सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 61–70

सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 61–70

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31 ६२ ] श्रीमनातनधर्मालोक ( ६ ) हास्वर वस्तुतः यह सब कल्पनायें निरी निकम्मी वा निःसार हैं । फिर मनुष्योंने रीछका कौनसा चेहरा लगाया था? शरीर पर दशहरी रोम कैसे लगाये थे? क्या वे रीछकी भांति चलते थे? ग्रन्थकार की होते? स्वाभाविक लिखी हुई देवतावतारमूलक वानरता इनकी छिप या नहीं सकती, चाहे अर्वाचीन लोग लाख वल लगा लें! आशा है-विद्वान् पाठकोंने यह रहस्य समझ लिया होगा । इससे उन खलाफ लोगोंकी यह बात भी कट गई कि - ' आज भी वालिद्वीप सुमाट्रा वा आस्ट्रेलिया के कई मनुष्य मिलते, जावा, ) श्र जैसा मांस - पिण्ड लगा हुआ हैं, जिनकी पूँछ-विकत है ' पर वे ' वानर ' नहीं कहे जाते । " न ही उनमें ' उच्छ्रितलांगूलाः, कर्णौ निकुच्य ' वाली रामायणप्रोक्त वन्दा बात घटती है । ( जैसा ( ६४ ) बाल्मी. में तारा लक्ष्मणको कहती है - ' कृतात्र संस्था - हनूम सौमित्रे! सुग्रीवेण यथा पुरा । अद्य तैर्वानरैः सर्वैरागन्तव्यं महाबलैः ' ( कि. ३५२१ ) ऋक्ष ( रीछ ) कोटिसहस्राणि गोलाङ्गूल-हवा ( लंगूर ) शतानि च । कोट्योऽनेकास्तु काकुत्स्थ कपीनां ( बन्दर कती दीप्ततेजसाम् । अद्य त्वामुपयास्यन्ति जहि कोपमरिन्दम ) ! ' ( २२ ) हनुमार यहाँ हजारों रीछ, लंगूर, बन्दर युद्धार्थ आवेंगे । यह सभी पशु उसे हूँ । मनुष्योंकी रीछ वा लंगूर एवं बन्दर जाति नहीं सुनी गई । है एक दयानन्दी टीकाकारका इसके अनुवाद में ' ऋक्ष जातिके नहीं निवासी, गोलांगूल जातिके वनवासी, वनवासियोंके अनेक ५३ मूह आपके साथ जायेंगे ' यह अर्थ करना गलत है । जहाँ भी पाशानर ' शब्द आता है, वादी वहाँ ' वनवासी मनुष्य ' अर्थ कर CC - 0. Ankur Joshi हनुमानादि वानर नर थे? [ Collection Gujarat. देता है - यह उसका निर्मूल पक्ष है । यहाँ ऋक्ष, गोलांगुल तथा कपिके साथ ' वानर ' शब्द ही नहीं है, तो वाढीने यहां बनावटसे ‘ वनवासी ' यह निर्मूल अर्थ कैसे कर दिया? इन लोगोंको ऐसा असत्य व्यवहार करते हुए पापका डर भी नहीं रहता । खेद!!! ' वैक्लव्यं मम तावदीदृशमिदं स्नेहाद-रण्यौकसः, पीड्यन्ते गृहिणः कथं नु तनयाविश्लेषदुःखैर्नवैः ' शकुन्तलानाटकके ४ र्थाङ्कके इस उत्तम पद्यमें कण्वमुनिंने कहा हैं कि मैं वनवासी, अपनी लड़की के पतिगृहमें जा रही होनेपर दुःखी हो रहा हूँ, तब गृहस्थी लोग क्यों न दुःखी होते होंगे ' । यहांपर मुनिको ' यौका: ' ( वनवासी ) तो कहा गया है; पर उस मुनिको वानर वा कपि नहीं कहा गया है । इसी प्रकार किरातार्जुनीयमें एक ' वनेचर ' को जिसने युधिष्ठिरको दुर्योधनकी रिपोर्ट दी थी, कहीं भी वानर नहीं कहा गया । इस प्रकार बहुत - सी प्राचीन पुस्तकों में आटविक, वनेचर, आरण्यक आदि शब्दोंसे वनवासियोंका बहुत वर्णन श्राया है । रघुवंश आदि काव्योंमें रघुका मूल सेना, श्राटविकोंकी सेना श्रादिका वर्णन तो बहुत आया हैं, पर यह याद रखनेकी बात है कि उन्हें कहीं भी वानर वा कपि आदि नहीं कहा गया । अतः रामायणके वानरोंको ' वनवासी मनुष्य ' बताना वादियोंकी बनावट है, निर्मूल कल्पना है । श्रीरामकेलिए ' वनगोचरः ' ( ६।११३।६ ) आदि शब्द तो आये हैं; पर उन्हें ' वानर ' नहीं माना गया; तब वादियोंका यह निर्मूल प्रयत्न है । An eGangotri Initiative

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६४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) ' हरिपुङ्गवा: ' ( वाल्मी. ४ | ३७ | ४ ) ' प्लवङ्गमाः ' ( ५ ) ' वानराः ' ( ६ ) ' महेन्द्र - हिमव विन्ध्यकैलासशिखरेषु च । मन्दरे पाण्डु-शिखरे पञ्चशैलेषु ये स्थिताः ' ( २ ) ' पर्वतेषु समुद्रान्ते पश्चिमायां तु ये दिशि ' ( ३ ) अब्जने पर्वते चैव ' ( ५ ) महाशैलगुहावासाः ' ( ६ ) वनेषु च सुरम्येषु... तापसानां च रम्येषु वनान्तेषु समन्ततः ' ( ८ ) ताँस्तान् समानय क्षिप्रं पृथिव्यां सर्ववानरान् ' ( ६ ) यहां विविध पहाड़ोंकी चोटियों, गुफाओं, समुद्री