ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 101–110

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 101–110

पृष्ठ 101

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* ब्रह्मविज्ञान कर बाहरी भीतरी वस्तु का जो देश, काल से भेद सम्बन्ध प्रतीत होता है वह निर्मूल हो जाता । अतः हमारे इस ज्ञान में अर्थात् ज्ञान का स्वरूप उत्पन्न कराने में अन्तर और बाह्य उभय जगत की पूरी - पूरी आवश्यकता निःसंदेह प्रतीत होती है । ज्ञानोत्पत्ति के विषय में २ मत हैं — १ वस्तुयों का अंश ज्ञान में सम्मिलित होता है ( यह मत पहले कहा जा चुका है ) २ ग्रंशों के मिलने से वस्तु मात्रा कम हो जानी चाहिए थी किन्तु ऐसा नहीं होता । ज्ञानोत्पत्ति का वास्तविक कारण बाह्य वस्तुनों के प्रतिफल का इन्द्रियों पर प्राघात होना ही है । वस्तुनों की समीपता, दूरी, सुक्ष्मता, विशालता आदि का भिन्न २ रूप से प्राघात पड़ने से ज्ञान होता है । प्रत्येक वस्तु के विशेष प्राघात से उसका विशेष प्रकार का ज्ञान होता है । आघात में कमी होने से परिणाम ठीक नहीं होता । बाह्य वस्तु के प्रभाव पर ग्राघात का होना संभव नहीं ग्रतः इस श्राघति से बाह्य जगत् पूर्णरीति से सिद्ध होता है । प्रत्येक ज्ञान का विषय ३ प्रकार का है: -- १ मालिक अर्थात् जगह रोकने वाला भौतिक है, २ माण्डलिक मौलिक की प्रतिकृति जो ऋ - मण्डल रूप में है यह माण्डलिक है परन्तु यह भौतिक अवश्य है पर जगह नहीं रोकता केवल प्राणमय है । यह रूप मौलिक से लेकर आँख तक रहता ३ प्रात्य-यिक या मानसिक यह विषय आंख से लेकर मस्तक तक रहता है | इन में मौलिक तो एक ही है किन्तु शेष दोनों रूप ग्रनन्त रहते हैं । इनमें केवल मनोमय का सम्बन्ध अन्तर्जगत् से है और भूतमय और प्रारणमय का बहिर्जगत् से है । बाह्य वस्तु मेरे चाहने पर उपस्थित नहीं होती । जिस बाह्य वस्तु को जिस स्थान पर मैं देखता हूं उसी स्थान पर दूसरे भी उसको वैसी ही देखते हैं अतः बाह्य वस्तुसत्ता स्वतन्त्र है । वह मेरे ज्ञान के ग्राधीन नहीं बल्कि मेरा ज्ञान उसके ग्राधीन है । बाह्य वस्तु श्रात्मप्रकाश के सामने आती है तब यह श्रात्मप्रकाश ज्ञान कहलाता है और जब कोई बाह्य वस्तु सामने ही नहीं आती तो यह ग्रात्मप्रकाश प्रकाश होते हुए भी किसी वस्तु का रूप न धारण करने से प्रज्ञान कहलाता है ज्ञान के स्वरूप के लिए बाह्य जगत् की ग्रावश्यकता है किन्तु ज्ञान का प्राधार होने पर भी ज्ञान में स्वयं नहीं घुसता | बहि-र्जगत् के केवल रूपमात्र में ग्रात्मा का परिणाम ही ज्ञान कहलाता है । यह रूप ग्रात्मा में चिरकाल तक रहता है । ग्रात्मा में बाह्यजगत् के रूप के परिणाम का ज्ञान ही ग्रन्तर्जगत् कहलाता है । वाह्यजगत् वस्तुतः साक्षात् है किन्तु ग्रन्तर्जगत् आत्मधरातल पर बाह्यजगत् का केवल चित्रमात्र है । बाह्यजगत् भूतमात्र और अन्तर्जगत् ज्ञानमय है । जगत् जैसा है वैसा ज्ञान के बाहर भूतरूप और वही चित्ररूप से ज्ञान के अन्दर है । ग्रन्तर्जगत् का मनोमय व्यापार वह बाह्यजगत् के न रहने पर भी उसके चित्ररूपों के साथ क्रीड़ा किया करता है । इस तरह भूतमय बाह्यजगत और ज्ञानमय अन्तर्जगत् सिद्ध हुए । अन्तर्जगत् के विषय में निम्न विषय स्मरणीय हैं: -आत्मा का एक ही मूल स्तम्भ पाँच भिन्न २ शाखाओं में विभक्त है हैं । आत्मा के ये पाँचों धरातल हैं किन्तु प्रत्येक का विशेष कार्य पृथक् २ शब्द का कान इत्यादि हैं । बाह्यजगत् का पदार्थ जितना सूर्य किरणों से [ ६ ९ ] । इनको ही इन्द्रियाँ कहते नियत है । रूप का आँाँख, ज्ञान धरातल पर आता है

