ऐतरेय ब्राह्मण पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 491–500

ऐतरेय ब्राह्मण पूर्वार्द्ध · पृष्ठ 491–500

पृष्ठ 491

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]:पञ्चमोऽध्यायः पञ्चमः खण्डः सायणाचार्यकृतभाष्योपेतम् ४२ ९ उद्भावयति- तदाहुर्यथा वाव स्तोत्रमेवं शस्त्रं गायत्रीषु सामगाः स्तुवत आनुष्टुभं होताऽऽज्यं शंसति, कथमस्य गायत्र्योऽनुशस्ता भवन्तीति ॥८ ॥

हिन्दी— तदाहुः इस विषय में (कुछ ब्रह्मवादी ) कहते हैं कि यथा वा स्तोत्रम् ( साम गान का ) जैसा स्तोत्र होता है एवं शस्त्रम् उसी प्रकार ( होता का ) शस्त्र भी होना चाहिए किन्तु सामगाः गायत्रीषु स्तुवते सामगायक लोग गायत्री छन्द वाली (ऋचाओं ) में स्तुति करते हैं और होता आनुष्टुभं आज्यं शंसति होता अनुष्टुप् छन्द वाले आज्य शस्त्र का शंसन करता है तो कथम् किस प्रकार गायत्र्यः ( साम गायकों की ) गायत्री छन्द वाली ऋचाएँ अस्य इस ( होता) के (आज्यशस्त्र में प्रयुक्त अनुष्टुप् छन्दस्क ऋचाओं) के अनुकूल हो जाती हैं। सा० भा ० — बहिष्पवमानस्तोत्रगता 'उपास्मै गायता’ ' इत्याद्या ऋचो गायत्रीछन्दस्का: र ‘प्र वो देवाय' इत्यादिकमाज्यशस्त्रम्' अनुष्टुप्छन्दस्कमिति वैयाधिकरण्यं चोद्यम्॥ तस्य परिहारमाह— संपदेति बूयात् ॥९ ॥

हिन्दी—( अब परिहार को कह रहे हैं ) सम्पदा ( अनुष्टुप् में गायत्री का ) सम्पादन होने से अनुकूल होती है— इति ब्रूयात् इस प्रकार कहना चाहिए। सा ० भा ० – अनुष्टुप्सु गायत्रीत्वे संपादिते सति तया संपदा वैयधिकरण्यपरिहारादनुकूलशंसनं भवतीति परिहारं ब्रूयात्॥ संपादनप्रकारं दर्शयति- सप्तैता अनुष्टुभस्तास्त्रिः प्रथमया त्रिरुत्तमयैकादश भवन्ति विरा- ड्याज्या द्वादशी, न वा एकेनाक्षरेण च्छन्दांसि वियन्ति न द्वाभ्यां, 31 ताः षोळश गायत्र्यो भवन्ति ॥ १० ॥

हिन्दी— ( सम्पादन प्रकार को दिखला रहे हैं - ) एताः अनुष्टुभः सप्त ये ( होता द्वारा आज्यशस्त्र में प्रयुक्त) अनुष्टुप् छन्द वाली ऋचाएँ सात हैं । इनमें प्रथमया त्रिः प्रथम (ऋचा ) की तीन बार और उत्तमया त्रिः अन्तिम (ऋचा ) की तीन बार ( आवृति करने से उनकी संख्या) एकादश भवन्ति ग्यारह हो जाती हैं । (इनके साथ ही ) विराड्याज्या द्वादशी बारहवीं विराट् छन्दस्क (ऋचा) याज्या होती है। ताः उन बारह ऋचाओं में षोडश गायत्र्यः भवन्ति सोलह गायत्री छन्दस्क (ऋचाएँ) बनती है; क्योंकि एकेन अक्षरेण छन्दांसि वियन्ति एक (अक्षर के अन्तर) से छन्द नहीं बदलते और न द्वाभ्याम् न दो ( १ ) ऋ० ९.११.१। ( २ ) उ०आ० १.१.१-३.१ - ९ । (३ ) ऋ० ३.१३.१-७।

