सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 491–500

सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 491–500

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४४ ] श्री सनातनधर्मालोक ( १ ) ऊचु: - हेअर, हेअर, हेअर - इति विवाहसंस्कारविधिः समाप्तः । २३ सु ० - यही तो शुद्ध वैदिकविवाह होगा । इस प्रकारका विवाहप्रवाह संसारका सार है । सन्तानकी उत्पत्ति तो रमणके आनन्द में विघ्न डालनेवाली होती है । उच्च यौवन में कन्या के विवाहकी हम लोगोंकी स्वीकृतिसे कौमार्यमें ब्रह्मचर्य के रहस्यका | मण्डाफोड़ कर देनेवाली होती है, जिससे पढ़नेवाली कुमारीको सब्ज में डूब जाना पड़ता है । इसलिए ' वूमनफ्रेण्ड ' का सेवन युवति लड़कियोंके लिए सर्वेथा हितकारक होता है । इस प्रकार करनेसे ही आयेजाति के अभ्युदयका उदय होगा । २३ घा ० - ठीक, बिल्कुल ठीक । शममें डूब मरनेके स्थान इस ढिठाईके समर्थनके उपलक्ष्य में आपको वधाई हो । अस्तु । अपनी अस्पृश्योंकी हितैषिताका आदर्श भी सुनिये । यह अछूत लोग अस्पृश्यता होनेपर धर्म में भी श्रद्धा रखते हैं, रामका नाम भी लेते हैं । चोटी भी रखते हैं । अपने - आपको ' सुधारक | माननेवाले आप लोग इसलिए उन्हें स्पृश्य बनाना चाहते हैं कि वे आपकी भांति धर्म में भी श्रद्धा खो बैठें । राम - नामका तेना भी छोड़ दें । चोटीको भी कटवा दें - यह आपका इन्हें स्पृश्यता देनेका आन्तरिक रहस्य है । २४ सु ० - पण्डित! यही तो वैदिकधर्म है । अस्तु । तुमने | अपना और हमारा अस्पृश्योंकी हितैषिता के विषय में तारतम्य प्रतिज्ञात करके भी नहीं दिखलाया । इससे मालूम होता है कि-तुम सनातनधर्मियों द्वारा अछूतोंकी हितैषिता के विषय में झूठ CC - 0. Ankur Joshi Collection साम्यवादविषयक संवाद. [ ९ ४५ बोलते हो । २४ घा ० - तब सावधान होकर सुनो । सनातनधर्मियोंने अतोंका गांवके बाहर निवास इस कारण रखा था कि वे सदा शुद्ध वायुको प्राप्त करें, क्योंकि सदा इन्हें मल - मूत्रके काममें लगे रहना पड़ता है, जैसे कि - शास्त्रोंका आदेश है कि ' चण्डाल-पचानां तु बहिर्ग्रामात् प्रतिश्रयः ' ( मनु. १०/५१ ) ' चण्डालः... कक्षे झल्लरीयुक्तो यतस्ततः चरन्, पूर्वाहे ग्रामादौ वीथ्यामन्यत्रापि मुलानि · अपकृष्य वहिरपोहयति ' ( वैखानसघर्मप्रश्न ३ । १४ । ७ ) । श्रशनसस्मृतिमें भी कहा है- मलापकर्षणं ' प्रामे पूर्वाह्न परि शुद्धिकम् ( ६ ) । प्राचीन ग्रन्थ नारदीयमनुस्मृतिमें भी कहा है-' गृहद्वाराऽशुचिस्थान रथ्यावस्करशोधनम् - गुह्याङ्ग · स्पर्शनोच्छिष्ट-विण्मूत्रग्रह्णोज्झनम् '. ( ५।५-६-७ ) इससे दुर्गन्धसे सने हुए यह लोग नगरोंके संकुचित, सूर्यकिरणोंसे असेवित घरों में न रहें । लेकिन आप लोग ही इनको नागरिक गृहोंमें रखना चाहते हैं कि यह इधर मल उठानेकी दुर्गन्धको अपने अन्दर रख रहे होते हैं, इधर शुद्ध वायुसे शून्य -नगरके घरोंमें रहें; जिससे इनका स्वास्थ्य नष्ट होवे; और इनका धन हमारे मित्र डाक्टरोंके खजाने में जाने । सनातनधर्मी जब अस्पृश्यको जिस मार्गसे, आता हुआ देखते हैं; उससे स्वयं ही एक ओर होकर उनकेलिए NT ANANT [ s ] S ar मार्ग छोड़ देते हैं कि यह विना कष्टके इघरसे चला जावे - यहु एक ओर होना घृणाके..कारण नहीं होता । हम किसी स्त्रीको लाते हुए देखते हैं, हम उसे न छूते हुए एक श्रोर हो जाते हैं कि - यहू स ० ध ० ६० San Gujarat. An eGangotri Initiative

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४६ | श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) इधर से अनायास चली जावे । इसमें क्या कोई हमारी उस स्त्रीसे घृणा मान सकता है? पर आप लोग तो उस अछूतवाले रास्तेसे ही श्राकर उन्हें टक्कर देकर उन्हें मार्ग लांघनेमें कष्ट देते हैं । ' हमने उनको अस्पृश्यता उनकी सन्तोष - वृत्तिके बढ़ाने के लिए दी थी; पर आप लोग ही उन्हें स्पृश्यतामात्र देकर उनकी उच्च आकाङ्क्षाएँ बढ़ाकर उनकी ' सर्विस ' की भूख बढ़ाते हैं कि-हमारी भांति यह लोग भी अफ़सरोंके घर - घर में चक्कर लगावें । उनसे ' नो विकेंसी ' शब्दसे निरस्त होकर ' इतो भ्रष्टास्ततो नष्टाः ', इस उक्तिके उदाहरण बनें । और आप लोग अछूतोंके विरोधी हमें इसलिए सिद्ध करते हैं कि इनकी हमारे साथ हाथापाई होवे, गुत्थमगुत्था लड़ाई होवे, जिससे मुकदमोंके लिए यह लोग कचहरियोंमें जजोंके दरवाजे खटखटायें, जिनसे इनका बचा हुआ धन भी इनके मित्र वकीलोंके घरोंमें जो प्रायः सुधारक होते हैं, और अर्जीनवीसोंके घरोंमें पहुँचे हाय हाय! आप लोग इन अछूतोंके कैसे शत्रु हैं!!!! २५ सु०— ( धार्मिककै प्रभावसे प्रभावित होकर ) पण्डित! तुम धन्य हो, दूरदेश हो । तुमने हमारी चालाकियां समझ लीं । तुम्हारा ज्ञान हमारे शरीर में रोमाञ्च पैदा कर रहा है । २५ धा ० — यही क्या? और सुनिये, आप लोग इनकी वृत्ति कैसे काटते हैं? हम देशी चमारोंसे बनायें हुए जूतोंको पहनते हैं; और आप लोग तो विलायती डासन बूटोंको पहनकर इनका पेट काटते हैं; आपके सुधारक चमड़े के बड़े - बड़े कारखाने, साम्यवादविषयक संवाद [ ६४७ EYE भल्ला बूट फैक्टरियां आदि खोलकर उनके बड़े - बड़े लाभांश स्वयं प्राप्त कर लेते हैं; शेष विदेशों में भेज देते हैं । हम भंगियोको मल उठानेके उपलक्ष्यमें वृत्ति देते हैं; पर आप लोग तो अपनी टट्टी भी आप उठाकर इनके घरोंमें कानी - कौडी भी जाने देना नहीं सहते । इमं सूर्यचन्द्र आदिके ग्रहण के अवसर पर इन लोगोंको गेहूँ - पैसे आदि दिया करते हैं, हर सनातनीके घर ATE गेहूँ मिल जानेसे इनके पास काफी गेहूँ इकट्ठी हो जाती है; ; परन्तु आप लोग तो इन अवसरोंमें ' यह पोपलीला है ' ऐसा अव प्रचार करके उनको अँगूठा दिखा दिया करते हैं । हमारे नम आदमी निम्न जातिवालोंसे बने हुए खिलौने अपने बच्चों के लिए शीत खरीदकर इस बहाने से उनकी आर्थिक सहायता कर दिया करते हैं, परन्तु आप लोग तो उनके खरीदने में अपनी बेइज्जती - सी मो मानते हुए इङ्गलैण्ड,: जर्मनी, जापान आदि विदेशोंके ही बने कि खिलौने खरीदकर अपना धन विदेशों में भेजा करते हैं । हम कुएँ का कीचड़ निम्न जातिवालोंसे निकलवाकर इस बहाने उन्हें वृत्ति देकर उनकी रक्षा करते हैं; और आप लोग . तो नल वर्तते हुए उन्हें कानी- कौड़ी भी नहीं देना चाहते । हम विवाहादिके समय — ' शूद्राणां मासिकं कार्यं द्विजोच्छिष्टं च भोजनम् ' ( मनु. ५।१४० ) ' उच्छिष्टमन्नं दातव्यं ' ( १०।१२५ ) इन मनुवचनोंके अनुसार उनकेलिए काफ़ी भोजन छोड़कर उनका घर अन्नसे भर देते हैं; पर आप लोग तो थोड़े खर्च करनेका बहाना बनाकर पहले तो वैसे भोज ही नहीं करते । यदि करते CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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४७ ४६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( e ) श भी हैं, तो जूठन बचानेकी बिल्कुल मनाही कर देते हैं । ' तब को उनं भंगियोंका पात्र खाली पत्तलोंसे ही भर जाता है । कैसे मी हितैषी हैं आप उनके? ना २६ सु ० – ठीक - ठीक । आपको ही मैंने ' हमारे गूढ इन । श्रभिप्रायोंको जाननेवाला देखा है । स्वा. द. जीके बनाये ग्रन्थकी तरह तुम ' सत्यार्थप्रकाश ' हो २६ धा०- - यही क्या, और भी सुनिये । शीतला आदिकें सा श्रवसर पर सनातनी घरोंसे इन्हीं भंगी आदियोंको ' मीठी वा रे नमकीन घी वाली रोटियां मिला करती हैं । आप लोग तो लिए शीतलों आदिको न मानकर इनको कुछ देते ही नहीं । ' पञ्च-रते महायज्ञके अवसर पर कौवे तथा कुत्तेकी बलिके साथ अपने मोजन से पहले चाण्डालों के लिए भी बलि रखी जाती है । जैसे ब कि- देखिये मनुस्मृति- ' शुनां च पतितानां च श्वपचा पापरोगिणाम्न वायसानां कृमीरणां च शनकैर्निर्वपेद् भुचि ( ३६२ ) । पर आपे इस लोग तो इन बातोंको पोपलीला बताकर उन रीतियोंको हटाने में ग द्द । कमर कसे हुए हैं ॥॥ निम्न जातिवालों से बनायें हुए, वस्तुओंको ऊँचा रखनेकेलिए च छीके, घरकी मट्टी साफ करनें वाले झाडू, कपड़ोंके टांगने के लिए ज़ खूटियां, कपड़ोंकें रखने के लिए टोकड़े, गेहूँ साफ करने के लिए का छोज, बैठनेकेलिए चटाइयों; रतिमें प्रकाश के लिए मट्टी के दीये, का और दीयोंको रखनेवाली लकड़ी की ' बनाई दीव, जलपानार्थं मैट्टी के घड़े, धान्य के चावल निकालने के लिए ऊखल- मूसल श्रादि CC - 0. Ankur Joshi Collection साम्यवादविषयकसंवाद | LAT वस्तुओंको खरीदकर हम उन लोगोंकी जीविका वनाये रखते हैं, पर आप लोगोंके घरमें तो इन वस्तुओंका होता है । होती हुई भी कई वस्तुएँ विलायती ही अत्यन्ताभाव जिससे इन निम्न जातिवालोंकी वनी होती हैं; जीविका न बन सके । इम इन निम्न जातिवालोंसे लाये हुए दातनोंको खरीदकर उनकी बनाते हैं, पर आप लोग तो विलायती ब्रुश तथा पेस्टोंको वृत्ति उनसे अपने दांत साफ करके इन लोगोंकी वृत्तिको लेकर हम शौच आदि होकर हाथ धोनेकेलिए काटते हैं । तथा घरमें लेप करनेके-लिए इन लोगोंसे लाई हुई चिकनी मट्टी लेकर इनकी वृत्ति बनाते हैं; पर आप लोग उसमें अपनी अप्रतिष्ठा सममकर हाथ धोने-केलिए साबुन, और जमीनकेलिए सीमेंट प्रयुक्त करके इनकी वृत्ति काटते हैं । हम विवाहादिके समय या अन्य समय में जुलाहोंसे चुने हुए खद्दरके कपड़े तथा कुम्हार लोगोंसे बनाई हुई वस्तुओंका प्रयोग करते हैं; पर आप लोग उसमें अवैदिकता बताकर उन वस्तुओंको लेते ही नहीं । बहुत कहनेसे क्या, हम खजूर के पत्ते तिनके- लकड़ियां, रस्सी आदि तककी वस्तुएँ इनसे खरीदकर अपने बैठने के आसन बनाकर इस बहानेसे इनकी वृत्ति बनाते हैं; पर आप लोग विदेशी चूल्हे आदि खरीदकर अपना धन विदेशों में भेजा करते हैं । इनसे बच्चोंकेलिए मट्टीकी बनाई ' दवातें, और सरकण्डेकी कलमें श्रादि खरीदकर इनकी वृत्ति बनाते हैं, पर आप लोग वे वस्तुएँ न खरीदकर विलायती Gujarat. An eGangotri Initiative ENT ANANT 3r ' S I ar San

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६५० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) फौन्टेन पेन आदि खरीदकर इन निम्न जातिवालोंकी वस्तुओंको घृणा - दृष्टिसे देखते हैं । इस तरह आप लोग ही इन निम्न-जातिवालोंकी वृत्ति वा पेट काटनेसे उनके शत्रु तथा उन्हें कष्ट देनेवाले बनते हैं; पर जब वे वृत्ति न प्राप्त करके ईसाई वा मुसलमान बनते हैं, तब आप लोग होहल्ला करते हैं, और कहते हैं कि इन्हें छुआ करो, इन्हें अपने साथ बैठाया करो; इन्हें देवमन्दिरोंमें प्रवेश करने दो । आवश्यकता होती है इन्हें वृत्ति की; और आप देते हैं इन्हें अन्य वस्तुएँ । इसलिए कि-सनातनधर्मियोंके छुआछूत एवं मन्दिरमें अप्रवेशके नियम टूटें । तब क्या देवमन्दिरोंमें इन्हें प्रवेश दे देने से इनकी वृत्ति वन जावेगी? २७ सु ० – पण्डितजी! आपकी दूरदर्शिताको देखकर बड़ा आश्चर्य सा होता है; पर हम उन अछूतोंके शत्रु हैं और उन्हें कष्ट देनेवाले हैं - यह तो आपकी बात घटती हुई नहीं दीखती । २७ घा०- अवश्य घटती है । क्या पूर्वके कहे हुए उदाहरण इस विषय में पर्याप्त नहीं हैं? अच्छा और देखिये- हमने उन लोगोंकेलिए कई असुविधाएँ इसलिए रखी थीं कि इनको कुछ दुःख मिले | दुःख मिलनेसे पूर्वजन्मका किया हुआ पाप - जिससे इन्हें कुत्सित जन्म प्राप्त हुआ क्षीण हो जावे । इस प्रकार इनका अग्रिम जन्म रमणीय ' वर्ण में हो; परन्तु आप लोग तो उनके शत्रु बने हुए रोगी को कड़वी दवाई न पिलाकर उसे मिठाइयां खिलाना चाहते हैं कि- जिससे रोगी टी.बी. का मरीज बन जाये । CC - 0. Ankur Joshi Collection साम्यवादविषयक संवाद [ ९ ५१ ६५२ अर्थात् इस जन्म में भी इन्हें सुविधाएँ देकर इनके पूर्वजन्मके करो अवशिष्ट पुण्यको भीं क्षीण करके अग्रिम जन्ममें इनकी सीधे का पशुजन्म में प्राप्ति चाहते हैं, जिससे यह सैकड़ों जन्मों तक बढ़व पुनर्जन्म में मनुष्ययोनि ही प्राप्त न कर सकें; क्योंकि - एक बार घर पुनर्जन्ममें पशु वनने पर फिर ८४ लाख पशुपक्षीयोनि आदिके तुम्ह भोगनेके बाद ही जाकर मनुष्ययोनि मिला करती है । हाथ खेद! आप लोग इन अछूतों के कैसे शत्रु हैं? नाइयोंकी वृत्तिको का काटकर आप लोग सेफ़टीरेजर ही खरीद लेते हैं, धोबियोंसे उनव कपड़े न धुलाकर विदेशी पाउडरों द्वारा ही स्वयं कपड़े घो लिया नज करते हैं । दूध - माखन आदि यहांकी बनी वस्तुएँ छोड़कर हैं । अहीरोंकी वृत्ति