सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 431–440
सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 431–440
पृष्ठ 431
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोक ( T ) ८२४ ] चार मान लेगा? | सार वेद ( १६ ) प्रलयमें वादी अपने वेदोंको जैसा नहीं? यदि मानता है; तब उसके वेद की कोई तब ' देवस्य पश्य काव्यं न ममार ' से च यदि वादी उन्हें तब भी विद्यमान हारोंका शाखात्मक वेद जो वादीको आजकल नष्ट हुआ मानता है, या भी अनित्य सिद्ध होगये । विरोध सिद्ध होगया । मानता है; तब सभी नहीं मिल रहे; उनकी भी सममता सत्ता नष्ट नहीं है । प्रलय के दृष्टान्तसे वादी समझ ले । यही बात भूल है । वेद स्वयं कहता है । देखो-बहुत ' देवस्य पश्य काव्यं महित्वा अद्य ममार, स ह्यः समान ' दोनों में ( ऋ. १०२५५।५ ) यहां यह बताया गया है कि- देवका काव्य जबकि ( अद्य ममार ) आज जो मर गया - सा मालूम देता है, ( सद्यः ' ड'को ' समान ) वह फिर कल जी उठेगा, प्रकट हो जावेगा, कोई ऋषि नहीं । ( समाधिनिष्ठ मन्त्रद्रष्टा ) उसे प्रकट कर देगा । सो फिर प्रकट तथा हो जाना शाखात्मक वेदोंकी नित्यताका प्रमाण है । इसलिए । इस निरुक्तकारने भी ऋषिका लक्षण बताते हुए ब्राह्मणका प्रमाण -क्रि- लिखा है- ' तद् यद् एतान् तपस्यमानान् ब्रह्म स्वयम्भु अभ्या नर्षत्, तद् ऋषीणामृषित्वम् ' ( २।११।१ ) इसी विषयमें एक स्मृतिवाक्य भी श्रीसायणाचार्यकी ऋभाभू. में उधृत किया गया है - ' युगान्तेऽन्तर्हितान् वेदान् सेतिहासान् महर्षयः । लेभिरे तपसा पूर्वमनुज्ञाताः स्वयम्भुवा ' सो उन शाखाओंको अन्तर्हित समझना चाहिये, नष्ट नहीं । वेद ( २० ) मन्त्र विनियोज्य होता है, ब्राह्मण विनियोजक । सो CC - 0. Ankur Joshi Collection ' पश्य देवस्य काव्य ' का अर्थ [ ८२५ विनियोज्यके ऋषि आदि बताये जाते हैं । कुछ समय की अजमेरी अथर्वसं. के ऋषि - देवता आदि पूर्व वादी-गये हैं; तब क्या उस नहीं थे; वे अब छपाये विनियोजकका समय वादीकी अथर्ववेदसं. वेद नहीं थी? ऋषि - देवता स्वयं परमात्मा होता है; श्रतः उसके लिए घन, माला आदि रखनेकी आवश्यकता घन, माला आदि तो सभी शाखाओं नहीं होती । शाखाओं के होते हैं; तब वादी सभी को भी वेद मान ले । इन भेदोंसे ' ब्राह्मण ' भले ' मन्त्र ' न हो; यह तो हम भी मानते हैं; पर इससे ही वेदत्वमें क्षति नहीं आती । मन्त्र - त्राह्मण दोनों दोनोंके एक - दूसरे से पृथक् ही हैं, तथा पृथक् लक्षण वाले हैं; यह दोनों ही भाग हैं; पर वेद दोनों ही हैं । श्रीपतञ्जलिने उपनिषदोंकोवेदोंसे पृथक् कहीं नहीं माना । ' रहस्य'का अर्थ ' उपनिषद् ' नहीं है, यदि हो भी सही; तो वहाँ ' गोबलीवर्द ' - न्यायसे पृथक् ग्रहणसम्भव है, वस्तुतः उपनिषद् भी वेद हैं । ब्राह्मण यहां वेदोंसे नहीं आये, तब वादीके अनुसार वे भी वेदान्तर्गत होनेसे पृथक् वेद सिद्ध हो ही गये; इसलिए महाभाष्यकारने ' पयोव्रतो ब्राह्मणः ' इस ब्राह्मणके - स्वा. द. जीके अनुसार शतपथके - वचनको वेदका वचन माना है । ( २१ ) ‘ पश्य देवस्य काव्यं ' में ' काव्य ' का अर्थ कोई ' पोथी ' नहीं है, क्योंकि - पोथियां तो वेदकी भी जीएँ हो ही जाया करती हैं; और नष्ट वा लुप्त भी । प्रलय में तो लुप्त हो ही जाती हैं । ' काव्य ' का अर्थ ' सामर्थ्य ' भी देखा जाता है; इसमें देखो Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 432
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८२६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) सायणभाष्यकी साक्षी भी ( ऋ. १०५५/५ ) । सो अथर्व के उक्त मन्त्रमें भी ' काव्य'का अर्थ ' सामर्थ्य ' ही लेना चाहिये । अब अर्थ यह हुआ कि- देव ( परमात्मा ) की सामर्थ्य न कभी नष्ट सङ्गत होती है, और न पुरानी पड़ती है; वह सदा बनी ही रहती है । तब लुप्त वेदकी शाखाओंको वेदत्वसे गिरानेकेलिए किया गया वादीका अर्थं गलत सिद्ध हुआ । क्योंकि - तब वर्तमान वेदको शाखाएं जो वादीके मतमें भी अब जीवित वा वर्तमान हैं; उनको वह वेदत्वसे न रोक सकेगा । वादीसे प्रष्टव्य है कि तुम वेदके अक्षरोंको ही यदि वेद मानो; तो बताओ कि - वेदके