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* ब्रह्मविज्ञान उतने ही का ज्ञान होता है विशेष का नहीं | ज्ञान धरातल पर उसके आधार से जो चिह्न होता है उसको संस्कार कहते हैं इसके द्वारा पीछे स्मरण हुआ करता है । श्राघात की न्यूनाधिकता पर ज्ञानो-त्पन्न होने की न्यूनाधिकता निर्भर है । ग्राघात के तारतम्य से ज्ञानोत्पन्न होने में तारतम्य हो जाता है । कोई कहे कि कमलपत्रवत् ज्ञान पर जगत् का कोई प्रभाव नहीं होता तो यहाँ पर यही कहना है वायु और जल के मर जाने से फेन होता है वैसा ज्ञान के विषय में नहीं है । बाह्य वस्तु ज्ञान में न मिल कर केवल उसका श्राघात मात्र है ग्रतः बाह्यवस्तु से यह निर्लेप है । ज्ञानोत्पत्ति के विषय में एक बात और है कि ज्ञान के सकल प्रदेश में ज्ञान एक ही समय में नहीं होता । कुछ अंश ज्ञान का एक समय में ज्ञान कराता है वही ज्ञान कहलाता है शेप ग्रज्ञान है अतः गीता में कहा है: अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्वः । क्योंकि मेरी ग्रात्मा इन्द्ररूप है यह अपने इन्द्रियवर्गों द्वारा अर्थवर्गो का स्पर्श करती है किन्तु ये इन्द्रियां अपना पृथक् २ कार्य करती हैं । एक इन्द्रिय से ज्ञान होते समय दूसरा ज्ञान उस समय नहीं होता इसी से ग्रात्मा अल्पज्ञ कहलाती है । किन्तु विद्या और तपस्या के अभ्यास से ज्ञान की वृद्धि हो सकती है । विद्या श्रीर तपस्या से ग्रन्तर्दर्शी या ग्रात्मदर्शी होकर सर्वज्ञ ईश्वरतुल्य हो सकता है । इसी ग्राशय को लेकर गीता में कहा हैः-वहूनां जन्मनामन्ते, ज्ञानवान् मां प्रपद्यते । अथवा अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परांगतिम् । ग्रन्तर्मुख वृत्ति से अपनी ग्रात्मा को ग्रन्तदृष्टि से देखने से सम्पूर्ण जगत् को देखने की योग्यता हो जाती है । आत्मा में जगत् की सब शक्तियाँ विद्यमान् होने से ग्रात्मदर्शी सर्वशक्ति सम्पन्न हो जाता है और सकल जगत् को जान लेता है । सर्वज्ञ ईश्वर का यही लक्षण है । बाह्य और अन्तर जगत् का भेद दूर हो जाता है क्योंकि इन्द्रियों से तो अल्पज्ञान ही होता है किन्तु ग्रात्मज्ञान से सर्व-जगत् का ज्ञान हो जाता क्योंकि सर्व जगत् ग्रात्मा में विद्यमान रहता है । जीवात्मा में अन्तर और बहिर्जगत् का भेद रहता है और ग्रात्मदर्शी होने पर यह भेद दूर हो जाता है और जीवात्मा परमात्मा की कक्षा में हो जाता है ।

पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयंभूस्तस्मात्पराङ् पश्यति नान्तरात्मन् ।

कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १ ॥

ईश्वर सिद्धिसूत्र ( कठोपनिषद् २1१ ) जो कुछ मेरे ज्ञान का प्रकाश है उसका मूलकेन्द्र मान कर ' ग्रहम् ' अर्थात् जीवात्मा की सिद्धि हुई | उसी जीवात्मा के विकास को ज्ञान कहते हैं और उसी ज्ञान के धरातल पर स्थित जो कुछ हमें [ ७० · ]

