ऐतरेय ब्राह्मण उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 41–50
ऐतरेय ब्राह्मण उत्तरार्द्ध · पृष्ठ 41–50
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प्रथमोऽध्यायः चतुर्थः खण्डः ] सायणाचार्यकृतभाष्योपेतम्: ८ ९९ जिस ( छन्द ) में निविद्धीयते निविद् ( पदसमूह ) प्रक्षिप्त होते हैं, तद् एतत् छन्दः वह यह छन्द वहति ( सवन का ) निर्वाहक होता है । तस्मात् इसी कारण गायत्रीषु गायत्री ( छन्द. वाली ऋचाओं ) में निविदं दधाति निविद् प्रक्षिप्त होते हैं । सा ० भा ० — ‘ यस्मिन् ’ छन्दसि ' निवित् ' पदसमूहः प्रक्षिप्यते, तदेतच्छन्दो ' वहति '
सवनस्य निर्वाहकं भवति I । तस्मान्निर्वाहणाय तासु गायत्रीषु निविदं दध्यात् ॥
अथ वैराजसामसम्बद्धं तृचद्वयं विधत्ते— ( निष्केवल्यशस्त्रविधानम् ) ( वैराजसामसम्बद्धतृचद्वयविधानम् ) ' पिबा सोममिन्द्र मन्दतु त्वा ', ' श्रुधी हवं विपिपानस्याद्रेरिति ' वैराजं पृष्ठं भवति, बार्हतेऽहनि चतुर्थेऽहनि चतुर्थस्याह्नो रूपम् ॥ १ ९ ॥ हिन्दी -- ( अब वैराज साम से सम्बन्धित दो तृचों को कह रहे हैं - ) ' पिबा सोम-मिन्द्रमदन्तु त्वा ' ( से प्रारम्भ यह स्तोत्रिय तृच ) और ' श्रुधी हवं विपिपानस्याद्रेः ' ( से प्रारम्भ अनुरूप तृच ) वैराजं पृष्ठं भवति वैराज ( नामक साम ) से युक्त पृष्ठ ( स्तोत्र ) होता है, जो बार्हतेऽहनि चतुर्थेऽहनि बृहत्साम से सम्बन्धित चतुर्थ दिन में ( प्रयुक्त ) चतुर्थस्याह्न रूपम् चतुर्थ दिन का निरूपक है ॥ सा ० भा०— पृष्ठस्तोत्रसाधनस्य वैराजसाम्न आधारः ' पिबा सोमम् ' ' इत्यादिः स्तोत्रियस्तृचः, ' श्रुधी हवम् ' इत्याद्यनुरूपः १ अतो वैराजसामसम्बन्धी लिङ्गम् । किञ्च बृहत्साम्नोऽपत्यं वैराजसाम । इदं चाहर्युग्मरूपत्वाद् बृहत्सामसम्बन्धि । अतोऽपि कारणात् अस्मिन्नहन्येतत्तृचद्वयं युक्तम् ॥ ऋगन्तरं विधत्ते— ( धाय्याविधानम् ) यद्वावानेति धाय्याऽच्युता ॥ २० ॥
हिन्दी— ( अन्य ऋचा को कह रहे हैं - ) ' यद्वावान् ' इति यह ऋचा धाय्या अच्युता
धाय्या ( प्रथम दिन में विहित होने के कारण ) अच्युत है ।
सा ० भा ० – अच्युतत्वं सर्वसम्बन्धिलिङ्गमित्युक्तम् ॥
तस्मात्तृच ऊर्ध्वमन्यं प्रगाथं विधत्ते— ( प्रगाथविधानम् ) ' त्वामिद्धि हवामह ' इति बृहतो योनिमनुनिवर्तयति; ( १ ) ऋ ० ७.२२.१-३ । ( २ ) ऋ ० ७.२२.४-६ । ( ३ ) ऋ ० ६.४६.१,२ ।
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९ ००: ऐतरेयब्राह्मणम् [ २१.४ पञ्चमपञ्चिकायां बार्हतं ह्येतदहरायतनेन ॥ २१ ॥
