ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 131–140

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 131–140

पृष्ठ 131

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ब्रह्मविज्ञान और आगे भी उसी मार्ग में चलने के लिए प्रबल इच्छा और प्रकृति होती है । इस प्रकार अनेक जन्म में कभी न कभी सायुज्य मुक्ति मिल जाती है । यही विषय गीता में भगवान् ने कहा है;: -बहूनां जन्मनामन्ते, ज्ञानवान् मां प्रपद्यते । अनेकजन्मसंसिद्ध, स्ततो याति परां गतिम् ॥ अर्थात् बहुत जन्मों के ग्रन्त में ज्ञानी मेरे को प्राप्त कर लेता है । अनेक जन्मों में अच्छे प्रकार ज्ञान प्राप्त कर मुक्ति पा जाता है । ऐसी कोई भी उपासना नहीं है कि जिससे जीव का ग्रात्मबल न बड़े किन्तु उपासना करता हुआ मनुष्य यदि दुःखी रहे यदि उसका हृदय दुर्बल हो तो निःसन्देह समझना चाहिए कि वह उपासना नहीं करता है और उसकी उपासना विधियुक्त नहीं होती क्योंकि प्रकृति नियमानुसार तीनों प्रकार की उपा-सना मनुष्य के ग्रात्मबल को बढ़ाने वाली है । उपासनासूत्र का साराश रस और बल दो तत्वों से सकल जगत् बना हुआ है । रस वास्तव में शान्त और एक रूप में रहने वाला है किन्तु बल उसके विरूद्ध क्षुब्ध और बहुरूपा है । रस और बल वैधम्मीं होकर भी जुदे - जुदे नहीं रहते वे सदा मिले हुए रहते हैं । रसबल संयोग का नाम ही जगत् है । जब रस पर बलों के ढ़ेर मिलते हैं तब वह रसबलों सहित एक प्रकार की ग्रन्थि सी हो जाती है इसी को हृद् ग्रन्थि कहते हैं । रस को ग्रात्मा कहते हैं | हृद्ग्रन्थि के कारण ग्रात्मा का बन्धन है और इस ग्रन्थि के छुटकारे या खुलने का नाम ही मोक्ष है मोक्ष ही सब से बड़ा पुरुषार्थ कहलाता है हृद्ग्रन्थि पर केवल बल के आने से क्षोभ मात्र होता है किन्तु रससहित बल के आने से दूसरी ग्रन्थि बन जाती है जैसे जल पर रससहित बल आने से मिट्टी और फिर मिट्टी से काच बन जाता है । इन गाँठों के खुलने से फिर वस्तु अपने पूर्वरूप में चली जाती है । वही गाँठ का बंधन या खुलना है । अनादि, अनन्त, असीम, सर्वव्यापी, शान्त, एकरस और ज्ञानगय जो तत्व है उसको रस, श्रात्मा या ब्रह्म के नाम से कहते हैं । इनके विरुद्धधर्म वाला सादि, सान्त, सीमाबद्ध, परिचित, क्षुब्ध, अन्धकारमय, बहुरूपा, अनेक आधार रस में तिरोहित, उद्भुत होने वालों, जो निराला एक तत्व है उन को बल, जड़,.या माया कहते हैं । रस में बल के उदभूत होने का नाम सृष्टि है और रस में थल के तिरोहित होने का नाम प्रलय है । सृष्टिदशा में बल, रस में ऐमा लिपट जाता है कि रस बल से बँधा हुआ सा प्रतीत होता है । रस में बलों के इतने ढेर के ढेर एकत्र हो रहे हैं कि साधारण दृष्टि में सफल जगत् जड़ ही जड़ दीखता है । किसी न किसी कारण से कहीं कहीं बल इतना निर्बल हो जाता है कि वहाँ ज्ञानमय रस का भान होने लगता है । ऐसी दशानों को ही चेतना कहते हैं । बल का जोर कम होने से ही जड़ ही चेतना कहलाता है, ये चेतन वस्तुयें हीं जीवन कहलाते हैं । इन जीवों में वल का जोर J घटते 2 इतना घट जाता है कि ज्ञान जो रसस्वरूप है भली प्रकार दीखने लगता है और ऐसे जीव ही [ ६

