ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 141–150

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 141–150

पृष्ठ 141

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* ब्रह्मविज्ञान श्राकार बड़े का घडापन है इसी को विशेषण कहते है । इस घड़ेपन को देखकर जिस द्रव्य को हम घट कहते हैं वह विशेष्य है इस घटत्व को हम आखों से देखकर उसी के द्वारा घट द्रव्य को भी आखों से देखा हुआ॥ समझते हैं परन्तु वास्तव में घटत्व को विचार पर से हटा दिया जावे तो वह घट जो विशेष्य है विचार पर कभी नहीं रह सकता । ये दोनो विशेष्य और विशेषण मिल कर एक विशिष्ट कार्य रूप समझना चाहिये । इनमें विशेष्य भाग को हम अमृत कहेंगे और विशेषण को सत्य । यह सत्य भाग तीन भाग में बाँटा जा सकता है १ कर्म, २ रूप और ३ नाम । इन्हीं तीनों सत्यों से ढका हुलाजो मृत का भाग है वही आत्मा है । वह अमृत भाग कवल प्रारण जो प्रायः जगत् के प्रत्येक पदार्थ में एक रूप से रहता है अर्थात् हाथी, घोड़ा, श्राग, पानी जहाँ जो कुछ है सब एक ही वस्तु प्राण ही प्राण है ग्रतः वह प्राण श्रमृत है । वह प्राण जिस भिन्न २ सत्य से ढका हुआा होता है वह प्राण दूसरे प्राणों से भिन्न २ समझा जाता है अर्थात् कर्म, रूप और नाम इन तीनों सत्यों के भेद होने से प्राण सजातीय होकर भी भिन्न माना जाता है इसी भिन्नता को जगत् कहते हैं । इनमें प्राण भाग जो ग्रात्मा का अंश है वह सर्वत्र एक होने पर भी भिन्न २ कर्म, रूप और नाम के कारण इस जगत् का अनन्त स्वरूप वन गया है । इस से इतना और समझना चाहिये कि जो अमृत का भाग यहाँ प्राण पद से कहा गया है वह कर्म, रूप औौर नाम की सृष्टि में प्रधान होने के कारण आत्मा मानी गई है । किन्तु वह प्राण, मन और बाक् के विना कदापि नहीं रहता । श्रतः ग्रव यह सिद्ध हुआ कि मन, प्राण और वाक् ये तीनों मिले हुए एक ग्रमृत भाग हैं और वही ग्रात्मा है जैसा कि वेद कहता है — स वा एष आत्मा वाङ्-मयः प्राणमयो मनोमयः ( वृहदारण्यक उपनिषद् ) । अर्थात् वह यह आत्मा, वाक, प्राण श्रीर मनोमय है और कर्म, रूप, नाम ये ही तीनों सत्य भाग हैं और यही जगत् का रूप है । जो जहाँ कुछ हम देखते हैं एक ही ग्रात्मा नाम, रूप, कर्म के भिन्न २ होने के कारण भिन्न २ दिखलाई दे रही है किन्तु इस श्रात्मा में मन की प्रेरणा, वाक् को भिन्न २ कर्म रूष, नाम में परिणत कर देता है । अतः इस जगत् में कर्म, रूप, नाम भिन्न २ प्रतीत होकर जगत् का रूप वना देते हैं | ये सब मन, प्राण की प्रेरणा से ही भिन्न २ सत्य उत्पन्न हुए हैं इसलिए आत्मा से ही जगत् का होना माना जाता है । ५. आत्मप्रतिपत्तिसूत्र जो जिसका उक्थ, ब्रह्म और साम होता है अर्थात् जहां से उठता है जिसमें रहता है और जो उत्पन्न होने वाले में समान रूप से सर्वत्र व्याप्त रहता है वही उत्पन्न होने वाले की आत्मा कहलाती है । इस प्रकार ग्रात्मा का स्वरूप पहले कहा जा चुका है अतः यह श्रात्मा शब्द ' सनिरूपक ' अर्थात् सापेक्ष व संवन्धी शब्द ठहरता है । जिस तरह पिता, पुत्र, गुरु शिष्य प्रादि शब्द एक दूसरे की अपेक्षा रखते हैं उसी तरह यह ग्रात्मा शब्द भी जगत् या शरीर से अवश्य ही ग्रापेक्षिक संबन्ध रखता है | ( जगत् भी एक प्रकार का शरीर है और शरीर भी एक प्रकार का जगत् है । ) तात्पर्य यह है कि आत्मा से भिन्न कोई दूसरा भाग ऐसा है कि जिस को हम जगत् वा शरीर कहते हैं और आत्मा से उत्पन्न होकर ग्रपनी परिस्थिति करता है । उसी की वह आत्मा कहलाती है । न ग्रात्मा के विना शरीर वा जगत् रहता है और न शरीर वा जगत् के विना कभी आत्मा, ग्रात्मा कहलाती है । [ १०६ ]

