सनातन धर्मालोक ९ — पृष्ठ 81–90

सनातन धर्मालोक ९ · पृष्ठ 81–90

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१२८ । श्रीसनातनधर्मालोक ( ह ) को प्रमाण मानता ही है, तो उनने अपनी रामायणकी टीका में ‘ रेमिरे मुदिताः ’ ( १-७७-१४ ) का मैथुनार्थ नहीं किया, किन्तु ' तदनन्तर वे सब अपने - अपने पतियोंके साथ राजभवन में जा हर्षित हो निवास करने लगीं, यह अर्थ किया है; तव वादीका खण्डन होगया । श्रीवाल्मीकिको भी तथा महाभारतको भी हमारा ही अर्थ इष्ट है, इस विषय के प्रमाण ' आलोक ' ( ७ ) ६७६-६७६ पृष्ठोंमें देखने चाहियें । मैथुनपक्ष में भी वहाँ योनिजता के कारण शीघ्र शारीरिक वृद्धि होनेसे हमारे पक्षकी क्षति नहीं । जबकि स्वा. द. जीने अयोनिज सृष्टिका यौवन तथा संयोग उसी दिन उत्पन्न हुनका भी बता दिया है; यहां तो अयोनिज सीता को ६ वर्षकी बताया है । मानुषी सृष्टिसे विलक्षण गाय २-२ ॥ वर्षमें ही गर्भ ले लेती है । पथिकके मान्य देवीभागवतमें भी श्रीरामको ' षोडशवार्षिक ' ( ३२८७ ) तथा सीता को ‘ अयोनिजा ' ( ३ | ३० | १२ ) माना है; तब क्या १६ वर्षके लगभग-के श्रीरामको सीता १६-२४ वर्षकी दी जाएगी? या सुश्रुतसं. के अनुसार ६ वर्ष कम अवस्था वाली? चरकसंहितामें लिखा है- ' नर्ते वै षोडशाद् वर्षात् सप्तत्याः परतो न च । श्रेयस्कामो नरः स्त्रीभिः संयोगं कर्तुमर्हति ' ( चिकित्सित २/४० चतुर्थ पाद ) में १६ वर्षसे पुरुषको स्त्री - संयोगकी अभ्यनुज्ञा दी गई है । महाभारत श्राश्वमेधिकपर्व में भी कहा है - ' युवा पोडशवर्षो हि यद्यद्य भविता भवान् ' ( ५६।२२ ) ददामि पत्नीं कन्यां च स्वां ते दुहितरं द्विज! ' ( ५६।२३ ) कि - यदि तुम CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीमीतारामको वैवाहिक अवस्था [ १२६ १६ वर्षके युवक हो; तो मैं तुम्हें अपनी लड़की पत्नी रूपमें दूँ " । मनुस्मृति में पादिक ब्रह्मचयंके बाद भी पुरुषको स्त्री - विनाहकी अभ्यनुज्ञा दी गई है, ' पट्त्रिंशदाब्दिकं चयं गुरौ त्रैवेदिकं व्रतम् । तदर्धिकं पादिक वा ग्रहणान्तिकमेव वा ( ३१ ) पादिक ब्रह्मचर्य ६ वर्षका माना जाता है । यह स. प्र. ३ समु. प्र. २५ में स्वा. द. जीने भी माना है जैसे कि - ' वा नौ वर्ष तथा जब तक विद्या पूरी ग्रहण न कर लेवे, तब तक ब्रह्मचर्य रखे ' ' अथवा एक वेदको साङ्गोपाङ्ग पढ़के " गृहाश्रममें प्रवेश करे ' ( स. प्र. ४ पृ. ४६ ) आठवें वर्ष जनेऊका पक्ष मानने पर ६ वर्ष तक एक वेदका अध्ययन करनेसे १६ वर्षकी आयुका कुमार शास्त्रानुसार विवाह कर सकता है । क्षत्रियका काम्य उपनयन मनुस्मृतिके अनुसार छठे वर्षमें भी हो सकता है । इसे स्वा. द. जीने भी संस्कारविधिमें माना है-' जिसको शीघ्र वलकी इच्छा हो; तो क्षत्रियके लड़के का जन्म वा गर्भसे छठे वर्षमें यज्ञोपवीत करे ' ( उपनयन. पृ. ७६ ) । सो इसके अनुसार १४ - १५ वें वर्ष में भी कुमार विवाह कर सकता है । श्रीराम इसी ( १५ वर्षकी ) अवस्थामें विद्या पूर्ण कर लेनेसे विद्यास्नातक होगये थे, तभी उनके विवाहकेलिए सोचा जाने लगा । ' चरितब्रह्मचर्यस्य विद्यास्नातस्य धीमतः ' ( २२८२ । ११५ ) ' ते चापि ( रामादयः ) मनुजव्याघ्रा वैदिकाध्ययने रताः । धनुर्वेदे च निष्ठिताः । अथ राजा दशरथस्तेषां दारक्रियां [ विवाहं ] प्रति । ( चिन्तयामास ' ) १।१८।३६-३७ ) । तव वादि - प्रतिवादिमान्य धर्म-शास्त्र के अनुसार भी राम - सीताकी इस आयुके विवाह में कुछ स ० ध ० ६ Gujarat. An eGangotri Initiative

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१३० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ९ ) भी विरोध न रहा । सीता अयोनिजा होनेसे जन्मते ही बढ़ गई थो । वह छः वर्षकी भी उस समयकी १२ वर्षकी लड़की के समान शरीरवाली थी । तो ' अत्यन्त वाला ' न होनेसे वहां भी रमण ( आमोद - प्रमोद ) में कोई अनुपपत्ति नहीं आती । वहाँ गर्भाधान नहीं कहा गया । गर्भाधान तो लङ्कासे लौटनेके बाद कहा है । अतः आयुर्वेदका भी कुछ व्याकोप न रहा । वस्तुतः नवीन - धारा के लोग अपना मनमाना एक सिद्धान्त स्थिर कर लिया करते हैं, फिर उससे विरुद्ध मिले हुए वचनोंका अर्थं तोड़ - मरोड़कर