पृष्ठ 103

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* ब्रह्मविज्ञान ऋ भासता है उसी को जगत् कहते हैं । किन्तु इस जगत् के निर्माण करने में हमारी ग्रात्मा अथवा हमारे ज्ञान को हम स्वतन्त्र नहीं पाते हैं अतः एक दूसरा जगत् और मानना पड़ता है । इन दोनों में एक को अन्तर्जगर और दूसरे को बाह्यजगत् या बहिर्जगत् कहना होगा । जो जगत् मेरे ज्ञान के धरातल पर बैठा रहता है उस ही को श्रन्तर्जगत् कहते । किन्तु जो जगत् ज्ञान पर चढ़ा हुआ नहीं है जीव के ज्ञान के धरातल से बाहर है उसको बहिर्जगत् कहते हैं । किन्तु यहां प्रश्न यह उठता है कि जिस प्रकार ग्रन्तर्जगत् हमारे ज्ञान के धरातल पर है उसी प्रकार इस ज्ञान के बाहर वाला वह बहिर्जगत् किस धरातल पर है । क्योंकि यह निश्चित हो चुका है कि हमारा ग्रन्तर्जगत् हमारे ज्ञान में से ही बनकर ज्ञान ही रहता है और ज्ञान ही में लीन हो जाता है । तो इसी प्रकार वह बहिर्जगत भी एक जगत् है वह भी किसी ज्ञान से उत्पन्न होकर उस ही ज्ञान में रहता होगा और उसी में उसका लय होगा ऐसा ज्ञान किसी जीवात्मा का नहीं हो सकता क्योंकि एक जीबात्मा के ज्ञान से उत्पन्न हुए जगत् को दूसरे जीवात्मा का ज्ञान कदापि सहयोग नहीं करता ग्रतः उसके संयोग से अपने में जगत् नहीं बना सकता किन्तु वहिजगत् के साथ संपूर्ण जीवात्माओं का ज्ञान संयोग करके उसी सांचे में ढ़ाल कर अपने में जगत् बनाते हुए दिखाई पड़ते हैं अतः अवश्य ही यह बहिर्जगत् किसी ऐसे ज्ञान के ग्राधार पर विचार किया जा सकता है जो ज्ञान किसी जीवात्मा का नहीं है । यहाँ यदि कोई प्रश्न करे कि इस वर्जिगत् के लिए किसी ज्ञान के धरातल होने की प्रावश्य-कता ही क्यों मानी जाती है, क्यों नहीं वह स्वतन्त्र रूप मान लिया जाता? इसके उत्तर में हम कहेंगे कि हमारा ज्ञान अथवा अनन्त जीवों का ज्ञान ही यह सब कुछ है उन ज्ञानों के अतिरिक्त कौनसा स्थान ग्वाली रह् गया है कि जिसमें बहिर्जगत् का रहना माना जावे क्योंकि कोई भी जगत् यदि ज्ञान बाहर से नहीं दीखता तो बहिर्जगत् को बिना ज्ञान के आश्रय पाये स्वतन्त्र रूप से कहीं मान लेना असमंजस || -( गड़बड़ ) होगा । क्योंकि इस संपूर्ण जगत् को हम गम्भीर दृष्टि से देखते हैं तो ज्ञान और ज्ञान के बने हुए जगत् दोनों के अतिरिक्त कहीं भी कुछ नहीं भासता । जबकि यह यही दोनों संपूर्ण विश्व मण्डल हैं तो कहना होगा कि संम्पूर्ण जगत् ज्ञानमण्डल में है और ज्ञानमण्डल ही विश्वमण्डल है । ऐसी स्थिति में इस ज्ञान के जगत् तथा ज्ञान मण्डल के अतिरिक्त उस बहिर्जगत् के लिये कोई स्थान ही खाली नहीं रह् जाता कि जिस पर वहिर्जगत् की सत्ता मानी जावै । स्वतन्त्र रूप से जगत् की सत्ता हमारे ज्ञान वाले जगत् की यदि नहीं है तो उसी दृष्टान्त से उस बहिर्जगत् की भी स्वतंत्र सत्ता नहीं मान सकते हैं ऐसी स्थिति में एक ऐसा विशाल ज्ञानमण्डल मानना उचित होगा कि जिस ज्ञानमण्डल के धरातल में यह संपूर्ण बहि-र्जगत् प्रतिष्ठित हैं श्रौर उसी ज्ञान से उत्पन्न होकर उसी ज्ञान में लीन भी हुआ करता है । तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार हमारे अन्तर्जगत् का हमारे ज्ञान से सम्बन्ध है उसी प्रकार उन राब बहिर्जंगतों का उस 11-एक विशाल मण्डल से सम्बन्ध है इस प्रकार जबकि एक गहाव्यापक ज्ञानमण्डल सिद्ध हुग्रा उसका तो भी कोई केन्द्र होगा उसी को हम ईश्वर करते हैं । अथवा जिस प्रकार हमारा ज्ञान हमारी आत्मा का 1 विशाल है अतः सम्पूर्ण ज्ञानमण्डल ही हम हैं इसी प्रकार वह विशाल ज्ञानमण्डल भी उस ईश्वर का ही L विकास होगा अतः व सम्पूर्ण एक विशाल ज्ञानमण्डल ही परमेश्वर है । [ ७१ ]

पृष्ठ 104

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* ब्रह्मविज्ञान ॐ अपन जबकि सम्पूर्ण जीवों के भिन्न ज्ञानमण्डल उसी विशाल ज्ञानमण्डल के पदार्थों का संयोग करके ज्ञानमण्डल जगत् वनाया करते हैं तो इससे सिद्ध हुआ कि सभी जीवों के सब ही ज्ञानमण्डल उग ही विशाल के भीतर व्यष्टि रूप से विद्यमान हैं तो इससे यह भी सिद्ध हुआ कि जिस प्रकार ईश्वर में सम्पूर्ण वहि-र्जगत् है उसी प्रकार सब जीवों के ज्ञानमण्डल भी हैं, उससे बाहर और कहीं कुछ भी नहीं हैं । श्रीर न वहाँ भीतर - बाहर का कुछ भेद है क्योंकि जीवों का ज्ञानमण्डल परिमित होने के कारण सीमाबद्ध है ग्रतः उसकेा वाहर कहाँ जा सकता है किन्तु इस विशाल ज्ञान मण्डल की कोई भी सीमा निश्चित रूप से प्रमाणित नहीं होती ग्रतः वह असीम है इसलिए उससे बाहर कुछ भी कहा नहीं जा सकता तो गिद्ध हुया कि यह सब कुछ एक ही ईश्वर का रूप है । उदाहरणः जब हम इस जगत् की ओर दृष्टि डालते हैं तो हमें चारों ओर तारामण्डल से भरा हुआ एक ग्राकाशमण्डल दीनता है वस वहीं तक हमारी दृष्टि पहुँचती है उतने ही मण्डल को हम जगत् कह कर देख रहे हैं । किन्तु हमारी ग्रन्तरात्मा इस विषय की साक्षी दे रही है कि इतना ही नहीं ग्रपितु जितने तारों से घिरा हुत्रा जगत् मण्डल हमारे ज्ञान भासता उससे भी आगे, ऊपर - नीचे चारों मोर ग्रनन्त प्रदेश या अनन्त लोक चौर भी होवेंगे । यह कदापि सम्भव नहीं जितना हम देख रहे हैं या जहाँ तक हमारे ज्ञान की पहुँच है उतना ही बड़ा यह जगत् है । इस प्रकार अपने ज्ञान के बाहर जो जगत् का विस्तार बाँधा जाता है अथवा अनन्त सीमा तक माना जाता है यह ज्ञान हमारे जीव के ज्ञान के अन्दर विस्तृत ईश्वरीय ज्ञान का अ ंश है । ईश्वरी ज्ञान होने के कारण यद्यपि उस बाह्य जगत् के रूप को हमारी ग्रात्मा व ज्ञान स्पष्ट नहीं पकड़ता तथापि वह ईश्वरी ज्ञान हमारे ज्ञान ग्रन्दर है इसी कारण उस ब्राह्य जगत्की झलक पूर्ण विश्वास को बारे हुये सत्यरूपेण हमारे ज्ञान में है । आकाश में कितने ही तारे अथवा ग्रह चलते हुए और कितने ही सैकड़ों वर्षों से एक स्थान में दृष्टि-गोचर हैं । प्रत्येक मनुष्य अपनी माता के गर्भ में जब उत्पन्न होता है तब सब के ग्रांख, कान, नाँक, मुख, हाथ पाँव आदि प्रत्येक ग्रंग यथा स्थान अपने ग्राप उत्पन्न होते हैं उनमें । तेज की लौ कुछ भी ग्रन्तर नहीं पड़ता ऊपर को और पानी सर्वदा नीचे को अपनी दिशा के लिये एक प्रकार का सत्य इन सब में स्थित प्रतीत होता है वही बनाते सब का हैं नियन्ता इन सब है में और इन नियमानुसार सब क्रियाओं वही प्रत्येक वस्तु को अपने अपने कार्य पर नियुक्त कार्य J } | करता हुग्रा सर्वत्र व्यापक प्रतीत होता है वही करता सत्य ईश्वर है । यही का रूप सत्य है जो । तात्पर्य प्रत्येक यह वस्तु है में कि भिन्न पू रूप से में जहाँ जो कार्य होता है वह सब एक नियति के अनुसार ही होता हुआ दीखता है । यह नियति प्रकृत्रिम नियम है इस नियति को ही सत्य कहते हैं और वहीपरमेश्वर का रूप है । जीव जिस समय जाग्रत अवस्था में ये रहता है उस समय उसकी चेष्टायें इच्छानुसार ' बहुत कुछ चेष्टा करता है किन्तु होती हैं अर्थात् प्रथम मन में जैसा विचार में यत्न जाता है वैसे ही प्राण होता है और तदनुसार शरीर में क्रिया होतीहै । इससे जाना गया कि उसकीसब ज्ञानाधीन हैं और उसीके अनुमार क्रियायें उसके हैं किन्तु जब मनुष्य सुप्तावस्था शरीर में रहता है उस समय उसके [ ७२ ]