पृष्ठ 142

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* ब्रह्मविज्ञान इस ग्रात्मा की प्रतिपत्ति ( विचार ) ६ प्रकार से की जा सकती है-१ - श्रवैकारिकरूढ, २ - वैकारिकरूढ, ३ - योगरूढ, ४ – यौगिकरूढ, ५ - यौगिक, ६ - व्यूह | इन्हीं ६ दशाओं में हम ग्रात्मा को पाते हैं । ग्रात्मविद्या का मुख्य स्वरूप इन्हीं ६ प्रकारों का निरूपण करना है । वही यहां क्रम से किया जाता है । ( १ ) श्रवैकारिकरूढ वह पदार्थ जिसके भीतर कुछ अवयव न हो अर्थात् एक दूसरे से फरक करने वाले कोई ग्रंश न हो और भिन्न २ प्रकार के पदार्थ जिस एक पदार्थ से उत्पन्न हुए हों वह ग्रखण्ड, निरवयव, असीम ही सव से प्रथम मुख्य आत्मा मानी जा सकती है । किन्तु वह ग्रज्ञेय और अनिर्वचनीय इसलिये कहा जाता है कि उसका कुछ भी स्वरूप ठीक २ जाना नहीं जा सकता है और न कहने में आ सकता है । किसी वस्तु का जानना मन का कार्य है परन्तु यह मन किसी वस्तु को दूसरी किसी वस्तु से भिन्न नहीं कर सकता जब तक उस चीज को नहीं पकड़ता है । यह मन का स्वभाव है । क्योंकि वह श्रखण्ड ग्रात्मा असीम और सर्वत्र व्यापक है तो उससे खाली कोई स्थान हो नहीं सकता और न कोई पदार्थ ही ऐसा है कि जिसके कण २ वा किसी भी अंश को हम ब्रह्म न कह सकते हो । जब कि इस प्रकार श्रात्मा की किसी वस्तु से मन भिन्नता को नहीं देख सकता तो उस खण्ड ग्रात्मा को पूर्ण स्वरूप से ग्रहण करने में असमर्थ है । अतः ग्रात्मा प्रज्ञेय है और अनिर्वचनीय यो है कि संसार भर की किसी भी भाषा का कोई भी शब्द विशिष्ट कार्य के अतिरिक्त किसी भी अर्थ को कहने में सामर्थ्य नहीं रखता हैं । विशेष्य और विशेषण इन दोनों से बना हुग्रा जो अर्थ का रूप है उनमें विशेषण के द्वारा अर्थात् विशेषण की ओर हमारी दृष्टि पहुँचा कर उसके द्वारा किसी विशेष्य की प्रोर दृष्टि पहुँचाने का कार्य करता है बिना विशेषरण को पकडे उस विशेष्य को जो सर्वत्र एक ही है उसको समझने में जगत् का कोई भी शब्द सामर्थ्य नहीं रखता । अतः वास्तव में वह आत्मा सर्वथा अनिर्वचनीय कही जा सकती है क्योंकि जब तक उसमें कोई नाम, रूप, कर्म स्थापित न किया जावे या जब तक उसमें कुछ भेद भाव उत्पन्न न हो जावे तब तक यह मूलतत्व हमारे वाक् श्रीर मन के अगोचर हैं अर्थात् उनकी दौड़ के मैदान के बाहर हैं । यही निविशेष, अव्याकृत, अव्याहृत निराकार, निरंजन, निर्धर्मक निर्गुण ब्रह्म है । ( २ ) वैकारिकरूढ इस प्रकार जो निर्विशेष कह कर एक आत्मा दिखाई गई है अर्थात् जिसमें सजातीय, विजातीय और स्वगत इन तीनों भेदों का प्रभाव है उसी निर्विशेष में अकस्मात् स्वगत भेद उत्पन्न हुग्रा अर्थात् वह अपनी महिमा से जो पहले अखण्ड थी सो पश्चात् तीन खण्डों में स्वतः परिणत होकर दीखने लगी । अब हम यहां से उस ब्रह्म ग्रात्मा को ३ खण्ड वाली ही मानकर सृष्टि का प्रारम्भ करेंगे । इन ही ३ खण्डों से जो जिस प्रकार सृष्टि हुई वह ' अपरा विद्या ' है और उस सृष्टि को हम किसी सीमा तक जानने का पूर्ण दावा रखते हैं । ये तीनों खण्ड वैकारिकरूढ हैं । ( ग्रभिन्न एक तत्व में तीन भेद का होना ही विकार है ) वैकारिक इसलिए है कि यह संपूर्ण सृष्टि इन तीनों से उत्पन्न हुई है और यह नित्यसृष्टि के आदि मध्य और अन्त में ग्रनवरत ( हर समय ) दिखाई देते हैं । वे तीनों ये मन, प्रारण, वाक् । [ ११० ]