हिन्दी— ( बृहत्साम सम्बन्धी प्रगाथ को कह रहे हैं - ) ' त्वामिद्धि हवामहे ' इति बृहतः योनिम् यह ऋचा बृहत् नामक साम की योनि है अत: ( योनिभूत प्रगाथ का ) अनुनि - वर्तयति ( पूर्वोक्त ‘ यद्वावान ' इस धाय्या के ) बाद में शंसन करता है । आयतनेन ( युग्म अहः रूप ) स्थान के द्वारा एतद् अहः यह दिन बार्हतम् बृहत्साम से सम्बन्धित है ॥ सा ० भा ० — त्वामिद्धीत्यस्यामृचि बृहत्सामोत्पन्नम्, तस्मादेतं योनिभूतं प्रगाथं पूर्वोक्तधाय्याम् ‘ अनु ’ पश्चाच्छंसेत् । ' एतदहरायतनेन ' युग्माहस्वरूपस्थानेन ‘ बार्हतं ’ बृहत्सामसम्बन्धं लिङ्गमित्युक्तम् ॥ · वैराजसाम्नः सम्बन्धिनं प्रगाथं विधत्ते— ' त्वमिन्द्र प्रतूर्तिष्विति ' ' सामप्रगाथः ॥ २२ ॥
हिन्दी— ( अब वैराज साम से सम्बन्धित प्रगाथ को कह रहे हैं— ) ' त्वमिन्द्र प्रतूर्तिषु ' इति सामप्रगाथः यह सामप्रगाथ है । तत्र लिङ्गं दर्शयति— ' अशस्तिहा जनितेति ' जातवांश्चतुर्थेऽहनि चतुर्थस्याह्नो रूपम् ॥ २३ ॥
हिन्दी - ( उक्त प्रगाथ में चिह्न को दिखला रहे हैं- - ) उक्त प्रगाथ ' त्वमिन्द्र प्रतूर्तिषु ' के तृतीय पाद में ‘ अशस्तिहा जनिता ' इति यह जातवान् जनि ( धातु ) से युक्त है, ( इसलिए ) चतुर्थेऽहनि चतुर्थ दिन में ( प्रयुक्त ) चतुर्थस्याह्नो रूपम् चतुर्थ दिन का निर्वाहक है । सा ० भा ० - उक्ते प्रगाथे तृतीयपादोऽयम् । अत्र ' अशस्तिहा जनितेति ', ततोऽयं जातवान् । ‘ जनि ' धातुयुक्तं जातवत्त्वं चैतस्याह्नो लिङ्गम् ॥ ‘ त्यमू ष्विति ' सूक्तविशेषस्याच्युतत्त्वं लिङ्गं दर्शयति— ' त्यमू षु वाजिनं देवजूतमिति ' ' तार्क्ष्योऽच्युतः ॥ २४ ॥
हिन्दी — ‘ त्वमू षु वाजिनं देवजूतम् ' इति यह सूक्त तार्क्ष्यः अच्युतः तार्क्ष्य देवता से सम्बन्धित है और ( प्रथम दिन में विहित होने के कारण ) अच्युत है ॥ ॥ इति श्रीमत्सायणाचार्यविरचिते माधवीये ' वेदार्थप्रकाशे ' ऐतरेयब्राह्मण-भाष्ये पञ्चमपञ्चिकायां प्रथमाध्याये ( एकविंशाध्याये ) चतुर्थः खण्डः || ४ || ( १५७ ) ( १ ) ऋ ० ८.९९.५,६ । ( २ ) ऋ ० १०.१७८ । Tripple ( A )
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प्रथमोऽध्यायः पञ्चमः खण्डः ] सायणाचार्यकृतभाष्योपेतम्: ९ ०१ ॥ इस प्रकार ऐतरेयब्राह्मण के इक्कीसवें अध्याय के चतुर्थ खण्ड की ' शशिप्रभा ' नामक हिन्दी व्याख्या समाप्त ॥ अथ पश्चमः खण्डः सा ० भा ० — विमदेन महर्षिणा दृष्टं न्यूङ्खसहितं सूक्त विधत्ते— ( विमददृष्टन्यूङ्खसहितसूक्तविधानम् ) ' कुह श्रुत इन्द्रः कस्मिन्नद्येति " सूक्तं वैमदं विरफितं विरिफितस्य ऋषेश्चतुर्थेऽहनि चतुर्थस्याह्नो वो रूपम् ॥१ ॥ ॥ हिन्दी — ( विमद ऋषि द्वारा दृष्ट सूक्त का न्यूङ्खसहित विधान कर रहे हैं - ) ' कुह श्रुत इन्द्रः कस्मिन्नद्य ' इति सूक्तम् यह सूक्त वैमदम् विमद ( ऋषि ) द्वारा दृष्ट है तथा विरिफितम् ( न्यूङ्खरूप ) विशेष कष्ट से उच्चारित होने वाला है । विरिफितस्य न्यूङ्खरूप विशेष कष्ट से उच्चरित होने वाले और ऋषेः ( विमद नामक ) ऋषि द्वारा दृष्ट ( सूक्त ) का चतुर्थेऽहनि चतुर्थ दिन में ( प्रयोग होता है ) वह चतुर्थस्याह्नो रूपम् चतुर्थ दिन का रूप है ॥ सा ० भा०- – पूर्ववद्व्याख्येयम् ॥ सूक्तान्तरं विधत्ते-( सूक्तान्तरविधानम् ) ' युध्मस्य ते वृषभस्य स्वराज ' इति सूक्तमुरुं गभीरं जनुषाऽभ्युग्र-मिति जातवच्चतुर्थेऽहनि चतुर्थस्याह्नो रूपम् ॥ २ ॥
हिन्दी – ( अन्य सूक्त का विधान कर रहे हैं - ) ' युध्मस्य ते वृषभस्य स्वराज़ ' इति सूक्तम् यह सूक्त है । ( इस सूक्त की चतुर्थ ऋचा का ) ' उरुं गभीरं पाद जातवत् जनि ( धातु ) से युक्त है जो चतुर्थेऽहनि चतुर्थ ( इसलिए ) चतुर्थस्याह्नो रूपम् चतुर्थ दिन का रूप है ॥ सा ० भा ० – ' युध्मस्येति ' सूक्ते ' ' उरुं गभीरम् ' इति यः श्रवणात् ‘ जातवत् ’ ‘ जनि ' धातुयुक्तं लिङ्गमस्ति । सूक्तगतं छन्दोऽवलम्ब्य प्रशंसति— ( १ ) ऋ ० १०.२२ । ( २ ) ऋ ० ३.४६.१ । ( ३ ) ऋ ० ३.४६ । जनुषाऽभ्युग्रम् ' इति यह दिन में प्रयुक्त होता है पादः, तत्र ‘ जनुषा ' इति 12-0-23.50 ( 9 )
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९ ०२: ऐतरेयब्राह्मणम् [ २१.५ पञ्चमपञ्चिकायां तदु त्रैष्टुभं तेन प्रतिष्ठितपदेन सवनं दाधारायतना-देवैतेन न प्रच्यवते ॥ ३ ॥
हिन्दी— ( सूक्त की छन्द के सम्बन्ध से प्रशंसा कर रहे हैं — ) तदु वह ( ' युध्मस्य ते वृषभस्य ' से प्रारम्भ होने वाला सूक्त ) त्रैष्टुभम् त्रिष्टुप् छन्द वाला है । प्रतिष्ठितपदेन तेन प्रतिष्ठित पद ( नियत अक्षर वाले ) उस ( सूक्त ) से सवनं दाधार ( माध्यन्दिन ) सवन ( वाला निष्केवल्यशस्त्र ) धारित होता है अतः एतेन इस ( सूक्त ) से आयतनात् अपने घर से न प्रच्यवते कभी भी ( यजमान ) च्युत नहीं होता ॥ सा ० भा ० – पूर्ववद्व्याख्येयम् ॥ तृतीयं तृचं विधत्ते— ' त्य मु वः सत्रासाहमिति " १ पर्यासो विश्वासु गीर्व्वायतमित्यभ्या-याम्यमिवैतदहस्तेन चतुर्थस्याह्नो रूपम् ॥४ ॥
हिन्दी – ( तृतीय तृच को कह रहे हैं — ) ' त्यमु वः सत्रासाहं ' ( से प्रारम्भ होने वाला तृच ) पर्यासः अन्त वाला ( उपसंहारक ) है । इसके ' विश्वासु गीर्ष्णायतम् ' इति इस ( पाद ) में ( ‘ आयतम् ' यह ) अभ्यायाम्यम् इव ( प्रयोगातिशय के कारण ) दीर्घता के समान है । एतद् अहः यह दिन ( अति दीर्घ के समान होता है ) । तेन इसी कारण ( यह ' तृच ) चतुर्थस्याह्नो रूपम् चतुर्थ दिन का रूप है । सा ० भा ० – परितः प्रक्षेपणीय: ' पर्यासः ' अन्तिमस्तृचः । तस्मिन् ' विश्वासु ' इति यः पादः, तत्र ‘ आयतम् ' इति शब्दो दीर्घत्ववाचकः श्रूयते । अहश्चैतत् ' अभ्यायाम्यमिव ' प्रयोगाधिक्याद् अतिदीर्घमिव; अतोऽत्र III दीर्घत्वं II लिङ्गम् ॥ छन्दोद्वारा प्रशंसति— ता उ गायत्र्यो वा एतस्य त्र्यहस्य माध्यंदिनं वहन्ति; तद्वैतच्छन्दो वहति यस्मिन्निविद्धीयते; तस्माद् गायत्रीषु निविदं दधाति ॥५ ॥