पृष्ठ 105

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श्राविज्ञान जो २ ष्ट होती है इसका क्या मूल कारण है क्योंकि वे उसकी इच्छानुसार नहीं हैं | जाग्रत् अवस्था में भी कितनी ही क्रियायें ऐसी हैं जो जीव की इच्छा के ग्राधीन नहीं हैं जैसे हृदय का स्फुरण होना, खून का बहना, नाड़ियों का पकड़ना, भोजन का रस बनना और फिर मल विभाग होना इत्यादि २ । इन सब का सम्बन्ध जीव के ज्ञान से नहीं है और जितना जीव में ज्ञान होता है वह भी एक प्रकार के शरीर में स्वायु - यन्त्र द्वारा होता रहता है जिसको गनुष्य ज्ञान होने पर अनुभव करता है । किन्तु वह ज्ञान कैसे होता है इन सब विषयों के जानने में जीव श्रसमर्थ है । जबकि जीव के शरीर में ही अनन्त क्रियायें ऐसी हैं जिनके जानने में न जीव की इच्छा है और न जीव उसका प्रयास ही करता है, न जीव को उसका ज्ञान ही है किन्तु उन क्रियाओं के द्वारा ही उसकी जीवन सत्ता है और सम्पूर्ण ज्ञान या चेष्टा है और उनकी चेष्टाओं के ग्राधीन जीव का जन्म और मृत्यु है, तो ऐसी स्थिति में यह प्रश्न होता है कि जिस क्रिया के प्राचीन जीव की सत्ता है और जीव की इच्छा या यत्न के बिना ही जीव के शरीर में हुआ करती है वह क्रिया किसकी इच्छा से उत्पन्न होती रहती है क्योंकि जीव के ज्ञान के अन्दर होने वाली क्रियात्रों को जीव की इच्छा के प्राधीन होते हुए देखते हैं अतः यह अनुमान बांधा जाता है कि वह दूसरी क्रिया जो जीव की इच्छा के आधीन नहीं है वह भी किसी की इच्छा के ग्राधीन अवश्य होगी । बस वह इच्छा जिसकी हो सकती है वही ईश्वर है और वह ईश्वर का अंश जो हमारे शरीर के यन्त्र को चला रहा है वह हमारे ही शरीर के अन्दर रहता है और वही हमारा कर्त्ता, हर्त्ता विधाता है औौर वही हमारा प्राराध्य देव है उन्हीं की हम सेवा या प्रार्थना करते हैं, उसी के ग्राधीन हम हैं | इसी अभिप्राय को लेकर गीता का वचन है: -ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ ( ० १८ श्लोक ६१ ) अर्थात् हे ग्रर्जुन सब प्राणियों के हृदय प्रदेश में ईश्वर निवास करता है । ग्रपनी माया से वह सब प्राणियों को माया से जगत् रूपी यन्त्र पर चढ़ा कर घुमाता है । सभी प्राणियों के जन्म काल से लेकर अन्त तक प्राय: कितनी ही वातों में ऐसा ज्ञान देखने में जाता है जो शिक्षा से सम्बन्ध नहीं रखता जैसे जानवरों के नये बच्चों को प्यास लगने पर पानी की ओर को झुकना और उस पानी से अपनी तृषा निवृति का ज्ञान होना, कौश्रा और घूघु तथा भैंस और घोड़ा इन जीवों में परस्पर विना किसी व्यवहार के भी वैर भाव का ज्ञान होना अथवा किसी ढेले या अस्त्र - शस्त्र के याते ही उससे हटने का यत्न करना इत्यादि २ । इस प्रकार के सभी जान जीव के अपने विचार से उत्पन्न नहीं होते किन्तु इस शरीर के अन्दर जो ईश्वरीय कला है उसी से ये सम्बन्ध रखते हैं अतः ये स्वभावसिद्ध धर्म कहे जाते हैं प्राचीन काल में मनुष्य गङ्गा तथा हिमालय को देखते थे उसी स्थान पर बाज हम भी इनको देखते हैं | पहले कह चुके हैं कि प्रत्येक मनुष्य के शरीर में जो जीवात्मा है यो अपना ज्ञानपण्डल भिन्न-गिन बनाता है । किसी जीव के ज्ञानमण्डल से ग्रन्य जीव के ज्ञानमण्डल का अणुमात्र भी गंसर्ग नहीं होने [ ७३ [

