ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 91–100

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 91–100

पृष्ठ 91

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के ब्रह्मविज्ञान * जस एक सूर्य एक ब्रह्माण्ड का नियन्ता है वैसे ही अनन्त ब्रह्माण्डों के अनन्त सूर्य नियन्ता हैं । ठीक इसी प्रकार जैसे एक जीब एक ज्ञानमण्डल का नियन्ता है वैसे ही ग्रनन्त जीव ग्रनन्त ज्ञान मण्डल के नियन्ता हैं । इसलिए भिन्न २ अनन्त जीव हैं । जीवों के अनन्त व्यवहार होने से जीव अनन्त हैं । एक ही समय में कोई खाता है कोई पीता है और कुछ करता है । ७ - ग्रन्तजगदानन्त्य सिद्धिसूत्र कहना यह है कि जो यह जगत् मुझको भास रहा हूं वही भासना जगत् का मूल है । उसी भासने के आधार पर जगत् ठहरा हुआ है । यदि भासना नहीं रहता तो यह जगत् भी निःसंदेह नहीं रहता । मुझको भासता है इसी से हम इसकी सत्ता कायम करते हैं । किन्तु जिस प्रकार इस जगत् का मूल यह भासना है अर्थात् मेरा ज्ञानमण्डल है उसी प्रकार मेरे इस भासने का अर्थात् ज्ञानमण्डल का मूल भी मैं हूँ । इस प्रकार जबकि जगत् का मूल मैं सिद्ध हुआ तो कहना होगा कि यह जगत् भी ग्रनन्त है क्योंकि पहले कहा जा चुका है कि यह वेत्ता जीव अनन्त है तो प्रत्येक वेत्ता का ज्ञान मण्डल भिन्न - भिन्न होगा और प्रत्येक ज्ञानमण्डल में भासता हुआ जगत् भी भिन्न - भिन्न ही होगा क्योंकि मेरे ज्ञान से जो जगत् भासता है वह कदापि संभव नहीं कि राम के ज्ञानमण्डल से भासता हो क्योंकि हमारे ज्ञान से भासते हुए जगत् में श्रीर राम के भासते हुए जगत् में हम कहीं - कहीं प्रत्यक्ष भेद पाते हैं । जबकि मैं सूर्य को उगता हुआ देखता हूं तो ठीक उसी समय मेरे पड्भान्तर पर अर्थात् मुझसे १८० अंश की दूरी पर रहता हुग्रा राम उसी सूर्य को अस्त होता हुआ देखता है और तीसरे किसी की दृष्टि में मध्याह्न का सूर्य है औौर चौथे किसी की दृष्टि में और किसी समय का सूर्य है । इसी प्रकार कोई एक मनुष्य को मित्र रूप से देखता है तो दूसरा शत्रु रूप से । कोई वस्तु किसी के लिए ग्रानन्दप्रद है तो वही वस्तु दूसरे के प्रति दुःखदायी है जिसकी आज्ञाकारी संतति और परिवार है, घर में पूर्ण संपत्ति है और शरीर में प्रारोग्यता है तो उसके लिये इस इस जगत् के सम्पूर्ण पदार्थ चारों ओर मानन्दमयी दीखते हैं किन्तु जिसके स्त्री, पुत्र दुःखदायी है और दरिद्री या रोगी है उसके लिये संपूर्ण जगत् दुःखमय प्रतीत होता है इत्यादि अनेक उदाहरण दिये जा हैं जिससे प्रतीत होता है जिस प्रकार प्रत्येक जीवात्मा भिन्न - भिन्न है उसी ही प्रकार उनके ज्ञानमण्डल भी भिन्न हैं अतः उनके अपने - अपने ज्ञान मण्डल से बने हुए जगत् भी भिन्न है । जब कोई सुप्तावस्था अथवा मूर्च्छा में रहता है तो उसके ज्ञानमण्डल के साथ - साथ उसका जगत् भी अस्त हो जाता है किन्तु उसी समय जागते हुए ग्रन्य जीवों के जगत् भासित होते रहते हैं । अतः सिद्ध हुआ कि जिस प्रकार जीव | \ / अनन्त हैं उसी ही प्रकार उन जीवों से बने हुए जगत् भी अनन्त हैं । द- - ग्रन्तर्जगदानन्त्य सिद्धिसूत्र का सारांश मेरे ज्ञानमण्डल में जो अन्तर जगत् भासता है उस अन्तर जगत् के भासने का कारण मेरा ज्ञान-कारण ' मैं ' हूँ । पूर्व के जीवनन्त्यसिद्धिसूत्र में जीव अनन्त सिद्ध हो चुके हैं अनन्त जीवों के ज्ञानमण्डल भी अनन्त हैं और अनन्त ज्ञानमण्डल होने से अनन्त होंगे क्योंकि एक जीव के ज्ञानमण्डल के अन्तर जगत् से देश, काल मण्डल है और मेरे ज्ञान का तो जीवों के अनन्त होने से उनमें भासने वाले जगत् भी [ ५६ ]