तटोंके रहनेवाले वानरोंको भी दयानन्दी टीकाकार बलात् ' वनवासी मनुष्य ' लिखता गया है, यह सारी उसकी निर्मूल कल्पना है । इस प्रकार योरोपियन स्कालरोंके पदचिन्हों पर चलनेवाले सुधारकों का पक्ष काटकर हमने हनुमानादिको देवावतार ( अप्राकृत, दिव्य ) वानर सिद्ध कर दिया है । इस पक्ष में रामायणके वचनोंमें कुछ भी असङ्गति वा प्रक्षिप्तता नहीं पड़ती है । जिस पुस्तकका जो अभिप्राय हो; उसे आप मानें या न मानें - यह आपकी इच्छा पर अवलम्बित है, पर उसके वचनोंकी तोड़ - मोड़ द्वारा ग्रन्थकारके तात्पर्यको बदलना - अत्यन्त अनुचित है, चोर - बाजारी है । ( ६४ ) हनुमानकी पूजाके बिषयमें यह जानना चाहिए कि-वे मरुतोंके अवतार हैं, जैसेकि हम पहले कह चुके हैं; और मरुतोंको रुद्रका अवतार माना जाता है, जैसे कि वेदमें - ' विद्मा हि रुद्रियाणां शुष्ममुग्र ं मरुतां ' ( ऋसं. ८२० ३ ) ' रुद्रस्य ये मीदुषः सन्ति पुत्राः ' ( ६।६६।३ ) यहाँ मरुत् देवता हैं । सो रुद्रके अवतार CC - 0. Ankur Joshi Collection हनुमानादि वानर नर थे? स होनेसे ही मारुति - हनुमान्की हिन्दुओं में पूजा होती हैं, नि चन होनेसे नहीं । पूज इसमें शिव - विष्णुका परस्पर अभेद वा प्रेम भी झलकता । जिससे साम्प्रदायिक कलह दूर हों । जब भगवान्, राम ‘ रामेश्वरलिङ्ग’को समुद्र पार करनेकेलिए पूजा था; तो वि सम अवतार श्रीरामने तो अपनी शिवभक्ति दिखलाने के लिए इ अस पदका तत्पुरुषसमासका विग्रह किया था कि - ' रामस्य यह शिवः ' यह महादेव रामके ईश्वर हैं, राम उनका सेवक है । वा पर भगवान् शिवने उक्त पदका बहुव्रीहि समासका विग्रह ि वर द था कि - ' राम ईश्वरो यस्य ' राम शिवके ईश्वर हैं, और शि नैषधी सेवक हैं । परन्तु हरि - हरके भक्तोंने उक्त पदका कर्मधारय यह विग्रह किया था - ' रामश्चासौ ईश्वरश्च ' राम और शिव दोर ( देवां एक - कोटिके हैं । इस प्रकार अभेदवादको प्रोत्साहन दिया ग देवांश था । भेदवादियोंने ' रामेश्वरम् ' का समाहारद्वन्द्वका विग्रह किय देवता था- ' रामश्च ईश्वरश्च तयोः समाहारो रामेश्वरम् ' । ' ईश्व मनुष्य महादेवका प्रसिद्ध नाम है, इस प्रकार रुद्र हनुमान के रूप पाठक । कथन विष्णुके सेवक हुए । विष्णुके अवतार राम - कृष्णने शिव की पूर्व र दि करके ( जैसा कि महाभारत आदिमें प्रसिद्ध है ) अपनेको शिवर शु - प सेवक बताया है । कहीं शिव विष्णुके मोहिनी रूप में विष्णुर्वी माया में मोहित हुए, और कहीं विष्णु शिवकी माया ( देखो शिवपुराण ) मोहित हुए । इस प्रकार पुराणोंका मी Gujarat. An eGan पुत्तिम अभिप्राय हरि - हरके अभेद में हैं, साम्प्रदायिक कलहॉर्स

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६६ ] श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) सृष्टि में नहीं । कलह अज्ञानियोंमें होता है । कहनेका निष्कर्ष है कि - हनुमान की मरुदवतार तथा यह पूजा होती हैं, बन्दर होनेसे नहीं रुद्रावतार होनेसे ही । हाँ, बन्दरोंका हनुमान के कता अङ्ग समझकर कहीं - कहीं सम्मान होता है । अस्तु । वराम अव हम ' पशु - पक्षियोंके भाषण ' पर लिखेंगे । थोड़ी विष्णु - समझके लोग पशु - पक्षियोंका भाषण लिखा देखकर उसमें लिए दूर असम्भव समझते हुए उन्हें मनुष्य सिद्ध करने लग जाते हैं-य ई यह ठीक नहीं । रघुवंशमें महाकवि कालिदासने वक है । वाणी दिखलाई है; और नन्दिनी गायकी भी शेर की मनुष्य-नह वर देने की बात लिखी है । नलकी कथा महाभारत मनुष्यवाणी में नैषधीयचरितमें में तथा रशि हंस पक्षीकी मनुष्यवाक् लिखी हैं, पर इससे धारक यह सब मनुष्य नहीं सिद्ध हो जाते हैं, किन्तु यह सब दिव्य व दोनं ( देवांश ) थे; जैसे कि - नैषधचरितमें दमयन्तीने हंसको देवतासि ' हंसोप दया ग वन्द्यः, श्रीवत्सलक्ष्मेव हि मत्स्यमृर्तिः ' ( ३।५७ ) वह किय " देवताका अंश कहा है, अतः इन वातोंको न समझकर उनको ' मनुष्य बनानेकी कल्पना करनी वस्तुतः निर्मूल है । आशा है-के रूपों ठकगण स्वयं भी इन बातों का मनन करेंगे, केवल सुधारकोंके कर न पर विश्वासमात्र न कर लिया करेंगे । हमने मार्गप्रदर्शन दिया है । पाठकों ठीक - ठीक समझ लिया शिवक होगा । अब " शु - पक्षियोंके भाषण पर देखिये ।