सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 71–80

सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 71–80

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१०३ १०८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( E ) नास उस लड़के के वापिस आनेके टाइममें स्वयं उन्हें लेने चले जा सकते दी, हैं । गायको इस प्रकार सिखलाया जा सकता है कि उसे खूंटेसे न गाये भी बांधा जावे, फिर भी वह घरमें ही बैठी रहेगी; कहीं चली गया नहीं जावेगी । नियत समयसे पहले बछड़ेको दूध नहीं पीने । देगी । सर्कस वाले लोग हाथी को सिखलाकर चौकीपर उस बैठाते हैं कि वह गणेश - जैसा मालूम इस प्रकार सिद्धि होने लगता है । रीछसे बाईसीकल चलवाते हैं । तोते द्वारा साइकल चलवाते हैं । एक T था । कुत्तोंका विश्वविद्यालय अमेरिकामें खोला गया है, जहाँ कारके कुत्तोंको सिखलाया जाता है, और उन्हें उपाधि दी जाती है - यह ' नव-कालेज- भारत ' में प्रकाशित हुआ था, साप्ताहिक ' संस्कृतम् ' के १५६ अङ्क २८-११-४४ में भी । ४१ को महाकवि बाणभट्टने कुमारपालित उसके राजाको वैशम्पायन तोतेके बोलनेमें ता था । कादम्बरी में कहा था - ' किमत्र चित्रम् जाता बात है? ) एते हि शुकसारिका - प्रभृतयो जाती वाचमुच्चारयन्तीति श्रधिगतमेव देवेन मन्त्रीके द्वारा शूद्रक-आश्चर्य प्रकट करनेपर ? ( इसमें हैरानी की क्या विहङ्गविशेषा यथाश्रु तां । तत्रापि अन्यजन्मोपात्त-चश्मा ) संस्कारानुबन्धेन वा, पुरुषप्रयत्नेन वा, संस्कारातिशय उपजायते-वा सौ इति नातिचित्रम् ( यह पक्षी सुनी हुई बातका उच्चारण करसकते जाता हैं । गत जन्मके संस्कारके कारण उनमें पुरुषके प्रयत्नविशेषसे पशु - प्रतिशयित संस्कार हो जाया करता है; इसमें बहुत हैरानीकी तर वात्रात नहीं ) । अन्यद् एतेषामपि पुरुषाणामिव प्रतिपरिस्फुटाभिधाना बन्दर गासीत् । अभिशापात्तु अस्फुटालापता शुकानामुपजाता' हैं, और CC - 0. Ankur Joshi पशु - पक्षियोंका मारण [ 208 Collection, Gujarat. ( इनकी भी पहले पुरुषोंकी भांति स्फुट वाणी हुआ करती थी ) । इसके अतिरिक्त देवी सृष्टिका कोई प्राणी जब हनुमान-आदि वानरोंका, जटायु श्रादि पक्षियोंका, जाम्बवान आदि रीछोंका, वासुकि आदि सपका शरीर लेता है, तब भी वह अलौकिक शक्तिशाली होनेसे दैवी गुणोंको नहीं छोड़ता । नट रङ्गमञ्चमें स्त्रीरूप धारण करता हुआ भी अपने पुरुषत्वको नहीं खो देता । तब उनका मनुष्य की भांति भाषण अलौकिक शक्ति वाला होना, अपना रूप परिवर्तन करना, पर्वतोंका उखाड़ना, उनका उठाना, और समुद्रको लांघना, पर्वत खण्डों वा वृक्षखण्डों- 1 को उखाड़कर लड़ना आदि उपपन्न हो जाता है । इन वानरों-का देवावतार होना हम गत निवन्धमें दिखला चुके हैं । ' यह मनुष्य थे ' इसका भी गत निबन्धमें हम खण्डन कर चुके हैं । इस प्रकार पुराण - इतिहासोंमें ऐसे पशु - पक्षियोंकी अपवाद-स्थल मानकर मनुष्यकी तरह भाषणशीलता समझनी चाहिये । अपवादस्थल माने बगैर कहीं भी निर्वाह नहीं होता । जब कि-अमेरिकाके मोण्टरीयल नगरमें एक सात वर्षका लड़का ऐसे रोग में फँस गया, जिसके कारण उसकी बाहें और जांघें पत्थर की बन गई । वैज्ञानिक इस बालकको देखकर बहुत हैरान हैं । इसमें यदि अपवाद - स्थल स्वीकार न किया जावे; तो उसके पत्थर होनेमें क्या युक्ति होगी? फिर सभीके अङ्ग वैसे पत्थर क्यों नहीं हो जाते? बृहदेवतामें श्रीशौनकाचार्यने कहा है - ' तमृषिं निषिषेधेन्द्रो An eGangotri Initiative

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११० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) मैं वोचः क्वचिन्मधु । नहि प्रोक्त े मधुन्यस्मिन् जीवन्तं त्वोत्सृजाम्यहम् । ' ( ३ । १६ ) ' तमृषिं त्वश्विनौ देवौ विधिवद् मध्वयाचताम् । स च ताभ्यां तदाचष्ट यदुवाच शचीपतिः । ( २० ) तमब्रतां तु नासत्यौ आश्वेन शिरसाऽभवत् । मध्वाशु ग्राहय त्वं तन्नेन्द्रश्च त्वां हनिष्यति ( २१ ) श्राश्वेन शिरसा तौ तु दध्यङ्ङाह यदश्विनौ । तस्येन्द्रोऽहरत् सन्तं (? ] व्यधातामथ तौ शिरः ' ( २२ ) । यहाँ दधीचिने अश्वके सिरसे अश्वियोंको मधु - विद्या बताई, जिसे