पृष्ठ 143

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* ब्रह्मविज्ञान * ( ३ ) – योगरूढ मन, प्रारण ग्रौर वाक् ये तीनों भिन्न भिन्न करके नहीं रहते । तीनों सर्वदा सम्मिलित रूप में ही सृष्टि के कारण होते हैं ग्रतः इन तीनों अवयवों से कोई एक ही अवयवी आत्मा माननी पड़ेगी । उसी एक ग्रात्मा को हम यहां ' प्रजापति ' कहेंगे और वह सर्वदा यज्ञ करता रहता है । इस यज्ञ से यह सृष्टि उत्पन्न होती है अथवा जिस सृष्टि को हम देख रहे हैं वही उस ग्रात्मा का यज्ञ हो रहा है । कारण यह है कि इरा मन भाग में एक प्रकार की ' शनाया ' ( क्षुधा ) उत्पन्न होती है जो अशनाया याज तक इस जगत् के प्रत्येक पदार्थों में ग्रव भी दीखती है जिसके कारण सूर्य हमारी पृथ्वी के एक एक अंश को प्रति-क्षण भक्षण किया करती है अंतः दोनों के प्रश प्रवेश करते रहते हैं और अपने अंशों को निकालते रहते हैं । इसी कारण इन दोनों अर्थात् सूर्य और पृथ्वी का स्वरूप कदापि नष्ट नहीं होता । इसी अशनाया के कारण इस प्रजापति में ३ भाव उत्पन्न हो जाते हैं जिनको ' उक्थ ', ' अर्क ' और ' अशीति ' कहते हैं । जब कभी दूसरे किसी प्रजापति की प्रशनाया के कारण किसी प्रजापति का कुछ अंश निकलता है तो उस प्रजापति की अपनी ग्रशनाया प्रबलता से जाग्रत हो जाती है और उसके उक्थ में से एक प्रकार का भाव वाहर से ग्रन्न लेने के उठ खड़ा होता है और व्याकुलता से अन्न को लेने के लिए व्यापार करने लगता है उसी ग्रंश को ' अर्क ' कहते हैं । वह अर्क जिस ग्रन्न को ग्रहण करके अपनी आत्मा की ओर खींचता है उसी अन्न को ' ग्रशीति ' कहते हैं । वह ग्रर्क इस प्रकार अपने भीतर प्रशीति को लेकर जब अपने वाक् की कमी को पूरा कर लेता है तब शान्त होकर अपने उक्थ में जो मन है लीन हो जाता है । उस समय उक्थ के अतिरिक्त ग्रर्क का कुछ व्यापार नहीं होता । बस इसी प्रकार उक्थ से अर्क का उठकर ग्रशीति के ग्रहण करने से प्रत्येक ग्रात्मा की कमी पूरी होती रहती है ग्रतः दूसरी ग्रात्मा के भोजन करने से न्यूनता होने पर भी किसी ग्रात्मा का कुछ अंश कम नहीं होने पाता । अब यहां इतना और समझ लेना श्रावश्यक है कि जिस ग्रशीति अर्थात् अन्न को ग्रहण करके ग्रर्क ने अपनी ग्रात्मा में खीच लिया है उस प्रशीति में उसी समय सेएक दूसरा व्यापार होने लगता है अर्थात् वह ग्रन्न ' ऊर्क ' नाम के रस में परिणत हो जाता है श्रीर वह ऊर्क प्राण में परिवर्तित हो जाता है और वही प्राण फिर ग्रर्क होकर फिर प्रशीति अर्थात् अन्न को ग्रहण करने लगता है । इस प्रकार ग्रन्न, ऊर्क और प्राण जो क्रमशः प्रापस में परिवर्तन होते रहते हैं इसी को ' यज्ञ ' कहते हैं । जब तक यह यज्ञ होता रहता है तब तक उस ग्रात्मा का वह रूप बिगड़ने नहीं पाता । यह् यज्ञ प्रत्येक प्रजापति का नित्य नियत कर्म है । कोई भी प्रजापति एक क्षण के लिए भी बिना यज्ञ के नहीं रहता | अलबत्ता यज्ञ का स्वरूप बदलता रहता है और यज्ञ का स्वरूप बदलने से वस्तु का स्व-रूप भी बदल जाता है । इस परिवर्तन के कारण सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी, अग्नि, वायु आदि भिन्न भिन्न प्रकार के प्रजापति जगत् में दिखाई दे रहे हैं । यद्यपि ये प्रजापति अनन्त हैं तथापि प्रत्येक प्रजापति दूसरे प्रजा-पति को भक्षण किया करता है और ग्राप भी दूसरे प्रजापति से खाया जाता है किन्तु प्रत्येक प्रजापति का ' बल बरावर नहीं होता । इसी कारण यज्ञ का बल भी न्यूनाधिक हो जाता है और अन्न से प्रबल यज्ञ के आक्रमण के कारण कोई कोई यज्ञ नष्ट हो जाता है यही सृष्टि का कम है और यही हमारे प्रजापति का स्वरूप है और यह यज्ञ रूप ग्रात्मा है । [ १११ ]

पृष्ठ 144

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ॐ ब्रह्मविज्ञान ( ४ ) - यौगिकद प्राण, वाक् रहते हैं । इन यह जो प्रजापति एक ग्रात्मा है उसके अङ्ग में तीन ' उवथ ग्रात्मा ' और मन दूसरी , ' महिमा ' जैसे दीपक में ग्रात्माग्रों के स्वरूप से ही दो अवस्थायें देखी जाती हैं । एक प्रकाश मण्डल फैला हुआ दीखता है वही जो लौ है वह उक्थ के रूप में हैं । किन्तु उसके चारों ओर जो उस दीपक की महिमा है । -- प्र-जगत् ( में ४ प्रकार के पदार्थ हैं – १ – स्वतः प्रकाश । २ - परतः प्रकाश । ३ - रूपप्रकाश ४ J काश । जैसे सूर्य, अग्नि आदि ज्योतिष्मान् पदार्थ स्वप्रकाश हैं! चन्द्रमा, दर्पण ग्रादि परप्रकाश हैं । घट प्रकाश , पट ग्रादि ग्रस्वच्छ पदार्थ सभी रूपप्रकाश हैं और बायु, शब्द, प्राण ग्रादि ग्रप्रकाश हैं । इनमें स्वः पदार्थों के दोनों भाग जिस प्रकार स्पष्ट दिखाई देते हैं उसी प्रकार पर प्रकाश में आधे भाग में महिमा दीखती दीखती है और आवे में नहीं । किन्तु रूपप्रकाश और ग्रप्रकाश में यद्यपि कुछ भी महिमा नहीं तथापि विश्वास करना होगा कि इन चारों में समानभाव से उपथ और महिमा दोनों भाग रहते हैं । रूप-प्रकाश की महिमा जहां तक व्याप्त है उसी के भीतर दृष्टि रखने से हम उस वस्तु को देख सकते हैं वह । अथवा जहां तक हम उसको देखते हैं वहां तक कोई उस वस्तु का भाग मेरी श्राँखों पर आता है किन्तु दृष्टि पर नहीं ग्राती तथापि मेरी दृष्टि पर वस्तु जहां की तहां रहती है मेरी उस वस्तु का जो भाग महिमा जाता है उसी को हम उसकी महिमा कहते हैं । वस्तु का गन्ध बहुत दूर तक फैला हुआ उसकी है । तात्पर्य यह है कि जगत् के पदार्थ के उक्थ ग्रर्थात् बीच के कन्दल | ऋक् के चारों ओर महिमा रहती है । अब यह महिमा ३ प्रकार की हैं क्योंकि प्रत्येक पदार्थ एक ग्रात्मा होने से प्रजापति है श्रुतःउसके तीन ग्रङ्ग ग्रवश्य होवेंगे । जिनमें मन के उक्थ से उठे हुए महिमा को ' वेद ' कहते हैं जो तीन प्रकार का है ' ऋक् ' ' यजु ' और ' साम ' जिनका वर्णन ग्रागे होगा । प्रारण के से ' कहते हैं । , उक्थ उठे ' हुए महिमा को यज्ञ और वाक के उक्य से उठा हया महिमा ' प्रज्ञा ' कहलाता है । इस प्रकार प्रत्येक प्रजापति के चारों ओर नियम से वेद, यज्ञ और प्रजा ये तीनों महिमाएँ व्याप्त रहते हैं । और उसी महिमा प्रजापति की तक उस सत्ता विद्वानों की दृष्टि में रहती है । वेद, यज्ञ और प्रजा प्रजापति है । इसके बिना प्रजापति कभी भी देखने में नहीं याता । ये तीनों की ही ' प्रथम यौगिकरूढ सृष्टि ' है । हैं । और वहनित्य इन में वद से ज्ञान, यज्ञ से क्रिया, प्रजा से ग्रर्थ तात्कालिक वस्तु की वेद रूपी उत्पन्न होते हैं जैसे किसी महिमा जहां तक फैली रहती है उसी सीमा के अन्दर दृष्टि रखने से उम्र वेद का भाग जितना दृष्टि पर पड़ा या किसी नाड़ी के द्वारा मस्तिक में है । जाकर मेरे प्रजापति के करता और दोनों के संयोग से जो परिणाम मन भाग से संयोग उत्पन्न हुग्रा वहीं उस वस्तु दो वस्तु के संयोग से उत्पन्न हुआ है अतः यौगिक रूढ है । किसी का ' मेरा ज्ञान ' हैं । यह ज्ञान प्रजापति के प्राण की महिमा या यज्ञ जबकिसी दूसरे प्रजापति पर अपना प्रभाव डालता है तो उस महिमा वही को दूसरा प्रजापति अपने में ले लेता है प्रथम प्रजापति की क्रिया कहलाती है जैसे हम बोलते हैं का , चलते हैं, हिलते हैं, इन कम्पन से मेरे शरीर प्रारण अवश्य ही कुछ खर्च हो जाता है और वह प्रारण क्रियारूप ओर में बदल कर वायु ग्रादि मेरे चारों [ ११२ ]