बदलने की चेष्टा किया करते हैं । जब उसमें भी पूर्वापर - प्रकरणवश वे सफलता नहीं प्राप्त कर सकते; तव उन स्व - प्रतिकूल वचनोंको प्रक्षिप्त कहकर अपना बचाव करनेकी चेष्टा किया करते हैं । वस्तुतः यह पाश्चात्य शैली है । इस प्रकार के ही लोग ऋसं. के प्रथम तथा दशम मण्डलको भी प्रक्षिप्त मान लिया करते हैं । वे व्यक्ति मान्य नहीं हो सकते । जो कि वादीने ' वेदवाणी ' ( १५/११ ) में लिखा है - ' कई सूत्र-कार विवाहके समय ससुराल में और कई पतिगृह में चतुर्थीकर्म मानते हैं, यह गोभिलगृ. में स्पष्ट लिखा है । अतः सीताका यहाँ ' रमण ' मैथुन ही है ' यह वादीकी बात गलत है, चतुर्थी - कर्म में मैथुन नहीं होता । रामायण में सीताका चतुर्थी -कर्म कहीं भी दिखलाया नहीं गया । रमणका अर्थ यहाँ मैथुन नहीं है । ' चतुर्थी - कर्मके विषयमें आगे लिखा जायगा । ' सीताजी तथा अन्य वहिनें प्रौढा थीं ' यह पथिककी ' साध्य ' बात है, ' सिद्ध ' CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीसीतारामकी वैवाहिक अवस्था नहीं । ' प्रौढा ' तो आयुर्वेद के अनुसार ५० वर्ष से है, तब क्या पथिक उनकी यही अवस्था मानता है ऊपर ? की । ज । प्रति के अनुसार यहाँ ' चतुर्थीकर्म'का कुछ भी वर्णन वा सङ्केत चतुर्थीकर्म ब्राह्ममुहूर्त में करना पड़ता है, उसमें मैथुन नहीं उसमें एक कर्मविशेष हवनादि करना पड़ता है हुमा क यह पाल आदि गृह्यसूत्रों में स्पष्ट है, यह हम आगे स्पष्ट करेंगे । है रागात्मक होता है और ऋतुकाल के नियत दिनों में करना य है । इसकी निश्चित तिथि वा विधि हो ही नहीं सकती म स्वा.द. सम्मत पारस्करगृह्यसूत्रमें ' त्रिरात्रमन्ततः ' लिख वर्षे तक वा भार्याकी योग्यता होनेपर अन्य विकल्प भी । गये हैं । हमारे पक्षमें तो मैथुनपक्षमें भी कोई हानि नहीं, द विषयमें हम ' आलोक ' ( ७ ) में स्पष्टता कर चुके हैं, उस " प्रतिपक्षी चुप्पी लगा गया । कुछ आगे भी हम स्पष्टता का न वाले हैं । ' पतिसंयोग - सुलभं'के अर्थ में पथिक ' रेमिरे रह: के स अर्थकी साक्षी व्यथें दे रहा है, इन सबका समाधान ह 6: ' आलोक ' ( ७ ) में कर चुके हैं; जिसपर उसकी लेखनी बन्दा चुकी । ' ताः सर्वा राजसुताः श्रभिवाद्यान् भर्तृभिः सहिता श्री म वाद्य मुदिता रहः रेमिरे ' यह वादि- सम्मत पद्यका ' शुद्ध अल दिखलाकर वादीके श्रद्धेय सातवलेकरजीने ' बालकास ह निरीक्षण ' ( पृ. ६१७ ) में ' मैथुन ' अर्थ खण्डित कर दिया है । घ ' पुत्री जव प्रौढा होती है, तभी पिताको वर ढूँढनेकी चि Gujarat. An eGangotri Initiative

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१३२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) परकी हो जाती है ' यह पथिकका कथन है; सो सीता भी मनुष्य-। जन्मसे विलक्षण उत्पत्ति होनेसे जन्मते ही वहुत बढ़ गई थी, प्रति सङ्केत अतः जनकजीका सीताके विषय में चिन्तित होना - यह रामायण-से में स्पष्ट है । पृथ्वी से उत्पन्न वृक्ष वा लताएँ भी कितने शीघ्र बढ़ हुआ का जाते हैं, कितने शीघ्र उनको पुष्प वा फल लग जाते हैं । गे मानुषी से भिन्न योनिवाली गाय तो २, २ ॥ वर्षमें ही गर्भग्रहरण-। मे योग्य हो जाती है; करना प मालूम होता है । इस और स्तन आदि लिखा- आशङ्का रहती है रूप भी । इन बातोंका मनन प्रतिपक्षीने नहीं किया मोटी मानुषी लड़कियोंकी भी शरीर - वृद्धि, शीघ्र हो जाते हैं; तव उसके रजः - स्रावकी । शास्त्रविश्वासी उससे पूर्व ही उसका वर ढूंढनेकी चेष्टा करता है - इत्यादि । इस विषय में ' आलोक ' ( ७ ) नहीं, ( पृ. ६७०-७२ ) में हम स्पष्ट कर चुके हैं; पर प्रतिपक्षी लोग उधर हैं, उस न तो दृष्टि डालते हैं, न उसका कुछ प्रतिसमाधान करते हैं । ष्टता केवल पिष्टपेषण करके दिखलाते हैं कि हमने ' कुछ ' लिख दिया हैं; पर विद्वान् उनका यथार्थ रहस्य समझते हैं । के ' स्मितवक्त्रा, स्मयमाना ' आदि सबका समाधान हम नाधान ' लोक ' ( ७ ) में कर चुके हैं । इस प्रकार ' वस्त्रान्तर्व्यञ्जित - स्तनी ' न्नी बन्दा ( १ । ६ । ३० ) पर भी हम वहीं उत्तर दे चुके हैं । उसमें जब हिता श्री मूलमें ' पीनपयोधर ' शब्द सर्वथा नहीं है; तब वैसा बनावटी युद्ध अन्न अर्थ किसी भी