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: [४३० ऐतरेयब्राह्मणम् १०.५ द्वितीयपञ्चिकायां (अक्षरों के ही अन्तर से छन्द बदलते हैं ) । विमर्श-( १ ) प्रातः सवन में अनुष्टुप् छन्द वाली सात ऋचाओं का शंसन करता है उनमें से प्रथम और अन्तिम ऋचा की तीन - तीन बार आवृति होने के कारण उनकी संख्या ग्यारह हो जाती है। एक अनुष्टुप् छन्द बतीस अक्षरों वाला होता है। इस प्रकार ग्यारह ऋचाओं में कुल ३५८ अक्षर होते है। इसके साथ ही एक विराट् छन्द वाली याज्या का शंसन होता है जिनमें ३० अक्षर होते है। इस प्रकार होता द्वारा प्रयुक्त ऋचाओं में कुल ३८२ अक्षर होते हैं । गायत्री छन्दस्क ऋचाएँ २४ अक्षरों वाली होती हैं । इस होता द्वारा प्रयुक्त ऋचाओं के ३८२ अक्षरों में १६ गायत्री छन्दंस्क ऋचाएँ होती हैं । शङ्का – १६ गायत्री छन्द में अक्षरों की संख्या ३८४ होती है जबकि होता द्वारा शंसित ऋचाओं में अक्षरों की संख्या ३८२ ही है । फिर होता द्वारा शंसित ऋचाओं के अक्षरों की संख्या से १६ गायत्री छन्द किस प्रकार सम्पन्न होगे। समाधान — होता द्वारा शंसित ऋचाओं के अक्षरों की संख्या ३८२ है और १६ गायत्री छन्दों में ३८४ अक्षर होंगे। इस प्रकार गायत्री छन्द बनाने में दो अक्षरों की कमी रह जाती है । किन्तु एक अथवा दो अक्षर की कमी अथवा अधिकता से छन्द नहीं बदलता है। अतः यहाँ दो अक्षरों की कमी होने पर भी गायत्री छन्द सम्पन्न हो जाता है। सा० भा० — आद्यन्तयोर्ऋचोस्त्रिरावृत्तौ सत्यां स्वभावतः सप्तानामनुष्टुभामेकादशत्वं संपद्यते । ‘ अग्न इन्द्रश्चेति’’ याज्या विराट्छन्दस्का । सा द्वादश्यनुष्टुबिति गणनीया । यद्यपि तस्या विराजस्त्रयस्त्रिंशदक्षरत्वादेकमक्षरमनुष्टुपत्वादतिरिच्यते तथाऽप्यल्पेन वैकल्येन च्छन्दस्त्वं नापैतीतिन्यायः पूर्वमप्युदाहृतः । एवं सति द्वादशस्वनुष्टुप्सु द्वादश पादानपनीया- वशिष्टैःपादैस्त्रिपदा गायत्र्यो द्वादश संपादनीयाः । अपनीतैश्च पादैश्चतस्रो गायत्र्यः, इत्यनेन प्रकारेण षोडशसंख्याका गायत्र्य एव संपद्यन्ते॥ परिहारं निगमयति- एवमु हास्यानुष्टुब्भिरेव प्रतिपद्यमानस्य गायत्र्योऽनुशस्ता भवन्ति ॥११ ॥

हिन्दी – ( उपर्युक्त परिहार का निगमन कर रहे हैं - ) एवमु इस प्रकार अनुष्टुब्भिः प्रतिपद्यमानस्य अनुष्टुप् छन्द से प्रारम्भ होने वाले अस्य इस ( होता ) के ( आज्यशस्त्र ) गायत्र्यः (बहिष्पवमान स्तोत्रगत) गायत्री छन्द के अनुशस्ताः भवन्ति अनुकूल होते हैं । इदानीमैन्द्राग्नग्रहस्य याज्यां विधत्ते— ( ऐन्द्राग्नीग्रहस्य याज्याविधानम् ) अग्न इन्द्रश्च दाशुषो दुरोण इत्याग्नेन्द्र्या यजति ॥ १२ ॥

( १ ) ऋ० ३.२५.४ । आश्व ०श्री० ५.९.२६।

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]:पञ्चमोऽध्यायः पञ्चमः खण्डः सायणाचार्यकृतभाष्योपेतम् ४३१ हिन्दी— ( अब ऐन्द्रग्नी ग्रह की याज्या का विधान कर रहे हैं - ) ' अग्न इन्द्रश्च दाशुषे दुरोणे' अर्थात् हे अग्नि इन्द्र के साथ अभिसवन करने वाले के घर में (आओ)—इति आग्नेन्द्र्या यजति इस अग्नि और इन्द्र सम्बन्धी (ऋचा ) से यजन ( याज्या ) करता है । सा० भा ० — नन्वैद्राग्नग्रहे पूर्वभावित्वमिन्द्रस्य प्रतीयतेऽग्नेस्तु पश्चाद्धावित्वम्॥ याज्यायां तु तद्विपर्ययः कस्मात् क्रियत इत्याशङ्क्याऽऽह— न वा एताविन्द्राग्नी सन्तौ व्यजयेतामाग्नेन्द्रौ वा एतौ सन्तौ व्यजयेतां तद्यदाग्नेन्द्र्या यजति विजित्या एव, ॥ १३ ॥

