ऐतरेय ब्राह्मण उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 581–590
ऐतरेय ब्राह्मण उत्तरार्द्ध · पृष्ठ 581–590
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पञ्चमोऽध्यायः अष्टम: खण्ड: ] सायणाचार्यकृतभाष्योपेतम्:: १४३५ ( नाराशंससंज्ञकचमसस्य प्रयोगविधानम् ) तद्यत्रैतांश्चमसान् सादयेयुस्तदेतं यजमानचमसं सादयेत्, तान्यत्र प्रकम्पयेयुस्तदेनमनु प्रकम्पयेदथैनमाहृतं भक्षयेन्नराशंसपीतस्य देव सोम ते मतिविद ऊमैः पितृभिर्भक्षितस्य भक्षयामीति प्रातःसवने नाराशंसो भक्ष, ऊर्वैरिति माध्यंदिने, काव्यैरिति तृतीयसवने ॥ १ ॥
हिन्दी— ( नाराशंससंज्ञक चमस के प्रयोग का विधान कर रहे हैं— ) तद् यत् उस ( आप्यायन ) के बाद तभी एतं यजमानचमसम् उस यजमान ( क्षत्रिय ) के भी चमस को सादयेत् रख देना चाहिए । तानि यत्र प्रकम्पयेयुः जब उन ( होत्रादि चमसों ) को वे सामने लावें तद् एतद् अनु तभी इन ( होत्रादि चमसों ) के ( सामने लाने के ) पश्चात् उस ( क्षत्रिय चमस ) को प्रकम्पयेत् सामने लाना चाहिए । अथ अब ( उस सामने लाने के पश्चात् ) आहतम् एनम् ( भक्षण के लिए सामने लाये गये ) इस ( क्षत्रिय के चमस ) को ( इस मन्त्र से ) भक्षयेत् भक्षण करना चाहिए— देव सोम हे सोम ( के समान फल देने वाले ) देव! नाराशंसपीतस्य नाराशंस द्वारा पान किये गये और ऊमैः पितृभिः भक्षितस्य ऊम नामक पितरों द्वारा पान किये गये तथा मतिविदः ते हम लोगों के तात्पर्य को समझने वाले तुम्हारा भक्षयामि मैं भक्षण कर रहा हूँ - इति इस मन्त्र से प्रातः सवने प्रातः सवन् में नाराशंसः नाराशंस से सम्बन्धित ( चमस ) का भक्षः भक्षण ( करना चाहिए ) । माध्यन्दिने माध्यन्दिनसवन में ऊर्वैः ( ऊर्में: के स्थान पर ) ऊर्वै तथा तृतीयसवने सायं-सवन में काव्यैः इति ( ऊर्में: के स्थान पर ) ' काव्यै ' का प्रयोग करना चाहिए ॥ सा ० भा ० - – ' तत् ' तस्मादाप्यायनादूर्ध्वं ' यत्र ' यदा ' एतान् ' होत्रादीनां चमसाना-प्यायितान् सादयेयुः, तदानीमेतं ' यजमानस्य ' राज्ञश्चमसं सादयेत् । ‘ तान् ’ होत्रादीनां चमसान् यदा प्रकम्पयेयुः सदैव ‘ एनं ’ राजचमसम् ' अनु ' प्रकम्पयेत् । ' अथ ’ अनन्तरमेनं चमसं भक्षणार्थमाहृतं नराशंसेत्यादिमन्त्रेणं भक्षयेत् । हे ' सोम ' सोमसदृश फलचमसदेव, ‘ नराशंसपीतस्य ’ नरा मनुष्या ऋभुप्रमुखाः शस्यन्ते यस्मिन् सवनविशेषे सोऽयं नराशंसः, तत्र देवैः पीतस्य, ऊमनामभिः पितृभिश्च भक्षितस्य, ‘ मतिविदः ' अस्मदभिप्रायाभिज्ञस्य ते भक्षयामि ‘ इति ' अनेन मन्त्रेण प्रातः सवने नाराशंसचमससम्बन्धी भक्षः कर्तव्यः । इतरयोस्तु सवनयोस्तस्मिन् मन्त्रे ‘ ऊमैरिति ' अस्य पदस्य स्थाने ' ऊर्वैः ' ' काव्यैः ' इति पदद्वयं क्रमेण पठनीयम् ॥ त्रिविधमन्त्रतात्पर्यं दर्शयति-ऊमा वै पितरः प्रातःसवन, ऊर्वा माध्यंदिने, काव्यास्तृतीयसवने, तदेतत् पितॄनेवामृतान् सवनभाजः करोति ॥ २ ॥
हिन्दी— ( उपर्युक्त तीन प्रकार के मन्त्रों के तात्पर्य को दिखला रहे हैं— ) प्रातः-
