ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 121–130

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 121–130

पृष्ठ 121

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ब्रह्मविज्ञान के रूप में उत्रथ नहीं है और जब उपथ की सत्ता नहीं तो अकं और अशीति भी जीव के सदृश ईश्वर नहीं हो सकते ग्रतः त्रिवत् रूप नहीं है । यह दोनों में भेद सिद्ध हु 1 जीव काममय है और ईश्वर भी काममय है किन्तु विशेषता यह है कि जीव का क्योंकि वह ग्रल्पज्ञ है किन्तु ईश्वर के काम नित्य हैं और सर्वदा एकरूप हैं । इनका काम अनित्य है और सर्वज्ञ होने के कारण सभी काम ज्ञान में एक साथ मौजूद रहते हैं अतः ईश्वर प्राप्त तिरोभाव काम नहीं होता को बिना इच्छा है | ईश्वर ही सब प्राप्य हैं और सब काम सर्वज्ञ होने से परिपूर्ण तथा ग्रचल नियमों से बद्ध रहते हैं अतः ईश्वर प्रकाम है । प्राप्त काम होकर भी काम कहा जा सकता है । अतः जीव कामगय है और ईश्वर एक जीव का ज्ञानमण्डल दुसरे जीव के ज्ञानमण्डल को नहीं जानता किन्तु ईश्वर के ज्ञानमण्डल में जो जगत् है उसको सभी जीव जानते हैं । जीव प्रागस के ग्रन्तर्जगत् को नहीं जानते किन्तु ईश्वर के ज्ञान पर ठहरे हुए बहिर्जगत् को सत्र जानते हैं । जगत् जन्म - मरणादि के कारण से जीव अनेक हैं किन्तु भेद न होने से ईश्वर एक है । जीवों का अन्त-जीवों के ज्ञान से ज्ञान इस प्रकार बना है कि उनके ज्ञान में ग्रन्तर्जगत् है और उनके अन्तर्जगत में उनका है । इसी ईश्वर प्रकार ईश्वर का बहिजंगत् है अर्थात् सकल पाञ्चभौतिक विश्व ईश्वर के ज्ञान में है और का ज्ञान विश्व ईश्वर में है जैसे घडे में मिट्टी और मिट्टी में घड़ा कहा जा सकता है । जीव और , ज्ञान में जीव जगत् और जगत् में ज्ञान होने के सम्बन्ध से साथमिक हैं किन्तु भेद इतना सा है कि तो अपनेग्रन्तर्जगतों को आपस में नहीं जानते किन्तु ईश्वर के ज्ञानमण्डल में सब जीवों के अन्त-जगत् विद्यमान हैं अतः ईश्वर को साक्षी कहते हैं । बहिर्जगत् बहिर्जगत् के अनुसार ग्रन्तर्जगत् बना करता है किन्तु कभी - कभी बहिर्जगत् का अंश या कभी के विरुद्ध और को ही ग्रन्तर्जगत् हो जाता है । इन दोनों अवस्थाओं को संशय भ्रम कहते हैं । दोनों अन्यथा ज्ञान भी कहते तो अपने बनाया ही करता है किन्तु प्रायः हैं । जीव बहिर्जगत् के अनुसार ग्रन्तर्जगत् । के पदार्थों बहिर्जगत् के पदार्थों से विलक्षण वस्तुऐं अपने अन्तर्जगत् बना कर उसके अनुसार बहिर्जगत् को तोड़ - मोड़ अपनी निर्माण कर देता है जैसे घर नगर कर नये २ स्वरूप जगत् में इच्छानुसार, , घड़ी रेल , कपड़े इत्यादि जितनी की बनाई , मनुष्य सामग्री हुई वस्तुएं हैं और जो मनुष्य उन्नति की हैं | ये सब में तो जीव संपत्ति है किन्तु प्रकट नवीन निर्माण की हुई वस्तुऐं जीव के अन्तर्जगत् वाहर रूप में होते ही को हेर - फेर नवीन निर्माण ईश्वरी सम्पत्ति हो जाती है । बहिर्जगत् के पदार्थों कर वस्तु को ही शिल्प शिल्प जैसे घर कुर्सी विमान इत्यादि । दूसरा कहते हैं । यह दो प्रकार का है एक अपूर्व,, प्रतिरूप शिल्प । ये दोनों ही जीव सम्पत्ति ईश्वर सम्पत्ति है जैसे कृत्रिम घोड़ा, हाथी, मनुष्य इत्यादि हो जाते हैं में ईश्वर की सम्पत्ति है ॥ ग्रन्तर्जगत् में जीव की और बहिर्जगत् नये भावों जीव वहिर्जगत् के अनुसार तो अन्तर्जगत् बनाया ही करता है किन्तु प्रायः बहिर्जगत् से भिन्न २ की घटना करके अपने किया करता है । अपनी कल्पनाशक्ति से अपने मन में अन्दर जगत् रचना नया संगठन उसका मनोराज है यह मनुष्य जगत् रच लेता है जैसे कवि आदि किया करते हैं यह की निजी नवीन सम्पत्ति है । [ ८ ९ ]