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* ब्रह्मविज्ञान और जीवों की अपेक्षा मनुअ चल मनुष्य कहलाते हैं । जड़ से चेतन में वल आधार रह जाता है और शेप बलबन्धन से मुक्त होने का भी न्यून हो जाता है और ज्ञान की मात्रा इतनी बढ़ जाती है कि अपने होने पर बल का उपाय कर सकता है । इस उपाय का नाम ही विज्ञान हैं । पूर्ण रीति से यह प्रात्मज्ञान श्रात्मज्ञान का प्रयत्न अत्यन्त - बन्धन, वल के रहते हुए भी टूट जाता है इसी को मुक्ति कहते हैं किन्तु हैं । कठिन है अतः उसका एक सुगम मार्ग निकाला गया है, जिसको उपासना कहते पश्चात् विशिष्टत्रिसत्योपनिपद् के निरुपण के अनन्तर और भी अधिक सूक्ष्म विचार करने के और जीव श्रौर ईश्वर के अतिरिक्त एक परमेश्वर भी ज्ञात होता है । यह जगत् इन तीनों के अतिरिक्त मान कर यह कुछ भी प्रतीत नहीं होता । ग्रतः जीव, ईश्वर और परमेश्वर इन्हीं तीनों को सत्य शुक्लत्रिसत्य नाम का प्रकरण प्रारम्भ किया जाता है । इस में निम्न परिच्छेद हैं । १ प्रजापतिपरिच्छेद । २ व्यूहानुव्यूह परिच्छेद । ४ श्रात्मगतिपरिच्छेद । ३ श्रात्मपरिच्छेद । शुक्ललिसत्योपनिषत् [ ५ ] १- प्रजापति - परिच्छेद का प्रथम ' मूलैकत्वसूत्र ' विषय प्रजापतिपरिच्छेद का प्रथम सूत्र ' मूलकत्व ' है अर्थात् इस जगत् का एक ही मूल है । इस का निरूपण इस परिच्छेद में किया है । की जो जहाँ कुछ हम देखते हैं इन्हीं सब का प्रकार जगत् कहते हैं । यह जगत् यद्यपि नाना । वस्तुनों का समूह दृष्टिगोचर होता है तथापि इन सब को चाहिये एक ही वस्तु से उत्पन्न हुग्रा समझना एक ही वस्तु क्रम से पश्चात् अनेक रूपों में परिणत हो गई है कुछ उत्पन्न । वह वस्तू जिससे यह सब हुआ है उसको ' ब्रह्म ' कहते हैं । वह एक है इसके जोड़ सबका , काकोई दूसरा पदार्थ नहीं है । वह आदि है और वह ही यह सब कुछ है । ब्रह्म से अतिरिक्तयहाँ कुछ नहीं जाना गया है एक ही वस्तु स यह सब भिन्न २ पदार्थ हम बन कर इस प्रकार विस्तृत हो गये हैं जिनको अनन्त भिन्न रूपों में दखते है प्रमाण । इन सबका एक ही किसी यही हैं कि हम तत्व से उत्पन्न होना मानने में मुख्य जो इन सत्र भिन्न पदार्थों कोआपस में परिवर्तनशील मृत्तिका अत्यन्त भिन्न अवस्था में है पाते हैं । ग्रग्नि, आप और ) समय पाकर ग्राम में ( पत्थर हो जाता बदल जाते हैं यहाँ है और पापा पानी । इसका तक कि पानी पापाण निश्चित विस्तारपूर्वक वर्णन आगे कहीं अवश्य हो गया कि अग्नि, ग्राप और होगा परन्तु इससे इतना ) और कुण्डलादिभूषणों मिट्टी इत्यादि एक भूषण के अनुसार आपस में पर्याय हैं । जो कड़ा ( नहीं आपस में परिवर्तनशील हो सकता और जब बदलते हैं तो कार्य हैं उनका ग्रापस में किसी का कोई कारण है और कार्य होगा का कारण होनाश्रावश्यक है । अतः मानना कि इन पर्यायों से भिन्न इन सब का मूल कारण कोई एक ही पदार्थ है । [ १०० ]

पृष्ठ 133

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हें ब्रह्मविज्ञान के जिस प्रकार एक ही बीज से उत्पन्न होकर अंकुर, पिण्ड, शाखा, पत्र, पुष्प, फलादि भिन्न २ प्रकार के पदार्थ बन कर उनके समूह में एक वृक्ष का रूप हो जाता है उसी प्रकार ब्रह्मरूपी एक तत्त्व मे शनैः शनैः शन्तानन्त भाव उत्पन्न होकर उनके समूह से यह जगत् का रूप खड़ा हो गया है । जिस प्रकार एक ही पिता के शुक्रविन्दु से शरीर के नाना प्रकार के भिन्न २ भाव जैसे रुधिर, अस्थि, मज्जा, वसा ( चरबी ), स्नायु आदि बनते हैं और इनमें एक ही प्रकार के बिन्दु से इस प्रकार के भिन्न २ भाव कैसे बने और क्यों बने यह जाना नहीं जा सकता, ठीक इसी नियम के अनुसार एक ही ब्रह्म से जगत् के प्रतन्त भिन्न २ भाव बन गये हैं, ऐसा जानना चाहिए । जैसे उसी शुक्रबिन्दु से चक्षु श्रोत्र, वाक्यादि भिन्न २ इन्द्रियां बनी हैं परन्तु चक्षु का काम श्रोत्र से नहीं होता और श्रांत्र का कार्य वाकू नहीं करती, इस प्रकार शक्तियों में अन्तर क्यों पड़ गया; एक ही वस्तु से उत्पन्न होकर क्यों नहीं सब का कार्य सब करते हैं यह ज्ञात नहीं होता वैसे ही एक ही ब्रह्म से उत्पन्न होने वाले अग्नि, आप, वायु, शब्द आदि में भिन्न २ प्रकार की शक्तियां कैसे उत्पन्न हुई यह विषय श्रचिन्त्य है किन्तु इसमें संदेह नहीं कि उस एक वस्तु से भिन्न २ प्रकार की शक्तियों का भिन्न २ प्रकार की वस्तुओं का विकास हुआ है । हम यदि इस पर विचार करें तो चक्षु में क्या शक्ति है वा श्रोत्रादि इन्द्रियों की शक्तियों में क्या भिन्नता है अथवा जल, वायु, अग्नि प्रभृति में क्या २ शक्तियां हैं इन बातों की भली प्रकार परीक्षा कर सकते हैं और सम्भवतः उन शक्तियों को यथार्थ रीति रो जान सकते हैं किन्तु फिर भी उन शक्तियों के निज के वास्तविक रूप क्या हैं, उनका विकास कैसे हुआ इत्यादि विषय अब भी हमारे ज्ञान की सीमा से बाहर हैं अर्थात् किसी मनुष्य की भी विचार शक्ति ग्रहणनहीं कर सकती । यहाँ पर किसी २ दार्शनिक का ऐसा विश्वास है कि वृक्ष का मूल ( बीज ) जिससे वृक्ष उत्पन्न होता है स्थूलरूप से देखने पर एक ही वस्तु प्रतीत होती है किन्तु वह बीज, अकुर, पिण्ड, डाल, पात, फूल भिन्न २ पदार्थों का संग्रह रूप है उसी का क्रमशः विकास होकर मे सब पृथक् २ दृष्टिगोचर होते हैं । मनुष्य का शुक्र भी रुधिर, ग्रस्थि मज्जा, चक्षु, क आदि अत्यन्त सूक्ष्म रूप से विद्यमान भिन्न २ पदार्थों काएक संग्रह है जिसमें से क्रमशः विकास होकर भिन्न २ अवयवों में विस्तृत होकर शरीर का रूप प्रकट होताहै । ये सब जो पहले भिन्न - भिन्न थे उन्हीं से भिन्न २ जाति के पदार्थ पृथक् २ उत्पन्न हुए हैं । किसी एक ही वस्तु से भिन्न २ रूपया भिन्न २ शक्तिया उत्पन्न होना कदापि नहीं माना जा सकता। ग्रतः पूरणं में जितने के पदार्थ विद्यमान हैं उन सब का अत्यन्त सूक्ष्मरूप का नाम ही ' ब्रह्म जगत् प्रकार ' हैं, बह भिन्न २ रूपों का एक मिश्रण मात्र है । जिस प्रकार किसी शरबत में सौ ( १०० ) प्रकार की वस्तुएं मिश्रित हो और उसमें से एक बूंद ली जान जो देखने में एक बिन्दु के समान है किन्तु विश्वास करना होगा कि से मिश्रित उन एक बूंद में भी उन सौ ( १०० ) वस्तुओं का अंश सूक्ष्मरूप है । इसी प्रकार और इसमें बौद्ध ब्रह्म को भी मिश्रित पदार्थ मानना चाहिये । यह एक मत है और वैदिक विद्वानों का विश्वास है । ऐतरेय ऋषि के कथनानुसार विश्वास करने का कारण यह है कि प्राणी के शरीर के प्रत्येक अङ्ग से तेजोरस निकल कर एक स्थान अर्थात् अण्डकोष में जमा होता है । उसका संनिवेश उसी [ १०१ ]