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१४३६: ऐतरेयब्राह्मणम् [ ३५.८ सप्तमपञ्चिकायां सवने ऊमाः पितरः प्रातः सवन में ऊमा ( सहायक ) नामक पितर, माध्यन्दिने ऊर्वाः माध्यन्दिनसवन में ऊर्वा ( महान् ) नामक पितर और तृतीयसवने काव्याः तृतीय ( सायं ) सवन में काव्या ( ऋषिगण ) नामक पितर ( ऋत्विकों द्वारा कहे जाते हैं ), तत् एतत् उस इस ( कथन ) से अमृतान् पितॄन् वह ( इन ) अमर पितरों को सवनभाजः करोति सवन में भागीदार करता है । सा ० भा ० — ऊमा, ऊर्वाः, काव्याः – इत्येते सवनत्रयगताः पितृविशेषाः, अत-स्तच्छब्दप्रयोगेण तान् पितॄन् सवनभाजः करोति । पितरश्च द्विविधाः, मृता अमृताश्च । इदानीं मनुष्याः सन्तो मरणादूर्ध्वं पितृलोकं प्राप्ताः ' मृताः ', सृष्टिमारभ्य पितृलोकेऽ-वस्थिताः ‘ अमृताः ’, ऊमादयः तथाविधत्वादमृतशब्देन विशेष्यन्ते ॥ अथ मन्त्रतात्पर्ये मतान्तरं दर्शयति— सर्वो हैव सोऽमृत इति ह स्माऽऽह प्रियव्रतः सोमापो यः कश्च सवनभागिति ॥ ३ ॥
हिन्दी – ( मन्त्र के तात्पर्य में अन्य मत को दिखला रहे हैं - ) यः कः च सवन-भाक् जो कोई भी ( पितर ) सवन का भागी होता है, सर्वः ह एव सः अमृतः वे सभी अमर ही होते हैं — इति ह स्म आह सोमापः प्रियव्रतः ऐसा सोम का पान करने वाले प्रियव्रत ने कहा 11 विमर्श – ( १ ) मृत और अमृत भेद से पितर दो प्रकार के होते हैं । उनमें से जो पितर मनुष्य योनि में जन्म लेकर मृत्यु के उपरान्त पितृलोक को प्राप्त करते हैं, वे मृत पितर कहलाते हैं तथा जो सृष्टि के प्रारम्भ से ही पितृलोक में रहते हैं, वे अमृत कहे जाते हैं । पितरों में ऊर्म नामक पितर मृत तथा ऊर्व और काव्य नामक पितर अमर हैं । ( २ ) सामपायी प्रियव्रत के अनुसार सोमपान के भागी सभी पितर अमर होते हैं । ३५. ७.१ में ऊर्म नामक पितर के प्रातः सवन में, ऊर्व नामक पितर के माध्यन्दिनसवन में तथा कव्य नामक पितर के सायंसवन में सोमपान मन्त्र से प्रयोग होने से ये सभी पितर सोमपान के भागी हो जाते हैं अतः ये सभी पितर अमर हैं । सा ० भा ० — न केवलमूमादय एव पितरः प्रसिद्धा अमृताः । किंतु यः कोऽपि पिता सवनभाग्भवति, स सर्वोऽप्यूमादिशब्दैरुपलक्षितत्वादमृत एव भवतीति ' ‘ सोमापः ’ प्रिय-व्रताख्यो महर्षिराह स्म ॥ इदानीं नराशंसचमसभक्षं प्रशंसति-( १ ) तथाहि — ‘ भक्षयित्वाऽयामं सोमममृता अभूम, शन्नो भव हृद आपीत इन्दविति मुखहृदये अभिमृशेरन् ’ - इति आश्व ० श्रौ ० ५.६.२६ ।
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पञ्चमोऽध्यायः अष्टमः खण्डः ] सायणाचार्यकृतभाष्योपेतम्: १४३७ अमृता ह वा अस्य पितरः सवनभाजो भवन्त्युग्रं हास्य राष्ट्रमव्यथ्यं भवति य एवमेतं भक्षं भक्षयति क्षत्रियो यजमानः ॥४ ॥
हिन्दी— ( अब नाराशंस चमस के भक्षण की प्रशंसा कर रहे हैं ) यः क्षत्रियः यजमानः जो यजन करने वाला क्षत्रिय एवमेतं भक्षं भक्षयति इस प्रकार इस ( नाराशंस ) के भक्ष्य का भक्षण करता है अस्य इस ( भक्षण करने वाले क्षत्रिय राजा ) के सवन-भाजाः सवन के भागीदार पितरः ( पितृपितामहादि ) पितर अमृताः ह वा भवन्ति मरणधर्म से रहित अमर ही होते हैं और अस्य इस ( राजा ) का राष्ट्रम् राष्ट्र उग्रम् अव्यथम् भवति तेजस्वी और कभी भी विनष्ट न होने वाला होता है ॥ सा ० भा ० — ' अस्य ' राज्ञो भक्षयितुः ' पितरः ' पितृपितामहादयः सर्वेऽपि सवन-भाजः सन्तः ‘ अमृताः ’ मरणरहिता देवा भवन्ति । उग्रमित्यादि पूर्ववत् ॥ यदुक्तं तदुत्तरयोः सवनयोरतिदिशति— समान आत्मनः प्रत्यभिमर्शः, समानमाप्यायनं चमसस्य ॥५ ॥
