्लेख नहीं होता । पतञ्जलिने महाभाष्य में उपनिषदों को वेद इन्, नहीं माना । ' तेन प्रोक्तम् ' ( ४ । ३ । १०१ ) के भाष्य में लिखा है, वेदोंसे काठक आदि पृथक् हैं, वेद नित्य हैं, पर ब्राह्मण वा त्पन्न शाखा अनित्य हैं । ' पश्य देवस्य काव्यं न ममार न जीयंति ' ( अथवे. १० । ८ । ३२ ) यह वचन चारों वेदोंकेलिए प्रयुक्त होता है । है । कि - परमात्माका काव्य न कभी नष्ट होता हैं, न जीर्ण; जबकि-षां, मानवकृत ११२७ शाखाएं लगभग सभी नष्ट हो चुकी हैं । CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदोंकी अक्षरसंख्या [ ८१३ अष्टाध्यायी ( ४ | २ | ६६ ) भी ब्राह्मण - ग्रन्थोंको वेदसे पृथक रही है । जैमिनि ऋषिका ' ऋक् यत्र अर्थवशेन बता गोतिषु सामाख्या, शेषे यजुः - शब्दः ' यह चारों वेदोंके पादव्यवस्था मन्त्रोंका, लक्षण केवल मन्त्रसंहिताभाग में मिलता है । ब्राह्मणभागका कोई लक्षण नहीं किया गया है, और न उपरोक्त लक्षण उसमें घटता है । उत्तरपक्ष- इस विषयमें हम पूर्णविवेचन तो ' आलोक ' ( ४-६-७-८ पुष्पों ) में कर चुके हैं, दशमपुष्पमें भी लिखेंगे । यहां कुछ संक्षेपसे लिखते हैं-( १ ) वादीको याद रखना चाहिये कि पहले तो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद ही कहीं छपे हुए नहीं मिलते । जहां मिलते हैं, ऋग्वेदसंहिता आदि ही मिलते हैं । यह तो ऋग्वेदादि की संहिताएँ हैं । यदि वादी इन्हींको ऋग्वेद आदि मानता है; तो वह अपने चारों वेदोंमें ' ऋग्वेदसंहिता ' आदि नाम दिखला दे, या ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद आदि नाम ही दिखला दे । यदि वह न दिखला सके; तो उसके वेद ' देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जीर्येति ' के विरुद्ध कहीं लुप्त हो गये समझने पड़े गे; तब उसका वैदिकधर्म कहीं लुप्त हो गया समझना पड़ेगा । ( २ ) अब रही ॠग्वेदादिकी मन्त्रसंख्या, श्री सातवलेकरजी ने ऋसं.क़ी. मन्त्रसंख्या १०४७२ बताई है । बालखिल्य की मन्त्र-संख्या ८० बताई है । दोनोंकी मन्त्रसंख्या १०५५२ बताई है । उनकी अक्षरसंख्या ३,६४,२२१ तथा वालखिल्योंकी ३०४४ Gujarat An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ८१४ ] अक्षरसंख्या ३,६७,२६५ बताई है | अक्षरसंख्याके साथ सम्पूर्ण परिशिष्ट हैं; इससे यह भी सिद्ध होता है कि- बालखिल्यसूक्त ही इसलिए गणपत कृष्णाजीकी छपी ऋ.