ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 151–160

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 151–160

पृष्ठ 151

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ब्रह्मविज्ञान मन ही ऐसा पदार्थ है जो जड़ न होने के कारण अकस्मात् वदला करता है उसी मन की वदल को ' इच्छा ' कहते हैं । जगत् में जो कुछ हम परिवर्तन देखते हैं ईश्वर के मन की इच्छा के कारण ही मानना पड़ेगा । हम जीवों के प्रारणों में जब यह निश्चय हो गया कि मन की इच्छा बिना प्राण क्रिया नहीं करता तो हमको अनुमान कर लेना चाहिये कि और भी सब प्राण किसी मन की ही प्रेरणा से अपना काम करते होंगे । श्रुतः इसी से हम ईश्वर की सत्ता में निश्चित रूप से विश्वास करते हैं । जितने प्राण जीवों की इच्छा के बिना काम करतेहुए दीखते है वे सव ईश्वर के मन के अनुसार हैं । इससे सिद्ध हुआ कि प्रारण मन की आज्ञा से ही अपना काम करता है अर्थात् ' मन का आज्ञाकारी ' है । सातवां लक्षण ' ग्रप्रसुप्ति ' है अर्थात् मन कभी जागता है और कभी सोता है और कभी तन्द्रा-वस्था में रहता है इसको स्वजन भी कहते हैं । इस प्रकार मन की तीन अवस्थाएं हैं । किन्तु प्राण कभी सोता ही नहीं सर्वदा काम करता रहता है इसी को ' ग्रप्रसुप्ति ' कहते हैं । श्राठवां लक्षण ‘ श्रमराहित्य ' है अर्थात् मन काम करते करते थक जाता है और विश्राम चाहता है किन्तु प्राण कभी नहीं थकता श्रीर न कभी विश्राम चाहता है । प्राण में यदि कोई थकान है तो वह भी मन की ही थकान समझनी चाहिए मन का काम प्राण को प्रेरणा करना है किन्तु थका हुआ मन प्रेरणा नहीं करता । अतः प्राण की क्रिया बंद होती हुई सी दिखाई देती है । प्राण का नवां लक्षण ' संक्रमण ' है अर्थात् वह एक वस्तु से दूसरी वस्तु में चला जाता है । जिस वस्तु में जितने परिमाण से रहता है यदि उस से कम परिमाण वाली वस्तु मिल जाय तो दोनों का प्राण मिलकर संपूर्ण में समानभाव से संक्रान्त हो जाता है । अर्थात् यदि एक वस्तु अत्यन्त गरम हो उसके साथ यदि कोई शीतल वस्तु जिसमें गरमी की मात्रा कम है मिला दी जाय तो वह गरमी दोनों वस्तुओंों में मिलकर समानभाव से फैल जायगी । दशवां लक्षण ' प्राणापान ' अर्थात् चलते चलते रुक जाता है और फिर चलता है । चलना ठहरना मेंढक की सी चाल है । वाक् के लक्षण १. पहला लक्षण यह है कि वह जगह रोकने वाली होती है, जिरा प्रदेश में वाक् रहती है जब तक वह् न हटायी जाय तब तक उस स्थान पर वाक् नहीं बैठ सकती । २. दूसरा लक्षण ‘ विकार ' है । वाक् एक रूप से दूसरे रूप में इस प्रकार बदल जाती है कि उसक " पहला रूप सर्वथा नहीं रहने पाता जैसे पानी का मिट्टी बनना और घास का दूध बनना । ३. तीसरा लक्षण ' प्रारण का ग्रहण करना और छोड़ना ' है । यह वाक् जिस प्राण के प्राधार पर बनती है किसी समय उसको छोड़कर दूसरा प्राण ग्रहण कर लेती है जैसे प्राणी का शरीर किसी प्राण के श्राधार पर बनते - बनते बुड्ढा हो जाता है किन्तु वाक् उस प्राण को छोड़कर सड़ - गल कर राख या [ ११६ ]