काटकर विलायती दूध, चाय- बिस्कुट केक अप आदिका प्रयोग कर लेते हैं । इस प्रकार आप उनके शत्रु हैं; हैं । बल्कि उनका अन्य भी खर्च बढ़वाने वाले हैं । । बचत २८ सु ० - हम अछूतों को कष्ट देने वाले कैसे हैं, और और उनका खर्च बढ़ानेवाले कैसे हैं? | हितै २८ धा ० - क्या पहलेके दिये उदाहरण आपको पर्याप्त नहीं न्याय मालूम हो रहे; जो अभी और सुनना चाहते हैं । तब सुनिये । साह हम अछूतोंसे छुए हुए उन्हें कष्ट न देकर सर्दी में भी स्वयं स्नान करते हैं; पर आप लोग स्वयं स्नान आदि कष्टों को न सहते हुए - चाहे. गर्मी हो, वा सर्दी - उन्हें आज्ञा देते हैं कि- श्राप लोग जिन टट्टी उठाने का काम खतम करके, फिर स्वयं स्नान करके खूब को साबुन लगाकर, सुफेद नये कपड़े पहनकर हमारे पास आया स्तुत्य Gujarat. An eGangotri Initiative

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६५२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) करो । इस प्रकार, आप उन लोगोंको कष्ट देते हैं; उनका साबुन-का खर्च भी बढ़ाते हैं, और सुफेद कपड़ोंके खरीदनेका खर्च भी बढ़वाते हैं । फिर आप उन लोगोंको आर्डर देते हैं कि अपने घर पूआ और हलवा आदि मीठा घृताक्त पाक बनाओ, हम तुम्हारे घर भोजनकेलिए आवेंगे । इस प्रकार उन्हें कानी कौड़ी तक भी न देकर स्वयं अपनी एक दिनकी घरकी रोटी का खर्च भी बचाकर सब धन उन्हींका खर्च कराते हैं । और उनके धन से अपने सुधारक मित्रों डाक्टर, प्लीडर, मैजिस्ट्र ेट, जन, पिटीशनराइटर, क्लाथ मरचेंट आदियोंका पेट भरवाते हैं । और अछूतोंके नामसे जनतासे लिये धनको सुन्दर रीतिसे अपने और अपने लोगों की पेटशालाका चन्दा वना दिया करते है । सो यह चालाकी की सकाष्ठा है । यदि उनके पास कुछ बचता भी है, तो उसे आप उनसे चन्दे के रूपमें लेकर उनका और भी कष्ट बढ़ाते हैं । फिर भी आप अपने - आपको उनका हितैषी सिद्ध करते हैं; और हमें उनका द्वेषी । सो यह विलक्षण न्याय है; और यह प्रशंसनीय अछूतोद्धार है । अब बतलाइये साहब! अस्पृश्योंका हितैषी कौन है, आप हैं वा हम? २६. सु ० - योग्य पण्डितः महोदय, आपने तो हमारे हृत्तल के अन्दर ही मानो प्रवेश करके हमसे सुगुप्त रूपमें रखे हुए-जिनका सर्व - साधारणको ज्ञान ही नहीं हो पाता ऐसे अभिप्रायों-को स्पष्ट प्रकट कर दिया है । प्रशंसनीय दूरदर्शी: आपकी बुद्धि ' स्तुत्य है; - परन्तु हम सुधारकम्मन्योंके मार्ग - दर्शक स्वा.द.जीने साम्यवादविषयकसंवाद [ ९ ५३ ही हमें अछूतोंसे सम्बन्ध करने का सबसे पूर्व मार्ग दिखलाया है । इसलिए हम उनके अनुयायी तथा उनके धर्म वाले होकर उनका मत अनुसरण करते हुए निन्दनीय नहीं हैं । २६ घा ० — ऐसा मत कद्दिये । स्वामीजीने तो ऐसा नहीं माना । वे तो छुआछूत मानने वाले थे । उनके इस विषय में बहुत उद्धरण हैं । इन बातोंको जानने केलिए आप ' श्रीसनातनधर्मालोक ' को खरीदिये, उसमें स्वामीजीके एतद्विषयक उद्धरणोंको देखिये । तथापि उनके कुछ थोड़े उद्धरण हम आपके सामने भी उपस्थित करते हैं । सावधानतासे सुनिये -३० सु ० - मैं सावधान हूँ । यदि स्वामीजीके उद्धरणोंमें छुवाछूतकी मर्यादा सिद्ध हो जावेगी; तो मैं सुधारकाभासताके कपट - पटको छोड़कर सच्चा सनातनधर्मी हो जाऊँगा । ४.३० धा - तब संक्षेपसे सुनिये । आप लोग अछूतोंके साथ सहभोज़में उनसे प्रेम हो जाना मानते हैं; पर वहाँ अपने स्वामीजीका उत्तर सुनिये - स्वा. द. जी के स्वा. सत्यानन्द - प्रणीत जीवनचरित्रमें लिखा है- ' एक थाल में भोजन पानेका जब विषय: चला तो सेठने कहा कि इससे प्रेम बढ़ता है । स्वामीजी ने कहा कि प्रेम यदि इकट्ठे होकर खानेसे बढ़ता है; तो यहां मुसलमान मिलकर खाते हैं; उनमें झगड़ा - बखेड़ा नहीं होना चाहिये । जव तुकोंपर रूसने, आक्रमण किया था; तो इकट्ठ मिलकर-: खानेवाले अफ़गानोंने मांगनेपर भी तुकोंको सहायता नहीं दी थी । फिर स्वामीजीने कहा कि मिलकर खानेसे कई ANANT 1 ar CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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६५४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) संक्रामक रोग लग जाते हैं । चिकित्साशास्त्र के अनुसार भी एक - दूसरेका जूठा खाना हानिकारक है ' ( श्रीमद्दयानन्दप्रकाश संगठनकाण्ड ३२८ पृष्ठ ) । आगे फिर देखिये - ' इसपर महाराज ( स्वा.