सं. में बालखिल्यसूक्त उनपर सायणभाष्य भी नहीं है । वे सूक्त वहां नहीं हैं; इसलिए, परिशिष्ट में मिलते हैं । ' अथ वालखिल्यम्, इति बालखिल्यम् लिखना वेदकी शैली के विरुद्ध है । अब वादी बतावे कि- शतपथानुसार १२००० मन्त्रों वाला अक्षरों वाला ॠग्वेद तुम्हारे किस प्रेसमें छपा और ४,३२,००० रखा है? वादीकी वैदिक यन्त्रालयकी है? किस लायब्ररीमें काव्यं न ममार, सं. में शेष ३४, ७३५ अक्षर ' देवस्य पश्य न जीर्यति'से विरुद्ध कहां लुप्त वा जीर्ण हुए? यदि कहा जावे संख्या है; तब ऋचाएँ यजुर्वेद सं., सामवेद कि - यह ऋचाओंकी ऋॠग्वेदकी अक्षर - संख्या सं. तथा अथर्ववेद सं. में भी हैं; तब नियत न हुई, और फिर ऋग्वेदकी ऋचाएं अन्य वेदोंमें किसने डालीं? क्या श्रीवेदव्यासने? क्या वादी इस प्रक्षेपको सह्य करते हैं? इससे जब सिद्ध हुआ कि ऋचाएँ अन्य वेदोंमें भी हैं, तब प्रश्न है कि वे ऋग्वेदसे गईं; वा उन वेदोंकी अपनी हैं? ऋसं. में यजु: हैं, साम भी, तब उनकी अक्षर - संख्या की क्या व्यवस्था होगी? इससे यह भी सिद्ध हुआ पहले वेद एक ही । वेदव्यासजीने उसके तीन, पीछे चार विभाग बनाये; और था यज्ञोपयोगी मन्त्रोंका यज्ञोंके क्रमसे संहिताओंके रूपमें संग्रह किया । उन मन्त्रोंका यज्ञमें जितने वार प्रयोग आता है, उनको CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदोंकी अक्षरसंख्या | १११ उतने ही वार संग्रहीत किया गया । इसलिए उनमें बहुतसे आते हैं । इसलिए भाष्यकारोंने भी पुनरुक्त मन्त्र उनका समान अर्थ होनेसे फिर दोबारा उनका विशेष अर्थ नहीं लिखा वादी बतावे कि जो ऋचाएं पुनरुक्त हैं; उनकी । संख्या भी गिनी गई है या नहीं? क्यों गिनी गई? और अक्षर-इसमें प्रमाण क्या है? वादीने सब वेदोंकी ऋचाओं की संख्या बताई है, तब यजुः और सामोंकी अक्षर - संख्या तो कुछ भी न हुई । अथर्ववेदक अक्षरसंख्या तो वादीने लिखी नहीं; तत्र क्या पृथक् वेद नहीं है? क्या वह पीछे से बनाया गया? वह ( ३ ) जिसे वादी अपना ऋग्वेद मानता है, वह तो ऋ की शाकल्यसं. होनेसे शाखा है । देखो इसमें प्रमाण - ' श्रीकात्यायनकी ऋग्वेद - सर्वानुक्रमणी के आरम्भ में – ' ग्वेदाम्नाये शाकलके ' कहकर इस सं. को शाकल्य की संहिता बताया है । ( ४ ) अब निरुक्तकार श्रीयास्ककी सम्मति देखनी चाहिये-' वने न वायो ' यह ऋसं. का मन्त्र निरुक्त ( ६ | २८ | ३ ) में देकर इसमें ' वायः'को एक पद माना है, पर वादीकी ऋसं. ( १०/२६१ ) में " " वा, यः ' यह दो पद रखे हैं । श्रीयास्कने यहाँ लिखा है- ' वा-व इति च य इति च चकार शाकल्य. ' अर्थात् शाकल्यने अपनी संहितामें ' वा, य: ' यह दो पद लिखे हैं; वस्तुतः ' वायः ' एक पद प्र है, दो पद माननेपर स्वरकी गलती पड़ती है । आर्यसमाजी ९ श्रीविश्वेश्वरानन्दजीकी ऋसं. की पदसूचीमें भी ' वाय ' यह व दो पद प्रत्यक्ष हैं । आर्यसमाजी प्रेस ' वैदिक यन्त्रालय'के मूल Gujarat. An eGangotri Initiative
