ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 111–120
ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 111–120
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* ब्रह्मविज्ञान * भी अपने ज्ञानमण्डल में सर्वदा बहिर्जगत् को बनाकर अपने में रखता है और अपने ही में लय करता है । तात्पर्य यह है कि इन दोनों बातों में जीव की और ईश्वर की समानता देखी जाती है किन्तु इन दोनों में बड़ा भारी अन्तर यह है कि जीव सर्वदा अपनी स्थिति के लिये किसी कोष की श्रावश्यकता रखता है किन्तु ईश्वर को किसी कोष की आवश्यकता नहीं । जीव के कोष इस प्रकार है - १ इन्द्रियवर्ग २ अर्थवर्ग, ३ मन और ४ बुद्धि । इन ४ तहों के अन्दर ' ग्रहम् ' की मात्रा विहार करती है । इस प्रकार जीव चतुष्कांप के बिना कदापि नहीं रहता । हमारा जीवात्मा ज्ञानमय है | ज्ञान का विकास इन्द्रियों द्वारा होता है । हम देखते हैं कि किसी इन्द्रिय के द्वारा जो कुछ अनुभव होता है वह भिन्न - भिन्न होने पर भी उसका अभिमान एक ही आत्मा अर्थात् मुझको होता है । देखती ग्राँख है, सुनता कान है इन दोनों के कार्य में दूसरे का कुछ भी सम्बन्ध नही है तथापि हम अभिमान करते हैं कि मैंने देखा, मैंने सुना ग्रतः निश्चित है कि देखने का फल या सुनने का फल दोनों एक ही केन्द्र में जाकर उसी का अंश बनते हैं वही मेरी ग्रात्मा है । यह तब ही हो सकता है कि यदि सभी इन्द्रियों का उसी एक केन्द्र से सम्बन्ध माना जात्रे यह उस केन्द्ररूप श्रात्मा का सबसे बाहरी कोश है किन्तु इसके अन्दर दूसरा अर्थ कोश है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये ५ ही भूतमात्रा है । ये पाँचों ही थोड़े बहुत अत्यन्त सूक्ष्म बीज रूप से ग्रात्मा में वर्तमान रहते हैं । जिस आत्मा में कदाचित् इनका कोई अंश न रहे या किसी श्रापात से पश्चात नष्ट हो जावे तो उस मात्रा का ज्ञान इन्द्रियों के द्वारा सिद्ध नहीं होता । कितने ही मनुष्य को लाल रंग बिल्कुल नहीं दीखता और किसी को किसी रंग का बोध नहीं होता तो यह रूपमात्रा के न होने के कारण से है । किसी के सिर में चोट लगने के कारण प्राचीन ज्ञान का कुछ भी स्मरण नहीं रहता अतः जाना गया है कि इन्द्रियों के द्वारा जो रूप हमारे चक्षु में ग्राते हैं वह इन्द्रिय के अन्दर वाले स्थायी रूप से संसर्ग करते हैं तब आत्मा के केन्द्र में पहुँच सकते हैं । यदि यह कोश न होता तो उस व्यक्ति को भी बाहर से रूप देखने पर उस रूप का ज्ञान आत्मा को अवश्य हो जाता । अतः इन्द्रिय कोश के भीतर अर्थकोश का मानना आवश्यक हुआ । अव इस कोश के भीतर मनकोश की सत्ता है क्योंकि यदि मन किसी दूसरी योर लगा हुय्रा रहे तो आँख के सामने श्राती हुई वस्तु का भी ज्ञान नहीं होता इससे जाना गया कि वाह्य पदार्थों का ज्ञान मन में पहुँच कर आत्मा में पहुँचता है, मन यदि न पहुँचे तो आत्मा के केन्द्र में न वह पहुँचने पाता है और न श्रात्मा को उसका ज्ञान होता है किन्तु मन, इन्द्रिय ग्रर्थं को पकड़ कर अपना कार्य आरम्भ करता है यतः मन का तीसरा कोश है । इसके भी अन्दर बुद्धिकोश है क्योंकि हम देखते हैं कि एक ही बात १० मनुष्यों को सुनाई जाती है, गुरु का उप-देश है किन्तु उससे भिन्न - भिन्न मनुष्यों को भिन्न - भिन्न रूप एक ही भाव एक ही रूप से होता से ज्ञान उत्पन्न होता है | इसका कारण उन सब में बुद्धि का भेद है । जो अधिक बुद्धिमान होता है उसका मन शीघ्रता से यथार्थ अर्थ को ग्रहण करता है और स्थूल बुद्धि के मनुष्य का मन अधि-कतर प्रयत्न करने पर भी यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने में भी समर्थ नहीं होता । ग्रतः जाना जाता है कि यह मन बुद्धि के आधार पर चलता है और उसी के अनुसार ग्रात्मा में ज्ञान उत्पन्न करता जितना है । बुद्धि एक प्रकार का ज्ञान है और ग्रात्मा भी ज्ञान स्वरूप है अतः इन्द्रिय में बुद्धि तक जो [ ७६ ]