पृष्ठ 145

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* ब्रह्मावज्ञान लैंड पदार्थों में प्रवेश करके उनमें कुछ परिवर्तन अवश्य ही कर देता है । यदि इस प्रकार दूसरे प्राण को अपने में नहीं तो पदार्थ मेरे तीसरे वाक् मैं कोई भी किया नहीं कर सकता ग्रतः क्रिया भी ' यौगिकरूढ ' की महिमा से जो प्रजा उत्पन्न होती है वह जब दूसरे मन, प्राण, वाक् को ग्रहण कर है । अब तो अर्थ कहलाता है जैसे लेती है बिगड़ किसी फल में गदा जो पहले एक ही प्राण रखता था अब उसका कर प्रजा होकर कुछ भाग जब भिन्न प्रकार के मन प्राण को करलेता है तो अलग होकर,, वाकू ग्रहण वह उस फल से एक कीड़े या लट के नाम से पति के कहा जाने लगा और वह नया अर्थ हो गया । इस प्रकार प्रजा-वेद , यज्ञ और प्रजा से रूढ़ हैं । ज्ञान क्रिया और अर्थ की सृष्टियां होती रहती हैं और ये भी सब यौगिक-मर इन अर्थों में से दो प्रकार के अर्थ इस तरह मिले कि एक दूसरे को मार डालते हैं और दोनों ही कर नया अर्थपैदा करते हैं और पहले के दोनों भाग न दिखाई देकर जाता है उसी एक ही सर्वथा रूढ तत्त्व वन को यौगिकरूढ़ जिससे पानी कहते है जैसे पानी में वायु का मौका लगने से पानी में लहर पैदा होती है । ऊँचा उठकर बुदा बड़ा सतह की ऊपर वाली हवा को ढक लेता है बुदबुदा पैदा हो जाता है । यह बुद-होने से हवा निकल का बल अधिक रहता है अतः हवा पानी की पतली झिल्ली को तोड़कर बाहर जाता है से । परन्तु यदि यह बुदबुदे छोटे छोटे तो के -उनकी बहुत से होते हैं वहां पर दूसरे बुदबुदों दबाव हवा बाहर निकलने और पानी नहीं पाती । कुछ समय तक हवा पानी को तोड़ कर बाहर निकलने का हवा को दबाने का दोनों मर जाते हैं । पानी स्वभावतः चेपदार भरपूर यत्न करते रहते हैं अन्त में कुछ समय पश्चात् परिणाम है और हवा रूखी है ग्रतः पानी से एक जीव होकर उसको रूखा बना देती है इसका यह होता है कि पानी है वह भाग और हवा दोनों ही न रहकर एक तीसरी जाति की वस्तु पैदा हो जाती तीसरे कहलाता है और दो पदार्थों का मरकर पदार्थ यह भाग ही मिट्टी का पहला रूप है इस प्रकार कहते हैं । का वन जाना यौगिकरूढ़ नष्ट होने को है । दो के मिलाव को किन्तु उनकी पृथक्ता रूढ़ ( ५ ) यौगिक जैसे दो पदार्थों के मिलने रहे तो उसको ' मिश्रण ' कहते हैं । पानी में पर भी उन दोनों का तत्व अलग - अलग अतः चीनी घोलने से दूसरे से मिलाव नहीं होने पाता इनसे शरवत होता है किन्तु इन तत्वों का एक का भिन्न है । एक नया तत्त्व पैदा नहीं होता । ऐसे मिश्रित तत्त्वों को यौगिक कहते हैं । यह रूढ़ नहीं ( ६ ) व्यूह ( व्यूह, त्रिपुरुषमय व्यूह, अव्यय, अक्षर, क्षर ) उपरोक्त मिलकर आत्मा बनी हो वह व्यूह पाँचों मिलकर बना है । ऐसे कई व्यह एक कहलाता ग्रात्मा एक व्यूह है और जिसमें अनेक है जिनका वर्णन विस्तार पूर्वक आगे होगा । व्यूह हो वह व्यूहानुव्यूह १- प्रवैकारिकरूढ या परात्पर आत्मासूत्र जब और अनन्तानन्त हम जगत् तीन दीखते हैं — पहला भाग यह पृथ्वी पर दृष्टि डालते हैं तो इसके भाग पदार्थ दृष्टिगोचर होते हैं । दूसरा भाग सूर्यमण्डल इस पृथ्वी के सम्बन्ध से इस पर चारों ओर [ ११३ ]