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८१५ ८१६ | मन्त्र निरुक्तके शाकल्यः ' नमान सिद्ध हो श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) पृ. ६४ की टिप्पणी में भी लिखा है- ' वा, यो ' इति । अब यह वादियोंकी ऋग्वेद - संहिता शाकल्यकी शाखा गई । इस ' वा य: ' इस पदभेदको पदपाठ में नहीं नर- माना गया है, किन्तु संहितापाठ में । अब दयानन्दियोंका इसमें श्रृग्वेद ' देवस्य पश्य काव्यं न ममार के विरुद्ध नष्ट हो गया, ताई उसे प्रतिपक्षी ढूंढे । नहीं तो फिर उसे शाखाओं को भी वेद हुई मानना पड़ेगा । वह ( ५ ) अजमेरी निरुक्तके पृ. ६२ में ' आ त्वा विशन्तु इन्दव आगल्दा धमनीनाम् ' यह ऋ. १।१५ २ का मन्त्र लिखा है, पर .की बहु वादियोंके ऋग्वेदमें इस रूप में नहीं मिलता । ऋ. शह २।२२ नक्की मैं भी इस रूपमें नहीं मिलता । अब वादी अपना ऋग्वेद ढूंढे लके ' कि उससे उक्त मन्त्र कहाँ लुप्त हो गया? ' न ममार न जीर्येति ' के विरुद्ध वह निरुक्तमें उद्धत मन्त्र कहां जीर्ण हो गया? इस 7- विषय में अधिक ' आलोक ' ( ८ ) पृ. ६६-१००, १०४, ११६-११८ देकर देखें । = 12 ) ( ६ ) ' देवस्य पश्य काव्यं ' यह मन्त्र वादीने अपने अथर्ववेद ' वा- का दिया है; उसी अथवे का मन्त्र अजमेरी निरुक्तके पृ. ८३ में पनी ' अतिक्रामन्तो दुरितानि विश्वा ' यह अ. ( १२/२/२८ ) का दिया है, पद पर यह वादी के अथर्ववेद में इस रूपमें नहीं मिलता । उसमें तो जी ' दुरिता पदानि ' रूप में मिलता है । अब वह वादीका अथर्ववेद यह कहां खो गया? मूल ( ७ ) यजुर्वेद के १६७५ मन्त्रों में ६८७ ऋग्वेदसे लिये गये हैं; CC - 0. Ankur Joshi Collection अथर्ववेदका प्रथम मन्त्र । ८१७ शेष यजुर्वेद के मन्त्र बचे; तब क्या उनमें वादी की २,८८,००० अक्षरसंख्या की कही यजुर्वेद-मिलती है? जब इतने मन्त्र उसमें कम हो गये; तो वादीकी कही यजुःकी मन्त्रसंख्या संख्या कैसे मेल खावेगी? सामवेदसं और अक्षर-. के १८२४ मन्त्र हैं, उसमें ७० वा ७५ मन्त्रोंको छोड़कर शेष मन्त्र ऋसं. से लिये गये हैं । वादीने सामकी मन्त्रसंख्या ४ हजार, तथा अक्षरसंख्या १,४४,००० लिखी है; तब यह मन्त्रसंख्याका मेल कैसे हुआ? क्या ७० मन्त्रोंकी इतनी अक्षरसंख्या हो सकती है? अथर्ववेद-सं. में ५६३७ मन्त्र हैं, उनमें ७०० मन्त्र ऋसं. से लिये गये हैं । शेष ५२३७ मन्त्रोंकी इतनी अक्षरसंख्याका मेल कैसे बैठेगा? वादीने अथर्ववेद की अक्षरसंख्या शतपथसे लिखी नहीं । इसका भाव यह हुआ कि अथर्ववेदको पृथक् सत्ता है ही नहीं । अब वादीका ' वैदिकधर्म ' भी नष्ट होगया । आर्यसमाजी रिसर्च-स्कालर श्रीभगवद्दत्तजी कुन्तापसूक्तोंको अथर्ववेदान्तर्गत नहीं मानते; देखो उनका ' वैदिक वाङ्मयका इतिहास ' ( द्वितीय भाग पृ. ७० ); अब वादी बतावे कि - उसकी अक्षरसंख्यामें अन्तर पड़ेगा या नहीं? ( ८ ) स्वा. दु.