पृष्ठ 152

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* ब्रह्मविज्ञान * मिट्टी के रूप में ग्रा जाती है । यदि वह वाक् अपने प्राण को न छोड़ती तो यह प्राणी कभी न मरता । प्राण का निकल जाना ही मरना | स्वर्ग को अग्नि में तपाने पर वह पिघल जाता है ठोस करने वाला प्रारण उस समय निकल जाता है । इस प्रकार सर्वत्र निकलता और प्रवेश करता है । ४. ५. ६. ७. चौथा लक्षर्ण ' केन्द्रयोगिता ' है अर्थात् कोई भी वाक् ऐसी नहीं जो केन्द्रधारी न हो । पांचवां लक्षण ' मूर्ति ' है अर्थात् कुछ न कुछ प्रदेश रखता है जिसके श्रवयव हो, विस्तार हो और लम्बाई और मोटाई हो । छठा लक्षण ' दिग्, देश और काल से उसका परिच्छेद ' है । सातवाँ लक्षग् कुछ न कुछ वैशेषिक वर्मयुक्तता है अर्थात प्रत्येक वस्तु दूसरी वस्तु से कुछ न कुछ फरक करने के लिये अपने में खास धर्म रखती है । मन, प्राण और बाकू का साधर्म्य वैधर्म्य ये तीनों ग्रापस में एक के बिना एक कभी नहीं रहते ग्रतः इन तीनों के कार्य ज्ञान, क्रिया और ग्रथं ये तीनों भी मिले - जुले रहते हैं । ऐसा कोई ज्ञान नहीं जिसमें मन की क्रिया न हो और कोई न कोई विषय उसमें न रहे । विषय का रहना ग्रर्थ भाग है और चक्षु के द्वारा विषय का ग्रात्मा का मिलना क्रिया का भाग है । अँगुली हिलाने की क्रिया मेरी इच्छा और अँगुली से सम्बन्ध रखती है । जितनी इच्छा है वह ज्ञान का भाग है और अँगुली जो क्रिया का आश्रय है वह उसमें अर्थ का भाग है । इसी प्रकार जो घट बनाया जाता है उसमें बनाने वाले की इच्छा शामिल है वह जैसा चाहता है वैसा बनाता है । ग्रतः उस वस्तु में वह ज्ञान का भाग शामिल है । कुम्हार के हाथ या चाक ग्रादि का व्यापार उसमें क्क्रिया का भाग है । तात्पर्य यह है कि मनुष्य का ज्ञान, क्रिया और ग्रर्थ जहां जो कुछ होता है उसमें तीनों में तीनों शामिल हैं । मनुष्य चेष्टा के बाहर जो जगत् में अनन्त क्रिया और अर्थ हो रहे हैं उनमें यदि ज्ञान का अंश शामिल होते हुए नहीं दीखता तथापि मनुष्य के दृष्टान्त से ही यह दृढ़ अनुमान किया जा सकता है कि इनमें भी कोई न कोई ज्ञान का भाग अवश्य होगा । वह ज्ञान ईश्वर का समझना चाहिये । तात्पर्य यह है कि ये तीनों ही तीनों के कामों में वरावर सहायता करते हैं । इन तीनों में समान धर्म तीनों में है । इन जो ग्रविनाभावधर्म है सो तो तीनों में समान है । इसी को साधर्म्यं कहते हैं । इस प्रकार तीनों में तीनों के रहने से किसी को प्रश्न हो सकता है कि ये तीनों एक ही वस्तु हैं किन्तु ऐसा नहीं है । इन तीनों में केवल ' साहचर्य ' प्रथनि एक साथ हिलमिल कर रहने वाले हैं । इनमें स्वभाव से भी एकता नहीं हैं क्योंकि | क्रिया और ग्रथं ' यज्ञ ' हे अर्थात् इनमें जानने स्वभाव नहीं हैं, ज्ञान श्रीर अर्थ ' ग्रक्रिय ' हैं अर्थात् क्रिया का स्वभाव इनमें नहीं है और ज्ञान और क्रिया अर्थानुसार प्रदेश वाले ग्रर्थात् जगह रोकने वाले परिच्छिन्न ' पदार्थ नहीं हैं । तात्पर्य यह है कि क्रिया और अर्थ ये दोनों ' अज्ञेय ' हैं अर्थात् ज्ञान से पकड़े जाते हैं, ज्ञान में ही रहते हैं परन्तु स्वयम् ज्ञान नहीं हैं । इसी प्रकार ज्ञान और ग्रर्थ में क्रिया होती रहती है ये क्रिया के ग्राश्रय हैं परन्तु स्वयम् क्रिया नहीं हैं । इसी प्रकार ज्ञान और क्रिया परिच्छिन्न ग्रर्थ पर ही रहते हैं परन्तु स्वयं परिच्छिन्न नहीं हैं, उनमें परिच्छिन्नता अर्थ के द्वारा भासती है किन्तु यह उनका निज का धर्म नहीं [ १२० ]