अक्षर निराकार होते हैं, वा साकार? यदि निराकार; तो निराकार वस्तु तो सदा ही रहेगी । इस प्रकार शाखात्मक वेद भी निराकार रूपमें सदा ही रहेगा, चाहे वह लोकदृष्टिमें न भी दीख रहा हो । नहीं तो तुम्हें न दीख रहे हुए परमात्माको भी तुम्हें न मानना पड़ेगा । उसका भी मर जाना समझकर तुम सीधा नास्तिकताका सर्टिफिकेट ले लो । अथवा यदि तुम निराकार भी अक्षरको व्यवहारार्थ साकार बना लो; और उसके द्वारा निराकारका ज्ञान प्राप्त करने-की चेष्टा करो; तब तुम उस निराकारको साकार बनाकर उसकी उपासना करनेसे स्पष्ट मूर्तिपूजक हुए । तब अपने प्रतिकूल सिद्धान्तका अवलम्बन करनेसे तुमने अपने सम्प्रदायको भी मार दिया । नहीं तो फिर तुम लोग निराकार वेदको निरा-कार ही रहने दो; निराकारकी मूर्ति मत बनाओ । निराकार CC - 0. Ankur Joshi Collection वादियोंके वेद भी शाखा हैं । [ ८२७ अक्षरकी मूर्ति बनाते हुए और उसकी उपासना करते हुए तुम लोगोंने मूर्तिपूजाकी अपने सम्प्रदाय में नींव रख ही दी ( २२ ) सभी शाखाओं में वादीकी मानी हुई चार माध्यन्दिनीसं., कौथुमीसं., शाखाएँ हैं । क्या शाखाओंसे ' वेद ' शब्द लिखा । वेदसंहिता रहता है । भी शाकल्यसंहिता शौनकी संहिता ही होनेसे, सभी भिन्न भी कभी शाखी कहीं मिल सकता है? मूल तो सदा छिपा ही रहता है, कभी दीख ही नहीं सकता 1 दीख तो शाखा ही रही होती हैं । इस प्रकार अन्य शाखाओंमें भी ' ऋग्वेद - आश्वलायनसंहिता, यजुर्वेद - काण्व-संहिता, यजुर्वेद - माध्यन्दिनसंहिता आदि शब्द लिखे रहते थे; पर पहले यह भूल मैक्समूलरने की, और फिर स्वा. द. जीने की कि - शाखावाचक शब्द मिटा दिया । फिर तो अन्धपरम्परा चल पड़ी । ‘ ऋग्वेद - शाकल्यसंहिता को केवल ' ऋग्वेदसंहिता ' और ' यजुर्वेदमाध्यन्दिनसंहिता ' को केवल यजुर्वेदसं., ' सामवेद-कौथुमसंहिता ' को केवल सामवेदसं. और ' अथर्ववेद शौनक-संहिता ' को केवल ' ' अथर्ववेदसंहिता ' लिखा जाने लगा, जिससे वर्तमान विद्वान् भी भ्रमकूपमें पड़े हुए हैं । इस समयसे पूर्व ' ऋग्वेदाश्वलायनसंहिता, यजुर्वेद काण्वसंहिता, यजुर्वेदतैत्ति-रीय संहिता, यजुर्वेद काठकसंहिता, यजुर्वेद मैत्रायणी संहिता, सामवेदजैमिनिसंहिता, अथर्ववेद पैप्पलाद संहिता,.. सामवेद-राणायनीसंहिता आदि लिखा जाता रहा । अब भी निर्णय-सागर आदि की वेदपुस्तकों में ऐसा ही लिखा रहता है । श्री-Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 433
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) ८२७ ८२८ ] एतुम राजारामशास्त्री, श्रीभगवद्दत्त रिसर्चस्कालर, श्रीयुधिष्ठिर मीमां-आदि दयानन्दी विद्वान् भी ऐसा ही मानते हैं । अन्य सक है । कई दयानन्दी इस चातको छिपा लेना चाहते हैं; पर छिपा लेनेसे हिता, यह सब छिपता थोड़े ही है । यह सदाकेलिए याद रख लेना सभी चाहिये कि - वेदपुस्तकके साथ जब ' संहिता ' शब्द होगा, तब उसके मिल साथ ऋषिविशेषका नाम भी अवश्य ही होगा । इस प्रकार अपने-नहीं अपने कुलकी विशेष संहिताएँ होती हैं; वे वे कुल उन्हीं अपनी अन्य अमित चार संहिताओं को ही चार वेद मानते हैं । हां, एव- अपनी चार संहिताओं में निष्ठा बनी रहे; अतः उन्हें तो अपौरुषेय थे; कहते हैं; और दूसरोंको पौरुषेय । यह साम्प्रदायिक दृष्टिकोण होता है; वस्तुतः सभी ११३१ संहिता ही ब्राह्मण - आरण्यक-उपनिषद् समेत वेद एवं अपौरुषेय होती हैं । यदि अर्वाचीन दृष्टिकोण रखा जावे; तो यह वर्तमान दयानन्दियोंसे श्रभिमत चारों संहिता भी उन्हें पौरुषेय माननी पड़ेगी । वस्तुतः ऋषिलोग नक इनके प्रवक्ता हैं, प्रणेता नहीं । समाधि द्वारा उन्हें जिस - जिस रूपमें वे संहिताएँ मिलीं; वे उसी उसी रूपमें पहले प्रवचन द्वारा और फिर ग्रन्थबन्धन द्वारा, लेख द्वारा सुरक्षित रख ली गई । यही वेदरहस्य है । इसो सम्प्रदायभेदको भाष्यकारादिके अनु-ता, सार संहिता - भेद कहा जाता है । यह दयानन्दसम्मत चार शाखाएँ कहीं नष्ट न हो जावें; यू- इसलिए दयानन्दी लोग अपने आर्यसमाज मन्दिरोंकी चारों नी- नीवों में उन्हें शीशेकी पिटारियों में बन्द करके रखते हैं । यदि CC - 0. Ankur Joshi Collection वेद पोथियां क्यों जल गई? [ ८२६ इन