पृष्ठ 122

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* ब्रह्मविज्ञान के मूल-अपना काम करता है । ऐसे ही जीवात्मा दीपक का प्रकाश दीपक की लौ के अनुसार 1 जीव के नष्ट होने से उसकी ग्रन्तरात्मा का व्यवहार है । नष्ट होने पर बिन्दू के संस्कारानुसार ही उसके ज्ञानप्रकाश ज्यों का त्यों रहता है । बहिर्जगत् ईश्वर के नष्ट हो जाती है किन्तु जीवों का बहिर्जगत् सनातन है अतः उसके ज्ञान का बहिर्जगत् नष्ट नहीं होता में । नष्ट हो सकता है किन्तु ईश्वर नित्य और ही नित्य और सनातन हैं और वास्तव है, ईश्वर और जगत् दोनों यह जगत् भी नित्य और सनातन दोनों ही एक हैं क्योंकि जगत् ईश्वर के ज्ञान का ही रूप 1 १४. जीव ईश्वर की पृथक् सत्ता कहनी से भिन्न चित्त की सत्ता के ग्राश्रय से जितनी वस्तुएं हैं उनकी मत्ता चित्त की सत्ता सत्ता पृथक है । के ग्राश्रय से विद्यमान है उसकी चाहिए जैसे कि प्रज्ञा एक वस्तु है जो कि चित्त की सत्ता उत्पन्न करती है । यदि श्रुतः वह चित्त के अंश को धारण करके कितने ही ग्रहं तत्व अर्थात् जीवों को । जिस प्रकार तो वह चित्त को अपने पर धारण नहीं कर सकती की ' प्रज्ञा की सत्ता चित्त से पृथक न होती वस्तु । जहाँ मिट्टी की सत्ता ही घट की सत्ता है तो उस घट के ऊपर वही मिट्टी चढ़ नहीं सकती प्रति-सूर्य का सत्ता भिन्न २ होती है जैसे सूर्य की सत्ता और जल की सत्ता भिन्न २ है तो वहां जल पर से विम्व होना सम्भव होता है । जब प्रज्ञा पर चित्त का प्रतिविम्ब है तो प्रज्ञा की सत्ता चित्त की सत्ता किया करता पृथक माननी चाहिए । मैं ग्रर्थात् जीव भी अपने ज्ञानमण्डल से जो अपने जगत् की कल्पना है ॥ वे हूं वह भी मिटटी के घड़े के सदृश नहीं किन्तु अपनी सत्ता से उनमें पृथक सत्ता उत्पन्न की जाती में मेरी सत्ता से सत्ता वाले नहीं हैं यही कारण है कि वे ग्रन्तर्जगत् संस्काररूप से हमारे ग्रन्तःकरण ग्रन्त-विद्यमान रहते हैं जिनका स्मरण करता हुआ मेरा ज्ञान पृथक रूप से पकड़ता ग्रीर देखता है । यदि । मेरे जगत् की सत्ता मेरे ज्ञान की सत्ता से पृथक् न होती तो ज्ञान अपने को ग्राप पकड़ने में असमर्थ हो जाता ज्ञान में बैठी हुई वस्तु दीखती है जिसको ज्ञान ग्रहण करता ऐसा कदापि हुग्रा पृथक रूप से देखता है सो से है । हुआ है वह आत्मा से ही उत्पन्न होने पर भी ग्रात्मा से सर्वदा पृथक रूप में में रहता आत्मा भरा अर्थात् अन्तर्जगत के बनने के पूर्व आत्मा को जितनी मात्रा थी ग्राज या बनते ग्रनन्त जगत् वनने पर भी रहने पर भी उस मात्रा में कुछ भी कमी नहीं होती । वह अपने में ज्यों का त्यों वना हुआ है । यह ग्रत्यन्त ग्राश्चर्य का विषय है कि इस स्वरूप में ग्रपने प्रभारण किन्तु ग्रात्मा से ग्रनन्तानन्त जगत् वन गया आत्मा उससे पृथक् ग्रपने स्वरूप में ज्यों का त्यों मौजूदहै । दूसरा आचर्य विषय भी है वह ग्रन्तर्जगत् ज्ञानमण्डल से इस प्रकार चिपका का यह कोई स्थान नहीं है किन्तु हुआ है कि उससे पृथक एक क्षण के लिए भी उसका ग्रात्मा उस अन्तर्जगत् से सर्वथा में अनन्ता-नन्न जल की धारा रात दिन रहने प्रसङ्ग है । जिस प्रकार ग्राकाश के पर भी ग्राकाश कभी नहीं जल लिये स्थान नहीं है किन्तु भीगता और ग्राकाश के सिवाय ग्राकाश उन जलों से प्रकार सदा पृथक् प्रसङ्ग इसी ज्ञान और ग्रन्तर्जगत् का भी रहता है, यह वस्तु धर्म है, सम्बन्ध जानना चाहिये ग्रन्तर्जगत् । यह सम्बन्ध जीव के का है उसी प्रकार परमेश्वर के ज्ञान के साथ जिस प्रकार साथ भी बहिर्जगत् कि जगत् की सत्ता ईश्वर की सत्ता से भिन्न है | का सम्बन्ध है ग्रतः कहा जाता है [ Eo ]