बतानेके लिए इन्द्र निषेध कर गया था, और सिर काटनेका डर दे गया था । तब अश्वियोंने दधीचिका सिर काटकर उसपर अश्वका सिर चढ़ा दिया; उसी अश्व के सिरसे दधीचिने मधु - विद्या ! श्रश्वियोंको दी । इन्द्रने उस अश्व शिरको काट डाला । तव अश्वियोंने उसका काटा हुआ अपना सिर उसपर प्रतिष्ठित कर ; दिया । यहां जब सामर्थ्य - विशेषसे घोड़ेका सिर भी बोल सका; तब बन्दरोंके बोलनेमें क्या कठिनता रही? ऊपरका इतिहास ब्राह्मणभागमें भी कहा गया है - ' स हो -वाच - इन्द्र ेण वै उक्तोस्मि, एतं चेद् अन्यस्मै अनुत्र याः, तत एव ते शिरः छिन्द्याम् - इति । तस्माद् वै विभेमि यद् वै मेस शिरो न छिन्द्याद् । न वाम् [ अश्विनौ ] उपनेष्ये ' ( शत. १४ । १ । १ । २२ ) यह यज्ञकी पूर्णता सिद्ध करनेवाली विद्याके लेनेकेलिए आये हुए अवियोंको अथर्वाके लड़के दध्यङ् ऋषिने कहा था । तब उन्होंने कहा-CC - 0. Ankur Joshi Collection पशु - पक्षियोंका भाषण ' तौ [ अश्विनौ ] ह ऊचतुः - श्रावां त्वा तस्मात् त्रास्याव [ हम तुम्हें इन्द्रसे बचावेंगे ] ( प्र. ) कथं मा त्रास्येथे? ( मुझे बचाओगे? ) ( उ. ) यदा नौ उपनेष्यसे, अथ ते शिरः विल अन्यन्त्र अपनिधास्यावः । अथ अश्वस्य शिर आहृत्य तत् ते प्रतिया स्यावः ' ( जब हमें विद्या दोगे तब तुम्हारा सिर काटकर कर रखेंगे, तुम पर घोड़ेका सिर लगा देंगे । उस सिरसे हमें दिए दोगे । उस सिरको इन्द्र काट लेगा । तब फिर तुम्हारा अप सिर लगा देंगे ) तेन ( अश्वशिरसा ) नौ ( आवाम् ) अनुवक्ष्यसि स यदा नौ ( अश्विनौ ) अनुवक्ष्यसि, अथ ते ( दधीचः ) ३ ( आश्वं ) इन्द्रः शिरः छेत्स्यति । अथ ते स्व ँ 9 शिर श्राहृत्य, के ते प्रतिधास्याव इति । तथा - इति ' ( श. १४ । १ । १ । २३ ) ' तौ ( अश्विनौ दध्यङ् ) उपनिन्ये । तौ यदा उपनिन्ये, अस्य शिरः छित्त्वा अन्यत्र अपनिदधतुः । अथ अश्वस्य वि श्रहृत्य तद् ह् अस्य प्रतिदधतुः । [ तेन अश्वशिरसा ] ह आभ्य [ अश्विभ्याम् ] अनुवाच । स यद् आभ्याम् अनूवाच, अथ तद् इन्द्रः शिरः चिच्छेद । अथ अस्य स्वँ शिर आहृत्य तद् त अस्य प्रतिदधतुः ' ( शत. २४ ) ( वैसा ही किया गया ) ब प ब्राह्मणभागात्मक वेदमें एक ऋषिकी घोड़ेवाले सिरसे: ह सम्भाषणकी शक्ति बताई गई है । जब ऐसा है, तो पशु - पक्षि छ भाषण भी वैदिक सिद्ध हुआ । शतपथ ब्राह्मणको स्वा.दु.जी प्रमाण मानते थे; इसलिए अपने भाष्यमें स्थान - स्थान शतपथके प्रमाण देते हैं; वल्कि अपने यजुर्वेदके भाष्यको खा अ व्य Gujarat. An eGangotri Initiative

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११२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) इसलिए प्रमाण बताते हैं कि वह शतपथानुकूल किया गया है । बिल उसी शतपथ में जव पशु श्रश्वके मुख द्वारा मनुष्यकी भांति प्रतिक्षा भाषण - शक्ति और विद्यादान - शक्ति दिखलाई गई है, और उसमें कर असम्भव नहीं, वैसे ही अपवाद - न्यायसे पौराणिक पशु - पक्षियोंके में वि भाषण में भी क्या असम्भव रहा? अफ घोड़े वाले सिरसे मनुष्यकी भांति भाषण में न केवल ब्राह्मणभागकी ही साक्षी है, बल्कि - वादिप्रतिवादिसम्मत, चः ) ३ वादियोंसे वेद नामसे सम्मत मन्त्रभागकी भी इसमें साक्षी है । त्य देखिये - ' दध्यङ् ह यन्मधु आथर्वणो वाम् [ अश्विनौ ] [ इस मन्त्रके वी देवता ( वाच्य ) हैं ] अश्वस्य शीर्णा प्रयदीमुवाच ' ( ऋ.सं. ये १ | ११६ | १२ ) ( अथर्वाके लड़के दधीचिने हे अश्विनो! तुम दोनों-वस्य को घोड़े के सिरसे मधुविद्याका उपदेश दिया ) | यही अन्य मन्त्रमें भी स्पष्ट किया गया है । जैसे कि -'युवं दधीचो मन आम्ब आविवासथः, अथ शिरः प्रति वाम् [ अश्विनौ ] अश्व्यं वदत् ' ाथ ( ऋ.सं. १ । ११६।६ ) यहाँ पर अश्वमुखके द्वारा जैसे भाषणशक्ति इत्यतद् तथा विद्याप्रदानशक्ति वताई गई है; वैसे ही अपवाद - न्यायसे या ) पशु - पक्षियोंका पुराण- इतिहास वर्णित भाषण भी वैदिक सिद्ध सिरसे हो गया । हाथी द्वारा मनुष्य - जैसे बोलनेमें हम गत - निबन्धमें पक्षियों श्रार्य - मुसाफिर श्रीलेखराम जी की साक्षी भी दे चुके हैं । .दु.