हिन्दी - ( छन्द के सम्बन्ध से उपर्युक्त तृच की प्रशंसा कर रहे हैं — ) ता उ वह ( ' त्यमु वः सत्रासाहं ' से प्रारम्भ तृच ) गायत्र्यः गायत्री छन्द वाला है । गायत्र्यः वै गायत्री ही एतस्य त्र्यहस्य इस त्र्यह के माध्यन्दिनं वहन्ति माध्यन्दिन ( सवन ) का निर्वहन करती हैं । यस्मिन् निविद्धीयते जिस ( छन्द ) में निवित् ( पदसमूह ) प्रक्षिप्त होते हैं, तद् एतत् छन्दः वह यह छन्द वहति ( सवन का ) निर्वाहक होता है । तस्मात् इसी कारण गायत्रीषु गायत्री ( छन्दों ) में निविदं दधाति निवित् को प्रक्षिप्त किया जाता है ॥ सा ० भा ० – पूर्ववद्व्याख्येयम् ॥ ( १ ) ऋ ० ८.८१.७ - ९ ।
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प्रथमोऽध्यायः पञ्चमः खण्डः ] सायणाचार्यकृतभाष्योपेतम्: ९ ०३ शस्त्रान्तरं विधत्ते — ( चतुर्थेऽहनि वैश्वदेवशस्त्रविधानम् ) विश्वो देवस्य नेतुस्, तत्सवितुर्वरेण्य, मा विश्वदेवं सत्पतिमिति वैश्वदेवस्य प्रतिपदनुचरौ; बार्हतेऽहनि चतुर्थेऽहनि चतुर्थस्याह्नो रूपम् ॥६ ॥
हिन्दी – ( अब वैश्वदेवशस्त्र का विधान कर रहे हैं - ) ' विश्वेदेवस्य नेतुः ' ( यह एक . ऋचा और ) ' तत्सवितुर्वरेण्यम् ' ( ये दो ऋचाएँ इस प्रकार यह तृच ) तथा ' आ विश्वदेवं सत्पतिम् ' यह तृच वैश्वदेवस्य वैश्वदेवशस्त्र की प्रतिपदनुचरौ ( दोनों तृच ) क्रमशः प्रतिपंद् और अनुचर हैं । बार्हतेऽहनि चतुर्थेऽहनि बृहत्साम सम्बन्धी चतुर्थ दिन में चतुर्थस्याह्नो रूपम् चतुर्थ दिन के रूप हैं । सा ० भा ० -'विश्वो देवस्य ' इति ' ऋगेका ' तत्सवितुरिति द्वे ऋचौ ॥ एष तृचो बृहत्सामसम्बन्धी, वैश्वदेवस्य प्रतिपत् । आ विश्वदेवमिति ' तृचोऽनुचरः । अह्नो युग्मत्वाद् बार्हतत्वम् । बृहत्सामसम्बन्ध एव मन्त्रलिङ्गम् ॥ सावितृदेवताकं सूक्तं विधत्ते— ' आ देवो यातु सविता सुरत्न " इति सावित्रमेति चतुर्थेऽहनि चतुर्थस्याह्नो रूपम् ॥७ ॥
हिन्दी - ( सविता देवता से सम्बन्धित सूक्त को कह रहे हैं - ) ' आ देवो यातु सविता सुरत्न ' इति सावित्र्यम् यह सविता ( देवता ) से सम्बन्धित ( सूक्त ) है । ( इस सूक्त में ) एति आ - यह उपसर्ग प्रयुक्त है, ( अतः यह ) चतुर्थेऽहनि चतुर्थ दिन में ( प्रयुक्त ) चतुर्थस्याह्नो रूपम् चतुर्थ दिन का उपलक्षक है सा ० भा ० – आकारोऽत्र लिङ्गम् ॥ प्र - शब्दलिङ्गोपेतं सूक्तं विधत्ते— ' प्र द्यावा यज्ञैः पृथिवी नमोभिरिति " ५ हनि चतुर्थस्याह्नो रूपम् ॥८ ॥