हिन्दी— ( याज्या में इन्द्र और अग्नि के स्थान पर अग्नि और इन्द्र के प्रयोग के कारण को कह रहे हैं— ) ( देवताओं और असुरों के युद्ध में देवताओं के लिए ) एतौ इस (इन्द्र और अग्नि) ने इन्द्राग्नौ सन्तौ इन्द्र और अग्नि होकर ( अर्थात् इन्द्र आगे और अग्नि पीछे होकर) न व्यजयेताम् विजय नहीं प्राप्त कर सके । एतौ ये दोनों आग्नेन्द्रौ सन्तौ अग्नि और इन्द्र ( अर्थात् अग्नि आगे और इन्द्र पीछे ) होकर व्यजयेताम् विजय को प्राप्त किया । तत् तो यद् आग्नेन्द्र्या यजति जो अग्नि और इन्द्र (अर्थात् अग्नि को आगे और इन्द्र को पीछे ) करके याज्या करता है, वह विजित्यै एव वह विजय के लिए होता है । सा० भा० — असुरैः सह देवानां विजययुद्धे सति विजयार्थमिन्द्रस्य पुरोगमनमग्नेः पश्चाद्गमनमित्येवं न संपन्नम्। किं त्वग्निः पुरोगत इन्द्रस्तु पश्चाद्गतः । अतो विजयकालीन- क्रमेणैवाग्निपूर्वकत्वप्रतिपादिकया यजने सति यजमानस्य विजयाय संपद्यत एव ॥ याज्यागतान्यक्षराणि प्रशंसति— सा विराट् त्रयस्त्रिंशदक्षरा भवति, त्रयस्त्रिंद् वै देवाः, अष्टौ वसवः, एकादश रुद्रा, द्वादशाऽऽदित्याः, प्रजापतिश्च वषट्कारश्च, तत्प्रथम उक्थमुखे देवता अक्षरभाजः करोत्यक्षरमक्षरममेव तद्देवता अनुप्र- पिबन्ति देवपात्रेणैव तद्देवतास्तृप्यन्ति ॥ १४ ॥

हिन्दी– ( याज्यागत अक्षरों की प्रशंसा कर रहे हैं - ) सा विराट् त्रयत्रिंशद् अक्षरा भवति वह ( याज्या वाली ऋचा 'अग्न इन्द्रश्च' इत्यादि ) विराट् छन्दस्क तैंतीस अक्षरों वाली हैं और अष्टौ वसवः आठ वसुगण, एकादश रुद्राः ग्यारह रुद्रगण, द्वादश आदित्याः बारह आदित्यगण प्रजापतिः वषट्कारः प्रजापति तथा वषट्कार- ये त्रयस्त्रिंद् देवाः देवता भी तैंतीस है। तत् इस ( याज्या के शंसन) से प्रथमे उक्थमुखे मुख्य. ' आज्यशस्त्र के प्रारम्भ में ( होता ) देवताः अक्षरभाजः करोति (तैंतीस) देवताओं को ( याज्या के तैंतीस) अक्षरों से सम्मिलित कर देता है । तद्देवताः वे ( तैंतीस) देवता अक्षरम् अक्षरमेव अनु ( याज्या के ) प्रत्येक अक्षर का अनुसरण करते हुए प्रपिबन्ति ( सोम का )

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: [४३२ ऐतरेयब्राह्मणम् १०.५ द्वितीयपञ्चिकायां पान करते हैं। इस प्रकार देवपात्रेण एव (अक्षररूपी) देवपात्र द्वारा ही तद्देवताः वे देवा तृप्यन्ति तृप्त होते हैं । सा० भा०--अक्षराणां देवतानां न संख्यासाम्यम्। उक्थमुखे शस्त्राणां मध्ये मुख्ये प्रथम आज्यशस्त्रे देवताः । प्रत्येकमक्षरभाजः करोति तास्तदक्षरमेवानुसृत्य ता देवताः सोमं प्रकर्षेण पिबन्ति । तथा सति स्वयोग्येनाक्षररूपेण देवपात्रेणैव देवतास्तृप्ता भवन्तीति॥ शस्त्रयाज्ययोर्देवताप्रयुक्तं वैयाधिकरण्यचोद्यमुद्भावयति । तदाहुर्यथा वाव शस्त्रमेवं याज्याऽऽग्नेयं होताऽऽज्यं शंसत्यथ कस्मादाग्नेन्द्र्या यजतीति ॥ १५ ॥

हिन्दी — तदाहुः इस विषय में ( कतिपय ब्रह्मवादी) कहते हैं कि यथा वाव शस्त्रम् जैसा शस्त्र होता है एवं याज्या वैसी ही याज्या होनी चाहिए, किन्तु होता आग्नेयं आज्यं शंसति होता अग्नि देवता ( वालीऋचाओं) वाले आज्य ( शस्त्र) का शंसन करता है अथ तो कस्मात् किस कारण आग्नेन्द्र्या यजति अग्नि और इन्द्र सम्बन्धी (ऋचा वाली ) याज्या करता है । सा० भा० – शस्त्रस्याग्निरेक एव देवता याज्यायास्त्वग्निरिन्द्रश्चेति द्वयोर्मिलितयो- र्देवतात्वमिति वैयधिकरण्यम्॥ अस्य चोद्यस्य परिहारमाह—.. या वा आग्नेन्द्र्यैन्द्राग्नी वै सा सेन्द्राग्नमेतदुक्थं ग्रहेण च तूष्णी- शंसेन च ॥ १६ ॥