जी सर्वसाधारण पशु - पक्षीका मनुष्यकी तरह भाषण - स्थान तथा कोखा व्यवहार हम भी नहीं बताते, किन्तु देवांश पशु - पक्षियोंका ही; अथवा आरूढ़ - पतितोंका बताते हैं । तभी महाभारतानुसार इंस hi Collection पशु - पक्षियोंका भाषण [ ११३ से मनुष्यकी वाणी द्वारा दमयन्तीको जो नलका परिचय प्राप्त हुआ था; वहां भी नैषधचरितमें उसे देवांग होनेसे वन्दनीय माना है । इस प्रकार सामवेद - छान्दोग्योपनिषद् में ' अथ ह हंसा निशायामतिपेतुः । तद्धैव हंसो हंसमभ्युवाद ' ( ४ । १ । २ ) यद्दांपर हंसोंका संवाद कहा गया है । उसे जानश्रुति पौत्रायणने सुना ( ४ | ११५ ) ' तं हंस उपनिपत्य अभ्युवाद ' ( ४/७/२ ) यहां पर जबालाके लड़के सत्यकामको हंसने उपदेश दिया था । तब महाभारतमें हंसका नलदमयन्ती के साथ तथा मार्कण्डेय पुराण में जैमिनिके साथ हंसोंका संवाद भी समूल सिद्ध हुआ । इसी प्रकार ' अथ ह एनम् ऋषभोऽभ्युवाद सत्यकाम ३ इति ' ( छान्दो ४ । ५ । १ ) यहां पर वृषभका संवाद कहा गया है । ' मद्गुष्टे पाई वक्ता ' ( ४ | ८ | १ ) यहांपर एक जलके इंसविशेषका संवाद कहा गया है । यह बात सामान्य पशु - पक्षियोंकी है, परन्तु हनुमान् - श्रादि वानरों, जटायु आदि गीधों और जाम्बवान आदि रीछोंके पहले से ही देवता होनेसे उनके अवतार होनेके कारण, देवताओंके ' विद्वा ँ सो हि देवाः ' ( शत ३७ | ३ | १० ) जन्मसे विद्वान् होनेके कारण इस जन्ममें उनका मनुष्यकी भांति बोलने तथा मानुषी व्यवहार करने और शास्त्रादि - ज्ञान रखनेमें थोड़ा भी सन्देह न रह सका । तव यह विषय समाप्त होनेसे इस निवन्ध को हम यहीं रोकते हैं । अब इस इतिहासचर्चा में उम पुष्पसे अनुवृत्त श्रीराम - सीताकी वैवाहिक श्रायुपर विचार दिया जाता है । स ० ध ० प Gujarat. An eGangotri Initiative

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( ४ ) श्री सीताराम की वैवाहिक अवस्था ( अवशिष्ट भाग ) ' श्रीराम तथा श्रीसीताकी विवाहावस्था ' श्रीवाल्मीकि-रामायणके अनुसार क्या थी इस विषयमें हमने ' आलोक ' ( ७ ) में ६३६ पृष्ठसे ७११ पृष्ठ तक ७५ पृष्ठों में लिखा था, जिसमें प्रतिपक्षियोंकी सभी शङ्काओं का समाधान दिया था; उसपर एक दयानन्दी - पथिकने कुछ थोड़ी - सी आपत्तियां ' वेदवाणी ' ( १५।११ ) में खड़ी की थीं, इस ' इतिहासचर्चा ' में इस विषयमें लिखा जा रहा है । प्रतिपक्षी वाङ्मात्रसे ' उत्तराभास, कुतर्क, धृष्टता, वाग्जाल, बालकी खाल खींचना, प्रक्षिप्तताका प्रयोग ' इन शब्दोंको लिखकर और अपने दयानन्दियोंके वा सुधारकोंके साध्य वचन उपस्थित करके अपने पक्षको सिद्ध हुआ समझ लेते हैं; और अपने विरुद्ध वचनोंको नाममात्रसे ' वेदविरुद्ध ' कहनेका ' तकिया-कलाम ' तो हर समय उसके गलेका हार बना ही रहता है । वह १८ पुराणोंको स्वा.द. की ' खोखली - तोप ' से अपनी समझ में उडाकर भी ( देखो उसके वै. सि. मा. में वह चित्र ) फिर उन्हीं पुराणोंको अपने गलेका हार बना लिया करता है । ( १ ) पूर्व लेखमें प्रतिपक्षीने ' ऊनषोडशवर्षो मे ' इस वाल्मी, रा.के वचनको माना था; उससे उसके पक्षका हम द्वारा खण्डन करनेपर इस लेख में उसने उसकी भी प्रक्षिप्तताका फतवा दे दिया । अपने पक्षकी रक्षाकेलिए यही ( प्रक्षिप्तता ) तो इनके पास अस्त्र होता है, पर यह विद्वज्जनोंकी दृष्टिमें उनके पक्षकी दुर्बलता-CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीसीतारामकी वैवाहिक अवस्था [ ११६ का प्रमाण है । हमने इन सबका उत्तर ' आलोक ' ऊहापोहके साथ दे रखा है, उस पर प्रतिपक्षी की लेखनी में अपन सकी । वहीं हमने ‘ सुश्रुत - संहिता ' के अनुसार भी ' समुपस्थि याँवन ' का संघटन किया था, पर साम्प्रदायिक- दलदल में उपन हुए प्रतिपक्षी के पास उसका प्रत्युत्तर है ही नहीं । बता ' युवा सुवासाः ' उस ( २ ) हमने लिखा था कि - स्वाद जी की 1 संस्कार- कट ( उपनयनसं. ) में उपनेय बटुकेलिए ' युवा सुवासाः ' मन्त्र सुवा किया गया है | उपनयन स्वामीने वटुका मुख्यतया गर्भ वा जन्म नहीं ८-११-१२ वर्षकी अवस्थामें माना है, और गर्भ वा जन जो ५-६-८ वर्षमें भी माना है । क्षत्रियका जब स्वा. द. जीके अनुसा सिद्ध ६ ठे तथा ११ वें वर्षमें भी उपनयन हैं; और मनुस्मृतिके श्रनुस है? ' वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः ' ( २६ ) स्त्रियोंका विवाह उपनयन - स्थानीय है; और उपनयन में स्वामी वात अनुसार ' युवा सुवासाः ' मन्त्र उपनेय वटुकेलिए पढ़ा जाता! उपज तत्र प्रतिपक्षी की सब आपत्तियाँ उड गई । ६-७ वर्षकी विवाहित उपन सीता, १२ वा १५ वर्षके श्रीराम भी ' युवा ' सिद्ध हो गये । द वर्ष तो अब ६-८ वर्षके वटुकेलिए प्रयुक्त किये गये ' युवा सुवासा कथ मन्त्रको प्रतिपक्षी अपने स्वाद की उपनयन - विधि में प्रक्षिप्त ५-६ या फिर अपना एतद्विषयक पक्ष अपने ही स्वामी द्वारा खण्डित माने सुवा क्या यव प्रतिपक्षीमें शक्ति है कि वह ' युवा सुवासाः ' मन्त्र - ६ के बलसे वादिप्रतिवादिमान्य ६, ८-११-१२, वर्षोंमें अनुठीया Gujarat. An eGangotri Initiative

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११६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( १ ) क ' उपनयन की वेदविरुद्धता की तीन और गर्भसे ६-८ वर्षका वटु नमुपरिक्ष उपनयनस्थानापन्न विवाह दलमें बतानेवाला सिद्ध हो गया उस विवाहावस्था में ' युवा ' कट गया । घोषणा करे? यदि नहीं कर सकता; भी ' युवा ' सिद्ध हो गया; तव सीताका भी छठे वर्षमें उसको ' युवा ' ( युवति ) । १२-१५ वर्षके श्रीराम तो स्वतः ही सिद्ध हो गये; तब प्रतिपक्षीका पक्ष कार- ( ३ ) इसपर वादी कहता है कि - ' उपनयन में स्वामीने ' युवा न्त्र सुवासाः ' का अर्थ नहीं किया, तब क्या इसका अर्थ होगा ही बाजना नहीं? ' मुर्गा वा मुल्ला बांग न देगा; तो क्या सवेरा न होगा '? T जन्म जो कि वादी कहता है कि- ' स्वामी के ' युवा सुवासाः ' से यह कहाँ के अनुसा सिद्ध होता है कि -८ वर्षके वटुकेलिए यह मन्त्र प्रयुक्त किया गया I अनुस है? यह तो श्रापकी कपोलकल्पनामात्र है । आपका ' कुतक है ' । ( २।६३ ) प्रतिपक्षीको धन्यवाद हो कि उसने अपने महर्षि (? ) की स्वामी वातको भी कपोलकल्पित कह दिया । स्वा. द. जोने तथा उनके जाता | उपजीव्य सभी गृह्यसूत्रों तथा मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्रोंने विवाहित उपनयन- प्रकरण में उपनयनकी जन्म वा गभेसे ८-११-१२ गये | वर्षको अवस्था लिखी है; तब क्या स्वामी तथा सभी सूत्रकारोंका सुवासा कथन कपोलकल्पित है? प्रश्न यह है कि- स्वा. द. के अनुसार क्षप्त मारे ५-६-८, ११-१२ वर्षकी अवस्था में होते हुए उपनयनमें ' युवा — माने सुवासाः ' मन्त्र पढ़ा जाता है, या नहीं? यदि पढ़ा जाता है; तब ' मन्त्र ५-६-८-११-१२ वर्षका वटु भी ' युवा ' कहलाया गया । यदि यह ठीक है; तो सीता - रामकी हमसे रामायण द्वारा दिखलाई हुई अनुशि CC - 0. Ankur Joshi श्रीसीतारामकी वैवाहिक अवस्था [ ११७ Collection Gujarat. An वैवाहिक अवस्था पर भी दोष न आ सका । नहीं तो ' युवा सुवासाः ' मन्त्रका यदि वादी ' पूरण ज्यान होके विद्या ग्रहण करके ' स्वामी के अनुसार यह अर्थ करता है, तब पूर्ण जवानी तो स्वामीके अनुसार ४० वा ४८ सालमें होगी; क्योंकि - स्वा. द. जी २६ वर्षकी आदिमं तो युवावस्थाका प्रारम्भ मानते हैं, ( देखो स.प्र. ३ प्र. २६ ), पूर्ण युवावस्था नहीं: तब क्या प्रतिपक्षी आर्यसमाजियोंका उपनयन ४० या ४ सालमें मानता २ वा कराता है? वेदारम्भ - संस्कार उपनयन के अनन्तर होता है; उसमें भी ' युवा सुवासाः ' मन्त्र वटुकेलिए आया है, तब क्या वे A वेद भी ४० वा ४८ वर्षमें पढ़ना आरम्भ करते हैं? तब क्या वे शूद्र नहीं हो जाएँगे? यदि ऐसा है, तो वह यज्ञोपवीत पतितका माना जावेगा । स्वा. द. जी संस्कारविधिमें लिख गये हैं कि - ' जन्मसे वा गर्भसे वें, ११ वें, १२ वें वर्ष में ब्राह्मणादिका यज्ञोपवीत करें; तथा १६-२२-२४ वर्षंसे पूर्वं - पूर्वं यज्ञोपवीत होना चाहिये । यदि पूर्वोक्त-कालमें इनका यज्ञोपवीत न हो; तो वे पतित माने जावें ' ( उपनयन. पृ. ७६ ); तब दयानन्दी पथिक ४० वा ४८ वर्षकी ( स्वामीजीके अनुसार ) पूर्ण युवावस्थामें वटुका यज्ञोपवीत पतित ( ब्रात्य ) अवस्थामें कराना वेदानुकूल मानेगा, वा वेद - विरुद्ध? और १६-२२-२४ वर्ष स्वा.द.जीके अनुसार पूर्ण युवावस्था तो दूर रही, स्वामी के मतानुसार युवावस्था भी नहीं; तब खा. द. जी के शब्दों में १६-२२-२४ वर्षसे पूर्वकी अवस्था तो भला युवावस्था कैसे eGangotri Initiative

