ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 21–30

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 21–30

पृष्ठ 21

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 21 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रह्मविज्ञान क विषय छन्दवेद का उपयोग दृष्टिविचार १३ वेद का मन, प्राण, वाक् से सम्बन्ध १४ वेद शब्द की व्युत्पत्ति १५ वेद की पौरुपेयता ६ - यज्ञ १ यज्ञभक्तिसूत्र २ प्रजा ३ अग्नि, सोम, यम, आप का साधर्म्य वैधर्म्य ४ अन्नादन कल्प ५ यौगिक ६ चतुर्व्यूह ७ स्कन्धव्यूह सञ्च & श्रात्मानात्मविवेक २- व्यूहानुव्यूह परिच्छेद में ३ दर्शन १ परमेश्वर दर्शन १ उपक्रमसूत्र २ आयुनिर्णयसूत्र ३ स्वातन्त्र्यसूत्र जीवतन्त्र ईश्वरतन्त्र परमेश्वरतन्त्र ४ पारतन्त्र्यसूत्र ५ सजातीय पारतन्त्र्य सूत्र ( व्यपदेशप्रयोग ) ६ जगत् व्यपदेश 13 ग्रात्मत्रय साम्यसूत्र ग्राकाशत्रयसाम्य ६ अनाहतनादसूत्र अनाहतनाद का ( सारांश ) १० अध्यात्म के तीन तन्त्र ११ बाहर के तीन तन्त्र [ ङ ] पृष्ठ १४५ १४५ १४६ १८६ १४७ १४७ १५० १५२ १५५ १६२ १६३ १६४ १६६ १६८ १६८ १७१ १७१ १७१ १७२ १७३ १७३ १७४ १७६ १७७ १७८ १७६ १८० १८१ १८१ १८५ १८६ १८६

पृष्ठ 22

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 22 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रह्मविज्ञान विषय १२ त्रैलोक्यव्यवस्था १ जीव स्वरूप निर्णय २ ईश्वर स्वरूप निर्णय ३ परमेश्वर स्वरूप निर्णय परमेश्वर में कामना का न होना परमेश्वर में नभ्यश्रात्मा का न होना परमेश्वर में दैशिक संस्था न होना परमेश्वर में कालिक संस्था का न होना १३ जगत् कारणता का विचार १४ सब का ग्रात्मा होना १५ भूमारस ( रस आनन्द ) १६ उपासना २ ईश्वरदर्शन १ सृष्टिक २ सत्यज्ञान रूप ३ प्राण सृष्टि ४ पञ्चस्कन्ध ५ ईश्वर की पांच ग्रात्मायें ६ ईश्वर की उपासना ३ जीवदर्शन १ परमेश्वर और ईश्वर से जीव धर्मभेद २ जीव का मुख्य स्वरूप लक्षण ३ जीव का लक्षण विद्या ४ विद्या भङ्ग सिद्धि ५ विद्या और कर्म का सहयोग ६ ब्रह्म गायत्री ७ जीव परिचय ( क ) ज्ञानोत्पत्ति क्रम ( ख ) 2 जीव- ईश्वर का अन्तरान्तर भाव १० प्रारम्भक तारतम्य उपादान कारण ११ भूमोत्तर या श्रणिमोत्तरवाद १२ भूमोत्तर या विकासवाद ( क ) [ ] च पृष्ठ १८६ १० ११ & I १ ९ ३ १६४ १ ९ ५ १६५ १ ९ ७ १६६ २०० २०१ २०२ २०३ २०५ २०६ २०८ २१३ २१८ २१८ २१६ २२० २२६ २३१ २३२ २३६ २३६ २४२ २४४ २४५ २४५