-विष्णुकी माया का कलहॉकी CC - 0. Ankur Joshi Collectic Gujarat. ( ३ ) पशु - पक्षियोंका भाषण । पहले तो वादी लोग हनुमान आदि वानरों और जटायु आदि गीधों को पशु - पक्षी योनिवाले नहीं मानते; जव रामायण-आदि बाह्य और आभ्यन्तर प्रमाणसे हम उन्हें पशु - पक्षी सिद्ध करते हैं, जैसा कि हम गत निबन्धमें कर चुके हैं, और उन्हें निरुत्तर करते हैं, तब और कोई उपाय न रह जानेसे वे वहां चुप हो जाते हैं; फिर खण्डनका अन्य प्रकार लेते हैं कि - ' यदि यह मनुष्य नहीं थे, किन्तु पशु - पक्षी थे; तब यह. मनुष्यकी तरह व्यक्त वाणीसे बोल कैसे सके? इस प्रकार पुराणोल्लिखित पशु - पक्षियोंके संवाद में भी सङ्गति जाननी चाहिये कि - यह मनुष्य थे, पशु - पक्षी नहीं; क्योंकि - पशु - पक्षियोंका भाषण असम्भव है । वानर हनुमान् भला व्याकरणका विद्वान् कैसे हो सकता है? इन पुराणोंके असत्यवक्ता होनेसे वे प्रमाण नहीं । ' इस पर हम विचार करते हैं । थोड़ी देरकेलिए मान भी लिया जाये कि -पुराणोंमें पशु - पक्षियोंका भाषण असम्भव है; तव यहां क्या दोष हुआ? क्या पञ्चतन्त्र आदिमें पशु - पक्षियोंके भाषणके बहाने कथाएँ नहीं बताई गई? क्या उन्हें कोई दोष-जनक मानता है? क्या उनसे शिक्षा नहीं मिलती? इस प्रकार पुराण - इतिहास में भी पशु - पक्षियोंके संवादोंसे शिक्षा ही मिलती है कि - यदि पशु - पक्षी भी ऐसे संवाद करते हैं, तब मनुष्य भी वैसा क्यों व कुरों जैसे कि- ' वनस्पतयः सत्रमासत ' ' सर्पाः सत्रमासत ' To T

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६ ६४ ] श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) हनुमानादि वानर नर थे? ' हरिपुङ्गवा: ' ( वाल्मी. ४ | ३७ | ४ ) प्लवङ्गमाः ' ( ५ ) ' वानराः ' ( ६ ) ' महेन्द्र - हिमवद्द्विन्ध्यकैलासशिखरेषु च । मन्दरे पाण्डु-शिखरे पञ्चशैलेषु ये स्थिताः ' ( २ ) ' पर्वतेषु समुद्रान्ते पश्चिमायां तु ये दिशि ' ( ३ ) अब्जने पर्वते चैव ' ( ५ ) महाशैलगुहावासाः ’ ( ६ ) वनेषु च सुरम्येषु... तापसानां च रम्येषु वनान्तेषु समन्ततः ' ( ८ ) ताँस्तान् समानय क्षिप्रं पृथिव्यां सर्ववानरान् ' ( ६ ) यहां विविध पहाड़ोंकी चोटियों, गुफाओं, समुद्री तटोंके रहनेवाले वानरोंको भी दयानन्दी टीकाकार बलात् ' वनवासी मनुष्य ' लिखता गया है, यह सारी उसकी निर्मूल कल्पना है । इस प्रकार योरोपियन स्कालरोंके पदचिन्हों पर चलनेवाले सुधारकोंका पक्ष काटकर हमने हनुमानादिको देवावतार ( अप्राकृत, दिव्य ) वानर सिद्ध कर दिया है । इस पक्षमें रामायणके वचनोंमें कुछ भी असङ्गति वा प्रक्षिप्तता नहीं पड़ती हैं । जिस पुस्तकका जो अभिप्राय हो; उसे आप मानें या न मानें- यह आपकी इच्छापर अवलम्बित है, पर उसके वचनोंकी तोड़ - मोड़ द्वारा ग्रन्थकारके तात्पर्यको बदलना - अत्यन्त अनुचित है, चोर - बाजारी है । ( ६४ ) हनुमानकी पूजाके विषयमें यह जानना चाहिए कि-वे मरुतोंके अवतार हैं, जैसेकि हम पहले कह चुके हैं; और मरुतोंको रुद्रका अवतार माना जाता है, जैसे कि वेदमें- ' विद्मा हि रुद्रियाणां शुष्ममुग्र ं मरुतां ' ( ऋसं. ८/२०१३ ) ' रुद्रस्य ये मीदुषः सन्ति पुत्राः ' ( ६।६६।३ ) यहाँ मरुत् देवता हैं । सो रुद्रके अवतार CC - 0. Ankur Joshi Collection सृा होनेसे ही मारुति - हनुमान्की हिन्दुओंमें पूजा होती है, नि होनेसे नहीं । पूज इसमें शिव - विष्णुका परस्पर अभेद वा प्रेम भी झलकता जिससे साम्प्रदायिक कलह दूर हों । जब भगवान् राम ‘ रामेश्वरलिङ्ग’को समुद्र पार करने के लिए पूजा था, तो विष सम अवतार श्रीरामने तो अपनी शिवभक्ति दिखलाने के लिए इसे अस पदका तत्पुरुषसमासका विग्रह किया था कि- ' राम शिवः ' यह महादेव रामके ईश्वर हैं, राम उनका सेवक है वाण पर भगवान् शिवने उक्त पदका बहुव्रीहि समासका विग्रह किय वर था कि - ' राम ईश्वरो यस्य ' राम शिव के ईश्वर हैं, और शि नैषधी सेवक हैं । परन्तु हरि - हरके भक्तोंने उक्त पदका कर्मधारयः