हिन्दी— ( अब उसका परिहार कह रहे हैं- ) या वा आग्नेन्द्रया जो अग्नि और इन्द्र से सम्बन्धित (याज्या ) है सा ऐन्द्राग्नी वह इन्द्र और अग्नि देवता वाली भी है; क्योंकि सा एतद् उक्थम् वह यह स्तुति ( शस्त्र) तो ग्रहेण तूष्णीशंसेन ग्रह और तूष्णीशंस ( मौनस्तुति) द्वारा सेन्द्राग्नम् इन्द्र और अग्नि के लिए साथ ( सम्पादित होती है ) । सा० भा ० — येयमाग्नेन्द्री याज्या सेयमैन्द्राग्न्यपि भवति । द्वयोः पौर्वापर्यमविसंवादेऽपि तस्या ऋचो ' द्विदेवत्यत्वसद्भावाद् देवतयोः क्रमविपर्यासमात्रेऽङ्गीकृते सति याज्याया ऐन्द्राग्नत्वमुपचरितं यथा संपद्यते तथैवैतदुक्थमाज्यशस्त्रमपि ग्रहद्वारा तूष्णीशंसद्वारा चेन्द्राग्निदेवतासहितं संपद्यते। तथा सत्यैन्द्राग्नत्वस्योपचरितस्य याज्याशस्त्रयोः सद्भावान्नास्ति वैयधिकरण्यम्॥ आज्यशस्त्रस्य ग्रहद्वारकं तूष्णीशंसद्वारकं चैन्द्राग्त्वं दर्शयति— ' इन्द्राग्नी आ गतं सुतं गीर्भिर्नभो वरेण्यम् । अस्य पातं धियेषिता ' ( १ ) ऋ० ३.१२.१।

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]:पञ्चमोऽध्यायः षष्ठः खण्डः सायणाचार्यकृतभाष्योपेतम् ४३३ इत्येन्द्राग्नमध्वर्युर्ब्रहं गृह्णाति, ' भूरग्निज्र्ज्योतिर्ज्योतिरग्निरिन्द्रो ज्योति- र्भुवो ज्योतिरिन्द्रः सूर्यो ज्योतिज्योंतिः स्वः सूर्यः ' इति होता तूष्णीशंसं शंसति तद्यथैव शस्त्रमेवं याज्या ॥ १७ ॥

हिन्दी – (इंस आज्यशस्त्र का ग्रह द्वारा और तूष्णीशंस द्वारा ऐन्द्राग्नता को दिखला रहे हैं ) ' इन्द्राग्नी हे इन्द्र और अग्नि! नभः आकाश (के समान महान्) वरेण्यम् वरण करने योग्य और गीर्भिः सुतम् स्तुतियों द्वारा सवन किये गये ( सोम) के प्रति आगतम् आओ तथा धियेषिता ( आकर) बुद्धि द्वारा प्रेरित तुम दोनों अस्य पातम् इस ( सोम) का ( सारतत्व) पान करों – इति ऐन्द्राग्नम् इस इन्द्र और अग्नि देवता वाले ( मन्त्र ) से अध्वर्युः ग्रहं गृह्णाति अध्वर्यु ग्रह को लेता है तथा ' भूरग्नि सूर्यः ' इति होता तूष्णीशंसं शंसति इस तूष्णीशंस ( मन्त्र ) का होता शंसन करता है। तत् इससे यथा एव शस्त्रम् जैसा शस्त्र है एवं याज्या वैसी ही याज्या भी है । सा ० भा० -हे इन्द्राग्नी, सुतमभिषुतं सोमं प्रत्यागतमागच्छतम्। कीदृशं सुतं, गीर्भिः स्तुतिभिर्युक्तमिति शेषः । नभ आकाशस्वरूपमाकाशवन्महदित्यर्थः । वरेण्यं वरणीयम्। आगत्य च युवां धियेषिता स्वबुद्ध्या प्रेषितौ सन्तावस्य सोमस्य सारं पातं पिबतम्। इत्यनेनैन्द्राग्नदेवताकमन्त्रेणाध्वर्युरैन्द्राग्नं ग्रहं गृह्णाति। तूष्णीशंसे भूरग्निरित्यग्निराम्नात इन्द्रो ज्योतिरितीन्द्रोऽप्याम्नातः तत अभयसद्भावात् तूष्णीशंसोऽप्यैन्द्राग्नः । ईदृशस्य ग्रहस्य तूष्णी-शंसस्य संबन्धादाज्यशस्त्रमप्यैन्द्राग्नं भवति । तस्माच्छस्त्रयाज्ययोरैन्द्राग्नत्वसंपादनान्नास्ति वैयधिकरण्यम्॥ ॥ इति श्रीमत्सायणाचार्यविरचिते माधवीये 'वेदार्थप्रकाशे' ऐतरेयब्राह्मणभाष्ये द्वितीयपञ्चिकायाः चतुर्थाध्याये ( दशमाध्याये ) पञ्चमः खण्डः ॥ ५॥

॥ इस प्रकार ऐतरेयब्राह्मण के दशम अध्याय के पञ्चम खण्ड की ' शशिप्रभा ' नामक हिन्दी व्याख्या समाप्त ॥ अथ षष्ठः खण्डः सा० भा ० — पूर्वत्र पराङध्वर्यावित्याद्याश्वलायनसूत्रोदाहरणेन होतुर्यो जपो दर्शितः ', तमिमं जपं विधत्ते— ( होतृजपविधानम् ) होतृजपं जपति रेतस्तत्सिञ्चति ॥ १ ॥