वेदसंहिताओं के जीर्ण होने वा नष्ट न रहता; और दयानन्दसमाजको हो जाने का उन्हें डर न जीर्यति ' का यही ' देवस्य पश्य काव्यं न ममार दयानन्दी समाज वादीसे कहा हुआ अभिप्राय इष्ट होता; तो कभी इन संहिताओंकी रक्षाका न करता; पर वैसा प्रयत्न करनेसे इतना प्रयत्न सही अर्थ है, जिसे स्पष्ट है कि इस मन्त्रका यही हम कर चुके हैं, ' काव्यम् - सामध्येम् ' । पाकिस्तान में मुलतानमें गुरुकुलकी सारी लायब्रेरी मन्दिर बोहड़ दरवाजेकी, आर्यसमाज लाहौरकी सारी वैदिक लायब्रेरी, गुरुदत्तभवन सारी बढ़िया वैदिक लायब्रेरी, इस प्रकार अन्य नन्दी वैदिक लायब्रेरियां भी जिनमें आर्यसमाजाभिमत दया-वेद भी थे, जल गई, वा नष्ट होगई । यदि चारों NT ANA वादीका उक्त मन्त्रका अर्थ सही होता; तब पाकिस्तानकाण्डमें वादीके जाते? इसलिए वेद भी क्यों जल शाखाओंके श्रवेदत्वका वादी द्वारा किया हुआ आक्षेप उसके साम्प्रदायिक वातावरणसे कलुषित दृष्टिकोण एवं अज्ञानके कारण है | यह वादीकी चार वेदसंहिताएँ भी शाकली, माध्यन्दिनी, कौथुमी, शौनकी शाखाएँ हैं । वादीने ' देव'स्यका अर्थ ' परमात्मा ' कैसे कर लिया? ' विद्वाँ सो हि देवाः ' के अनुसार ' विद्वान् ' अर्थ क्यों नहीं किया? ( २३ ) वादीका यह कहना गलत है कि - महाभाष्यकारने a ' काठक आदिको वेदसे पृथक कहा है । इसपर ' आलोक ' ( ४ ) पृ. १५१-१६०, ' आलोक ' ( ८ ) पृ. १०६-११५ द्रष्टव्य है । महा-भाष्यने वेदके नामसे कई उद्धरण दिये हैं । देखो - ' अस्त्यप्रयुक्तः ' Gujatal, An eGangotri Initiative
पृष्ठ 434
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोक ( 1 ) ८३० ] ( वा. ) में ' यद् वो रेवती रेवत्यां तमूष ' वेदवचन; पर यह वादीकी वेद - संहिताओं में नहीं है । अंशतः यह कृ.य. काठकसं. चारों है । यदि भाष्यकार कृ.य. काठकसं. को वेद न ( ३१।७ ) में मिलता मानते; तो वेदके उद्धरण में काठक सं. का उद्धरण क्यों देते? ( ख ) ' ऋषिः ( वेदः ) पठति - शृणोत ग्रावाणः ' ( ३ | १ | ७ ) महा-भाष्यने यह वेदका वचन दिया है, पर यह वचन वादीकी चारों वेद - संहिताओं में नहीं; यह कृ.य. तैत्तिरीयसं. का है । भाष्यकार-ने ‘ आम्नाय ' ( वेद ) का वचन दिया है - ' श्मशाने नाध्येयम् ', चतुष्प-नाध्येयम् ' ( ५ | २ | ५६ ) इसे वादी अपने वेदमें दिखलाए । यदि थे; तब उसे वेदकी सीमा इन चार वेद - पोथियोंसे न दिखला सका अधिककी माननी पड़ेगी । ( २४ ) ‘ अष्टाध्यायी ' ( ४ | २/६६ ) में ब्राह्मणोंको वेदसे पृथक् कहा कथनपर वादी प्रत्युत्तर ' आलोक ' ( ६ ) पृ. ४६-५० है; इस अपने ' तनादिकृभ्य उ: ' ( ३ | १ | ७६ ) में कृज़ को में देखे | श्रीपाणिनिने तनादिसे भिन्न लिखा है; तब क्या ' कृन ' धातु तनादि नहीं रहेगी? ' छन्दो - ब्राह्मण को गो - बलीवर्द न्याय से पृथक् - रखा गया है । क्या वादी ' गो'को ' बैल ' मानकर उससे पृथकूं कहे गये ' बलीवदे ' को बैल नहीं मानेगा? ( २५ ) जब परमात्मा ही स्वयं वेदका शब्द ( मन्त्र ). लिखे, वही स्वयं वेदका अर्थ ( ब्राह्मण ) लिखे; तब क्या वह वेद नहीं रहेगा? इससे तो फिर स्वा. द. जीकी भाभू. मूल, परन्तु उसका . ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका नहीं रहेगी । फिर तो अर्थ ऋभाभू CC - 0. Ankur Joshi Collection सत्यार्थप्र. का मूल नष्ट [ ८३१ स्वा. द. जीका ' सत्यार्थप्रकाश ' जिसे वह संस्कृत में बोलते अर्थ वर्तमान सत्यार्थ प्र. भी सत्यार्थप्रकाश न रहेगा गये, उसका समाजका वेद स्वा. द. जीका संस्कृतका शब्दात्मक । वह आर्य-प्रकाश मर गया; उसका अर्थ ही आर्यसमाजके मूल सत्यार्थ-वादी परमात्मा के ही लिखे शब्दके पास है । यदि , परमात्मा के ही लिखे अर्थको वेद नहीं मानते; तब वे वर्तमान स. प्र. को भी होनसे मूल स.