वर्तमान टीकाकारका हो, वह माननीय नहीं बालकाण्ड हो सकता । मोटी लड़कियोंका जब आरम्भिक स्तनोंका उद्गम या है । छोटी आयुसे ही वस्त्रके अन्दरसे ही झलकने लगता है, उस नेकी चि CC - 0. Ankur Joshi श्रीसीतारामकी वैवाहिक अवस्था [ १३३ समय पीनता नहीं होती । वे धीरे - धीरे बढ़ते रहते हैं । मोटे लड़कोंके भी छोटी आयुमें स्तन दीखने लग जाते हैं मोटी लड़कियोंका तो कहना ही क्या? इससे उन लड़कियोंकी कोई वड़ी आयु सिद्ध नहीं हो जाती, अयोनिजा लड़की के कुच तो और भी शीघ्र उद्गत हो सकते हैं । इससे श्रीसीताकी छः वर्षकी युके विवाह में कोई रुकावट नहीं पड़ती- यह हम ' आलोक ' ( ७ ) में स्पष्ट कर चुके हैं ।. ' दुकूलपरिसंवीता ' का ' वह अति उत्तम साड़ी पहने हुई थी, जिसमें से उसके पीन पयोधर मलक रहे थे ' यह वादीका किया अर्थ उपहासजनक है । क्या पयोधर साड़ी से झलकते हैं? महाशय! ' दुकूल ' का अर्थ ' साड़ी ' नहीं होता । शेष रावणके उस सीता पर मोहित होने का जो आक्षेप वादी ने दिया है, उसमें किये हमारे समाधानको वादीने छिपा दिया है । वह तो पृथिवीसे जन्मते ही बहुत बढ़ गई थी । उसी समयसे ही राजा लोग उसके वरणके लिए आने लग गये थे । जैसे कि - रामायणमें ही स्पष्ट है – “ भूतलाद् उत्थितां तां तु वर्धमानां ममात्मजाम् । वरयामासुरागत्य राजानो मुनिपुङ्गव! ” ( १।६६।१५ ) । तत्र जब वह छः वर्षकी होगई, तब तो उस अयोनिजा सीता की शारीरिक वृद्धिका क्या कहना? ( क ) श्रीगणेशजी पार्वती से अयोनिज उत्पन्न हुए थे । पैदा होते ही उसी समय उनकी इतनी वृद्धि होगई कि - पार्वतीने उसे रक्षार्थ द्वारपर बैठा दिया; और उसका महादेवसे उस समय Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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१३४ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ). युद्ध भी हुआ । ( ख ) श्रीव्यासजी दिव्य संयोगसे उत्पन्न होने से दिव्यतावश पैदा होते ही पराशरजी के साथ तपस्यार्थ वनमें चले गये थे । यह महाभारतमें जल्दी बढ़ गया था - यह • पितुर्गृ हे सा ववृधे शुक्लपक्षे यहाँ पर साधुकी लड़की का लिखा है; तभी उसका नाम वत्रों की पैदा होते ही वृद्धि परिशिष्टोंमें समाचारपत्रोंकी स्पष्ट है । ( ग ) मत्स्यावतार कितनी शतपथ ब्राह्मणादिमें स्पष्ट है । ( घ ) यथा शशी ' ( सत्यनारायणव्रतकथा ) चन्द्रकलाकी तरह शीघ्र बढ़ जाना भी ' कलावती ' रखा गया । ( ङ ) कई होगई- यह हमारे ' आलोक ' के साक्षी देखनी चाहिये । तव रावण-की सीतानुरक्तिका उत्तर होगया । ( च ) त्रेतायुगमें आकार - प्रकार बड़े होते थे, कलियुगमें कद छोटे होगये । जब मुचुकुन्द गुफासे बाहर आये, और मनुष्य - वृक्ष आदिका आकार - प्रकार छोटा देखा; तो समझ गये कि कलियुग आ गया । ' स वीक्ष्य क्षुल्लकान् ( स्वल्पाकारान् ) मर्त्यान्... मत्वा कलियुगं प्राप्त ( श्रीमद्भा.१० | ५२/२ ) इससे त्रेता - द्वापर आदिमें स्त्री - पुरुषोंका आकार - प्रकार बड़ा होता था; तब छः वर्ष की अयोनिजा सीता के बड़े आकारका तो क्या कहना? यौवनकी मीमांसा ' आलोक ' ( ७ ) प्र. ६६४ से ७०६ पृ. तक हम कह चुके हैं । उसके प्रत्युत्तर में प्रतिपक्षी मूक होगया । श्रीरामके मर्यादापुरुषोत्तमत्व पर भी हमने वहीं ( पृ.६८८-८६ में ) मीमांसा कर दी है । देवी भागवतको यदि पथिक प्रमाण मानता हैं; जो कि उसने उसकी साक्षी दी है, तो देवीभागवत ( ३ | २८ | ७ ) CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीसीतारामकी वैवाहिक अवस्था के अनुसार १६ वर्ष वाले श्रीरामका विश्वामित्रके यज्ञकी f करके अयोनिजा - सीतासे विवाह दिखलाया है । ' ऊन पोह वर्षायां ' इस सुश्रुतंवचन के अनुसार वादी भी पति - पत्नीमें वर्षोंका अन्तर मानते हैं; तब १६ वर्षके लगभगके श्रीराम य ६-७ वर्ष वाली सीता न दिलवाकर क्या वादी २०-२४ वर्षक प सीता दिलवाकर ' बहू बड़ी घर छोटे लाला ' को चरित करेगा? प्रतिपक्षीने सीता - रामकी विवाहकी नियत अवस्था रामावत ति के किसी भी प्रमाणसे नहीं दी; तब उसका सन्दिग्ध पक्ष क भी खण्डित हो गया । जो कि वह ' ऊनषोडशवर्षो मे रामे " उषित्वा द्वादशसमाः, मम भर्ता महातेजाः, अष्टादश हि वर्षा