जीने अपनी भाभू. ( पृ. ६६ ) में अथर्ववेदका पहला मन्त्र ' शं नो देवीः ' दिया है । वहाँ ' प्रथममन्त्रप्रतीक ' शब्द प्रत्यक्ष लिखा है । इस प्रकार स्वामीजीने अन्यत्र भी यह सूचित किया है; पर वादी की थ.सं. में ' शं नो देवी ' प्रथम मन्त्र नहीं है, यह शौनकशाखा है- यह सभी मानते हैं । वह प्रथममन्त्र अथर्ववेद TAN Gujarat. An स eGangotri ० ध ० ५२ Initiative
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८१८ | श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) पैप्पलादसं, में है, देखो उडीसाकी उडियाभाषाकी पैप्प. सं. में; तथा गुणविष्णुका कथन | फिर उसे ही अथववेद छान्दोग्यभाष्यमें मानो । इस प्रकार सभी शाखा चार वेद बन जावेंगी । ( ६ ) आर्यसमाज कानपुरकी छपाई ' वेदसंज्ञाविमर्शं'-पुस्तक में आर्यसमाजके मन्त्री श्रीविद्याधरजीने वादिसम्मत-अथ.सं.को ' खण्डित प्रतिलिपियोंके आधारपर संगृहीत हुई ' हेरफेर वाली माना है । उनके यह शब्द हैं- ' ऋषि दयानन्द के मतमें तथा भाष्यकारके कथनानुसार अथर्ववेदका आरम्भ ' शं नो देवी ' मन्त्रसे ही होता है... अतः वर्तमान अजमेर वाली संहिताके आदिमें जो ' ये त्रिषप्ता; ' इस मन्त्रका पाठ मिलता है, वह अथर्ववेदकी उपलभ्यमान खण्डित प्रतिलिपियोंके अनुसार है । उन [ खण्डित प्रतिलिपियों ] में ' ये त्रिषप्ताः ' मन्त्रका प्राधान्य है ' ( वेदसं.वि पृ. ८ ध् ) अब वादियोंकी हेरफेर वाली अथर्ववेद-सं. वेद न रहीं । अव.. वादीकी अथर्वैवेदसं. भी शौनकी शाखा, सिद्ध हुई; उसके अथर्ववेदमें भी ' वने न वा यो ' में ' वा यो ' इन अलग-अलग पदरूपमें है । अब वादीका अथर्ववेद भी नष्ट हुआ । यदि नहीं नष्ट हुआ; तब इस शौनकी - शाखाको अथर्ववेद माननेसे सभी शाखाएँ वेद सिद्ध हो जानेसे वादी स.ध.की शरण में आ गये । ( १० ) जिस शतपथको वादी यहां मानता है, उसीमें लिखा है - ' तस्माद् एतद् ऋषिणा अभ्यनूक्तम्- ' मनसाः संकल्पयति, CC - 0. Ankur Joshi Collection do.op शतपथका अथर्ववेद [ 5 तद्वातमभिगच्छति । वातो देवेभ्य श्राचष्टे ८ मनः ' ( ३/४/२/७ ) इसे यहां ऋषि ( वेदमन्त्र, यथा पुरुष! से वेदमें इसी रूपमें पूराका पूरा नहीं मिलता ) बताया है; पर । तच वादी यह ' पूरे मन्त्रवाला