हिन्दी – ( प्र शब्द से युक्त सूक्त को कह रहे इति द्यावापृथिवीयम् यह ( सूक्त ) द्यावापृथिवी ( ॥ द्यावापृथिवीयं हैं — ) ' प्र द्यावा देवता ) वाला है प्रेति चतुर्थेऽ-यज्ञैः पृथिवी नमोभिः ’ । ( इसमें प्रयुक्त ) प्रेति ( १ ) ऋ ० ५.५०.१ । ( २ ) ऋ ० ३.६२.१०-११ ।
( ३ ) ऋ ० ५.८२.७ - ९ । ( ४ ) ऋ ० ७.४५ ।
( ५ ) ऋ ० ७.५३ ॥
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९ ०४: ऐतरेयब्राह्मणम् [ २१.५ पञ्चमपञ्चिकायां ' प्र ' यह ( उपसर्ग ) चतुर्थेऽहनि चतुर्थ दिन में ( प्रयुक्त ) चतुर्थस्याह्नो रूपम् चतुर्थ दिन का रूप है ॥ सा ० भा ० — प्र - शब्दो वाक्सम्बन्धश्चेति लिङ्गद्वयोपेतं सूक्तं विधत्ते— ' प्र ऋभुभ्यो दूतमिव वाचमिष्य ' " इत्यार्भवं; प्रेति च वाचमिष्य इति च चतुर्थेऽहनि चतुर्थस्याह्नो रूपम् ॥ ९ ॥
हिन्दी - ( प्र शब्द और वाक् शब्द से युक्त सूक्त का विधान कर रहे हैं - ) ' प्र ऋभुभ्यो दूतमिव वाचमिष्य ' इत्यार्भवम् यह ( सूक्त ) ऋभु देवता वाला है । इनमें प्रयुक्त प्रेति ' प्र ' यह ( उपसर्ग ) और ( वाक् सम्बन्धी ) वाचमिष्य इति यह ( शब्द ) चतुर्थेऽहनि चतुर्थ दिन में प्रयुक्त चतुर्थस्याह्नो रूपम् चतुर्थ दिन का उपलक्षक है ॥ सा ० भा ० — ऋभुदेवताकत्वं स्पष्टम् । प्रशब्दो वाक्यसम्बन्धश्च प्रेति चेत्वादिना प्रदर्श्यते ॥ प्रशब्देन शुक्रशब्देन चोपेतं सूक्तान्तरं विधत्ते— ' प्र शुक्रेतु देवी मनीषेति ' वैश्वदेवं; प्रेति च शुक्रवच्चतुर्थेऽहनि चतुर्थस्याह्नो रूपम् ॥ १० ॥
हिन्दी - ( प्र शब्द और शुक्र शब्द से युक्त अन्य सूक्त को दिखला रहे हैं — ) प्र शुक्रेतु देवी मनीषा ' इति वैश्वदेवम् यह ( सूक्त ) विश्वेदेवा देवता वाला है । ( इसमें प्रयुक्त ) प्रेति ' प्र ' यह ( उपसर्ग ) और शुक्रवत् ' शुक्र ' शब्द चतुर्थेऽहनि चतुर्थ दिन में ( प्रयुक्त )
चतुर्थस्याह्नो रूपम् चतुर्थ दिन का रूप है ।
सा ० भा ० — अत्र बहुदेवताकत्वाद् वैश्वदेवत्वम् ॥
नानाविधच्छन्दोयुक्तत्वरूपं लिङ्गान्तरं दर्शयति— ता उ विच्छन्दसः सन्ति द्विपदाः सन्ति चतुष्पदास्तेन चतुर्थ-स्याह्नो रूपम् ॥ ११ ॥
हिन्दी – ( प्र शुक्रैतु ' सूक्त की प्रशंसा कर रहे हैं — ) ता उ वे ( ' प्र शुक्रैतु ' सूक्त की ऋचाएँ ) विच्छन्दसः सन्ति विविध छन्दों वाली हैं । द्विपदाः सन्ति चतुष्पदा ( उनमें इक्कीस ऋचाएँ ) दो पादों वाली ( और शेष ऋचाएँ ) चार पादों वाली हैं । तेन इस ( विविध छन्दों ) से ( यह सूक्त ) चतुर्थस्याह्नो रूपम् चतुर्थ दिन का उपलक्षक है । सा ० भा०– ' ता उ ' तास्तु सूक्तगता ऋचो ' विच्छन्दसः ' विविधच्छन्दोयुक्ताः; तत्रैकविंशतिर्द्विपदाः सन्ति, अवशिष्टाश्चतुष्पदाः सन्ति । ' तेन ' विच्छन्दस्त्वेनाह्नो निरूप-कम् ॥ ( १ ) ऋ ० ४.३३.१ । ( २ ) ऋ ० ७.३४ ।
