ऐतरेय ब्राह्मण उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 111–120

ऐतरेय ब्राह्मण उत्तरार्द्ध · पृष्ठ 111–120

पृष्ठ 111

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तृतीयोऽध्यायः द्वितीयः खण्डः ] सायणाचार्यकृतभाष्योपेतम्: ९ ६ ९ पिबशब्दलिङ्गकं प्रगाथान्तरं विधत्ते— ' पिबा सुतस्य रसिन इति सामप्रगाथः, पिबवान् सप्तमेऽहि सप्तमस्याह्नो रूपम् ॥ २८ ॥

हिन्दी - ( पिब् शब्द के चिह्न वाले अन्य प्रगाथ का विधान कर रहे हैं— ) ' पिबा सुतस्य रसिनः ' इति सामप्रगाथः यह साम प्रगाथ है । जो पिबवान् पिब शब्द से युक्त सप्तमेऽहनि सप्तम दिन में ( प्रयुक्त ) सप्तमस्याह्नो रूपम् सप्तम दिन का रूप है ॥ अच्युतत्वलिङ्गकं सूक्तविशेषं विधत्ते— ' त्यं मू षु वाजिनं देवजूतमिति ' ' तार्क्ष्योऽच्युतः ॥ २ ९ ॥ हिन्दी — ' त्य मू षु वाजिनं देवजूतम् ' इति तार्क्ष्योऽच्युतः यह तार्क्ष्य देवताक ( पूर्व में विहित होने से ) अच्युत है ॥ ॥ इति श्रीमत्सायणाचार्यविरचिते माधवीये ' वेदार्थप्रकाशे ' ऐतरेयब्राह्मण-भाष्ये पञ्चमपञ्चिकायां तृतीयाध्याये ( त्रयोविंशाध्याये ) प्रथमः खण्डः ॥१ ॥ ( १६ ) ( १६ ९ )

॥ इस प्रकार ऐतरेयब्राह्मण के तेइसवें अध्याय के प्रथम खण्ड की ' शशिप्रभा ' नामक हिन्दी व्याख्या समाप्त । अथ द्वितीयः खण्डः सा ० भा ० | - – प्रशब्दलिङ्गकं सूक्तं विधत्ते— ' इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्रवोचमिति सूक्तं प्रेति सप्तमेऽहनि सप्तम-स्याह्नो रूपम् ॥१ ॥

हिन्दी - ( अब प्र शब्द से युक्त चिह्न वाले सूक्त का विधान कर रहे हैं— ) ' इन्द्र-स्य नु वीर्याणि प्र वोचम् ' इति सूक्तम् यह सूक्त है जिसमें प्रेति ( यह सूक्त ) सप्तमेऽहनि सप्तम दिन में ( प्रयुक्त ) सप्तमस्याह्नो रूप है ॥ तत्रत्यं छन्दः प्रशंसति— तदु त्रैष्टुभं तेन प्रतिष्ठितपदेन सवनं दाधारायतनादेवैतेन न ( १ ) १. ऋ ० ८.३.१,२ । ( २ ) ऋ ० १०.१७८ । ( ३ ) ऋ ० १.३२ । ' प्र ' यह ( उपसर्ग ) है । रूपम् सप्तम दिन का प्रच्यवते ॥ २ ॥

पृष्ठ 112

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९ ७०: ऐतरेयब्राह्मणम् [ २३.२ पञ्चमपञ्चिकायां हिन्दी — ( ‘ इन्द्रस्य नु वीर्याणि ' सूक्त के छन्द की प्रशंसा कर रहे हैं — ) तदु वह ( सूक्त ) त्रैष्टुभम् त्रिष्टुप् ( छन्द ) वाला है । प्रतिष्ठितपदेन तेन प्रतिष्ठितपद ( नियताक्षर पाद वाले ) उस ( सूक्त ) से सवनं दाधार ( माध्यन्दिन ) सवनगत ( शस्त्र ) धारित होता है । एतेन इस ( सूक्त ) से वह आयतनाद् न प्रच्यवते ( अपने ) स्थान से च्युत नहीं होता ॥ सा ० भा ० — अभिशब्द - प्रशब्दयोरुपसर्गत्वसाम्येनार्थैकत्वमभिप्रेत्य त्यतद्द्द्वारा शब्दक- शब्द त्वमप्यारोप्याभिप्रशब्दलिङ्गकं सूक्तं विधत्ते— ' अभि त्यं मेषं पुरुहूतमृग्मियमिति १ सूक्तं; यद्वाव प्रेति तदभीति सप्तमेऽहनि सप्तमस्याह्नो रूपम् ॥ ३ ॥

