ऐतरेय ब्राह्मण उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 141–150

ऐतरेय ब्राह्मण उत्तरार्द्ध · पृष्ठ 141–150

पृष्ठ 141

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चतुर्थोऽध्यायः द्वितीयः खण्ड: ] सायणाचार्यकृतभाष्योपेतम्: ९९९ ॥ इति श्रीमत्सायणाचार्यविरचिते माधवीये ' वेदार्थप्रकाशे ' ऐतरेयब्राह्मण-भाष्ये पञ्चमपञ्चिकायां चतुर्थाध्याये ( चतुर्विंशाध्याये ) प्रथमः खण्डः ॥ १॥ ( २० ) ( १७३ )

|| इस प्रकार ऐतरेयब्राह्मण के चौबीसवें अध्याय के प्रथम खण्ड की ' शशिप्रभा ' नामक हिन्दी व्याख्या समाप्त ॥ अथ द्वितीयः खण्डः सा ० भा ० – अथ गमिधातुयुक्तं सूक्तं. विधत्ते— ( नवमदिनलिङ्गोपेतमन्यसूक्तविधानम् ) ' सं च त्वे जग्मुर्गिर इन्द्र पूर्वीरिति " सूक्तं, गतवन्नवमेऽहनि नवमस्याह्नो रूपम् ॥ १ ॥

हिन्दी - ( अब गम् धातु से युक्त सूक्त का विधान कर रहे हैं - ) ' सं च त्वे जग्मुर्गिर इन्द्र पूर्वीम् ' इति सूक्तम् यह सूक्तं है जो गतवत् गम् धातु वाला है अतः नवमेऽहनि नवम दिन में प्रयुक्त नवमस्याह्नो रूपम् नवम दिन का रूप है II सा ० भा ० – जग्मुरिति गमिधातुः ॥ क्षेतिधातुलिङ्गकं सूक्तं विधत्ते— ' कदा भुवन् रथक्षयाणि ब्राह्मेति ' ' सूक्तं, क्षेतिवदन्तरूपं, क्षेतीव वा अन्तं गत्वा नवमेऽहनि नवमस्याह्नो रूपम् ॥२ ॥

हिन्दी - ( अब क्षेति धातु से युक्त सूक्त को बतला रहे हैं - ) ( कदा भुवन् रथक्षयाणि ब्रह्म ' इति सूक्तम् यह सूक्त है जो क्षेतिवद् क्षेति धातु से युक्त अन्तरूपम् अन्त रूप वाला है । क्षेतीव वा अन्तम् निवास - स्थान के समान ( जाकर ) अन्त है । नवमेऽहनि नवम दिन में नवमस्याह्नो रूपम् नवम दिन का रूप है सा ० भा ० — कदा भुवन्नित्यत्र ' क्षयाणीति ' क्षेतिधातुरूपं श्रूयते । क्षेतिधातुश्चान्त-रूपः । कथमेतदिति? तदुच्यते — मार्गस्यान्तं गत्वा ' क्षेतीव वै ' क्वचिन्निवसत्येव, अतो निवासार्थवाचिनः क्षेतिधातोरन्तरूपत्वम् ॥ सत्यलिङ्गकं सूक्तं विधत्ते-' आ सत्यो यातु मघवाँ ऋजीषी'ति सूक्तं, सत्यवन्नवमेऽहनि ( १ ) ऋ ० ६.३४ । ( २ ) ऋ ० ६.३५ । ( ३ ) ऋ ० ४.१६

पृष्ठ 142

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१०००: ऐतरेयब्राह्मणम् | _ [ २४.२ पञ्चमपञ्चिकायां नवमस्याह्नो रूपम् ॥ ३ ॥

हिन्दी – ( सत्य शब्द से युक्त सूक्त का विधान कर रहे हैं - ) ' आ सत्यो यातु मधवाँ ऋजीषि ' इति सूक्तम् यह सूक्त है जो सत्यवत् सत्य ' शब्द ' से युक्त है अतः नवमेऽहनि

नवम दिन में ( प्रयुक्तं ) नवमस्याह्नो रूपम् नवम दिन का रूप है ।

सा ० भा ० — सत्यशब्दोऽत्र विस्पष्टः ॥

अन्तलिङ्गोपेतं सूक्तं विधत्ते— तत्त इन्द्रियं परमं पराचैरिति ' सूक्तमन्तो वै परममन्तो नवममहर्नवमेऽ -हनि नवमस्याह्वो रूपम् ॥४ ॥