पृष्ठ 23

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 23 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रह्मविज्ञान विषय १३ मोत्तरवाद ( ख ) १५ विस्फोटवाद १६ युगपत् सृष्टिवाद ३- श्रात्मपरिच्छेद आत्मा के सम्बन्ध में पांच मत सिद्ध हैं १ प्रत्ययात्मवाद २ प्रत्ययातिरिक्तात्मवाद ३ कोशात्मवाद ४ कोशवदात्मवाद ५ यज्ञमयात्मवाद ९ चयनयज्ञ आदि पञ्चचिति ( पुनश्चिति ) २ अन्तिम पञ्चभूतचिति १ भूतात्मचिि २ ३ वेदचिति यजुः ४ लोकचिति ५ धातुचिति ३ सवनयज्ञ तथा यज्ञमय सात्म जीवन ६ चिदात्मवाद ७ त्रिशरीर विवेक १ कारणशरीर २ सूक्ष्मशरीर ३ स्थूलशरीर ( त्रिविध - शरीर - समन्वय ) पश्चात्मसंस्था १ परमात्मा २ शान्तात्मा ३ सत्यात्मा ४ अक्षरआत्मा [ छ ] पृष्ठ २४६ २४६ २४७ २४८ २४६ २४६ २५० २५० २५३ २५४ २५५ २५६ २५६ २५७ २५७ २५७ २५८ २६१ २६५ २६६ २६७ २६८ २६२६६ २७० २७१ २७१ २७३ २७४ २७५ २७६ २७७ १४ जीव और ईश्वर के अपने अङ्गों का जानना न जानना ( ग )

पृष्ठ 24

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 24 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रह्मविज्ञान विषय ५ सूत्रात्मा ६ क्षेत्रज्ञग्रात्मा १ योनि प्रतिष्ठा ग्राशय २ ग्रालम्बन ३ नाड़ी सञ्चार ४ क्षेत्रज्ञ ग्रात्मा से सम्बन्ध रखने वाले देवता ५ विधता ६ सेतुता ७ प्रयोजकता निलिप्तता ६ अवस्थात्रय १ जाग्रत या बुद्धयन्त ग्रवस्था २ स्वप्न या सन्ध्यावस्था ३ सुषुप्ति या स्वप्नान्त ग्रवस्था मतान्तर ( दूसरा या तीसरा ) १० ] उत्क्रमण ७ महान्प्रात्मा महान्प्रात्मा का जन्म प्रकार सपिण्डविचार पितृस्वधा महान् का ४ प्रकार से शरीर में रहना १ श्राकृतिमहान् २ प्रकृति ३ ग्रात्मवृत्ति ४ ] ग्रहंंकृतिमहान् • उपसंहार भूतात्मा भूतात्मा परिचय तेजस ग्रात्मा प्रज्ञात्मा ? योनि और ग्राशय २ प्रज्ञात्मा की प्रतिष्ठा [ ज ] २७७ 5138 २७६ २८० २८० २८२ २८२ २८३ २८३ २८४ २८५ २८५ २८५ २८६ २८८ २८८ २८६ २६० २ ९ २ २६३ २६४ २६४ २६६ २६८ २६६ ३०३ ३०४ ३०४ ३०८ ३१० ३१० ३११

पृष्ठ 25

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 25 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रह्मविज्ञान * विषय चित् का प्रतिविम्व ३ प्राज्ञ का आयतन ८ इन्द्रियों का देवतापन ५ प्रज्ञा का भिन्नरूप धारण करना ७ इन्द्रियों में प्रारण की मुख्यता प्रज्ञान का विज्ञान से सम्बन्ध ९ प्राज्ञ की देह भेद से भिन्नता १० प्रत्यय की वृद्धि से विज्ञान की वृद्धि ११ स्वर्ग में नित्य जाना १२ प्राज्ञ श्रात्मा का मुख्य स्वरूप १ प्राण २ देवता ३ ऋतु ४ दिक् ५. छन्द ६ स्तोम ( प्राण राशि ) ७ पृष्ठ 4 साम ग्रह १० ऋषि १३ प्राज्ञ ग्रात्मा की अवस्था १ जाग्रत २ स्वप्न ३ सुषुप्ति ४, ५ मोह और मूर्छा र मुक्ति ६, ७ मृत्यु १४ आत्मा का परिशिष्ट भाग १५ महान् १६ ग्रात्मशास्त्र समन्वय १७ समन्वय १८ आत्मसारसमुच्चय [ झ ] पृष्ठ ३१२ ३१२ ३१३ ३१५ ३१५ ३१६ ३१८ ३१८ ३१६ ३२० ३२१ ३२२ ३२३ ३२३ ३२४ ३२४ ३२४ ३२५ ३२६ ३२६ ३२८ ३३० ३३० ३३० ३४० ३४३ ३४५ ३४५ ३४८ ३५१ ३५२ ३५५ ६ इन्द्रिय प्राणों का एक प्रज्ञा ही की ओर झुकाव