पृष्ठ 106

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* ब्रह्मविज्ञान है किन्तु इन हिमालय- गङ्गा आदि पाता । प्रत्येक का ज्ञानमण्डल स्वतन्त्र रूप से अपना ही स्थान कार्य पर करता सब का ज्ञान सामान्य रूप से हो जाता पदार्थों के ज्ञान में बिना किसी शिक्षा के भी एक जीव के विचार से होता तो अवश्य सम्भव है कि जीवों है इसका क्या कारण है | यदि यह ज्ञान किसी सब के ज्ञान में एक स्थान पर न होती । इमगे ज्ञात के विचार में अंतर होने के कारण इनकी दृष्टि कला से सम्बन्ध रखते हैं जो ईश्वरी कला प्रत्येक होता है कि इस प्रकार के ज्ञान हमारे अन्दर ईश्वरी प्रत्येक जीव में एक ग़ा ही ज्ञान का उदय जीवों के शरीर में एक रूप से वर्तमान रहती है तदनुसार होता है । में प्रत्येक जवकि हम कह चुके हैं कि प्रत्येक जीव का ज्ञानमण्डल भिन्न है तो प्रत्येक ज्ञानमण्डल को एक हाथी इन्द्रिय से बना हुआ ग्रन्तर्जगत् भी अवश्य ही भिन्न होगा | तात्पर्य यह है कि जहां हम में भिन्न १०० ज्ञान मण्डलों देख रहे हैं उस हाथी का अन्तर्जगत् वाला रूप देखने वाले १०० मनुष्यों के द्रव्य, काल, भिन्न १०० हैं उनमें से कोई भी हाथी का रूप दूसरे हाथी के रूप से दिक् देश, किसी संख्या सभी विषयों में भिन्न हैं तथापि वे हाथी के रूप भिन्न २ न दीख कर बाहर हैं । से देखते एक ही स्थान में १०० या अधिक मनुष्य उस एक हाथी को एक ही रूप सर्वथा करते हुए श्रीर अपने देखे हुए हाथी को दूसरे के देखे हुए हाथी से तुलना एक ही हाथी होने का विश्वास रखते हैं । इस प्रकार भिन्न - भिन्न हाथियों में एक ज्ञान है जो वह प्रत्येक जीव में एक रूप से रहता हुआ ईश्वरी कला के कारण से है उनमें जो भिन्नता प्रतीत होती जीवों के निज के ज्ञान से सम्बन्ध रखती है किन्तु जो एकता है वह ईश्वरीय ज्ञान से सम्बन्ध रखती है । जब हम किसी बाह्य चीज को देखते हैं उस समय मेरी ग्रात्मा वहिर्जगत् से सम्बन्ध करती है किन्तु मेरी ग्रात्मा जिस प्रकार मन, प्राण और भी वाक् इन तीनों तत्त्वों से बनी है उसी प्रकार बहिर्जगत् इन तीन तत्वों से बना हुआ है ग्रतः जव उन दोनों का सहयोग होता है उस समय ग्रात्मा के तीनों तत्त्व वर्जिगत् के तीनों तत्वों से सजातीय क्रम होकर इस प्रकार से मिल जाते हैं कि उन दोनों के भिन्न मन मिलकर एक मन भिन्न प्राण मिल और यह , कर एक प्राण दोनों वाकू की एक वाक् हो जाती है तात्पर्य है कि ग्रात्मा और वहिजंगत् दोनों परस्पर मिलकर । ग्रतः एक मन, प्राण, वाक् का पदार्थ वन जाता है जो ईश्वर के मन, प्राण और वाक् से बना वाक् के हुग्रा वहिजगत् है उसके साथ जीव के मन, प्रारण और G मिलने से उसवस्तु की जीव के ज्ञान से पृथक्ता जाती रहती है । अतः जीव के ज्ञान वह बहिर्जगत् रूप में परिणत होकर जीव के ज्ञान के अभिन्न अपने रूप में एक अन्तर्जगत् वन जाता है जिसको कि जीव ज्ञान के अन्दर की वस्तु कोसमझनेलगता है । जब हम घट को देखते हैं तो सर्वप्रथम उस घट का वस्तु-सीमा कह सकते हैं रूप अर्थात् उसका ग्राकार जिसको हम दिखाई देता है । तत्पश्चात् कितने ही द्रव्यगुण दीखते उस आकार के भीतर उस ग्राकार को भरने वाले हैं और इन दोनों परज़मी के सिवाय और कुछ हुई वस्तु की सत्ता अलग दीखती है बस इन तीन नहीं है । इन पृथक् होकर हमें पृथक् होने पर भी जिस किसी की प्रतीति एक वस्तु का ज्ञान होता है गूढतत्व के द्वारा एकता वह तत्त्व हमारे ज्ञान में मिश्रित है । उस जगह सत्ता की वृद्धि घट की उपलब्धि ईश्वरीय ज्ञान का भाग अर्थात् घट के ज्ञान से घटसत्ता अलग नहीं है । तात्पर्य यह है कि [ ७४ ]