हिन्दी - आत्मनः प्रत्यभिमर्शः ( इस कर्म में ) अपने शरीर का स्पर्श समानः जैसा पहले कहा गया है, वैसे ही होता है । चमसस्य आप्यायनम् और चमस का भरना भी समानम् ( पूर्व में कहे गये के ) समान ही होता है । फलचमसे विद्यमानं प्रयोगविशेषमभिधायावशिष्टं सोमचमसगतं प्रयोगं सवनत्रयेऽ-प्यतिदिशति— ( अवशिष्टचमसगतप्रयोगविधानम् ) प्रातः सवनस्यैवाऽऽवृता प्रातः सवने चरेयुर्माध्यंदिनस्य माध्यंदिने, तृतीयसवनस्य तृतीयसवने ॥६ ॥
हिन्दी – ( अब अवशिष्ट चमसगत प्रयोग को कह रहे हैं - ) प्रातः सवने प्रातः सवन में प्रातःसवनस्य एव प्रात: सवन के समान ही आवृता चरेयुः कार्य की आवृत्ति करना चाहिए ( अर्थात् जिस प्रकार प्रातःसवन में सोमरस निकालते हैं उसी प्रकार न्यग्रोध बरोह इत्यादि का भी सवन करना चाहिए ) । उसी प्रकार माध्यन्दिने माध्यन्दिस्य माध्यन्दिनसवन में माध्यन्दिन सोमसवन और तृतीयसवने तृतीयसवनस्य सायंसवन में सायंसवन के कार्य की आवृत्ति होती है । विमर्श— ( १ ) तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार प्रातःसवन में सोमरस का सवन होता है उसी प्रकार न्यग्रोध के बरोह इत्यादि से निष्पन्न क्षत्रिय भक्ष्य का भी सवन किया जाता है । ऐसे ही माध्यन्दिनसवन में माध्यन्दिनसवन के समान और सायंसवन में सायंसवन के समान ही क्षत्रिय के भक्ष्य न्यग्रोध के बरोह इत्यादि का भी सवन किया जाता है ।
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१४३८: ऐतरेयब्राह्मणम् [ ३५.८ सप्तमपञ्चिकायां सा ० भा ० — सोमविषयस्य प्रातः सवनस्यैव ' आवृता ' प्रकारेण फलचमसविषय-प्रातःसवने ‘ चरेयुः ' अनुतिष्ठेयुः । एवमितरत्रापि योज्यम् ॥ उक्तं फलचमसभक्षमुपसंहरति-तमेवमेतं भक्षं प्रोवाच रामो मार्गवेयो विश्वंतराय सौषद्मनाय ॥७ ॥
हिन्दी— ( पूर्वोक्त फलचमस की विधि का उपसंहार कर रहे हैं— ) एवम् इस प्रकार तम् एतं भक्षम् उस पूर्वोक्त इस ( क्षत्रिय के ) भक्ष्य को मार्गवेयः रामः मार्गवेय राम ने सौषद्मनाय विश्वन्तराय सुषदमन के पुत्र विश्वन्तर के लिए प्रोवाच कहा था ॥ अथ विश्वंतरस्य वाक्यं दर्शयति— तस्मिन् होवाच प्रोक्ते सहस्रमु ह ब्राह्मण तुभ्यं दद्मः, सश्यापर्णं उ मे यज्ञ इति ॥ ८ ॥
हिन्दी — तस्मिन् ह प्रोक्ते ( राम द्वारा ) उस ( क्षत्रियभक्ष्य ) के कह दिये जाने पर उवाच ( उस राजा विश्वन्तर ने राम से ) कहा – ब्राह्मण हे ब्राह्मण राम! तुभ्यं सहस्रं दद्मः तुमको सहस्र गायें मैं दूँगा । मे यज्ञः अब मेरा यज्ञ सश्यामपर्णः श्यामपर्णों से युक्त होगा ॥ सा ० भा ० - ' तस्मिन् ' राजभक्षे रामेण ' प्रोक्ते ' सति स राजा रामं प्रत्येवमुवाच । हे ' ब्राह्मण ' राम! तुभ्यं वयं ‘ सहस्रमु ह ' गवां सहस्रं सम्पूर्णं दद्मः । पुरा मे यज्ञो विश्यापर्ण आसीत् । इदानीं तु ‘ सश्यापर्णः ' एवास्तु, भवदीयाः श्यापर्णनामकाः सर्वे ब्राह्मणा अस्मिन् यज्ञे वसन्त्विति ॥ इदानीं सम्प्रदायकथनेन भक्षं प्रशंसति-( सम्प्रदायकथनेन भक्षप्रशंसनम् ) एतमु हैव प्रोवाच तुरः कावषेयो जनमेजयाय पारिक्षिताय; एतमु हैव प्रोचतुः पर्वतनारदौ सोमकाय साहदेव्याय; सहदेवाय सार्ङ्गयाय, बभ्रवे दैवावृधाय, भीमाय वैदर्भाय, नग्नजिते गान्धाराय, एतमु हैव प्रोवाचाग्निः सनश्रुतायारिंदमाय, क्रतुविदे जानकाय; एतमु हैव प्रोवाच वसिष्ठः सुदासे पैजवनाय; ते ह ते सर्व एव महज्जग्मुरेतं भक्षं भक्षयित्वा सर्वे हैव महाराजा आसुरादित्य इव ह स्म श्रियां प्रतिष्ठितास्तपन्ति, सर्वाभ्यो दिग्भ्यो बलिमावहन्तः ॥९ ॥
हिन्दी— ( सम्प्रदाय - कथन द्वारा भक्ष्य की प्रशंसा कर रहे हैं— ) ( प्रथम सम्प्रदाय में ) एतम् उ ह एव इसी ( पूर्वोक्त ) भक्ष्य को ही कावषेयः तुरः कवष ऋषि के पुत्र तुर ( नामक महर्षि ) ने पारिक्षिताय जनमेजयाय परिक्षित के पुत्र ( राजा ) जनमेजय के लिए प्रोवाच कहा । ( द्वितीय सम्प्रदाय में ) एतम् उ ह एव इसी ( क्षत्रिय के भक्ष्य ) को ही
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पञ्चमोऽध्यायः अष्टम: खण्ड: ] सायणाचार्यकृतभाष्योपेतम् ः १४३ ९ पर्वतनारदौ पर्वत और नारद ने साहदेव्याय सोमकाय सहदेव के पुत्र सोमक के लिए प्रोचतुः कहा । ( फिर सोमक ने ) सहदेवाय ( अन्य ) सहदेव के लिए, ( सहदेव ने ) सार्ज्जयाय साञ्जय के लिए, ( सार्ङ्गय ने ) बभ्रुवे बभ्रु के लिए, ( बभ्रु ने ) दैवावृधाय दैवा-वृध के लिए, ( दैवावृध ने ) भीमाय भीम के लिए, ( भीम ने ) वैदर्भाय वैदर्भ के लिए, ( वैदर्भ ने ) नग्नजिते नग्नजित् के लिए और ( नग्नजित् ने ) गान्धाराय गान्धार के लिए कहा । ( तृतीय सम्प्रदाय में ) एतम् उ ह एव इसी ( क्षत्रिय के भक्ष्य ) को ही अग्निः अग्नि नामक ऋषि ने सनश्रुताय सनश्रुत के लिए, ( सनश्रुत ने ) अरिंदमाय अरिन्दम के लिए, ( अरिन्दम ने ) क्रतुविदे क्रतुविद् के लिए और ( क्रतुविद् ने ) जानकाय जानक के लिए प्रोवाच कहा । ( चतुर्थ सम्प्रदाय में ) एतम् उ ह एव इसी ( पूर्वोक्त क्षत्रिय भक्ष्य ) को ही वसिष्ठः वसिष्ठ ने सुदासे सुदास के लिए और ( सुदास ने ) पैजवनाय पैजवन के लिए प्रोवाच कहा । ते ह ते सर्वे उन सभी ने एतं भक्षं भक्षयित्वा इस ( क्षत्रिय ) भक्ष्य का भक्षण करके महत् जग्मुः महत्व को प्राप्त किया । सर्वे एव हि वे सभी महाराजाः आसुः महाराजा हुए और श्रिया प्रतिष्ठिताः ( हाथी, घोड़े इत्यादि ) सम्पत्ति से प्रतिष्ठित होकर आदित्यः इव सूर्य के समान अन्धकार रूप शत्रुओं को समाप्त किये ) तथा सर्वाभ्यः दिग्भ्यः सभी दिशाओं ( के राजाओं ) से बलिम् आवहन्तः बलि ( कर ) लेते हुए स्वामी बने । सा ० भा०- -'एतं पूर्वोक्तमेव भक्षं कवषस्य पुत्रस्तुरनामको महर्षिः, परिक्षित्पुत्राय जनमेजयसंज्ञकाय प्रोवाच । अयमेकः सम्प्रदायः । तथैव ' एतमेव ' भक्षं पर्वतनारदाख्यावृषी सहदेवस्य पुत्राय सोमकाय प्रोचतुः । सोमकश्चान्यस्मै सहदेवाय प्रोवाच । सहदेवश्च सार्ङ्गवञ्ज प्रोवाच, साञ्जयश्च बभ्रवे प्रोवाच । बभ्रुश्च दैवावृधाय प्रोवाच । दैवावृधश्च भीमाय प्रोवाच । भीमश्च