पृष्ठ 123

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ब्रह्मविज्ञान जब घट हम देखते हैं तो घट का ज्ञान घट से मिला हुग्रा हमें भासता है यहाँ तक कि श्रीरघट को पृथक करना भी कठिन है तथापि जब वह ज्ञान घट को छोड़ कर हाथी पर जाता है ज्ञान तो घट को इस प्रकार बेलाग छोड़ता है कि जैसा उसका घट से कोई सम्बन्ध ही नहीं था । इसी प्रकार स्फटिक के पास जिस प्रकार गुडहल का फूल रखने से स्फटिक जो निरा सफ़ेद होता है वह सर्वथा लाल दीखने लगता है यहाँ तक कि स्फटिक की वह लाली अपनी निज की मालूम होती है परन्तु जब गुडहल को हटाते हैं तो वह लाली इस प्रकार बेलाग छूट जाती है कि जैसे वह लाली स्फटिक में थी ही नहीं । इसी प्रकार ज्ञान का और अर्थ का सम्बन्ध जानना चाहिये । यदि जगत् की सत्ता ज्ञान की सत्ता से पृथक् है तो यह प्रश्न उठता है कि ज्ञान से उत्पन्न होते हुए जगत् में वह सत्ता कहां से आई । इसके उत्तर में तीन मत होते हैं पहला यह है कि ज्ञान ही से जगत् में सत्ता श्राई है अर्थात् ज्ञान की सत्ता ही जगत् की सत्ता है क्योंकि ज्ञान के नाश में जगत् का नाश देखते हैं, जगत् ही ज्ञान का ग्राकार है न जगत् बिना ज्ञान रहता है और न ज्ञान बिना जगत्, श्रुतः जगत् ज्ञान का ही विकार है, ज्ञान की सत्ता वाला है । दूसरा मत है कि ज्ञान की सता ही जगत् की सत्ता तब मानी जाती कि यदि घास से दुग्ध, दुग्ध से दही अथवा सुत से कपड़ा और मिट्टी से घड़ा इनके सदृश ज्ञान से जगत् बना होता किन्तु जैसा हम देखते हैं कि दुग्ध बनने पर घास नहीं रहता उसी प्रकार जगत् बनने पर ज्ञान का रूप न रहे ऐसा नहीं होता । ज्ञान में ही बैठा हुआा जगत् भासता है अतः कहना होगा कि जल में बुदबुद या झाग के अनुसार ज्ञान में जगत् की उत्पत्ति है किन्तु इसमें भी विशेषता यह है कि झाग के बनने में खर्च हो जाने से पानी अवश्य घट जाता है और पानी ग्रुपने स्वरूप से बिगड़ कर झाग बनता है किन्तु ज्ञान में वह दोनों बातें नहीं । जगत् के बनने से न ज्ञान में कोई विकार श्राता है न उसकी मात्रा की कमी होती है ऐसी स्थिति में ज्ञान की सत्ता से जगत् की सत्ता कहना असंगत है कर्म ये | हम कह सकते हैं कि ज्ञान में जो जगत् उत्पन्न हुआ है उसमें नाम, रूप और तीनों हो अकस्मात् उत्पन्न हो जाते हैं । जो वस्तु लाल या काली दीखती है उसकी वह रगत वह आकार ज्ञान में न थी वह उस जगत् के अर्थ में कहाँ से या गया इसका उत्तर केवल है जिस प्रकार ज्ञान में में न रहता हुआ रूप अर्थात् रंग तथा आकार उस वस्तु अकस्मात् या गया उसी प्रकार सत्ता का भी आ जाना सम्भव हो सकता है । ज्ञान के भेद से जैसे वस्तु का रूप नष्ट हो जाता है उसी प्रकार उस वस्तु की सत्ता भी नष्ट हो जाती है यही मत यथार्थ ज्ञात होता है । तीसरा मत यह भी है कि जैसे प्रातिभासिक रस्सी में सर्प उत्पन्न हो जाता है वह सर्प मिथ्या है उसकी सत्ता भी मिथ्या है केवल रस्सी की सत्ता से सत्ता सर्प की बन गई है सो मिथ्या है इसी प्रकार ज्ञान पर जगत् मिथ्या बन गया है उसकी सत्ता मिथ्या गई है वह भ्रम है और मिथ्या है केवल ज्ञान की सत्ता से ही जगत् की प्रातिभासिक सत्ता बन है । यह विचार अधिक प्रबल नहीं है । मत ग्राजकल दार्शनिकों में प्रचलित है किन्तु यह जीव ईश्वर की पृथक् सत्ता का सारांश सत्ता चित्त सत्ता अर्थात् ईश्वर की ज्ञानसत्ता प्राश्रम से जगत् वस्तुनों की सत्ता स्थिर है । किन्तु चित्त वस्तु सत्ता से भिन्न है । चित्त सत्ता के आश्रय से जगत् सत्ता की रचना होने पर भी चित्त सत्ता कम नहीं भी चित्त से होती और चित्त सत्ता के श्राश्रय सम्पूर्ण जगत् सत्ता रहने पर सत्ता जगत् सत्ता [ १ ]

पृष्ठ 124

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* ब्रह्मविज्ञान असंग है । तात्पर्य यह है कि ईश्वर जगत् को पेट में रखते हुए भी जगत् से भिन्न है जगत् की रचना करते हुए भी घटता नहीं और जगत् को अपने आश्रय रखता हुया भी सदा श्रसङ्ग रहता है । निम्न-लिखित उदाहरण से इस सिद्धान्त को समझना चाहिए – दो समान सत्ता में प्रतिविम्ब सम्भव नहीं चिदाभास किन्तु भिन्न सत्ता में ही आभास देखा जाता । इस नियमानुसार प्रज्ञा पर जो चित्त से भिन्न है हुआ करता है । चिदाभास सहित प्रज्ञा ही को जीव या अहम् कहते हैं । प्रज्ञा पर चिदाभास ही मनुष्य की श्रात्मा है । इस श्रात्मा के प्रकाश का नाम ही ज्ञान है । इस ज्ञान में जो ग्रन्तर्जगत् पैदा होता है उसकी सत्ता और इस ज्ञान की सत्ता सर्वथा भिन्न है क्योंकि अन्तर्जगत् मेरे ज्ञान में केवल संस्काररूप से रहता है वह ज्ञान की सत्ता में परिणत कभी नहीं होता । ये दोनों पृथक् २ हैं अतः ज्ञान अन्तर्जगत् को पकड़ने में समर्थ है यदि एक होते तो ज्ञान श्रन्तर्जगत् को पृथक् देखने में असमर्थ होता और ज्ञान में भरा हुना अन्तर्जगत् कुछ भी भान नहीं होता अतः सिद्ध है कि ज्ञान सत्ता अन्तर्जगत् सत्ता से भिन्न है । ज्ञाना-श्रय में अन्तर्जगत् श्रनन्त हो जाने पर भी ज्ञान की मात्रा कुछ भी कम नहीं होती क्योंकि अन्तर्जगत् का ज्ञान केवल प्रकाश करने वाला है और श्रन्तर्जगत् के अनन्त रूपों को धारण करता हुआ सा दीखता हुग्रा भी उस श्रन्तर्जगत् से सर्वथा पृथक और श्रसङ्ग है । श्रन्तर्जगत् के अनन्त रूपों को धारण करने पर भी परिपूर्ण मात्रा जैसे ज्ञानसत्ता वाला है और ग्रन्तर्जगत् अन्तर्जगत् सत्ता से को पृथक अपने है, उदर में रखते हुए भी प्रसङ्ग है वैसे ही ईश्वर की ज्ञान सत्ता भी परिपूर्ण है और जगत् को धारण करने पर भी प्रसंग है । जगत् से पृथक है, जगत् रचने पर भी पर जग सत्ता से पृथक् है, ईश्वर ज्ञान