पृष्ठ 76

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११८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) रहेगी? तब उसमें ' युवा सुवासा: ' इस उपनयनमें पढ़े जाने वाले मन्त्रके ' युवा ' पदके अनुसार यज्ञोपवीत कराना पथिक वेदानुकूल मानेगा, वा वेद- विरुद्ध? या यह दोनों ही उपनयनकी अवस्थाएँ वेद - विरुद्ध हैं? अथवा १६- २२-२४ वर्षसे पूर्वकी स्वा. द. जीसे उल्लिखित ८-११-१२ एवं ५-६-८ वर्षकी अवस्थामें भी ' युवा ' शब्द-का प्रयोग किया जा सकता है, वा नहीं? यदि किया जा सकता है; तो वादीका पक्ष खण्डित हो गया । अब वादी बतावे कि गर्भ वा जन्मसे ८-११-१२ वर्ष उपनयन की अवस्था बताते हुए और उसमें वटुको ' युवा ' कह-लाते हुए स्वा. द. जी भ्रान्त हैं, या उस अवस्थाका खण्डन करता हुआ प्रतिपक्षी स्वयं भ्रान्त है? वह यह भी बतावे कि -५,६,८, ११,१२ वर्षकी अवस्थामें होते हुए उपनयनमें ' युवा सुवासाः ' मन्त्र पढ़ा जाता है, या नहीं? यदि पढ़ा जाता है, तब प्रतिपक्षी के अनुसार ६ वर्षकी सीता तथा १२-१५ वर्षके श्रीराम भी ' युवा ' हो गये । प्रतिपक्षीका पक्ष चूर - चूर हो गया; या फिर ५,६,८, ११,१२ वर्षमें होने वाले उपनयनमें स्वा.द. द्वारा प्रयुक्त किये गये ' युवा सुवासाः ' मन्त्रके उल्लेख की भी वादी प्रशुद्ध वा वेद- विरुद्ध होनेकी घोषणा सब आर्यसमाजोंमें कर दे । है क्या उसमें यह शक्ति? यदि है; तो वह यह घोषणा कर दे, जिससे आर्यसमाज-से स्वा. दु.जीका नाम काट कर वादीको ही आर्यसमाजका महर्षि वना दिया जावे! अब बता या जावे कि दयानन्दी पथिक वेदोंका अधिक विद्वान् है; या स्वामीजी? या दोनों वेदसे कोरे CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीसीतारामकी वैवाहिक अवस्था १२० और परस्पर विरुद्ध वक्ता है? एक कट्टर दयानन्द वर्षक दयानन्दपर आक्रमण कर रहा है, या नहीं? प है, पथिक लिखता है - ' स्वामीजी के अनुसार १६-२२-२५ इस पूर्व - पूर्व यज्ञोपवीत होना चाहिये, तो क्या ' युवा ' १६-वर्षके वटुपर प्रयुक्त नहीं माना जा सकता है? शब्द हुए अतः कुतर्क व्यर्थ है ' । चुरा अब विद्वान् पाटक देखें कि यह हमारा कुतर्क है, वाद वर्ष का, यह पथिककी लेखनी ही स्वयं बोल उठेगी । पदव बतावे कि क्या आप लोग वटुका यज्ञोपवीत इसपर बैठा अवस्था में कराते हैं? और वह यह भी बतावे २२-२४ ३ युवा कि १६२ और वर्षसे पूर्वकी ५-६-८-११-१२ वर्षकी अवस्था तथा १६ तो व वर्षकी अवस्था भी क्या स्वामीजी वा पथिकके अनुसार पि युवावस्था है? स्वामीजीके वाक्यमें ' १६-२२-२४ वर्षसे लेगा यहाँ पूर्व शब्द था । पथिकने अपने वाक्यमें ' पूर्व ' शब्द बतान जनदृष्टिसे छिपा लिया है । इससे उसके अनुसार १६-२३ वर्ष पूर्वकी अवस्था भी पूर्ण युवावस्था सिद्ध न वर्ष म स्वा. द. जी इस अंशमें वादीके अनुसार वेद- विरुद्ध २४ सिद्ध हो गये । अव पथिक यह कहकर जो कि हमें डां विधि कि- ' क्या ' युवा ' शब्द २२-२४ वर्षके वटुपर प्रयुक्त ३२२-माना जा सकता है? अतः आपका कुतर्क व्यर्थ है । ' तब स्वाव १६-२२-२४ वर्षकी अवस्थाको पथिक पूर्ण युवावस्था मानानु है? स्वा. द. जीने स.प्र. सं. वि. श्रादि अपने ग्रन्थोंमें १ Gujarat. An eGangotri Initiative

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१२० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) दीप वर्षके, अन्त २६ वेंके आरम्भमें यौवनावस्थाका आरम्भ माना है, पूर्ण युवावस्था नहीं । आशा है- पथिक अपने स्वामीजी के इस मतको वैदिक मानता होगा । यदि ऐसा है, तो २२-२५ १६-२२-२४ वर्षमें भी ( यदि स्वामीजी के इस वाक्यमें ठहरे शब्द हुए ' इन वर्षों से पूर्व ' इस ' पूर्व ' शब्दको पथिक जनदृष्टिसे चुराने में सफल सिद्ध हो भी जावे ), तत्र वादी इस १६-२२-२४ वर्षकी अवस्थाके उपनयनमें ' युवा सुवासाः ' मन्त्रके ' युवा ' है, बा । पदका जिसका स्वामीने ' पूर्ण ज्वान ' अर्थ किया है, सामञ्जस्य इसपर बैठा सकेगा क्या? क्या पथिक १६-२२-२४ वर्षोंको पूर्ण २२४ । युवावस्था