वैदर्भाय प्रोवाच । वैदर्भश्च नग्नजिते प्रोवाच । नग्नजिच्च गान्धाराय प्रोवाच 1 । अयं द्वितीयः सम्प्रदायः । तथा ‘ एतम् ' एव भक्षमग्निनामको महर्षिः सनश्रुताय प्रोवाच । सनश्रुतश्चारिंदमाय प्रोवाच । अरिंदमश्च क्रतुविदे प्रोवाच । क्रतुविच्च जानकाय प्रोवाच । अयं तृतीयः सम्प्र॒दाय: । तथा ‘ एतम् ' एव भक्षं वसिष्ठो महर्षिः सुदासे महर्षये प्रोवाच | सुष्ठु धनं दासतीति सुदाः । अथवा सुष्ठु शत्रून् दस्यत्युपक्षयतीति सुदाः । स च पैजवनाय प्रोवाच । यद्वा ' सहदेवाय सार्ज्जयायेत्यादिषु वाक्येषु सहदेवादिनाम्नां सार्ङ्गयादिपदानि ( १ ) सुदा एवं पैजवनोऽन्यत्र प्रसिद्धः । तथाहि — ऋ ० ७.१८.२२-२५ ऋक्षु ‘ सुदासः पैज-वनस्य ’ – इति । ‘ विश्वामित्र ऋषिः सुदासः पैजवनस्य पुरोहितः ’ - इत्यादिर्निरुक्तग्रन्थश्च ( २.७.२ ) । अतएव पूर्वोक्तस्य ' सहदेवश्च सार्ङ्गकाय ' - इत्यादि व्याख्यानस्यायुक्तत्व-मनुभूय सुयुक्तं व्याख्यानं वक्तुं प्रक्रमते यद्वेति । सहदेवस्य सृञ्जयापत्यत्वेन साञ्जयत्वम्, नग्नजितश्च गन्धारदेशवासित्वेन गान्धारत्वं शतपथे प्रसिद्धम् ( २.४.४.४; ८.१.४. १० ) । एवमन्येष्वपि तत्तद् विशेषणनिदानान्यन्वेष्टव्यानि ।
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१४४०: ऐतरेयब्राह्मणम् [ ३५.८ सप्तमपञ्चिकायां विशेषणताया योज्यानि । द्वितीयस्तच्छब्द एतच्छब्दार्थः । ' ते ह ' एते तुरादयः पैजवनान्ताः सर्व एव पुरुषाः ‘ एतं ' फलचमसभक्षं भक्षयित्वा ' महज्जग्मुः ' महत्त्वं प्राप्ताः । महत्त्वस्यैव सर्वे हेत्यादिकं विवरणम् । सर्वेऽप्येये ' महाराजाः ' सार्वभौमा आसुः । यथाऽऽदित्यो द्युलोके प्रतिष्ठितस्तपति, एवमेते ‘ श्रियां ' गजाश्वादिकायां सम्पदि प्रतिष्ठिताः सन्तः ' तपन्ति ' शत्रूणां तापं कुर्वन्ति । तथा ‘ सर्वाभ्यो दिग्भ्यः ' सर्वदिगवस्थितेभ्यो राजभ्यः सकाशाद् ' बलिमाव-हन्तः ' करमाददानाः स्वामिनो भवन्ति ॥ नराशंसभक्षं पुनरपि फलकथनेन प्रशंसति-आदित्य इव ह वै श्रियां प्रतिष्ठितस्तपति, सर्वाभ्यो दिग्भ्यो बलिमावहत्युग्रं हास्य राष्ट्रमव्यथ्यं भवति य एवमेतं भक्षं भक्षयति क्षत्त्रियो यजमानो यजमानः ॥१० ॥
हिन्दी – ( नाराशंस भक्ष्य के पुनः फलकथन द्वारा प्रशंसा कर रहे हैं — ) यः क्षत्रियो यजमानः जो यजन करने वाला क्षत्रिय एवमेतं भक्षम् भक्षयति इस प्रकार इस भक्ष्य का भक्षण करता है, वह श्रिया प्रतिष्ठितः ऐश्वर्य से प्रतिष्ठित होकर शत्रुओं में आदित्य इव तपति आदित्य के समान तपता रहता है, सर्वाभ्यो दिग्भ्यः सभी दिशाओं ( के राजाओं ) से बलिम् आवहति बलि ( कर ) लेता है और अस्य राष्ट्रम् उसका राष्ट्र उग्रम् अव्यथ्यं भवति ( शत्रुओं को अभिभूत करके ) उग्र और अपराजेय होता है ॥ ॥ इति श्रीमत्सायणाचार्यविरचिते माधवीये ' वेदार्थप्रकाशे ' ऐतरेयब्राह्मण-भाष्ये सप्तमपञ्चिकायां पञ्चमाध्याये ( पञ्चत्रिंशाध्याये ) अष्टमः खण्डः ॥८ ॥ ( ३४ ) ( २५७ )
॥ इस प्रकार ऐतरेयब्राह्मण के पैतीसवें अध्याय के अष्टम खण्ड की ' शशिप्रभा ' नामक हिन्दी व्याख्या समाप्त ॥
वेदार्थस्य प्रकाशेन तमोहार्दं निवारयन् ।