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* ब्रह्मविज्ञान कै इत्यादि के भिन्न होने से भिन्न हैं । ग्रन्तर्जगत् के भिन्न - भिन्न होने के और भी प्रमाण है प्रथम एक ही सूर्य को एक ही समय में भिन्न देश के कारण एक जीव ऊगता हुआ, दूसरा जीव ग्रस्त होता हुआ और तीसरा मध्याह्न वाले सूर्य को देखता है । दूसरा एक ही जगत् किसी को दुःख भरा हुआ और किसी को सुख से परिपूर्ण ज्ञात होता है । तीसरे किसी को एक ही व्यक्ति मित्र और किसी को शत्रु दीखता है । येनकेन-प्रकारेण श्रीर भी उदाहरण दिये जा सकते हैं जिससे सिद्ध है कि भिन्न जीवों के भिन्न ज्ञानमण्डल में भिन्न ग्रन्तर्जगत् है ग्रतः यह बात है कि सोते हुए या मूर्छा पाये हुए जीव या व्यक्ति का अन्तर्जगत् उसके ज्ञान-मण्डल के न रहने से नहीं रहता किन्तु उसी समय के जगत् मनुष्यों तथा जीवों का ज्ञानमण्डल रहने से अन्तर्जगत् भी कायम रहता है । वस ग्रव सिद्ध है कि जैसे जीव ग्रनन्त हैं वैसे ही उनके भिन्न - भिन्न ज्ञान-मण्डल के अनुसार ग्रन्तर्जगत् भी अनन्त हैं । हम यह भी कह सकते हैं कि रात्रि को एक हो चन्द्रमा को १०० या एक हजार मनुष्य एक ही समय में देखें तो उनके भिन्न ज्ञानमण्डल में भिन्न - भिन्न चाँद है । ऐसे एक ही चन्द्रमा अनन्त ज्ञानों में अनन्त सिद्ध हुआ इसी प्रकार एक ही मनुष्य या जगत् ग्रनन्त सिद्ध हुए | जैसे एक ही वस्तु ग्रनन्त काँचों में अनन्त भासती है उसी प्रकार ग्रनन्त जीवों के ग्रनन्त चक्षु रूपी काँचों के द्वारा ग्रनन्त ज्ञानमण्डलों में यह एक ही जगत् एक ही समय में ग्रनन्त होकर भासता है । ग्रन्तर्जगतो अहमालम्बनत्व सिद्धिसूत्र अन्तर जगत् की अनन्तता की सिद्धि में यह ग्राक्षेप है कि यदि यह जगत् ज्ञान का बना होता तो जीवों के ज्ञान के अनन्त होने से ज्ञान के बने हुए जगत् भी अनन्त हो सकते थे किन्तु यदि यह मान लिया जावे कि जगत् के प्रत्येक पदार्थ भातिसिद्ध नहीं हैं केवल सत्तासिद्ध है, तो ऐसी स्थिति में ज्ञान के आधीन वस्तु की सत्ता नहीं प्रत्युत सत्ता के प्राधीन वस्तु का ज्ञान है । ग्रतः वस्तु क ज्ञान के अनन्त होने पर भी अनन्त नहीं हो सकती । एक ही वस्तु को एक ही काल में अनेक जीव देख सकते हैं । इस प्रश्न पर यह उत्तर है कि यह जगत् भले ही सत्तासिद्ध हो किन्तु उससे भातिसिद्ध वस्तु का खण्डन नहीं हो सकता । मानाकि आकाश में चन्द्रमा हमारे ज्ञान से नहीं वह सृष्टि के ग्रादि से स्वतः सिद्ध वस्तु है तथापि जब हम देखते हैं चन्द्रमा का ज्ञान होता है । यह ज्ञान कैसे हुआ यदि इसका विचार किया जावे तो तीन पक्ष की सम्भावना हो सकती है । एक यह कि ज्ञान मेरे अन्दर है, चन्द्रमा ग्राकाश में है दोनों का दोनों से संयोग नहीं हुआ किन्तु प्रकृति का नियम है कि आँख के सामने किसी चीज के रहने पर उसका ज्ञान हो जावे । दूसरा पक्ष यह है कि हमारी ज्ञान की वृत्ति ग्राँख से बाहर निकल कर वस्तु के समीप जाकर उसको स्पर्श करता है और उसी से उसका ज्ञान होता है । तीसरा पक्ष यह है कि वस्तु के शरीर से उस बस्तु के रूप की मात्रा चारों ओर ग्रनन्त निकली हुई रहती हैं किन्तु उसकी भी एक सीमा है उस सीमा के अन्दर यदि ग्रांख हो तो उस पर वस्तु का रूप उसी तरह बैठता है जैसे काँच या जल पर वस्तु का प्रतिविम्व । विशेषता यह है कि उस ग्राँख पर ज्ञान पैदा करने वाले कोई स्नायु मस्तक से ग्राकर इस प्रकार जमे हुए हैं कि उनके द्वारा मस्तष्क से चक्षु तक ज्ञान की धारा प्रवाहित रहती है । जिह समय प्राँख का प्रतिबिम्ब पड़ा उस समय ग्राँख पर बैठा हुग्रा प्रज्ञाप्राण जिसके द्वारा ज्ञान होता है वह उस वस्तु के रूप में परिणत हो जाता है और उसी रूप में ग्रॉस से मस्तक ज्ञान की धारा बहने लगती है । यह ज्ञान का बना हुग्रा वस्तु का रूप वस्तु के शरीर से ग्राँख पर प्राये हुए वस्तुरूप से सर्वथा भिन्न है [ ६० ]