प्र मम ' इत्यादि रामायणके वचनोंको प्रक्षिप्त बताता है; यह स रा व्यर्थकी बातें हैं । सं. १६६२ में प्रकाशित ' दयानन्द महाविद्य र लय - ग्रन्थमालाकी वाल्मीकि रामायण में जिसका सम्पाद य लाहौरसे आर्य - समाजके कट्टरभक्त श्रीभगवद्दत्तजीने वि श्रीविश्ववन्धुजीने किया था, इन माना । उसमें ' ऊनषोडशवर्षो ' ' उषित्वा द्वादश समाः मम सप्तविंशकः । अष्टादश तु ( ३ | ४७ | ε ( १० ) में दिये गये हैं । प्रक्षिप्तता नहीं; बल्कि उनके दिये पद्योंको कहीं भी प्रक्षिप्त न वर्ष बालकाण्डमें १८/२ में त भर्ता तथा ब्रह्मन्! वयस का वर्षाणि ममाप्यायुर्निगयो । ' द इनमें कुछ पाठ - भेद् तो है, वा गये पद्य अन्य भी स्पष्ट हैं । त्व ( ७ ) अन्य प्राचीन टीकाकार भी इन्हें प्रक्षिप्त नहीं मानते Gujarat An eGangotri Initiative

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[ १३६ ] श्रीमनातनधर्मालोक ( ६ ) की र जिन्हें टीकाकार प्रक्षिप्त मानते हैं, उनको टीका नहीं करते । इन -पोद्या श्लोकोंकी तो उन्होंने ऊहापोह पूर्वक स्पष्ट टीका की है । हम लीमें उस टीकाको ' आलोक ' ( ७ ) पृ. ६४५-६४६ में दिखला चुके हैं । श्री राम यहाँ हम अन्य टीकाकारोंकी टीका भी उद्धृत करते हैं, जिससे ८४ वर्ष पथिकको इनकी तथाकथित प्रक्षिप्तता हटकर अन्य श्राशङ्काएँ भी चरिता दूर करनेवाली सिद्ध होंगी । ' ऊनषोडशवर्षो हि रामो राजीवलोचनः ' यहाँ पर महेश्वरतीर्थ रामाव लिखते हैं- ' ऊनपोडशवर्षे ' शब्दस्य द्वादशाब्द पर्यवसानम् । तत् पक्ष कथम्? कौशिकयागसंरक्षणार्थमागत - रामवयोविशेषमुद्दिश्य मे राम्रो ' बालोद्वादशवर्षोऽयमकृतास्त्रश्च राघवः ' इति अरण्यकाण्डे रावणं हे वर्षादि प्रति मारीचोक्तत्वात् ' ( अर्थात् यहाँ ' सोलह वर्षोंसे कम ' का अर्थ रामका १२ वर्षकी आयु वाला होना है; क्योंकि –आगे मारीच यह स रावणको श्रीरामकी आयु बारह वर्षकी बताता है ) । नहाविद्या यहाँ भूषणटीका लिखती है - ' ऊना: - असंम्पूर्णाः षोडशवर्षा सम्पाद यस्य स तथोक्तः द्वादशवर्ष इति यावत्- ' बालो द्वादशवर्षोऽयम् ' इति ने तय विशिष्य वक्ष्यमाणत्वात् ( यहाँ भी वही कहा है ) । परिपूर्णषोडश-क्षिप्त वर्षो हि युद्धक्षमो भवति । द्वादशवर्षो बालः कथं युद्धाय प्रभव-२ में व तीति वालः ( यह दशरथके वाक्यका अनुवाद है, जो विश्वामित्र-! वय को कहा गया था ) । यत्तु कौशल्यया वनप्रवेशसमये प्रोच्यते— युर्निग ' दश सप्त च वर्षाणि जातस्य तव पुत्रक! ' इति, तत् कौसल्या-तो है, ' वाक्ये ‘ जातस्य ' इति द्वितीयं जन्म उच्यते, क्षत्रियस्यापि द्विज-पष्ट हैं । त्वात् । द्वितीयं जन्म च उपनयनम्, तच्च वृद्धेन दशरथेन काम्य-ह्रीं मानते । CC - 0. Ankur Joshi श्रीसीतारामकी वैवाहिक अवस्था [? 29 Collection Gujarat. पक्षमाश्रित्य गर्भाष्टम एव कृतम् । तथा च द्वितीय - जन्मापेक्षयः सप्तदशत्वम्, उपनयनात् पूर्वं सप्त वर्षाणीति ( एवं २५ वर्षीय-स्तदा श्रीरामः ) । ' वयसा पञ्चविंशकः ' इति सीता - वचनमपि उपपन्नम् | ' ऊनषोडशवर्ष इत्यत्र पादोनत्वम्, द्वादशवर्षे इत्यन्यत्र उक्तत्वात् । अतः सर्वथा वनप्रवेशकाले पञ्चविंशतिवर्ष एव रामः । ननु विवाहितस्यैव सम्भोगः श्रूयते - ' रामस्तु सीतया सार्धं विजहार बहून् ऋतून ' इति स कथं द्वादशवर्षस्य वालस्य सम्भवति? सम्भवत्येव । सौकुमार्यातिशयेन प्रौढशरीरतया । अतएव देव्याश्च षड्वर्षे एव यौवनारम्भः ' अष्टादश हि वर्षाणि मम जन्मनि ' इति वनप्रवेशे अष्टादशत्वम् । विवाहकाले सीतायाः षड्वर्षत्वमवगमयतीति सर्व सुस्थम् ' । गोविन्दराजीय, रामानुजीय, तनिश्लोकी, महेश्वर- तीथंकी टीका में ' मम भर्ता वयसा पञ्चविंशकः ' । ' वयसा पश्र्च-विंशतिवर्षारिण अर्हतीति पञ्चविंशतिवर्ष इत्यर्थः । वयः - परिमाणं वनानर्गमनकालिकम् । मम जन्मनि सति वर्षाणि श्रष्टादश- इति गण्यते । रामस्य जन्म आरभ्य द्वादशे वर्षे विश्वमित्रागमनम् । तदनन्तरं वैदेह्या सह नगरे द्वादशवर्षाणि वासं कृतवान् । ततः परं त्रयोदशे वर्षे यौवराज्याभिषेकारम्भः । ततः वनप्रवेशसमये रामः पञ्चविंशतिवर्षार्हः । ततो मुनीनामाश्रमेषु दश वत्सराः । पञ्चवटचां त्रयः । वनवासस्य चतुर्दशे वर्षे सीताहरणम् । सीतायाश्च भूगर्भाद् आविर्भावानन्तरं मिथिलायां षट् संवत्सराः । ततो विवाहानन्तरमयोध्यायां द्वादश इत्येवम् अष्टादशवर्षा गता An eGangotri Initiative