पुमर्थांश्चतुरो देयाद् विद्यातीर्थमहेश्वरः ॥
॥ इति श्रीमद्राजाधिराजपरमेश्वरवैदिकमार्गप्रवर्तकवीरबुक्कभूपालसाम्राज्यधुरंधर-माधवाचार्यादेशतो श्रीमत्सारणाचार्येण विरचिते माधवीये ' वेदार्थ-प्रकाशे ' नामभाष्ये ऐतरेय ब्राह्मणभास्ये सप्तमपञ्चिकायाः पञ्चमोऽध्यायः ( पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ) ॥३५ ॥
॥ इस प्रकार ऐतरेयब्राह्मण के पैतीसवें अध्याय की ' शशिप्रभा ' नामक हिन्दी व्याख्या समाप्त ॥
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पञ्चमोऽध्यायः अष्टमः खण्डः ] सायणाचार्यकृतभाष्योपेतम्: १४४१
अथातः पशोरेकः ( १ ) । तदाहुर्यं आहिताग्निरेकादश ( २ ) ।
हरिश्चन्द्रः षट् ( ३ ) । प्रजापतिर्यज्ञमष्टौ ( ४ ) । विश्वन्तरोऽ-ष्टौ ( ५ ) ॥७ ॥
हिन्दी — सप्तम पञ्चिका से ' अथातः पशो ' से प्रारम्भ एक खण्ड वाला प्रथमाध्याय, ‘ तदाहुर्य आहिताग्नि ' से प्रारम्भ ग्यारह खण्डों वाला द्वितीयाध्याय, ‘ हरिश्चन्द्रः ’ से प्रारम्भ छः खण्डों वाला तृतीयाध्याय, ' प्रजापतिर्यज्ञम् ' से प्रारम्भ आठ खण्डों वाला चतुर्थ अध्याय और ' विश्वन्तरः ' से प्रारम्भ आठ खण्डों वाला पञ्चमाध्याय है । अथातः पशोः, तदाहुर्यद्दर्शपूर्णमासयोर्, अथात इष्टापूर्त्तस्य, तेषां यश्चमसानां चत्वारि ॥७ ॥
हिन्दी — सप्तम पञ्चिका में ' अथातः पशो ' से प्रारम्भ खण्डों का प्रथम दशक, ‘ तदाहुर्यद्दर्शपूर्णमासयो ’ से प्रारम्भ द्वितीय दशक, ' अथातः इष्टापूर्त्तस्य ' से प्रारम्भ तृतीय दशक और ‘ तेषां यश्चमसानां ' से प्रारम्भ खण्ड चतुष्टय है । इस प्रकार इस पश्चिका में कुल चौतीस खण्ड हैं | ॥ इत्यैतरेयब्राह्मणे सप्तमपञ्चिका ॥७ ॥
॥ इस प्रकार ऐतरेयब्राह्मण के सप्तम पञ्चिका की ' शशिप्रभा ' नामक हिन्दी व्याख्या समाप्त ॥ ऐ.ब्रा.उ.- ३७
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byn 1 ( 1 ) zefire अथ अष्टमपञ्चिकायां प्रथमोऽध्यायः [ अथ षट्त्रिंशोऽध्यायः ] प्रथमः खण्डः
सायणभाष्यम्— फलाख्यचमसो भक्षो राज्ञो यज्ञे प्रकीर्तितः ।
उच्यते राजयज्ञेऽस्मिन् विशेषः स्तोत्रशस्त्रयोः ॥१ ॥
तदेतत्प्रतिजानीते— ( राजयज्ञे स्तोत्रशस्तयोः विशेषकथनम् ) अथातः स्तुतशस्त्रयोरेव ॥ १ ॥
[ सोमयाग के स्तोत्र और शस्त्र ] हिन्दी - ( राजा के यज्ञ के स्तोत्र और शस्त्र के कथन के लिए प्रस्तावना कर रहे हैं— ) अथ इस ( राजा के भक्ष्य - विशेष के कथन ) के बाद अतः यहाँ से स्तुतशस्त्रयोः स्तोत्र और शस्त्र का ( निरूपण किया जा रहा है — ) । सा ० भा०- ' -'अथ ' राज्ञो यज्ञे भक्षविशेषकथनानन्तरं यतः स्तुतशस्त्रयोर्विशेषो जिज्ञासितः, ‘ अतः ’ कारणात्तयोरेव, विशेष उच्यत इति शेषः ॥ तं विशेषं वक्तुमादौ विशेषरहितमंशं दर्शयति— ऐकाहिकं प्रातःसवनमैकाहिकं तृतीयसवनमेते वै शान्ते क्लृप्ते प्रतिष्ठिते संवने यदैकाहिके, शान्त्यै क्लृप्त्यै प्रतिष्ठित्या अप्रच्युत्यै ॥ २ ॥