पृष्ठ 134

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ब्रह्मविज्ञान है जिसको भ्रूण कहते प्राणी के ग्रङ्ग के अनुसार होने से उस प्रारणी के श्राकार का एक कीट पैदा होता का समूह एक तरल शुक्र हैं वह जल विन्दु के समान अत्यन्त मृदु और तरल होता है अतः सहस्रों भ्रूणों के आकार का के रूप में प्रतीत होता है । इस शुक्र में जो ग्रसंख्या भ्रूण कीट हैं उनका एक २ मनुष्य ही पश्चात् में होने से चक्षु, श्रवण, मुखादि सभी ग्रङ्ग प्रति ग्रङ्ग सूक्ष्मता से विद्यमान रहते वह हैं एक जिनका ही किसी श्रमिश्रित विकास होकर प्राणी का बड़ा भारी शरीर बनता है अतः कहना होगा कि उत्पन्न होने पर संभव विन्दु से बना हुग्रा नहीं है । यदि कोई प्रश्न करे कि यह प्रक्रिया प्राणी से प्राणी शुक्र से उत्पन्न न हो सकती है किन्तु इस सृष्टि में जो सर्ब प्रथम प्राणी उत्पन्न हुया वह अपने पिता के था अतः वह भ्रूण से उत्पन्न न होकर किसी एक ही जाति के अमिश्रित बिन्दु से अवश्य बना होगा, तो इसके उत्तर में हम बौद्ध सिद्धान्तरूप से यह निर्णय करते हैं कि ऐसा कभी कोई समय ही न था जबकि श्राणी अपने पिता से उत्पन्न न हुग्रा हो । यह सृष्टि अनादि है जैसे वृक्ष का बीज ग्रवश्य ही दूसरे वृक्ष से पैदा हुआ है उसी प्रकार दूसरे के शरीर में उत्पन्न हुए शुक्र से ही दूसरे प्राणी का शरीर बनने के नियम का सदा से प्रारम्भ है अतः शुक्र के अनुसार ब्रह्म का भी नाना विजातीय पदार्थों का संग्रहरूप एक मिश्रित पदार्थ होना ही निश्चित किया जा सकता है । से व इस उपर्युक्त सिद्धान्त पर यह विचार करना है कि शुक्र के विषय में यद्यपि यह कहना बहुत कुछ सत्य ठहरता है किन्तु हम देखते हैं कि संसार में सभी प्राणी योनिज ही नहीं है बहुत प्रयोनिज भी है । जैसे गांवर, कैले का रस श्रीर दही मिलाकर बन्द घड़े में रखने से बिच्छू उत्पन्न होते हैं, किसी देश में संदूक भर कर सब प्रकार के मेवे करके देने से हजारों कीटाणु उत्पन्न होकर पीछे उन सब का एक कीड़ा बन जाता है, लकड़ी बन्द में घुन धूप पैदा में ताप होते है, फलों में कीड़े पैदा होते हैं । यहाँ देखना है कि फलों का रस जो सर्वथा एक ही प्रकार का है उससे अस्थि मज्जा चक्षु, श्रवणादि ,, भिन्न २ प्रकार के पदार्थ बनते दिखाई देते हैं में ग्रांख यह कोई विश्वास नहीं कर सकता कि उन रसों और कान, हड्डी और माँस भिन्न चक्षु रूप में वर्तमान हैं । जिस रस से ग्रस्थि वनी है उस ही रस से भी बना है अतः यह कहा जाता है कि पदार्थ इस जगत् में एक ही किसी पदार्थ से भिन्न २ प्रकार के भी उत्पन्न हो सकते हैं अतः ब्रह्म को ग्रमिश्रित पदार्थ मान सकतेहैं । अब हम को वृक्ष के बीज पर भी वट के कुछ विचार करना है । वौद्धों का विश्वास है कि एक बीज में सारा वटवृक्ष ज्यों है । सूक्ष्मरूप से विद्यमान है जिस का पीछे विकास होता किन्तु यह विश्वास निरा अज्ञानता से भरा हुआ है किसी वृक्ष के बीज में उस वृक्ष का कोई भी अवयव हले से विद्यमान नहीं रहता । प्रायः करके वृक्षों का बीज के डिब्बे के तौर पर दो पाट के संपुट से जुड़ हुआ है 1 । दोनों पाटों के अन्दर केवल दो पत्ते बत्तौर सांचे को के विद्यमान रहते हैं और दोनों पत्तों जोड़ने वाला एक वृत्त डाँड ) भी होता उन है । इस वृन्त और पत्तों के का प्राण नियम से रहता है । एक प्राण जोड़ के स्थान पर तीन प्रकार वृत्त के द्वारा पृथ्वी में से चढ़ाता है जिन से पत्ते, डाली वगैरह मिट्टी घुला हुना पानी खींच कर ऊपर बनते रहते हैं॥ दूसरा प्राण दोनों पत्तों आकाश का रस अर्थात् सूर्य, चन्द्र की ग्रमी पोता की अणी के द्वारा रहता है, और तीसरा लाये हुए रस को लेकर प्रथम वृत्त और पत्तों को साँचे प्राण पृथ्वी और आकाश से में ढाल कर उनकी किसी न सूरत बनाता है और पीछे [ १०२ ]