अथर्ववेद ढू ढे, कहां गया? उसमें शतपथोरू भी अन्तर हो जावेगा । अक्षरसंख्यामे ( ११ ) यदि कहा जावे कि - शतपथके पूर्ववचनमें पोथीके मन्त्र वा अक्षरोंकी संख्या नहीं किन्तु ऋग्वेद की की है; तब. ऋचाएँ तो यजुर्वेदसं, उसकी ऋचाओं . में भी हैं; साम और श्रथवर्ष भी; तब वादी के अनुसार यह संख्या केवल ऋग्वेदकी हुई । वादी अब सब वेदोंका संशोधन करे सिद्ध न वेदोंकी ऋचा ही रखे, उससे यजुः । ऋग्वेदमें सभी सभी वेदोंकी और साम उड़ा दे । यजुर्वेदमें यजुः ( गद्य ) ही रखे । उनसे ऋचा एवं सामा दे । सामवेदमें सभी सामं ( गान ) ही रखे, उससे यजुः उडा दे 1 । अथर्ववेदको विल्कुल ऋचा एवं उडा दे; क्योंकि वह किसी छन्दका नाम नहीं है । बहुत - सी पुनरुक्त ऋचाएँवा मन्त्र उढा दे; वेद- पुस्तकें हलकी हो जाएँगी । ( १२ ) निरुक्तं ( ६५/१ ) में ' भद्र ं वद दक्षिणतः ' यह ऋचा उधृत की गई है, पर यह वादीके ऋग्वेदमें नहीं मी मिलती, किन्तु ऋक्परिशिष्ट ( २।१३ ( १ ) में मिलती है; तब ऋक्परिशिष्ट भी ऋग्वेद हुआ । ' नेज्जिह्मायन्त्यो नरकं पताम ' यह मन्त्र निरुक्तके निपात - प्रकरण ( १।११।१ ) में. उदाहृत है; पाणिनिके वैदिकसूत्र ( ३ | ४ | ८ ) ( ८ अष्टक, ६ अ, २ प. ) में भी; तब वेद- परिशिष्ट Qujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) [ ८२० • ] ste हुआ । अब ऋचाओंकी अक्षरसंख्यामें घट - बढ़ सिद्ध रुप! भी ऋग्वेद पर हुई, या नहीं? यह ) निरुक्त मन्त्रभागकी सार्थकताके प्रकरण में ' ओषधे! उपयोक्त ( १३ त्रायस्वैनम् ' ( १ | १५ | ६ ) मन्त्र उधृत है; पर वादीके बेदमें संख्याम ' के साथ ' एनं ' नहीं है । यदि ' एन ' का अध्याहार ' area श्रीयास्कने किया है; तो ' नियतवाचोयुक्तयो नियतानुपूर्व्या वेद की भवन्ति ' ( १ | १६ | ४ ) कहनेवाले यास्क मन्त्रमें ऐसा करके उसमें चाओ न्यूनपददोष कैसे बता सकते हैं; जबकि कृष्णयजुर्वेद में ' त्रायस्व ' अथव के साथ ' एन ' प्रत्यक्ष है । वहीं पर ' प्रोहारिण ' यह वेदमन्त्र दिया सिद्धन गया है; पर यह वादीकी चारों वेद संहिताओं में नहीं । वहीं सभी ' अग्नये समिध्यमानाय अनुत्र हि ' यह वेदमन्त्र दिया गया है नर्वेद में ( निरु, १ । १५ । ८ ); यह भी वादीकी चारों वेदसंहिताओं में नहीं । उदा वहीं ' एक एव रुद्रोवतस्थे न द्वितीयः ' यह वेदमन्त्र भी दिया एवं गया है; पर यह भी वादी के वेदमें नहीं मिलता । उक्त वेदमन्त्र किसी वादीकी वेदसंहिताओंसे कहाँ लुप्त हुए? तव उसकी मानी हुई उडा वेदांकी अक्षरसंख्यामें भेद पड़ेगा, या नहीं? इससे स्पष्ट है कि भी सभी वेदशाखा वेद हैं, उनमें यह मन्त्र सुलभ हैं । ( १४ ) यदि मन्त्रसंख्या के विषयमें वादी शतपथ पर ही विश्वास करता है; तो शतपथमें उर्वशी - पुरूरवाके संवादमन्त्र ऋग्वेदमें १५ बताये गये हैं । देखो - ' इत्येतदुक्तप्रत्युक्तं पञ्चदशचं बह्वचाः [ ऋग्वेदिनः ] प्राहु: ' ( शत. ११/५/१/१० ), पर वादीकी सूत्र श्रृसं.