पृष्ठ 153

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ब्रह्मविज्ञान है । उगसे सिद्ध हो गया कि वे तीनों भिन्न पदार्थ होकर भी सर्वदा साथ रहते हैं इनका ' साहचर्य ' नियत है । हम देखते हैं कि यदि कोई बता करे तो उसके वाक्य में यदि ज्ञान का यश हो अर्थात् जानने योग्य विषय हो और उसके भाषण में कुछ प्रारण हो तो उसके शापण में सुनने वालों को श्रद्धा होती है । यदि कहने वाला बिना मन से कहे अथवा उसके नापा में ग्रोज न हो तो लोगों की श्रद्धा नहीं होती ग्रतः सिद्ध हुआ कि बाक् में मन श्रीर प्राण के योग से ही यथार्थ स्वरूप सिद्ध होता है इसी प्रकार प्राण अर्थात् वल भी बिना मन शीर अर्थ के प्रयोग किया जाय तो वह अनिष्टकारी होता है उससे शरीर और श्रायु दोनों क्षीण होते हैं । अतः किसी मुख्य अर्थ पर सचेत रहकर वल प्रयोग किया जाय तो वह लाभदायक होता है जैसे चलता हुआ मनुष्य अंधकार में में गड्डे को न जानकर पाँव रखे तो गिर जाता है, वेग्रन्दाज पाँव रखने से पांच लचक जाता है या कभी टूट भी जाता है । अब मन का तो प्राण और वाक् से इतना घनि-प्ट सम्बन्ध है कि इनके बिना मन का स्वरूप ही सिद्ध नहीं होता । जब कुछ मन से सोचता है तो वह भीतर ही भीतर कुछ न कुछ बोलता रहता है । वह बोलना ही मन का विचार है और किसी न किसी विषय को लेता और छोड़ता रहता है । इसी प्रकार चेष्टा करते - करते अन्त में कहीं विश्राम करके किसी बात का सिद्धान्त करता है । बोलना जिस प्रकार मन में वाक् का भाग है उसी प्रकार ऊहापोह ( लेना-छोड़ना ) की चेष्टा करना मन में प्राण का भाग । यदि ये दोनों मन में से निकाल दिये जाँय तो मन का स्वरूप कदापि सिद्ध नहीं होगा ग्रतः निःसंदेह हम कह सकते हैं कि यदि मन है तो वहां प्राण और वाक् भी ग्रवश्य होंगे और यदि बाकू है तो वहां मन, प्राण श्रवश्य होंगे । अतः महर्षियों का सिद्धान्त है कि जो जहां कुछ पदार्थ दीखता है वह सब वाक् है ' ग्रथो वागेवेदं सर्वम् ' ( ऐतरेय श्रुति ) अतः जिस प्रकार उसमें हम प्राण देखते हैं उसी प्रकार मन भी अवश्य ही होगा । सब चेतन हैं किन्तु लोक में जड़ चेतन का व्य-बहार इन्द्रियों से सम्बन्ध रखता है । मन ग्रन्तः करण है, अर्थात् भीतर की इन्द्रिय है उसके रहने न रहने ` से जड़ - चेतन का भेद नहीं है किन्तु केवल पाँच वाह्य ज्ञानेन्द्रियों के रहने से चेतन और न रहने से जड़ का व्यवहार किया जाता है । यह केवल व्यवहारिक दशा है । किन्तु पारमार्थिक विज्ञान में कोई भी पदार्थ बिना गन के सिद्ध नहीं होता श्रतः सचेतन है । इस प्रकार ज्ञान, क्रिया, अर्थ का और मन, प्राण, वाक् का शाहुचर्य सिद्धान्त रूप से यहां तक निरूपण हुआ । मन, प्राण और वाक् का अधिकार ग्रर्थात् पदार्थों में उपयोग प्रत्येक वस्तु में मन ‘ श्रभिमानी ' रूप से रहता है अर्थात् में अमुक हूँ यह यदि वह पदार्थ दावा करे तो वह गन के भांग में होता है । ग्रार्य लोगों के मत में जगत् की प्रत्येक वस्तु में मन होना सिद्ध किया जा चुका है । उगी के अनुसार बहती हुई गङ्गा में जो वाक् श्रर्थात् मन का प्रश है और जिसमें बहने की क्रिया है उसमें कोई मन का भाग है उस ही भाग को गङ्गा के अभिमानी देवता का लक्ष्य करके श्रार्य लोग गङ्गा की पूजा करते हैं । पीपल, तुलसी ग्रादि जहां जहां जड़ पदार्थों में प्रतीक उपाराना का नियम किया गया है उन सब ही स्थानों में अभिमानी देवता की ही उपासना की जाती है । और वह ग्रभिमानी मन का भाग है | यही बात शारीरकशाप्य सूत्र में व्यासजी ने कहा है- ' अभिमानीव्यपदेशस्तु विशेषानु-गतिभ्याम् ' अर्थात् उपासना में अभिमानी का व्यवहार होता है । [ १२१ ]