पार ।

परिपूर्ण निर्लेप है, जग रचना भण्डार॥१ ॥

जिमि है अन्तर्जगत् का, जीवज्ञान श्रागार । तिमि सारे संसारका ईश्वर ज्ञानाधार ) || २ || ( पु ० गोपीनाथ जोशी ज्ञान और अर्थ का सम्बन्ध स्फटिक की सत्ता जब और गुडहल के फल के सदृश और अन्त-जगत् कारण है । ऐसे मतानुसार पृथक २ जगत् है तो की जगत् की सत्ता के विषय में तीन मत हैं- प्रसङ्ग है । ज्ञान उपादान सत्ता ज्ञान की सत्ता ही से १ ज्ञान जगत् का श्राती है । २. उपर्युक्त पहले मत को दूध, दही, मिट्टी, घड़ा भाग , , बुदबुदे के उदाहरण नाम रूप कर्म जैसे से काट कर के ,, ज्ञान में आकर अर्न्तजगत् दूसरा मत कहता है कि वहिर्जगत् उनके बनाते हैं वैसे ही साथ - साथ चली भी जाती है । ग्रन्तर्जगत् की सत्ता भी आ जाती है और यह मत यथार्थ प्रातिभासिक सत्ता रस्सी ज्ञात होता है की में सर्प के समान । ३. ज्ञान पर ज्ञान से ही जगत् बन गई है किन्तु यह विचार अधिक । यह मत है प्रबल नहीं है । ग्राजकल दार्शनिकों का प्रचलित १५. ज्ञान और सत्ताका पौर्वापर्य सूत्र ज्ञान और सत्ता में पहलेकौन पीछे गया है । हम कह सकते, कौन इस हो हैं कि जगत् जबकि प्रश्न का उत्तर भी के दो होने से सरल सत्तामय है अर्थात् जगत और ' है ' इस हैं । बुद्धि ही को जगत् कहते [ २ ]

पृष्ठ 125

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* ब्रह्मविज्ञान यह जगत् ज्ञान से बना हुआ हूं तो माना गया कि ज्ञान ईश्वरीय ज्ञान के ग्राधीन है और अन्तर्जगत् की सत्ता जीव पहले रूप है और ज्ञान सत्ता के आधीन पीछे है । बहिर्जगत् की सत्ता बिना ज्ञान के सत्ता है तात्पर्य यह है कि नहीं ग्रतः ज्ञान पहले है और सत्ता पीछे । किन्तु स्मरण रहे कि जिस प्रकार बहिर्जगत् ईश्वर के ज्ञान के आधीन है उसी प्रकार सत्ता भी ईश्वर के ग्राधीन है क्योंकि जीव भी एक प्रकार का जीव की भास होता है उसी को जीव कहते हैं । प्रज्ञा बहिर्जगत् है । प्रज्ञा बहिर्जगत् के न होने है अर्थात् प्रज्ञा के ऊपर चिदा-श्रुतः कहा जा सकता है कि चिदाभास का ज्ञान अर्थात् जीव का ज्ञान की से सत्ता चिदाभास के आधीन नहीं हो है अर्थात् सकता सत्ता पहले है और जीव का ज्ञान पीछे है । श्रथवा यों समझना चाहिए कि अन्तर्जगत् का ज्ञान बाह्य जगत् की सत्ता के आधीन है, यदि बाहर घट की सत्ता नहीं है तो हमका घटका ज्ञान कदापि नहीं होगा । हम को जो कुछ भी ज्ञान है उस ज्ञान को उत्पन्न होने के लिए बाहर किसी न किसी सत्ता आवश्यक है अर्थात् पहले होता सत्ता रहती है तत्पश्चात् ज्ञान होता है । हो किन्तु तीसरी बात यह है कि इस प्रकार बहिर्जगत् की सत्ता के आधीन अन्तर्जगत् का ज्ञान भले ही ईश्वरीय के बांधना पहले कही जा चुकी ज्ञान है उस ग्राधीन पर किसी बहिर्जगत् का मत की है कि सत्ता ज्ञान और और जीव सत्ता के ज्ञान इन दोनों के आधीन में पहले अन्तर्जगत् - पीछे का की विचार सत्ता समंजस है क्योंकि जो । ' है ' वस्तु का ज्ञान होता है वही वस्तु की सत्ता है - घट है- यही घट का ज्ञान को बिना पकड़े जा सकती ज्ञान का रूप नहीं बनता और ज्ञान के बिना वस्तु की सत्ता कुछ भी नहीं कही । प्रतः वस्तुज्ञान और वस्तु सत्ता दोनों एक है । इनको आगे - पीछे कहना भ्रम है इसी तात्पर्य को लेकर एक महर्षिका वचन है: -नैन वाचा न मनसा, प्राप्तु ं

शक्योन चक्षुषा ।

अस्तीति ब्रुवतो ऽन्यत्र, कथं तदुपलभ्यते ॥

प्रस्तीत्येवोपलब्धस्यस्तत्व भावेनचोभयोः ।

अस्तीत्येवोपलब्धस्य, तत्वभावः प्रसीदति ॥

दूसरी अर्थात् न तो वाणी से न मन रो न नेत्रों से वह प्राप्त हो सकता है । जो ' है ' यह कहता है उससे जगह वहकैसे प्राप्त हो सकता है । है इसीलिए वह प्राप्त हो सकता है दोनों के रहने से ही ' है ' इस रूप में प्राप्त होनेपर सत्ता भाव सिद्ध हो जाता है । ज्ञान और सत्ता पौर्वापर्य सूत्र का सारांश ज्ञान तो जो विषय सत्तामय प्रकाशमय है और समस्त जगत् ज्ञान का विषय है । ज्ञान का हो वही है या सत्ता ' है ' बुद्धि के सिवाय और नहीं है का रूप है । ' है ' बुद्धि का नाम सत्ता है । जगत् कुछ ग्रतः जगत् सत्ता मय है । जगत् २ प्रकार का है— प्रन्तर और बहिर् । अन्तर्जगत् का कारण [ ६३ ]