में उर्वशी - पुरूरवा संवादकी ऋचाएं १८ मिलती हैं । इससे CC - 0. Ankur Joshi Collection शतपथ की ऋ. संहिता [ ८२१ स्पष्ट है कि - शतपथकी इष्ट ऋग्वेदसं अब वादी बतावे. कोई ग्रन्य थी; बादी वाली नहीं । कि - उसकी सं. में शतपथके संख्या तथा अक्षरसंख्या अनुसार मन्त्र-कुछ बढ़ जावेगी, या नहीं? वस्तुतः शतपथ यादि ब्राह्मण अपने से प्रभिमत शाखाओं को ही चार वेद बताकर ४ ऋगादि-सो वह ११३६ शाखाएं उन्हींका ही वणन करते हैं । समुल्लासों वाला सभी चार वेद सिद्ध हुए । जैसे १४ संहिताएँ भी सत्यार्थप्रकाश एक माना जाता है, वैसे ११३१ भी चार वेद सिद्ध हुए । ( १५ ) वादीने यजुर्वेद की अक्षरसंख्या पर उसमें ८८,८७५ अक्षर २,८८,००० बताई है, मिलते हैं । देखो इसपर ' वैदिक-साहित्य ' पुस्तक ( पृ. ६१ ) । तब वादी की यजुर्वेदसंहिता नुसार भिन्न सिद्ध हुई । इस प्रकार सामवेदकी शतपथा-ठीक नहीं घटती । अथर्ववेदकी अक्षरसंख्या भी निश्चित अक्षरसंख्या वादीने शतपथसे बताई ही नहीं; अत: वह अथवेवेदकी पृथक् मत माने | इस प्रकार वादीका वेविषयक सत्ता ही मत उसके वेदोंको ही मारनेवाला है; तब उसका वैदिकधर्म भी नष्ट हो गया इससे ' दयानन्द सिद्धान्त- प्रकाश ' का भी खण्डन । हो गया; क्योंकि - यह मत वादीने उसी से अपहृत किया है । ( १६ ) स्वा. द. जीने अपने अष्टाध्यायी भाष्य में ' मन्त्रे घस ' ( पा. २४/८० ) इस सूत्रके मन्त्र ( वेद ) का उदाहरण अज्ञात ' ' दिया है । यह वादी के चारों वेदोंमें नहीं है । स्वा. द. जीने लिखा है- ' छन्दो - वेद- निगम - मन्त्र - श्रुतीनां पर्यायवाचकत्वात् ' ( ऋमाभू. Garat. An eGangotri Initiative
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८२२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) पृ.७ ९ ) यहांपर स्वा.द.जीने ' छन्द ' वेदका नाम माना है । ' छन्दसि निष्टर्क्स ' ( ३ | १ | १२३ ) का उदाहरण स्वामीने अपनी पुस्तकोंमें ‘ निष्टर्क्यं ' चिन्वीत पशुकामः ' वा केवल ' निष्टर्क्स ' दिया मन्त्र एवं पद वादीकी चारों वेदसंहिताओं में नहीं है; है, यह तब उनमें अक्षरसंख्याका भेद होगा, या नहीं? फलत: वादीका वेदविषयक मत खण्डित हो गया । ( १७ ) उस शतपथ ( १० | ४/२/२४ ) के वचन में पक्तिछन्दका निरूपण भी किया गया है । वहां ' अष्टाशत शतानि पङ्क्तयोऽ-भवन् ' ( २३ ) ८०००० पंक्तियां बताई गई हैं । सो वादी अपने वेदोंमें इतनी पङ्क्तियां दिखलावे । वस्तुतः यह शतपथकी अपनी सम्मत त्रयीकी संख्या बताई गई है; वादी से सम्मत वेद - पोथियों-के अक्षरोंकी नहीं । क्योंकि ब्राह्मण भी अपनी इष्ट त्रयीका वंणेन देते हैं, सभी वेदसंहिताओंका नहीं । सो शतपथ की दृष्टिमें वादीकी चार संहिता - पोथियाँ नहीं कहीं; क्योंकि — उसके अनुसार लिखी अक्षरसंख्या वादीसे अभिमत संहिताओंकी अक्षरसंख्यासे मेल नहीं खाती । वादीकी ऋग्वेदसं. की अक्षर-संख्या ३,६७,२६५ है; पर शतपथने ऋग्वेदकी अक्षरसंख्या वादी के अनुसार ४,३२,००० लिखी है । तब शेष ३४,७३५ अक्षर ‘ देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जीर्यति ' के विरुद्ध कहाँ खो गये? यह भी वादी बतावे कि - अथर्ववेद के अक्षरोंकी संख्या ) शतपथने क्या बताई है? और वादी के अथर्ववेद में कितनी. न्यूनाधिक है? इस प्रकार वादी के ही प्रमाणसे वादीका ' उष्ट्र-.. CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदोंका स्वर भाषिक नहीं (? ) 1८२३ लगुड ' न्यायसे खण्डन हो गया । इससे ११३१ हैं- यह सिद्ध होता है; तब उनके चरणव्यूहादिके संहिता चार द कि - उसमें लिखा है- एक लाख मन्त्र होने से अनुसार जैसा । क्षति नहीं पड़ती । हमारे पक्ष की कोई ( १८ ) यह जो वादीने ' दयानन्द सिद्धान्त करके कहा है- ' वदोंका स्वर भाषिक नहीं - प्रकाश ' से चोरी भाषिक होता है ' इसमें वादी ' भाषिक ' का होता; ब्राह्मणोंका क्या अर्थ सममता है? क्या ' लौकिक '? यदि ऐसा है; तो यह वादीकी । स्वरप्रक्रिया में जितने स्वर बताये गये हैं इनमें भूल है । कम हैं । शेष जो स्वर हैं; वे वेद और; छान्दससूत्र बहुत भाषा ( लोक ) दोनोंमें समान हैं । ' भाषिक ' तो एक पारिभाषिक शब्द हैं । जबकि मन्त्रभागमें भी परस्पर भेद होते हैं । जैसे ऋसं. में ' ड'को अचोंके मध्यमें ' ल ' लिखा जाता है, पर शेष तीनों वेदोंमें नहीं । अनुस्वार को र, श, ष, स, ह सामने होनेपर यजुर्वेद तथा सामवेद में होता है, पर सं. तथा अथर्वमें नहीं । इस प्रकार इन चारों संहिताओं में स्वरोंका भी कुछ भेद है जैसे कि-• सामवेदादि में; तब क्या भिन्न विधिवाली संहिताएँ वेद नहीं रहेंगी? । ' भाषिक ' की परिभाषा यह है कि - ' छन्दोगा वह वृचाश्चैव तथा वाजसनेयिनः । उच्चनीच स्वरं प्राहुः स वै भाषिक उच्चते " " ( देखो मीमांसादर्शनका शावर भाष्य ( १२/३/१६ ) सो यह स्वर इन वेदोंमें भी होता है; तब इससे क्या वादी उन्हें अवेद Gujarat. An eGangotri Initiative