पृष्ठ 146

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* ब्रह्मविज्ञान दो मुख्य भाग हैं । इन है कि जिसके प्रकाश के सम्बन्ध से एक विश्वचक्र वना हुआ दीखता है । वस सीमित ये ही हैं, ग्रपनी बँधी हुई सीमा दोनों के सव पदार्थ इन दोनों से बँधे हुए होने के कारण ' सायतन ' अर्थात् के मध्य में खाली ग्राकाश है । से बाहर स्वतंत्रतापूर्वक नहीं जा सकते । तीसरा भाग जो इन दोनों कितने ही और जिसके कारण पूर्व के दोनों भागों का अन्तर ज्ञात होता है अन्तरिक्ष कहलाता है इसमें पदार्थ ‘ निरायतन ’ रूप से हैं जो किसी केन्द्र से न वँबे हुए होने के कारण सर्वत्र फैले हुए रहते हैं और इधर - उधर स्थानान्तर भी होते रहते हैं । इन तीनों भागों को तीन लोक कहते हैं । इन तीनों में सामान्य रूप से अग्नि रहता है जिसके इन तीनों लोकों के भेद से नाम, रूप, कर्म भिन्न - भिन्न होते हैं जिनको ग्रग्नि ( पृथ्वी ), वायु ( ग्रन्तरिक्ष ) और सूर्य कहते हैं । यदि हम स्थूल दृष्टि से जगत् को देखें तो तीन लोक दीखते हैं और इसी त्रैलोक्य को जगत् कहते हैं किन्तु विज्ञान दृष्टि से निश्चित ज्ञात हुआ है कि ऐसे - ऐसे त्रैलोक्य श्रनन्तानन्त विद्यमान हैं जैसे यह पृथ्वी इस सूर्य के साथ बँधी हुई है उसी प्रकार ग्रनन्तान्त त्रैलोक्य भी एक दूसरे महासूर्य के श्राधीन उसके चारों श्रोर जहाँ - तहाँ स्थित है । जिस प्रकार हमारे सूर्य में से ७ रङ्ग श्रथवा अनन्त रङ्गवाला भौतिक प्रकाश निकलता है उसी प्रकार उस महासूर्य से भी एक - एक महाज्योति निकलती है जिसमें रूप नहीं श्रीर दृष्टि से नहीं देखा जाता उसको ' ज्ञानमय प्रकाश ' कहते हैं । उसी के द्वारा प्रकाश और अन्धकार का ज्ञान होता है और वह इस भौतिक प्रकाश तथा घोर अन्धकार में भी बराबर श्रपना प्रकाश जारी रखता है | हमारी स्वप्नावस्था में जहां सूर्य, चन्द्र, ग्रग्नि के प्रकाश कुछ नहीं पहुँचते वहां आत्मा के उसी प्रकाश से सब दिखाई देते हैं और उस समय इस प्रकाश का प्रत्यक्ष होता है । इस प्रकार विद्वान् लोग त्रिलोकी से बाहर उस महा ज्योतिष्मान् सूर्य की श्रात्मा को परोरजा स्वयंभू प्रजापति या परमात्मा कहते हैं । त्रिलोकी से परे होने के कारण परोरजा है यहाँ तक तो हुया यह जगत् का स्वरूप किन्तु जगत् छोटा - बडा कैसा भी हो सब कार्य है श्रतः इसकी उत्पत्ति का कोई कारण ऐसा अवश्य होना चाहिए जो असीम अनन्त, केन्द्ररहित और भेद - भाव रहित हो, क्योंकि जगत् के धर्मों से भिन्न होना चाहिए । हमारी बुद्धि किसी न किसी भेद - भाव या सीमा विभाग को को पकड़ कर ही किसी वस्तु धारण करती है किन्तु जगत् के उस ग्रादि कारण में इन सब धर्मों के न रहने के हमारी कारण उसको बुद्धि ठीक ठीक ग्रहण नहीं कर सकती । अज्ञेय ग्रौर ग्रनिर्वचनीय कह कर उससे हट जाती है तो भी इतना मानने को वह सर्वदा तैयार है कि इस संपूर्ण जगत् का मूल कारण कोई जिसमें न कोई ऐसा पदार्थ है कि जगत् के धर्म कुछ भी नही हैं । वही पदार्थ सर्वप्रथम है औरविज्ञान की परिभाषा में ' परात्पर ' के नाम से व्यवहृत किया जावेगा । इसका अर्थ है परे से परे अर्थात् त्रिलोकी से परे पुरु-पोत्तम, जो महासूर्य के नाम एक सच्चिदानन्द, श्रात्मा आत्मा को ' परात्पर ' कहते हैं । कहा गया है उस से भी परेहोने के कारण अगम्य, गोचर, निर्विशेष यद्यपि वास्तव में इसके कोई भी नाम , रूप, कर्म नहीं करेंगे कि नहीं हो सकते तथापि संकोच इस जगत में जितने नाम हैं जितने हम यह कहते , रूप हैं और जितने । कर्म हैं वास्तव में सब उसी के हैं जगत् में काला और सफेद, छोटा और बड़ा प्रादि भावों में परस्पर विरोध है अतः एकका रूप रूप नहीं हो सकता । परन्तु जबकि सब दूसरे का नाम, सव रूप सब कर्म कहना , उसएक से निकलते हैं तो हमको होगा कि ये सब नाम, रूप, कर्म उस निर्विशेष आत्मा का प्रपञ्च ( फैलाव ) विशेष हैं । [ ११४ ]