पृष्ठ 126

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* ब्रह्मविज्ञान है श्री है । व्रत दोना जगत का कारण ज्ञान कार्य ने ज्ञान है - ऐसे ही बहिर्जगत् का भी कारण ईश्वरीय है ज्ञान अतः ज्ञान सना ने पहल है क्योंकि कारण जगत् सत्तामय है अतः ज्ञान सत्ता का कारण की सत्ता पहले होता है । है । प्रज्ञा होता है अतः मनामय का ज्ञान प्रज्ञा पर चिदाभास का नाम जीव है । प्रज्ञा विगत जीव से दिमाग या की सत्ता होने से चिदाभास का होना सम्भव है अर्थात प्रजा की मता होने बहिर्जगत् का ज्ञान है अतः पहले सत्ता और ज्ञान पीछे है । दूसरी तरह समझो कि अन्नजंगन के के आधीन है ग्रतः सत्ता पहले और ज्ञान पीछे कहा जा सकता है । बहिर्जगत् ज्ञान पोछे अलजंगन का सत्ता जो यह बात कही गई कि ज्ञानाचीन ग्रन्तर्जगत है और पहने और है और आधीन है और वहिर्जगत् की सत्ता ईश्वरीय ज्ञानाचीन और इसमें ज्ञान होता कोई बताई जाती है तो इस पर यह विचारणीय है कि ज्ञान का स्वरूप ही सना से कायम होना और विना नहीं सत्ता का भास ज्ञान में ही हो सकता है ग्रतः कोई ज्ञान कभी भी बिना मना कि एक दूसरे । सत्ता बिना ज्ञान के स्थिर नहीं होती ग्रतः ज्ञान और मन दोनों ऐसे ग्रविनाभून सकते कभी नहीं रहते । ऐसी स्थिति में ज्ञान और पीछे नहीं कह मना में से किसी को भी पहले

मन वारणी श्ररु चक्षु से नहीं पकड में प्रात ।

' हे ' उपलब्धि के परे जात ॥

, कछु न समझा जोशी ) ( पु ० गोपीनाथ नहीं उपसहार् ग्राधीन एक इन प्रकरणों से जीव के है और दूसरा यह सिद्धान्त निकला कि एक जगत् स्वतन्त्र रूप से जो से अतिरिक्त जगव जगत् जीव के ज्ञान से जगतों किन्तु I जीव है जो बना हुआ उसके ग्राधीन है और उन दाना है जगत् के ईश्वर के अनुसार देश या काल के है और अनन्त अनुसार जड़ सब म छोटी सत्ता रखता जीव नहीं है | इन सबका में प्रमु पृथक एक ईश्वर है वह चेनन है | चेतनता तुल्य है और छोटी सत्ता या अनन्त संख्या मेंजीव जगत् तुल्य है । त्य अर्थात् जगत् जीव अथवा , और ईश्वर कहते हैं से पृथक तत्वत्रय उपासना । इन तीनों में और कुछ नहीं है । इन्हीं तीनों का उसकी प्रकार करते हैं मुख्य परमेश्वर ' इस किन्तु सत्यता है । जीव और में रहकर ' हूँ अन्त-अपना की परीक्षा में जगत् उसके ग्राधीन मैं पर साक्षात्कार जीव की को । फिर जगत् स्पष्ट कक्षा प्रथम है क्योंकि ग्रापामर सभी है की सत्यता रूप से होने के होती सत्यता निर्भर जीव ज्ञान की कारण जीव की सत्यता सबसे प्रथम सिद्ध की प्राप्त । है और बहिर्जगत् सत्यता है करके की पर निर्भर है । ग्रन्तर्जगत् की सत्यता बहिर्जगत् की सत्यता ही सत्यता ईश्वर प्रथम जगत् की सत्यता की सत्यता जीव परीक्षा के द्वारा ईश्वर पर निर्भर है । इस प्रकार की की सत्यता जीव तक हम पहुँचते हैं यतः से तीनों ऐसी स्थिति में बस इन न विश्व को को । सत्य कह सकते हैं और ईश्वर न जीव अथवा मतः ये तीनों हीएक से एक सकते उस प्रकार रह सम्मिलित रहते नहीं हैं कि एक के बिना ग्रन्य दोनों [ ६८ ]