पृष्ठ 135

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* ब्रह्मविज्ञान किसीग्रङ्ग को फोड़ करपत्ते की में बने हुए उस रस को बाहर निकाल देता है । बाहर निकलने पर सूरत मिट्टी मिश्रित पानी में से पानी के भाग को सूर्य और वायु चूस लेता है किन्तु मिट्टी के जाने से पृथ्वी का ग्राकर्षण रोक लेता अतः फिर पानी सींचने की आवश्यकता हो जाती भाग है । को यह ऊपर एक प्रकार का नियम है इसी में कुछ न कुछ न्यूनाधिक परिवर्तन करके भिन्न - भिन्न प्रकार का नियम देखा जाता है जिसका विस्तारपूर्वक वर्णन करना यहाँ आवश्यक नहीं है परन्तु इतना कहना आवश्यक इन बीजों में कुछ सांचे के प्रांश के अतिरिक्त और होने वाले वृक्षों के अवयव कुछ भी नही रह्ते | है उसी कि साँचे के द्वारा मिट्टी पानी से पिण्ड, पत्ते, डाल, फल, फूल, रस, गुठली यादि भिन्न - भिन्न प्रकार के पदार्थ उत्पन्न होते रहते हैं । ठीक इसी प्रकार हमारे ब्रह्म से सम्पूर्ण जगत् के भिन्नभिन्न पदार्थों का उत्पन्न होना माना जा सकताहै । यह एक दृष्टान्त केवल इसीलिये दिखाया है कि एकजातीय वस्तु से अनेक भिन्न जातीय वस्तुऐं उत्पन्न हो सकती हैं किन्तु वास्तव में जब देखा जाय तो ब्रह्म के लिये कोई दृष्टान्त देकर किसी विषय को सिद्ध करना सर्वथा अयोग्य है क्योंकि दृष्टान्तों से सिद्ध किया हुआ नियम भी सृष्टि का ही एक स्वरूप है । नियमों का बनाना ही सृष्टि का रूप है । सृष्टि होने पर ये नियम स्थान स्थान पर दृष्टिगोचर होते हैं किन्तु जब हम सृष्टि के मूलतत्व का निरीक्षण कर रहे हैं तो वह तत्त्व अवश्य ही सृष्टि से पहले होगा । सृष्टि से के पहले उस मूलतत्त्व में उन नियमों का जो सृष्टि के पश्चात् उत्पन्न हुए हैं जानना असंभव है अतः सृष्टि के पश्चात् पदार्थों कादृष्टान्त देकर मूलतत्त्व का निरूपण करना एक प्रकार अनुचित प्रतीत होता है, अतः इस सृष्टि का हम किसी एक ही मूलतत्त्व से होना आरम्भ करते हैं । इसमें संभव - असंभव का प्रश्न उठाना निरी ज्ञानता है । यदि हम सृष्टि की रचना पर गम्भीर दृष्टि डालें तो छोटी से छोटी सृष्टि का ढंग आश्चर्य-जनक औरअसंभव प्रतीत होता है किन्तु जिनको हम बारबार होते हुए देखते हैं उनका असंभव स्वभाव संभव में परिणत त्यागने हो जाता है । केवल जिन नियमों को हमने नहीं देखा है उन्हीं को मनुष्य असंभव करके को तत्पर हो मार्ग में किसी सीमा तक ठीक जाता है किन्तु इस प्रकार का ग्रहण और त्याग व्यवहार है किन्तु पारमार्थिक बद्ध विज्ञानमार्ग में कोई भी ग्रसम्भव नही माना जा सकता । मनुष्य की बुद्धि सीमा-है ग्रतः उसकेजानने न जानने से संभव असंभव की व्यवस्था करना उचित नहीं हो सकता अतएव हम यहाँसिद्धान्त रूप से करते हैं कि संपूर्ण सृष्टि एक ही मूलतत्त्व से बनी है और वह मूलतत्त्व यह स्थापित यह विजातीय भेद सजातीय भेद और स्वागत भेद इन तीनों से रहित है, पूर्ण, ग्रखण्ड, अद्वितीय है । इससे, किसी प्रकार इसमें बिना कोच सृष्टि हुई यही दिखाने के लिए हम अग्रसर होते हैं । अलबत्ता मुझको के इतना के हैं क्योंकि सृष्टि वीज कहना आवश्यक है कि ब्रह्मा की सव कार्यवाही दृष्टान्त अनुकूल नहीं आदि से वृक्षादि के ही नियम दीखते हैं | यह कि बीज से अंकुर उत्पन्न होने पृथ्वी उत्पन्न होने में कितने की गरमी उसकी उर्वरता सींचना हवा सूर्य का प्रकाश, चन्द्रमा की ग्रमी और ऋतु दि, जल का,, , बहुत से सहयोगी के भी न होने पर अंकुर नहीं होता और अंकुर उत्पन्न ने कारण होते हैं, इनके एक पर बीज का में ये सब भी नहीं होते अर्थात् ब्रह्म के अतिरिक्त असली स्वरूप सर्वथा नष्ट हो जाता है परन्तु ब्रह्म कुछ न किसी सहयोगी करण की आवश्कता होती है और न इतने बड़े जगत् की सृष्टि होने पर उस मूलतत्त्व ब्रह्म के असली स्वरूप में किसी प्रकार का फर्क आता है वह ज्यों का त्यों बना हुआ रह [ १०३ ]