पृष्ठ 86

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१३८ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( 8 ) वनवासारम्भे । इदानीं तु रामः अष्टात्रिंशद्वर्षः । मम तु एकत्रि-शद् वर्षा गताः । इदानीं तु द्वात्रिंशो वर्षो वर्तते ' । रामानुजीय टीका- ' ननु इदानीमेव रामः पञ्चविंशतिवर्षः, देवी चाष्टादशवर्षा इति किं न गण्यते इति चेत्, तदानीन्तन-वृत्तान्तस्य इदानीमुच्यमानत्वाद् इदानीमष्टात्रिंशद्वर्षत्वाद् देव्यास्तु एकत्रिंशद्वर्षत्वाश्ञ्च पञ्चविंशकशब्दस्य न मुख्यार्थस्वीकारः स्यात् । तयोर्वयोगणनाक्रमस्त्वेवम् - रामस्य त्रयोदशे वर्षे सीता-पाणिग्रहणम् । तदारभ्य अयोध्यायां द्वादशसंवत्सरपर्यन्तं वासः । ततः पञ्चविंशे वर्षे वनवासारम्भः ।... मुन्याश्रमेषु दश, पञ्चवट्यां त्रयः । तथाच इदानीं रामस्य अष्टात्रिंशद् वर्षाणीति सिद्धम् । तस्मिन्नेव वर्षे सीतावियोगश्च । ततश्च एकोनचत्वारिंशे पट्टाभिषेकः । देव्यास्तु षष्ठे पाणिग्रहणम् । सप्तमे अयोध्याप्रवेशः । तदारभ्य अयोध्यायां द्वादश - संवत्सरपर्यन्तं वासः । ततश्च एकोनविंशे वनवासप्रारम्भः । ततो मुनीनामाश्रमेषु दश, पञ्चवट्यां त्रयः इति एकत्रिंशद् । द्वात्रिंशे रामवियोगो लङ्का - प्रवेशश्च । ततस्त्रय-स्त्रिंशे रामेण सह पट्टाभिषेकः ' । ' मम इत्येतद् वनप्रवेशसमयमधिकृत्य उच्यते । वनप्रवेशसमये मम भर्ता वयसा पञ्चविंशकः - पञ्चविंश इव । पञ्चविंशतिवार्षिक इति व्यपदेष्टुं शक्यते, नातिपरिणत इत्यर्थः । मम जन्मनि तदानीं वर्षाणि अष्टादश गण्यते - गण्यन्ते । वचन - व्यत्यय आर्षः । जब इस प्रकार टीकाकारोंने इन पद्योंकी स्पष्ट टीका की है; किसी भी प्राचीन विद्वान्ने इन पद्योंको प्रक्षिप्त नहीं माना है; CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीसीतारामकी वैवाहिक अवस्था तब नवीन अंग्रेजी चश्मा धारण करनेवाले, संस्कृतमें श्रात प्रवेश वाले आजकलके सुधारकोंके प्रक्षिप्त कह देने से: यद्द प्रक्षिप्त नहीं हो सकते । २५ वर्षकी आयु में श्रीरामका राज्यामि होना था — अतः उन्होंने १२ वर्ष तक घरमें रहना ही था । * यह १२ वर्ष उनके गृहनिवासको प्रमाणित करनेवाला प बहुत स्थान आवृत्त किया हुआ है, प्रक्षिप्त नहीं हो सकता । ( ८ ) हमने लिखा था कि- सीता रामायणानुसार पृथिव उत्पन्न होनेसे ‘ अयोनिजा ' थी । अयोनिजों तथा मानुषी सृि भिन्न योनिवालोंकी शारीरिक वृद्धि शीघ्र हो जाया करती है. जैसे कि - स्वाद. जीने सृष्टिकी आदिमें उत्पन्न प्रमैथुन - योनियो उत्पत्तिवाले दिन ही ' युवा ' माना था; तव छः वर्षवाली सीबते यौवनका तो क्या कहना '? सो छः वर्षकी सीता श्राजकलवाई १२ वर्षजैसी लड़की के समान थी । उसके शीघ्र विवाहो कारणका भी हमने ' आलोक ' ( ७ ) में निर्देश कर दिया व पर प्रतिपक्षीने उन बातोंको छिपा लिया, और ' धन्यासुता ह I सीता रामपत्नी भविष्यति ' अपने सम्प्रदाय के सचालको व शब्दों में ' विषसम्पृक्तान्न ' पुराणका प्रमाण दे दिया । ' शिवलि पूजापर्यालोचन ' के मुखपत्रके चित्रमें तथा अपने वै.सि.मा प चित्रमें भी स्वाद की वैदिक - तोपके तर्कगोलेसे १८ पुरा उड़ा दिया था; पोपदलको भी वैदिकतोपसे उड़ा दिया गया था स्थ पता नहीं, फिर शिवपुराण कैसे बच गया पथिक भी इ कैसे बन गया? रामायण उसमें न उड़ने पर भी कहाँ उड़ गई । Gujarat. An eGangotri Initiative

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१४० ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) मैं अत मालूम होता है कि उस शिवपुराणने ही स्वा. द. जीकी तोपमें - यह कील ठोंककर उसे वेकाम कर दिया; और स्वा. द. जी पर ही यासिषेत प्रत्याक्रमण करके उनको वा उनके प्रभावको समाप्त कर दिया । था तभी तो दयानन्दके एक कट्टर भक्त पथिकने स्वा. द. सम्मत । वे उपनयनावस्थाका भी खण्डन करना शुरू कर दिया । जैसे कि - हम पहले दिखला चुके हैं । राम - सीता चरित्र विषय में श्रार्य-ता । समाज वाल्मीकि रामायणको अधिक प्रमाणित दृष्टिसे