प्र. मत माने । उसे पौराणिक मत मान लें मूलका अर्थ फिर तो जो कि वेदमें ही मन्त्रोंका । जैसे कि - ' आर्ष्टिषेणो होत्रमृषिर्निषीदन् अनुवाद किया है, ' ( ऋ. १०१६८५ ) इसी मन्त्रका अनुवाद दूसरा मन्त्र है - ' यदु देवापिः शन्तनवे पुरोहितः ' ( ऋ. १० | ६८ | ७ ) इसी प्रकार ' परिषद्यं ह्यरणस्य रेक्णो ' ( ऋ. ७ | ४ | ७ ) का अनुवाद ' नहि प्रभायारणः ( ७: ४/८ ) इस मन्त्रको भी वादी वेद मत माने । इस प्रकारके वेदके वीसों प्रमाण दिखलाये जा सकते हैं । ( २६ ) जैमिनिका जो वादीने ऋक्, यजुः, सामका लक्षण दिखलाया है; वह वेद की पोथियोंका नहीं है, किन्तु मन्त्रविशेषका लक्षण है; नहीं तो इसमें अथर्वन्का लक्षण न होनेसे अथर्ववेद. वेकु नहीं रहेगा । इसपर ' आलोक ' ( ६ ) पृ. १५१ - १५२ देखना चाहिये । ( २७ ) यदि कात्यायनसूत्रके परिशिष्ट वचन होनेसे, ' मन्त्रः ब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ' इसे कात्यायनका वचन न माना जावे, तो स्वा.द.जी भा.भू. ( पृ. २३५ ) में ' मृतश्चाहं पुनर्जात: ' निरुच के इस परिशिष्टके वचनको ( देखो अजमेरी निरुक्त का पू. २२३-Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 435
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
| ६३१ ] श्रीसनातनधर्मालांक ( 8 ) ८३२ उसका ) निरुक्तकारके नामसे देते हैं । आर्यसमाजी ' तर्कमृषिं २२४ प्रायच्छन् ' इस निरुक्तके परिशिष्टवचनको ( देखो अजमेरीनिरुक्त-त्यार्थ- का पृष्ठ २१७ ) निरुक्तकारके नामसे देते हैं । स्वा.द.जीने भी यदि भाभू. पू. में ऐसा ही माना है, फिर वादी उनका भी लिखे खण्डन करें । आज भी ग्रन्थकार अपने ग्रन्थमें परिशिष्ट रखते का अर्थ हैं; वह भिन्नकर्तृ क नहीं हो जाता । श्रीयास्कने ऋग्वेदपरिशिष्टके मन्त्रोंको अपने निरुक्तमें है, ऋचः ' ' कहा है, जिसे हम पहले ' भद्र ' वद दक्षिणतः ' आदिके इसी उद्धरण से लिख चुके हैं । तब तो वादी निरुक्तकारका भी खण्डन तनवे करे । स्वा. द. जीने ऋभा.भू. में इसे कात्यायनका वचन माना है । ऋणो ' कात्यायन से भिन्न अन्य ऋषि - मुनियों का भी यही सिद्धान्त रहा इस है - ‘ मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ' । देखो इसपर पारस्करगृह्यसूत्र-बीसों ' विधिर्विधेयस्तर्कश्च वेदः ' ( २६५ ) इसमें विधि ( ब्राह्मण ), तकेँ ( अथंवादात्मक ब्राह्मण ) तथा विधेय ( मन्त्रभाग ) को वेद माना क्षण है । इस विषय में अधिक ' आलोक ' ( ६ ) ( पृ. १०५-११६ ) में देखो! का स्वा. द. जी भी पहले इसी मत के थे । इसपर ' आलोक ' ( ६ ) पृ. ५५० - ५६६ देखो । शेष रहा महाभारतके दश सहस्र श्लोकोंके एक लाख श्लोक बन जाना यह वादीकी बात निष्प्रमाण है । महाभारतमें स्पष्ट उसकी एकलक्षताका प्रमाण है । इस विषय में ' आलोक ' ( ४ ) पृ. २३१-२३४ देखो । ' हनुमान चालीसा ' आदिको स्वा. करपात्रीजीने अपनी किस पुस्तकमें वेद कहा है- यह वादी CC - 0. Ankur Joshi Collection ' घवतारवादपर धालोचना [ ८३३ लिखे? स्वा. करं. जीने तो लिखा है- ' सनातनी रामायण, हनुमान चालीसा तक्रको तुलसीकृत ( सिद्धान्त १६/६ - १०, स्तम्भ १ पृ. २४८ वेदानुकूल मानते हैं वेदानुकूल पं. १८-१६ ) उन्होंने उन्हें तो लिखा है, वेद नहीं । मालूम होता है कि - वादीने यह गलत बात ' वेदसंज्ञाविमर्श ' से लिखी है, वह आर्यसमाजी पुस्तक है । इस प्रकार वादीका वेद - विषयक मत खण्डित होगया । आलोचना ( १५ ) अवतारवादपर आलोचना । ' अवतार - रहस्य ' की आलोचना हम ' आलोक ' ( ७ ) के पृ. १७६-२१५ में तथा अन्यत्र भी यत्र - तत्र ( पृ. ३६३-४२५ ) कर चुके थे । उसमें वादीने २७ प्रश्न भी किये थे; वादी उनमें कुछ महत्त्व समझता है । उसपर हम यहां लिख रहे हैं । बहुत बार प्रेरणापर भी वादीने उन वचनोंके पते नहीं भेजे । उसकी अन्य बातोंपर भी हम यहां लिखेंगे । चादीके प्रश्नोंको हम ब्रॅकेटमें लिखेंगे; आगे हमारा उत्तर होगा । १. प्रश्न ( शिवजीने राधा व पार्वतीने कृष्णावतार धारण किया ( महाभाग. ) इसका प्रत्युत्तर आलोक ' ' ( ७ ) पृ. १६६-१६८ में हमने दिया है । - २ ( श्रीकृष्ण पूर्वजन्मके नारायण ऋषि महान तपस्वी थे, उनका पेशा युद्ध करना था महाभा. उद्यो. ४६।२१ ) इसका प्रत्युत्तर ' आलोक ' ( ७ ) पू. ३०२-३०३ में तथा अन्यत्र देखो! स ० ध ० ५३ Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 436