पृष्ठ 147

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 147 का मूल पृष्ठ
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* ब्रह्मविज्ञान क्योंकि बहु यद्यपि ज्ञेय है अनिवर्चनीय है तथापि यही उसका ज्ञान, और निर्वचन समझना चाहिये अज्ञेय को अज्ञेय निश्चयकरना ही उसका वास्तविक ज्ञान है और अनिर्वचनीय को अनिर्वचनीय कहना ही उसका यथार्थ निर्वचन हो सकता है । यदि उस अज्ञेय को ठीक - ठीक जानने का दावा करें तो वह अज्ञानी है और के वह उसको कुछ नहीं समझा ऐसा समझना चाहिए । वह जानने का दावा करने वालों लिये न जानी पैदे हुई चीज है और जो उसको न जानने का तत्त्व कहकर जानते हैं वे उसको एक प्रकार तक पहुँचकर

जान चुके हैं जैसा कि वेद कहता है: -यस्यामतं तस्यमतं, मतं यस्य न वेद सः ।

अविज्ञातं विजानताम्, विज्ञातमविजानताम् ॥

अर्थात जो नहीं क्योंकि वह जानने वालों से नहीं जानता वह जानता है जो जानता है वह नहीं जानता है जाना गया है शब्दों में जिसको अव-कारिकरू और जो नहीं जानते हैं उनने उसको जाना है । परिभाषिक कहा है वह वैज्ञानिक से है । भाषा में परात्पर श्रात्मा व्यवहृत हुआ न तत्र सूर्या भाति न चन्द्रतारकं, नेमा विद्युतो भान्ति कुतोयमग्निः । तमेव आन्तमनुभाति सर्वं, तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ कठ ० उपनि ० j सूर्य चन्द्र नहिं भासते, नहिं विद्युत की ठोर । भारत जिससे विश्व को, चमाचमी चहुँ ओर ॥ [ पु ० गोपी ० जोशी । २- वैकारिकरूढ या सत्यत्रयसूत्र दिखाई देवेंगेः – ज्ञान, क्रिया और अर्थ इस जगत् के पदार्थों का यदि हम विचार करें तो तीन ही पदार्थ सर्वत्र तीन ही होवेंगे । उन ही मूलतत्वों | अतः सहज ही में यह विश्वास होता है कि इन तीनों के मूल कारण भी कार्य परिवर्तनशील को हम मन और कहते हैं । राव इन्हीं तीनों से हुआ है । इनके समस्त , प्रारण वाक कुछ हैं । उनकी अपेक्षा हैं कुछ जाते हैं ग्रतः वे सब असत्य ये समय तक रहकर फिर नहीं रहते अथवा बदल तत्वों को ' सत्य ' कहते हैं तीनों कारणरूप से विद्यमान रहते हैं अतः मन, प्राण और वाक इन तीनों । जब ये सदा की ग्रस्तित्वबुद्धिहुआ करती है । इसलिये भी तीनों मिलकर एक रूप पैदा करते हैं तब किसी वस्तु हैं क्योंकि वस्तुओं में प्राण इन तीनों को सत्य का भी सत्य कहते ही को सत्य कहते हैं इन में भी मन उसी की आज्ञा से काम करता सत्य का के से ठहरता है और है अतः रूप है परन्तु वह प्राण मन ही आधार में वाक्तो सत् और प्राण असत् और वह मन सत्य का भी भी एक मत है कि इन मन सत्य है । यह परिच्छेद हो सके उसको सत् सदसत् कहलाते आदि से जिसका कहना हैं । तात्पर्य यह है कि दिक- देश - काल से सब अर्थ बने हैं । और चाहिये नहीं हो सकता । वाक् ही सब । वह वास्तव में वाक के अतिरिक्त कोई किया जाता अर्थ परिच्छिन्न कार्य करने से ही अनुमान हैं किन्तु प्राण है उसका रूप में हैं अतः उनको सत् कहते हैं परन्तु इस मन को ज्ञान कोई निज का दीखता अतः उसको असत् कहते । रूप हमें नहीं [ ११५ ]