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# प्रत्यविज्ञान: * आत्मा के समीप ग्राता जाता है उसमें प्रकाश की मात्रा बढ़ती जाती है । बुद्धि ग्रात्मा के ग्रत्भन्त समीप है इन दोनों के भीतर किसी दूसरे का व्यववान ( रोक ) नहीं है ग्रतः दोनों के स्वरूप एक ही प्रकार से हैं अर्थात् ज्ञानमय है । इनमें ग्रन्तर उतना है कि बुद्धि नाम का ज्ञान सर्वदा विषयक है अर्थात् किसी विषय को पकड़े हुए ज्ञान का स्वरूप धारण करता है किन्तु ग्रात्मा ज्ञान विशुद्ध निर्विषयक है वह जिस बुद्धि की ओर होता है उसी बुद्धि का विषय ग्रात्मा का विषय वन जाता है । बुद्धि हमारी सीमाबद्ध है, बाल्यकाल से लेकर आज तक शिक्षा के द्वारा जितनी बुद्धि हमने उगा-जित की है उतनी ही मेरे पास है किन्तु मैं वह जानरूप आत्मा हूँ कि जिसने इन बुद्धियों का का संग्रह किया है, करता है और करेगा । उसी के प्रकाश से बुद्धि, मन, अर्थ श्रीर इन्द्रिय में चारों जड़ होने पर भी प्रकाशमान् दीखते हैं, इन चारों में ग्रात्मा बँधा हुआ रहता है और इनके साथ ही शरीर छोड़ने पर जाता है अतः ये चारों आत्मा के कोप कहलाते हैं अतः भगवान्
का वचन है: -इन्द्रियेभ्यः पराह्यर्था प्रर्थेभ्यश्च परं मनः ।
मनसस्तु पराबुद्धिर्योबुद्धेः परतस्तु सः ॥
अर्थात् — इन्द्रियों से परे ग्रर्थ याने विषय हैं और उनसे परे मन है, मनसे परे बुद्धि है और बुद्धि से भगत पाएँ यह ग्रंव्ययात्मा है । बुद्धि, मन, अर्थ और इन्द्रिय ये चारों आत्मा के साथ इस प्रकार दृढ़ बन्धन से बंधे हैं कि इनमें एक के श्नाने से चारों ही प्रकट होते हैं और एक के नाश होने से सब नष्ट हो जाते हैं । अतः किसी का यह मत कि पशुओं में न श्रात्मा है, न बुद्धि है और न मन है सर्वथा भ्रम मूलक ज्ञात होता है क्योंकि इनमें काले - पीले रूपों का भी ज्ञान पाया जाता है और साथ ही इनमें मन भी है क्योंकि इनमें विचार शक्ति भी पाई जाती है । चारा घास नित्य देने वाले को ये शान्ति और प्रेम की दृष्टि से देखते हैं, किन्तु अस्त्र शस्त्रधारी को तथा हिंसक जीवों को देख कर भागते हैं, कोई अद्भुत वस्तु को देख कर ग्रकस्मात् चमक पड़ते हैं औौर बड़े प्रातङ्क तथा विचार की दृष्टि से देखने लगते हैं । ये सब इनमें मन के होने का प्रमाण है । बुद्धि भी इनमें पाई जाती | बहुत से पशु - पक्षी ऐसे हैं जिनको शिक्षा क्रम पर लाने से लगभग मनुष्य के सदृश शिक्षित होकर कार्य करने लगते हैं । शिक्षा का ग्रहण करना तथा उससे संस्कार, का उत्पन्न होना किसी विद्या से आत्मा का सम्वन्ध होना वुद्धि का काम है । और जब इस प्रकार वाह्य सामग्री उपस्थित है तो इनको एक सूत्र में बाँधने वाला इन चारों का श्राश्रय एक अवश्य होना चाहिए, आत्मा है | इस प्रकार पांचों धर्म मनुष्यों के अनुसार पशु, पक्षी, कोट आदि सब जीवों में ग्रवश्य हैं किन्तु यह कहना अनुचित न होगा कि मनुष्य की अपेक्षा इन ४ की मात्रा न्यूनाधिक रहती है, किन्तु सर्वथा न होने का अभिमान करना मिथ्या है । ग्रतः जीव मात्र में चारों कोश अवश्य ही सर्वत्र पाये जाते हैं किन्तु ईश्वर में इनका एक भी नहीं होता क्योंकि वह असीम है अतः दूसरे से उसका बन्धन नहीं हो सकता । परमेश्वर में न बुद्धि है, न मन है और न इन्द्रियाँ हैं किन्तु इनकी अनुपस्थिति में भी इनके कार्यों की हानि परमेश्वर में नहीं है । वह [ ८० ]
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* ब्रह्मविज्ञान वस्तु के उत्पन्न करने में इस प्रकार स्वतन्त्र है कि विशेष इन्द्रिय न होने पर भी अपने शरीर के प्रत्येक स्थान से देखता है, सुनता है, विचारता है, समझता है—
पाणिपादो जवनोग्रहीता, पश्यत्य चक्षुः स शृणोत्यकर्णः ।
स वेत्ति वेद्यम् न च तस्य वेत्ता, प्राहुस्तमग्रचम् पुरुषं पुराणम् ॥