पृष्ठ 107

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* ब्रह्मविज्ञान का ज्ञान ही बट का ज्ञान है । अथवा घट का ज्ञान होना हो घट की सत्ता भीतर वाले द्रव्य गुण मेरे ज्ञान के बाहर होने पर भी सर्वदा स्थिर रहते है हैं और हमारे उस ज्ञानाधीन घटा या रूप के अतः उन रूपों को रूप के अन्दर वाले द्रव्यगुणों को श्रीर वस्तुसत्ता को नहीं हैं । तत्त्व को हम ईश्वरीय महाज्ञान कह सकते हैं । व इन तीनों को मिलाने वाले एक इसी प्रकार हम देखते हैं कि जो तेल पानी के आकार में था कितने ही उनके गुण पानी के समान थे किन्तु वह दीपक जलते समय अकस्मात् भिन्न रूप में परिरणत हो जाता है अर्थात् उसमें ऊपर उठने की शक्ति, जलाने की शक्ति, श्वेत या स्वर्णमय रंगत यादि कितने ही धर्म उसमें अकस्मात् ऐसे ग्रा जाते हैं जिनका वहां भी प्रादुर्भाव न था । यदि ईश्वर न माना जावे तो यह शक्तियाँ कहाँ से ग्राकर अकस्मात् उपस्थित हो जाती हैं इस प्रश्न का उत्तर अत्यन्त कठिन होगा, तात्पर्य यह है कि सम्पूर्णं ग्रनन्तानन्त शक्तियों का घन सर्वव्यापक रूप से सर्वत्र कोई अवश्य प्रतीत होता है उस ही खान में से जहाँ चाहें उस स्थान पर सब प्रकार की शक्तियाँ मिल जाया करती हैं और पश्चात् वे सब उसी घनशक्ति में लय होती रहती हैं । इसी सर्वशक्ति घन को हम विश्वमूर्ति परमेश्वर कहते हैं । नास्तिक प्रश्नों का उत्तर नास्तिकों ने संशयोपनिषद् में ईश्वर खण्डन करते हुए जो प्रश्न किये थे उनका यहाँ सम्भव तब हाता यदि ईश्वर भी मनुष्यों के अनुसार ही रचना करता किन्तु जीवों का किया हुआ वस्तुरचना का प्रकार और ईश्वर की रचना का प्रकार भिन्न - भिन्न हैं प्रत्युत यों कहना चाहिये कि जिस प्रकार मनुष्य वस्तु की रचना करता है वह प्रकार भी जगत् का ढंग है जिसको जगत् की रचना करने वाले परमेश्वर ने एक असाधारण व्यवस्था के साथ नियत किया है किन्तु ईश्वर का किया हुया रचना का प्रकार सर्वथा निराला है ग्रतः उस पर यह प्रश्न करना कि परमेश्वर ने किस स्थान पर बैठ कर किस सामग्री को लेकर कैसी चेष्टा करके श्रौर किस कामना से इस जगत् को कैसे रचा है इत्यादि प्रश्न सर्वथा व्यर्थ हैं, क्योंकि ये सब ढंग शरीर बारियों के और परतन्त्रों के हैं परन्तु ईश्वर जो किसी के परतन्त्र नहीं हैं शरीरधारी नहीं हैं जो सर्वव्यापक है स्वतन्त्र रूप से अपनी इच्छा मात्र से अनहोनी को होती कर सकता है उसके उसके लिये न किसी सामग्री की अपेक्षा है और न किसी स्थान की । जब हम परमेश्वर के स्वरूप को ही मनुष्य के समान नहीं देखते हैं तो मनुष्य के समान क्रिया करने का आक्षेप उस पर कैसे कर सकते हैं । दूसरा प्रश्न यह है कि परमेश्वर विज्ञानरूप हैं या विज्ञान वाला है? इसका उत्तर यह है कि यदि सकता । जिस हम मानले कि वह विज्ञानस्वरूप ही है तथापि उस पर जड़ होने का प्राक्षेप नहीं हो प्रकार नहीं रखता । सूर्य का प्रकाश अपने स्वरूप को प्रकाशित करने के लिये दूसरे प्रकाश की प्रावश्यकता जो स्वयं प्रकाशित नहीं हैं वह दूसरे को भी प्रकाशित नहीं कर सकता । इसी प्रकार यदि विज्ञान जड़ हो तो उससे दूसरे का प्रकाश नहीं हो सकेगा, अतः मानना होगा कि वह स्वतः प्रकाश है और उसी विज्ञान-घन को हम ईश्वर कह सकते हैं और यह कहते भी हम नहीं रुकते कि विज्ञान रूप होता हुम्रा परमेश्वर विज्ञानवान् भी है । तात्पर्य यह है कि हमारा परमेश्वर श्रानन्द, विज्ञान और सत्ता इन तीनों का घन है, उसमें यद्यपि ये तीनों धर्मरूप से विद्यमान हैं तथापि उसका धन - धर्मी कहा जा सकता है । जिस प्रकार वृक्षों को ही हम वन कह सकते हैं और मनुष्यों को ही सेना कहते हैं तथापि यह कहने में भी हमको संकोच नहीं है कि वन में वृक्ष हैं और सेना में मनुष्य हैं, जिस प्रकार वृक्षमाला वन है और मनुष्य वाली सेना है उसी ईश्वर है । प्रकार विज्ञान वाला [ ७५ 1