यह र विग्रह किया था - ‘ रामश्चासौ ईश्वरश्व ' राम और शिव दो ( देवां एक - कोटिके हैं । इस प्रकार अभेदवादको प्रोत्साहन दिया ग देवांश था । भेदवादियोंने ' रामेश्वरम् ' का समाहारद्वन्द्वका विग्रह किया देवता था - ' रामश्च ईश्वरश्च तयोः समाहारो रामेश्वरम् ' । ' ईश्वर मनुष्य ' महादेवका प्रसिद्ध नाम है, इस प्रकार रुद्र हनुमान के रूप पाठक विष्णुके सेवक हुए । विष्णु के अवतार राम - कृष्णने शिवकी पूर्व कथन करके ( जैसा कि महाभारत आदिमें प्रसिद्ध है ) अपनेको शिवक दि सेवक बताया है । कहीं शिव विष्णुके मोहिनीरूप में विष्णुर्व शु - पि माया में मोहित हुए, और कहीं विष्णु शिवकी मायामें ( देखो शिवपुराण ) मोहित हुए । इस प्रकार पुराणोंका भी अन्तिम अभिप्राय हरि - हरके अभेदमें हैं, साम्प्रदायिक कलहों की Gujarat. An eGangotri Initiative

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६६ ] सृष्टिमें नहीं २ निष्कर्ष है कि पूजा होती हैं, लकता! अङ्ग समझकर राम अव हम विष्णु समझ के लोग श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) । कलह् ज्ञानियोंमें होता है । कहनेका यह हनुमान की मरुवतार तथा रुद्रावतार होनेसे ही बन्दर होनेसे नहीं । हाँ, बन्दरोंका हनुमानके कहीं - कहीं सम्मान होता है । अस्तु । ' पशु - पक्षियोंके भाषण ' पर लिखेंगे । थोड़ी पशु - पक्षियोंका भाषण लिखा देखकर लिए इ असम्भव समझते हुए उन्हें मनुष्य सिद्ध करने लग जाते उसमें हैं-य ईश्व यह ठीक नहीं । रघुवंशमें महाकवि कालिदासने शेरकी वक है वाणी दिखलाई हैं; और नन्दिनी गायकी भी मनुष्यवाणी मनुष्य-ह वर देने की बात लिखी है । नलकी कथा महाभारतमें में तथा र कि नैषधीयचरितमें हंस पक्षी की मनुष्यवाक् लिखी हैं, पर इससे चाय यह सब मनुष्य नहीं सिद्ध हो जाते हैं, किन्तु यह सब दिव्य दो ( देवांश ) थे; जैसे कि - नैषधचरितमें दमयन्तीने " देवांशतयासि वन्द्यः, श्रीवत्सलक्ष्मेव हंसको ' इंसोपि या ग " देवताका अंश हि मत्स्यमृर्तिः ' ( ३।५७ ) ह किया कहा है, अतः इन बातोंको न समझकर उनको " ईश्व बनाने की कल्पना करनी वस्तुतः निर्मूल हैं । आशा है-रूपा कर स्वयं भी इन बातोंका मनन करेंगे, केवल सुधारकोंके की पू कथन पर विश्वासमात्र न कर लिया करेंगे । हमने मार्गप्रदर्शन शिवक र दिया है । पाठकोंने ठीक - ठीक समझ लिया होगा यु - पक्षियोंके भाषण पर देखिये ।- । अब विष्णुवी मायामें का भी लहों की CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. ( ३ ) पशु - पक्षियोंका भाषण । पहले तो वादी लोग हनुमान आदि वानरों और जटायु आदि गीधों को पशु - पक्षी योनिवाले नहीं मानते; जब रामायण-यदि बाह्य और आभ्यन्तर प्रमाणोंसे हम उन्हें पशु - पक्षी सिद्ध करते हैं, उन्हें निरुत्तर वे वहां चुप हो कि- ' यदि यह मनुष्यकी तरह पुराणोल्लिखित चाहिये कि यह जैसा कि हम गत निबन्धमें कर चुके हैं, और करते हैं, तब और कोई उपाय न रह जानेसे जाते हैं; फिर खण्डनका अन्य प्रकार लेते हैं मनुष्य नहीं थे, किन्तु पशु - पक्षी थे; तव यह व्यक्त वाणी से बोल कैंसे सके? इस प्रकार पशु - पक्षियोंके संवाद में भी सङ्गति जाननी मनुष्य थे, पशु - पक्षी नहीं; क्योंकि - पशु - पक्षियोंका भाषण असम्भव है । वानर हनुमान् भला व्याकरणका विद्वान् कैसे हो सकता है? इन पुराणोंके असत्यवक्ता होनेसे वे प्रमाण नहीं । ' इस पर हम विचार करते हैं । थोड़ी देरकेलिए मान भी लिया जाये कि - पुराणों में पशु - पक्षियोंका भाषण असम्भव है; तब यहां क्या दोष हुआ? क्या पञ्चतन्त्र आदिमें पशु - पक्षियोंके भाषणके बहाने कथाएँ नहीं बताई गई? क्या उन्हें कोई दोष-जनक मानता है? क्या उनसे शिक्षा नहीं मिलती? इस प्रकार पुराण - इतिहास में भी पशु - पक्षियोंके संवादोंसे शिक्षा ही मिलती है कि - यदि पशु - पक्षी भी ऐसे संवाद करते हैं, तब मनुष्य भी वैसा क्यों कुछ? जैसे कि- ' वनस्पतयः सत्रमासत ' ' सर्पाः सत्रमासत ' To So