ग्रर्थात् — जिसके हाथ और पैर नही हैं किन्तु वेग वाला है, पकड़ने वाला है और जिसके नेत्र नहीं हैं किन्तु देखता है जिसके कान नहीं है किन्तु सुनता है और वह सब को जानता है किन्तु स्वयं जाना नहीं जाता, उसको ग्रादि परम पुरुष कहते हैं । जीव की विचार शक्ति में दोग आ सकता है, कमी हो सकती है, गलती हो सकती है किन्तु ईश्वर का विचार निर्दोग और सदा एकरूप में रहने वाला होता है । ग्रतः जीव के इन्द्रिय, मन, बुद्धि परिछिन है उसकी अपेक्षा ग्रपरिमित बुद्धि, विचार और इन्द्रियज्ञान रखने वाले ईश्वर में अवश्य विशे-पता पाई जाती है | यहाँ पर एक बात कहना और आवश्यक है कि जिस प्रकार मनुष्य में इन्द्रियों के द्वारा कभी ग्रंथों का ज्ञान होता है और कभी नहीं होता और मन भी उस अर्थ का निश्चय करने के लिए नया व्यापार ग्रारम्भ करता है किन्तु ईश्वर में इन्द्रिय या मन के द्वारा किसी ज्ञान का नवीन तौर से प्रारम्भ नहीं होता । सृष्टि के ग्रादिकाल से अन्तकाल तक जिस पदार्थ को परमेश्वर ने जैसा जान लिया है वह पदार्थ वैसा ही हो गया और वैसा ही रहेगा । परमेश्वर का ज्ञान ही वस्तु की सत्ता है । उसकी कोई भी वस्तु न जानी हुई नहीं है अतः जानने के लिए नया व्यापार नहीं करता । यह भी जीव से ईश्वर में वैधर्म्य है । जीव के लिए जगत् में कितने ही पदार्थों का त्याग या ग्रहण करना आवश्यक होता है । बिना त्याग या बिना ग्रहण किये ग्रात्मा की हानि होने की सम्भावना हो जाती है । किन्तु परमेश्वर इस प्रकार परिपूर्णरूप है कि वह किसी वस्तु को त्याग नहीं सकता और न अपने से अलग कर सकता और न उसको कोई वस्तु प्राप्य है कि जिसकी प्राप्ति के लिए वह यत्न करे किन्तु इतना होने पर भी बिना किसी ग्रावश्यकता के ज्ञान क्रिया रूप होने के कारण सर्वदा जानता और करता रहता है अतः गीता में लिखा है
न से पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन ।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एवच कर्मरिण ॥
( गी ० ३।२२ ) अर्थात् – हे अर्जुन! यद्यपि तीनों लोकों में मेरा कुछ कर्तव्य नहीं है और न कोई पदार्थ ऐसा है कि जो मुझको प्राप्त नहीं होकर ग्रव पाने योग्य हो तथापि मैं कर्म करने में प्रवृत हूं | संसार में जितने अर्थ हैं वे स्वभावतः परिवर्तनशील हैं । उनके रूपों का परिवर्तन होने पर जीव की अवस्था का परिवर्तन होना स्वभावसिद्ध है । अवस्था परिवर्तन से अथवा जीवों के ग्रथों के परिवर्तन [ ८१ ]
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* ब्रह्मविज्ञान जीव प्रतिक्षण नाशवान् होने पर भी उनके से जीव का ही परिवर्तन कहा जा सकता है । इस प्रकार रहने से जीवों को संख्या में अनन्त कह सकते हैं श्रर्थों की उत्पत्ति या नाश का चिरकाल तक संख्या अनुवर्तन में एक है । जीव विनश्वर है और ईश्वर अविनश्वर है । किन्तु इनके बिरुद्ध ईश्वर अविनाशी और है । जीव परिवर्तनशील है और ईश्वर अपरिवर्तनीय से बना हुआ यदि स्वरूप की ग्रोर विचारें तो जीव का स्वरूप त्रिवृत् ग्रर्थात् तीन सामग्रियों X + है — उक्थ, अर्क और ग्रशीति । जिस प्रकार प्रकाशमय सूर्य का विम्ब प्रकाश के मध्य में पृथ्वी है और, मङ्गल उसके, चारों ग्रौर प्रकाशमण्डल उस विम्ब से वृद्ध है और उस प्रकाशमण्डल की सीमा के अन्दर तीनों में बीच शनि, वृहस्पति ग्रादि नाना प्रकार के पिण्ड उस प्रकाश के ग्राधीन विद्यमान हैं तो इन पिण्डों को } | ' वाले बिम्ब को ' उक्थ ' कहेंगे और प्रकाश मण्डल को ' अर्क ' तथा उसके अन्तर्गत पृथ्वी यादि उसकी ' प्रणीति ' कद्ध मकते हैं । इसी प्रकार जीव का भी स्वरूप समझना चाहिये । ज्ञानमय जीव के मध्य में जो एक चमकता हुआ विन्दु है उसको ' उक्थ ' कहते हैं किन्तु उसके ग्राधार से विद्यमान ज्ञान मण्डल को उसका ‘ अर्क ' कहते हैं और उस मण्डल के ग्रन्तर्गत जो नाना जगत् के रूप भासते 1 ) | उस मण्डल की ‘ अशीति ' है । अशीति से मतलव अन्न से है कि जिसके द्वारा ग्रात्मा का अंश बनता रहता है । यह निश्चित हो चुका है कि शनि ग्रादि पिण्डों से सूर्य सर्वदा रस चूसता रहता है । इसी प्रकार यह ग्रात्मा भी अपने ग्रन्तर्जगत् से रस लिया करता है । जिस प्रकार पृथ्वी प्रादि पिण्डों के न होने पर उन पिण्डों के चारों ओर वायुमण्डल भी न रहेगा तो सम्भव है कि इन्हीं वायुमण्डलों के ग्राघात या घर्षणा से उत्पन्न होता हुआ सूर्य का प्रकाश भी नहीं होगा प्रकाश के प्रकाशित न होने से न होने के बराबर होगा । इसी प्रकार ग्रन्तर्जगत् वाले न होने विषयों पर से रहता ही