हिन्दी – ( अन्त चिह्न से युक्त सूक्त को कह रहे हैं - ) ‘ तत्त इन्द्रियं परमं पराचैः ’ इंति यह सूक्त है । अन्तो वै परमम् ( सूक्त में प्रयुक्त ) परम ही ( उत्कर्ष के कारण ) अन्त हैं । अन्तो नवममहः नवम दिन ( त्र्यह का ) अन्त है । नवमेऽहनि नवम दिन में ( प्रयुक्त यह ( सूक्त ) नवमस्याह्नो रूपम् नवम दिन का रूप है ॥ सा ० भा०- - ' तत्ते ' इति सूक्ते परमशब्द उत्कर्षवाची विद्यते; उत्कर्षादधिकस्य कस्यचिदभावात् परमशब्दस्यान्तवाचित्वम् ॥ ' सं च त्वे ' इत्यादिसूक्तचतुष्टयगतं छन्दः प्रशंसति— तदु त्रैष्टुभं, तेन प्रतिष्ठिपदेन सवनं दाधारायतनादेवैतेन न प्रच्यवते ॥ ५ ॥

हिन्दी – ( उपर्युक्त चारो सूक्तों के छन्द की प्रशंसा कर रहे हैं — ) तदु त्रैष्टुभम् वे ( सूक्त ) त्रिष्टुप् छन्द वाले हैं । प्रतिष्ठितपदेन तेन प्रतिष्ठित पद ( नियताक्षर पाद वाले ) उस सूक्त से सवनं दाधार ( माध्यन्दिन ) सवन धारित होता है । एतेन इस ( सूक्त चतुष्टय ) से आयतानाद् न प्रच्यवते ( अपने ) स्थान से च्युत नहीं होता ॥ अन्तलिङ्गकमन्यत् सूक्तं विधत्ते-' अहं भुवं वसुनः पूर्व्यस्पतिरिति ' १ सूक्तमहं धनानि संजयामि शश्वत इत्यन्तो वै जितमन्तो नवममहर्नवमेऽहनि नवमस्याह्वो रूपम् ॥ ६ ॥

हिन्दी— ( अन्त शब्द वाले सूक्त का विधान कर रहे हैं— ) ‘ अहं भुवं वसुनः पूर्व्य-स्पतिः ' इति सूक्तम् यह सूक्त है । ( इस सूक्त की प्रथम ऋचा के द्वितीय पाद ) ' अहं धनं सञ्जयामि शश्वत ' में अन्तो वै जितम् जितम् ( शब्द युद्ध की समाप्ति होने के कारण ) अन्त ( १ ) ऋ ० १.१०३ । ( २ ) ऋ ० १०.४८ ।

पृष्ठ 143

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चतुर्थोऽध्यायः द्वितीयः खण्डः ] सायणाचार्यकृतभाष्योपेतम्: १००१ है और अन्तो नवममहः नवम दिन ( त्र्यह का ) अन्त है अतः नवमेऽहनि नवम दिन में ( प्रयुक्त यह सूक्त ) नवमस्याह्नो रूपम् नवम दिन का रूप है । सा ० भा ० - ' अहं भुवम् ' इति सूक्तस्य अहं धनानि इति द्वितीयः पादः । तत्र ‘ जयामि ' इति श्रूयते; जयश्च युद्धस्यान्तः ॥ तस्मिन् सूक्ते निविद्धानं विधत्ते— तदु जागतं, -जगत्यो वा एतस्य त्र्यहस्य मध्यंदिनं वहन्ति; तद्वैतच्छन्दो वहति, यस्मिन्निविद्धीयते, तस्माज्जगतीषु निविदं दधाति ॥७ ॥

हिन्दी — ( ' अहं भुवं ' सूक्त में निविद्धान को कह रहे हैं— ) तदु जागतम् यह ( सूक्त ) जगती छन्द वाला है । जगत्यः वै जगती ही एतस्य त्र्यहस्य इस त्र्यह के मध्यन्दिनं वहति मध्यन्दिन ( सवन ) का निर्वहन करती है । यस्मिन् निविद् धीयते जिस छन्द में निवित्पद का प्रक्षेप होता है तत् वै एतत् छन्दः वहति वह यह ही छन्द ( सवन का ) निर्वहन करता है तस्मात् इसी कारण जगतीषु निविदं दधाति जगती में निवित् ( पद ) का प्रक्षेप करता है । सूक्तगतं छन्दोद्वय सूक्तसंख्या च प्रशंसति— मिथुनानि सूक्तानि शस्यन्तेः- त्रैष्टुभानि च जागतानि च; मिथुनं वै पशवः, पशवश्छन्दोमाः, पशूनामवरुद्ध्यै, पञ्च पञ्च सूक्तानि श-स्यन्ते; पञ्चपदा पङ्क्तिः, पाङ्क्तो यज्ञः, पाङ्क्ताः पशवः, पशव-श्छन्दोमाः, पशूनामवरुद्ध्ये, तानि द्वेधा पञ्चान्यानि पञ्चान्यानि दश संपद्यन्ते; सा दशिनी विराळनं विराळन्नं पशवः, पशवश्छन्दोमाः, पशूनामवरुद्ध्यै ॥८ ॥