द. ) ने कहा कि-इस प्रकार प्रीति बढ़ती हो, तो कुत्ते भी तो इकट्ठे खाते हैं, परन्तु खाते - खाते एक - दूसरेको काटने - नोचने लग जाते हैं - यह सुनकर वे दोनों ( उमीदखां और पारजी इब्राहीम ) अवाक् रह गये ' ( दयानन्दप्र: पृ. ३६२ ) । उसी पुस्तकके ४२५ पृष्ठमें कहा है- ' जोन्स महाशय ने कहा. आपका कथन ही ऐसा है कि इसपर कुछ कहते बन नहीं आता । जब आप इतने उदार और स्वतन्त्र विचार रखते हैं, तो छूताछूत क्यों मानते हैं? आपको हमारे साथ मिलकर - भोजन करनेमें क्यों नकार है? इसपर स्वामीजी बोले कि - किसी मनुष्य के साथ खाने - पीनेमें धर्माधर्म नहीं है । ऐसी सब रीत्तियां देश और जातिके आचार - व्यवहारके साथ सम्बन्ध नहीं रखती हैं । वास्तविक धर्मके साथ इसका कोई भी सम्बन्ध नहीं है; परन्तु सोच - विचार वाले सभी मनुष्य आवश्यकता के बिना अपने देश और जातिके नियमोंको नहीं तोड़ते । उसके प्रतिकूल आचरण नहीं करते । आप ही बताइये - क्या आप अपनी पुत्रीका विवाह किसी देशी ईसाईके साथ करनेको समुद्यत हैं? क्या ऐसा कर देनेसे आपको प्रसन्नता होगी? उस यूरोपीय महाशयंने कहा- हम ऐसा करने केलिए कभी भी समुद्यतांन होंगे । CC - 0. Ankur Joshi Collection ' साम्यवादविषयकसंवाद [ ९ ५५ १५६ ) स्वामीजीने पूछा- क्यों, धर्मविचारसे? उन्होंने उत्तर दिया- पर ज नहीं, अपनी जातिकी रीति - नीतिके कारण । तब महाराज समय ( दयानन्द ) ने कहा कि इसी प्रकार हम भी अपने देशबन्धुओ के सिद्धा नियम और व्यवहारके कारण आप लोगोंसे सहभोज नहीं भर करते । " भी सि यद्यपि यहां स्वामीजीने स्पृश्यास्पृश्यताका सम्बन्ध शास्त्र, केलि वा धर्मसे नहीं बताया; किन्तु जातीय रीति - नीतिके साथ ही आपक तथापि यहां कारण उनका अल्पश्रुतता मानना पड़ेगा । फिर भी संक्षेप इससे स्पृश्यास्पृश्यतामें तो स्वामीका पक्षपात स्पष्ट है । ३१ सु ० - स्वा. दानी के जीवन चरित्रकी पुस्तकें विश्वासयोग्य शरीर नहीं हैं । उनमें हमने बहुत - से अर्थवाद डाल दिये हैं, जिससे खावें अनजान लोग इस मतमें खिंच आवें । उनमें हमने तिनकेको नाम पहाड़ बना दिया है, बल्कि वह कहना चाहिये कि बिना नाम दीवार में चित्र खड़ा कर दिया है । प्रायः वहाँपर हमारी कपोल- म्लेच कल्पनाएँ ही हैं । उसमें ' यद्विवाहः तद्गीतगानम् ' यही हमने भोज अपनाया है । अपने मन्तव्य इसने उसमें युक्तिसे डाल दिये हैं । इसि आप उन्हें छोड़कर स्वा. द. जी प्रणीत ग्रन्थोंके ही प्रमाण तीच: दीजिये । ३१ धा ० — सम्भव है ऐसा ही हो । जहाँपर उसमें अपने ही वर्णोंव सिद्धान्त हों, वहां तो आप लोगों द्वारा की हुई प्रक्षिप्तता सिद्ध उत्तम हो सकती हैं । जहां अर्थवाद हों, वहां भी स्वामी की करके अतिशयित प्रशंसा साधारण जनों के श्राकर्षणार्थ हो सकती है; Gujarat. An eGangotri Initiative

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| १५६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) २५ FT- पर जहां उसमें स.ध. के सिद्धान्तोंकी छाया हो; वे अंश सच्चे ही ज समझने पड़ेंगे, क्योंकि कोई भी पुरुष अपनी पुस्तकमें दूसरोंके कि सिद्धान्त उत्तरपक्ष नहीं करता । जहाँ - तहां अपने ही सिद्धान्तों नहीं भर देता है । तथापि यदि वे दीखें; तब स्पष्ट होगा कि - वे उनके भी सिद्धान्त हैं । यदि आजकल स्वामी के अनुयायी उन्हें मानने स्त्र केलिए तैयार नहीं; तब यह उनका बहाना ही है । तथापि दी; आपके अनुरोधसे स्वा.द. जीसे बनाये पुस्तकोंके भी उद्धरण भी संक्षेपसे उपस्थापित किये जाते हैं । स.