हुआ ज्ञान सूर्य का रूप भी बनता है । यदि कदाचित् एक भी विषय ज्ञान में न श्राये तो न ज्ञान का स्वरूप ही नहीं बनेगा । ज्ञान का प्रकाश होने पर जीव की मता भी होकर अन्तर्जगत् न होने के बराबर होगी । ग्रतः पृथ्वी ग्रादि पिण्डों के सदृश्य के रूप भी ग्रशीति कहे होकर जा सकते हैं । ग्रशीति का यह भी अर्थ है कि जो किसी ग्रर्क में व्याप्त उसका ग्रन्न वने अर्थात् जिससे ग्रर्क की को स्वरूप सिद्धि हो । सब ही ग्रात्मा स्वभावतः अपने शरीर ज्यों का त्यों बनाये रखने के लिए हो कुछ न कुछ अन्न खाया करती हैं और वह ग्रन्न ग्रात्मा के ग्राधीन जाता है उसी को ग्रशीति कहते लिए हैं किन्तु अर्को वह वस्तु है कि जिसमें संग्रह करने के इन ग्रन्नों को है, इससे उत्पन्न होकर ग्रन्न केलिए अर्चना करता है अर्क कहते हैं | यह ग्रर्क जिससे, अर्थात् व्यापार करता है इसीसे उसको उठता है उसे ही प्रकाश उक्थ कहते हैं । जैसे ओर फैलता है ग्रतः वह उक्थ है और सूर्य के विम्व से उठ कर चारों को चारों ओर फैल रस कर ग्रन्न को पकड़ने के वाला और उस ग्रन्न नोट: -: - 8. उपथ - उत्थ= उठना । X ग्रर्क - प्रस्तुतिकरना प्रस्ताव । , करना, किसी उद्देश्य को कार्यक्षेत्र में लाना + ग्रशीति — ग्रश = भोजन करना; प्रशू - व्याप्त होना, फैलना । [ ८२ ]
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६ ब्रह्मविज्ञान २४ उक्थ तक पहुंचाने वाला प्रकाशमण्डल ही ग्रर्क है अथवा जीव का मध्य बिन्दु जिसको हम कहते हैं उसी से ज्ञानमण्डल उठ कर दूर २ तक विषय रूपी प्रश्नो को ग्रहण करके उक्थ अर्थात् ग्रात्मा तक पहुंचता है अतः ज्ञान अर्क है और वह ज्ञान जहाँ से उठता है वही आत्मा उक्थ है इसी प्रकार सूर्य के अनुसार जीवात्मा भी अपना त्रिवृत्रूप रखता है । यहाँ एक बात और भी जानना चाहिए कि सूर्यमण्डल में रहते हुए जितने पिण्ड हैं वे सव सूर्य सही बने हुए हैं इस विषय का किसी अन्य प्रकरण में विस्तार पूर्वक निर्णय किया गया है । इसी प्रकार यह अन्तर्जगत् भी जो ग्रात्मा के ज्ञान में बने हुए दीखते हैं वे श्रात्मा की इच्छा से बने हुए हैं । उनके वनन में इच्छा अर्थात् आत्मा का काम प्रधान कारण है क्योंकि जीव ग्रात्मा में मन, प्राण, वाक् ये भाग सदा बने रहते हैं उनमें सब से प्रथम मन से इच्छा करता है, पीछे प्रारण से यत्न करता है तत्प श्रात् वाक् अर्थात् भूत भाग में क्रिया उत्पन्न हो जाती है तो सिद्ध हुआ कि आत्मा से जो कुछ उत्पन्न, होता है उसमें प्रथम काम ही प्रधान कारण है अतः ज्ञान के अन्तर्जगत् जो कुछ जगत् का रूप दीखता है उसको काम कहते हैं | महर्षियों का मत है कि यह जीवात्मा काममय है अर्थात् चारों और कामों से व्याप्तहैं । सब काम जीवात्मा के रूप हैं और अन्न भी हैं ग्रतः निष्काम कर्म करते २ जबकि श्रात्मा से सब काम निवृत्त हो जाते हैं तो काम होने पर जीवात्मा का रूप ही नहीं रहता वह अपने मूलाधार ईश्वर के रूप में लीन हो जाता है । जिस प्रकार किसी कारण से पानी झाग के रूप में श्राता हैं और उस कारण के निवृत्त होने पर वह भाग अपने पानी के रूप में फिर या जाता है निवृत्त होने पर काम श्रात्मा ईश्वर हो जाता है और काम रूप ग्रन्न न मिलने से इसी प्रकार काम के फिर जीव का रूप नहीं बनने पाता अर्थात् जन्मादि बन्धन जो जीवात्मा के लक्षण हैं जिनके उत्पन्न होने का कारण काम है, काम के निवृत्त होने पर फिर जन्म बन्धन नहीं होता । इसी को मोक्ष कहते हैं । इस मोक्ष को क्षीणो-दर्क और इससे अतिरिक्त दूसरे मोक्ष को भुमादकं कहते हैं । यह सब धर्म जीव के हैं किन्तु ईश्वर में यह सब कुछ नहीं हैं । प्रथम उसके रूप में उक्थ, अर्क, अशीति का भेद नहीं है क्योंकि जीव में जो उवथ का भाग है वह प्रज्ञा अर्थात् बुद्धिरूप है उसी प्रज्ञा पर जो ईश्वर का रूप प्रतिविम्बित होता है उसी को चिदा-भास कहते हैं यही चिदाभास जीव कहलाता है । परन्तु यह प्रतिबिम्व ईश्वर में नहीं हो सकता क्योंकि ईश्वर से नरें कोई दूसरा ईश्वर नहीं है कि जिसके प्रतिबिम्व से ईश्वर बनता और अपना प्रतिविम्ब अपने पर