पृष्ठ 148

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* ब्रह्मविज्ञान के रूप भी अपने भीतर समझता है परन्तु दूसरे का मन भी प्राण के अनुसार दृष्टिगोचर नहीं होता या अनुभव में नहीं प्राता ग्रतः उसको सत् और असत् दोनों कहते हैं । प्राचीन ऋषियों ने इन तीनों को इन ही तीनों नाम से अधिकतर व्यवहार किया है ग्रतः इस शास्त्र में भी इनका व्यवहार इन्हीं शब्दों से होगा । मन – प्रारण – वाक् के ग्रौर और नाम जो व्यवहृत होते हैं: -१ प्रज्ञा - बल - श्राकाश २ धी- श्रसु - रथि ३ बुद्धि - + - + १. - मन के लक्षण मन निर्लेप, प्रसङ्ग, श्रक्रिय, और अनवच्छिन्न है । अर्थात् इस मन पर कितनी ही वस्तु आवे परन्तु वे इस पर चिपकती नहीं है अर्थात् जिस प्रकार वस्त्र पर रङ्ग चढाने से वह रंग चिपक जाता है, वर्तन में तेल रखने से वह चिपकता है उसी प्रकार मन सदा के लिए चिपक नहीं जाता । जब तक मन किसी विषय को उठाये रहता है तब तक लिप्त हुआ सा दीखता है किन्तु जब उस विषय को छोड़ता है तो बेलाग होकर निकल जाता है और दूसरे विषय के रूप में ग्रा जाता है । लाल रङ्ग का खयाल करके लाल हो जाता है किन्तु तत्काल ही सफेद का विचार होते ही श्व ेत हो जाता है । वह प्राचीन लाली व सर्वथा लुप्त हो गई ग्रतः मन को ' निर्लेप ' कहते हैं । जिस प्रकार ग्राकाश ग्रहनिश वायु - जलादि पदार्थों से युक्त होने पर भी सर्वदा उनसे बेलाग रहता है उस ही प्रकार सब पदार्थों से युक्त होता हुग्रा मन भी उन से बेलाग रहता है ऋत ' उसको ' असङ्ग ’ कहत हैं । मन एक प्रकार का ग्राकाश जिसमें सब पदार्थ प्रवेश करके ठहरे हुए दीख कर पीछे निकल जाया करते है अतः उस मन में कुछ भी क्रिया नहीं है जो कुछ क्रिया मन में भासती है वह उसके साथ ही प्रारण से उत्पन्न होती है किन्तु मन अपने स्वरूप से ' निष्क्रिय ' है । यह मन जिसको हम ज्ञान रूप में देखते हैं यदि हम उस ज्ञान पर दृष्टि डालें तो उसमें ऊंचा, नीचा, बगल यदि कोई भी प्रदेश या दिशा दृष्टि में नहीं ग्राती ग्रतः उसको ' अनवच्छिन्न ' कहते हैं जो मन राई को लेकर पूर्ण रूप होता है वह ही एक विशाल पर्वत या विश्वमण्डल को अपने में लेकर उन्हीं के रूप से परिपूर्गा होता है । वास्तव में मन न छोटा है, न बड़ा है केवल छोटी - बड़ी वस्तु को ग्रहण करके छोटा - बड़ा दीखा करता है । यदि उसका कोई अपना रूप होता तो इस प्रकार छोटे - बड़े रूप में कभी नहीं या सकता ग्रतः उसको ' अनवच्छिन्न ' कहते हैं । परन्तु उसमें यह गुण श्रवश्य है कि जिस वस्तु के साथ उसका योग किया जावे उस ही वस्तु के परिमाण और रूप - रङ्ग को लेकर दीखा करता है । बहुतों का यह भी मन है कि संपूर्ण जगत् में जितने पदार्थ हैं उन सब के अत्यन्त सूक्ष्म रूपों के समूह ही का नाम मन है । अतः यह जगत् का एक संक्षिप्त रूप है । [ ११६ ]

पृष्ठ 149

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ब्रह्मविज्ञान २- प्राण के लक्षण प्रारण ' कुर्वद्रूप ' प्रतिक्षण क्रियाशील है । जगत् में जो कुछ जहा किया होती है वह सब प्राण का ही रूप हैं । प्राण एक स्थान से दूसरे स्थान में जब सम्बन्ध करता है तो उस वस्तु में कम्पन होता है उसी को क्रिया कहते हैं । सभी क्रियाश्रो का उपादान नही प्राण है । जिसमें क्रिया होती है उसमें से कुछ प्रागा का भाग निकल जाता है । जिस प्रकार सरोबर में से एक बिन्दु पानी निकाल देने से उसका कुछ भी भाग कम होता हुया नहीं दीवता है उसी प्रकार एक अंगुली हिलाने या चलने - फिरने से शरीर म प्राण की कमी नहीं मागम होती परन्तु कमी अवश्य होती है, क्योंकि किसी भी क्रिया को यदि हम देर तक करते रहे तो अवश्य ही हम थक जाते हैं और यह ना केवल प्राण की कमी है । जब इस अनन्त श्राकाश से अथवा वायुमण्डल में फिर हमारी यह प्राण की कमी हो जाती है तो थकान मिट जाती है श्रतः सिद्ध हुआ कि तब ही क्रिया पाएका बिकार है । प्राण का दूसरा लक्षण यह है कि पचभूतों अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध के लक्षण एक भी प्राण में नहीं होते । प्रत्येक तप में कराने से शब्द उत्पन्न करते हैं परन्तु प्राणों के बन ब्रापस में टकराने से कुछ भी शब्द उप नहीं करते । वायु का बक्का हमारे शरीर पर लगता है किन्तु प्राणों का श्राघात होने पर भी उनके स्पर्श का कुछ भी बोध हमें मालूम नहीं होता । लाल, पीला ग्रादि न उसमें किसी प्रकार का रूप है और न मीठा, खट्टा ग्रादि स्वाद है और न किसी प्रकार का गन्ध है अतः उसको भूत नहीं कह सकते परन्तु इतने पर भी उसमें एक अतावारण धर्म ' विवरणशक्ति ' ऐसी है कि जिसके द्वारा हम इस प्राण को स्पष्ट रीति से पहचान सकते हैं जैसा कि थोड़ी सी मिट्टी में पानी मिला-कर खूब गूथकर एक ढेला बनावे तो जल सुखकर केवल मिट्टी रह जावेगी परन्तु जिस प्रकार पहले मिट्टी बिखरी हुई थी अब सिमटकर एक ठोस रूप में डेला बन गई है । इस मिट्टी में इस ठोस बनने का और मिट्टी का बिखरने न देने का कारण कोई नया पदार्थ प्रवश्य इसमें प्रवेश किया हुआ मानना पड़ेगा वहीं प्रारण है | इस प्राण के विवरण धर्म के कारण मिट्टी के सब ही परमाणु इस प्रकार बंध गये हैं कि स्वतन्त्रता पूर्वक इधर - उधर बिखरने नही पाते । कोई कह सकते हैं कि परमाणु में एक प्रकार की प्राक-बंण शक्ति है जो ग्रापस में एक - दूसरे को पकड़कर तनाव में आ गये हैं किन्तु यह भूल है | यदि परमाणुग्न का अपना निज का स्वभाव ऐसा होता तो यह मिट्टी बिखरी हुई न रहती क्योकि वस्तु में निज का स्व-भाव नित्य होता है किन्तु इसी ढेले को प्रहार करने पर यह चुरमूर हो जाता है और फिर मिट्टी अपने स्वभाव के अनुसार बिखर जाती है । इससे मानना होगा कि उन परमाणुओं में ग्राबरा में पकड़ने का धर्म निज का स्वाभाविक नहीं है । दूसरे योग के कारण उसका योग हटाया औॉर मिलाया जा सकता है, न्यूनाधिक किया जा सकता है । बस उसी विवरण करने वाले तत्त्व को ' प्राण ' कहते हैं | यदि इन पर-माशुश्रों में ग्राकर्षण शक्ति मानी भी जाये तो उगी को हम प्राण कहने । उस प्राण में श्रानंजन ( खिचाव ) होने के कारण बीच में भूत को रखकर आप उसके बाहर - भीतर इस प्रकार बंधा रहता है कि जिसके कारण एक परमाणु दूसरे परमाणु को पकड़ने की क्रिया किया करता है । तीसरा लक्षण यह है कि कोई भी प्राण भूतमात्रा के बिना कभी कहीं भी नहीं रहता । प्रत्युत इसी स्वगाव के कारण यह प्राण ' वाक् ' में रहकर अपने विवरण धर्म से प्रतिक्षण घन वनता रहता है । [ ११७ ]