( १ ) ‘ सुमदित्यादिमन्त्रस्य ' नाम ' होतृजपस्त्विति' - इति षड्गुरु ० ।

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: [४३४ ऐतरेयब्राह्मणम् १०.६ द्वितीयपञ्चिकायां हिन्दी— ( अब होता द्वारा किये जाने वाले जप का विधान कर रहे हैं - ) होतृजपं जपति ( होता ) होतृजप ( नामक जप को ) जपता है । तत् इस (जप) से रेतः सिञ्चति ( वह प्रजोत्पादन के लिए प्रथमत: ) वीर्य का सेचन करता है । सा० भा ० – होतुः कर्तव्यो यो जपस्तमनुतिष्ठेत्। तेन प्रजोत्पादनार्थमादौ रेतः सिक्तं भवति ॥ तत्रोच्चारणप्रकारविशेषं विधत्ते— ( होतृजपोच्चारणप्रकारविधानम् ) उपांशु जपत्युपांश्विव वै रेतसः सिक्तिः ॥ २ ॥

हिन्दी—( उस होतृजप के उच्चारण में विशेष को कह रहे हैं — ) उपांशुः जपति ( होता होतृजप नामक जप को) उपांशु (मौन होकर ) जपता है ( क्योंकि लोक में ) उपांशु इव रेतसः सिक्तिः मौन होकर ही वीर्य का सेचन होता है । सा० भा ० — ओष्ठस्पन्दनमेव परैर्दृश्यते न तु शब्दः श्रूयते तादृशमुपांशुत्वम्। लौकिके रेत: सेचनेऽपि ध्वनेरश्रवणाद्युक्तं तथाविधत्वम्॥ तस्य जपस्य शोंसावोमित्येतस्मादाहावात् पूर्वभावित्वं विधत्ते— ( जपस्याहावात्पूर्वभावित्वम् ) पुराऽऽहावाज्जपति यद्वै किञ्चोर्ध्वमाहावाच्छस्त्रस्यैव तत् ॥ ३ ॥

हिन्दी– ( उस जप का ' शोंसावोम्' इस आहाव से पूर्व होने का विधान कर रहे हैं— ) आवाहात् पुरा जपति (होतृजप को ) आहाव से पहले जपता है। यद्वै किञ्च जो कुछ आहावाद् ऊर्ध्वम् आहाव के बाद (पाठ करता है ) तत् शस्त्रस्य एव वह शस्त्र से ही सम्बन्धित होता है। सा० भा०--अध्वर्युराह्वयते येन ‘ शोसावोम्' इति मन्त्रेण तस्मात् पूर्वभावी होतृ- जपः । तथा च आश्वलायनेनोदाहृतम्— ' जपित्वाऽनभिहिंकृत्य शोंसावोमित्युच्चैराहूय ' ' इति। .आहावाद् ऊर्ध्वं यत्किञ्चित् पठ्यते तस्सर्वं शस्त्रस्यैव संबन्धि भवेत्। आहावमन्त्रेण शस्त्रा- नुज्ञानस्य पृष्टत्वात् । अतो होतृजपस्य शस्त्रान्तर्भावं निवारयितुं पूर्वकालीनत्वम्॥ अथाऽऽहावे प्रकारविशेषं विधत्ते- ( आहावे प्रकारविशेषविधानम् ) पराञ्चं चतुष्पद्यासीनमभ्याह्वयते, तस्मात् पराञ्चो भूत्वा चतुष्पादो रेतः सिञ्चन्ति ॥४ ॥

( १ ) आश्व०श्री० ५.९.१ ।

पृष्ठ 497

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]:पञ्चमोऽध्यायः षष्ठः खण्डः सायणाचार्यकृतभाष्योपेतम् ४३५ हिन्दी— ( अब आहाव के विषय में प्रकार- विशेष का विधान कर रहे हैं— ) पराञ्च चतुपद्यासीनम् पराङ्मुख हुए और चार पैरों वाले पशु (के समान दोनों हाथों को पृथिवी पर रख कर) बैठे हुए ( अध्वर्यु ) से अभ्याह्वयते ( होता आहाव) कहता है । तस्मात् इसी कारण लोक में पराञ्चः भूत्वा चतुष्पादः पराङ्मुख होकर चौपाए ऐतः सिञ्चति वीर्य का सेचन करते हैं । सा ० भा०- अस्मिन् कालेऽध्वर्युः पराङ् भवति होतुर्विमुखो भवति। तथा चतुष्पदी गौरिव हस्तौ भूमाववस्थाप्याऽऽसीनो भवति। तादृशमध्वर्यु संबोध्याभिमुखो यथा भवति तथा होता शोंसावोमिति मन्त्रेणाऽऽह्वयते । यस्मादाह्वानकाल ईदृशोऽध्वर्युस्तस्माल्लोकेऽपि चतुष्पादो गवादयः पराञ्चः संभोगावस्थायां परस्पराभिमुखरहिता भूत्वा रेतः सिञ्चन्ति॥ आहावादूर्ध्वमध्वर्योश्चतुष्पात्त्वं परित्यज्य सम्यगुत्थानं विधत्ते— ( आहावादूर्ध्वमध्वर्योः सम्यगुत्थानविधानम् ) सम्यङ्ग्द्विपाद् भवति, तस्मात् सम्यञ्चो भूत्वा द्विपादो रेतः सिञ्चन्ति ॥ ५ ॥