नहीं पड़ता । अतः ईश्वर के रूप में उक्थ नहीं हो सकता । उक्थ के न रहने से ग्रर्क और अशीति भी नहीं हो सकते अतः जीव के अनुसार ईश्वर का त्रिवृत् रूप नहीं हैं यह दोनों में भेद सिद्ध हुआ । दूसरी बात यह है कि जीव को जिस प्रकार काममय कहा गया है उसी ही प्रकार ईश्वर भी काममय है किन्तु विशेषता यह है कि जीव का काम श्रनित्य है और सर्वदा राभी काम ज्ञान में रहते भी नहीं ग्रर्थात् उनका अविर्भाव, तिरोभाव होता रहता है और सभी काम उसमें उत्पन्न भी नहीं हो सकते क्योंकि वह अलपज्ञ भी हैं किन्तु ईश्वर के काम नित्य है और सर्वदा एक रूप हैं उनके कामों का तिरोभावनहीं होता और सर्वज्ञ होने के कारण सभी काम ज्ञान में एक साथ वर्तमान हैं जिसको कि जगत् कहते हैं । यदि ईश्वर अपने काम को भूलता तो जगत् ही नष्ट हो जाता । अतः कहना चाहिए कि वह सर्वदा प्राप्त काम है । काम के प्राप्ति होने से इच्छा की निवृत्ति हो जाती है अतः ईश्वर में इच्छा नहीं L ८३ ]
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ब्रह्मविज्ञान क मानी जा सकती । उसके सब काम इच्छा के ही सर्वदा परिपूर्ण रहते हैं अथवा किसी नियम के बद्ध रहते हैं अतः इच्छा न होने के कारण उस ग्राप्त काम को भी हम काम कह सकते हैं । यही जीव से ईश्वर में भेद है । सभी जीव अपने ज्ञानमण्डल के भीतर के जगत् को ग्रहण करते हैं और दूसरे जीव के ज्ञान मण्डल के भीतर वाले जगत् को कदापि ग्रहण नहीं करते । किन्तु ईश्वर के ज्ञान मण्डल में जो जगत् विद्यमान है उससे सभी जीवों का संपर्क होता है इससे भी ईश्वर को जीव से भिन्न कहते हैं । जीवों में जन्म - मृत्यु सुख - दुःख ग्रादि व्यवहारों का इस प्रकार भेद प्रतीत होता है कि जिससे जीवों का भेद स्पष्ट दीखता है किन्तु इस प्रकार का कोई भेद ईश्वर को अनेक मानने के लिए नहीं पाया जाता ग्रतः हम कह सकते हैं कि जीव अनेक हैं और ईश्वर एक है । सभी भूत ग्रात्मा में रहते हैं और सब भूतों में ग्रात्मा रहती है इस प्रकार आत्मा श्रीर भूत का परस्पर सम्बन्ध जीव और ईश्वर दोनों में बराबर है क्योंकि दोनों ही अपने अपने जगत् के साथ इसी सम्बन्ध रखते हैं । दोनों के ज्ञान मण्डल से उनके जगत् बनते हैं । वे जगत् उस ज्ञान से कदापि पृथक् नहीं रहते । ग्रतः कहा जा सकता है कि ज्ञान में जगत् है और जगत् में ज्ञान है । परन्तु इसके अतिरिक्त एक बड़ा अन्तर यह है कि जीवात्मा का अन्तर जगत् एक जीव का नहीं प्रत्युत अनन्तानन्त जीवों का पृथक् - पृथक् ग्रनन्तानन्त जगत् मण्डल सभी ईश्वर के ज्ञान मण्डल में सदा विद्यमान रहते हैं । यह ईश्वर जिस प्रकार अपने जगत् को अपने ज्ञान मण्डल में रखता है उसी ही प्रकार जीवों के ज्ञान मण्डलों को भी रखता है कारण यह है कि जड़ पदार्थों के अनुसार जीव विभाग भी ईश्वर के ज्ञानमण्डल का एक जगत् है जब सभी जीव ईश्वर के ज्ञानमण्डल के ग्रन्तर्जगत् हैं तो जीवों का अन्तर्जगत् कदापि ईश्वर के ज्ञान से बाहर नहीं रह सकता यतः हम कह सकते हैं कि यद्यपि जीव दूसरे जीव के ज्ञान विषय देखता तथापि ईश्वर सम्पूर्ण जीवों को अपने ज्ञान में रखता हुया उनकी चेष्टायें, उनका ज्ञान, उनके को नहीं मन का विषय यादि सभी को सर्वदा देखता रहता है अतः ईश्वर को साक्षी कहा जाता है । बहिर्जगत् जिस प्रकार का होता है उसके योग से ठीक उसी प्रकार की सृष्टि करती है जिस नाग - रूपवाले बहिर्जगत् से हमारी अन्तरात्मा मिलती है उस अन्तरात्मा अन्तर्जगत् की कल्पना में हुग्रा की हुई अन्तर्जगत् की वस्तु का भी वही रूप वही नाम उत्पन्न ( साबित ) होता है किन्तु कहीं कहीं हमारा अन्तरात्मा बाह्य के जगत् वाली वस्तु के सब धर्मों का सहन न करने के कारण अथवा वहिर्जगत् के विना ही नये पदार्थ की कल्पना करने के कारण कभी - कभी वहिर्जगत् के विरुद्ध भी ग्रन्तर्जगत् का लिया करता है उसको भ्रम या संशय कहते हैं । इसमें कुछ अँश तो बहिर्जगत् के अनुसार है और रूप बना रूप नया कल्पित रहता है ग्रतः इस को ज्ञान कहते हैं । कुछ किन्तु कहीं - कही हमारा अन्तरात्मा वहिर्जगत् के अनुसार ग्रन्तर्जगत् न बना करके स्वतन्त्र ग्रपनी इच्छानुसार ग्रन्तर्जगत् बनाया करता है । किन्तु फिर ऐसी चेष्टा करता है कि उस अन्तर्जगत् के अनुसार बहिर्जगत् का नया रूप बन जावे जैसा घर, रथ, छत्र, ग्रासन आदि आदि में सब प्रथम बहिर्जगत् में न थे [ ८४ J