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* ब्रह्मविज्ञान क्योंकि उस वस्तु के हटने या ढकने पर उस वस्तु का प्रतिबिम्ब वाला रूप भी आँख से हट जाता है किन्तु प्रज्ञाप्राण का बना हुआ ज्ञानमय उस वस्तु का रूप कदापि नहीं हटता और वह मेरे अन्दर बहुत समय तक बना रहता है । इससे विदित हुआ कि ये दोनों रूप भिन्न हैं एक भूतमय है और दूसरा ज्ञान-मय । भूतमय में गुरुता है किन्तु ज्ञानमय में गुरुता का लेश भी नहीं । इस प्रकार दो रूप सिद्ध होने पर भूतमय रूप को हम सत्ता सिद्ध कहेंगे और ज्ञानमय रूप को अवश्य ही भातिसिद्ध कहना पड़ेगा । इन दोनों में सत्तासिद्धि रूप वस्तु से इस प्रकार बंधा हुआ है कि उस वस्तु के आलम्बन को छोड़ कर कदापि दूसरे के ग्राधीन नहीं रह सकता किन्तु ज्ञानमय वस्तु का रूप हमारे साथ हमारे ज्ञान के प्राधीन रहता है । इसी से कहना पड़ेगा कि मेरे ज्ञान के अन्दर जो रूप भासता है वह उस वस्तु का भौतिक रूप नहीं है किन्तु मेरे ज्ञान का प्रातिभासिक रूप है । इस प्रतिभासिक या प्रात्ययिक रूप को हम अन्तर जगत् कहते हैं क्योंकि वह ज्ञान के अन्दर ही रहता है, ज्ञान के बाहर उसकी सत्ता नहीं है । इस प्रकार यह ग्रन्तर्जगत् तो भातिसिद्ध है और ज्ञान का ही बना हुआ सिद्ध होता है । ऐसी स्थिति में ज्ञान का अनन्त होने से वह जगत् भी पृथक - पृथक ज्ञान में रहते हुए ग्रनन्त है । सारांश श्रन्तर्जगत् की अनन्तता सिद्धि पर किसी का प्राक्षेप है कि यदि यह जगत् ज्ञान से ही बना हुआ होता तो अनन्त ज्ञान होने से अनन्त हो सकता था अर्थात् जगत् भातिसिद्ध नहीं है यह तो केवल सत्ता-सिद्ध ही है; ऐसी स्थिति में वस्तु सत्ता ज्ञान के ग्राधीन नहीं प्रत्युत ज्ञान वस्तु सत्ताधीन और वस्तु सत्ता स्वतन्त्र है वह ज्ञान के अनन्त होने पर भी ग्रनन्त नहीं हो सकती । एक ही वस्तु को अनन्त जीवों का एक ही काल में देखना हो सकता है । यह ग्राक्षेप अन्तर और बहिर्जगत् के भेद को न समझने वालों का है । बाह्य - सत्तासिद्ध जगत् एक ही होकर भी अन्तर- भाति सिद्ध जगत् तो अवश्य ही ग्रनन्त हैं । मनुष्य और चन्द्रमा में इतना अन्तर होने पर भी वह मनुष्य के ज्ञान का विषय होने से भातिसिद्धि है और अनन्त है । चन्द्रमा के ज्ञान होने की रीति समझने के लिए तीन पक्षों की सम्भावना हो सकती है: -१ - प्रकृति नियमानुसार आँख के सामने वस्तु के प्राने से ही ज्ञान हो जाता है । २ - मनुष्य के ज्ञान की किरणें आँस से बाहर निकल कर वस्तु के समीप जाकर उसको स्पर्श करती है और उसी से उसका ज्ञान होता है । यह दोनों मत तो व्यावहारिकों के हैं किन्तु पारमार्थिक वैज्ञानिकों का तीसरा मत यह है: -३ –वस्तु के ऋक् सम्बन्धी साम के अन्दर वस्तु का प्रतिबिम्ब ग्राँख पर वैसे ही गिरता है जैसे काँच या जल पर, अर्थात् वस्तु के रूप का चित्र आँख पर स्थिर हो जाता है किन्तु विशेषता यह है कि आँख चैतन्य है । मस्तक से प्राँख तक स्नायु के द्वारा ज्ञान की धारा बहती रहती है । और स्नायु में प्रज्ञाप्रारण के होने से ज्ञान होता रहता है । आँख पर ठहरा हुग्रा रूप या प्रतिबिम्ब प्रज्ञाप्राण में प्रथवा प्रज्ञाप्राण उस रूप में परिणत होकर उस रूप में ग्रॉस मस्तक तक ज्ञान - धारा बहने लगती है । किन्तु ज्ञान का बना हुरूप उस वस्तु रूप सत्ता से भिन्न है क्योंकि उस वस्तु के परोक्ष में भी ज्ञान का बना हुआ रूप [ ६१ ]

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* ब्रह्मविज्ञान I नष्ट नहीं होता । ग्रतः स्पष्ट सिद्ध कि ये दोनों रूप भिन्न हैं एक भूतमय और दूसरा ज्ञानमय । भूतमय में गुरुता है ज्ञानमय में लवलेश भी नहीं । ग्रतः भूतमय रूप सत्तासिद्ध है और ज्ञानमय रूप भातिसिद्ध । एक ही जगत् में दो रूप सिद्ध हुए एक वाह्य भूतमय सत्तासिद्ध दूसरा ग्रन्तर - ज्ञानमय-भातिसिद्ध । सत्तासिद्ध रूप वाह्य जगत् से बंधा हुग्रा वहाँ का वहाँ ही रहता है और भाति सिद्ध रूप ज्ञानाधीन होने से ज्ञान में उस भूत वस्तु से भिन्न है । यह भौतिक नहीं किन्तु मेरे ज्ञान का प्रात्य-यिक रूप है और वही प्रात्ययिक रूप ग्रन्तर्जगत् कहलाता है क्योंकि वह ज्ञान में हीं रहता है, ज्ञान से बाहर उसकी सत्ता नहीं । इस प्रकार यह ग्रन्तर्जगत् जो भातिसिद्ध है ज्ञान का ही बना हुआ सिद्ध होता है । ऐसी स्थिति में ज्ञान ग्रनन्त होने से वह जगत् भी पृथक् पृथक् ज्ञान में रहते हुए ग्रनन्त हैं | ६- बहिर्जगत् सिद्धिसूत्र मैं, मेरा भ्राता, पिता, मित्र, शत्रु इत्यादि भिन्न रूप में हमें भासते हैं । उनमें कितने मर गये कितने मरेंगे तथापि यह विश्व कदापि नष्ट न हुआ न होगा । एक जीव की मृत्यु पर ग्रथवा मोक्ष होने पर संभव है कि उस जीवात्मा का ज्ञान मण्डल पृथक् रूप से न रहे, सर्वथा नष्ट हो जावे तथापि क्या उस ज्ञान के नाश से विश्व का नाश होना संभव है, कदापि नहीं । चैत्र की मृत्यु से मंत्र का ग्रन्तर्जगत् नष्ट नहीं होता इसी प्रकार मैत्र के नष्ट होने पर भी जगत् नष्ट नहीं होता । हम जब गाढ़ निद्रा में सो जाते हैं या मूर्छा में रहते हैं तो अवश्य मेरे साथ ही मेरा संपूर्ण विश्व मण्डल मुझमें लय हो जाता है तथापि यह विश्व बाहर ज्यों का त्या वना रहता है क्योंकि हम देखते हैं कि जव दूसरा मनुष्य गाढ़ निद्रा में सो जाता है या मूर्च्छित रहता है तथापि यह जगत् हमें भासता रहना है । इससे जाना गया कि यह विश्व मण्डल हमारे ही ज्ञान के ग्राधीन नहीं है, किन्तु स्वतन्त्र है । १ – अन्तर्जगद् बहिर्जगतोः पृथकत्व सिद्धिसूत्र कदाचित् इस पर कोई कह सकता है कि बाहर कोई जगत् स्वतन्त्र रूप से नहीं है केवल जो मनुष्य जाग्रत् अवस्था में है उसी का ज्ञान मण्डल केवल उसी को जगत् दिखा रहा है । जितने जीवात्मा जाग्रत हैं उन्हीं के ज्ञान मण्डलों के आधार पर यह सम्पूर्ण जगत् खड़ा हुग्रा दिखता है । वास्तव में ज्ञान मण्डल से बाहर स्वतन्त्र रूप से किसी बाह्य जगत् की सत्ता सर्वथा नहीं है तो इस पर हम कहेंगे कि यदि जगत् मेरे ही ज्ञान के आधार पर हैं और मेरे ही ज्ञान का बना हुआ है तो कोई भी जोवात्मा किसी दुःख दारिद्र्य के कारण किसी स्थिति में भी विवश न होता, अपने ही ज्ञान से सुख - साम्राज्य की समृद्धि स्वेच्छा रूप से पाता, स्थानान्तर में न जाकर सभी स्थानों को इच्छानुसार अपने ज्ञान से कल्पना कर लेता । परन्तु हम देखते हैं कि ज्ञान करने पर भी जो, जहाँ, जैसा हम चाहते हैं वैसा नहीं होता । मेरी इच्छा के विरूद्ध कहीं मुझको भय देने वाली वस्तु दीखती है और वह मेरी इच्छानुसार नहीं हटती । ग्रतः जाना जाता है कि मेरे ज्ञान से बाहर कोई न कोई वस्तु स्वतन्त्र रूप से ग्रवश्य है कि जिसकी सत्ता के ग्रधीन मेरे ज्ञान की सत्ता है । जहाँ, जो, जैसी वस्तु है नियम से उसी स्थान पर वैसा ही मेरा ज्ञान उत्पन्न होता है । मेरे ज्ञान उत्पन्न होने का कारण स्वतंत्र रूप से बाहर है उसी को हम बहिर्जगत् कहते हैं । यद्यपि वह बहिर्जगत् मेरे [ ६२ ]