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६८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) यहाँपर कृष्णयजुर्वेदादिमें चित्तवर्जित भी वनस्पतियोंका यज्ञ कहा गया है । यह मीमांसादर्शनमें वर्णित है । और देखिये- ' पिप्पल्यः समवदन्त आयतीर्जननाद् अधि । यं जीवम् अश्नवाम है, न स रिष्याति [ हिंस्यते ] पूरुषः ' ( अथर्वशौ. सं. ६।१०६।२ ) यहांपर वादियोंके अनुसार अचेतन भी पिप्पली नामक श्रोषधिका संवाद ( बातचीत ) वेदमें भी दिखलाया गया है, तब चेतन अङ्गद आदि वानर तथा जटायु आदि पक्षियोंके इतिहासवर्णित संवादमें क्या विवाद? ' श्रोषधयः समवदन्त सोमेन सह राज्ञा । यस्मै॑ कृणोति ब्राह्मणः, तं राजन्! पारयामसि ' ( यजु. माध्यं, १२२६६ ) ( ओषधियाँ अपने राजा सोमको कहती हैं कि - ऐ राजा! ब्राह्मण वैद्य हम ओषधियोंका जिसकेलिए प्रयोग करता है, हम उसे रोगोंसे परे कर देती हैं ) यहां भी वादियोंके अनुसार अचेतन भी प्रोषधियोंका अपने राजा सोमके साथ संवाद दिखलाया गया है । यहां इनका यदि अभिमानि - देवता स्वीकार किया जाता है; तब हिमालय पर्वत आदियोंके संवादमें भी तथा उनकी पुत्री पार्वती आदिकी उत्पत्तिमें भी अभिमानी देवताका स्वीकार कर लेना चाहिये । यदि ऐसा है, तब चेतन पशु - पक्षियोंके भाषण में थोड़ा भी संशय न रहा । आगे देखिये - ' भूमिरघिब्रवीतु मे ' ( अथर्व. १२/२/५६ ) यहां वादियोंके अनुसार अचेतन भी पृथिवीका भाषण दिखलाया गया है । ' ब्रवीतु ' में ' व् व्यक्तायां वाचि ' धातु है । यदि ऐसा CC - 0. Ankur Joshi Collection पशु - पक्षियोंका भाषण १० हैं, तो चेतन पशु - पक्षियोंका पुराणस्थित संवाद ( भार ( क व्यभिचरित कैसे हो सकता है? ' ग्रावा यत्र वदति ' । हैं; २०।२५।६ ) इस लौकिक - व्यवहारमें अचेतन ग्रावा फूल भी बोलना बताया है । ' वर्षे व्यक्तायां वाचि ' । इस पत्थ कृष्णयजुर्वेद में शृणोत ' ग्रावाणः ' ( कृ.य.तै.सं. १११ । १३ ॥ ‘ श्रोता ग्रावाणः ' ( शु.य.माध्यं. ६ २६ ) यहां पर पत्थरोंकी वेद शक्ति दिखाई गई है । यह इसका संकेत महाभाष्य ( ३ | १/७ के सूत्र के भाष्य ) श्री सूचित किया है । वहां पर ' कूलं पिपतिषति ' पर प्रश्न भाव यदि इच्छा अर्थमें सन् होता है; तो यहांपर सन् नहीं वैचि सकता; क्योंकि – किनारेके अचेतन होनेसे उसमें इच्छा वनी वैचिन बन सकती । तब आशङ्कायां ' सन् वक्तव्य: ' इस बात आशङ्का अर्थमें सन माना गया कि - किनारेके गिरनेकी था दिति " तदस है । पर फिर वही बात भी रखी गई कि यहां पर भी इच्छा वेदने ही सन् किया जाय । तब प्रश्न उपस्थित होता है कि होता अचेतन होनेसे उसमें गिरनेकी इच्छा कैसे हो सकती अतः इस पर नया बार्तिक आया कि - ' सर्वस्य वा चेतनावर सम्भव ( अर्थात् सांसारिक सभी पदार्थ चेतना वाले ( चेतन ) होते गावे इस पर भाष्यकार उदाहरण कहते हैं - अथवा सर्वं चेतना दार्थो एवं हि आह - कंसकाः सर्पन्ति, शिरीषोऽयं स्वपिति, सुखात्मा आदित्यमनुपर्येति ' | आस्कन्द कपिलक इत्युक्त तृणमास्कन्द क अयस्कान्तमणिम् अयः संक्रामति । ऋषिः पठति - शृणोत ग्रा Gujarat. An eGangotri Initiative

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१०० ] श्री सनातनधर्मालोक ( ६ ) ( कृ.य.तै.सं. १ | ३ | १३ | १ ) अर्थात् इस संसार में सभी वस्तुएँ चेतन ' त ' हैं; तभी कहा जाता है - यह सिरसका वृक्ष सो रहा है, सूर्यमुखी फूल सूर्यके सामने रहता है - आदि । तभी वेदने कहा है-इस पत्थरो! सुनो ' । तव लोक - दृष्टि में अचेतन कहे जाते हुए भी पत्थर आदि रॉकी वेदकी दृष्टिमें चेतन कहे हैं । तभी तो पत्थर घटते - बढ़ते रहते हैं । यह महाभाष्यकारका आशय है । इसी बातको ' प्रदीप ' कार श्रीकैयटने भी स्पष्ट किया है- ' सर्वस्य वेति - आत्माद्वै तदर्शनेनेति T ष्य ) दे भावः । ऋषिरिति । वेदः सर्वभावानां चैतन्यं प्रतिपादयतीत्यर्थः है । वैचित्र्येण च पदार्थानामुपलम्भात् सर्वचेतनधर्मः सर्वत्र नोभा-नू नहीं वनीयः ' । इसीकी स्पष्टता उद्योतकार श्रीनागेशभट्टने की है-इच्छा वैचित्र्येणेति । चेतनेषु मनुष्येष्वपि नानाजातीय - व्यवहारदर्शना-सवा " दिति भावः । सर्वत्र परिणामदर्शनेन चेतनाधिष्ठानं विना च की