हिन्दी – ( सूक्तगत दोनों छन्दों और सूक्त की संख्या की प्रशंसा कर रहे हैं - ) त्रैष्टुभानि च जागतानि च त्रिष्टुप् और जगती ( दोनों के ) मिथुनानि सूक्तानि शस्यन्ते मिथुन सूक्तों का शंसन करते हैं । मिथुनं वै पशवः पशु मिथुनरूप वाले हैं पशवः छन्दोमाः और छन्दोम ( पशुप्राप्ति का साधन होने से ) पशुरूप हैं । पशूनाम् अवरुद्ध्यै पशुओं की प्राप्ति के लिए ( मिथुन सूक्तों का पाठ होता है ) । पञ्च पञ्च सूक्तानि शस्यन्ते ( मरुत्वतीय और निष्केवल्यशस्त्र के ) पाँच - पाँच सूक्तों का शंसन करते हैं । पञ्चपदाः पङ्क्तिः पङ्कि ( छन्द ) पाँच पादों वाला होता है, पाङ्काः यज्ञः यज्ञ ( हविष् इत्यादि के कारण ) पाङ्क है, पाङ्का पशवः पशु ( चार पाद और मुख से ) पाङ्क हैं, पशवः छन्दोमाः छन्दोम ( पशु प्राप्ति का साधन होने से ) पास है । अतः पशूनाम् अवरुद्ध्यै पशुओं की प्राप्ति के लिए ( पाँच - पाँच सूक्तों का ) शंसन होता है । पञ्चान्यानि पाँच अन्य ( मरुत्वतीय-

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१००२: ऐतरेयब्राह्मणम् [ २४.२ पञ्चमपञ्चिकायां शस्त्र ) के सूक्त और पञ्चान्यानि पाँच अन्य ( निष्केवल्यशस्त्र ) के सूक्त द्वेधा दो प्रकार वाले हैं । दश सम्पद्यन्ते ( दोनों मिलकर ) दश हो जाते हैं । सा दशिनी विराट् ( उन सूक्तों ) ' की दश संख्या विराट् रूप है । विराट् अन्नम् विराट् ( छन्द अन्न का साधन होने से ) अन्न रूप है । अन्नं पशवः अन्न ( क्षीरादि रूप से पशुओं से प्राप्त होने के कारण ) पशु रूप है । पशवः छन्दोमाः छन्दोम ( पशु प्राप्ति का साधन होने से ) पशु रूप है अतः पशूनाम् अवरुद्ध्यै पशुओं की प्राप्ति के लिए ( दश सूक्तों का शंसन होता है ) । सा ० भा ० — मरुत्वतीयनिष्केवल्यशस्त्रद्वयगतसूक्तापेक्षया ' पञ्च पञ्चेति ' द्विरुक्तिः ॥ तृतीयेऽहनि विहितौ वैश्वदेव प्रतिपदनुचरावत्रापि विधत्ते— ( नवमेऽहनि वैश्वदेवशस्त्रनिरूपणम् ) तत्सवितुर्वृणीमहे ', ऽद्या नो देव सवितरिति वैश्वदेवस्य प्रतिपदनुचरौ राथंतरेऽहनि नवमेऽहनि नवमस्याह्नो रूपम् ॥९ ॥

हिन्दी— ( अब नवम दिन से वैश्वदेवशस्त्र का विधान कर रहे हैं — ) ' तत्सवितुर्वृणीमहे ' यह तृच और ‘ अद्या नो देव सवितः ' यह तृच वैश्वदेवस्य वैश्वदेवशस्त्र के प्रतिपदनुचरौ क्रमशः प्रतिपद् और अनुचर हैं । स्थन्तरेऽहनि नवमेऽहनि रथन्तर ( साम ) से सम्बन्धित नवम दिनं में प्रयुक्त नवमस्याह्नो रूपम् नवम दिन का रूप है ॥ अन्तलिङ्गकं तृचात्मकं सूक्तं विधत्ते— दोषो आगादिति सावित्रमन्तो वै गतमन्तो नवममहर्नवमेऽहनि नवमस्याह्नो रूपम् ॥ १० ॥

हिन्दी – ( अन्त शब्द से युक्त तृचात्मक सूक्त का विधान कर रहे हैं— ) ' दोषो अगाद् ' इति यह तृच सावित्रम् सविता देवता वाला है । अन्तो वै गतम् गतम् ( चला गया ) ही अन्त है । अन्तो नवममहः नवम दिन ( त्र्यह का ) अन्त है, अतः नवमेऽहनि

नवम दिन में प्रयुक्त ( यह तृच ) नवमास्याह्नो रूपम् नवम दिन का रूप है ।

सा ० भा०- -'आगात् ' इति गमिधात्वर्थः । गमनं च स्थितेरन्तः; अतोऽन्तत्वं लिङ्गम् ॥

शुचिलिङ्गकं सूक्तस्थानीयं तृचं विधत्ते— प्र वां महि द्यवी अभीति ', द्यावापृथिवीयं; शुची उप प्रशस्तय इति शुचिवन्नवमेऽहनि नवमस्याह्नो रूपम् ॥ ११ ॥