पृष्ठ 95

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* ब्रह्मविज्ञान कै ज्ञान में नहीं आता इसीलिए हम उसको बहिर्जगत् कहते हैं, तथापि यदि वह न होता तो एक ही स्थान पर बीग मनुष्यों को ही एक रूप में एक वस्तु का ज्ञान नहीं होता । प्रत्येक के ज्ञान मण्डल भिन्न होने के कारण स्वतन्त्र रूप से भिन्न कुछ का कुछ दीखता । किन्तु एक ही रूप में सबको दिखने के कारण किसी परोक्ष वस्तु का होना अनुमान से पाया जाता है और उसी के अधीन मेरा ज्ञान मण्डल है जिसको हम देखते हैं । इससे सिद्ध हुआ कि जगत् दो प्रकार का है - १ - जो मेरे ज्ञान में भासता है, यह सब पदार्थ मेरे ही ज्ञान के अन्दर हैं और मेरे ही ज्ञान का बना हुआ है - २ - किन्तु दूसरा एक जगत् मेरे ज्ञान के बाहर है श्रीर स्वतन्त्र मत्ता रखता है और वही मेरे ज्ञान वाले अन्तर्जगत् का कारण भी यही जगत् वहिर्जगत् कहलाता है । यदि कोई कहे कि इस प्रकार बहिर्जगत् की श्रावश्यकता होने पर इस सम्पूर्ण जगत् को केवल बहिर्जगत् ही क्यों न मान लिया जाय – ग्रन्तर्जगत् और बहिर्जगत् कह कर दो प्रकार का जगत् क्यों माना जाता है क्योंकि सम्भव है कि हमारी ज्ञान इन्द्रिय बहिर्जगत् से स्पर्श करके ज्ञान पैदा करता हो जिस प्रकार सूर्य या दीपक अपने प्रकाश से उन्हीं वस्तुनों को प्रकाशित करता है जो कि प्रकाश के ग्राने पहले भी वहां विद्यमान थे । जो वस्तु विद्यमान ही नहीं वह प्रकाशित नहीं होती । इससे ज्ञात हुआ किवस्तु की भत्ता प्रकाश ग्राधीन नहीं है, स्वतन्त्र है । ठीक इसी प्रकार हमारा ज्ञान भी एक प्रकार से है उसके अधीन किसी वस्तु की सत्ता नहीं । प्रत्युत स्वतन्त्र रूप से वस्तु की सत्ता रहने पर ज्ञान से प्रकाशित होती है जैसे सूर्य का प्रकाश हाथी, घोड़ा नहीं बनता किन्तु वर्तमान हाथी, घोड़े को दिखा देता है वैसे ही ज्ञान भी हाथी, घोड़ा न बनकर विद्यमान हाथी घोड़े को दिखला देता है । ऐसी स्थिति में किसी अन्तर्जगत् का होना पाया नहीं जाता केवल ज्ञान के बाहर रहने वाली वस्तुओंों का ज्ञान से संसर्ग हो जाना ही उस वस्तु का ज्ञान कहलाता है अतः सिद्ध हुआ कि केवल बहिर्जगत् ही सब वस्तु है । ग्रन्तर्जगत् कोई वस्तु नहीं । इस ग्राक्षेप का उत्तर हम इस प्रकार देवेंगे — जो उदाहरण सूर्य या दीपक के प्रकाश का दिया गया है वहाँ भी दो प्रकार पदार्थ हैं - एक वह हाथी जो बहुत भारी बाहरी किसी प्रदेश में खड़ा रहता है उसका प्रकाश होना मानों हमारी दृष्टि में आता है परन्तु क्या आप विचार सकते है कि वह भारी हाथी आपकी ग्राँख पर सवार हो गया? कदापि नहीं । वह अपने स्थान को किश्चित् मात्र भी नहीं छोड़ता केवल उस हाथी के बाहरी चर्म के ऊपर जितने परमाणु हैं जिस रंग के हैं उन परमाणुओंों का संसर्ग करके सूर्य का प्रकाश उसी रंग में रंग कर वहाँ से उलटा निकलता हुआ ( Reflected ) ग्राँख पर जाता है, उसी से आँख पर उन्हीं किरणों कि एक प्रकार हाथी की सूरत बन जाती है जिसको कि हाथी ग्राँख पर ग्राना कहते हैं । यह ग्राँख का हाथी प्रवश्य ही उस बाहरी हाथी से भिन्न हैं । इस प्रकार जैसे सूर्य के प्रकाश में दो हाथी की सिद्धि हुई उसी प्रकार ज्ञान प्रकाश में भी दो हाथी मानना उचित है । इस कारण यह है कि जब हम हाथी को देखते हैं तब एक ही हाथी हम अपने शरीर से बाहर किसी जगह देखते हैं किन्तु मान लीजिये कि वह हाथी वहाँ से कहीं चला गया तो उस दशा में भी मेरी ग्रांखों के सामने यदि मैं कल्पना करूँ तो उसी प्रकार का हाथी दीखेगा जिसको कि हम या ग्राप कल्पित मानेंगे | इस कल्पित से तात्पर्य यह है कि वह ग्रापके ज्ञान का बना हुआ है । इस कल्पित हांथी और [ ६३ ]