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* ब्रह्मविज्ञान किन्तु प्रथम अन्तर्जगत् में आकर पीछे बहिर्जगत् में चले गये हैं । जो प्रथम जीव की सम्पत्ति थी वह पीछे से ईश्वर की सम्पत्ति हो गई । किन्तु कभी - कभी यह अन्तरात्मा वहिर्जगत् के अनुसार सूर्य, चन्द्र, पर्वत, वृक्ष, गाय, घोड़ा आदि पदार्थों का अपने अन्तर्जगत् में रूप कल्पना करके अपनी चेष्टा से फिर अपनी उस ग्रात्मसंपत्ति को ईश्वर केजगत्में दे दिया करता है और फिर वह ईश्वर की सम्पत्ति हो जाती है किन्तु स्मरण रहे कि यह दोनों प्रकार शिल्प के है ऊपर के पैरे में जो प्रकार लिखा है उसको अपूर्व शिल्प कहते हैं जैसे — कपड़ा बर्तन, तख्ता, बिछायत, काच यादि किन्तु इस पैरे के प्रकार की प्रतिरूप शिल्प कहते हैं जैसे हाथी, घोड़ा, पर्वत ग्रादि की प्रतिमा या चित्र बनाया जाय । ये दोनों ही प्रकार ग्रन्तर्जगत् के पश्चात् बहिर्जगत् के हुये हैं । अब एक प्रकार ऐसा भी है जहाँ हमारी अन्तरात्मा वहिर्जगत् से विशेष रूप से सम्बन्ध न करके स्वतन्त्र ग्रपनी इच्छा से ग्रन्तर्जगत् बनाया करती है जैसे किसी कवि के मन में नये नये भाव उत्पन्न होते हैं और कभी कोई विक्षिप्त नया २ मनोराज का संगठन किया करता है अथवा सोता हुआ मनुष्य स्वप्ना -वस्था में नये २ अन्तर्जगत् की कल्पना किया करता है कभी आकाश में उड़ता हुआ चलता है, कभी स्वयं को मरा देखता है, कभी सर्प में हाथी का मस्तक देखता है । तात्पर्य यह है कि जो बहिर्जगत् में कहीं नहीं है वह ग्रन्तर्जगत् में भासता रहता है यह जीव का सामर्थ्य है सौर यह उस की निज की सम्पत्ति है । जीव के ज्ञान मण्डल का जीव से उसी प्रकार सम्बन्ध है जैसे दीपक की लौ से दीपक के प्रकाश का है । दीपक के प्रकाश को साफ करना, चलाना या ढकना तभी हो सकता है कि दीपक की लौ जब उस प्रकार की जावे । इसी प्रकार जीवात्मा का ज्ञान भी तब ही पकड़ा जा सकता है यदि मूल बिन्दु श्रन्तरात्मा संस्कार के द्वारा अपने अधीन किया जावे जिस प्रकार अनेक दीपकों के रहते किसी एक दीपक के बिगाड़ने या बुझाने से दूसरे दीपक न बिगड़ते हैं और न बुझते हैं अर्थात् इक दीपक का धर्म दूसरे दीपक पर लागू नहीं होता इसी प्रकार जीव अनन्त हैं ग्रतः किसी एक जीव के मूर्ख या विद्याहीन होने से रोगया पाने से दूसरे जीव कदापि वैसे नहीं होते । एक दीपक के वुझने पर दूसरा दीपक जला मृत्यु करता है उसी तरह एक जीव के मरने से दूसरा जीव जीवित रहता है जैसे बुझे हुए दीपक का प्रकाश मण्डल नष्ट हो जाता है उसी प्रकार मरे हुए जीवात्मा का ज्ञानमण्डल या ग्रन्तर्जगत् भी नष्ट हो जाता है किन्तु यह बहिर्जगत् ईश्वर के ज्ञानमण्डल की वस्तु है, यदि ईश्वर नष्ट होता तो सम्भव होता कि जगत् भी नष्ट हो जाता किन्तु ईश्वर के नित्य सनातन स्थान से च्युत होती है और न नष्ट होती है और न जीव के ज्ञान का उसमें कुछ सम्बन्ध नहीं है ग्रतः किसी नित्य सनातन रूप से इसी प्रकार भासता हुआ चला ग्रा सनतन हैं और वास्तव में दोनों ही एक हैं । होने के कारण बहिर्जगत् की कोई वस्तु न ग्रपने जीवों की इच्छा से उसमें कोई ग्रन्तर पड़ता है । जीव के मरने से भी यह जगत् ग्रनादि काल से रहा है अर्थात् ईश्वर और जगत् दोनों ही नित्य जीव और ईश्वर का साधर्म्य वैधर्म्य सूत्र का सारांश १ - समष्टि ग्रात्मा ईश्वर है और व्यष्टि आत्मा जीव है । [ ८५ ]
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* ब्रह्मविज्ञान अनन्त प्रतिविम्व ग्रात्माओं को जीव और २– एक सूर्य के अनन्त प्रतिविम्वों के समान एक मूलात्मा के मूलविम्वी ग्रात्मा को ईश्वर कहते हैं । ३ – महाज्ञानरूप ईश्वर को ' ओम् ' और अनन्त ज्ञानरूपी जीवों को ' ग्रहम् ' कहते हैं । ईश्वर ४ — जीव पृथक - पृथक परिमित पुद्गल होने से अपना शक्तिकेन्द्र नियत स्थान में रखता है । किन्तु स्थान में असीम अनन्त न होने के कारण अपना शक्तिकेन्द्र किसी नियत स्थान पर न रखकर प्रत्येक हृदय, मस्तक, पाँव, आँाँख, कान यादि माना जा सकता है महपियों ने उसका स्वरूप कहा है: -सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ । १ ॥ ( गीता १३।१३ । )