हिन्दी - ( शुचि शब्द वाले सूक्तस्थानीय तृच का विधान कर रहे हैं - ) ' प्र वां महि ( १ ) ऋ ० ५.८२.१-३ । ( २ ) ऋ ० ५.८२.४-६ । ( ३ ) २२.८ टिप्पण्यां मन्त्रपाठादिकं द्रष्टव्यम् । ( ४ ) ऋ ० ४.५६.५-७ ।

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चतुर्थोऽध्यायः द्वितीयः खण्डः ] सायणाचार्यकृतभाष्योपेतम्: १००३ द्यवि ' इति द्यावापृथिवीयम् यह ( तृच ) द्यावापृथिवी देवता वाला है । इस तृच के तृतीय पाद ‘ शुची उप प्रशस्तय ' इति शुचिवत् यह शुचि शब्द से युक्त है जो नवमेऽहनि नवम दिन में प्रयुक्त नवमस्याह्न रूपम् नवम दिन का रूप है । सा ० भा ० – ' महि द्यवी ' - इति श्रवणात् इदं द्यावापृथिवीयम् । तस्य तृतीयपादे ' शुची उप ' इति शुचिशब्दः श्रूयते ॥ त्रिशब्दोपेतं सूक्तस्थानीयं तृचं विधत्ते— इन्द्र इषे ददातु नस्ते नो रत्नानि धत्तनेत्यार्भवं, त्रिरा साप्तानि सुन्वत इति त्रिवन्नवमेऽहनि नवमस्याह्नो रूपम् ॥१२ ॥

हिन्दी —- ( अब त्रिशब्द से युक्त सूक्तस्थानीय तृच को कह रहे हैं— ) ' इन्द्र इषे ददातु नः ' यह एक ऋचा, ‘ ते नो रत्नानि धत्तन ' ये दो ऋचाएँ इत्याभर्वम् यह ऋभुदेवता वाला तृच है । ( जिसका ) “ त्रिरा सातानि ' ( पाद ) त्रिवत् त्रिशब्द से युक्त है अतः नवमेऽहनि नवम दिन में ( प्रयुक्त ) नवमस्याह्नो रूपम् नवम दिन का रूप है । सा ० भा ० – ' इन्द्र इषे ' ' इत्यृगेका, ' ते नो रत्नानीति ' द्वे, त्रितयं मिलित्वा ऋभुदेवताकं सूक्तम् । ‘ ऋभुक्षणमृभुमिति ' श्रवणात् ' । ' त्रिरा साप्तानीति पादे त्रिशब्दः श्रुतः ॥ पादद्वयोपेता ऋचो विधाय प्रशंसति— बभ्रुरेको विषुणः सूनरो युवेति द्विपदाः शंसति; द्विपाद्वै पुरुषश्च-तुष्पादाः पशवः, पशवश्छन्दोमाः, पशूनामवरुद्ध्यै, तद्यद्विपदाः शंसति, यजमानमेव तद् द्विप्रतिष्ठं चतुष्पात्सु पशुषु प्रतिष्ठाप-यति ॥ १३ ॥

हिन्दी – ( अब दो पाद वाली ऋचाओं को कहकर उनकी प्रशंसा कर रहे हैं— ) ' बभ्रुरेको विषुणः सूनरो युवा ' इति द्विपदा शंसति इन दो पाद वाली ऋचाओं का शंसन करता है । द्विपाद्वै पुरुषः पुरुष दो पैरों वाला होता है और चतुष्पादाः पशवः पशु चार पाद वाले होते हैं । पशवः छन्दोमाः छन्दोम ( पशु - प्राप्ति का साधन होने से ) पशुरूप है । अतः पशूनाम् अवरुद्ध्यै पशुओं की प्राप्ति के लिए ( द्विपदा ऋचाओं का शंसन करता है ) । तद् यत् द्विपदा शंसति तो जो द्विपदा ( ऋचाओं ) का शंसन करता है, वह द्विप्रतिष्ठितं यजमानम् दो पाद वाले यजमान को चतुष्पात्सु पशुषु प्रतिष्ठापयति चार पद वाले पशुओं में प्रतिष्ठित करता है । त्रिशब्दोपेतं बहुदेवताकं सूक्तं विधत्ते— ( १ ) ऋ ० ८.९ ३.३४ । ( २ ) ऋ ० ८.९ ३.३४ । ( ३ ) ऋ ० १.२०.७ । ( ४ ) ऋ ० ८.२ ९.१-१० । ( ५ ) ऋ ० ८.२ ९.१-१० ।

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१००४: ऐतरेयब्राह्मणम् २४.२ पञ्चमपञ्चिकायां ' ये त्रिंशति त्रयस्पर इति वैश्वदेवं त्रिवन्नवमेऽहनि नवम-स्याह्नो रूपम् ॥१४ ॥