हिन्दी— ( अभि और उपसर्गों के अर्थ में समानता के द्वारा दोनों शब्दों में एकता को आरोपित करके ‘ प्र ' से युक्त चिह्न वाले सूक्त का विधान कर रहे हैं - ) ' अभि त्यं मेषं पुरुहूतमृग्मियम् ' इति सूक्तम् यह सूक्त है जिसमें प्रेति अभीति प्र और अभि ( उपसर्ग ) सप्तमेऽहनि सप्तम दिन में ( प्रयुक्त ) सप्तमस्याह्नो रूपम् सप्तम दिन का रूप है । अस्मिन् सूक्ते निविद्धानं विधत्ते— तदु जागतं, जगत्यो वा एतस्य त्र्यहस्य मध्यंदिनं वहन्ति; तद्वैतच्छन्दो वहति, यस्मिन्निविद्धीयते; तस्माज्जगतीषु निविदं दधाति ॥४ ॥

हिन्दी - ( ' अभि त्यं मेषं ' से प्रारम्भ सूक्त में निविद्धान का तदु जागतम् वह सूक्त जगती छन्द वाला है । जगत्यः वै जगती त्र्यह के मध्यन्दिनं वहति मध्यन्दिन ( सवन ) का निर्वाह करती जिस छन्द में निवित् पद का प्रक्षेप किया जाता है एतत् छन्दः निर्वाहक होता है अत: जगतीषु निविदं दधाति जगती ( छन्द ) में करता है । छन्दोद्वयं मिलित्वा प्रशंसति— विधान कर रहे हैं - ) ही एतस्य त्र्यहस्य इस हैं । यस्मिनिविद्धीयते यहीं छन्द ( सवन ) का ही निवित् पद का प्रक्षेप मिथुनानि सूक्तानि शस्यन्ते, - त्रैष्टुभानि च जागतानि च; मिथुनं वै पशवः पशवच्छन्दोमाः पशूनामवरुद्ध्यै ॥५ ॥

हिन्दी — ( त्रिष्टुप् और जगती दोनों छन्दों को मिलाकर प्रशंसा कर रहे हैं— ) त्रैष्टुभानि च जागतानि च त्रिष्टुप् और जगती ( सम्बन्धी ) दोनों मिथुनानि सूक्तानि मिथुन सूक्तों का शस्यन्ते शंसन करते हैं । मिथुनं वै पशवः पशु मिथुन रूप वाले होते हैं । पशवः छन्दोमाः ( चतुर्विंश, चतुश्चत्वारिंश और अष्टचत्वारिंश स्तोमों द्वारा ) छन्दोम ( पशुप्राप्ति का साधन होने से ) पशुरूप हैं । पशूनामवरुद्ध्यै पशुओं की प्राप्ति के लिए ( १ ) ऋ ० १.५१ ।

पृष्ठ 113

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तृतीयोऽध्यायः द्वितीयः खण्डः ] सायणाचार्यकृतभाष्योपेतम्: ९ ७१ इस छन्दोम युक्त त्र्याह में दोनों छन्दों का शंसन करते हैं । शास्त्रान्तरस्य प्रतिपदनुचरौ विधत्ते-( सप्तमेऽहनि वैश्वदेवशस्त्रविधानम् ) ' तत्सवितुर्वृणीमहेऽद्या ' नो देव सवितरिति वैश्वदेवस्य प्रतिपद-नुचरौ; राथंतरेऽहनि सप्तमेऽहनि सप्तमस्याह्नो रूपम् ॥६ ॥

हिन्दी – ( अब वैश्वदेवशस्त्र के प्रतिपत् और अनुचर तृचों को कह रहे हैं— ) ‘ तत्सवितुवृणीमह ' और ‘ अद्या नो देव सवितः ' इति ये दोनों तृच वैश्वदेवस्य वैश्वदेव ( शस्त्र ) के प्रतिपदनुचरौ क्रमशः प्रतिपत् और अनुचर हैं 1 । रथन्तरेऽहनि सप्तमेऽहनि रथन्तर साम से सम्बन्धित सप्तम दिन में ( प्रयुक्त ) सप्तमस्याह्नो सप्तम दिन का रूप है ॥ । रूपम् सा ० भा ० — तत्सवितुरित्यादेः क्वचिद्रथंतरसामाधारत्वमभिप्रेत्य राथंतरत्वं लिङ्गमुक्तम् ॥ अभिशब्द - प्रशब्दयोः पूर्ववदेकत्वमारोप्य प्रशब्दलिङ्गकं तृचात्मकं सूक्तं विधत्ते— ' अभि त्वा देव सवितरिति सावित्रं, यद्वाव प्रेति तदभीति, सप्तमेऽ-हनि सप्तमस्याह्नो रूपम् ॥७ ॥