था ". तदसत्त्वात् सर्वस्य तदधिष्ठितत्वं ज्ञायते - इति तात्पर्यम् । ( अर्थात् इच्छा वेदने सभी पदार्थों को चेतन कहा है; क्योंकि -आत्मा सर्वव्यापक कि कि होता है । और फिर सब पदार्थ विचित्रतासे मिले हुए होते सकती. हैं; " अतः सब चेतनोंके धर्म आपसमें एक - जैसे मिल जावें - यह तनाव " सम्भव नहीं । चेतन- मनुष्यों में भी किसी को सर्वाङ्ग में लकवा हो न ) हो; न वह हिल सकता है और न ही बोल सकता है । सब र्च चेतनादार्थों में परिणाम ( परिवर्तन ) दीखता है, अतः सभी पदार्थ त, सुगत्माधिष्ठित हैं । ) मास्क कई लोग आत्माको सर्वव्यापक मानकर भी जिसमें चित्त गोत ग्रा CC - 0. Ankur Joshi पशु - पक्षियोंका भाषण [ १०१ नहीं होता; उसे अचेतन कहते हैं; और चित्तवालोंको चेतन मानते हैं, पर ' तच्च ( मनः ) प्रत्यात्म नियतत्वाद् अनन्तम आत्माके साथ मन ( चित्त ) भी अवश्य ' ( तर्कसं. ) होता है । हाँ, कहीं वह अभिव्यक्त होता है, कहीं अनभिव्यक्त । यही चेतन - अचेतनका व्यावहारिक भेद है; पर होते सभी चेतन हैं । महाभाष्यके उक्त उद्धरण में सबको ' चेतनावत् ' कहा है-' चेतनवत् ' नहीं कहा । जोकि - ' दुष्कृतं चरकाचार्यम् " नामक निबन्धमें उसके लेखकने पृ. ६ की टिप्पणी में लिखा है- ' वस्तुतः ' अभिमानी देवता ' की कल्पना भी अर्वाचीन श्राचार्यों द्वारा सृष्ट हुई है । प्राचीन आचार्य ' अचेतनेषु चेतनावत् ' अर्थात् अचेतनमें चेतनवद् व्यवहार औपचारिक ( गौरा ) मानते थे, इसी नियमस्रे ही ‘ शृणोत प्रावाणः ' आदि वैदिक वाक्योंका सामञ्जस्य उपपन्न हो जाता है । उसके लिए अभिमानी देवताकी कल्पनाकी कोई आवश्यकता भी नहीं है ' । यह उक्त लेखककी बात ठीक नहीं है । यह कथन महाभाष्यस्य उक्त वार्तिकके आधारसे प्रवृत्त प्रतीत होता है । परन्तु उसमें ' चेतनावत् ' है, ' चेतनवत् ' नहीं; और यहाँ मतुप् प्रत्यय है, वति नहीं । मतुप्के ' म ' को ' मादुपधायाश्च ' ( पा. ८ ) से ' व ' हुआ हुआ है । अतः यहाँ भाव यह है कि - सभी जड़ - चेतन कहे जानेवाले पदार्थ चेतनावत् अर्थात् चेतनावाले ( चेतन ) हैं, उनमें चेतना हुआ करती है । जब ऐसा है; तब अभिमानी देवताकी सिद्धि स्वतः वैदिक हो जाती है । उसी कारण सभी पदार्थ लोकदृष्टिमें जड़ कहे जाते Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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१०२ ] श्रीमनातनधर्मालोक ( १ ) हुए भी चेतन सिद्ध हुए । हाँ, कहीं चेतना अभिव्यक्त होती है, कहीं अनभिव्यक्त । मनुष्य में भी जब सब अङ्गोंमें लकवा हो जाता है, तो वह हिल नहीं सकता, चल नहीं सकता, बोल नहीं सकता, तब क्या वह मनुष्य अचेतन कहा जायगा कभी नहीं! वर्तमान विज्ञान भी अचेतन कही जाती हुई वस्तुओंकी चेतनताकी पुष्टि करता है । इस विषय में आलोक ' ' ( ५ ) देखना चाहिये । इस प्रकार जब पत्थरमें भी सुननेकी शक्ति दिखलाई गई है, तब पशु - पक्षियोंके बोलनेमें क्या आश्चर्य? परमात्माकी विलक्षण महिमासे इसमें भी असम्भव कुछ नहीं । पशु - पक्षियों में कोई भाषा तो अवश्य है, जिससे वे आपसमें व्यवहार करते हैं, इसमें तो किसी भी संशयालुको नकार नहीं हो सकता, इसमें वैज्ञानिकोंकी गवेषणा भी है । एक अँग्रेजने वनमें रहते हुए बहुतसे बन्दरोंको अपना विश्वासी बना लिया । तब उसने उनके सभी तरहके शब्दों का ग्रामोफोन-यन्त्रमें रिकार्ड कर लिया । जब वही रिकार्ड की हुई आवाज उसने अन्य बन्दरोंको सुनाई; उससे वे कभी प्रसन्न, कभी दुःखी, और कभी हैरान हो जाते थे । इस प्रकार उस अँजने बहुत वार अनुभव करके उनकी भाषाका ज्ञान ठीक - ठीक कर लिया । इससे सिद्ध हुआ कि पशु एवं पक्षियोंकी भी भाषा अवश्य है, हम - उसे नहीं जान सकते. यह अन्य बात है । क्या हम पहले अंग्रेजी वा रवी वा जर्मनी वा फ्रांसीसी भाषाओंको सीखनेसे पूर्व जानते थे? केवल हमारी भाषाका जानकार अमेरिका CC - 0. Ankur Joshi Collection पशु - पक्षियोका भाषण [ १०१ १० आदि देशोंमें जाबे, क्या वह वहाँ वालों और इति हमारी भाषाको जान सकेंगे? यदि नहीं; तब क्या वे सभी कैस मनुष्य नहीं, अथवा