हिन्दी - ( अब त्रिशब्द से युक्त बहुदेवताक सूक्त का विधान कर रहे हैं — ) ' ये त्रिंशति त्रयस्पर ' इति वैश्वदेवम् यह विश्वेदेव से सम्बन्धित सूक्त है जो त्रिवत् त्रि ( शब्द ) से युक्त है अतः नवमेऽहनि नवंम दिन में ( प्रयुक्त यह सूक्त ) नवमस्याह्नो रूपम् नवम दिन का रूप है ॥ सा ० भा०— ' त्रिंशति ' इति श्रवणाद् बहुदेवताकत्वम् । ‘ त्रयः ' इति त्रिशब्दो विस्पष्टः ॥ तत्सूक्तगतं छन्दः प्रशंसति— तान्यु गायत्राणि गायत्रतृतीयसवन एष त्र्यहः ॥ १५ ॥

हिन्दी — ( ' ये त्रिंशति त्रयस्पर ' से प्रारम्भ सूक्त के छन्द की प्रशंसा कर रहे हैं - ) तान्यु गायत्राणि वह सूक्त गायत्री छन्द वाला है एषः त्र्यहः यह त्र्यह गायत्रतृतीय-सवनः गायत्री से सम्बन्धित तृतीय सवन वाला है । सा ० भा ० — ‘ तान्यु ' वैश्वदेवशस्त्रे प्रोक्तानि तान्यपि सूक्तानि ॥ शस्त्रान्तरस्य प्रतिपदं विधत्ते— ( नवमेऽहन्याग्निमारुतशस्त्रनिरूपणम् ) वैश्वानरो न ऊतय इत्याग्निमारुतस्य प्रतिपदा प्र यातु परावत इत्यन्तो वै परावतोऽन्तो नवममहर्नवमेऽहनि नवमस्याह्नो रूपम् ॥ १६ ॥

हिन्दी - ( अब अग्निमारुतशस्त्र का विधान कर रहे हैं— ) ' वैश्ववानरो न ऊतय ' इति आग्निमारुतस्य प्रतिपद् यह तृच अग्निमारुतशस्त्र का प्रतिपद् है । इस तृच में ‘ आ प्र यातु परावत ' इति यहाँ अन्तो वै परावतः ( मार्ग के अन्त का सूचक ) परावत अन्त है और अन्तो वै नवममहः नवम दिन ( त्र्यह का ) अन्त है अतः नवमेऽहनि नवम दिन में ( प्रयुक्त यह तृच ) नवमस्याह्नः रूपम् नवम दिन का रूप है । सा ० भा ० — अत्र सूत्रपठिते ' तृचे ' परावतः ' इति शब्दो दूरदेशवाची; स च देशो मार्गस्यान्त इत्यन्तवत्त्वं लिङ्गम् ॥ प्रकारान्तरेणान्तलिङ्गकं सूक्तं विधत्ते— ' मरुतो यस्य हि क्षय इति " मारुतं, क्षेतिवदन्तरूपं; क्षेतीव वा ( १ ) ऋ ० ८.२८ । ( २ ) आश्व श्व ० ० श्री ० ८.११.४ । तत्र ' वैश्वानरो न ऊतये ' - इति प्रथमा, ‘ वैश्वानरो न आगमत् ' - इति द्वितीया, वैश्वानरो अङ्गिरोभ्यः ' इति तृतीया । ( ३ ) ऋ ० १.८६ ।

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P चतुर्थोऽध्यायः द्वितीयः खण्डः ] सायणाचार्यकृतभाष्योपेतम्: १००५ अन्तं गत्वा नवमेऽहनि नवमस्याह्नो रूपम् ॥१७ ॥

हिन्दी – ( प्रकारान्तर से अन्त चिह्न वाले सूक्त का विधान कर रहे हैं — ) ' मरुतो यस्य हि क्षये ' इति मारुतम् यह मरुत देवताक ( सूक्त ) है । यह क्षेतिवद् क्षेति ( निवास स्थान ) शब्द से युक्त है जो ( गमन का अन्त होने के कारण ) अन्तरूप है अतः नवमेऽहनि नवम दिन में ( प्रयुक्त ) नवमस्याह्नो रूपम् नवम दिन का रूप है । सा ० भा ० – ‘ मरुतः ' इति श्रवणात् ' मारुतम् ' । ' क्षयः ' इति श्रवणात् ‘ क्षेतिवत् ' क्षयतिधातुयुक्तम् । स च धात्वर्थोऽत्र स्वरूपम् । कथमेतदिति? तदुच्यते । सर्वो हि पुरुषो मार्गस्यान्तं गत्वा ‘ क्षेतीव वै ' क्वचिन्निवसत्येव; सोऽयमन्तो लिङ्गम् ॥ अच्युतत्वलिङ्गयुक्तामृचं विधत्ते-' जातवेदसे सुनवाम सोममिति ' ' जातवेदस्याऽच्युता ॥ १८ ॥