पाणिपाद शिर ग्राँख मुख, कररण सहित सब ठोर ।
सकल जगत घेरे हुए, वह व्यापक सब ओर ॥ १ ॥
( पु ० गोपीनाथ जोशी ) ५ — जीव और ईश्वर, ज्ञान और जगत् कल्पना में समान हैं अन्तर इतना ही है और ईश्वर सर्वज्ञ है । जीब अन्तर्जगत् की कल्पना करता है और ईश्वर कि जीव अल्पज्ञ और जगत् कल्पना करने में समान होने पर भी इनमें बड़ा अन्तर है । जीव वहिर्जगत् अपनी की स्थिति । ज्ञान लिए कोशों की आवश्यकता रखता है और ईश्वर नहीं रखता । जीव के ४ कोश हैं— इन्द्रिय के ग्रथं, मन और बुद्धि । जीव इन चतुष्कोशों में बिहार करता है । इनके बिना स्थित नहीं रह, सकता । ग्रात्मा ज्ञान स्त्ररूप है । पाँच इन्द्रियों का भिन्न २ ज्ञान होने पर भी इनका केन्द्र में होता है जो आत्मा कहलाता है अनुभव एक ही । पाँच इन्द्रियों का पाँच भिन्न के ग्रन्न होने के कारण ये पाँचों २ ज्ञानफल एक ही आत्मा इन्द्रियाँ उस ग्रात्मा अपने केन्द्ररूप ग्रात्मा के का एक प्रकार का कोश या स्तर है । इन्द्रियाँ सब से बाह्य कोश हैं भीतर । इन्द्रियों के भीतर अर्थकोश है । पाँचों इन्द्रियों के शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ग्रर्थ , या की तह अवश्य ही है । किसी इन्द्रिय के भीतरी भूतमात्रा के अत्यन्त सूक्ष्म रूप ग्रर्थमात्रा के को नहीं होता । कान और ग्रॉस नष्ट होने से उस मात्रा का ज्ञान ग्रात्मा में शब्दऔर रूप मात्रा के से को इन दोनों का ज्ञान नही होगा । श्रतः सिद्ध न रहने ग्रात्मा है कि इन्द्रिय कोश के है । ग्रकोशान्तर मनकोश की सत्ता है जिस इन्द्रिय पश्चात् अर्थकोश अवश्य मन का प्रादुर्भाव को ज्ञान नहीं होता ग्रतः जाना गया है कि इन्द्रियों न होवे तो ग्रात्मा से अर्थ में और अर्थ होकर ग्रात्मा में पहुंचता है । से मन में वाह्य वस्तु ज्ञान इस प्रकार तीसरा मन कोशहै । इसके बुद्धि पश्चात् चोथा कोश का है । मन, बुद्धि के आधार पर कार्यकरता है । तीव्र, मन्द और नष्ट बुद्धि मन वस्तुयों को पकड़ता है । वृद्धि ग्रपने धरातल अनुसार करती है । ग्रात्मा के ज्ञानरूपी प्रकाश से से ४ जड पर चञ्चल होने मन के व्यापारों के ज्ञानों को एकत्र पर भी चैतन्य और प्रकाशित रहते हैं । [ ५६ ]
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* ब्रह्मविज्ञान र आत्मा के निकटस्थ रहने से बुद्धि भी ज्ञानमय है । अन्तर केवल इतना ही है कि बुद्धि सविषयक है और ग्रात्मा शुद्ध, निर्विषयक है और ग्रात्मा जिस बुद्धि की ओर होती है उस बुद्धि का विषय आत्मा विषय बन जाता है । बुद्धि सोमावद्ध है - बाल्यकाल से ग्रव तक शिक्षा द्वारा जितनी बुद्धि उपार्जन की है बहु तो मेरे पास है ही किन्तु मैं वह ज्ञानरूप ग्रात्मा हूँ जिससे यह बुद्धिज्ञान उत्पन्न हुए हैं और ग्रागे भी होते रहेंगे । इस ग्रात्मा से ही चारों कोश प्रकाशमान् हैं । आत्मा ये ४ बँधे रहते हैं और इनके साथ शरीर छोड़ने पर ग्रात्मा जाती है यतः चारों ग्रात्मा के कोश कहलाते है अतः भगवान् ने कहा है: -इन्द्रियेभ्यः परार्था अर्थभ्यश्च परं मनः इत्यादि । इन्द्रिय परं तो अर्थ है अर्थ पर मन जान 1 मन के आगे बुद्धि है, फिर है प्रतम ज्ञान ॥१ ॥
इन्द्रिय, अर्थ, मन, बुद्धि के कोश प्रातमा मान । ', इनसे प्रतम जीव है, इन बिन ईश्वर जान ॥२ ॥
कोश सहित जो प्रातमा जीवमात्र का रूप । कोश रहित जो प्रातमा, ईश्वर रूप अनूप ॥। ३ ॥ ( पु ० गोपीनाथ जोशी ) श्रात्मा के साथ चारों कोशों का ढढ़ सम्बन्ध है । एक के रहने से सत्र रहते हैं और एक के नष्ट होने है से सब नष्ट हो जाते हैं । जीव जन्तुद्रों में ४ कोश पाये जाते हैं तो उनमें श्रात्मा का होना भी सिद्ध किन्तु ईश्वर बिना स्वयं ग्रात्मास्वरूप है उसका नियमन किसी कोश से नहीं है वह सर्वदर्शी और सर्वज्ञ है इन्द्रिय के सब कार्य कि करता है । जैसा महर्षियों का वाक्य है: -पाणिपादो जवनोग्रहीता चक्षुः सशृणोत्यकर्ण: । , पश्यत्य स वेत्ति विद्यम् ॥ ( उपनिषद् न च तस्य वेत्ता, प्राहुस्तमग्रथं पुरुषं पुराणम् )