मानता है? तव गुरु - चेलोंमें कौन वेदानुकूल वक्ता है, = १६ और कौन वेद विरुद्ध, यह बताना वादीका काम है । हम बतायें, १६ तो वह हमारा ' कुतर्क ' मान लेगा । अव आशा है कि दयानन्दी अनुसार पथिक ' सांप - छछून्दर ' वाली इस घटना से अपने आपको बचा वर्ष लेगा । व्यर्थ हमारी " धृष्टता, वा कपोलकल्पना वा कुतर्क ' न पूर्व ' शब्द बतायेगा । दूसरेको गाली देने से अपना पक्ष सिद्ध नहीं हो जाता । १६-२९ क्या पथिक अपने अनुसार वटुका उपनयन १६-२२-२४ द्ध न वर्षमें करता है? यदि ऐसा है, तो स्वामीजीके अनुसार १६-२२-रुद्ध २४ वर्षसे पूर्व यज्ञोपवीत न होनेसे ( क्योंकि - स्वामीजी संस्कार-में डांस विधि में इन वर्षों से पूर्व यह ' पूर्व ' शब्द लिख गये हैं, तब १६-युक्त २२-२४ में वा उसके बाद उपनयन करनेवाला दयानन्दी तब स्वाद की संस्कार - विधिके उपनयन- प्रकरण पृ. ७६ पं. ३-४ के या मानानुसार पतित हो जायगा । वह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य न रहकर थोंमें CC - 0. Ankur Joshi श्री सीतारामकी वैवाहिक अवस्था । १२१ Collection Gujarat. शूद्र हो जायगा । क्या पथिक उसी शुद्रका यज्ञोपवीत करेगा? शूद्रका तो स्वामीकी सं.वि. में उपनयन - संस्कार करानेका आदेश कहीं है नहीं । क्या इसी वल - बूते पर पथिकने हमारे लेख पर लेखनी चलाई है? क्या उस १६-२२-२४ वर्ष वाले वटुका वेदारम्भ - संस्कार पथिक कराएगा? यदि ऐसा है, तो ८-११-१२ वर्ष में उपनयन करानेवाले तथा लिखनेवाले आर्यसमाजियों तथा स्वा. द. जी को भी पथिकने क्या वेदविरुद्ध सिद्ध नहीं कर दिया? यदि वादी स्वा. द. जी पर कट्टर भक्ति रखता है, और उन्हें वैदिकपुङ्गव मानता है. उनके एक - एक अक्षर के आगे अपनी अांखें बिछानेको तैयार है, तो स्वामीने १६-२२-२४ वर्ष पूर्व तकके ८-११-१२ वर्षके तथा ५-६-८ वर्षके भी वटुका उपनयन आदि किया है; और उपनयनमें स्वामीने ' युवा सुवासाः ' मन्त्र उस ८-११-१२, ५-६-८ वर्षों वाले वटुकेलिए प्रयुक्त भी किया है; उस वेदमन्त्रमें उस वटुको युवा ' कहा गया है; तब विवाह में १२-१५ वर्षके श्रीराम भी १६-२२-२४ वर्षसे पूर्वकी अवस्था होने के कारण प्रतिपक्षी वा उसके स्वामी के अनुसार भी ' युवा ' सिंद्ध होगये, ' जादु वह जो सिरपर चढ़कर बोले ' । कमसे कम-' ऊनषोडशवर्ष ' ( वाल्मी. ११२०१२ ) के श्रीराम ' समुपस्थितयौवन ' ( ११५० / १७-१८ ) तो सिद्ध हो ही गये । यह तो पथिक स्वयं ही अपने वचनसे हमारा पक्ष सिद्ध कर रहा है । तव क्या वह ऊनषोडशवर्षके श्रीरामका विवाह २४ वर्षकी सीतासे करावेगा? ' बहू बड़ी घर छोटे लाला '? अथवा सुश्रुतसंहिताके अपने माने An eGangotri Initiative

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१२२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( E ) अनुसार ६-७ वर्षवाली सीताके साथ, हुए ६ वर्षके अनुपातके इम प्रेरणा करते यह बताना भी वादीका काम है । प्रतिपक्षीको हैं कि अपने इस निर्मूल पक्षको छोड़ दे; नहीं तो वह उसका पदे - पदे स्खलन कराएगा । हाँ, अपनी झेंप मिटानेको निराधार अपने अखबारोंमें ' कुछ ' लिखमात्र देना अन्य बात है । अब पथिकको चाहिये कि - श्रीनानूराम तथा पादरी फादर द्वारा उपनयनमें स्वा.द.जीसे प्रयुक्त किये हुए ' युवा सुवासाः ' मन्त्र पर स्वा.द.जी द्वारा ६-८-११-१२ वर्षमें उपनयन लिखने पर अथवा हरताल फिरवा दे | स्वा. द. जीने अपनी संस्कार - विधिमें सृष्टिकी आदिमें प्रणीत अपनी महामान्य मनुस्मृतिके अनुसार पिता- पितामहकी परम्परासे नियतकाल तक ब्रह्मचारी रहनेवाले क्षत्रिय के बालकका गर्भसे छठे वर्षमें भी उपनयन माना है । ( देखो सं. वि. उपनयन प्र. ) उस ६ वर्षवाले वटुके उपनयनमें भी स्वाद जीके अनुसार ' युवा सुवासाः ' मन्त्र पढ़ा ही जाता होगा, क्योंकि - उसमें कुछ विशेषता नहीं बताई गई है । फिर ६ वर्षकी क्षत्रिय वर्णकी सीता भी प्रतिपक्षीके अनुसार १६ वर्षकी पूर्वकी होनेसे उसका ' वैवाहिको-विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः ' [ श्रपनायनिकः परः ] ( मनु. २/६७ ) उपनयनस्थानापन्न विवाह अनुपपन्न सिद्ध नहीं होता है, वह भी ' युवति ' सिद्ध हो जाती है । जब तक स्वा. द. जी की सं.