प्र. १० म समुल्लास में - ' मद्य मांसाहारी म्लेच्छ कि- जिनका ग्य शरीर मद्यमांस के परमाणुओं से ही पूरित है, उनके हाथका न से खावें ' ( पृ. १६७ ) मद्यमांसाहारी तो हिन्दु भी होते हैं; उनका नको नाम न लिखकर अथवा सामान्यरूपसे मद्यमांसाहारीमात्रका बना नाम न लिखकर विशेषरूप से म्लेच्छों का नाम लिखा है । स्वामी लं- ' म्लेच्छ ' शब्द से मुसलमान एवं ईसाईयोंको लेते हैं; इससे उनके मने भोजनका निषेध करके स्वामीने छुआछूतको प्रश्रय दिया है । हैं । इसलिए ब्राह्मणादि उत्तम वर्णोंके हाथका खाना, चाण्डालादि ए नीच भङ्गी चमार आदिका न खाना । क्योंकि - चाण्डालका शरीर दुर्गन्ध परमाणुओं से भरा हुआ होता है, वैसा ब्राह्मणांदि ही वर्णोंका नहीं ' ( स.प्र. १० पृ. १६६ ) यहां स्वामीने ब्राह्मणवर्ण उत्तम वर्णं माना है । भंगी - चमार आदिके भोजनका निषेध की करके स्वामीने यहां भी छुआछूतको प्रश्रय दिया है । है; ' आर्यों के घर में [ शूद्र ] जब रसोई बनावें, तब मुख बांधके CC - 0. Ankur Joshi Collection साम्यवादविषयक संवाद [ ७ बनावें, क्योंकि उनके मुखसे उच्छिष्ट और निकला हुआ श्वास भी अन्न न पढ़े ' ( स.प्र. १० पृ. १६६ ) यहां पर शूद्रके श्वासोंकी भी शुद्धता बताई गई है, चाण्डालादिके श्वासोंका तो क्या कईना? यदि साम्यवाद मनुष्यमात्रमें स्वामी को अभीष्ट होता; तबे वे‘ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यके श्वासोंको छोड़कर शुद्र आदियोंकें श्वासोंको ' ही निन्दित क्यों मानते? क्या यह साम्यवादका खण्डन नहीं है? ' वस्तुतः शुद्रका ' अन्न भी निषिद्ध होता है । जैसे कि – ' शूद्राणां यस्तथा मुते स भुङ्क्ते पृथिवीमलम् । पृथिवीमलमश्नेन्ति, ' यें ं द्विजाः शूद्रमोजिनः ' ( महा. अनुशा १३५।६ ) । इसका कारण यह हैं कि- ' असतो चा एष सम्भूतो ' येत् शूद्रः ' ( तै.ब्रा. श २३ ( E ) इस प्रकार स्वा.द.जीने अपने स्त्रैणता॑द्धितमें ' कंद्रुकमण्डल्वोश्छन्दसि ' ( १३२ सू. ) इस सूत्रके उदाहरणमें ' मास्म ' कमण्डलुं शूद्राय ' दद्यात् ' ( पृ. १२५ ) यह उदाहरण देकर शूद्रकी ' कमण्डलु न देना वैदिक ध्वनित किया है, इस " प्रकारकी उसकी अस्पृश्यता प्रकाशित की है । ३२- हाँ यह स्व. द. जीके शब्द, लेकिन हम लोग जव ANANTA 1 स्वा.दै.जीका ” वर्चन अपने विरुद्ध ' देखते हैं, तब उस वचनको नहीं मानते । सर्वं ' हर्म वेदं - प्रमाण ' माँगते हैं; क्योंकि वेद परमात्माका ज्ञान हैं । परन्तु हम उनमें मध्ययुगीन पौराणिक in भाष्योंको नहीं मानते, किन्तु स्वा दे. जी की ही भाष्य मानते हैं । आप उसीको ' सुनाइये । ' हमें आपकी मीमांसा ' सुनेनेसे बड़ा आनन्द आ रहा है । pri For Gujarat. An eGangotri Initiative

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६५८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) ३२ घा ० - यदि ऐसा है तो आप सुनिये! इसमें यजुर्वेदका ३० वां अध्याय और उसमें स्वा. द. जीका भाष्य देखिये । परन्तु मैं उसमें थोड़े उद्धरण देता हूँ- ' वायवे चाण्डालम् ' ( यजुः ३०/२१ ) यहां पर स्वा. द. जी संस्कृत - हिन्दी भाष्य में इस प्रकार कहते हैं-' वायुस्पर्शाय चाण्डालं परासुव । चाण्डालस्य शरीरागतो वायु-दुर्गन्धत्वाद् न सेवनीयः । वायुके स्पर्शके अर्थ भंगीको दूर कीजिये । भङ्गीके शरीरमेंसे आया वायु दुर्गन्धयुक्त होनेसे सेवने योग्य नहीं होता ' । कितनी स्पष्टता है यहां । यहां ' चाण्डालका ' भंगी ' अर्थ करके स्वामीने उस शारीरिक वायुका सेवन भी निषिद्ध कर दिया है, उसका स्पर्श करना तो कहां रहा? अन्य मन्त्र सुनिये - ' बीभत्सायै पौल्कसम् ' ( यजुः ३०/१७ ) यहां स्वा.द.जीका भाष्य इस प्रकार है- ' भर्त्सनाय प्रवृत्तं पुक्कसस्य-अन्त्यजस्य अपत्यं परासुव । हे राजन्! धमकाने के लिए प्रवृत्त हुए भङ्गीके पुत्रको पृथक् कीजिये ' । यहां वे आर्यसमाजी श्रुत-बन्धु आदि अवश्य ही ध्यान रखें; जो हिन्दुसमाज के धमकाने में प्रवृत्त डा. अम्वेदकर अन्त्यज वा उसके लड़के को अपनी लड़की भी देनेकेलिए उन दिनों तैयार हो गये थे । जो मनुस्मृति आदि धार्मिक ग्रन्थोंको जलानेवाले भी अन्त्यजोंका. सनातनधर्मी त्राह्मणोंसे भी अधिक सम्मान करते हैं । एक अन्य मन्त्र भी देखिये- ' अन्तकाय श्वनिनं ' ( यजुः ३० / ७ ) यहां स्वा.दु.