पृष्ठ 127

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* ब्रह्मविज्ञान तीनों का संयुक्त रूप होने के कारण इसको विशिष्ट त्रिसत्य कहते हैं इसी विशिष्ट त्रिसत्य सम्मिलित गिद्धान्त को आधार मान कर उपासक लोगों के नाना प्रकार के उपासना धर्म प्रचलित हुए हैं । उपासना सूत्र कितने ही बल किसी एक बिन्दु में मिलकर संयोग से आपस में गूंथ जावे तो उसका हृद् ग्रन्थि कहते हैं । बल एक ऐसी वस्तु है जो बिना श्राश्रय के नहीं रहता । उसके ग्राश्रय को हम यहाँ ' रस ' शब्द से व्यवहार करेंगे । रस एक ऐसी वस्तु है कि जो सदा शान्त एक रूप पर रहता है क्योंकि वह क्रिया रूप नहीं है केवल सब बलों का वह ग्राश्रय है परन्तु बल वह वस्तु है जो क्रिया के रूप में परिणत हुग्रा करता है क्रिया हो उसका रूप हैं । बिना क्रिया के अर्थात् विना परिणाम के कभी रहता ही नहीं । जैसे रस शान्त रूप है उसी प्रकार उसके विरुद्ध बल क्षुब्ध रूप है । बिना बल के रस नहीं रहता और बिना रस के बल भी नहीं रहता । यही कारण है कि बल अपना क्षोभ करके नष्ट हो जाता है किन्तु उस क्षोभ का फल रस पर छोड़ जाता है और वह रस का संस्कार होकर रस के स्वरूप में परिवर्तन वन जाता है । इसी कारण से एक बिन्दु पर बलों के परस्पर मेल से जो हुदु ग्रन्थि वनती है उस में रस ही हो जाताहै । इ हैं । यह आत्मा यद्यपि क्रिया रूप न होने से बन्धन में कदापि नहीं श्रा सकती तथापि ग्रुपने बल के कारण बँधी हुई सी हो जाती है । इस ग्रन्थि के कारण यह आत्मा का बन्धन कहलाता है । इसी बन्धन के छुटकारे को मोक्ष कहते हैं और मोक्ष सबसे बड़ा पुरुषार्थ है । जहां हृद्ग्रन्थि से रस में बलों की गांठ एक प्रकार की बँध चुकी है उस ही बिन्दु में उस गाँठ पर जब दूसरा बल लगाया जाता है तो उससे दूसरी गांठ फिर बनती है । दूसरा बल पहले बल से न मिलने के कारण दूसरी गाँठ ग्रलग ही बनती है और अलग ही ढंग से खुलती है । बलब लगता है तो उसकी दो गति होती है कभी पहले ही रस पर केवल शुद्ध नया बल आता है तो वहाँ गाँठ नहीं बनती केवल बल अपना क्षोभ दिखा कर नष्ट हो जाता है किन्तु जबकि रस पर बैठा हुआ अपने रस को साथ लिए हुए किसी वस्तु पर लगाया जाता है तो वहाँ वह नवीन गाँठ पैदा पैदा करता किया है जैसा गया कि कोई तीर या गेंद ऊपर या तिरछाऊँ के दिया जावे तो वहां बल उस तीर या गेंद में किन्तु उसमें नया रस नहीं मिलाया गया है अतः गेंद या तीर बल के अनुसार कुछ दूर चलकर फिर ज्यों का त्यों हो जाता है उसमें सदा के लिए उस बल से कोई नया परिवर्तन नहीं होता किन्तु एक मिट्टी को भट्टी पर चढ़ा कर जब औटाया जाता है तो वह विशेष प्रकार के बल को पाकर कांच बन जाता है उस के में उस बल से सदा के लिए एक नया परिवर्तन हो जाता है । पानी के परमाणुओंों में विशेष प्रकार बल लगने से बलों गाँठ को मिट्टी कहते हैं अब उस गांठ पर दूसरा की एक गाँठ बँध गई थी उस ही बल लगाने से काँच कहते हैं । उस काँच वाली गाँठ को यदि दूसरे प्रकार की गाँठ बँधी गई है जिसको प्रयत्न से खोलें जावे तो सभव है कि काँच फिर मिट्टी हो जावे या प्रकृति के अनुसार अपने आप खुल उस ही पानी के रूप में ग्रा जाती है । यही गाँठ का प्रकार मिट्टी की भी गाँठ खोल देने से वह बँधना और खुलना है । [ ६५ J

पृष्ठ 128

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ब्रह्मविज्ञान के रस, वल का इस प्रकार हृद् ग्रन्थि के मुक्ति से ग्रात्मा के बन्धन की मुक्ति हुआ करती है जिसमें और फिर अपने ग्राप खुल कर आश्रय होने के कारण अपने ग्राप बंध कर जगत् के रूप में या जाता है कभी जगत् बनता है और | ग्रात्मा के रूप में अर्थात् स्वरूप में या जाता है । इस प्रकार एक ही ग्रात्मा सर्वथा ग्रखण्ड था, व्यापक | कभी अपने रूप में रहता है । दोनों भेद एक ही तत्व के हैं । जो ग्रात्मा पहले परिमाण ` या और एक रूप था उसी में बल के बन्धन से हृद्ग्रन्थि बन कर भिन्न रूप या जाता है और बन अर्थात् वल की न्यूनाधिकता के अनुसार परिछिन्न वस्तु बन कर उसी ग्रात्मा के भिन्न २ ग्रनेक खण्ड जाय करते हैं । पहली ग्रन्थि से जो वस्तु बनी थी उस पर दूसरी ग्रंथि से दूसरी बस्तु, तीसरी से तीसरी वस्तु इस प्रकार नाना वस्तुओं की सृष्टियाँ एक ही वस्तु के रस में हुआ करती हैं जैसे एक पानी की बूंद अंकुर, शाखा, पत्र, पुष्प, फल, वीज होते हैं और उस बीज का गऊ के पेट में जाने पर दूध, दही, मलाई, मक्खन आदि नई २ सृष्टियाँ एक ही रस की हुई हैं इन सब में रस नहीं वदला है केवल बल नया २ चढ़ता गया है । यह बन्धन का सिलसिला जगत् का रूप है । ज्यों २ इन वस्तुनों से बल का बन्धन छुड़ाया जावे त्यों २ वस्तु अपने कारण के रूप में क्रम से याते २ अन्त में सव बलों का बन्धन मुक्त हो पर शुद्ध रस रह जाता है और उस पर बिना बन्धन के वल सब घरे रहते हैं । यही आत्मा की मुक्ति कहलाती है । इस मुक्ति की दशा में ग्रात्मा या रस अपने स्वरूप में ही रहता है । से ग्रात्मा क्रम से बन्धन पर बन्धन पाकर मन, प्राण, वाक् अर्थात् श्राकाश वायु, तेज, जल, मिट्टी, खनिज, उद्भिज, वृक्ष और जीव तथा जीवों के शरीर तक बन्धन में आ जाते हैं और ये सब अर्थ कह-लाते हैं जो प्रथम न; के रूप में कुछ २ ज्ञान रखता था वही अब वल की मात्रा बढ़ने से अत्यन्त जड़ के रूप में आ गया है किन्तु शरीर में फिर अपने स्वरूप से प्रवेश करके अपने उद्धार की चेष्टा के लिए ज्ञान स्वरूप का विकास करता है । यदि यह ज्ञान की मात्रा क्रम से बढ़ाई जावे क्रम से अथवा क्षीणोदर्क के क्रम से बन्धन सब खुलते खुलते शरीर से वृक्ष, खनिज, मिट्टी तो , पानी भूमोदर्क , अग्नि, वायु, वाक्, प्राण, मन के रूप में ग्राकर शुद्ध रस वन सकता है और जगत की संज्ञा मिट कर शुद्ध सच्चिदा नन्द की दशा मिल सकती है । जो पारीर के पकड़ में ग्राकर परिछिन्न रूप में अल्पज्ञ सुखी, दुखी हो गया था वही रह कर, ग्रव परमानन्द के रूप में ग्रा पाकर गया है । इस प्रकार बन्धन जगत् बनना और मुक्ति इस ग्रात्मा का पाकर निज स्वरूप में ग्राना प्रवाहसिद्ध होता है किन्तु यदि विशेष होने के कारण स्वाभाविक प्रतीत प्रयत्न किया जाय तो बन्धन सर्वथा का प्रात्यन्तिक मक्ति के वीज | निकल जाने से सम्भावना की जाती है कारण वन्धन का कि फिर बन्धन की जाती है कि फिर का बीज सर्वथा निकल जाने से सम्भावना बन्धन न ग्रावे इसीयत्न को विज्ञान कहते हैं यह 1. विशुद्ध मुक्ति होना सम्भव है । पूर्ण रीति से आत्मज्ञान होने पर किन्तु यह ग्रात्मज्ञान | मार्ग निकाला गया है उसको का प्रयत्न अत्यन्त कठिन सुगम उपासना कहते हैं । है ग्रतः उसका एक जीव का मन अर्थात्ज्ञान चञ्चल है किन्तु है क्योंकि जीव परमेश्वर का शान्त का ज्ञान अल्प मन अर्थात् ज्ञान नितान्त या परिछिन्न होने के वश नाना के कारण ग्रज्ञान से घिरा के प्रकार भय, शोक आदि दुःख के रहता है । इसी अज्ञान कारण जीव के ज्ञान में जीव का ज्ञान चञ्चल है किन्तु परमेश्वर उपस्थित हुआ करते हैं इसीसे का ज्ञान व्यापक होने के नहीं कारण उसमें हो ग्रज्ञान का संबन्ध [ ६६ ]