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८३४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( e ) उक्त वचनमें इनको ' पूर्वदेव ' ( पहले मुख्यदेव विष्णुदेवता ) माना गया है । विष्णुपुरासमें वो यह स्पष्ट है । पापको नष्ट . कराने के लिए वे युद्ध कराते थे । अन्य शक्तिके पराधीन होकर अपने कर्म के फल ३ ( विष्णु ) । वादीका समाज भी भुगतनेको अवतार लेता है - देवीमागचच भगवान्को सर्वशक्तिमान् मानता है । सो वह भगवान् जब अपनी शक्तिसे कोई भारी काम करता है, वो भगवान् भी वादी के शक्तिके अधीन हुए, या नहीं? वही शक्ति दिव्य. अनुसार होनेसे उपाधिभेदवश ' देवी ' कही जाती है; और स्त्रीलिङ्गान्त होने से वह स्त्री रूप में चरित्र होती है । इसी शक्तिका अर्थवाद ' देवीभागवत ' है । शक्ति तथा शक्तिमान में वास्तविक भेद नहीं होता | जैसे कि शक्तिने स्वयं कहा है-' निर्गुणा दुर्गमा शक्ति, " निर्गुरश्च ततः पुमान् । ज्ञानगम्यौ मुनीनां तु भावनीयौ पुनः पुनः । अनादिनिधनौ विद्धि सदा प्रकृतिपूरुषौ ' ( देवी. ३।७११०-११ ) । या शक्तिः परमात्मासी योऽसौं ( परमात्मा ) सा परमा ( शक्ति ) मता ( १५ ) देवीने स्वयं अपना अभेद कहा है-= ‘ सदैकत्वं, न भेदोऽस्ति सर्वदैव ममाऽस्य च । योऽसौ सा s ह-महं योऽसौं भेदोऽस्ति मतिविभ्रमात् ' ( ३ | ६ | १ ) इससे भगवान् विष्णु या महादेव इनका तथा इनकी शक्तिका परस्परभेद मतिभ्रमसे माना गया है । ' ब्रह्माऽहं विष्णुरुद्रौ च ' ( ७/२३ । १३ ) यह भी देवीका वचन हैं. 1. अवतारवादपर श्रालोचना [ ८३५ भेदस्वरूपमें वादी ' तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य ( ऋ. ३/६२/१० ) में सविता ( प्रेरक देव ) का ध्यान न करके धीमहि प्रेरक देवके भर्ग ( शक्ति ) का ध्यान क्रिया करता है । भेदरूपा वह भी तो यह भी कहा जा सकता है कि- भगवान् भी शक्तिके ' निहत्थे ' हैं । भेदपक्षमें आप लोग भी ' भद्रकाल्यै नमः ' विद्र ( संस्का विश्व में भगवान्की शक्ति ' भद्रकाली ' को नमस्कार करते हैं । स्वा. द. जीने अपनी पञ्चमहायज्ञविधि ' तथा किया ही ( बलिवश्व. प्र. ३०८ ) में इसका परमात्मा की शक्ति ' ही अर्थ ऋमाभू. किया है । सो यह औपाधिक ही भेद हुआ करते हैं; वास्तविक नहीं । पर औपाधिकता बतानेकेलिए कभी भेदरूपसे भी कह दिय जाता है कि शक्ति बिना ' शिव ' ' शव ' हैं-‘ शिवोपि रावतां याति कुण्डलिन्या ( शक्त्या ) विवर्जितः | शक्तिहीनस्तु यः कश्चिद् असमर्थो मतो दुधैः ' ( देवी.. १ | १८ | ३१ ) इसलिए शक्तिके बिना विष्णुकी भी निन्दा कर दी जाती है । यही लक्ष्य करके श्रीविष्णुने भी कहा था- ' तस्मान्नाहं स्वतन्त्रोसि शकुत्यधीनोस्मि सर्वथा ' ( दे. १ । ४ । ६१ ) । यही वेदमें वाकूरूपा आदिशक्ति कहती है- ' यं कामये तमुत्रः कृणोमि, तं ब्रह्माण, तमृषि, तं सुमेधाम् ' ( ऋ. १० १२५ | ५ ) ( जिसे मैं चाहूँ- ब्रह्मा बनाऊँ, वा ऋषि बनाऊँ ) ' अहं रुद्राय धनुरातनोमि ' ( ६ ) AS ( मैं रुद्रको, भी धनुष देती हूँ । अहं सुवे पितरमस्य मूर्धेन, मम योनिरप्सु अन्तः समुद्र ( ७ ) इत्यादि । वही शक्ति, केनोपनिषद्की हैमवती दमा ( ३।१२ ) है, जिसके CC - 0. Ankur Joshi Collection - Guarat An eGangotri Initiative
पृष्ठ 437
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८३६ ] श्रीसनातनधर्मालांक ( 8 ) ८३ ९ महि कारणं देवताओंने विजय प्राप्त की थी । ४ ( अवतार विष्णुके व्यभिचारादिमें लगे शापोंके कारण मी रूप में दुःख उठानेको जन्म लेने पड़े थे - ( शिवपु. ) इसका प्रत्युत्तर बिन्त श्रालोक ' ( ७ ) २५३-२५८ ) में देखो । शाप आदि गौण कारण केवल निमित्त होते हैं । मुख्य कारण तो धर्मरक्षा, वा देवकायें, एवं भक्तोद्धार - ' यत् त्वा भीते रोदसी श्रह्वयेताम् । प्रावो देवान् नाभू श्रातिरो दासमोजः प्रजायै त्वस्यै यदशिक्ष इन्द्र! ' ( ऋ. १०१५४ ( १ ) किन तथा आतें हुई पृथ्वी की प्रार्थनासे पृथिवी से पाप तथा पापियोंका नहीं । भार उतार कर देवगरण - रक्षा, प्रजाको बल देना आदि होता है । दियर इसी वेदमन्त्रको आधारित करके वेदोंके विस्तीर्ण भाष्य पुराणने भी कहा है-नतः । " एवं युगे युगे विष्णुरवतारान् अनेकशः । करोति यर्मरक्षार्थं ' ३१ ) ( देवी. ४/२/२७ ) ' यदुवंशे समुत्पत्तिर्विष्णोरतुलतेजसः ।... क्षितिभार-है समुत्तारनिमित्तमिति मे मतिः ' ( ४ २० २-३ ) ' यथा दिव्यतनुर्विष्णुः मानुषेष्विह जायते ।... कतु ५ धर्मव्यवस्थां च जायते मानुषेष्विह ' ( पद्म.