जीका भावार्थ इस प्रकार है- ' हिंसक तथा कुत्तोंके पालनेवाले चाण्डालादिको दूर बसावें ' कितने स्पष्ट शब्द हैं? यह CC - 0. Ankur Joshi Collection साम्यवादविषयक संवाद [ ९ ५ ε εξ शब्द ' चण्डाल - श्वपचानां तु वहिर्ग्रामात् प्रतिश्रयः । पपात्रांच कर्तव्या घनमेषां श्वगर्देभम् ' ( १०/५१ ) इस मनुपद्यके मूल हैं । इस प्रकार संक्षेपसे स्वा.द.जीकी सम्मति बताई गई है । बा व्यवहार कुत्ते पालना आदि हिन्दु बाबू भी करते हैं, आर्यसमाजी लड़के भी सनातनधर्मियोंको धमकाया करते हैं, उनको दूर स्व करनेकेलिए न कहकर अन्त्यजोंको दूर करनेकेलिए कहना भ ' स्वा. द. जीके वैदिक मत अनुसार उन्हें छुवाछूत माननेवाला 1. बता रहा है । वेद केवल संकेतमात्र ही देता है, वह हिन्दुधर्मके इस मुख्य अङ्ग चोटी जनेऊ के भी संकेतमात्र कहता है, स्पष्टता नहीं करता; पर यहां अन्त्यजोंकी शारीरिक वायुका भी सेवन गु स्पष्टतया निषिद्ध कर. देनेसे ' छुआछूत वैदिक है ' यह बात बड़े धड़ल्ले से सिद्ध हो रही है । अब सुधारकजी! आप इस पर कुछ बोलिये । * ३३ सु ० – सम्मान्य पण्डितजी! आपसे दिये हुए प्रमाणोंको देखकर तो मैं बड़े आश्वयसागर में निमग्न हो गया हूँ । हम लोग उस कभी वेदादिको तो देखते ही नहीं; पर जो अपनी बात सिद्ध करनी हो; उसे नाममात्र से ' वैदिक ' कहना तो हम लोगोंका तकिया कलाम है; इसी से हम अनुसन्धान न करनेवाली जनताकी वा आंखों में धूल झोंकने में सफलता प्राप्त कर लिया करते हैं; चाहे. वेदमें उसका गन्ध न भी हो । अस्तु! मैंने वेदादियों तथा स्मृतियोंका अपमान करके जो पाप किया है, उसके प्रायश्चित्तार्थ प्रस्तुत हूँ । और मैं वैश्य दुकानदार हूँ, ब्राह्मणं नहीं हूँ । Gujarat. An eGangotri Thitiative

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६६० / श्रीसनातनधर्मालोक ( T ) | दुकानदारी में मेहनत देखकर, और इस ब्राह्मण बननेकी लाईन में अनायास ही पेटपूर्ति देखकर इस मार्गेमें आ पड़ा हूँ । हम जैसे बातूनी व्याख्यानमात्रकी अथवा दलीलबाजी की अपनी सामर्थ्य देखकर अपने आपको 5 ब्राह्मण प्रसिद्ध कर लिया करते हैं । हम स्वयं तो ब्राह्मण बनना चाहते हैं; पर सनातनधर्मी ब्राह्मणोंको भरपेट गालियां निकाला करते हैं । 7. वास्तव में मुझ सुधारकाभासने दूसरे सुधारकाभासोंकी भांति इस जन्ममें बहुत पाप किये हैं । स्वराज्य के लिए किये जाते हुए नान्दोलनोंमें हमसे ही आगे की हुई कुमारियों वा खियों को गुप्तरूपसे अपनाया है । अछूतोद्धार के बहानेसे इकट्ठी की हुई धृनकी थैलियोंको भी तरीके से अपनी पेटशालाका चन्दा बना दिया है, जनताके विश्वासार्थं बाहरी हिंसा - मात्र दिखला दिया जाता है । मैं सनातनधर्मियोंसे ही धन लेकर सनातनधर्मका ही बोर - खण्डन करता रहा, और स.ध. के विरुद्ध कार्योंमें ही उस घनके अंशका विनियोग करता रहा । दानकर्ता सनातनधर्मी सेठोंके ही धनसे अपने शरीरको पुष्ट करके उनके पूर्वजोंको ही कोसता रहा? उन्हीं के धनसे उनके धर्मके विरुद्ध - शिक्षा देने--वाले विद्यालय, अनाथालय, गुरुकुल और कई श्राश्रम खोलें । विधवाओंके रक्षण के बहाने सनातनधर्मियोंसे ही धन लेकर विधवाश्रमोंको बनाकर विधवाओं को ही वेश्यात्वकी दीक्षासे दीक्षित किया, और उनसे स्वयं भी आनन्द लूटा, और दूसरोंको भी उसका अंश दिया । सनातनधर्मियोंको ही कई आन्दोलनोंमें CC - 0. Ankur Joshi Collection साम्यवादविषयकसंवाद [ ९ ६१ उत्साहित करके उनकी सहायतासे मलकानाओं की शुद्धि आदिमें भाग लेकर और सफलता प्राप्त करके अपनी बिल्डिंगें खड़ी कर लीं, और उनका नाममात्र भी भूलकर भी कभी नहीं लिया । सनातनधर्मियोंके ही वोट लेकर राजकीय संसदों में मिनिस्टरी आदि प्राप्त करके सम्मान और धन कमाया; और उन्हींके विरुद्ध बिल पेश किये और पास कराये । सुधारके बहानेसे प्रायः हमने सर्वत्र संहार ही किया, प्राचीनताको हटवाकर अर्वाचीनता जारी की । अपना और अपने सहवर्गियोंका कितना रहस्य खोलूँ । मैं तो अब पश्चाताप करता हूँ । इसमें शास्त्रीय प्रायश्चित्त करनेको प्रस्तुत हूँ । अव अपने वके अनुकूल कर्मोंको करूँगा । ' सिग्रेट ' पीना छोड़कर