पृष्ठ 136

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* ब्रह्मविज्ञान * कर अत्यन्त अद्भुत सृष्टि की रचना कर देता है । यहीं उसकी महिमा है । यदि हम से कोई प्रश्न करे कि इस सृष्टि के अन्दर सहकारी कारण का ग्रावश्यक होना और ब्रह्म में उसका न होना, ग्रथवा सृष्टि के अन्दर कारण में विकार होना और ब्रह्म में विकार न होना इस प्रकार के भेद होने में कारण क्या है । तो इसका यथार्थ उत्तर मेरे पास नहीं हैं क्योंकि इस सृष्टि की विद्या के दो विभाग हैं पर और अपर । पर विभाग इस प्रकार का जटिल है कि प्राणी के मन और बुद्धि की सीमा से बाहर है उसके जानने का दावा करना ग्रज्ञानता है और ग्रनिर्वचनीय है केवल अपर विभाग को मनुष्य बहुत सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर जान सकता है अर्थात् उस एक मूलतत्त्व से इतनी विशाल सृष्टि किस रीति से उत्पन्न हुई, क्या क्या उत्पन्न हुए, जगत् का क्या रूप है इत्यादि विषय जानना ही अपर विद्या है उसी का विचार करने लिए हम यहाँ पर कुछ वर्णन करते हैं । मूलैकत्वसूत्र का सारांश इस सूत्र में इस विषय का निरूपण किया जाता है कि इस समस्त जगत् का एक ही मूल है । यह जगत् श्रनन्त भिन्न भिन्न पदार्थों का एक समूह है । हम प्रसीम भिन्नतामय जगत् का कारण या बीज या मूलतत्त्व एक ही बुर्गा, ग्रखण्ड, अद्वितीय भेदशून्य पदार्थ है जिसको ' ब्रह्म ' कहते हैं इसका कुछ विचार करने से विदित होगा कि जगत् के समस्त भिन्न पदार्थ परस्पर बदलते रहते हैं । जैसे पृथ्वी से घास और घास, दूध, रक्त, गोबर और फिर दूध से दही, मक्खन इत्याद बदल जाते हैं और फिर समय पाकर घास, दूध यादि पृथ्वी में परिणत हो जाते हैं । ऐसी दशा में न पृथ्वी घास, दूध का कारण कहीं जा सकती है और न घास दूध पृथ्वी का कारण कहा जा सकता है । ऐसे ही पृथ्वी पानी में और पानी पृथ्वी में वदल जाया करते हैं यहाँ पर कौन किसका कारण है. नहीं कहा जा सकता । इसी प्रकार जगत् के समस्त पदार्थ श्रापस में वदलते रहते हैं । ये सब ग्रास में कार्य पर्याय हैं ये एक दूसरे के कारण नहीं कहे जा सकते । क्योंकि जगत् परिवर्तनशील है ग्रतः कार्य है । और जव कार्य है तो कारण ग्रवश्य होना चाहिये । जगत् का कारण होने में मुख्य प्रमाण इस जगत् का कार्य होना ही है और जब कार्य सिद्ध हुआ तो इसका कोई न कोई कारण होना स्वतः सिद्ध हो गया । कार्य रूपधारी और सीमावद्ध है किन्तु कारण अरूप और असीम है अतः केवल अनुभवगम्य । जैसे स्वर्ण ग्राभूषणों का कारण है वैसे ही इस जगत् कार्यरूप का कोई आधारभुत कारण है और वह ग्ररूप, ग्रमीम है किन्तु अनुभवगम्य श्रवश्य प्रतीत होता है । इस कार्य रूप जगत् का ग्राधार भूत कारण, वीज मूलतत्त्व ही ' ब्रह्म ' कहलाता है | यह ग्ररूप, असीम, पूर्ण, अखण्ड द्वितीय यादि सिद्ध होता है । उदाहरणार्थ जैसे एक ही वीज से कई पदार्थों के पश्चात् एक वृक्ष बनता है उसी प्रकार ' ब्रह्म ' रूपी एक तत्त्व से धीरे धीरे ग्रनन्तानन्त भाव उत्पन्न होकर उनके समूह से यह एक जगत् का रूप खड़ा हो गया है जैसे एक ही पिता के शुक्रविन्दु से शरीर के अनेक भाव, रस, खून, आदि बन जाते हैं और एक ही विन्दु से ये अनेक भाव कैसे वन गए और क्यों वन गये कोई नहीं कह सकता, वैसे ही एक ही ब्रह्म से जगत् के नाना भाव वन गये हैं । जैसे एक ही शुक्रविन्दु से भिन्न भिन्न इन्द्रियाँ भिन्न भिन्न शक्तियों के साथ वन गई हैं और ये शक्तियां एक विन्दु से कैसे वन गई यह नहीं जाना जा सकता वैसे ही पृथ्वी, जल, तेज ग्रादि में भिन्न भिन्न शक्तियां कैसे पैदा हो गई, नहीं कहा जा सकता | अलवत्ता, ये क्या हैं और क्या कार्य करते हैं यह कहा जा सकता है किन्तु इनका वास्तविक रूप और उनका विकास कदापि नहीं कहा जा सकता । [ १०४ ]