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* ब्रह्मविज्ञान ग्रथवा यदि हम परमेश्वर को जड़ भी कहें तो कुछ हानि नहीं है क्योंकि इस जगत् में जितने विरुद्ध धर्म हैं कोई भी परमेश्वर से भिन्न चीज नहीं है । जड़ हो या चेतन, काला या श्वेत, छोटा या बड़ा तात्पर्य यह है कि जो कुछ जगत् का रूप है सब परमेश्वर है । ग्रतः इस परमेश्वर के ऊपर किसी विषय होने न होने का कोई भी प्रश्न लागू नहीं हो सकता । सम्पूर्ण जगत् जो कुछ भासित है परमेश्वर रूप है वह सम्पूर्ण शक्तियों का घन है एक है श्रीर अविनाशी है । कपड़े में जिस प्रकार रुई की सत्ता है बर्फ में जिस प्रकार जल की सत्ता है उसी प्रकार इस जगत् में परमेश्वर की सत्ता है । परमेश्वर का इस जगत् के साथ षड्विकल्प सम्बन्ध है अर्थात् परमेश्वर से इस जगत् का मिलाव ६ प्रकार का है: -१ - जगत् में ईश्वर है । २ - ईश्वर में जगत् है । ३ – ईश्वर ही जगत् है या जगत् ही ईश्वर है । ४ - जगत् से भिन्न ईश्वर या ईश्वर से ही भिन्न जगत् है । ५ - ईश्वर से भिन्न जगत् है किन्तु जगत् से भिन्न ईश्वर नहीं है । ६ - असली ईश्वर में प्रातिभासिक रूप से जगत् भासता है । ईश्वरसिद्धिसूत्र का सारांश १ – जो ब्रह्माण्ड ह्मारी ग्राँख से पकड़ा जाता है उसके अतिरिक्त कई अन्य ब्रह्माण्ड जिनकी गणना नहीं हो सकती उनको जब हमारा ज्ञान निश्रयात्मका बुद्धि से अनुमान करता है तो इस अनन्तता अथवा असीमता का ज्ञान में भान होना ईश्वरीय ज्ञान को हमारे ज्ञान में सिद्ध करता है क्योंकि अल्पज्ञ मनुष्य के ज्ञान में अनन्तता या असीमता का विश्वास होना सर्वज्ञता की झलक को प्रद-शित कर रहा है । २ - समस्त विश्व के कार्य ऐसे नियमों से सदा संचालित रहते हैं कि उनमें कुछ भी कदाचित किसी प्रकार का अन्तर नहीं होता । जैसे जो ग्रह चलते हैं तो नियमबद्ध चलते ही रहते हैं और जो ग्रह जिस नियम से ग्रचल हैं तो चल ही रहते हैं कभी नियमभंग नहीं करते । माता के गर्भ में प्रत्येक जीव के नियमानुसार सब, ग्रङ्ग, हाथ, पाँव, ग्रॉस, नाँक इत्यादि इत्यादि सदा वनते रहते हैं । पानी सर्वदा नीचे को और अग्नि की लौ सदा ऊपर को नियमानुसार चलते रहते हैं । ऐसे ऐसे उदाहरण अनन्त हैं कि जिनमें नियमबद्ध सब कार्य होते रहते हैं । ये नियम सदा ग्रचल, ग्रमिट, अटल, सर्वत्र व्यापक एक ही रूप को धारण किए हुए संसार को चलाते रहते हैं । इन नियमों में कभी कोई भूल नहीं होती । इन नियमों की अचूक और निरन्तर दृढ़ता से इनका सत्यरूप प्रकट होता है । इन नियमों की सत्यता ही ईश्वर का रूप है । यही सब नियमों में सत्यरूप से विराजमान होकर सब क्रियायों का नियन्ता हो रहा है समस्त विश्व को ऐसे टल नियमों के [ ७६ ]

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* ब्रह्मविज्ञान साथ चलाने वाला जो सत्यरूप है और जो कभी ग्रसत्यता किंचित् मात्र भी नहीं दिखाता वही सत्यरूप ईश्वर का रूप है । ये विश्वव्यापक नियम सर्वव्यापी सत्यस्वरूप ईश्वर को प्रकट कर रहे हैं । ३ - - मनुष्य में मानसिक, वाचिक और कायिक व्यवहार करने वाली शक्ति को जीव आत्मा कहते हैं । इन मानसिक, वाचिक और कायिक व्यवहारों को चलाने के निमित्त मनुष्य शरीर में एक बड़ा यन्त्रालय है जिस पर मनुष्य का कोई भी ग्राधिपत्य नहीं है । इस यन्त्र की अद्भुत और विलक्षण क्रियाओं को संचालित करने वाली जो ज्ञानरूप शक्ति है वही ईश्वर है । मनुष्य शरीर के यन्त्र की समग्र कौशल कलाओं का यथार्थ प्रेरणा करने वाला केन्द्र जो हृदय प्रदेश में स्थित हुआ विरा-जमान है उसी को ईश्वर कहते हैं । यह ईश्वर ही जीवात्मा का आधार है । यह ईश्वर शरीर यन्त्रों को इस प्रकार चला रहा है कि जिसके द्वारा जीवात्मा स्थिर रह रहा है । इस प्रकार मनुष्य जीवन का ईश्वर हेतु अतः हमारा कर्त्ता, हर्त्ता विधाता होने के कारण हमारा माराव्य देव हैं उसी की हम सेवा, प्रार्थना करते हैं और उसी के ग्रधीन हैं । इस अभिप्राय को लेते हुए गीता का वचन है: -ईश्वरः सर्वभूतानां