वि.में उपनयनमें ' युवा सुवासाः ' मन्त्र विद्यमान है, तब तक पथिककी शक्ति नहीं कि वह इस पर कुछ चीं - चपड़ कर CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीसीतारामकी वैवाहिक अवस्था सके । हाँ, पथिक अपने सम्प्रदायके सचालक स्वामी ' नाममझ वा परस्परविरुद्ध - वक्ता अथवा वेदविरुद्ध वक्ता ' लं, तब जाकर वह दयानन्दानुयायी न रहकर नानूराम पादरी फादरका पूरा चेला सिद्ध हो जावेगा । पथिक स्वयं भी बतावे कि क्या वह स्वाद जीकी ि स १६-२२-२४ वर्षसे पूर्वकी ६-६-११-१२ अवस्थाको ' युवावस मानता है? यदि हाँ, तो उसे बधाई हो । उसने हमारा सिद्ध कर दिया । सीता तथा राम भी १६ वर्षसे पूर्वके य नहीं तो पथिक यह उपनयन जिसमें ' युवा सुवासाः ' मन्त्र ऋ च है, २५ वर्षके बादके वटुका तो वैदिक माने, और २५ वर्ष प पूर्वके वटुका वेदविरुद्ध माने । अब प्रतिपक्षी वतावे कि-उसका अपना सिद्ध हुआ, या हमारा? ( ४ ) आगे ' समुपस्थितयौवनौ ' का ' यौवनावस्थाको प्र १ नहीं है, किन्तु ' यौवन जिसका उपस्थित है, निकट है ' ६५ हमारे अर्थमें पथिक हमारा छल बताता है; और अपने आर्यसमाजियोंके ' साध्य प्रमाण ' देता है । जो स्वयं साध्य हो श्र है, वह दूसरे को क्या सिद्ध करेगा? शब्दोंका अर्थ शब्दशा G द्वारा हुआ करता है, वा आर्यसमाजियोंके वचनानुसार ६ १२-१५ वर्षके श्रीराम में तो वह सुश्रुतानुसार भी घट ही गया । क्योंकि – स्वा.द.जीसे उद्धृत ‘ आ षोडशाद् वृद्धिः, या पञ्चविंशे यौवनम् ' इस सुश्रुतके वचनानुसार - जिसका अर्थ स्वाद जी तक पथिकने शुद्ध किया है, जन्मसे १६ तक वृद्धि अवस्था Gujarat. An eGangotri Initiative

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१२४ ] श्रीमनातनधर्मालोक ( ६ ) स्वामी: १६ से २५ तक यौवनावस्था सिद्ध हो जानेसे श्रीवाल्मीकिके का ' ' ऊनषोडशवर्षो मे रामो राजीवलोचन: ' की प्रक्षिप्तता कहाँ सिद्ध राम हुई? ' आ षोडशाद् वृद्धिः, आ पञ्चविंशतेयवनम् ' इस सुश्रुत-की लि सं. के वाक्यका अर्थ आर्यसमाजी विद्वान श्रीतुलसीराम स्वामीने युवावस अपने ' भास्कर - प्रकाश ' ( ४ र्थ समुल्लास ) में लिखा हैं - ' सुश्रुतके मारा प मतानुसार सोलहवें वर्ष तक वृद्धि अवस्था तथा २५ वें वर्ष तक पूर्वके यौवन होता है ' । तव २६ वर्षके आरम्भ में यौवनारम्भका अर्थ करते हुए स.प्र.का तथा '२५ वें वर्ष में यौवन ' अर्थ करते हुए २५ वर्ष पथिकका कथन ठीक सिद्ध न हो सका; क्योंकि दोनों स्थलों में कि- ' आङ्का अर्थ बराबर है कि - ' जन्मसे १६ तक वृद्धि अवस्था और १६ से २५ तक यौवनावस्था ' । तव जन्मसे शुरू होकर १६ वर्षसे पूर्व तक वृद्धि अवस्था समाप्त हुई, और १६ से ' यौवन ' ' शुरू हो गया, उसकी सीमा २५ वें वर्ष तक रही । फिर नने २५ से सम्पूर्णता अवस्था शुरू होकर ४० वर्ष तक रही । फिर T ध्य हो ४० वर्ष से ' परिहाणि ' अवस्था शुरू हुई; और वह अन्त तक चली जाती है । इस प्रकार रामायणप्रोक्त ' ऊनषोडशवर्ष ' के राम शब्दशान बानुसार ' समुपस्थितयौवन ' सिद्ध होगये । तब वैसा कहते हुए वेद-ही गया आयुर्वेदादि - शास्त्रज्ञ वसिष्ठ वा विश्वामित्र ऋषि अज्ञानी कैसे वंश हुए? तो क्या ' ऊनषोडशवर्ष ' के श्रीरामको २४ वर्षकी सीता दिलाई गई? जी स्वा. द. जीने सं. वि. प्र. १०३ में लिखा है- ' स्त्री और पुरुषके स्था CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. श्रीसीतारामकी वैवाहिक अवस्था [ १२५ शरीरमें पूर्वोक्त चारों अवस्थाओंका एकसा समय नहीं हैं, किन्तु जितना सामर्थ्य २५ वर्षमें पुरुषके शरीरमें होता है, उतना सामर्थ्य स्त्रीके शरीरमें १६ वें वर्ष में होता है ' । यदि ऐसा है, तो उमी अनुपातसे १६ वर्षके रामको ६-७ वर्षकी सीता यदि दी गई; तो अवस्थाका अनुपात बराबर - होनेसे आयुर्वेदका व्याकोप भी न रहा । ( ५ ) जोकि - ' उषित्वा द्वादश समाः ' को प्रतिपक्षी ' नानूराम व्यास तथा पादरी फादर एवं अखिलानन्द भरियाके अनुसार प्रक्षिप्त मानता है, तब क्या वे वाल्मीकि वा वेदव्यास हैं कि-इनकी बात मानी जाए! उन्होंने अपनी इच्छानुसार रामायण में प्रक्षिप्त मान लिये हैं, और