हिन्दी – ( अभि और प्र उपसर्ग के एकत्व को आरोपित करके ' प्र ' चिह्न वाले तृच का विधान कर रहे हैं— ) ' अभि त्वा देव सवितः ' इति सावित्रम् यह ( तृच ) सविता देवताक है । यद् वाव जो यह प्रेति ' प्र ' उपसर्ग है तद् अभीति वही अभि ( उपसर्ग ) भी है अतः सप्तमेऽहनि सप्तम दिन में ( प्रयुक्त ) सप्तमस्याह्नो रूपम् सप्तम दिन का रूप हैं । आरोपित - प्रशब्दलिङ्गकमुक्त्वा मुख्यप्रशब्दलिङ्गकं तृचात्मकं सूक्तं विधत्ते— ' प्रेतां यज्ञस्य शंभुवेति ' ४ द्यावापृथिवीयं; प्रेति सप्तमेऽहनि सप्तम-स्याह्नो रूपम् ॥८ ॥

हिन्दी— ( आरोपित ' प्र ' चिह्न वाले तृच को कहकर वास्तविक प्र शब्द वाले तृच को कह रहें हैं— ) ' प्रेतां यज्ञस्य शंभुव ' इति द्यावापृथिवीयम् यह तृच द्यावापृथिवी देवताक है । ( इस तृच में ) प्रेति ' प्र ' यह ( शब्द ) सप्तमेऽहनि सप्तम दिन में ( प्रयुक्त ) सप्तमस्याह्नो रूपम् सप्तम दिन का रूप है ॥ सा ० भा ० – द्वितीयस्यामृचि ' द्यावा नः पृथिवी ' - इत्युक्तत्वात् इदं द्यावापृथिवीदेवताकम् ॥ ( १ ) ऋ ० ५.८२.१-३ । ( २ ) ऋ ० ५.८२.४-६ । ( ३ ) ऋ ० १.२४ | ( ४ ) ऋ ० २.४१ ।

पृष्ठ 114

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९ ७२: ऐतरेयब्राह्मणम् [ [ २३.२ पञ्चमपञ्चिकायां जातलिङ्गकं तृचात्मकं सूक्तं विधत्ते-' अयं देवाय जन्मनः ' इत्यार्भवं ' जातवत्सप्तमेऽहनि सप्तम-स्याह्नो रूपम् ॥ ९ ॥

हिन्दी - ( जनि धातु वा तृच का विधान कर रहे हैं - ) ' अयं देवाय जन्मनः ’ इत्यार्भवम् यह तृच ऋभु देवताक है, जो जातवत् जनि धातु से युक्त सप्तमेऽहनि सप्तम दिन में प्रयुक्त सप्तमस्याह्नो रूपम् सप्तम दिन के अनुरूप है ॥ सा ० भा ० — अत्र सूक्ते चतुर्थ्यामृचि ' ऋभवो विष्ट्यक्रत ' - इति श्रुतत्वात् अयमपि तृच आर्भवः । ‘ जन्मन: ’ इत्युक्तत्वाज्तावल्लिङ्गम् ॥ अथ पादद्वयोपेता ऋचो विधाय प्रशंसति— ' आ याहि वनसा सहेति द्विपदाः शंसति; द्विपाद्वै पुरुषश्चतु-ष्पादाः पशवः, पशवश्छन्दोमाः, पशूनामवरुद्ध्यै; तद् यद्वि-पदाः शंसति, यजमानमेव तद् द्विप्रतिष्ठं चतुष्पात्सु पशुषु प्रति-ष्ठापयति ॥ १० ॥

हिन्दी - ( अब दो पाद वाली ऋचाओं और उनकी प्रशंसा कर रहे हैं - ) ' आ याहि वनसा सह ' इति द्विपदाः शंसति इन दो पादों वाली ऋचाओं का शंसन करता है । द्विपादः वै पुरुषः क्योंकि पुरुष दो पैरों वाला होता है । चतुष्पादाः पशवः पशु चार पैरों वाले होते हैं । पशवः छन्दोमाः छन्दोम पशुरूप है । यद् द्विपदाः शंसति जो दो पाद वाली ऋचाओं का शंसन करता है तत् पशूनामवरुद्ध्यै वह पशुओं की प्राप्ति के लिए ( होता है ) । द्विप्रतिष्ठितं यजमानम् दो पैरों पर प्रतिष्ठित यजमान को चतुष्पात्सु पशुषु प्रतिष्ठापयति चार पाद वाले पशुओं में प्रतिष्ठित करता है ॥ सा ० भा ० — छन्दोमानां पूर्वोक्तचतुर्विंशादीनां पशुप्राप्तिसाधनत्वात् पशुत्वम् ॥ आकारलिङ्गकं बहुदेवताकं सूक्तं विधत्ते— ' ऐभिरग्ने दुवो गिर इति ' ३ वैश्वदेवमेति सप्तमिऽहनि सप्तम-स्याह्नो रूपम् ॥ ११ ॥