देखती पृथिवी है । तभी तो पथिकने रामायण - महाभारतको स्वा. द. जी की तोप श्री सृि की मारमें नहीं रखा । पर पथिकने यहाँ स्वामी के शब्दों में विष-करती है । सम्पृक्तान्नका प्रयोग करके अचेतस्कता ( वेहोशी ) प्राप्त कर ली; - योनियो जब कि उसमें रामायणका पूरा चरित्र अंकित नहीं । सीब पथिक कहता है - " पुराण में सीताकी माताका नाम ' धन्या ' चकलवार वतलाया है, तब आप उन्हें अयोनिजा कैसे कह सकते हैं? विवाह ' धन्या ' को आप सरीखे शास्त्री पृथिवी समझकर अयोनिजा दिया कहनेकी घृष्टता करते हैं । " तब क्या पथिकके अनुसार रामायणके सुता सा प्रणेता श्रीवाल्मीकिने सीताको पृथिवी से उत्पन्न एवं अयोनिजा चालक बताकर ' धृष्टता ' की है? उसका नाम सीता इसीलिए ही तोहुआ = शिवलित था कि वह हलके अग्रभागसे पृथिवी द्वारा प्रकट हुई थी । सो - सि.मा पृथिवी भी पृथिवी - पति जनक राजाकी स्त्री होनेसे उससे उत्पन्न पुरा अयोनिजा सीताको यदि राजा जनकने ' वीर्यशुल्केति मे कन्या गया था स्थापितेयमयोनिजा । भूतलादुत्थितां तां तु वर्धमानां ममात्मजाम् ' भी इस पद्य में अयोनिजा, पृथिवीसे उत्पन्न कहा है, और उसी में उसे उड़ गई CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीसीतारामकी वैवाहिक अवस्था [ १४१ ' आत्मजा ' और ' कन्या ' कहा है; और उसके अग्रिम पद्य में रामायणमें उसे ' सुता ' कहा है; तो इसमें हमारी ' धृष्टता ' कैसे हुई । उत्तररामचरितमें पृथिवीका पर्यायवाचक ' विश्वम्भरा ' कहा है - ' विश्वम्भरा भगवती भवतीमसूत ' ( २६ ) आर्यसमाजी श्रीशिवशङ्करकाव्यतीर्थने ' जातिनिर्णय ' में सम्भवतः उसे ' धरणी ' शब्दसे कहा है; तव इसमें हमारी धृष्टता क्या हुई? यदि अन्य भी कोई ' अयोनिजा ' आदि लड़की हो; उसे दम्पति स्वीकार कर लें; तव ममता हो ' जानेसे उस लड़की को उन पति - पत्नियोंकी ' आत्मा ' भी कह दिया जाता है; इसमें वह लड़की उनकी अपने से उत्पन्न सिद्ध नहीं हो जाती । ' धन्या ' भी तो ' पृथिवी ' हो सकती है । ' धन्या धात्र्यामलक्योः स्याद् ' यह विश्वकोष तथा मेदिनीकोषमें लिखा है ( अमर. सुधा व्याख्या ३ | १ | ३ ) ' धात्री स्यादुपमातापि क्षितिरप्यामलक्यपि ' ( अमर. ३।३।१७६ ) । पथिकसे प्रमाणित अमरकोषमें धात्री ' पृथिवी'का नाम कहा है । रामायणमें जनकजीकी स्त्रीका नाम नहीं लिखा । पुराणमें यदि उसका नाम ' धन्या ' लिखा है, और यही नाम रामायणमें भी मान लिया जाय; तब भी तो सीताकी अयोनिजतामें क्षति नहीं पड़ती । हमने ' आलोक ' ( ७ ) में लिखा था कि - दत्तक वा पालित वा अन्यकी लड़की होनेपर भी उसे स्वीकार कर लेनेपर उसमें ममता हो जानेसे उसे उन दम्पतियोंकी ' सुता वा आत्मजा ' कहा जा सकता है । इसपर हमने परपुत्री ' शकुन्तला ' को पालक कवकी आत्मजा ' भी शकुन्तलानाटकसे दिखलाया Gujarat. An eGangotri Initiative

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१४२ ] श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) था; जिसपर प्रतिपक्षी ने अपनी आंख बन्द कर ली; परन्तु ख बन्द कर लेनेपर प्रतिपक्षीकी वात थोड़े ही ठीक हो जावेगी! तब पृथिवीसे अयोनिजा उत्पन्न होनेपर भी सीताको जनककी वा उसकी स्त्री की पुराणानुसार धन्याकी ' आत्मजा, वा सुता ' जानकी आदि कहा जा सकता है । ( ६ ) पथिक लिखता है - ' संस्कृतकोषोंमें अपने से उत्पन्न पुत्रियोंको श्रात्मजा, तनया, सुना और जन्म देनेवाली माताओंको जनयित्री, प्रसू, जननी, माता कहा गया है ( अमरकोष ) । अवशिष्ट प्रकारकी [ अर्थात् अयोनिजा या पराई, वा पालित ] लड़कियोंको ' कन्या ' आदि कहा गया है । अतः सीताजी राजा जनक तथा उनकी पत्नी धन्याकी आत्मजा, सुता, तनया थी ' ( वेदवाणी १५/११ पृ. १६ स्तम्भ २ पं. १६-१७-१८-११-२०-२१ ) । पथिकको धन्यवाद हो कि वह अज्ञानियोंको भी मार्ग-प्रदर्शन करता रहता है । अब हम उसके आगे कुछ प्राचीन उद्धरण उपस्थित करते हैं, जहां अयोनिज उत्पत्ति होनेपर भी, वा दूसरों की सन्तान होने पर भी उसके पालक होने पर भी उस सन्तानको ' आत्मज वा श्रात्मजा, सुत वा सुता कहा जाता है । वादी अपनी युक्तिसे अपना खण्डन स्वयं देखे । ( क ) महाभारतके अनुसार द्रुपदका लड़का शिखण्डी