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प्रथमोऽध्यायः पञ्चमः खण्डः ] सायणाचार्यकृतभाष्योपेतम्: ९ ०५ शस्त्रान्तरस्थं प्रतिपत्सूक्तं विधत्ते— ( चतुर्थेऽहन्यग्निमारुतशस्त्रविधानम् ) ' वैश्वानरस्य सुमतौ स्यामेत्याग्निमारुतस्य प्रतिपदः इतो जात इति जातवच्चतुर्थेऽहनि चतुर्थस्याह्नो रूपम् ॥ १२ ॥
हिन्दी – ( अग्निमारुतशस्त्र का विधान कर रहे हैं — ) ' वैश्वानरस्य सुमतौ स्याम् ' इति अग्निमारुतस्य प्रतिपद् यह सूक्त अग्निमारुत ( शस्त्र ) का प्रतिपद् है । ( इस सूक्त की प्रथम ऋचा के तृतीय पाद ) इतो जातः इतो जातः ( में जात शब्द होने से ) चतुर्थेऽहनि चतुर्थ दिन में ( प्रयुक्त ) चतुर्थस्याह्नो रूपम् चतुर्थ दिन का रूप है ॥ सा ० भा ० — तस्य सूक्तस्य प्रथमाया ऋचस्तृतीयपाद ' इतो जातः ' इति श्रवणा-ज्जातवच्छब्दोपेतं लिङ्गमस्ति ॥ मरुद्देवताकं सूक्तं विधत्ते— ' क ई व्यक्ता नरः सनीळा ' इति मारुतः, नकिर्ह्येषां जनूंषि वेदेति जातवच्चतुर्थेऽहनि चतुर्थस्याह्नो रूपम् ॥ १३ ॥
हिन्दी – ( अब मरुत् देवता वाले सूक्त को कह रहे हैं - ) ' क ई व्यक्ता नरः सनीळा ' इति मारुतम् यह ( सूक्त ) मरुत् देवता वाला है । ( इसकी प्रथम ऋचा के तृतीय पाद में ) ' नकि ह्येषा जनूंषि वेद ' इति जातवत् यह जनि ( धातु ) से युक्त है अतः चतुर्थेऽहनि चतुर्थ दिन में ( प्रयुक्त ) चतुर्थस्याह्नो रूपम् चतुर्थ दिन का रूप है ॥ सा ० भा ० – अस्मिन् सूक्ते ' तृतीयस्यामृचि ' मरुद्भिरस्तु ' इति श्रवणान्मारुतम् । नकिर्हीत्यादिकः प्रथमाया * ऋचस्तृतीयः पादः, तत्र ' जनूंषीति ' ' जन ' धातुयुक्तत्वं लिङ्गम् ॥ विविधच्छन्दस्त्वं लिङ्गान्तरं दर्शयति— ता उ विच्छन्दसः सन्ति द्विपदाः सन्ति चतुष्पदास्तेन चतुर्थ-स्याह्नो रूपम् ॥ १४ ॥
.हिन्दी— ( विविध छन्द और अन्य चिह्नों की दृष्टि से ' क ईं व्यक्ता नरः ' सूक्त की प्रशंसा कर रहे हैं— ) ता उ वे ( सूक्त की ऋचाएँ ) विच्छन्दसः सन्ति विविध छन्दों वाली हैं । द्विपदाः सन्ति चतुष्पदा ( उनमें दश ऋचाएँ ) दो पादों वाली ( और अवशिष्ट ) चार पादों वाली हैं, तेन इस कारण से चतुर्थस्याह्नो रूपम् चतुर्थ दिन का निरूपक है । ( १ ) ऋ ० १.९ ८ | ( २ ) ऋ ० ७.५६ । ( ३ ) पञ्चम्यामूचीति वक्तुमुचितम् । ( ४ ) द्वितीयाया इति वक्तव्यम्; न हि प्रथमा ऋक् चतुष्पदा ।
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९ ०६: ऐतरेयब्राह्मणम् [ २१.५ पञ्चमपञ्चिकायां सा ० भा०- - अस्मिन् सूक्ते एकादश द्विपदाः, इतराश्चतुष्पदाः ' ॥ अच्युतत्वलिङ्गोपेतामृचं विधत्ते— ' जातवेदसे सुनवाम सोममिति ' ' जातवेदस्याऽच्युता ॥ १५ ॥