हिन्दी — ( ‘ आ ' चिह्न वाले बहुदेवताक सूक्त का विधान कर रहे हैं— ) ' एभिरग्ने दुवो गिर ' इति वैश्वदेवम् यह विश्वदेवा देवता वाला सूक्त है जो सप्तमेऽहनि सप्तम दिन में सप्तमस्याह्नो रूपम् सप्तम दिन के अनुरूप है है । ॥ ( १ ) ऋ ०१.२० । ( २ ) ऋ ० १०.१७२ । ( ३ ) ' ऋ ० १.१४ ।

पृष्ठ 115

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तृतीयोऽध्यायः द्वितीयः खण्डः ] ______ सायणाचार्यकृतभाष्योपेतम्: ९ ७३ उक्तेषु सूक्तेषु च्छन्दः प्रशंसति— तान्यु गायत्राणि गायत्रतृतीयसवन एष त्र्यहः ॥ १२ ॥

हिन्दी — ( ‘ एभिरग्ने हुवे गिर ' सूक्त के छन्द की प्रशंसा कर रहे हैं— ) तान्यु वे ( ‘ अद्या नो देव ' से लेकर और मध्य की द्विपदाओं को छोड़कर ' एभिरग्ने ' तक के सूक्त ) गायत्राणि गायत्री छन्दस्क है । एषः त्र्यहः यह त्र्यह गायत्रतृतीयसवनः गायत्री से सम्बन्धित तृतीय सवन वाला है । सा ० भा ० - ' तान्यु ' तानि तु सूक्तानि ' अद्या नो देव सविता: ' इत्यारभ्य मध्ये द्विपदा वर्जयित्वा ‘ एभिरग्ने ’ इत्यन्तानि गायत्रीछन्दस्कानि वैश्वदेवशस्त्रेऽभिहितानि । एषु चोतम-स्त्र्यहो ‘ गायत्रतृतीयसवनः ' गायत्रीछन्दस्तृतीयसवने यस्य त्र्यहस्य सोऽयं गायत्रतृतीय-सवनः । तदेव च्छन्दो विवाहप्रस्तावेऽनुसन्धेयम् ॥ शस्त्रान्तरस्य जनिधातुलिङ्गयुक्तं प्रतिपदं विधत्ते— ( सप्तमेऽहन्याग्निमारुतशस्त्रविधानम् ) वैश्वानरो अजीजनदित्याग्निमारुतस्य प्रतिपज्जातवत्, ' सप्तमेऽहनि सप्तमस्याह्नो रूपम् ॥ १३ ॥

हिन्दी— ( अग्निमारुतशस्त्र के जनि धातु से युक्त प्रतिपत् का विधान कर रहे हैं— ) ‘ वैश्वानरो अजीजनत् ' इत्यादित्या अग्निमारुतस्य प्रतिपत् यह आदित्य देवताक अग्निमारुत ( शस्त्र ) का प्रतिपत् है जो सप्तमेऽहनि सप्तम दिन में ( प्रयुक्त ) सप्तमस्याह्वो रूपम् सप्तम दिन के अनुरूप है । प्रशब्दलिङ्गकं सूक्तं विधत्ते-' प्र यद्वस्त्रिष्टुभमिषमिति ' २ मारुतं, प्रेति सप्तमेऽहनि सप्तम-स्याह्नो रूपम् ॥ १४ ॥

हिन्दी — ( प्र शब्द के चिह्न वाले सूक्त को कह रहे हैं— ) ' प्र यद्वास्त्रिष्टुभमिषम् ' इति मारुतम् यह मरुद्देवताक ( सूक्त ) है जिसमें प्रेति ' प्र ' यह ( शब्द ) सप्तमेऽहनि सप्तम दिन में प्रयुक्त सप्तमस्याह्नो रूपम् सप्तम दिन के अनुरूप है ॥ सा ० भा ० — द्वितीयपादे ‘ मरुतो विप्राः ' इति श्रुतत्वात् इदं सूक्तं मरुद्देवताकम् ॥ अच्युतत्वलिङ्गयुक्तामृचं विधत्ते— ( १ ) वैश्वानरीयतृचसूक्तस्याद्या चातुर्मास्येषु कल्पजा, उत्तरे त्वत्रैव पठिते । स विश्वम् ' – इति, ‘ वृषा पावक’— इति च । द्र ० - आश्व ० श्रौ ० ८.९.१ । ( २ ) ऋ ० ८.७ ।

पृष्ठ 116

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९ ७४: ऐतरेयब्राह्मणम् [ २३.२ पञ्चमपञ्चिकायां ' जातवेदसे सुनवाम सोममिति ' ' जातवेदस्याऽच्युता ॥ १५ ॥