सृष्टि. १३।२४६-२४७ ) । इसी प्रकार ' भक्तोद्धार - परायणः ’ ये तं ( शिवं. रुद्रसं. सृष्टि. ४।४० - ४१ ) ' देवकार्यार्थमीश्वरः ' ( युद्धखं. ४०।२१ ) 212 ) इत्यादि बहुत स्थलों में भक्तोंके उद्धारार्थ वा देवोंके लाभकेलिए द्राय अवतार लेना कहा है, व्यभिचार के लिए नहीं । यह तो ' वादीकी बुद्धि ही ' व्यभिचारिणी है कि - कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं शक्त भगवान्पर ही दोष लगानेका साहस करती है । पद्मपुराण में ब्रह्माजी ने श्रीविष्णुको कहा था कि तुम्हें भली अवतारवादपर आलोचना [ ८३७ शाप कौन दे सकता है? यह कार्य तुम स्वयं कामना से कई निमित्त बनाकर लोकोंकी हित-लोकानां करते हो - ' दश जन्म मनुष्येषु हितकाम्यया । स्वयं कर्ता [ भवान् ] न ते शक्तः शापदानाय कोपि वा । कोऽयं भृगुः, कथं तेन शक्यं शप्तुं जनार्दन क्या वस्तु है, और वह तुम्हें! ( भृगु भला सकता हे विष्णु! भला शाप ही क्या दे है? ( सृष्टि. ४ | १०७-१०८ ) । ' महर्षीणां भृगुरहं ' ( गी. १०/२५ यहाँ भगवान्को ही भृगु कहा गया है, सो यह भगवान ) लोकोपकाराथै कोई निमित्त बना रहे थे । उनकी निजी स्वयं कोई भी नहीं थी । कामना ' ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्त्रमिवाम्भसा ' ( ४/१६ ) ' कर्मण्यभिप्रवृत्तोपि नैव किञ्चित् करोति सः ' ( ४/२० ), शारीरं केवलं कम कुवन् नाप्नोति किल्विषम् ' ( ४/२० ) ' न च मां तानि कर्माणि निघ्नन्ति धनञ्जय! ' ( हा ६ ) ' शुद्धमपापविद्धम् ' ( यजुः ४०१८ ) वह पापसे कभी विद्ध नहीं होता, इसलिए शुद्ध है ) ' अनश्नन् अन्यो अभिचाकशीति ' ( ऋ.१।१६४।२० ) ( कर्म करता हुआ भी वह उसका फल नहीं भोगता ) ' कुर्वन्नपि न लिप्यते ' ( गीता ५।७ ) ' हत्वापि स इमान् लोकान् न हन्ति न निवध्यते ' ( ८१७ ) ' कृत्वापि न निवध्यते ' ( ४/२२ ), ' सदा देवा अरेपसः ' ( पापफलरहिताः ) ( सामवेदसं. ऐन्द्रपर्व ४ | १० | ६ ); ' तद् इन्द्रो अमुच्यत, देवो हि सः ' ( शत. १/२/१/२ ) इत्यादि गीताके, तथा ' अहं विश्वेषु भुवनेष्वन्तः । श्रहं प्रजा अजनयं पृथिव्याम् अहं जनिभ्यो अपरीषु पुत्रान् ' ( ऋ. १०।१८३ । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat, An eGangotri Initiative
पृष्ठ 438
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६३८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( x ) वेदमन्त्रोंका मंनन यदि वादी किया करे, तो उसे ३ ) एतदादिक व्यभिचारके स्वप्नदोष कभी न हों । इस विषय में वेद - पुराणादिकें इतने प्रमाण दिये जा सकते हैं कि इस कुतर्कीका सिर ही चक्कर खा जाय, और मूक हो जाये । हमने दिङ्मात्र यह वचन दिये हैं । वादी पुराणपारायणके समय इन - जैसे बहुत वचनोंको जन-दृष्टिसे छिपाकर लोकवञ्चन करता है । ५ ( क ) ( विष्णु व्यभिचारको भावना पूरी करने को बार - बार जन्म लेते हैं ( शिंव. धर्मसं. ) इसपर ' आलोक ' ( ६ ) पृ. ५७०-५६३ देखो । शिवकी स्तुति करनेवाला पुराण होनेसे शिवपु: धर्मसं. में शिवकी महत्ता तथा अन्य देवकी निन्दारूप में गौणता बताई जा संकती है, यह सब देवोंके ' पुराणोंमें स्वाभाविक है । वहाँ निन्दार्थवादमें ' नहि ं निन्दा ' निन्द्य ं निन्दितुं प्रवर्तते, किन्तु निन्दिताद् इतरं प्रशंसितुम् ' यह ' मीमांसाप्रोक्त न्यायः चरितार्थ किया जाता है । इसका आदर्श उसी धर्मसंहिता के वचन में ही देखिये-" बालस्तु गोपकन्याभिर्वने क्रीडां चकार सः । दशलक्षाणि पुत्राणां गोपालानां ससर्ज हर इसमें पहले तो बच्चे श्रीकृष्णांंकी गोपबालाओं से क्रीड़ा बताई गई है । यह तो कुछ बुराईकी बात नहीं । ' छोटे बच्चे - बच्चियां आपसमें खेलते ही हैं । आगे जी दश लक्ष मोप - पुत्रोंका श्रीकृष्ण द्वारा सर्जन ( सृष्टि कर देना ) बताया है, यह वचन पूर्वार्धसे स्वतन्त्र है । यह सर्जन ( निर्माण ) ब्रह्मको सीधा करने के लिए था, जिसने परीक्षार्थं ग्वाल - वालोंको अवतारवादपर प्रालोचना 1 GRE हर लिया था । इस अभिनय में भगवान्ने ब्रह्माको सूचित था कि तुम इस अभिमान में न रहो कि मैं ही सृष्टिसर्जक