हिन्दी— ( अच्युत लिङ्ग वाली ऋचा का विधान कर रहे हैं — ) ' जातवेदसे सुनवाम सोमम् ' इति जातवेदस्याः यह ( ऋचा ) जातवेद ( देवता ) वाली और अच्युता ( पहले विहित होने के कारण ) अच्युत है ॥ सा ० भा ० — जातवेदोदेवताकमन्यत् सूक्तं विधत्ते— ' अग्नि नरो दीधितिभिररण्योरिति ' जातवेदस्यम्; हस्तच्युती जनय-न्तेति जातवच्चतुर्थेऽहनि चतुर्थस्याह्नो रूपम् ॥ १६ ॥
हिन्दी— ( जातवेदस् देवता वाले अन्य सूक्त को कह रहे हैं— ) ' अग्निं नरो दीधिति-भिररण्योः ' इति जातवेदस्यम् यह ( सूक्त ) जातवेदस् देवताक है । ( इस सूक्त की प्रथम ऋचा का द्वितीय पाद ) ‘ हस्तच्युती जनयन्त ' जातवत् जनि ( धातु ) से युक्त है अतः चतुर्थेऽहनि चतुर्थ दिन में चतुर्थस्याह्नो रूपम् चतुर्थ दिन का उपलक्षक है ॥ सा ० भा ० — जातस्य जगतो वेदितत्वात् अग्निरेव ' जातवेदाः ' । हस्तच्युतीत्यादि-र्द्वितीयः पादः, तत्र ‘ जनयन्तेति ' श्रवणाज्जनिधातुयुक्तं लिङ्गम् ॥ विविधच्छन्दोरूपं लिङ्गान्तरं दर्शयति— ता उ विच्छन्दसः सन्ति विराजः सन्ति त्रिष्टुभस्तेन चतुर्थस्याह्नो रूपमह्नो रूपम् ॥१७ ॥
हिन्दी— ( छन्द की दृष्टि से ‘ अग्निं नरो ' सूक्त की प्रशंसा कर रहे हैं— ) ताः उ वे ( ' अग्निं नरो ' सूक्त की ऋचाएँ ) विच्छन्दसः सन्ति विविध छन्दों वाली हैं । विराजः सन्ति त्रिष्टुभः ( उनमें से अट्ठारह ऋचाएँ ) विराज ( छन्द ) वाली ( और अवशिष्ट ) त्रिष्टुप् छन्द वाली हैं । तेन इसी कारण चतुर्थस्याह्नो रूपम् चतुर्थ दिन का उपलक्षक है । सा ० भा ० ० – अत्रा विराजः, इतरास्त्रिष्टुभः । अभ्यासोऽध्यायपरिसमाप्त्यर्थः । ॥ इति श्रीमत्सायणाचार्य विरचिते माधवीये ' वेदार्थ प्रकाशे ' ऐतरेयब्राह्मण-भाष्ये पञ्चमपञ्चिकायां प्रथमाध्याये ( एकविंशाध्याये ) ( १ ) क ई व्यक्ता इति पञ्चविंशत्यृचं सूक्तम् । तत्र आद्या एकादशा द्विपदाः, विंशत्यक्षरा विराजः, शिष्टाश्चतुर्दशः त्रिष्टुभः । तदिह यदुक्तं पुरस्तात् ' तृतीयस्यामृचि ' इति यच्चोक्तं ' प्रथमाया ' ऋच: ' - इति, तदुभयमेव भाष्यकारस्यैतस्य भ्रममावेदयतीति स्फुटम् । ( २ ) ऋ ० १.९९। _ ( ३ ) ऋ ० ७.१1
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प्रथमोऽध्यायः पञ्चमः खण्डः ] सायणाचार्यकृतभाष्योपेतम्: ९ ०७ पञ्चमः खण्डः ॥५ ॥ ( १५८ )
॥ इस प्रकार ऐतरेयब्राह्मण के इक्कीसवें अध्याय के पञ्चम खण्ड की ' शशिप्रभा ' नामक हिन्दी व्याख्या समाप्त ॥
वेदार्थस्य प्रकाशेन तमोहार्दं निवारयन् ।
पुमर्थाश्चतुरो देयाद् विद्यातीर्थमहेश्वरः ॥