हिन्दी— ' ( अब अच्युत चिह्न वाली ऋचा को कह रहे हैं — ) ' जातवेदसे सुनवाम सोमम् ' इति जातवेदस्या यह ( ऋचा ) जातवेद देवताक और ( पूर्व में विहित होने के कारण ) अच्युत है । विमर्श ' — ‘ जातवेदसे सुनवाम् ' इस ऋचा ( ऐ ० ब्रा ० २२.१०.७ ) का विमर्श देखें । अस्पष्टदेवताकं सूक्तं विधत्ते— ' दूतं वो विश्ववेदसमिति ' ' जातवेदस्यमनिरुक्तं सप्तमेऽहनि सप्तम-स्याह्नो रूपम् ॥ १६ ॥

हिन्दी— ( अब अस्पष्ट देवताक सूक्त का विधान कर रहे हैं — ) ' दूतं वो विश्ववेदसम् ’ इति जातवेदसस्यम् अनिरुक्तम् यह जातवेदस् देवता से सम्बन्धित अनिरुक्त देवताक ( सूक्त ) सप्तमेऽनि सप्तम दिन में ( प्रयुक्त ) सप्तमस्याह्नो रूपम् सप्तम दिन का रूप है । सा ० भा ० — जातवेदः शब्दस्याग्निवाचित्वेऽपि स्पष्टदेवतावाचकत्वस्याभावात् ‘ अनिरुक्तत्वम् ' ॥ ‘ वैश्वानरो अजीजनत् ’ इत्यादिषु ' दूतं वः ' इत्येतेषु सूक्तेषु जातवेदस इत्येतद्वर्जितेषु विद्यमानं छन्दः प्रशंसति— तान्यु गायत्राणि गायत्रतृतीयसवन एष त्र्यहः ॥ १७ ॥

हिन्दी — ( ‘ दूतं वो विश्ववेदसम् ' सूक्त के छन्द की प्रशंसा कर रहे हैं— ) तान्यु वे ( सूक्त ) गायत्राणि गायत्री छन्द वाले हैं और एषः त्र्यहः यह त्र्यह गायत्रीतृतीयसवनः गायत्री से सम्बन्धित तृतीय सवन वाला है ॥ ॥ इति श्रीमत्सायणाचार्यविरचिते माधवीये ' वेदार्थप्रकाशे ' ऐतरेयब्राह्मण-भाष्ये पञ्चमपञ्चिकायां तृतीयाध्याये ( त्रयोविंशाध्याये ) द्वितीयः खण्डः ॥२ ॥ ( १७ ) ( १७० )

॥ इस प्रकार ऐतरेयब्राह्मण के तेइसवें अध्याय के द्वितीय खण्ड की ' शशिप्रभा ' नामक हिन्दी व्याख्या समाप्त ॥ ( १ ) ऋ ० १.९९.१ । ( २ ) ऋ ० ४.८ । "

पृष्ठ 117

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तृतीयोऽध्यायः तृतीयः खण्ड: ] सायणाचार्यकृतभाष्योपेतम्: ९ ७५ अथ तृतीयः खण्डः सा ० भा ० – सप्तममहरभिधायाष्टमस्याह्नो मन्त्रलिङ्गानि दर्शयति— ( अथ द्वादशाहे नवरात्रस्याष्टमस्याह्नो निरूपणम् ) ( तत्र मन्त्रलिङ्गविधानम् ) यद्वै नेति न प्रेति, यत्स्थितं, तदष्टमस्याह्नो रूपम् ॥ १ ॥

हिन्दी - ( अब द्वादशाह के नवरात्र के अष्टम दिन के मन्त्र के चिह्न को कह रहे हैं— ) यद्वै जो न एति न प्रेति आङ् और प्र ( उपसर्ग कहे गये हैं वे अष्टम दिन के रूप ) नहीं है, प्रत्युत यत् स्थितम् जो स्था धातु के रूप से युक्त है तद् अष्टमस्याह्नो रूपम् वह अष्टम दिन के अनुरूप है ॥ सा ० भा ० — आकारस्य च प्रशब्दस्य च अलिङ्गत्वं नकारद्वयेन निषिध्यते । ‘ यत्स्थितम् ’ अच्युतत्वेन नियतं तिष्ठतिधातुयुक्तं वा, तदष्टमस्याह्नो निरूपकम् ॥ द्वितीयस्मिन्नहनि प्रोक्तानि लिङ्गान्यष्टमेऽहन्यतिदिशति— यद्व्येव द्वितीयमहस्तदेवैतत्पुनर्यदष्टमम् ॥ २ ॥