हिन्दी— ( विशेष को कहने के लिए पहले विशेषता से रहित अंश को दिखला रहे हैं— ) एकाहे सवने विकृतिभूत एकाहसवन में एकाहिकं प्रातःसवनम् ( प्रकृतिभूत ) एकाह से सम्बन्धित प्रात: सवन और एकाहिकं तृतीयसवनम् एकाह से सम्बन्धित सायंसवन - एते ये दोनों ( विकृतिभूत राजा के सवन में ) शान्ते शान्त, क्लृप्ते क्रमबद्ध और प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठित होते हैं । अतः ( प्रकृति के समान ) ये दोनों शान्त्यै शान्ति के लिए, क्लृप्तैः क्रमबद्धता के लिए, प्रतिष्ठित्यै प्रतिष्ठा के लिए और अप्रच्युत्यै विनाश-रहितता के लिए होते हैं ॥ सा ० भा ० — एकाहे प्रकृतिभूते यत्प्रातःसवनं यच्च तृतीयसवनमुक्तं तदुभयं राज्ञो विकृतावपि तथैव प्रयोक्तव्यम् । न तु तयोः कश्चिद्विशेषाऽस्ति । ऐकाहिके ये उभे प्रातःसवनतृतीयसवने स्तः, ते ' एते ' एव ' शान्ते ' सुखकरे ' क्लृप्ते ’ स्वभ्यस्ते ‘ प्रति-
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प्रथमोऽध्यायः प्रथमः खण्डः ] सायणाचार्यकृतभाष्योपेतम्: १४४३ ष्ठिते ' सम्पन्ने । अतस्तयोः प्रकृतिवदनुष्ठानं ' शान्त्यै ' सुखार्थं, ' क्लृप्त्यै ' स्वभ्यासार्थं ‘ प्रतिष्ठित्यै ’ च सम्पत्त्यर्थम् ' अप्रच्युत्यै ' विनाशराहित्यार्थं भवति ॥ यथा प्रातःसवनतृतीयसवनयो: प्राकृताद्विशेषो नास्ति, तथा माध्यंदिनसवनेऽपि मरुत्वतीयमैकाहिकं होत्रकशस्त्राणि चैकाहिकानि, स्तोत्रे तु विशेषोऽस्ति, तमिमं दर्शयति— उक्तो माध्यंदिनः पवमानो य उभयसाम्नो बृहत्पृष्ठस्योभे हि सामनी क्रियते ॥३ ॥
हिन्दी — माध्यन्दिनः पवमानः उक्तः जो माध्यन्दिन पवमान कह दिया गया है, उन्हीं उभयसाम्नः बृहत्पृष्ठस्य उभे माध्यन्दिन पवमान स्तोत्र में रथन्तर साम और पृष्ठ स्तोत्र में बृहत्साम दोनों सामनी क्रियते साम ( राजसूय में ) प्रयोग में लाये जाते हैं ॥ सा ० भा ० — बृहद्रथंतरं चेत्युभयविध साम यस्मिन्नभिजिदादौ सोऽयमुभयसामा, बृहत्साम पृष्ठं स्तोत्रं यस्मिन्नभिजिदादौ सोऽयं ' बृहत्पृष्ठः ' तादृशस्य ' उभयसाम्नो ' बृह-त्पृष्ठस्य ' अभिजिदादेर्यो माध्यंदिनः पवमान उक्तः, स एवात्र राजयज्ञे माध्यंदिनः पव-मानो द्रष्टव्यः । न चोभयसामत्वं बृहत्पृष्ठत्वं चोभयं व्याहतमिति शङ्कनीयम् ॥ माध्यंदिन-पवमानस्तोत्रे रथंतर साम, पृष्ठस्तोत्रे बृहत्सामेत्येवमुभयसामत्वस्य व्यवस्थितत्वात् । ‘ उभे हि ’ - इत्यनेनेयमेव व्यवस्था स्पष्टीक्रियते । यद्यपि मरुत्वतीयशस्त्रावयवाः प्रतिपदादयः प्राकृता एव, तथाऽपि तदनुवादेनात्र प्रशंसा क्रियते ॥ तत्र प्रतिपदनुचरौ दर्शयति— ( राजयज्ञे मरुत्वतीयशस्त्रम् ) आ त्वा रथं यथोतय, इदं वसो सुतमन्ध इति राथंतरी प्रतिपद् रथंतरोऽनुचरः, पवमानोक्थं वा एतद् यन् मरुत्वतीयं; पवमाने वा अत्र रथंतरं कुर्वन्ति; बृहत्पृष्ठं, सवीवधतायै; तदिदं रथंतरं स्तुत-माभ्यां प्रतिपदनुचराभ्यामनुशंसति ॥४ ॥
हिन्दी — ‘ आ त्वा रथं यथोतयः ' इत्यादि तृच रथन्तरी प्रतिपद् ( जिसमें उद्-गाताओं द्वारा रथन्तर साम का गान किया जाता है ऐसी तृच मरुत्वतीयशस्त्र की ) रथन्तरी प्रतिपद् है तथा ‘ इदं वसो सुतमन्ध ' इत्यादि तृच रथन्तरोऽनुचरः ( छन्द, देवता इत्यादि के समान होने के कारण और पूर्व के तृच के ही अनुसार रथन्तर साम पर आधारित होने के कारण ) रथन्तर अनुचर है । यद् मरुत्वतीयम् जो मरुत्वतीयशस्त्र है पवमानो-क्थं वै एतत् वह पवमान स्तोत्र ही है । अत्र पवमाने वै इस ( मध्यन्दिन ) पवमान स्तोत्र में ही रथन्तरं कुर्वन्ति ( सामगान करने वाले ) रथन्तर ( नामक साम ) को करते हैं । बृहत्