पृष्ठ 26

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 26 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रह्मविज्ञान * विषय ४ - आत्मगति परिच्छेद १ गतिस्वरूप २ गतिप्रभेद १ संसारगति ( नित्यगति ) २ अतिमुक्ति = भूतगति ३ प्रतिमृत्यु = देवगति ४ पञ्चत्वगति = भूतगति ( प्राणगति = उत्क्रान्ति के ४ भेद हैं ) १० समदलघ ३ गतिनिमित्त १ ज्ञानरूपी विद्या विद्या २ कर्मरूपी विद्या श्रविद्या काम कम १ ( विद्या सापेक्ष कर्म ) १ यज्ञ २ तप ३ दान २ ( विद्या निरपेक्ष कर्म ) ( विकर्म अर्थात् विद्या विरोधी ) ( अकर्म ) ( मुलाविद्या ) १ भिन्न लोकों में भिन्नशरीर २ लोकों में बीच की स्थिति ५ गतिमार्ग १ शरीर के भीतर श्रात्मा का गतिमार्ग [ न 1 पृष्ठ ३५८ ३५८ ३५६ ३५६ ३६० ३६० ३६१ ३६१ ३६२ ३६३ ३६४ २६४ ३६५ ३६८ ३७३ ३७४ ३७६ ३७७ ३७७ ३७७ ३७८ ३७६ ३८२ ३८३ ३८३ ३८५ ५ ब्रह्मगति, ६ - दैवगति, ७ - पंत्रीगति, ८- नारकीगति, ६ - प्रगति ३६२ ( शरीर आत्मा के तीनों लोकों में भ्रमण ३५० ४ प्रेत्य स्थिति के तीन कारण ) ३८१ २ स्थूल शरीर छोड़ते समय ३८५ श्रात्मा के सूक्ष्म शरीर कापरमाणु ३८६

पृष्ठ 27

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 27 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रह्मविज्ञान विषय ३ प्रत्ययज्ञान १ शुक्लकृष्ण मार्ग शुक्लकृष्ण मार्ग के ५ पर्व १ कर्म २ नाड़ी ३ दिक् ४ आकाश ५ काल २ कर्म ३ काम ४ शुक्र यज्ञ ( चयनयज्ञ ) तप प्राकाम्य मुक्ति ( १ - कर्मयोग, २ - भक्तियोग ) ( ३ - ज्ञानयोग ) सम्पत्ति कैवल्य भूमोदर्क मुक्ति ( २ - क्षीणोदकमुक्ति ) निर्वाण समघलय दात उपसंहार इति शुभम् [ ट ] पृष्ठ ३८७ ३८७ ३६० ३६० ३६० ३६० ३६२ ३६२ ४०० ४०३ ४०६ ४०६ ४१३ ४२० ४२० ४२३ ४२५ ४२५ ४२७ ४२६ ४२६ ४३१ ४३२ ४३६