हिन्दी - ( उस छन्दोम के दूसरे अर्थात् द्वादशाहगत नवरात्र के अष्टम दिन में कहे गये मन्त्रों के चिह्न का अतिदेश कह रहे हैं - ) यत् हि एव जो कि द्वितीयमहः नवरात्र के द्वितीय दिन ( का रूप है ) तद् एतत् वही यह पुनः यद् अष्टमम् पुनः अष्टम ( दिन का रूप है ) ॥ सा ० भा ० — यल्लिङ्गकमेव द्वितीयमहः, तल्लिङ्गकमेवैतत् पुनरपि भवति । यद-ष्टममहः, तत्पूर्वोक्तलिङ्गकम् ॥ तानि लिङ्गान्युपन्यस्यति— यदूर्ध्ववद्यत्प्रतिवद्यदन्तर्वद्यद्वृषण्वद्यद्वृधन्वद्यन्मध्यमे पदे देवता निरुच्यते यदन्तरिक्षमभ्युदितम् ॥३ ॥

हिन्दी — यद् ऊर्ध्ववत् जो ऊर्ध्व ( शब्द ) से युक्त है, यत्प्रतिवत् जो ( मन्त्र ) प्रति ( शब्द ) से युक्त है, यद् अन्तर्वत् जो अन्तः शब्द से युक्त है, यद् वृषण्वत् जो वृषण् ( शब्द ) से युक्त है, यद् वृधन्वत् जो वृधन् ( शब्द ) से युक्त है, यद् मध्यमे पदे जिसके मध्यम पाद में देवता निरुच्यते देवता का कथन हुआ है, यद् अन्तरिक्षम् अभ्युदितम् और जिसमें अन्तरिक्ष की ओर सङ्केत किया गया हो ( वह अष्टम दिन का रूप है ) ॥ अथ नूतनानि लिङ्गानि दर्शयति—

पृष्ठ 118

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९ ७६: ऐतरेयब्राह्मणम् [ २३.३ पञ्चमपञ्चिकायां यद्द्द्व्यग्नि यन्महद्वद्यद्द्द्विहूतवद्यत्पुनर्वद्यत्कुर्वत् ॥ ४ ॥

हिन्दी— ( अब कुछ नूतन चिह्नों को दिखला रहे हैं - ) यद् द्व्यग्निवत् जो ( मन्त्र ) दो अग्निद्वय ( शब्द ) से युक्त हो, यद् महत् जो महत् शब्द से युक्त हो, यद्द्द्विहूतवत् जो दो देवताओं के आह्वान वाला हो, यत् पुनर्वत् जो पुनः शब्द से युक्त हो और यत् कुर्वत् जो वर्तमानकालिक क्रिया से युक्त हो ( वह अष्टम दिन का रूप है ) ॥ सा ० भा ० — अग्निशब्दद्वयोपेतं द्व्यग्नीत्युच्यते । महच्छब्दोपेतं ' महद्वत् । द्वयोर्देव-तयोर्हृतमाह्वाः यस्मिंस्तादृशं द्विहूतवत् ' । पुनःशब्दोपेतं ' पुनर्वत् ' । द्वितीयेऽहनि वर्तमा-नार्थवाचिप्रत्ययान्तं कुर्वच्छब्देनोक्तम् ॥ तेन सह सर्वाणि लिङ्गान्युपसंहरति— यद्द्द्वितीयस्याह्वो रूपमेतानि वा अष्टमस्याह्नो रूपाणि ॥५ ॥

हिन्दी— ( अष्टम दिन के मन्त्रों के सभी चिह्नों का उपसंहार कर रहे हैं— ) यद्-द्वितीयस्याह्नो रूपम् जो द्वितीय दिन का रूप है, एतानि वै वे ही अष्टमस्याह्नो रूपाणि अष्टम दिन के भी निर्वाहक चिह्न हैं । तत्राज्यशस्त्रं विधत्ते— ( अष्टमेऽहन्याज्यशस्त्रनिरूपणम् ) अग्नि वो देवमग्निभिः सजोषा इत्यष्टमस्याह्न आज्यं भवति; यग्न्यष्टमेऽहन्यष्टमस्याह्नो रूपम् ॥ ६ ॥

हिन्दी - ( अब अष्टम दिन के आज्यशस्त्र का विधान कर रहे हैं— ) ' अग्निं वो देवमग्निभिः सजोषा ' इत्यष्टमस्याह्न आज्यं भवति यह ( सूक्त ) अष्टम दिन का आज्य ( शस्त्र ) होता है ( क्योंकि · इसमें ) द्व्यग्नि दो बार अग्नि ( शब्द ) अष्टमेऽहनि अष्टम दिन में ( प्रयुक्त ) अष्टमस्याह्नो रूपम् अष्टम दिन का रूप है ॥ सा ० भा ० — द्वावग्निशब्दौ यस्मिन् सूक्ते विद्येते, तत्सूक्तं ' द्व्यग्नि '; अतोऽष्टमेऽहनि योग्यत्वात् एतदष्टमस्याह्नो निरूपकम् ॥ तत्रत्यं छन्दः प्रशंसति— तदु त्रैष्टुभं त्रिष्टुप्प्रातः सवन एष त्र्यहः ॥७ ॥