पृष्ठ 129

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ॐ ब्रह्मविज्ञान सकता अतः अज्ञानकल ना कादि दुख को कोई भी कारण उपस्थित नहीं होता जाना एक इसीसे ईश्वर का रोक ऐसत में यदि जीव भी अपने मन से चञ्चलता मिटा कर मन की वृत्ति को कर योगाभ्यास के द्वारा यदि अपने मन को स्थिर कर सके तो चिदाभास मन दोनों ही जागा रूप होने से एकतान हो जाते हैं और इस प्रकार जीव का मन का मन धीरे और २ ईश्वर ईश्वर का के मन में लीन हो जाता है और बीरे २ ईश्वर के मन की कला बढ़ाने लगती है यह ही रहस्य है । उपासना का इस उपासना किया में जीव का के ग्रन्त में मन ईश्वर मन सेना समीप होकर ठहर जाता है कि जीव का और भाग बन जाने मन से भीश्वर के मन की शक्ति अर्थात् ग्रवयव बन जाता है । पास रहने से उपासना भक्ति कहते हैं । योग जिस प्रकार चक्षु को स्थिर करें किन्तु पानी में प्रतिविम्व चञ्चल हो तो दोनों का पूरा एकतान नहीं हो सकता ग्रच्छी किन्तु यदि प्रतिविम्ब भी स्थिर किया जाय तो वह प्रतिविम्व चक्ष के समीप में तरह श्रा जाता है प्रतिविम्व इसी मेल को योग कहते हैं । इसी पास आने को उपासना कहते हैं और इसी का बां पर फिर प्रतिविम्ब हो जाने को भक्ति कहते है यदि स्थिर; यह क्रिया संयम शक्ति से की जावे तो जिस भक्ति प्रकार ग्रॉस प्रतिविम्व के प्रत्येक भाग पर अपना प्रकाश डालती है उसी प्रकार होने पर जीव के योग ज्ञान में ईश्वरीय ज्ञान का प्रकाश खुब पड़ता है जिससे ग्रष्टसिद्धि नाम का वल प्रत्यक्ष करती प्राप्त हति हुए दीखता है । यह प्रकृति का नियम है कि जब एक वस्तु दूसरा वस्तु से योग है तो ग्रल्प वस्तु के माना की शक्ति में अधिक मात्रा की शक्ति धीरे २ आने लगती है जैसे एक ठण्डी पास गरम इसी वस्तु का योग किया जावे तो उस ठण्डी वस्तु में भी गरमी का प्रवेश हो जायगा । नियम के बढ़ अनुसार पक्ष जीव का सर्वश ईश्वर में योग करने पर अल्प जीव के ज्ञान की मात्रा जाया करतीहै यही योगबल कहलाता है । योग तीन क्रिया और में ही मेश्वर प्रकार का है- क्रियायोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग | क्योंकि ज्ञान पर-के दो ज्ञान के मुख्य स्वरूप है अतः जीव यदि चाहे तो क्रिया द्वारा परमेश्वर में प्रवेश कर सकता है अथवा द्वारा उसमें लीन केवल क्रिया के योग किया हो सकता है । इसी प्रवेश करने को योग कहते हैं । यदि द्वारा । जाय अथवा केवल उसे क्रियायोग या ज्ञानयोग कहेंगे । किन्तु यदि ज्ञान संयुक्तक्रिया ज्ञान के द्वारा तो के द्वारा अथवा क्रिया योग किया जावे तो उसे भक्ति योग कहते हैं क्योंकि भक्तियोग संयुक्त ज्ञान के द्वारा । में कर्मयोग में कर्म का ज्ञान अथवा ज्ञान का कर्म भक्ति अर्थात् शाग बन जाता है । इन तीनों योगों के कारण से महत्व की प्राप्ति है क्योंकि कर्म की शक्ति जीव में बढ़ जाती है और शक्तिगान् होने सामर्थ्य महत्व बढ़ता है और भक्तियोग अत्यन्त सरल उपाय है जिसके द्वारा ज्ञानयोग प्राप्त करने की या जाती है परमेश्वर के पूर्ण ज्ञान में लय कर देने के कारण और ज्ञानयोग से जीव अपने अल्पज्ञान को ईश्वर कहते हैं । तुल्य हो जाता है इसी को साय मोक्ष अर्थात् सायुज्यमोक्ष स्वार्थ की लिप्सा खास व्यक्ति के पदार्थ की लिप्सा से कर्म न किया जावे ( लोग ) न करके अथवा किसी से किया, केवल सामान्य भाव से संपूर्ण जगत् की जनता के हित करने वाला कर्म यदि निष्कारण बुद्धि || जावे तो कोई भी विचार न करके विश्व हितकारी कर्म उसे योग कहते हैं । एकदम स्वार्थ का [ ९ ७ }