पृष्ठ 137

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 137 का मूल पृष्ठ
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* ब्रह्मविज्ञान * किसी किसी दार्शनिक का ऐसा विश्वास है कि बीज में वृक्ष के समस्तभाग सूक्ष्मरूप से रहते हैं जैसे वृक्ष और मनुष्य, बीज और वीर्य में नुक्षारूप से विद्यमान हैं वैसे हो यह स्थूल जगत् ग्रपनी समस्त शक्तियों सहित ब्रह्म में सूक्ष्मरूप से रहता है | अतः ब्रह्म एक भांति का पदार्थ नहीं है वह मिश्रित पदार्थ है । इस मत में बद्धि और वैदिक दोनों का ही विश्वास है । ऐतरेय ऋषि के कथनानुसार वैदिक विद्वानों का विश्वास करने का कारण यह है कि वीर्य भ्रूणों का समूह है और भ्रूण मनुष्य के शरीरानुसार सब श्रृङ्गों से परिपूर्ण है अतः वीर्य एक मिश्रित पदार्थ है और क्योंकि मनुष्य वीर्य से बना हुआ है यतः वह भी मिश्रित पदार्थ से बना हुआ है । यदि कोई ग्राक्षेप करे कि आदिम पुरुष भ्रूणों से बना हुआ नहीं कहा जा सकता तो उत्तर में यह कहेंगे कि ऐसा कोई ग्रादिम पुरुष नहीं हो सकता क्योंकि जब यह जगत् अनादि काल से है और ग्रनन्त काल तक ऐसा ही रहेगा तो ऐसा कोई समय नहीं था कि जब प्राणी अपने पिता से उत्पन्न न हुआ हो । जैसे वृक्ष का बीज अवश्य ही दूसरे वृक्ष में पैदा हुया है वैसे ही दूसरे के शरीर से ही उत्पन्न हुए शुक्र से ही दूसरे प्राणी के शरीर बनने का नियम सदा से है । इसी प्रकार ' ब्रह्म ' भी शुक्रानुसार नाना विजातीय पदार्थों का संग्रहरूप एक मिश्रित पदार्थ होना ही निश्चित किया जा सकता है । उपर्युक्त विषय शुक्र के तथा योनिज प्राणियों के विषय में ठीक हो सकता है किन्तु प्रयोनिजों में कभी ठीक नहीं रहता, जैसे विच्छु का पैदा होना, मेवे से कीड़ों का पैदा होना और फिर उन सब से एक कीड़े का बनना, लकड़ी में बुन का पैदा होना यादि । यहीं विचार करने पर विदित होगा कि एक ही रस से कीट के हाड़, मांस, ग्रांख यादि कैसे उत्पन्न हो गये । यह कोई नहीं कह सकता कि एक ही रस में हड्डी, मांस, ग्रांखयादि वर्तमान हैं । ग्रतः संभव हो गया कि रस से नाना भांति की चीजें वन सकती हैं और एक ही ब्रह्म से अनेक रूप जगत् हुआ है । बौद्धों का विचार है कि एक वट वीज में संपूर्ण वृक्ष ज्यों का त्यों सूक्ष्म रूप से विद्यमान है किन्तु यह उनकी भूल है क्योंकि वीज में न डाल है, न पात है और न कोई वट के अवयव है बल्कि वृक्षों का बीज डिब्बे के ग़दृश दो पाट के संपुट से जुड़ा हुआ है और दोनों पाटों में दो पत्ते श्रीर बतौर साँचे के ' रहते हैं और उन दोनों को जोड़ने वाला एक वृत्त भी होता है । इस वृत्त और पत्तों के जोड़ के स्थान पर तीन प्रकार का प्राण नियम से रहता है । एक नीचे के रस को खींचता है दूसरा ऊपर के रस को श्रीर तीसरा दोनों रसों के पहले के वृत्त और पत्तों को सांचे में ढाल कर उनकी सूरत बनाकर वीज के किसी अंग को छेदन कर उस रस को बदल कर वृत्त तथा पत्तों की सूरत में बाहर निकाल देता है । बस इन बीजों में कुछ ऐसे साँचे के सिवाय वृक्ष के और ग्रवयव कुछ भी नहीं रहते । उसी खांचे के द्वारा इसी मिट्टी पानी से पत्ते, डाल, फूल इत्यादि उत्पन्न हो जाया करते हैं । इसी प्रकार हमारे ब्रह्म में से भी जगत् के भिन्न - भिन्न पदार्थों का बनना माना जा सकता है । यह एक दृष्टान्त इसीलिये दिखाया गया है कि एक ही वस्तु से नाना प्रकार के भाव बन सकते हैं । जब जगत् में यह संभव है कि एक से अनेक बनते हैं तो फिर एक ब्रह्म से जगत् की अनेक वस्तु क्यों नहीं बन सकती अर्थात् श्रवश्य ही वन सकती है । किन्तु वास्तव में देखा जाय तो जगत् के नियमों का दृष्टान्त देकर ब्रह्म की किसी बात का सिद्ध करना सर्वथा अयोग्य है क्योंकि सृष्टि के नियम सृष्टि के ही रूप हैं जगत् रूपी कार्य के दृष्टान्त देकर [ १०५ ।