हिन्दी - ( अच्युत चिह्न वाली ऋचा को कह रहे हैं— ) ' जातवेदसे सुनवाम सोमम् ' इति जातवेदस्या अच्युता यह ऋचा जातवेदस् देवता वाली और ( पूर्व में विहित होने के कारण ) अच्युत है । जातवेदोवाचकाग्निशब्दोपेतं सूक्त विधत्ते— ‘ प्राग्नये वाचमीरयेति ' ' जातवेदस्यं समानोदर्कं; नवमेऽहनि नवम-स्याह्नो रूपम् ॥ १ ९ ॥ हिन्दी – ( जातवेद - वाचक अग्नि शब्द से युक्त सूक्त को कह रहे हैं - ) ' प्राग्नये वाचमीरय ' इति जातवेदस्यम् यह ( सूक्त ) जातवेद देवता वाला और समानोदर्कम् समान अवसान वाला है जो नवमेऽहनि नवम दिन में ( प्रयुक्त ) नवमस्याह्नो रूपम् नवम दिन का रूप है । सा ० भा ० - एतदीयास्वृक्षु ' स नः पर्षदति द्विषः ' इति पादेन समाप्तिदर्शनात् समानोदर्कत्वम् ॥ तस्य पादस्य पुनः पुनरावृत्तिं दर्शयति— स नः पर्षदति द्विषः, स नः पर्षदति द्विष एतस्मिन्नवरात्रे, किंच किंच वारणं क्रियते, नः पर्षदति द्विषः, स नः पर्षदति द्विष इति नांस्तदेनसः प्रमुञ्चति ॥ २० ॥

हिन्दी — ( पाद की पुनरावृत्ति को दिखला रहे हैं — ) ( १ ) ऋ ० १.९९.१ । ( २ ) ऋ ० १०.१८७ । इति शंसति; बहु वा शान्त्या एव; तद्यत्स शंसति, सर्वस्मादेवै-' सः न पर्षदति द्विषः ’; ‘ सः नः

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१००६: ऐतरेयब्राह्मणम् [ २४.२ पञ्चमपञ्चिकायां पर्षदति द्विष: ' इति शंसति यह ( पुनरावृत्ति करके ) शंसन करता है । एतस्मिन् नवरात्रे इस नवरात्र में शान्त्यै एव शान्ति के लिए ही बहु वा किञ्च किञ्च बहुत अथवा कुछ-कुछ ( पापों का ) निवारण किया जाता है । तत् तत् जो - जो ‘ स नः पर्षदति द्विषः ', ‘ स नः पर्षदति द्विषः ' इति शंसति इसका शंसन करता है वह एनान् इस ( ऋत्विक् और यजमान ) को सर्वस्माद् एनसः सभी पापों से प्रमुञ्चति मुक्त कर देता है । ( पाद का अर्थ इस प्रकार है — जिस अग्नि के लिए स्तुति रूप वाली कही जा रही है ) सः वह ( अग्नि ) द्विषः ( पाप रूप ) पशुओं का अति अतिक्रमण करके नः पर्षद् ( विघ्नपरिहार द्वारा ) हमको पार करें ॥ सा ० भा ० — ‘ स नः ' इत्यादिपादस्य सर्वास्वृक्षु पठितस्य संग्रहार्थं वीप्सारूपेण द्विरुक्तिः । एतमेव पादं पुनः पुनः शंसतीत्यत्र कोऽभिप्राय? इति सोऽभिधीयते । एतस्मिन्न-वरात्रे त्रिविधत्र्यहसमष्टिरूपे प्रयोगाधिक्यात् तदा तदा विस्मृत्य किमपि ' वारणं ' वारणीयं निषिद्धानुष्ठानं ‘ बहु वै ’ प्रभूतमेव क्रियते ', अतः स्वशान्त्यर्थमेव पुनः पुनः शस्यते । तेन ‘ स नः ' इत्यादेः पुनः पुनः शंसनेन, तस्मात् सर्वस्मात् निषिद्धाचरणपापाद् एनान् ऋत्विग्यज-मानान् प्रमोचयति । तस्य पादस्यायमर्थः – यस्याग्नये स्तुतिरूपा वागीयते, सोऽग्निः पाप-रूपान् शत्रूनतिक्रम्य ‘ नः ' अस्मान् पर्षद् ' विघ्नपरिहारेण कर्मपारं नयत्विति ॥ एतच्छस्त्रगतसूक्तेषु च्छन्दः प्रशंसति— तान्यु गायत्राणि गायत्रतृतीयसवन एष त्र्यहः ॥ २१ ॥