हिन्दी – ( आहाव के बाद अध्वर्यु के चतुष्पादता को छोड़ कर सम्यक् प्रकार से उठने का विधान कर रहे हैं— ) सम्यग् द्विपाद् भवति ( आहाव के पश्चात् अध्वर्यु) दो पैरों पर सम्यक् खड़ा होता है, तस्मात् इसी कारण (लोक में ) सम्यञ्चः भूत्वा सम्मुख होकर द्विपादः दो पैर वाला ( मनुष्य ) रेतः सिञ्चति वीर्य सेचन करता है । सा ० भा० – ऊर्ध्वत्वेनोत्थानं सम्यक्त्वम्। तथाविधा भूत्वा रेतः सिञ्चन्ति। जपि-तव्यो यो मन्त्रस्याऽऽदौ ' सुमत्पद्वग्दे' इति पञ्चाक्षराणि पठितव्यानि। तानि च पूर्वमेवा-क्षरपङ्क्तिप्रशंसायां विहितानि॥ तेभ्य ऊर्ध्वं यो जपितव्यो मन्त्रस्तस्य प्रथमभागमनूद्य व्याचष्टे- ( होतृजपमन्त्रविधानम् ) पिता मातरिश्वेत्याह, प्राणो वै पिता, प्राणो मातरिश्वा, प्राणो रेतो रेतस्तत्सिञ्चति ॥ ६ ॥

हिन्दी- (उनके बाद जपनीय मन्त्र के प्रथम भाग को कहकर उसका व्याख्यान कर रहे हैं — ) पिता मातरिश्वा अर्थात् मातरिश्वा ( वायु ) पिता है' - इति आह ( होता) इस ( मन्त्र) का पाठ करता है । प्राणः वै पिता प्राण ही पिता है प्राणः मातरिश्वा प्राण ही मातरिश्वा है और प्राणः रेतः प्राण ही (प्रजनन का हेतुभूत होने से ) वीर्य है। तत् इस (पाठ ) से रेतः सिञ्चति (होता यजमान के पुनर्जन्म के लिए) मानो वीर्य सिञ्चन करता है । सा० भा० - तस्मिन् मन्त्रे यजमानस्य नूतनं जन्म संपाद्यते। अतोऽत्र मातरिश्वा वायुः पितृत्वेन वर्ण्यते । तमिमं पितेत्यादिकं मन्त्रं होता ब्रूयात्। प्राण एव लोके पिता, मृतात्

पृष्ठ 498

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: [४३६ ऐतरेयब्राह्मणम् १०.६ द्वितीयपञ्चिकायां पितृदेहाज्जन्मासंभवात् । वायुश्च प्राणः प्राणस्य वायुकार्यत्वात्। रेतश्च प्राणः, प्राणयुक्तस्यैव रेतसो जननहेतुत्वात्। अत एव आरण्यके समाम्नास्यते'– 'यद्वा ऋते प्राणाद् रेतः सिच्येत पूयेन्न संभवेत्’ ” इति। तत्तेन प्रथमभागपाठेन यजमानपुनर्जन्मार्थं रेतः सिक्तं भवति॥ द्वितीयभागमनूद्य व्याचष्टे— अच्छिद्रा पदाऽधा इति रेतो वा अच्छिद्रमतो ह्यच्छिद्रः संभवति ॥७ ॥

हिन्दी— ( मन्त्र के द्वितीय भाग को कहकर उसका व्याख्यान कर रहें हैं— ) ' अच्छिद्रा पदाऽधा' अर्थात् (उस वायुरूप पिता ने ) छिद्ररहित (रेत) को ( गर्भाशय में ) प्रतिष्ठित किया— इति यह ( मन्त्र का द्वितीय भाग है )। यहाँ रेतः वै अच्छिद्रम् वीर्य ही छिद्ररहित है अतः हि इसलिए अच्छिद्रः सम्भवति ( पुरुष ) छिद्ररहित उत्पन्न होता है । सा ० भा ० — स वायुरूपः पिता छिद्ररहितं पदं प्रापणीयं रेतोऽधा गर्भाशये स्थापित-वान्। अत्रोक्ताच्छिद्रं वस्तु रेत एव। अतो हि रेतसः पुमानच्छिद्र उत्पद्यते ॥ तृतीयभागमनूद्य व्याचष्टे— अच्छिद्रोक्था कवयः शंसन्निति ये वा अनूचानास्ते कवयस्त इदमच्छिद्रं रेतः प्रजनयन्नित्येव तदाह ॥८ ॥