हम मनुष्य नहीं? में इस प्रकार जब हमारी भी भिन्न - भिन्न भाषा है; तब यदि पर पशु - पक्षियोंकी भी हमसे भिन्न भाषा है; और हम उसे जान शक्त नहीं सकते; तो इसमें आश्चर्य क्या? इससे उनकी भाषा से सिख सिद्ध हो ही गई । जैसे एक अंग्रेजने अपनी निपुणताये वोल बन्दरोंकी भाषाका ज्ञान कर लिया, इस प्रकार यदि हमारे पूर्व कर मुनियोंने भी ' यद् दुस्तरं ' यद् दुरापं यद् दुर्गं यच्च दुष्करम् । सर्वं तत् तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम् ' ( मनु. ११/२३८ ) युवा ( जो भी कठिनतासे प्राप्त होने योग्य, दुर्लभ वा दुष्कर पदार्थ है । खुद वे सब तपस्यासे सिद्ध हो जाते हैं, तपस्याकी शक्तिका उल्लंघन चार नहीं किया जा सकता ) इस अलौकिक अपनी तपस्या - शक्तित्रे ज्ञानर दिव्य अथवा आरूढपतित पशु - पक्षियोंकी भाषा जानकर उनकी अव्य बातचीतका अनुवाद करके उन्हें पुराणादिमें लिखा हो; और पी श्रीराम - जैसे दिव्य अवतारने उनके अाशयको जानकर उनसे " वेशिष्ट युद्ध आदिका काम ले लिया हो, तब इसमें असम्भव क्या रहा | सखल इसीलिए ही तो योगदर्शन के विभूतिपादमें कहा है- ' शब्दार्थ | जा प्रत्ययानामितरेतराध्यासात् संकरः, तत्प्रविभागसंयमात् सर्वभूतनम रुतज्ञानम् ' ( १७ ) इस सूत्र में कही हुई यौगिक प्रक्रिया द्वारा सा षरण प्राणियों के शब्द का ज्ञान हो जाना कहा है । ष्ट व अब केवल एक ही प्रश्न वचता है कि - ' पशुपक्षियोंका पुरा Gujarat. An eGangotri Initiative

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१०१ १०४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) इतिहासमें मनुष्यकी तरह बोलना भी आया है, उसकी सङ्गति व सभी कैसे है '? यहाँ भी दूरदर्शिता की आवश्यकता है कि पशु - पक्षियों-में ऐसा विकास नहीं है कि वे हमारी तरह स्वतन्त्र होकर बोलें; यदि पर उनमें चाहे थोड़ी क्यों न हो, पर मनुष्यकी तरह भाषण-से जान | शक्ति है अवश्य । यदि मनुष्योंको भी जन्मसे वर्णात्मक शब्द न षा तो सिखलाये जाएँ; तब वे भी पशु - पक्षियोंकी भांति अव्यक्त ही वारे वोलें । विना सिखाये जन्मसे वर्णात्मक शब्दका प्रयोग वे भी न रे पृथ्व कर सकें । इसमें मनुष्योंके बच्चे ही उदाहरण बन सकते हैं । करम् । भेड़ियोंकी मांदोंसे प्राप्त हुए मनुष्य बालकोंमें जो चाहे ब १ ( २३८ ) युवा भी हो चुके हैं, यह देखा गया है । वे शिक्षकके वगैर न तो दार्थ है । खुद पैरोंके बल ठहर सके, न चल सके, किन्तु पशुओंकी भांति उल्लंघर चार पावोंसे चलते थे । वे शिक्षित मनुष्यकी तरह स्वाभाविक - शक्ति ज्ञानसे स्पष्टतासे नहीं बोल सकते थे, किन्तु ' हुँ- हुम् ' आदि उनकी अव्यक्त ही बोलते थे । हाथोंसे कुछ भोजन लेकर नहीं खाते, T; और 1 किन्तु , मुंहसे ही लेकर उसे खाते थे । और पानी भी पशुकी तरह ही पीते थे । इससे स्पष्ट है कि - मनुष्य - वालकोंमें भी जो कुछ उनसे वैशिष्ट बोलना - चालना आदि व्यवहार प्राप्त होता है; वह रहा सखलाने से ही होता है । स्वतः नहीं । यह पहले कई मुसलमान शब्दार्थ- राजा ] भी परीक्षित कर चुके हैं । उन्होंने सद्यः - प्रसूत बच्चोंको सर्वभूत__ न आदि एकान्तस्थानमें रखा कि जहाँ उनका किसी मनुष्यसे द्वारा सा " षरण - शिक्षण सम्बन्ध न हो । वे स्वतः नहीं सीख सके, न बोल सकते थे । पशुओं की भांति वे चीखते - चिल्लाते थे, जैसे पुरा CC - 0. Ankur Joshi पशु - पक्षियोंका भाषण [ १०५ Collection Gujarat गूंगे पुरुष किया करते हैं । इससे पशु - पक्षियोंमें वर्णात्मक भाषाके शिक्षणाथे उनके जन्मसे ही पुरुषके प्रयत्नकी अपेक्षा रहा करती है । इसमें सिखानेसे वोलने वाले तोते - मैंना ही प्रमाण हैं । वे पुरुष के प्रयत्नसे ही बोलते हैं - यह प्रत्यक्ष है । यदि उनमें भी पुरुषका प्रयास न हो, तब वे तोते भी मनुष्यकी भांति न बोल सकें, किन्तु अव्यक्त ही । मनुष्य - शिशुको जन्मसे ही जो भाषा मुलतानी, चाहे पञ्जावी, हिन्दी, संस्कृत या अंग्रेजी आदि भाषा सिखलाई जाएगी; उसी भाषाको वह अनायास ही बोलने में समर्थ होता है; अन्य भाषाको नहीं । इस प्रकार पशु - पक्षी भी जन्म से ही माता - पिता द्वारा जिस भाषाके संस्कारको पाते हैं, उसी भाषाको बोलते हैं; वे भी दूसरी भाषाको कैसे बोल सकें? पाश्चात्य वैज्ञानिक - विद्वान डार्विन के मतानुसार बन्दर ही उन्नति करके मनुष्य बने । इस प्रकार जब वे वार्नर नर बन कर व्यक्त भाषणमें सफल हो गये; तव भैंसे भी उन्नति करके महिषासुर, वगले भी उन्नत होकर बकासुर, बछड़े भी वत्सासुर, सांप भी अघासुर, गधे वा गायें धेनुकासुर बनकर यदि व्यक्त भाषणमें सफल हो जाएँ; तव पाश्चात्योंके अनुयायी वादी भी अपने सन्देहको अपने उक्त आचार्यसे ही दूर कर लें । इन वर्तमान रीछ - वानर आदिका व्यक्त भाषण हम भी सामान्यरूपसे, नहीं मानते, किन्तु हमारा यह अभिप्राय है कि— जो गतजन्मसे विशेषसंस्कारशाली अथवा श्रारूढ़ - पतित पुरुष . An eGangotri Initiative

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१०६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) कर्मवश, अथवा देवता, ऋषि, मुनि, योगी अपनी इच्छासे पशु वा पक्षी बनें, वे पहले जन्म के संस्कारों को भी धारण करते हैं । उनसे यदि प्रयत्न किया जावे, तब वे मनुष्यकी भांति बोलने तथा अन्यान्य कार्योंको करनेमें अवश्य समर्थ हो सकते हैं; क्योंकि वे प्रकृतिके दास साधारण पशु - पक्षियोंसे विलक्षण हुआ करते हैं, यह पुनर्जन्म मानने वाले लोगोंको पूर्व - जन्मके संस्कार इस जन्म में अवश्य मानने पड़ेंगे । कभी किसी तपस्वी के तपो-बलसे भी पशु - पक्षीको मानुषी वाणी बुलवाई जा सकती है, जैसे कि - सन्त ज्ञानेश्वर द्वारा सिरपर हाथ रखनेसे भैंसा भी वेदमन्त्र बोलकर संशयालु व्यक्तियोंके आश्चर्यका विषय बन गया था । श्री कन्हैयालाल मिश्र नाम के एक पण्डितने हरिद्वारके कुम्भमें एक ऐसे बन्दरको देखा था, जो हिन्दी में अपना नाम लिख दिया करता था । वह पैसे लेकर बाजारसे विशेष विशेष वस्तुओं को खरीद कर भी ला दिया करता था -- यह बात ‘ ब्राह्मणसर्वस्व ' ( इटावा ) के पुराणाङ्कमें लिखी गई है - यह हम गत निबन्धमें सूचित कर चुके हैं । हमने मुलतानमें २१ अक्टूबर सन् १६३५ को एक बैल देखा था । वह भीड़मेंसे किसी विशेष नाम वाले पुरुषके ढूढने-केलिए कहा हुआ । तीन चक्कर लगाकर उसी पुरुषके सामने जाकर ठहर जाता था । हमारे सामने की बात है । हमारे साथ ठहरे हुए एक व्यक्तिने अपने हाथमें रखी हुई इनकी दो शीशियाँ दिखलाते हुए, बैल वालैको कहा कि- बैलको कहो कि - इत्रकी CC - 0. Ankur Joshi Collection पशु - पक्षियों का भाषण १०७ शीशियों वालेको ढूढे । पर उसने वे शीशियाँ अपने पास न रखकर अपने सामनेकी भीड़में किसी एक के हाथ पकड़वा दी जिसका मुझे भी पता न लग सका । बैलने और मेरे सामनेकी भीड़में एक पुरुषके पास मैंने समझा कि – बैल यहाँ गलती कर गया; सामनेके व्यक्तिने इत्रकी वे शीशियाँ दिखला होगी वा नहीं; इसपर वह विधि - निषेधका आजकल देहली में भी वैसा बैल दीखता चमत्कार विशेषरूपसे मननीय हैं । , भ तीन चक्कर लगाये. जाकर ठहर गया ॥ न पर नहीं, तब उस दीं । कार्यकी सिद्धि सिर हिलाता था । वा है । इस प्रकारके कु सि भा इस प्रकार मुलतानमें हमारे ‘ श्रीसनातनधर्म संस्कृत कालेज- २८ में एक कुत्तेका मास्टर एक छोटे कुत्तेको ४ फर्वरी सन् १६४१ को ले आया था । वह कुत्ता विशेष खेल दिखलाता था । उसके राज आगे चाकसे लिख कर दें, तो वह उनका जोड़ लगाता था । काद अङ्क लोहे के बने होते थे; वह जमा वाले ' स्थानमें रखता जाता बात था । घड़ी, चाकू, ऐनके भिन्न - भिन्न व्यक्तियों की रख दी जाती वाच थीं; जिसका नाम बताया जाता था कि - अमुककी ऐनक ( चश्मा ) संस्क उठा लाओ, वह मुहसे उठा लाता था । पांच वा दस वा सौ इति के नोट रख देनेपर जिस नोटको उसे उठा देने को कहा जाता हैं । था— उठा लाता था । उसका मास्टर कहता था कि - सव पशु - प्रति पक्षियोंको इसी प्रकार सिखलाया जा सकता है । कबूतर वात्रात बाज़ नियत पुरुषको चिट्ठी दे श्रा सकते हैं । कुत्ते वा बन्दरगा लड़केका वस्ता उठाकर उसको स्कूलमें पहुँचाने जा सकते हैं, और Gujarjat An eGangotri Initiative