किया पर मैंने तुम द्वारा गोपोंको छिपानेपर भी फिर उनका हूँ, ( सृष्टि ) कर दिया है । इसी बातको निन्दार्थवाद के लिए सद पद्यरूपमें संघटित कर दिया भी पुराणानुसार श्रीकृष्ण के शक्तियां थे; कुछ भिन्न नहीं, वादी वैदिक - भगवान्का यह ' अहं विश्वेषु भुवनेष्वन्तः । जनिभ्यो अपरीषु पुत्रान् ' अनुवाद वह धर्मसंहितामें उक्त गया । गोपबालाएं वा गोपाल यादि ही अंश होनेसे उसकी अपनी ही यह पुराणमें स्थान - स्थान स्पष्ट है । वचन सदाकेलिए याद रखे - कि-अहं प्रजा अजनयं पृथिव्या॑म् श्रहं ( ऋ. १०/१८३ | ३ ) इसी मन्त्रा भी समझ ले; तब वैदिक एवं पौराणिक भगवान्में अभेदवश व्यभिचारको आशङ्का ही व्यभिचारिणी सिद्ध होगई । रुक्मिणी आदि ८ रानियोंसे श्रीकृष्णके क्षत्रियवर्णकै य उपयुक्त विवाह हुए थे; फिर १६१०० स्त्रियोंसे भी श्रीकृष्णके उतने ही रूपों में विवाह हुए । सधा तो उनकी अपनी नित्यशक्ति थी, यह ब्रह्मवैवतं आदि में स्पष्ट है । यह सब भगवान्की स्वकीया थीं; इसपर ' आलोक ' ( ६ ) देखो; तव ' तथापि पर - नारीणां लम्पटो नित्यमेव हि ' यह कहना निन्दार्थवाद सिद्ध हुआ । ६ उसका तात्पर्यमात्र लिया जाता है । ' पर - नारीणां का श्रेष्ठ नारियां ' ' अर्थ है । ' पर ' ‘ श्रेष्ठः प्रसिद्ध है । जैसे कि परमात्माको परात्मा ' भी कहा जाता है । भगवान् की श्रेष्ठ शक्तियों को परा - शक्ति ' कहा ६ CC - 0. Ankur Joshi Collectors Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 439
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
1 श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) किया जाता है - ' पराऽस्य शक्तिर्विविधा च श्रयते ' ( श्वेता. ६ ( ८ ) यहां भगवान की बहुत - सी परा - शक्तियाँ बताई गई हैं । उन परा-सजेद शक्तियोंसे युक्त होनेका भाव ही ' परनारीलम्पट ' कहा जाता है । उक्त यो इसी वास्तविकताके होनेपर भी अथवादवश इस रूपमें भक्त यदि द्वारा उपालम्भरूपसे निन्दा भी कर दी जाती है । वस्तुतः तो वहाँ स्तुति ही लक्ष्य होती है । इसीको व्याजनिन्दा वा व्याजस्तुति है । अलङ्कार ' वा ' भक्तका अदभुत उपालम्भ ' कह दिया जाता है । -कि- शिशुपालवध ' में शिशुपालको श्रीकृष्णको दी हुई गालियों में भी कविने स्तुतिका अर्थ भी अन्तर्निहित रखा है । उसे वल्लभ-त्रका देवकी टीकामें स्पष्ट किया गया हैं । जैसे कि - ' सर्वगुणविरहितस्य हरेः परिपूजया कुरु - नरेन्द्र! को गुण: ' यहाँपर ऊपरसे निन्दा ही मूलकती है कि- ' यह श्रीकृष्ण सब गुणोंसे शून्य है, इसकी M पूजासे हे युधिष्ठिर! क्या लाभ है? पर ' निगु णो हि पुरुषः ' यह सिद्धान्त होनेस ' निर्गुण ब्रह्मकी पूजा नहीं हो सकती- यह एके विवक्षित होनेसे, वस्तुतः यहां श्रीकृष्णकी ब्रह्मता इष्ट होने से क्ति स्तुति है । इस प्रकारके वहां ३४ श्लोक हैं, यहांपर भी वैसे ही समझना चाहिये । ' नलचम्पू ' में राजा भीमकी स्त्रीने लड़की होने का वर देने-। वाले एक तापसकी व्याजसे निन्दा की है - कृत कुटीक कुशास्त्र-यां! ग्राहिन्! धीवर! ' इत्यादि वाक्य द्वारा बाहरसे तो यही थं मा कलकता है कि तुम कुत्सित ( खराब ) टीकाओं वाले कुल्सि ' ग्रहण करने वाले हो, और मलाह ( नाव चलाने वाले ) CC - 0. Ankur Joshi Collection अवतारवादपर ग्रालोचना | ८४१ हो ', परन्तु भीतरी रहस्य यह है कि तुम कृत - कु - टीक, तुम ( कु ) पृथिवी में भ्रमण ( टीकृ गतौ ) करने वाले हो; और तुम्हारे अस्त्र हैं, ब्राह्मण हो, धीवर, घी ( बुद्धि ) में वर श्रेष्ठ कुशा हो-इत्यादि । यह स्तुति अन्तर्निगूढ है । पर यह तत्त्व - रत्न श्रन्तः प्रवेश करने वाले गवेषकको मिलते हैं; क्योंकि वे भीतरी स्तरमें होते हैं; बाहर ही बाहर तैरने वालेको न तो उस समुद्रकी गम्भीरता ही ज्ञात होती है; और न रत्न ही उसे मिलते हैं । तब ऐसे लोग ' अशक्तास्तत्पदं गन्तु ' ततो निन्दां प्रकुर्वते ' गम्भीरता न जान सकनेसे अपने से अप्राप्य वस्तुकी निन्दा करते रहते हैं । अन्य भी यहां एक रहस्य है । वेद में कहा है- ' विष्णुर्यो-निं कल्पयंतु, त्वष्टा रूपाणि पिंशतु । आ सिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते ' ( ऋ. १०।