पृष्ठ 138

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 138 का मूल पृष्ठ
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* ब्रह्मविज्ञान 8 के है । ग्रतः इस सृष्टि का कारण रूप मूलतत्व ब्रह्म का निरूपण करना एक प्रकार से प्रशुद्ध इसमें प्रतीत संभव होता - ग्रसंभव का प्रश्न करना एक ही मूलतत्व कारण दिखा कर हम इसका ग्रारम्भ करते हैं है और कभी असंभव संभव । ग्रज्ञानता है, क्योंकि हमारी बुद्धि सीमा वद्ध है कभी संभव असंभव हो जाता मूलतत्व से श्रतः इस व्यवस्था को छोड़ कर यह सिद्धान्त स्थापित करते हैं कि यह समस्त जगत् एक ही बना है और वह मूलतत्व सफल प्रकार के भेद अर्थात् सजातीय, विजातीय और स्वगत मे रहित है, भेद-रहित, पूर्ण, श्रखण्ड और अद्वितीय है । ऐसे मूलतत्व से यह जगत् कैसे उत्पन्न हुआ है । डग विषय को सिद्ध करने को हम उद्यत हुए हैं । इस ब्रह्म में न सहयोगी कारण की आवश्यकता है और न जगन् बनने पर उस मूलतत्व में किसी प्रकार का अन्तर पड़ता है । वह जगत् से पहले और पीछे ज्यों का त्यों में सदा एक पूर्ण अवस्था में रहता है । यह उसकी अद्भुत महिमा है । यदि कोई प्रश्न करे कि जगत् सहकारी कारण का होना और ब्रह्म में न होना अथवा सृष्टि के अन्दर कारण में विकार होना और ब्रह्म में विकार न होना क्यों है तो इसका उत्तर मनुष्य की बल, बुद्धि से बाहर है क्योंकि विद्या के से दो भाग हैं एक ' पर ' और दूसरा ' ग्रपर ' । पर विभाग ग्रनिवर्चनीय है केवल ग्रपर विभाग सूक्ष्म दृष्टि देखने पर जाना जा सकता है अर्थात् उस एक मूलतत्व से यह जगत् किस प्रकार उत्पन्न हुआ, क्या - क्या उत्पन्न हुए, जगत् का क्या रूप है? इत्यादि विषय जानना ही ग्रपर विद्या है और विचार करने उस ही का के लिये हम यहाँ पर कुछ वर्णन करते हैं । १. जगत् का मूल कारण ' ब्रह्म ' है । संक्षेप २. जगत् व्यष्टि व समष्टिरूप से परिवर्तनशील है अतः कार्य है और कार्य होने से कारण स्वतः सिद्ध होता है । सृष्टि और इसके मूल कारण ब्रह्म इन दोनों काआपस में षड्विकल्प सम्बन्ध जहां किसी वस्तु से कोई वस्तु उत्पन्न होती है वहाँ होता है । जैसे पिता का पुत्र; और कहीं कारण विगड़ कर एक ही तो कारण से कार्य पृथक कार्य होता है जैसे बीज कारण का बहुत कम भाग लिया जाता है और का वृक्ष, परन्तु इसमें वृक्ष का बहुत सा हिस्सा गया है और कहीं पर कारण ही वदलकर कार्य हो दूसरे सहयोगी कारणों से लिया जाता है जैसे दूध न वदलता है और न बिगड़ता है और का दही । परन्तु कहीं पर कारण न कारणों से वह के काय पृथक् ही होता ज्यों त्यों रहते हुए उसी में कार्य एक भिन्न वस्तु है तथापि कारण के उत्पन्न हो जाता वह है परन्तु कारण का कुछ नहीं बिगड़ता, पृथक उत्पन्न हो जाता है परन्तु कारण का कुछ नहींबिगड़ता और न कम होता त्यों बना रहता जैसे मकड़ी से जाल का तार । तात्पर्य है वह ज्यों का की देखी यह है कि जगत् में कारण जाती है, ऐसी दशा में ब्रह्म का कार्य की प्रक्रिया अनेक प्रकार जगत् से कारण कार्यभाव है । इसमें कारण से कार्य पृथक है वह भी एक अनूठे प्रकार का हो सकता बनता है परकारण से कार्यजुदा नहीं रहता । जैसे मिट्टी से घड़ा [ १०६ ]

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ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 139 का मूल पृष्ठ
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ॐ ब्रह्मविज्ञान नहीं बनना किन्तु से कारण में ही कार्य स्रोत - प्रोत होकर बैठा रहता है यहाँ तक कि कारण के नष्ट करने उसके साथ- साथ ज्यों वह कार्य भी नष्ट हो जाता है परन्तु दूसरा कारण मकड़ी है जो ग्राम विना बिगड़े की त्यों रहकर अपने से पृथक कार्य पैदा करती है और मकड़ी के नाश होने पर उस कार्य का नाज नहींहोता । परन्तु से अब इन दोनों कारणों का मिश्रण हम ब्रह्म पाते हैं वह मकड़ी के अनुसार अपने जूदा कार्य पैदा लिमिल करता है जिसको जगन् कहते हैं । परन्तु यह जगत् रूपी कार्य मिट्टी में घड़े के अनुसार होकर एक हो को से रहा है कि जिस तरह मिट्टी से पृथक हम घड़े नहीं पाते उसी प्रकार ब्रह्म पृथक् यह जगत् कदापि नहीं हो सकता जैसे सब मिट्टी पट की घड़ा है और सब घट मिट्टी है । उसी कार सर्वत्र है । इस कारण का कार्य के साथ प्रर्थात् ब्रह्म का जगत् के साथ पविकल्प संबन्ध है, वह इस प्रकार है।---१. में जगत्है । २. जगत् में ब्रह्म है । है. ब्रक्षा और जगत् दोनों एक ही पदार्थ हैं अर्थात् जगत् ही ब्रह्म और ब्रह्म ही जगत् है | ४. ब्रह्म औरजगत् दोनों भिन्न पदार्थ है । ५. जगत् से ब्रह्ना भिन्न परन्तु ब्रह्म से जगत् भिन्न नहीं है । ६. जगत् का सम्बन्ध श्रनिर्वनीय है । अर्थात ब्रह्म से बना ही नहीं । जगत् कोई में जगत् प्रातिभासिक रूप से है । तात्पर्य यह है कि ब्रह्म जगत् के वस्तु ही नहीं । बिना बने ही रस्सी में सर्प के अनुसार अथवा हमारी ग्रात्मा में स्वप्नजगत् ( होर बिलकुल सच्चा दीखे वह ही माया है ) से भासता है । यह मामा क्या है पर या अनिर्वचनीय है माया का होना माना जाता है । परीक्षा करने सर्प के । किन्तु भासता है अतः अनुसार यह को झड़ा कहना पड़ता है । बस यही जगत् भी कुछ नहीं ठहरता ग्रतः माया गायिक संवन्ध पचिध है । यह में घटित होते हैं अतः इसको विकल संवन्ध परस्पर विरुद्ध होने पर भी अविरोधरूप से ब्रह्म वे सम्बन्ध कहते हैं के कई के भेद ऊपर दिखाये जा चुके हैं । सव सम्भव जसे जगत् में कारण कार्यों प्रकार हो सकते हैं के हम इस जगत् का मूल कारण उस एक । इस षड्विकल्प सम्बन्ध अनुसार ब्रह्म को मानते हैं । व्युत्पत्ति सूत्र उत्पन्न इस जगत् में होती है वहा दो भाग अवश्य होते हैं । एक होने जहा किसी वस्तु से कोई वस्तु उत्पन्न उसे ' ' कहते हैं । यहां पर वाला जिसमें होता है मूल इस सम्पूर्ण उसको ' तूल ' कहते हैं और दूसरा उत्पन्न विचार वृद्धि विशाल उसके पर विचार किया जाता है । बहुत सबही करने पर जगत् को तूल समझकर मूल है अर्थात् उफान के यह सिद्ध हो ही किसी मूल का बृहण मूल चुका है कि यह सपूर्ण जगत् एक को कहते हैं जिसमें कि तत्व बढकर है । वह उस बढ़ाव पू इस जगत् रूप में आ गया [ १०७ ]