हिन्दी– ( मन्त्र के तृतीय भाग को कह कर उसका व्याख्यान कर रहे हैं— ) ' अच्छिद्रोक्था कवयः शंसन् अर्थात् वेदज्ञाता छिद्ररहित शस्त्र का शंसन करते हैं '. इति यह ( मन्त्र का तृतीय भाग है । यहाँ ये वै अनूचानाः जो षडङ्गों के सहित वेद के विद्वान् हैं ते कवयः वे क्रान्तद्रष्टा हैं। ते इदम् अच्छिद्रं रेतः प्रजनयन् वे इस छिद्ररहित वीर्य को उत्पन्न करते हैं — इति एव तदाह इसी ( तथ्य) को ही यहाँ कहा गया है । सा ० भा ० — कवयः पुरुषा अच्छिद्रोक्था शंसंश्छिद्ररहितमुक्थं शस्त्रं शंसन्ति। अत्र कविशब्देनानूचानाः षडङ्गसहितवेदाध्यायिन उच्यन्ते। ते चेदमच्छिद्रं रेतः प्रजनयन्नुत्पादय- न्तीत्यनेनैव प्रकारेण तदच्छिद्रोक्थेति वाक्यमाह ब्रूते। चतुर्थभागमनूद्य व्याचष्टे— सोमो विश्वविन्नीथा निनेषद् बृहस्पतिरुक्थामदानि शंसिषदिति, ब्रह्म वै बृहस्पतिः, क्षत्त्रं सोम, स्तुतशस्त्राणि नीथानि चोक्थामदानि च दैवेन चैवैतद्ब्रह्मणा प्रसूतो दैवेन च क्षत्त्रेणोक्थानि शंसति ॥ ९ ॥

हिन्दी – (मन्त्र के चतुर्थ भाग को कह कर उसका व्याख्यान कर रहे हैं— ) ' विश्ववित् सोमः सभी को जानने वाले सोम ने नीथा निनेषत् नेतव्य ( सम्पादनीयं स्तोत्र ( १ ) एष मन्त्रोऽन्यशाखीय इति आश्व ० श्री० ५.९.१ । ( २ ) ऐ०आ० ३.२.२.५।

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]: पञ्चमोऽध्यायः षष्ठः खण्डः सायणाचार्यकृतभाष्योपेतम् ४३७ और शस्त्रों ) की कामना किया और बृहस्पतिः बृहस्पति ने उक्थमदानि सन्तुष्ट करने वाले शस्त्रों को शंसिषत् शंसन करने की कामना किया - इति यह ( मन्त्र का चतुर्थ भाग है ) । यहाँ ब्रह्म वै बृहस्पतिः बृहस्पति ब्राह्मण है; क्षत्रं सोमः सोम क्षत्रिय है। स्तुतशस्त्राणि नीथानि च उक्थामदानि च नीथ और उक्थ क्रमशः स्तोत्र और शस्त्र हैं । एतत् इस (भाग के पाठ ) से दैवेन ब्रह्मणा क्षत्रेण देवता- सम्बन्धी ब्राह्मण से और क्षत्रिय से प्रसूतः प्रेरित किया गया (होता) उक्थानि शंसति शस्त्रों का शंसन करता है । सा० भा०--विश्ववित् सर्वज्ञः सोमो नीथानि नेतव्यान्यनुष्ठेयानि स्तोत्रशस्त्राणि निनेषन्नेतुमिच्छां कृतवान् प्रयुक्तवानित्यर्थः । तथा बृहस्पतिरुक्थामदानि शस्त्ररूपाणि संतोष- कारणानि शंसिषच्छंसितुमिच्छति शस्तवानित्यर्थः । अस्मिन् भागे बृहस्पतिसोमशब्दाभ्यां ब्राह्मणक्षत्रियजातिद्वयं दैवं विवक्षितम्। नीथशब्देनोक्थामदशब्देन च स्तोत्रशस्त्राणि विव-क्षितानि। अत एवैतद्भागपाठे सति देवसंबन्धिना ब्राह्मणेन क्षत्रियेण च प्रेरितः शस्त्राणि शंसति ॥ सोमहबृहस्पत्योः सर्वकर्मप्रेरकत्वप्रसिद्धिं दर्शयति— एतौ ह वा अस्य सर्वस्य प्रसवस्येशाते यदिदं किञ्च ॥ १० ॥

हिन्दी -( सोम और बृहस्पति की सभी कर्मों की प्रेरकता की प्रसिद्धि को दिखला रहे हैं ) एतौ ये दोनों ( सोम और बृहस्पति ) यदिदं किञ्च ( इस यज्ञ में सम्पाद्यमान) जो कुछ भी है अस्य सर्वस्य प्रसवस्य इन सभी प्रेरित करने वालों के ईशाते स्वामी हैं। सा० भा० —- यज्ञेऽनुष्ठेयं यत्किञ्चिदस्त्यस्य सर्वस्य प्रसवो यत्प्रेरणं तस्य सोमबृहस्पती एव स्वामिनौ॥ व्यतिरेकमुखेनैतदेव द्रढयति— तद्यदेताभ्यामप्रसूतः करोत्यकृतं तदकृतमकरिति वै निन्दन्ति ॥ ११ ॥