हिन्दी – ( ' अग्निं वो देवं ' सूक्त के छन्द की प्रशंसा कर रहे हैं — ) तदु ( सूक्त ) त्रैष्टुभम् त्रिष्टुप् छन्द वाला है । एषः त्र्यहः यह तृतीय त्र्यह त्रिष्टुप्प्रातः सवनः त्रिष्टुप् छन्द से सम्बन्धित प्रातःसवन वाला है ॥ ( १ ) ऋ ० ७.३ ।

पृष्ठ 119

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तृतीयोऽध्यायः तृतीयः खण्डः ] सायणाचार्यकृतभाष्योपेतम्: ९ ७७ अथ प्रउगशस्त्रं विधत्ते — ( अष्टमस्याह्नः प्रउगशस्त्रविधानम् ) कुविदङ्ग नमसा ये वृधासः, पीवो अन्नाँ रयिवृधः सुमेधाः, उच्छन्नुषसः सुदिना अरिप्रा, उशन्ता दूता न दभाय गोपा, यावत् तरस्तन्वो ३ यावदोजः, प्रति वां सूर उदिते सूक्तै, धेनुः प्रत्नस्य काम्यं दुहाना, ब्रह्मा ण इन्द्रोप याहि विद्वान्, ऊर्ध्वो अग्निः सुमति वस्वो अश्रेत्, उत स्या नः सरस्वती जुषाणेति प्रउगं प्रतिवदन्तर्वद्, द्विहूतवदूर्ध्व-वदष्टमेऽहन्यमष्टमस्याह्नो रूपम् ॥ ८ ॥

हिन्दी — ( अष्टम दिन के प्रउगशस्त्र का विधान कर रहे हैं — ) ' कुविदङ्ग नमसा ये वृधासः ’ - यह ऋचा ‘ पीवो अन्नां रयिवृधः सुमेधाः ': ' - - यह ऋचा, ' उच्छन्नुषसः सुदिना अरिप्रा ’ - यह ऋच ( इस प्रकार प्रथम तृच ), ' उशन्ता दूता न दभाय गोपा ' - यह एक ऋचा, ‘ यावत् तरस्तन्वो यावदोज ’: - ये दो ऋचाएँ, ( इस प्रकार द्वितीय तृच ) ' प्रति वां सूर उदिते सूक्तैः ' यह तृतीय तृच, धेनुः प्रत्नस्य काम्यं दुहाना ' - यह चतुर्थ तृच, ' ब्रह्मा ण इन्द्रोप याहि विद्वान् ’ – यह पञ्चम तृच, ‘ ऊर्ध्वो अग्निः सुमति वस्वो अश्रेत् ' - यह षष्ठ तृच और ' उत स्या नः सरवती जुषाण ' - यह सप्तम तृच इति प्रउगम् यह ( अष्टम दिन का ) प्रउग ( शस्त्र ) है जिनमें प्रतिवत् प्रति ( शब्द ) से युक्त, अन्तर्वत् अन्तः ( शब्द ) से युक्त, द्विहूतवत् दो आह्वानों से युक्त और ऊर्ध्ववत् ऊर्ध्व शब्द से युक्त ( ऋचाएँ ) अष्टमेऽहनि अष्टम दिन में प्रयुक्त अष्टमस्याह्नो रूपम् अष्टम दिन के अनुरूप हैं । सा ० भा०- – ' कुविदङ्गेति ' ' प्रथमं प्रतीकम् । ‘ पीवो अन्नानिति ' ' द्वितीयम् । ‘ उच्छ-नुषस: ’ * इति तृतीयम् । ‘ उशन्ताः ४ – इति चतुर्थम् । ' यावत् तर: ' ५ इति पञ्चमम् । ' प्रति वामिति’६ षष्ठम् । ‘ धेनुः प्रत्नस्येति ' ' सप्तमम् । ‘ ब्रह्मा णः " इत्यष्टमम् । ‘ ऊर्ध्वो अग्निरिति ’ नवमम् । ' उत स्या नः’१ ° इति दशमम् । अत्राऽऽद्यैस्त्रिभिः प्रतीकैरेकस्तृचः, चतुर्थी चैका, पञ्चमे द्वे, तदुभयं मिलित्वा द्वितीयस्तृचः; इतरे पञ्च तृचाः, एतत्सर्वं प्रउगम् । तत्र दशमे प्रतीके ‘ प्रति स्तोममिति ’ प्रतिशब्दोपेतं लिङ्गमस्ति, धेनुः प्रत्नस्येत्यस्य द्वितीयपादे ' अन्तः पुत्रः ' इत्यन्तः शब्दोपेतं लिङ्गम्, ऊर्ध्वो अग्निरित्यस्मिन्नूर्ध्वशब्दोपेतं लिङ्गम् । अवशिष्टेषु द्वयोराह्वानं लिङ्गम्, –क्वचिदिन्द्रवाय्वोः क्वचिन्मित्रावरुणयोरिति द्रष्टव्यम् ॥ ( १ ) ऋ ० ७.९ १.१ । ( २ ) ऋ ० ७.९ १.३ । ( ३ ) ऋ ० ७.९ ०.४ । ( ४ ) ऋ ० ७.९ १.२ । ( ५ ) ऋ ० ७.९ १.४,५ । ( ६ ) ऋ ० ७.६५.१-३ । ( ७ ) ऋ ० ३.८५.१-३ । ( ८ ) ऋ ० ७.२८.१-३ । ( ९ ) ऋ ० ७.३ ९.१-३ । ( १० ) ऋ ० ७.९५.४-६ । ऐ.ब्रा.उ.- ८