पृष्ठ 28

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 28 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रहाविज्ञान विषय ४ - श्रात्मगति परिच्छेद १ गतिस्वरूप २ गतिप्रभेद १ संसारगति ( नित्यगति ) २ अतिमुक्ति = भूतगति ३ श्रुतिमृत्यु = देवगति ४ पञ्चत्वगति = भूतगति ( प्रागिति = उत्क्रान्ति के ४ भेद हैं ) १० समवलय ३ गतिनिमित्त १ ज्ञानरूपी विद्या ग्रविद्या २ कर्मरूपी विद्या विद्या काम कर्म १ ( विद्या सापेक्ष कर्म) १ यज्ञ २ तप ३ दान २ ( विद्या निरपेक्ष कर्म ) ( विक्रमं प्रर्थात् विद्या ( अकर्म ) विरोधी ) ( मुलाविद्या ) १ भिन्न लोकों में भिन्न शरीर २ लोकों में ५ गतिमार्ग बीच की स्थिति १ शरीर के भीतर ग्रात्माका गतिमार्ग [ न ] पृष्ठ ३५८ ३५८ ३५६ UC ३६० ३६० ३६१ ३६१ ३६२ ३६३ ३६४ २६८ ३६५ ३६८ ३७३ ३७४ ३७६ ६७७ ३७७ III ३७८ ३७६ ३८० ३८१ ३८२ ३८३ ३८३ ३८५ ३८५ ३८६ ५ ब्रह्मगति ६- दैवगति ३६२ ,, ७- पंत्रीगति - नारकी गति - प्रगति ( शरीर आत्मा ४ प्रेम स्थिति के तीनों लोकोंमें भ्रमण के तीन कारण ) २ स्थूल शरीर छोड़ते समय ग्रात्मा के सक्ष्मशरीर का परमाणु

पृष्ठ 29

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 29 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रह्मविज्ञान विषय ३ प्रत्ययज्ञान १ शुक्लकृष्ण मार्ग शुक्लकृष्ण मार्ग के ५ पर्व १ कर्म २ नाड़ी ३ दिक् ४ आकाश ५ काल २ कर्म ३ काम है शुक्र यज्ञ ( चयनयज्ञ ) तप प्राकाम्य मुक्ति ( १ - कर्मयोग, २ - भक्तियोग ) ( ३ - ज्ञानयोग ) सम्पत्ति कैवल्य भूमोदमुक्ति ( २ - क्षीणोदकमुक्ति ) निर्वाण समघलय दात उपसंहार इति शुभम् [ ट ] पृष्ठ ३८७ ३८७ ३६० ३६० ३६० ३६० ३६२ ३६२ ४०० ४०३ ४०६ ४०६ ४१३ ४२० ४२० ४२३ ४२५ ४२५ ४२७ ४२६ ४२६ ४३१ ४३२ ४३६

पृष्ठ 30

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 30 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

ॐ श्रीः क ब्रह्मविज्ञान सिद्धान्तवाद - व्याख्यान * मङ्गलाचरण * निषु सीद गणपते गणेषु त्वामाहुर्विप्रतमं कवीनाम् । न ऋते त्वत् क्रियते किञ्चनारे महामर्कं मघवन् चित्रमर्च ॥ ( १ ) ( ऋ ० १०/११२/१ ) ( २ ) जगृम्भा ते दक्षिणमिन्द्र हस्तं वसूयवो वसुपते वसुनाम् । विद्मा हि त्वा गोपति शुरगोना-मस्मभ्यं चित्रं वृषणं रयिं दाः ॥ ( २ ) ( ऋ ० १०/४७/१ ) –तरलार्थ -- हे ( गणपते ) हे समूह के पति! ( गणे! ) ग्राप अपने समूह में ( निषुसीद ) विराजें । ( त्वां ) आपको सभी ( कवीनां ) विद्वानों के ( विप्रतमं ) अग्रगण्य ( प्राहुः ) कहते हैं । ( त्वद्ऋते ) ग्रापके बिना ( किञ्चनारे ) कोई भी काम कहीं भी ( न क्रियते ) नहीं किया जाता है । ( मघवन् ) हे पूजनीय प्रभो! ( चित्र ) नाना प्रकार के ( महामर्क ) बडे प्रकाश अर्थात् दिव्य ज्ञान को ( अर्च ) प्रकाशित कीजिये ॥१ ॥

( वैज्ञानिक - विवेचना ) र में प्रत्येक मनुष्य की आत्मा प्रज्ञा और प्रारण से बनी हुई है । शरीर में प्रज्ञा के द्वारा र प्राण के द्वारा क्रिया का संचार निरंतर होता रहता है । यदि सम्पूर्ण जगत् की भुत.