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ॐ ब्रह्मविज्ञान के प्रत्यक्ष हाथी में अब कुछ सम्बन्ध नहीं है, दोनों ही स्वतन्त्र है । उस प्रत्यक्ष हाथी से जिसको ह्ग वह्निर्जगत् कहते हैं इस कल्पित हाथी जिसको हम ग्रन्तर्जगत् कहते हैं भिन्न मानना पड़ेगा क्योंकि यह हमारे ज्ञान के अन्दर है । इस प्रकार बहिर्जगत् के साथ - साथ अन्तर्जगत भी मानना पड़ता है । इसके अतिरिक्त हम देखते हैं कि जिस वस्तु की बाह्य सत्ता इस समय सर्वथा नहीं है ऐसी भूत-वस्तु या भविष्य वस्तु या कितनी ही विचारणीय वस्तुयें जिनका कोई व्यक्ति विशेष नहीं है ये सव कल्पना ग्रच्छी तरह विचारे जा सकते हैं कल्पना में एक प्रकार का उनका स्वरूप बनकर ज्ञान की मर्यादा बनती रहती है । उन स्वरूपों को कदापि कोई भी बहिर्जगत् नहीं कह सकता | बिना बहिर्जगत् के केवल अन्तर्जगत् की ही वहाँ सत्ता सिद्ध होती है ग्रतः बहिर्जगत् के अतिरिक्त अन्तर्जगत् की भी सत्ता मानना ग्रावश्यक है | ग्रथवा यों कहिये कि जितने श्राप बहिर्जगत् कह रहे हैं वे वास्तव में सब ग्रन्तर्जगत् हैं क्योंकि वहिर्जगत् के पदार्थ जबकि ज्ञान के बाहर हैं तो ज्ञान से उनका व्यवहार हो ही नहीं सकता; केवल अन्तर्जगत् के कारण कह कर कल्पना किये जा सकते हैं किन्तु जिनका मुझको ज्ञान है वे सब स्वरूप मेरे ज्ञान के अन्दर । सम्पूर्ण जगत् के पदार्थों का हमको ज्ञान है यतः वे सब हमारे ज्ञान के ग्रन्दर हैं इसीलिये वे सब अन्तर्जगत् हैं । आप यदि अपनी एक आँख की पुतली को अँगुली से जरा टेढ़ी करके देखें तो श्रापको दोनों ग्राँखों की गति भिन्न होने के कारण एक हाथी की जगह दो हाथी दीखेंगे । उन दोनों हाथियों में से बायाँ हाथी वांई ग्राँख के बन्द करने से और दाहिना हाथी दाहिनी ग्राँख के बन्द करने से लोप हो जाता है । उस जगह यदि उन दोनों हाथियों में से एक भी हाथी अपनी सच्ची सत्ता से स्वतन्त्र होता तो हमारे हजार बार ग्रॉस बन्द करने से भी ग्रहश्य नहीं होता । इससे जाना गया कि उन दोनों कि सत्ता मेरे ज्ञानाधीन । अतः उनको हम ग्रन्तर्जगत् कहते हैं । इस प्रकार ग्रन्त-जंगत् श्रर वहिर्जगत् इन दोनों की पृथक - पृथक सत्ता सिद्ध होती है । ११ - ज्ञानोपपादन सिद्धिसूत्र इस प्रकार अन्तर्जगत् और बहिर्जगत् इन दोनों की उत्पत्ति इसलिये भी श्रावश्यक होते हैं कि बिना इन दोनों के किसी ज्ञान का स्वरूप पृथक - पृथक बताई गई किन्तु ये दोनों संयोग से ही ज्ञान की उत्पत्ति होती है और वह सिद्ध नहीं होता, इन दोनों के इस प्रकार है-मैं जो जीबात्म हूँ वह ग्रनन्त करती है पृथ्वी, आकाश के प्रावरण में शक्तियों हर का एक घन है अर्थात् इस जगत् में जितनी शक्तियाँ काम उन सब शक्तियों का एक - एक बिन्दु एकत्र करके कही भी जिन शक्तियों से इस जगत् का चल रहा है मैं हूँ किन्तु उसमें सभी शक्तियां हर समय काम नहीं यदि करती कोई, स्वरूप कितनी बने तो वही मेरी श्रात्मा है और वही समय - समय पर बाह्य समग्री ही उनमें दबी हुई है ( सर्वथा ) जो की उत्तेजना पर कार्य करने सर्वथा उभरी हुई रहती लगती है किन्तु कितनी ही शक्तियाँ उसमें हैं उन उभरी हुई शक्तियों ही को की भिन्न शक्तियां हम इन्द्रियां कहते हैं मेरी आत्मा हैं जो ग्रात्मा के अतिरिक्त यह इन्द्रियां मिल कर नहीं रहती और न ग्रात्मा से इन्द्रियां जुल एक ग्रात्मा का स्वरूप बनता पृथक् होती हैं वे सब है । इस इन्द्रियपर जो कि आत्मा का एक भाग है बाहर [ ६४ ]