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ऐतरेय ब्राह्मण उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 120 का मूल पृष्ठ
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९ ७८: ऐतरेयब्राह्मणम् [ २३.३ पञ्चमपञ्चिकायां उक्तमन्त्रगतं छन्दः प्रशंसति— तदु त्रैष्टुभं त्रिष्टुप्प्रातः सवन एष त्र्यहः ॥ ९ ॥

हिन्दी— ( उपर्युक्त मन्त्रों के छन्द की प्रशंसा कर रहे हैं— ) तदु उन तृचों की ऋचाएँ त्रैष्टुभम् त्रिष्टुप् ( छन्द ) वाली है । एषः त्र्यहः यह ( तृतीय ) त्र्यह भी त्रिष्टुप्प्रातः सवनः त्रिष्टुप् छन्द से सम्बन्धित प्रातःसवन वाला है ॥ अथ मरुत्वतीयशस्त्रे तुल्यशस्त्रक्लृप्त्याख्येन लिङ्गेनोपेतान् मन्त्रान् विधत्ते— ( अष्टमस्याह्नो मरुत्वतीयशस्त्रविधानम् ) विश्वानरस्य वस्पति ' मिन्द्र इत्सोमपा एक इन्द्र नेदीय एदिद्यु ' -त्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते ऽग्निर्नेता ' त्वं सोम क्रतुभिः पिन्वन्त्यपो " बृहदिन्द्राय गायतेति द्वितीयेनाह्ना समान आतानोऽष्टमेऽहन्यष्टम-स्याह्नो रूपम् ॥१० ॥

हिन्दी - ( अब मरुत्वीयशस्त्र के मन्त्रों का विधान कर रहे हैं - ) ' विश्वानरस्य वस्पतिम्, ‘ इन्द्र इत्सोमपा एक ', ' इन्द्र नेदीय एदिहि ', ' उतिष्ठ ब्रह्मणस्पते ' ' अग्निर्नेता ', ‘ त्वं सोम क्रतुभिः ', ' पिन्वन्त्यपो ' बृहदिन्द्राय गायत ' इति द्वितीयाह्ना समानः ये द्वितीय दिन के समान आतानः क्रमागत ( ऋचाएँ ) अष्टमेऽहनि अष्टम दिन में ( प्रयुक्त ) अष्टम-स्याह्नो रूपम् अष्टम दिन के अनुरूप है । महच्छब्दलिङ्गकं सूक्तं विधत्ते— शंसा महामिन्द्रं यस्मिन् विश्वा इति सूक्तं महद्वदष्टमेऽहन्यष्टम-स्याह्नो रूपम् ॥११ ॥

हिन्दी – ( अब महत् शब्द से युक्त चिह्न वाले सूक्त का विधान कर रहे हैं— ) ' शंसा महामिन्द्रं यस्मिन् विश्वा ' इति सूक्तम् यह सूक्त महद्वत् महत् शब्द से युक्त अष्टमेऽहनि

अष्टम दिन में प्रयुक्त अष्टमस्याह्नो रूपम् अष्टम दिन का रूप है ।

सा ० भा ० - अत्र ' महाम् ' – इत्येष महच्छब्द: ॥

पुनरपि महच्छब्दयुक्तं सूक्तान्तरं विधत्ते— ' महाश्चित्त्वमिन्द्र यत एतानिति १० सूक्तं महद्वदष्टमेऽहन्यमष्टम-( १ ) ऋ ० ८.६८.४ । ( २ ) ऋ ० ८.२.४ । ( ३ ) ऋ ० ८.५३.५ । ( ४ ) ऋ ० १.४०.१ । ( ५ ) ऋ ० ३.२०.४ । ( ६ ) ऋ ० १.९ १.२ । ( ७ ) ऋ ० १.६४.६ । ( ८ ) ऋ ० ८.८ ९.१ । ( ९ ) ऋ ० १.१६ ९ । ( १० ) ऋ ० १.१६ ९ ।