हिन्दी – ( इन सूक्तगत छन्दों की प्रशंसा कर रहे हैं - ) तान्यु ये ( अग्निमारुतशस्त्र के तीन सूक्त ) गायत्राणि गायत्री छन्द वाले हैं । एषः त्र्यहः यह त्र्यह गायत्रतृतीय-सवनः गायत्री से सम्बन्धित तृतीयसवन वाला है ॥ ॥ इति श्रोमत्सायणाचार्यविरचिते माधवीये ' वेदार्थप्रकाशे ' ऐतरेयब्राह्मण-भाष्ये पञ्चमपञ्चिकायां चतुर्थाध्याये ( चतुर्विंशाध्याये ) द्वितीयः खण्डः ॥२ ॥ ( २१ ) ( १७४ )

॥ इस प्रकार ऐतरेयब्राह्मण के चौबीसवें अध्याय के द्वितीय खण्ड की ' शशिप्रभा ' नामक हिन्दी व्याख्या समाप्त ॥ ( १ ) ‘ बहु = विपुलं, वारणं = निरोधः । किञ्चित् किञ्चिदौपदेशैः प्राकृते निवर्तिते प्रयोगो हस्तरोधोऽनुभूयते वा स्यात् । इति षड्गुरुशिष्यः ।

पृष्ठ 149

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चतुर्थोऽध्यायः तृतीयः खण्डः ] सायणाचार्यकृतभाष्योपेतम्: १००७ अथ तृतीयः खण्डः सा ० भा ० - द्वादशाहे प्रायणीयोदयनीयरूप आद्यन्ते ये अहनी, तयोर्मध्ये दश-रात्रोऽस्ति, तस्मिंश्च त्रयो भागाः, - पृष्ठ्यः षडह एको भागः; छन्दोमनामकास्त्रयोऽहर्वि-शेषा द्वितीयो भागः, दशममहस्तृतीयो भागः तस्य भागस्य विधेयतया प्रशंसा कर्तव्या । इतरभागयोरप्यत्र या प्रशंसा प्रतीयते, साऽपि विधेयस्य दशमस्याह्नः प्रशंसार्थमेव तस्मिन्नहनि प्रशंसातिशयस्य गम्यमानत्वात् । तत्र चत्वारो दृष्टान्ता विवक्षिताः । तेषां मध्ये प्रथमेन दृष्टान्तेन प्रशंसति— ( दृष्टान्तद्वारा दशमस्याह्नः प्रशंसा ) पृष्ठ्यं षळहमुपयन्ति; यथा वै मुखमेवं पृष्ठ्यः षळहस्तद्यथाऽन्तरं मुखस्य जिह्वा तालु दन्ताः, एवं छन्दोमाः, अथ येनैव वाचं व्या-करोति, येन स्वादु चास्वादु च विजानाति, तद्दशममहः ॥ १ ॥

हिन्दी - ( द्वादशाह के प्रायणीय और उदयनीय रूप प्रथम और अन्तिम दिन के मध्य में पृष्ठ षडह, छन्दोम त्र्यह और दशम अहः- ये दश रात्रियाँ होती हैं । यहाँ अब दशम दिन की चार दृष्टान्तों द्वारा प्रशंसा कर रहे हैं, उनमें प्रथम दृष्टान्त – ) पृष्ठं षळहम् उपयन्ति ( याज्ञिक लोग ) द्वादशाह के पृष्ठ षडह का अनुष्ठान करते हैं । यथा वै मुखम् जैसे ( शरीर में ) मुख होता है एवं पृष्ठं षडहः इसी प्रकार द्वादशाह में पृष्ठ षडह ( नवरात्र के प्रथम दिन से लेकर षष्ठ दिन तक ) है ( अर्थात् पृष्ठ षडह द्वादशाह का मुख स्थानीय है ) तद्यथा जिस प्रकार मुखस्य चिह्ना तालुः दन्ताः मुख में जिह्वा, तालु, दन्त होते हैं, एवं छन्दोमाः उसी प्रकार छन्दोम त्र्यहः ( नवरात्र का सप्तम, अष्टम और नवम दिन ) होता है । अथ येन एव वाचं व्याकरोति जिस ( वागिन्द्रिय ) से वाणी को व्यक्त करता है और येन स्वादु च अस्वादु च विजानाति जिस ( रसनेन्द्रिय ) से स्वादिष्ट और अस्वादिष्ट को विशेष रूप से जानता है, तद् दशमः अहः उसी प्रकार वह दशम अहः ॥ सा ० भा ० — याज्ञिका दशरात्रे पृष्ठ्यं षडहमनुतिष्ठन्ति, स मुखस्थानीयः, मुख-स्याभ्यन्तरे जिह्वा तालु दन्ताश्चेति त्रयोऽवयवास्तिष्ठन्ति, तत्स्थानीयास्त्रयश्छन्दोमाः । अथ ' तद् ' येन विलक्षणेन येनैव वागिन्द्रियेण ' वाचं व्याकरोति ' शब्दमुच्चारयति । येन च रसनेन्द्रियेण स्वाद्वस्वादुविभागं जानाति, तदिन्द्रियद्वयस्थानीयमेतद् दशममहः ॥ द्वितीयेन दृष्टान्तेन प्रशंसति— यथा वै नासिके एवं पृष्ठ्यः षळहस्तद्यथाऽन्तरं नासिकयोरेवं