था, जो पहले लड़की था; फिर लड़का बन गया । इसलिए भीष्म उससे नहीं लड़े | फिर अग्नि द्वारा धृष्टद्युम्न तथा कृष्णा ( द्रौपदी ) की अयोनिज उत्पत्ति हुई; यह महाभारतमें स्पष्ट है । इस CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीसीतारामकी वैवाहिक प्रवस्था [ विषयमें हम ' आलोक ' ( ७ ) में लिख चुके हैं । सो आदि अयोनिज लड़कोंकेलिए भी महाभारत में आत्मज ' ', प्रयोग किया गया है- ' धृष्टद्य ग्नमुखा वीरा भ्रातरो द्रुपदात्मज्ञ ( १२२०७/२१ ) । ( ख ) द्रौपदी की उत्पत्ति भी अग्नि में हुई अब उस अयोनिजाकेलिए भी ' आत्मा ' का प्रयोग परि देखें - ‘ ततस्तु कुन्ती द्रुपदात्मजां तां ' ( १११६४ | ४, ११२१०११-तब क्या इन अयोनिजोंको पथिक द्रुपदके वीर्थसे उत्पन्न भ लेगा? पर यह निष्प्रमाण होगा । अयोनिज उत्पत्ति वैशेषि आदि दर्शनों में भी बताई गई है । ( ग ) पाण्डवोंको पथिक भी जानता होगा कि वे पार उत्पन्न नहीं थे, किन्तु देवताओंके वरदानसे उत्पन्न हुए थे ( विषयमें ' आलोक ' ( ८ ) में ' नियोग और मैथुन ' देखो ); पर ि व भी महाभारत उन्हें ‘ पाण्डव ' बताता है - ' पाण्डोरपत्यं पाए यह शब्द सुप्रसिद्ध है; तब क्या उन्हें इससे पाण्डुके बी स उत्पन्न मान लिया जावेगा? थ ( घ ) कर्णको तो पथिक भी जानता - मानता होगा कि प सूत तथ, उसकी स्त्री राधासे उत्पन्न नहीं हुआ था; किन्तु सूत प्रभावसे कुन्तीमें उत्पन्न हुआ था । सूत तथा उसकी स्त्री राह उसे पाला मात्र था । फिर भी उसे महाभारतमें ' सूतजं ' ( कई क ६।५१ ) सूतका आत्मज कहा गया है; तव क्या वह सूतके व उत्पन्न हुआ था यह पथिक सिद्ध कर सकता है? तव क स इससे उसका पक्ष खण्डित नहीं हुआ? क्या यहां पर Gujarat. An eGangotri Initiative

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१४४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ६ ) [ व्यासजीकी भी इसमें धृष्टता मानता है? ( ङ ) अन्य देखिये –महाभारतमें कांको ' सूतात्मजः ' ( कर्ण-शब्द पर्व ८६।३७ ) भी कहा गया है; तब क्या कर्ण सूतकी स्त्रीमें उसी-दात्म के वीर्याधान से पैदा हुआ था कि - उसे ' सूतात्मज ' कहा गया यदि नहीं; किन्तु ' सूतात्मज ' लिखा होनेपर भी वह करको? ग परि ' सूतपालित ' ही मानेगा, वैसे सीता के लिए कहे हुए ' ममात्मजा ' = १०/१२ शब्द से भी जनकसे पालितही मानना पड़ेगा । तव श्रयोनिज उत्पन्न म सीताकी छः वर्षकी होनेपर भी सृष्टिकी आदिमें उत्पन्न अयोनिज तवैश सृष्टिकी शीघ्रवृद्धिकी भांति उसके शीघ्रयौवनप्राप्ति में क्षति नहीं पड़ती । -वे पा ( च ) वादी अन्य भी प्रवल प्रमाण देखे - कर्णको महाभारतमें ये ' राधेय ' भी कहा गया है । जैसे कि - ' एवमुक्तस्तु राधेयो युद्धात् ]; पर ि कर्णौ न्यवर्तत ' ( १ | १६२।२३ ) ' स्त्रीभ्यो ढकू ' ( पा. ४ | १ | १२० ) यह ढक् पाए प्रत्यय ‘ आत्मज ' अर्थमें ही होता है, जैसे गाङ्गेयः, सौमित्रेयः, केबी सौभद्रयः । तब क्या कर्ण सूतकी स्त्री राधासे पैदा हुआ हुआ था? यदि नहीं; तब भी उसे ' राधेय ' कहा गया है; तव यदि न्गा किन पालिता सीताको ' जनकात्मजा अथवा धन्यासुता ' कहा गया किन्तु तव इससे श्रीसीता के अयोनिजत्व में भी क्षति नहीं पड़ती है, । स्त्री राम ( छ ) अन्य देखिये - कर्णको ' सूतसुत ' ( कर्णपर्व ८६।१६ ) भी - ( क कहा गया है । पथिक अपनेसे उत्पन्न पुत्रको ' सुत ' कहता है; तब तब क्या कर्ण सूतके वीर्यसे उत्पन्न हुआ था? यदि नहीं; और वह ? तब सूतसे पालित ही था; तब भी यदि उसे ' सूतसुत ' कहा गया है; महां CC - 0. Ankur Joshi श्री सीतारामकी वैवाहिक अवस्था [ १४५ Collection Gujarat. वैसे ही सीताको ' जनकसुता ' कहने पर भी वह जनकपालित ही सिद्ध होती है, जनक- वीर्यज नहीं । ( ज ) शकुन्तलाको पथिक विश्वामित्रके वीर्य से उत्पन्न तथा कण्वसे पालित जानता वा मानता होगा । वही शकुन्तला अपने आपको ' सुतां कण्वस्य मामेवं विद्धि त्वं मनुजाधिप! ' ( महाभारत १२७२/१८ ) कण्वकी ' सुता ' कहती है; तब क्या वह नैष्ठिक ब्रह्मचारी कण्वके वीर्यसे उत्पन्न मानी जावेगी? यदि नहीं, किन्तु पालित ही; वैसे ' धन्यासुता ' भी ' धन्यासे पालित ' ही मानी जावेगी । वादी से