सच्चा हवन करूँगा । कुत्तोंकी सेवा छोड़कर गौओंकी सेवा करूँगा । पैन्ट आदि पहनावा छोड़कर घोती आदि प्राचीन वेष रखूँगा । पाश्चात्य भाषाके साहित्यका शौक छोड़कर अब प्राच्य - शास्त्रोंका पारायण करूंगा । मैंने जो कुछ भी आपको कठोर कहा हो; उस सबको ANANT 1 अच्छे स्वभाव वाले आप महानुभाव मुझे क्षमा कर दीजियेगा ( यह कहकर वह सुधारक धार्मिक - परितके पांवमें गिर जाता हैं ) । ३३ धा०- ०- ( पांवपर पड़े सुधारकको उठाकर मैं सब क्षमा करता हूँ । इसी आपकी प्रतिज्ञासे कि आप आगेसे शास्त्रीय व्यवहार करेंगे - मैं आपके सभी दोषोंको क्षमा करता हूँ । अब आप जानें कि - साम्यवाद किसी भी शास्त्रको इष्ट नहीं है । यदि स ०६० ६१ Gujarat. An eGangotri Initiative

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६२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) कम्यूनिज्म के प्रवाह में पड़कर हमने उसे अपना लिया; तो हम भारतीयधर्मकों खो बैठेंगे, फिर पेट पालना और धन कमाना यही हमारा काम रह जावेगा । ऐसा करनेसे प्रजा निहत्थी हो जावेगी | यदि कोई अन्य देश इमपर आक्रमण करके इमसे हमारा देश छीन लेगा, तो प्रजाके धन छिन जानेसे प्रजा उस विदेशी राजाका कभी विरोध वा मुकाबला न कर सकेगी । हमारे धर्म में जो धनी थे, वे धार्मिक थे । वे पर्याप्त धन कमाकर भी उसीके बलसे विद्यालय खुलवाते थे, विद्वानोंको वृत्ति देते थें । संस्कृतका प्रचार बना रहता था । साम्यवादके प्रचार किये जानेसे यह सब ख़तम हो रहा है, और हो जावेगा । यह भारतको कम्युनिज्मके जंजीरोंमें बाँधना होगा; और कम्युनिस्ट चीन आदि देशको यहाँपर आधिपत्य के लिए निमन्त्रण देना होगा; और भारतको नास्तिक बनानेका उपक्रम होगा । पृथक - पृथक् जातियोंके जो - जों पृथक् - पृथक् जन्म - सिद्धू व्यवहार शास्त्रोंमें बताये गये हैं; वे ही आचरण के योग्य हैं । सर्व गुड - गोबर करना ठीक होगा । भगवद्गीता कहती -'तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ' ( १६।२४ ) ‘ यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । न स सिद्धिमवा-प्नोति न सुखं न परां गतिम् ' ( १६।२३ ) ( शास्त्रविधिका उत्सर्ग और स्वेच्छानुसार ' व्यवहार सुख - शान्तिका कारण नहीं हुआ करता ) । तब स्पष्ट हैं कि - भगवद्गीताको तथा अन्य शास्त्रोंको कभी साम्यवाद वा छुआछूत तोड़ना इष्ट नहीं है । मनुस्मृति CC - 0. Ankur Joshi Collection साम्यवादविषयक सवाद [ ६६३ ९ ६४ कहती है- ' श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिष्ठन् हि मानवः । इह कीर्ति-वाप्नोति प्रेत्य चानुत्तमं सुखम् ' ( २६ ) ( श्रुति स्मृति से कहे करू हुए धर्मको करता हुआ मानव इद्दलोक एवं परलोकमें अतिशयित इसम सुख प्राप्त कर लिया करता है ) । तब महाशय! आप ' श्रेयान् स्वधर्मो विगुणोऽपरधर्मात् शाख स्वनुष्ठितात् ' ( गौता ३ | ३५ ) ' वरं स्वधर्मो विगुणो न पारक्यः स्वनुष्ठितः ' ( मनु. १०।६७ ) ( अपना अपना वर्णाश्रमधर्म विगुण होता हुआ भी दूसरेके अच्छे धर्मसे भी अच्छा होता है ) । लाल ‘ आत्मीये संस्थितो धर्मे शूद्रोपि स्वर्गमश्नुते ' ( अन्निसंहिता १८ ) ( अपने धर्ममें रहनेवाला शूद्र भी स्वर्गमें जाता है ) इस सिद्धान्तका द्दी सुधारकम्मन्योंमें उपदेश करके उन्हें सन्मार्ग में ले आएं । यद्यपि यद्द हुम ब्राह्मणोंका कर्तव्य है; तथापि वे हमारे वचनोंको सुननेकेलिए भी तैयार नहीं । आपको वे अपना सहवर्गी समझकर आपके ब अवश्य श्रद्धा करेंगे । 1 इसलिए आप इन होलीके दिनोंमें उन्हें इस प्रकार प्रेरणा दें कि वे शास्त्रविरुद्ध अपनी चेष्टाओंका और नये - नये शास्त्रविरुद्ध आचारोंका इस होलीमें दहन कर दें; जिससे हिन्दुसमाजमें अशान्तिका साम्राज्य न होने पावे, और वर्तमान अव्यवस्था दूर हो जावे, और हिन्दुजातिका स्वरूप विरूप न हो जावे; और वह पद - पदमें विपद्को प्राप्त न करे - यह कहकर अब इम अपने कथनको और विस्तीर्णे न करते हुए रुकते हैं । ३४ सुधारक - ऐसा ही होगा; आपके इस आदेशका पालन jarat. An eGangotri Initiative