कहीं - कहीं परिवर्तन भी कर दिया है । जैसे कि - ' प्रजातव्यञ्जनः श्रीमान... काकपक्षधरो धन्वी ' ( वाल्मी. ३ | १८ | १४ ) ' बालचन्द्र इवोदितः ' ( १५ ) यहां श्रीरामकी छोटी श्रायु बताई गई है, इसमें नवोदित बालचन्द्रकी उपमा तथा काकपक्षका धारण जो छोटी आयुमें रखे जाते हैं - ज्ञापक हैं, पर अखिला-नन्द श्रयंसमाजीने वहां ' स जातव्यञ्जनः ' यह पाठ स्वयं बदल दिया, जिसका उसे कोई अधिकार नहीं । परिवर्तन तो कर दिया, पर उससे जो बालचन्द्रकी उपमा तथा काकपक्षका धारण असम्बद्ध हो जाता है, उसे अपने किये परिवर्तनकी चुगली खानेको रख दिया । इस प्रकार उसने ' वानरः ' का सर्वत्र ' वनवासी ' अर्थ कर दिया, जबकि वनवासी मुनियों के लिए कोई , वानर ' शब्दका प्रयोग नहीं करता । इस विषय में हम ' हनुमान् Án eGangotri Initiative

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१२६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) आदि क्या नर थे इस आरम्भिक निबन्धमें स्पष्ट कर चुके हैं । इस प्रकार उसने दण्डकारण्यविषयक ऋषिके शापको भी प्रक्षिप्त व्यर्थ ही माना हैं, जबकि उसे योगदर्शनके स्वा.द. प्रमाणित ‘ व्यास - भाष्य ' ( ४ । १० ) में प्रमाणित किया गया है । श्रीराम विवाहके समय ' ऊनषोडश ' वर्षके थे, राज्य तो उन्हें २५ वर्ष हो जानेके बाद मिलना था । श्रत: १२ वर्ष तक तो श्रीराम - सोताने घर में रहना ही था; उस समयको प्रतीक्षा करनी ही थी; तब ' उषित्वा द्वादश समाः ' आदि पद्य रामायण में प्रक्षिप्त कैसे हो सकते हैं? क्या प्रक्षिप्त कह देनेसे वे श्लोक प्रक्षिप्त हो जाएँगे; जबकि रामायणमें ही बहुत स्थलोंमें उनका अनुवाद वा अभ्यास आया है । रूसने ईश्वरका ही खण्डन कर दिया; उसको ही शास्त्रोंमें प्रक्षिप्त सिद्ध कर दिया; तब क्या ईश्वर अव नहीं रहा? महाभारतमें १६ वर्षके लगभगके अभिमन्युको ' युवा ' कहा गया है, उसका १२ वर्षकी उत्तराके साथ विवाह कहा गया है, उसे भी वहाँ ' वयःस्था ' ( युवति ) कहा गया है । उनका लड़का परीक्षित् भी बताया गया हैं । इस विषय में ' आलोक ' ( ७ ) में हम प्रमाण दे चुके हैं । यह ऐतिहासिक घटना भी क्या प्रक्षिप्त है? ' षड् - वर्षं एव वालः स ( भरतः ) कण्वाश्रमपदं प्रति ' ( महा. आदि. ७४ | ६ ) ' तं कुमारमृषिदृष्ट्वा... समयो यौवराज्याय ' ( १७४ | ६ ) यहां पर छः वर्षके भरतको युवराज होनेके योग्य बताया है । उसकी उत्पत्ति अप्सरासे होनेके कारण वह जन्मसे ही अतिकाय, CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीसीतारामकी वैवाहिक अवस्था [ १२ विशालकाय बन गया था । क्या वह भी प्रक्षिप्त है? १६ वर्ष छोटे श्री गांधीजी ' पिता ' बन गये थे । इस बातको बतानेवाली उनकी ' आत्मकथा ' तथा शाकुन्तलय भरत भी प्रक्षिप्त हूँ क्या ( ६ ) ' रेमिरे ' पर हमने इतना लिख दिया था कि उसपर पथिककी गति ही रुक गई । हमने उसमें सभी आपत्तियोंश समाधान कर दिया था, जिसपर पथिककी लेखनी बन्द होगई ॥ हमने बताया था कि — श्रीवाल्मीकिको ' रम् ' धातुका ' आमोद प्रमोद ' ही अर्थ इष्ट है । मुनिके ' रम ' धातुके बहुतसे प्रयोग देखे गये हैं, उनमें मुनिको मनोरञ्जन अर्थ ही इष्ट है । रामाय ‘ बालकाण्डके निरीक्षण ' ( पृ. ६१६ ) में वादीके मान्य श्रीपाद दामोदर सातवलेकरने लिखा है - ' संस्कृतभाषाका जिनको बिलकुल ज्ञान नहीं, वे ही ' रम् ' धातुकी ' रेमे, रमयामास, रेमिरे ' आदि क्रियाओंसे अनर्थकारी भाव बता सकते हैं; पर जिनको संस्कृतभाषा कुछ - न - कुछ समझ पड़ती है; वे इन शब्दों में केवल मनोरञ्जनका ही भाव देख सकते हैं ' । वस्तुतः काव्यप्रणेता लोग ग्राम्यदोषके कारण मैथुनका वर्णन कभी नहीं करते । श्रीपाणिनिने ' रमु क्रीडायाम् ' लिखकर, स्वा. द. जीने भी अपने आख्यातिकमें वही अर्थ लिख कर, मनुजी ने अपनी स्मृतिमें ' यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ' में ‘ रमन्ते ' लिख कर स्वा.द.जीने उसका हमारे अनुकूल अर्थ करके पथिकका रास्ता बन्द कर दिया है । इनके मुकाबले में ' श्रीद्वारकाप्रसाद ' आदि नगण्य हैं । यदि पथिक श्रीद्वारकाप्रसाद Gujarat. An eGangotri Initiative