पृष्ठ 97

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 97 का मूल पृष्ठ
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# ब्रह्मविज्ञान के किसी पदार्थ का सूर्य यादि प्रकाश के द्वारा योग होने पर उस बाहरी कुछ कुछ ग्रंश ग्रापस में मिलकर दोनों के विकार से एक नई चीज पदार्थ का और इस इन्द्रिय का आदि का ज्ञान कहते हैं । इन दोनों में रूप, रस आदि का जो भिन्न बन भाव जाती है उसी को रूप, रस, गन्ध का ग्रंश है और जो उनका प्रकाश हमारी ग्रात्मा में कुछ मालूम मिलता है वह बाह्य पदार्थों दोनों में से यदि एक भी हटा दिया जाय तो किसी भी ज्ञान का कोई होता भी स्वरूप है वही कदापि इन्द्रिय नहीं का अंश हैं । इन बनेगा । हम देखते हैं कि तेल में कोई भी दोष होने से दीपक की ज्योति फीकी और धुंधली हो ठीक से उसी प्रकार बाह्य पदार्थ में यदि ग्रन्थकार, सूक्ष्मता आदि कोई दोष मिला हुआ रहे तो उसके जाती संसर्ग है उत्पन्न हुआ ज्ञान फीका और धुंधला होता है अतः उसको संशय या भ्रम कहा करते हैं। एक बात और भी ध्यान देने योग्य है कि इस ज्ञान में कुछ वाह्य पदार्थों का अंश भी सम्मिलित होता है इसी कारण हमारा ज्ञान जो मेरी श्रात्मा में होता है उसमें भी बैठे हुए भासते हैं मेरे ज्ञान के भीतर रहनेपर भी जो उन वस्तुओं में बाह्यपन हमें भासता है वह बाहर से पदार्थ का अंश आने के कारण से ही होता है | यदि बहिर्जगत् नहीं होता तो बाह्य पदार्थों का अंश कोई भी ज्ञान में सम्मिलित नहीं होता । उस समय मेरा ज्ञान गैरी ही ग्रात्मा के आधार पर होना माना जायगा तो ऐसी स्थिति में हमारे ज्ञान के अन्दर प्रतीत हुई चीजों का जो बाह्य किसी देश काल से सम्बन्ध मालूम होता है वह निर्मूल हो जाता है ग्रतः हमारे इस ज्ञान में अन्तर्जगत् और बहिर्जगत् दोनों की श्रावश्यकता स्पष्ट है । इस प्रकार ज्ञानोत्पत्ति की व्यवस्था मानी जाती है किन्तु इसमें बहुतों की विप्रतिपत्ति है । वे कहते हैं कि किसी ज्ञान में भी बाहर के पदार्थ का कुछ भी अंश सम्मिलित नहीं होता ह जहाँ परएक वस्तु को सहस्रों प्राणी देखते हैं तहाँ उन सहस्रों ज्ञानों में उस वस्तु के सम्मिलित होने से वह वस्तुअवश्य ही कुछ न्यून हो जाती किन्तु ऐसा नहीं होता, इससे ज्ञात होता है कि वह बाह्य वस्तु मेरी इन्द्रियों ज्ञान पर केवल ग्राघात करता है उसी से मेरी इन्द्रियों का स्वरूप बदल जाता है उसी को हम कहते हैं । जिस प्रकार जल में के से लहरें उत्पन्न हो जाती हैं किन्तु वे लहरें केवल जल वायु आघात ही का विकार है उसमें नहीं होता इसी प्रकार भी जानो । जो काला-पीला वायु का अंश सम्मिलित यह रंग हमारे मेरा ही रंग में बदल गया ज्ञान में भासता है वह वस्तु का अंश नहीं बल्कि ज्ञान उस है ग्रतःकहना होगा कि केवल इन्द्रियों के विकार होते हुए सभी ज्ञान मेरे आत्मा ही का विकार है । किन्तु फिर भी उसमें मेरे ज्ञान में भासती हुई चीजों में जो बाह्य प्रदेश का सम्बन्ध पाया जाता है बाहर के पदार्थ का ग्रंश सम्मिलित होना कारा नहीं है किन्तु बाहर से आते हुए वस्तुओं का जो आघात पहुंचता है उसमें विशेषता जाती है उसी से ऐसा बाह्यपन का प्रतीत समीपता और दूरी के कारण कुछ ग्रा होना इन्द्रियों का स्वभाव हैं । वास्तव इसी तरह भ्रम या संशय होने में बाह्य वस्तुओंों के अंश का क्षेष कारण बताया गया है किन्तु में वह ग्राघात की बरातल पर पूर्ण रीति मे प्राघात पहुंचे तो इन्द्रिय का का दोन है । यदि इन्द्रियों परिणाम किन्तु ग्राघात में कमी होने से परिणाम ठीक पूर्ण रीति से होगा और ज्ञान भी स्वच्छ होगा न होकर ज्ञानअधुरा रह जाता है । [ ६५ ]