पाणिपाद बिन पकड़ता और दौड़ना दूर ।
चक्षु करण बिन देखता, सुनता सब भरपूर ॥
वह नहीं जाना जा सकत, वह सकता सब जान । ऐसे को ऋषि कहत हैं, अग्रयं पुरुष पुराण || ( पु ० गोपीनाथ जोशी ) जीव की वृद्धि आदि परिछिन्न हैं किन्तु ईश्वर की अपरिछिन्न और ग्रपरिमित बुद्धि ग्रादि हैं । मनुष्य जानते सर्वज्ञ जानते जानने है ईश्वर ग्रादि अन्त तक सब कुछ जानता है उसके ज्ञान में नवीन कुछ लगता किन्तु है कुछ ग्रहण करता है । पुरातन का भेद नहीं है । जीन अपनी रक्षा निमित्त कुछ त्यागता [ ८७ ]
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* ब्रह्मविज्ञान होने के उपरान्त भी अपने ज्ञान क्रियाग के किन्तु ईश्वर परिपूर्ण होने से ऐसा नहीं करता । परिपूर्ण रहता है । जैसा गीता में कहा है अनुसार सदा जानता रहता है और सब कुछ करता न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन । नानवाप्तमवाप्तव्यं, वर्त एवच कर्मणि ॥ ( गीता ) पार्थ मुझको है नहीं करना कोई कर्म । अप्राप्य वस्तु कोई नही कर्म होत यही मर्म | | ( ० गोपीनाथ जोशी ) परिवर्तन से जीव के क्षगा - क्षण रूप अनेक माने जाते हैं किन्तु ईश्वर में अदल - बदल कुछ नहीं होता, वह निरन्तर एक है । जीव का स्वरूप त्रिवत् है किन्तु ईश्वर का त्रिवत् नहीं है । संसार की समस्त वस्तुनों के स्वरूप त्रिवत् हैं । जीव का त्रिवत् होना सूर्य के समान जानों । सूर्य त्रिवत् इस प्रकार है- पहले सूर्य विम्ब, दूसरे उसका प्रकाश, तीसरे उस प्रकाश में ग्रहों यादि तथा बहुत सी वस्तुओं का होना । सूर्य विस्व की ‘ उक्य ', प्रकाश को ‘ अर्क ', प्रकाश की वस्तुओंों को ' अशीति ' कहते हैं । इसी प्रकार ज्ञानमय जीव के मध्य में जो एक चमकता हुआ विन्दु है उसको ' उक्थ ' और उसके ग्राधार से विद्यमान ज्ञानमण्डल को ' अर्क ' और इस ज्ञानमण्डल के ग्रन्तर्जगत् जो ग्रन्तर्गत है उसको ' प्रशीति ' कहते हैं । ग्रशीति के द्वारा श्रात्मा का प्रदेश बनता रहता है । ग्रात्मा ग्रन्तर्जगत् से रस लिया करता है । ग्रन्तर्जगत् से ही ज्ञान का स्वरूप बनता है और ग्रन्त-जंगत् सहित ज्ञान प्रकाश से ही श्रात्मा की गत्ता भी है । यदि ग्रन्तर्जगत् न रहे तो ज्ञान का कोई स्वरूप ही नहीं बनेगा और ग्रात्मा की सत्ता रहने पर भी न रहने बराबर है । इस प्रकार अन्तर्जगत् ही शीति है अर्थात् ज्ञान के द्वारा ग्रात्मा का भोजन ग्रा ग्रन्न है । ग्रश् धातु का अर्थ व्याप्त होना भी है ग्रतः अशीति वनता है । कई अपने के ग्रर्क श्रथ में यत्न व्याप्त करता होकर है । उसका जिस बिन्दु ग्रन्न से यह उठता है उसको मध्य उक्थ विन्द कहते से उठकर हैं । जीन इसके के लिए मध्य ग्रन्न व्याप्ति ' ग्रहम् ' या ' आत्मा ' कहलाता है जिससे ज्ञानमण्डल उठता है और बँधा बिन्दु को जो हुआ है ' उक्थ ' कहते हैं जो | ज्ञानमण्डल इससे उठा हुआ है उसी ग्रर्क और ज्ञानमण्डल के जीव, उक्थ, अर्क, ग्रशीति से त्रिवत् कहलाता है । अन्तर्जगत् को ग्रशीति कहते हैं । इस प्रकार ऋषियों ने जीव को काममय कहा है । जीव में इच्छा पैदा होती है ग्रौर इच्छा ही से ग्रन्तर्जगत् पैदा हो जाता है । इसी जगत् को काम कहतेहैं । यह इच्छा या दिया जावे तो ग्रात्मा निष्काम होकर ईश्वर काम धीरे - धीरे ग्रात्मा में से हटा रूप हो जाता है ।काम सहित ग्रात्मा जीव है और काम रहित ग्रात्मा ईश्वर है । काम बन्धन से जन्म -मरण होता है । और है ( श्रीगोदर्क मोक्ष ) ये सब जीव के इसके न रहने से मोक्ष मिल जाता धर्म हैं । ईश्वर में यही धर्म है । ईश्वर का नहीं क्योकि नहीं है उक्थ अर्क ग्रशीति जीव का धर्म उक्थ वास्तव में वह,, प्रज्ञा का रूप हैं जिस होता है और जिसको चिदाभास कहते हैं पर ईश्वर का रूप प्रतिविम्बित । यह चिदाभास ही जीवका स्वरूप है ईश्वर । यह ईश्वर नहीं है अतः [ ८८ ]