हृद्दशेऽर्जुन तिष्ठति ।

भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥

( गी ० अ ० १५ श्लोक ६१ ) ईश्वर जिस प्रकार मनुष्य शरीर का आधार होकर शरीर के हृदय केन्द्र में स्थित है वैसे ही सब प्राणियों का आधारभूत है । ४- - सकल प्राणियों के जीवन भर में कितने ही ज्ञान ऐसे हैं कि जिनका शिक्षा से सम्बन्ध नहीं है जैसे — जन्मते हुए बच्चों का पानी या दूध से तृपानिवृत्ति का ज्ञान होना, कौवे र घुघू में जन्म से ही वैर भाव रहना, ग्रस्त्र शस्त्र से हटने की क्रिया करने का ज्ञान होना । ये सब ज्ञान जीवों के विचार से उत्पन्न नहीं होते ये सब जो ईश्वर की कला शरीर में है उससे सम्बन्ध रखते हैं अतः ये सब ईश्वरोक्त हैं । १३ - जीव और ईश्वर का साधर्म्यवैधर्म्य सूत्र १ -- सबसे प्रथम ग्रात्मा के दो भेद जानने चाहिये - १ व्यष्टि और २ समष्टि । अनेक भेदों को व्यष्टि कहते हैं और उन सब को मिला कर यदि एक बुद्धि की जावे तो उसको समष्टि कहेंगे । एक समष्टि में ग्रनन्त व्यष्टियाँ होती हैं । यदि आत्मा की किसी समष्टि में अनन्त व्यष्टियों को हम देखें तो वे ही जीव होवेंगे और उन सब जीवों को यदि समष्टि रूप से देखें तो उसी को ईश्वर कहेंगे । [ ७७

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ब्रह्मविज्ञान हैं और उन प्रतिबिम्बों २ – जिस प्रकार एक ही सूर्य के अनन्त स्थानों में अनन्त प्रतिबिम्ब हुआ किसी करते एक बड़ी श्रात्मा के अनन्त का मूलस्वरूप बिम्बवान् सूर्य एक होता है उसी प्रकार प्रतिविम्बों का विम्बी एक मूल श्रात्मा प्रतिबिम्ब हो गये हैं उन्हीं को जीव कहते हैं और उन है उसी को ईश्वर कहते हैं । ३ — जिस महाज्ञान का नाम ईश्वर है उसको ' ओम् ' शब्द से और जिन अनन्त ज्ञानों को जीव कहते हैं उनका ' अहम् ' शब्द से व्यवहार होता है । शरीर कहते ४ - जो जहाँ कुछ हम देखते हैं स्थूल पुद्गल हमें दृष्टिगोचर होता है । इन पुद्गलों को ही हैं । ये छोटे - बड़े अनेक प्रकार के हो सकते हैं । उन सब को भिन्न - भिन्न शरीर कहेंगे । कितने से शरीर कितने ही शरीरों से बनते हैं । जिस प्रकार मनुष्य का एक शरीर है ऐसे कई शरीरों कई जातियों एक सेना का शरीर बनता है और कई शरीरों से एक जाति का शरीर बनता है और दृष्टि के शरीरों से एक जमात या ग्राम बनता है । तात्पर्य यह है कि कितने पुद्गलों को हम एक में से देखें, वे एक वस्तु होने के कारण एक शरीर हो जाते हैं । इस प्रकार जितने इस जगत् छोटे - बड़े शरीर है सब के अन्दर उस शरीर के चेष्टा करने का कोई शक्ति केन्द्र रहता है उसी शक्ति केन्द्र को उस शरीर की आत्मा कहते हैं । इस प्रकार छोटे बड़े जितने शरीर है उनकी आत्मा -को अर्थात् उनके प्रत्येक शक्ति केन्द्रों को हम जीव कहते हैं किन्तु विशाल जो यह सम्पूर्ण महा जगत् [ अनादि काल से वर्तमान है जिसका शरीर अनन्त पुद्गालों से बना उसको चलाने हुआ है वाला भी अनन्तानन्त शक्ति वाला अवश्य ही कोई शक्ति केन्द्र हो है इसमें सकता है, वही ईश्वर विशेषता यह है कि जीवों का शरीर परिमत होने के कारण स्थान उसका शक्ति केन्द्र एक नियत में आ जाता है, किन्तु जो असीम ग्रनन्तरूप से आत्मा जगत् को शरीर बनाता है उसकी कोई नियत शक्ति केन्द्र न रख कर प्रत्येक बिन्दू को अपना परमे-शरीर बनाये रहती है इसी से श्वर के प्रत्येक स्थान में हृदय, मस्तक, पाँव, आँख, कान, आदि मानेजा सकते हैं अतः ने उसका स्वरूप कहा है: -= सर्वतः पारिण पादम् तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य 1 तिष्ठति ॥ महर्षियों अर्थात् यह सब हाथ - पैर वाला, सब तरफ आँखमस्तक और कान वाला होकर सब को ढक कर ठहरा हुआ है । मूख वाला और सब तरफ ५ -- ज्ञान के स्वरूप में और जगत् की कल्पनाकरने में ईश्वर हैं । अर्थात् जिस प्रकार जीव को हमने और जीव दोनों बराबर धर्म रखते ज्ञान रूप में देखा है । यद्यपि जीव ज्ञान का एक छोटा है उसी प्रकार ईश्वर भी महा ज्ञान का घन घन हैं किन्तु ईश्वर ज्ञानों का भण्डार है । इतना अन्तर होने ग्रनन्त अपरिमित और सम्पूर्ण पर भी ज्ञान स्वरूप होने में कुछ भी भेद नहीं है इसी प्रकार दोनों ही अपना - अपना जगत् भीरखते हैं । जिस प्रकार जीवका ज्ञानमण्डल सर्वदा अन्तर्जगत् से और व्याप्त रहता है और अपनेही ज्ञान की सामग्री से है नया - नया ग्रन्तर्जगत् बनाया करता उस ग्रन्तर्जगत् को अपनेही में रखता हुआअपने ही में लय ईश्वर कर लेता है । इसी प्रकार [ ७८ 1