पृष्ठ 98

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* ब्रह्मविज्ञान * इस प्रकार ज्ञानोत्पत्ति की दो व्यवस्था है- एक में हमारी इन्द्रिय के अंश के साथ बाह्य वस्तु के श्रंश का मिल कर ज्ञान होना कहा गया है । और दूसरे मत में बाह्य वस्तु के कुछ भी न मिल कर केवल उनके ग्रामात मात्र से इन्द्रिय के ग्रंश का विकार होना ही ज्ञान का होना कहा गया है । यद्यपि इस मत में ज्ञान होने में बाह्य वस्तु के कुछ अंश की भी आवश्यकता नहीं होती है तो भी केवल श्राघात पहुंचाने ही के लिए बाह्य वस्तु की सत्ता माननी पड़ती है । नात्पर्य यह है कि चाहे कोई मन हो, सब मतों से ज्ञान की उत्पत्ति में बाहर की वस्तु की सत्ता और आत्मा की सत्ता इन दोनों की आव-श्यकता है । इस प्रत्येक ज्ञान से बहिर्जगत् की सत्ता सिद्ध होती है । प्रत्येक ज्ञान का विषय तीन प्रकार का है - १. मौलिक, २. माण्डलिक, ३. प्रात्ययिक । मौलिक, जगह रोकने वाला और भौतिक है । किन्तु उसी मौलिक के चारों ओर उसी के समान श्राकृति वाले ऋक् मण्डल रूप की कोई ग्रहष्ट प्रतिकृति ( image ) दूर तक फैली हुई है जो ग्रांख पर आने से काच के समान प्रतिविम्वत होती है वही माण्डलिक है यह भी भौतिक है किन्तु स्थान नहीं रोकता ग्रतः इसको प्राणमय कहते हैं । यह मौलिक से लेकर ग्रां तक रहता है किन्तु ग्रांख से मरतक तक एक तीसरा मनोमय विषय पैदा होता है उसको प्रात्ययिक या मानस कहते हैं मौलिक एक है किन्तु प्राणमय और मनोमय रूप श्रनन्त हैं । मनोमय का सम्बन्ध ग्रन्तर्जगत् से और भूतमय श्रीर प्राणमय का बहिर्जगत् से है । यदि बाहर कोई वस्तु नहीं रहती है तो मेरे चाहने पर भी किसी वस्तु की सत्ता बाहर नहीं होने पाती इससे ज्ञात हुआ कि बाह्य सत्ता मेरे ज्ञानाधीन नहीं है । इस लिए कोई स्वतन्त्र बहिर्जगत् मानना आवश्यक हुआ बाहर किसी वस्तु के रहने पर जिस प्रकार मुझको उस स्थान पर उसका ज्ञान होता है उसी प्रकार जगत् के प्रत्येक मनुष्य को उस वस्तु का ज्ञान उसी स्थान पर हुआ करता है । इसलिए भी बहिर्जगत् की स्वतन्त्र सत्ता माननी पड़ती है और उसी के प्राचीन ही मेरे ज्ञान का होना पाया जाता है । इतना होने पर भी हम कह सकते हैं कि जो वस्तु बहिर्जगत् के रूप में बाहर है वही मेरे ज्ञान के अन्दर भी भासता है यह बात कदापि नहीं है क्योंकि इस ज्ञान के अन्दर वाले पदार्थ में लेश मात्र भी गुरुता नहीं है और बाहर में है, इससे सिद्ध हुया कि बहिर्जगत् के साथ हमारी ग्रात्मा का इन्द्रियों के द्वारा संयोग होने पर उसी वस्तु के रूप में हमारी ग्रात्मा का परिणाम होता है और वही परिणाम चिरकाल तक मेरी आत्मा में स्थिर रहता उसी को हम ग्रन्तर्जगत् कहते हैं । इस प्रकार ग्रन्तर्जगत् और बहिर्जगत् ग्रवश्य ही पृथक् पृथक् मानने पड़ते हैं । यहाँ एक बात और भी जान लेना आवश्यक है कि वहिर्जगत् का पदार्थ सूर्य किरणों द्वारा हमारी ग्रात्मा के ज्ञान धरातल में ग्राकर जितना ग्राघात करता है उतने ही ग्रंश का ज्ञान होता है । इन्द्रिय रूप के उस ज्ञान धरातल पर जो ग्रश नहीं ग्राता है अथवा ग्राकर हट जाता है उसका ज्ञान नहीं हो सकता । इस ज्ञान धरातल पर उसका ग्राघात जैसा होता है ठीक उसका चिन्ह उस आत्मा के ज्ञान पर बन जाता है वह संस्कार ( अतिशयाधान, बनावट ) कहलाता है और उसी के द्वारा पश्चात स्मरण हुआ करता है । ग्राधात अधिक होने से अधिक से अधिक ज्ञान होता है तात्पर्य यह है कि स्पर्श के तारम्य तैं ज्ञान उत्पन्न होने में भी तारतम्य हुग्रा करता है । [ ६६ ]

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ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 99 का मूल पृष्ठ
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* ब्रह्मविज्ञान यहां पर कितने ही ग्राक्षेप किया करते हैं कि यह ग्रात्मा या ज्ञान कमल पत्रवत् निर्लेप हैं चोर असंग हैं ग्रतः बाह्य वस्तुयों का ग्रात्मा या ज्ञान पर ग्राकर ग्राघात करना और प्राघात से चिन्ह होना दोनों ग्रसत्य हैं । किन्तु इस पर हम कहेंगे कि ग्रात्मा या ज्ञान अवश्य ही निर्लेप या ग्रसङ्ग है किन्तु इसका यह है कि जिस प्रकार जल और वायु मरकर एक नई वस्तु फेन पैदा होता है उसी प्रकार यह ज्ञान किसी के साथ इस प्रकार मिले कि मर कर नई वस्तु पैदा करे ऐसा सङ्ग उसमें नहीं होता । किन्तु जब हम प्रत्यक्ष देखते हैं | कि हर्ष, शोक होने का प्रभाव हमारे ज्ञान पर पड़ता है और ज्ञान संकुचित गौर विकसित होता है और इस संकोच, विकास का कारण बाह्य वस्तु का संयोग ही कहा जाता है तो हम अवश्य कहेंगे कि बाहर की वस्तु का श्राघात ग्रात्मा या ज्ञान पर ग्रवश्य पड़ता है किन्तु वह बाह्य वस्तु उस ग्रात्मा के स्वरूप के अन्दर घुस नहीं जाता । इतने इतने ही से उसको निर्लेप या प्रसङ्ग कह सकेंगे । एक बात और जानना चाहिये कि इस ग्रात्मा या ज्ञान पर बाह्य वस्तु का ग्रामात ग्रात्मा के अंशों को व्याप्त करके नहीं होता किन्तु किसी न किसी प्रदेश में संयोग होकर उतने ही ज्ञान के प्रदेश में उस वस्तु का ज्ञान प्रकट होता है यद्यपि श्रात्मा प्रकाश को ही हम ज्ञान कहते हैं इसलिये ग्रात्मा ज्ञानमय है किन्तु यहाँ ज्ञान से अभिप्राय अर्थ - ज्ञान से है । जबकि ग्रात्मा किसी वस्तु के रूप में परिणत होता है तो उसी को वस्तु ज्ञान कहते हैं । ग्रतः श्रात्मा के जितने श्रंश से किसी वस्तु का प्रकाश हो रहा है वही भाग ज्ञान है | इसके अतिरिक्त जितने आत्मा के प्रांश शेष हैं वे उस समय किसी भी वस्तु का ज्ञान नहीं करा रहे हैं । इसलिये उस अवस्था को हम ग्रज्ञान कहेंगे । प्रत्येक वस्तु के ज्ञान के समय ग्रात्मा का बहुत अल्प यश वस्तु के रूप में परिणत होकर ज्ञान का रूप धारण करता है और शेप अधिक अंश अज्ञान के रूप में रहता है अतः प्रत्येक समय ज्ञान का अंश चारों ओर अधिक ज्ञान के अंश से घिरा रहता है इस कारण यह जीवात्मा सर्वज्ञ नहीं कहलाता और अज्ञान की मात्रा अधिक रहने के कारण दुःख और भय की मात्रा जीवात्मा में अधिक रहा करती है अतः गीता में भगवान् ने कहा है: -अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः यह बहुत ठीक है क्योंकि यह मेरी ग्रात्मा जो इस शरीर में इन्द्र है वह अपने इन्द्रियवर्गों के द्वारा ही ग्रर्थवर्ग का स्पर्श करती है । बिना इन्द्रियों के किसी अर्थ से साक्षात् सम्बन्ध नहीं करता । किन्तु ये इन्द्रियाँ सभी सत्र ग्रंथों को स्पर्श करने की क्षमता या योग्यता नहीं रखती । इसलिये किसी विशेष इन्द्रिय से भी ज्ञान करते समय किसी विषय का ज्ञान ग्रात्मा को होता है किन्तु उसके अतिरिक्त किसी भी अन्य वस्तु का ज्ञान उस समय नहीं होता इसी से यह श्रात्मा अल्पज्ञ कहा जाता है । परन्तु इसकी यह ज्ञान योग्यता अभ्यास से बढ़ाई जा सकती है । यदि विद्या के द्वारा अथवा योगाभ्यास ग्रादि तपश्चर्या के द्वारा उस ग्रात्मा की शक्ति बढ़ाई जावे तो शनैः शनैः बढ़कर संभव है कि अनेक जन्म के पश्चात् यह जीव सर्वज्ञ होकर ईश्वर हो जाय । श्रतः गीता में कहा है: -बहुनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् मां प्रपद्यते । अनेक जन्मसंसिद्धस्ततो याति परांगतिम् ॥ ६७ ]