॥ इति श्रीमद्राजाधिराजपरमेश्वरवैदिकमार्गप्रवर्तकवीरबुक्कभूपालसाम्राज्यधुरंधरमाधवा-चार्यादेशतो सायणाचार्येण विरचिते माधवीये ' वेदार्थप्रकाश'- नाम भाष्ये ऐतरेयब्राह्मणभाष्यस्य कृतौ पञ्चपञ्चिकायाःप्रथमोध्यायः ( एकविंशोऽध्यायः ) समाप्तः ॥१ ॥
॥ इस प्रकार ऐतरेयब्राह्मण के इक्कीसवें अध्याय की ' शशिप्रभा ' नामक हिन्दी व्याख्या समाप्त ॥
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अथ पञ्चमपञ्चिकायां द्वितीयोऽध्यायः [ अथ द्वाविंशोऽध्यायः ] प्रथमः खण्डः सायणभाष्यम् — अथ नवरात्रापेक्षया पञ्चमं मध्यमत्र्यहापेक्षया द्वितीयमहर्विधत्ते— ( पृष्ठ्यषडहः क्रमागतः ) ( तत्र द्वादशान्तर्गतस्य नवरात्रस्य पञ्चममहर्निरूपणम् ) गौर्वै देवता पञ्चममहर्वहति त्रिणवः स्तोमः शाक्वरं साम पङ्क्ति-श्छन्दो यथादेवतमेनेन यथास्तोमं यथासाम यथाछन्दसं राध्नोति य एवं वेद ॥ १ ॥
हिन्दी – ( द्वादशाह नवरात्र के ) पञ्चमम् अहः पञ्चम दिन को गौर्वै देवता गौ देवता ही वहति निर्वहन करते हैं अर्थात् पञ्चम दिन के देवता गौ देवता हैं । त्रिणवः स्तोमः तीन का नौ गुणा अर्थात् सत्ताइस ( सप्तविंश ) स्तोम है, शाक्वरं साम शाक्वर ( नामक ) साम है, पङ्क्तिछन्दः पङ्क्ति ( नामक ) छन्द है, यः एवम् जो इस प्रकार यथादेवतम् इस देवता को यथास्तोमम् इस स्तोम को यथासाम इस साम को और यथाछन्दसम् इस छन्द को वेद ( पञ्चम दिन के निर्वाहक के रूप में ) जानता है, वह एनेन इस ( ज्ञान ) से राध्नोति ( इन देवता इत्यादि का अनतिक्रमण करके ) समृद्ध होता है । विमर्श - त्रिणव स्तोम — एक तृच का तीन पर्यायों में आवर्तन किया जाता है । उनमें प्रथम पर्याय में तृच की प्रथम ऋचा का तीन बाद, द्वितीय ऋचा का पाँच बार और तृतीय ऋचा का एक बार पाठ किया जाता है । द्वितीय पर्याय में प्रथम ऋचा का एक बार, द्वितीय ऋचा का तीन बार और तृतीय ऋचा का पाँच बार पाठ होता है । तृतीय पर्याय में प्रथम ऋचा का पाँच बार, द्वितीय का एक बार और तृतीय का तीन बार पाठ किया जाता है । इस आवृत की गयी सत्ताइस ऋचाओं के द्वारा त्रिणव स्तोम होता है । सा ० भा ० — पूर्वत्र वागेकं गौरेकं द्यौरेकमिति देवताया रूपत्रयमुक्तम्; तत्र वागात्मकं रूपं चतुर्थेऽहन्युक्तम्, पञ्चमस्याह्नो गौरव ' देवता निर्वाहिका । स्तोमानां मध्ये त्रिणवो निर्वाहकः । तस्य त्रिणवस्य स्तोमस्य स्वरूपं छन्दोगैरेवमाम्नातम् — ‘ नवभ्यो हिं करोति स तिसृभिः स पञ्चभिः स एकया । नवभ्यो हिं करोति स एकया स तिसृभिः स पञ्चभिः । नंवभ्यो हिं करोति स पञ्चभिः स एकया स तिसृभिः । वज्रो वै त्रिणवः ' इति । अस्यायमर्थः-( १ ) ' गौरत्र सुरभिर्यद्वा ब्रह्मपत्नी सरस्वती ' - इति षड्गुरुशिष्यः । ( २ ) ता ० ब्रा ० ३.१,२ ।