१८४ | १ ) यहां विष्णुदेवको स्त्रीका गर्भे-स्थापन करने वाला तथा प्रजापतिरूपसे शुक्रसेचक और धाता-रूपसे गर्भधारक कहा है । इसी प्रकारका ' अहं विश्वेषु भुवने-ध्वन्तः [ गर्भं धारयामि ], अहं प्रजा अजनयं पृथिव्याम, अहं जनिभ्यो अपरीषु पुत्रान् ' ( ऋ. १०/१८३२३ ) यह वेदमन्त्र हम पहले भी दे चुके हैं । इसी के अनुवाद में पुराणमें भी यह जगत् भरकी स्त्रियोंका विष्णु द्वारा कार्य होनेसे उस श्रीकृष्णको ' तथापि परनारीणां लम्पटो नित्यमेव हि ' इस अर्थवादरूपसे कह दिया जाता है । इसमें श्रीकृष्णका भगवत्त्व तथा विष्णु-देवत्व होना व्यङ्ग्य है । पर अल्पश्रुत, साहित्यकलाविद्दीन ' साक्षात् प्रशुः पुच्छविषाणहीनः ' के उदाहरण इस. श्राक्षेप्ताको Grat: An eGangotri Initiative
पृष्ठ 440
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८४२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( E ) निन्दा के सिवाय क्या सूझे? इसने तो जनवञ्चन करके अपने पैसे खड़े करने हैं, अथवा अपने भ्रान्त समाजके गलत प्रचारको अनभिज्ञ समाजमें जहां - तहां पहुँचाना ही है । वास्तविक तात्पर्य रत्नको पाने की इसने कोशिश कहां करनी है? ५ ( ख ) वादीने ' शिवोपि पर्वते नित्यं कामिनी पाश - संयुतः ' यह पद्य देवीभा. ( १ | ११ ) के नामसे लिखा है, पर यह उक्त स्थलमें नहीं है. तभी तो उसने श्लोकसंख्या नहीं लिखी । ' एष स्त्रीलम्पटो देवो ' ( मत्स्य. - १५४ ( ३१ ) यह वादीसे दिया हुआ वचन पावेतो के क्रोधवश कहनेके कारण है । जैसे कि - ' उवाच क्रोधरक्नाक्षी भ्रुकुटीकुटिलानना ' ( १५४ ३ ) उसे ' काली ' कहनेके कारण क्रोधावेश आ गया था ( २० ) क्रोध के आवेशमें आकर पुरुषं वा स्त्री क्या गाली नहीं देते? देखो क्रोध के आवेशमें आये हुए स्वा.द.जीने भागवतादि - पुराणकारको स.प्र में कितनी गालियां दी हैं । उन्हें ' कसाई ' तक कहा है । उनका गर्भमें ही मर जाना मांगा है । सो क्रोधावेशमें आये हुएका गाली देना कुछ भी महत्व नहीं रखता, उल्टा उस क्रोधी की ही इसमें नासमझी समझी जाती है । वहां ' परस्त्री लम्पटो ' न कहकर ' स्त्री - लम्पट: ' कहा है । वहां पार्वतीका यह भाव भी नहीं था कि यह महादेव स्त्री- लम्पट हैं, क्योंकि उसके अतिरिक्त तो मत्स्यपुराणके उक्त स्थलमें कोई स्त्री महादेवकी बताई नहीं गई है । सो पार्वतीका भाव यह था कि- ' एष स्त्री लम्पटी देवों याताया मय्यनन्तरम् ' ( ३१ ) अर्थात् मेरे तपस्यार्थः जाने पर यह.. CC - 0. Ankur Joshi Collection प्रवतारवादपर आलोचना द देव कहीं स्त्री- लम्पट न हो जावे; इसकारण ऐ बच्चे ध्यान रखना कि कोई स्त्री यहां न आने पावे - ' वीरक! तुम कार्या " यथा न कापि विशेद् योषिद् द्वाररक्षा त्वया अत्र इरांन्तिकम् ' ( ३२ ) दृष्टा वरस्त्रियं चात्र वदेथा मम पुत्रक! ( ३३ ) ( कोई स्त्री इरके पास आवे; तो मुझे इतला देना ) सुन्दर इससे हरके पास किसी अन्य स्त्रीका होना मत्स्य प्रकरण में सूचित नहीं होता, हाँ, एक दैत्य आडी स्त्रीका के उस बनाकर वीरकसे छिपकर आया था । सो भी ' शङ्करने उसे रूप जानकर उसके अपराधी ग्रङ्गको ' मेटू ' वस्त्रास्त्रमादाय दानवं तम- I शातयत् ' ( १५५।३७ ) वज्ज्र से काट डाला - ' तं दानवं वस्त्रास्त्रम् आदाय मेढूळे अशातयत् ' पहले समय में जिसका अपराधी जो श्रङ्ग ह होता था, उसे काट डाला जाता था । जैसे कि शङ्ख - लिखितके क इतिहासमें हाथसे चोरी करने के कारण राजाने मुनिके हाथको य कंटवा डाला था । सो यहाँ भी दैत्य जिस अङ्गसे अपराध करने उ आया था, उसमे अङ्ग ( उपस्थ ) को वज्रसे काट डाला I गया । इससे हरकी ' वादी से अभिमत स्त्री लम्पटता प्रकाशित ग नहीं होती । यदि हर सचमुच ही स्त्री लम्पट होते; तो उस म सुन्दर - स्त्रीको पार्वतीकी अनुपस्थिति में विलासार्थ अपने यहाँ ल छिपाकर रख लेते; क्योंकि- ' ज्ञातास्वादो विवृतजघनां को विहा न समर्थ: ' पर यह तो ' वेधा द्वोघा भ्रमं चक्र कान्तासु कनकेषु च । तासु तेष्वप्यनासक्तः साक्षाद् भर्गो नराकृतिः ' नराकृति भी नहीं, किन्तु ' साक्षात् भर्ग ' हरः स्मरहरो भर्ग: ( अमरकोष ( १३३ ) Gujarat. An eGangotri Initiative