प्रमाणित अध्यात्मरामायणमें भी यह स्पष्ट कर दिया है - ' यज्ञभूमि विशु-द्धयर्थं कर्षतो लाङ्गलेन च । सीता ( हल ) मुखात् समुत्पन्ना " शुभ लक्षणा । तामद्राक्षमहं प्रीत्या पुत्रिकाभावभाविताम् । अर्पिता प्रिय-भार्यायै ' ( १ | ६ | ५६-६० ) अर्थात् भूमिसे उत्पन्न हुई सीता को भूमिपति मैंने अपनी सुता ( स्वसुतोदन्तं ० ११६५८ ) पुत्री बनाया । ( झ ) अब पथिकसे प्रमाणित पुराणके प्रमाणपर भी विचार करना चाहिये - शिवपुराण रुद्रसं. पार्वती खं ० २ य अध्याय में हिमालय पर्वतकी स्त्री की तीन पुत्रियाँ बताई हैं, उसमें ज्येष्ठाको लड़कीका नाम पार्वती ( २८ ) बताया है, और दूसरीकी लड़की का नाम ' कन्या प्रिया द्वितीया तु योगिनी जनकस्य च । तस्याः कन्या महालक्ष्मीर्नाम्ना सीता भविष्यति ' ( २६ ) यहाँ सीताको धन्याकी ' कन्या ' बताया गया है । ' कन्या ' शब्दका प्रयोग पथिक अपनेसे न उत्पन्न हुई, अयोनिज आदि लड़की के लिए मानता है । तब सीता भी इस प्रमाणसे जनकपालिता एवं .स ० ध ० १० An eGangotri Initiative

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१४६ ] श्री सनातनधर्मालोक ( 8 ) अयोनिज सिद्ध हो गई । ( ञ ) अव स्व - प्रमाणित पुराणका अन्य स्पष्ट प्रमाण पथिक देखे – ' तिस्रो भगिन्यस्ताः तात! पितॄणां मानसी: सुता. ' ( २।४२ ) यहाँ पर उन तीन बहनोंको मानस ( अयोनिज ) बताया गया है । उन अयोनिजोंको पुराण के प्रमाण में ' सुताः ' कहा गया है । इस पथिक - प्रमाणित पुराणके वचनसे ( क्योंकि - इस पुराणके वचनसे अतिरिक्त पथिकने अन्य प्रमाण कोई नहीं दिया ) स्पष्ट सिद्ध होगया कि- ' मानस सन्तान ' ( अयोनिज ) को भी ' सुताः ' कह दिया जाता है, तब धन्याकी सुता सीता भी ' अयो-निज ' सिद्ध हो गई । इसी प्रकार रामायणमें भी अयोनिजा, पृथिवीसे उत्पन्न सीता के लिए यदि उस पृथिवी के पति जनककी ' सुता, वा आत्मजा शब्द आया है, उसका भी समाधान इस पुराणके प्रमाण तथा पूर्वोक्त महाभारतके प्रमाणोंसे हो गया । सो यदि अब पथिक पुराणकी बात मानता है, तो पुराणमें भी सीताकी विवाहावस्था ६ वर्षकी लिखी है - यह ' आलोक ' ( ७ ) पृ.६४७ में देखे, उसे भी मान ले; और मैथुनोत्पन्नतामें शरीर शीघ्र बढ़ जाता है; जैसे कि - स्वाद. जीने सृष्टिकी आदिमें मैथुनोत्पन्न स्त्री - पुरुषोंको उत्पत्ति वाले ही दिन युवावस्थामें ( स.प्र. १३६ ) माना है और उनका विवाह भी माना है, तब श्रमैथुनयोनि, पृथिवीसे उत्पन्न छः वर्षकी सीता के यौवनका तो भला क्या कहना? अतः देश - कालभेद के कारण ६ वर्षकी युवति सीताके विवाहमें कुछ भी अनुपपत्ति नहीं आती । CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीसीतारामकी वैवाहिक अवस्था [ " जब ' दयानन्दतिमिरभास्कर ' में ' पं ० ज्वालाप्रसाद जी १२ वर्षकी लड़की का विवाह ' द्वादशवर्षीयां पत्नी मावहेत् ' सुश्रुतसं. के वचन से दिखलाया, तव उसके प्रत्युत्तर में श्र: समाजी श्रीतुलसीरामस्वामीने ' भास्कर प्रकाश ' ( ४६ समुहाद प्र में उक्त पाठकी साधुता मानते हुए समाधान किया कि -सुश्रुत II १२ वर्षकेलिए लिखा- " हम तो यह मानते हैं कि- " जो वैद्य थे; उन्होंने वङ्गाल आदि देशोंको लक्ष्यमें रखकर वहाँ त निर्वाहार्थ यह दूसरा वचन ( १२ वर्षकी लड़कीके विवाह र लिखा है, जिससे यह सिद्ध होता है कि- जहाँ जब युवास होती हो; वहां तव ही विवाह करे । यही वेदका सिद्धान्त है । ये भेदसे वर्ष - संख्या भले ही भिन्न - भिन्न रहे ' । जव ऐसा है; और स्वा.द.जीके आदि सृष्टि के अमैथुनेत जोड़े, जब कि उत्पत्तिवाले दिन ही युवा पैदा हुए ' ( देखो स X तब विदेह - देशकी अमैथुनोत्पन्न सीता जो उत्पत्तिवाले ही । स वहुत बढ़ गई; छः वर्षकी हो जाने पर भला उसे युवति व माना जाए, और अमैथुनीत्पन्न डील - डौलवाले १२-१५ व राम भी युवा क्यों न माने जावें? श्लो इससे सिद्ध हुआ कि - सीतारामका विवाह वेद - वि विं आयुमें नहीं हुआ । जब कि स्वामीने आदिम अमैथुनिक बो का विवाह उत्पत्तिवाले दिन ही करवा दिया; वादी उसमें वे विरोध नहीं मानता; तब अमैथुनिक सीताराम की हमसे अभ विवाहावस्थामें भी वेद - विरोध कुछ भी नहीं आता । इस । Gujarat. An eGangotri Initiative