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ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 100 का मूल पृष्ठ
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* ब्रह्मविज्ञान एक वात औौर जाननी चाहिये कि इस जगत् की बाह्य कामनायों का त्याग करता हुआ यदि कोई अपनी ही ग्रात्मा की कामना रखता हुग्रा ग्रन्तर्मुख वृत्ति करे तो वह जिस प्रकार बाह्य पदार्थों को जान लेता था उसी प्रकार ग्रव वह ग्रपनी ग्रात्मा को ग्रन्तर दृष्टि से देखता हुआ जान लेता है । यदि यह ज्ञान उसको पूर्ण हो जावे तो वह केवल ग्रात्मज्ञान से संपूर्ण जगत् का ज्ञानी हो जाता है क्योंकि ऊपर कहा जा चुका है कि जगत की संपूर्ण शक्तियों का घन मेरी ग्रात्मा है अतः आत्मा का ज्ञान ही संपूर्ण जगत् का जानना है और यही जानना सर्वज्ञ ईश्वर का लक्षण है, अतः जो योगिराज वाह्य कामनाओं को त्याग कर ग्रात्मा की कामना करते हैं उनको अन्त में संपूर्ण जगत् की प्राप्ति अपने ग्राप हो जाती है श्रोर ग्रन्तर और बाह्य जगत् एक हो जाता है किन्तु जब तक जीवात्मा और ईश्वर का भेद है तब तक दोनों जगत् अवश्य पृथक - पृथक रहते हैं ।

पराञ्चि खानि व्यतृरणत्स्वयंभू स्तस्मात्पराङ पश्यति नान्तरात्मन् ।

कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १ ॥

ज्ञानोत्पादनसूत्र का सारांश ( कठोपनिषद् - २1१ ) ग्रन्तर्जगत् श्रौर बहिर्जगत् मनुष्य ज्ञान के प्रधान कारण हैं, इनमें जैसे बहिर्जगत् प्रन्तर्जगत् का कारण है वैसे ही अन्तर्जगत ज्ञान उत्पन्न करने का कारण है । देखिये - ग्रनन्तशक्तियों के घन या समूह का नाम जीव या ' मैं ' हूँ अथवा जीवात्मा या ग्रहम् ग्रनन्तशक्ति - सम्पन्न । इन शक्तियों में से कितनी ही उद्भूत और कितनी ही तिरोहित रूप में रहती है । तिरोहित का उत्तेजना पर विकास होता है किन्तु कितनी ही सदा जन्म से मृत्यु तक उद्भूत रहती हैं । ये उद्भूत शक्तियाँ तीन हैं १ ज्ञानशक्ति, २ क्रियाशक्ति, ३ अर्थ या द्रव्यशक्ति । मूल ज्ञानशक्ति से पश्च ज्ञानशक्ति शाखाएं हुई जो ज्ञानेन्द्रिय कहलाती हैं । ऐसे मूल क्रिया - शक्ति से पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं और अर्थशक्ति से सब शरीर स्थित हुआ, जीवात्मा की उद्भूत शक्तियों में से ५ ज्ञानेन्द्रियाँ ही बहिर्जगत् के द्वार हैं विचारिये कि जगत् के पञ्च महाभूतों की सूक्ष्म मात्रात्रों रूप, रस, गन्धादि का सूर्य वायु यादि के द्वारा जब ज्ञानेन्द्रिय पर योग होता है तब इन दोनों के अंश से एक नई विकारी वस्तु पैदा हो जाती है इसी का नाम रूप - रसादि का ज्ञान होना कहते हैं । इस ज्ञान II में रूप, रसादि की भिन्नता तो बाह्य भौतिक वस्तु है और इस भिन्नता का भास कराने वाला प्राति-भासिक इन्द्रियज्ञान है । इस भौतिक भिन्न भाव का श्रंश और प्रातिभासिक इन्द्रिय ग्रंश दोनों ग्रंशो के योग से ही किसी ज्ञान का स्वरूप संभव है । एक के प्रभाव से ज्ञान का स्वरूप संभव नहीं । देखिये कि इस बाह्य और ग्रन्तर के योग से ज्ञान का स्वरूप पैदा करने में परस्पर इतना घनिष्ठ सम्बन्ध है कि बाह्य पदार्थ मूक्ष्म या तम से प्राच्छादित होने के दोष से ग्रस्पष्ट भान होता है । ऐसे ही इन्द्रिय ज्ञान में ' भी दोष होने से बहिर पदार्थ का स्पष्ट भान नहीं होता । इसी से इस अस्पष्ट भासने को ही संशय या भ्रम कहते हैं | यह भ्रम कदापि नहीं होता यदि इन दोनों का परस्पर सम्बन्ध न होता । ज्ञान में ग्रन्दर ग्रोर बाहर का भेद मालूम होने से स्पष्ट विदित है कि ग्रन्तर और बाह्य जगत् का श्रंश ज्ञान में बाहर से अवश्य आया है जिससे कि यह भेद मालूम हुआ करता है बाह्यपन बाहर से और ग्रन्तरपन अन्दर से उत्पन्न होकर बाह्य और अन्तर का भेद बताते हैं । यदि ऐसा न होता तो ज्ञान के ही ग्राधार पर रह [ ६८ 1