पृष्ठ 150

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१००८: ऐतरेयब्राह्मणम् [ २४.३ पञ्चमपञ्चिकायां छन्दोमा, अथ येनैव गन्धान् विजानाति तद्दशममहः ॥ २ ॥

हिन्दी— ( द्वितीय दृष्टान्त से दशम दिन की प्रशंसा कर रहे हैं ) यथा वै नासिके जिस प्रकार शरीर में दो नाक हैं एवं पृष्ठ्यः षडहः उसी प्रकार पृष्ठ्य षडह ( द्वादशाह का नासिका स्थानीय ) है तद्यथा नासिकयोः अन्तरम् और जिस प्रकार नासिकाओं के अन्तर ( छिद्र ) होता है एवं छन्दोमा उसी प्रकार छन्दोम ( त्र्यह ) है अथ येन गन्धान् विजानाति और जिस ( घ्राणेन्द्रिय ) से गन्धों ( सुगन्ध और दुर्गन्ध ) को जानते हैं तद्दशम् अहः उसी प्रकार यह दशम अहः है । सा ० भा ० — छिद्रद्वययुक्तत्वेन भागद्वयविक्षया ' नासिंके ' इति द्विवचनम् । तयोः ‘ अन्तरं ’ मध्यवर्ति च्छिद्रं; गन्धग्राहकघ्राणेन्द्रियस्थानीयं दशममहः ॥ तृतीयेन दृष्टान्तेन प्रशंसति— यथा वा अक्ष्येवं पृष्ठ्यः षळहस्तद्यथाऽन्तरमक्ष्णः कृष्णमेवं छन्दोमा, अथ यैव कनीनिका, येन पश्यति, तद्दशममहः ॥३ ॥

हिन्दी – ( तृतीय दृष्टान्त द्वारा दशम अहः की प्रशंसा कर रहे हैं - ) यथा वा अक्षी जिस प्रकार शरीर में दो नेत्र है एवं पृष्ठ्यः षडहः उसी प्रकार पृष्ठ्य षडह ( द्वादशाह का नेत्र स्थानीय ) है । तद्यथा अक्ष्णः अन्तरम् कृष्णः जिस प्रकार नेत्रों के भीतर कृष्णवर्ण होता है एवं छन्दोमा उसी प्रकार छन्दोम ( यह ) है अथ या एव कनीनिका और जो काले वर्ण की पुत्तलिका है येन पश्यति जिसके द्वारा देखता है तद्दशमः अहः उसी प्रकार दशम दिन है । सा ० भा०— अक्षिशब्देन शुक्लमण्डलसहितं सर्वं गोलकं विवक्षितम् । तत्र भागत्रयमारण्यकाण्डे वक्ष्यते— ' त्रिवृदिव वै चक्षुः शुक्लं कृष्णं कनीनिका ' ' इति । शुक्लमण्डलमध्ये कृष्णमण्डलं, तस्य मध्ये स्वल्पा वर्तुलाकारा कनीनिका, तत्रावस्थितेन चक्षुरिन्द्रियेण जनो रूपं पश्यति । तत्र शुक्लमण्डलरूपगोलकस्थानीयः पृष्ठ्यः षडहः, ( १ ) तदिति तत्र लुप्तोपमा; यथा सिंहो देवदत्तः, व्याघ्रो देवदत्तः, अग्निर्माणवकः इति । तद्वत् दशममहः इति यावत् । दशममहरित्यनुवादः । यथा पृष्ठ्यं षळहमुपयन्ति इति । ननु छन्दोमानां पृष्ठ्यावयवत्वात् तदान्तरसंस्तवो युक्तः । आह च — पूर्वख्त्र्यहः पुनश्छन्दोमा इति । दशमस्य पुनरह्नः पृष्ठान्तरत्वं कथम्? इति, अत्रोच्यते— पार्ष्टिकं प्रथम-महरग्निष्टोमसंस्थम् । आन्तरं च तत् षडहस्य । आह च- - ' ' अग्निष्टोमः प्रथमं षोडशी चतुर्थम् उक्थ्या इतरे ’ — इति । अविवाक्यम् अप्यहरग्निष्टोमसंस्थमेव, आह च— ' दशमेऽहन्यनुष्टुभाम् ’ - इति प्रक्रम्योपसंहारे ' अग्निष्टोम इदमहः ’ - इति अतः संस्थासामा-न्यात् षडहाभ्यन्तरतया स्तुतिः - इति गोविन्दस्वामी । ( २ ) ऐ ० आ ० २.७.५.५ ।