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१४४४: ऐतरेयब्राह्मणम् [ ३६.१ अष्टमपञ्चिकायां पृष्ठम् और पृष्ठ ( नामक स्तोत्र ) को बृहत् ( नामक साम ) से युक्त करते हैं । ( जो दोनों सामों से सम्पन्न करते हैं ), सः वीवधतायै वह मानो वीवध ( बहँगी ) के समान ( सन्तुलन बनाये रखने के लिए करते हैं । तदिदं रथन्तरं स्तुतम् जब यह रथन्तर ( नामक साम माध्यन्दिन पवमान में ) स्तुत होता है तब ताभ्यां प्रतिपदनुचराभ्याम् उन ( ' आ त्वा रथं ' और ' इदं वसो सुतमन्ध ' ) दो प्रतिपद् और अनुचर ( तृचों से ) अनुशंसति अनुशंसन करता है ॥ सा ० भा ० — ‘ आ त्वा रथम् ' इति यद् तृचः सोऽयं मरुत्वतीयशस्त्रस्य प्रतिपत्, तस्मिंस्तृचे रथंतरं सामोद्गातृभिर्गीयते । तस्मादियं प्रतिपत्, ' राथंतरी ’ । ‘ इदं वसो सुत-मन्ध ' इत्ययं ' तृचोऽनुचरः, छन्दोदेवतादिना पूर्वेण समानत्वात् । रथंतरसामाधारस्य पूर्वस्य तृचस्यानुसारित्वादस्यापि राथंतरत्वम् । यत् मरुत्वतीयं शस्त्रवतीयं शस्त्रमस्ति, ‘ एतत् पवमानोक्थं वै ’ पवमानस्तोत्रानुसारेण शस्यमानत्वात् । ‘ उक्थं ' शस्त्रम् । तच्च द्वि-विधम् — पवमानोक्थं ग्रहोक्थं च । अतोऽत्र पवमानोक्थमिति विशेष्यते । अस्मिंश्च माध्यंदिनपवमानस्तोत्रे सामगा रथंतरं साम कुर्वन्ति । पृष्ठस्तोत्रं तु बृहत्सामोपेतं कुर्वन्ति, तदेतदुभयं ‘ सवीवधतायै ’ सम्पद्यते । उभयतः शिष्यद्वयेन जलकुम्भद्वयं वोढुं यः काष्ठ-विशेषः पुरुषाणामंसे स्थीयते, स वीवध इत्युच्यते । सामद्वयोपेतस्य माध्यंदिनसवन-प्रयोगस्य वीवधसदृशत्वाद् वीवधेन सह वर्तत इति सवीवधत्वम् । यदिदं रथंतरं साम माध्यंदिने पवमाने स्तुतं, तदिदम् ' आभ्याम् ' आ त्वा रथमिदं वसो सुतमित्येताभ्यां प्रतिपदनुचराभ्यामनुशंसेत् ॥ ब्रह्मान्नपृथिवीरूपत्वेन रथंतरं प्रशंसति— अथो ब्रह्म वै रथंतरं, बृहद्, क्षत्रं ब्रह्म खलु वै क्षत्त्रात् पूर्वं, बह्म पुरस्तान्म उग्रं राष्ट्रमव्यथ्यमसदित्यथान्नं वै रथंतरमन्नमेवास्मै तत्पुरस्तात्कल्पयत्यथेयं वै पृथिवी रथंतरमियं खलु वै प्रतिष्ठा, प्रतिष्ठामेवास्मै तत्पुरस्तात् कल्पयति ॥ ५ ॥
हिन्दी – ( रथन्तर की प्रशंसा कर रहे हैं - ) रथन्तरं वै ब्रह्म रथन्तर ( नामक साम ) ब्राह्मणजाति वाला है और बृहत् क्षत्रम् बृहत् ( नामक साम ) क्षत्रियजाति वाला है । ब्रह्म खलु वै क्षत्रात् पूर्वम् ब्राह्मणजाति क्षत्रियजाति से पूर्ववर्ती है । अतः पुर-( १ ) ऋ ० ८.६८.१ ( २ ) ऋ ० ८.२.१ ( ३ ) ' विवधेन हरति विवधिकः । पक्षे ठक्, वैवधिकः । एकदेशविकृतस्यानन्यत्वाद् वीव-धादपि ष्ठन्, वीवधिकः, वीवधिकी । विवधवीवधशब्दौ उभयतो बद्धशिक्ये स्कन्ध-बाह्ये काष्ठे वर्तेते ’ — इति ( सि ० कौ ० ) दीक्षितः, पा ० सू ० ४.४.१७ सूत्रे । द्र ० ता ० ब्रा ० ४.५.१ ९; १४.१.१० । आश्व ० गृ ० सू ० १.१२.३ । ' विवध ' इति ह्रस्वादिपाठः तैत्तिरीयाणाम्, ७.३.५.४; ७.६ । ' विवध ' इति प्रवर्ग्यमध्यपाठोऽपि क्वाचित्कः ।