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ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 140 का मूल पृष्ठ
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* ब्रह्मविज्ञान होने पर भी वास्तव में कुछ भी वृद्धि न होती हो । जैसे समुद्र की लहर जिसमें वायु के सम्बन्ध से जल का ऊँचा होना दीखता है परन्तु वास्तव में जल जितना था उतना ही रहता है । उस ही प्रकार माया के सम्बन्ध से ब्रह्म में ' बहुत कुछ क्षोभ होना दीखता है परन्तु वास्तव में ब्रह्म जितना है उतना ही रहता हैं । इस प्रकार मूलतत्व के वृहण से यह जगत् हमको दृष्ट होता है उस ही मूलतत्व के वृंहण के कारण हम ब्रह्म नाम रखते हैं । वृह धातु का अर्थ वढ़ना है । ग्राकाश सदृश व्यापक होने के कारण उस मूलतत्व से परे कोई वृहत् नहीं है और इस मूल से अतिरिक्त और कोई इस जगत् का बृंहण अर्थात् बढाने वाला नहीं है । वह ही सब बृहत् है और उसी के बृंहण से यह जगत् उत्पन्न हुग्रा है ग्रतः उस मूलतत्व को ब्रह्म कहते हैं इसमें वह धातु के श्रागे मन प्रत्यय जोड़ने से ' ब्रह्मन् ' वना हैं यहां मन का श्रर्थं कर्ता है । एक ऋषि कहते हैं कि यह ब्रह्म शब्द ' भृ ' धातु से बना है जिसका अर्थ धारण, तथा पोषण_करना है यह सव कुछ जिस पर रखखा हुआ है, जो इन सब को एक साथ धारण किये हुए है जिससे बाहर कुछ भी रक्खा हुआ नहीं है वह ही तत्व इन सवका धारण करने तथा पोपण करने वाला ब्रह्म कहलाता है । इस में ' भृ ' धातु के प्रत्यय लगाने पर ' भर् ' बन जाता है । उसके आगे ‘ मन् ' प्रत्यय जोड़ने से ‘ भर् मन् ' शब्द बनता है व ' भर् ' शब्द के ' ह ' और ' र ' इन दोनों वर्णों को आपस में बदल देने से ‘ ब्रह्मन् ’ वन जाता है । ( व् + ह् + अ + र् + मन् = ब् + र् + ग्र + ह् + मन् = ब्रह्मन् ) जिसका अर्थ धारण पोषण करने वाला है । इस ही ब्रह्म को ' उक्थ ' वा ' साम ' भी कहते हैं जिससे कोई चीज उठती है वह उठने वाले का ' उक्थ ' है और जो सब कार्य पर्यायों में समान रूप से रहता है वह उसका ' साम ' है जो धारण करता है वह उसका ब्रह्म कहलाता है । जैसे वाक् प्रत्येक इन्द्रिय नाम का ' उक्थ ' ' ब्रह्म ' और ' साम ' । क्योंकि उसी से उठती है और वही धारण करती है और सब नामों के लिए समान है । इसी प्रकार ' रूप ' के लिए चक्षु और कर्मों के लिए शरीर समझना चाहिये । इसी प्रकार इस सम्पूर्ण जगत् का एक ही कोई तत्व उक्थ, ब्रह्म और साम है, क्योंकि उसी से यह सब कुछ उभरा है और उसी से धारण किया हुआ है और सब में समान रूप से रहता है । ४. ग्रात्मनिर्वचनसूत्र जो जिसका उक्थ, ब्रह्म और साम हो उसी को उसका आत्मा कहते हैं । ये तीनों एक ही के स्वरूप हैं अर्थात् जो जिसका श्रात्मा कहा जाता है उसको उस वस्तु का उक्थ, ब्रह्म और साम समझना चाहिये, क्योंकि जो जिसका श्रात्मा है उसी से वे वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं और वही ग्रात्मा उन सब को धारण किये रहता है और वे कार्य पर्याय सब यद्यपि ग्रापस में भिन्न रूप के होते है परन्तु उन सब में वह आत्मा सर्वथा समान रूप से रहती है । इसी कारण वह ग्रात्मा कहलाती है । ( श्रात्मा = ग्रा सब ओर + प्रत् ( पहुँचने ) + मन् ( वाला ) अर्थात् अपने कार्य में सर्वत्र व्यापक ) इस ग्रात्मा के जितने कार्य होते हैं वे दो भाग में अवश्य विभक्त होंगे । एक विशेष्य और दूसरा विशेषण । विशेषण वह है कि जिससे किसी वस्तु का दूसरी वस्तु से भेद समझते हैं और जिस वस्तु का दूसरी वस्तु से भेद किया गया वह भाग विशेष्य है । जैसे घट विशेष्य है और घटत्व विशेषण । घटत्व रूप और संख्या ग्रादि वस्तु के गुण को कहते हैं जैसे पैदे में गोलाई, पेट खाली और गला तंग यही [ १०८ ]