पृष्ठ 150

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* ब्रह्मविज्ञान * जिस प्रकार रूई के परमाणु अत्यन्त विरल दीखते हैं यही रूई यदि १० कोस में फैलादी जावे तो उतनी रूई को यह प्राण अपन बिधरण के कारण यदि मन करने लग जावे तो संभव है कि एक राई के वरा-वर हीरे का टुकड़ा होगा । इसी प्रकार घन और विरल करता हुआ यह प्राण प्रत्येक भूत में कुछ न कुछ रहता है अतः प्राण को ' अर्थवान् ' कहते हैं । यहां यह श्रौर समझना चाहिए कि प्राण ४ जाति का है: -सब पदार्थ उसके विधरण से स्थान २ पर नियत रूप से रहते हैं । स्वभाव रखता है । ३ - सौम्य - जो धन करने का स्वभाव रखता है । स्वभाव रखता है जैसे घास का दूध । - १ - परोरजा जिससे त्रैलोक्यसृष्टि के २- श्राग्नेय जो विशकलन करने का ४- श्राप्य जो रूपान्तर में बदलने का । इसमें चौथा लक्षा ' आसंजन ' है । यह कहा जा चुका है कि मन प्रसङ्ग है प्रर्थात् किसी वस्तु का धर्म पर नहीं आता वह वेलाग होकर निकल जाता है ठीक इसके विरुद्ध प्राण में ग्रासञ्जन उस एक प्रकार का चेप है जिसके कारण आप स्वयम् भी भूतों के परमाणु से इस प्रकार चिपका धर्म जिससे ब्राण और भूत पृथक पृथक स्थान नहीं रखते । प्राणमय भूत या भूतमय प्राण ही रहता है कि हैं । इस ही आसंजन धर्म के कारण यह प्राण विचरण भी कर सकता है । देखने में श्राते यह प्राण मन को बांधने वाला है । यद्यपि मन किसी वस्तु करने की अधिक शक्ति रखता है अतः वह अपनी शक्ति से मन को का संग नहीं करता किन्तु प्राण, संग कि इन प्राणियों के शरीर में मन बंधा हुग्रा रहता है । किसी विषय अपने में बांध लेता है । यही कारण है बहुत इधर - उधर व्यापार करता है तथापि प्राण को छोड़कर का विचार करता हुआ मन यद्यपि धर्म नहीं है किन्तु वह प्राण ही की शक्ति से बंधा रहता है अतः अलग प्राण नहीं हो सकता । वंधा रहना नन का बांधने वाला धर्म है | पाचवाँ लक्षण ' विसारिता ' है अर्थात् थोड़े में ' मनोधकर्ता ' प्रर्थात् मन को प्रदेश में रहकर वह अधिक प्रदेश रह सकता है जैसे दीपक की ली और प्रकाश । में भी छठा लक्षण मन की आज्ञाकारिता ' है अर्थात् प्राण स्वयम् करता । अगुंली का हिलाना सन की इच्छा बिना प्राण नहीं करता विना मन के कोई भी व्यापार नहीं कोई मनुष्य सो गया, तब निद्रा से मन का व्यापार बन्द होते ही हाथ । किसी वस्तु को हाथ से पकड़कर हाथ से गिर जाती है । यदि प्राण उस वस्तु के पकड़ने में स्वतन्त्र खुल जाता है और पकड़ी हुई चीज काम बन्द होने पर भी प्राण का काम बन्द न होने से वह ज्यों का होता तो नींद की हालत में मन का कर सकता है कि जब सोने में मन का काम बन्द हो गया तो त्यों पकड़े रहता । यहां कोई प्रश्न चलना, अन्न का परिपाक होना यादि कैसे होते रहते हैं तो और प्राणों के काम ग्रर्थात् स्वांस का जावेगा, यहाँ केवल इतना ही कहना है कि इस शरीर में पृथक् इसका उत्तर विस्तार पूर्वक आगे दिया का और दूसरा ईश्वर का । जीव के मन की प्रेरणा से होते हुए प्राण - पृथक् दो मन काम करते हैं । एक जीव जाते हैं किन्तु ईश्वर के मन की प्रेरणा से प्राण का व्यापार नित्य के व्यापार निद्रावस्था में सब बन्द हो रहता है । ग्राकाश में बादलों का वायु का चलना वन्द होना जगत् के प्राणों के व्यापार ईश्वर के मन की प्रेरणा से बनना, का यह नित्य स्वभाव है कि वे आरम्भ होने पर बिना वन्द किये स्वयम् वन्द नहीं ही है होते , क्योंकि जड़ पदार्थों । जगत् में केवल [ ११८ ]