पृष्ठ 130

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ॐ ब्रह्मविज्ञान करने से विश्व के रूप में पुष्टि होती है जिसमे विश्वमूर्ति परमेश्वर से हमारा योग उत्पन्न होता है । यही कर्मयोग का मुख्य तात्पर्य है । उपासना का मुख्य लक्ष्य जीव का ईश्वर में योग करना है और यह दो प्रकार से होता है अपने श्रात्मा के अंश को परमात्मा के अंश में योग करना अथवा परमात्मा के अंश को जीवात्मा के अंश में योग करना । इन दोनों ग्रल्प मात्रा के जीव का पूर्ण मात्रा के ईश्वर में तुल्य रूप से आत्म समर्पण हो जाता है और यही ग्रात्म समर्पण उपासना का मुख्य स्वरूप है । यह संपूर्ण जगत् परमेश्वर | का शिल्प है इसमें यदि जीव अपने निज के ज्ञान से उत्पन्न शिल्प को यदि बहिर्जगत् के रूप में समर्पण . कर दे तो वह जीव के ज्ञान का ईश्वरीय ज्ञान में ग्रात्म समर्पण होगा । यह प्रथम उपासना है । जैसे वन का उत्पन्न होना प्राकृत होने के कारण ईश्वरीय शिल्प है किन्तु एक वगीचा लगाने में मनुष्य की वृद्धि खर्च होती है और वहिर्जगत् के रूप में परिणत हो जाती है । इससे कहना होगा कि जीव ने अपनी ज्ञान की मात्रा को बहिर्जगत् रूप ईश्वरीय ज्ञान की मात्रा में सदा के लिये श्रात्म समर्पण कर दिया है । जव तक जगत् में वह जीव का शिल्प विद्यमान रहेगा तब तक जीव का ज्ञान ईश्वरीय ज्ञान में समर्पित है । यह ही जीव की ईश्वर उपासना है । जितने पदार्थ इस जगत् में दीखते हैं उन सब की विद्या पृथक् २ है । प्रत्येक वस्तु की उत्पत्ति, स्थिति और नाश और परस्पर के संबन्ध का ज्ञान ही विद्या कहलाता है । जो एक महाज्ञान परमेश्वर का स्वरूप । इन भिन्न - भिन्न पदार्थों का भिन्न - भिन्न सभी ज्ञान भी उसी महाज्ञान का युद्ध प्रति ग्रङ्ग है । अतः यह सभी विद्या रूपी ज्ञान परमेश्वर के ग्रङ्ग होने से परमेश्वर का स्वरूप कहे जाते हैं । जितना ही इन विद्यात्रों का उपार्जन किया जावे उतना ही ईश्वर के स्वरूप का हम स्पर्श करते हैं ग्रथवा यों समझो कि परमेश्वर की ग्रात्मा से अपनी ग्रात्मा का स्पर्श कराते हैं । यदि संभव होता की जगत् के समस्त पदार्थों का हम ज्ञान कर लेते तो परमेश्वर की संपूर्ण ग्रात्मा और मेरी ग्रात्मा एक हो जाती । किन्तु ऐसा कदापि नहीं | क्योंकि कोई भी मनुष्य संपूर्ण जगत् के पदार्थों का ज्ञान या अनुभव नहीं कर सकता ग्रतः बहुत अच्छा उपाय यह है कि जगत् के सभी पदार्थों को छोड़ कर केवल अपनी ग्रात्मा को वाह्य जाने क्योंकि संपूर्ण जगत के पदार्थों की रचना में जितनी शक्तियाँ लगी हुई हैं उन सब शक्तियों का एक-एक बिन्दु लेकर ही हमारी आत्मा बनी है जो सर्व शक्तियों का छोटा घन है । उस हमारी एक ग्रात्मा को जान लेना सम्पूर्ण जगत् को जान लेने के बराबर है । यदि हम ग्रपने ही ग्रात्मा को यथार्थ रीति से जान लेवें तो संपूर्ण जगत् को हमने जान लिया । और जगत् से पृथक् कोई ईश्वर का स्वरूप नहीं है ग्रतः जगत् को जानना ही ईश्वर को जानना है । तो इससे सिद्ध हुआ कि अपनी ग्रात्मा का यथार्थ ज्ञान होने से हमारी जीवात्मा ईश्वरज्ञानमय हो जाती है और जीव ईश्वर में भेद - भाव नहीं होने को सायुज्यमुक्ति कहते हैं और यह सायुज्यमुक्ति ग्रात्म ज्ञान रूपी ज्ञानयोग द्वारा पाता । इसी प्रकार यह ज्ञानयोग की उपासना हुईं । सिद्ध होती है । इस इस प्रकार कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग तीन उपासना के मार्ग बतलाये गये हैं । इन में यदि हम संपूर्ण मनोयोग न दे सके तो बहुत थोड़ा भी चलना परम लाभदायक है क्योंकि मार्गों में जाने का संस्कार आत्मा में हो जाने से दूसरे जन्म में उतनी गति स्वभावतः सहज ही में हो उस जाती मार्ग है I ६८ ]