हिन्दी— ( व्यतिरेक द्वारा इस उपर्युक्त कथन को दृढ़ कर रहे हैं— ) तद् यत् एताभ्याम् अप्रसूतः करोति तो जो इन दोनों ( सोम और बृहस्पति) की प्रेरणा के बिना ( होता) करता है तद् अकृतम् अकः वह न करने के समान है— इति वै निन्दन्ति इस प्रकार (इसकी ) निन्दा करते हैं । सा ० भा ० — तत्तथा द्वयोः प्रेरणस्वामित्वे सति यदङ्गमेताभ्यामप्रेरितः करोति तदङ्गम-कृतमेव भवति। लोकेऽपि स्वाम्यनुज्ञामन्तरेण यत्क्रियते तत्तत्राकृतमकरकर्तव्यं कृतवानिति जना निन्दन्ति ॥ वेदनं प्रशंसति— कृतमस्य कृतं भवति नास्याकृतं कृतं भवति य एवं वेद ॥ १२ ॥

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ऐतरेय ब्राह्मण पूर्वार्द्ध, पृष्ठ 500 का मूल पृष्ठ
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: [४३८ ऐतरेयब्राह्मणम् १०.६ द्वितीयपञ्चिकायां हिन्दी— ( इस ज्ञान की प्रशंसा कर रहे हैं - ) यः एवं वेद जो इस प्रकार जानता है अस्य कृतं कृतं भवति इस (जानने वाले ) का किया गया ( कार्य ) किये गये के समान होता है । अस्य कृतम् अकृतं न भवति इसका कियाकि गया ( कार्य ) न किये गये के समान नहीं होता । सा० भा ० — अस्य वेदितुः कृतं कर्तव्यमेव कृतं भवति, न त्वकृतमकर्तव्यं कृतं भवति॥ पञ्चमभागमनूद्य व्याचष्टे— वागायुर्विश्वायुर्विश्वमायुरित्याह प्राणो वा आयुः प्राणो रेतो वाग्यो- निर्योनिं तदुपसंधाय रेतः सिञ्चति ॥ १३ ॥

हिन्दी –( मन्त्र के पञ्चम भाग को कहकर उसका व्याख्यान कर रहे हैं— ) ‘वागायुर्विश्वायुर्विश्वमायुः अर्थात् वागिन्द्रिय और आयु, सम्पूर्ण आयु और समस्त ( सौ वर्ष की ) आयु को ( यजन करने वाला प्राप्त करता है ) — इत्याह यह शंसन करता है । प्राणः वै आयुः ( यहाँ) प्राण आयु हैं और प्राणः रेतः प्राण वीर्य है । वाग् योनिः वाक् योनि है। तत् इस ( शंसन ) से योनिम् उपसन्धाय गर्भस्थान को अभिलक्षित करके रेतः सिञ्चति वीर्य का सेचन करता है। सा० भा ० — येयं वागिन्द्रियरूपा यदप्यायुर्जीवनं तदुभयमस्त्विति शेषः । न चात्राऽऽ- युरल्पं विवक्षितं किंतु विश्वायुर्विश्वं समस्तं शतसंवत्सरपरिमितमायुर्विवक्षितम्। तस्मा-द्विश्वमायुर्यजमानः प्राप्नोत्वित्यध्याहारः । तमिमं भागं पठेत्। अत्र आयुःशब्देन प्राण एव विवक्ष्यते। ‘ यावद्ध्यस्मिञ्शरीरे प्राणो वसति तावदायुः ' इति श्रुतेः' । रेतसः प्राणत्वं पूर्वमेवो- दाहृतम्। वाक्शब्देन योनिरुपलक्ष्यते। तथा सति तद्भागपाठेन योनिमुपसंधाय गर्भस्थानम-भिलक्ष्य रेतः सिञ्चति ॥ षष्ठं भागमनूद्य व्याचष्टे- क इदं शंसिष्यति स इदं शंसिष्यतीत्याह प्रजापतिर्वै कः प्रजापतिः प्रजनयिष्यतीत्येव तदाह ॥ १४ ॥

हिन्दी –( षष्ठभाग को कह कर उसका व्याख्यान कर रहे हैं - ) 'क इदं शंसिष्यति ( १ ) कौषी ० उ ० ३.२ । ( २ ) ‘प्राणो रेतः प्राणनहेतुत्वात्। योनिरेव वाक् सर्वार्थानां विकल्पमूलत्वात्' – इति भट्टभास्करः । ( ३ ) ‘ उपसन्धानमुपसंश्लेषः ' इति भट्टभास्करः । 'शस्त्रस्य योनिभूतां वाचमुपसन्धाय मन्त्रेण रेतोभूतं यजमानं सिञ्चति' – इति गोविन्दस्वामी ॥ ( ४ ) 'को ह वै नाम प्रजापति: ' - इति तै ०ब्रा० २.२१० ।