पृष्ठ 154

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* ब्रह्मविज्ञान इसी प्रकार प्रत्येक वस्तु में प्राण ' अधिष्ठाता ' अर्थात् उस वस्तु का स्वरूप संरक्षक बनकर उस वस्तुको बाहर - भीतर सर्व प्रकार से पकड़े हुए उस पर श्राधिपत्य करता है । जैसे सेनापति सेना के प्रत्येक श्रङ्ग पर अपना अधिकार रखता है उसी प्रकार प्रत्येक वस्तु के भूतमात्रा पर यह प्राण अधिकार रखता है यही उसका ' अधिष्ठातृ ' पना है । यदि इस वस्तु में से प्राण कुछ अंश निकाल दिया जाय तो उस वस्तु का पहले के अनुसार रूप नहीं रहेगा । दूसरे प्रकार के प्राण ग्राने से वस्तु भी बदल कर दूसरे प्रकार की हो जाती है जैसे लकड़ी जलने पर कोयला या राख हो जाती है । राख में भी प्राण है किन्तु लकड़ी का प्राण निकल जाने से ग्रब लकड़ी का रूप नहीं रह सकता यही उस लकड़ी के प्रारण का अधिष्ठातृपना है । इसी प्रकार वाक् प्रत्येक वस्तु में ' ग्रविष्ठान ' रूप से रहता है अर्थात् यदि वाक् का भाग न रहे तो प्राण या मन दोनों ही नही रह सकते । उन दोनों का आश्रय यही वाक् है अतः इसको ग्रधिष्ठान कहते हैं । तात्पर्य यह है कि ग्रभिमानी, ग्रधिष्ठाता और अधिष्ठान ये तीनों मिलकर एक वस्त का स्वरूप बनते हैं । इन तीनों का एक ही नाम रहता है । जैसे जल का भाग और उसके अन्तर्गत प्राण का भाग र ग्रभिमानी देवता का भाग इन तीनों को गङ्गा शब्द से वोला करते हैं । इसका कारण यह है कि इन तीनों में एक के भी न रहने से वस्तु स्थिति नहीं रह सकती । अब दूसरा अधिकार इस प्रकार है जगत् में जितने प्रकार के कर्म या क्रिया में होती हैं उनका ब्रह्म वाक् भाग है । वाक् का ब्रह्म प्राण है और प्राण का ब्रह्म मन है । ब्रह्म उसको कहते हैं कि कोई वस्त जिसके श्राश्रय से रहे जिससे पकड़ा हुआा हो ग्रौर जहां से बढ़ा करे, क्रियायें वाक् के आश्रय से देखी जाती हैं । अँगुली के ग्राश्रय से हिलने की क्रिया होती " है वह क्रिया अॅगुली से पकड़ी हुई है और अँगुली ही उठती रहती है अतः यह अँगुली उन क्रियाश्रों का ब्रह्म है परन्तु वह वाक् ग्रर्थात् गुली बनाने वाले प्राण के ग्राधीन है । यदि अँगुली का प्राण सब निकल जाय तो अँगुली का रूप नष्ट हो जावेगा । यह अँगुली उसी प्रारण के आश्रय से है, उसी से पकड़ी हुई है नौर उसी प्राण से इस रूप में बनी है, अतः प्राण उसका ब्रह्म है किन्तु यह प्राण किसी मन के ग्राश्रय से रहता है औौर उससे पकड़ा हुआ है और उस मन की आज्ञा से बढ़कर काम करने लगता है । इसलिए मन उस प्राण का भी ब्रह्म है । इन तीनों में इस प्रकार मन में प्रधानता सिद्ध होती हैं । तीसरा अधिकार नियत हैं - ब्रह्म, क्षत्र और विट् । इन इनमें मन ब्रह्म है, प्राण क्षत्र है और होने वाली जितनी वृत्तियां हैं उनको बल से सम्बन्ध रखने वाली जितनी सम्पत्ति से संबंध रखने वाली करने वाले मनुष्य समाज के इस जगत् में प्रत्येक वस्तु के स्वभाव के लिये तीन भाव तीन भावों का सम्बन्ध इन ही तीनों सत्यों से समझना चाहिए ॥ वाक् विट् है क्योंकि मन से ज्ञान उत्पन्न होता है और ज्ञान उत्पन्न ही ब्रह्म कहते हैं । प्रारण अर्थात् बल से कर्म उत्पन्न होता है ग्रतः वृत्तियां हैं उनको क्षत्र कहते हैं । वाक् से अर्थ उत्पन्न होता है, ग्रर्थ जितनी वृत्तियाँ हैं उनको विट् कहते हैं । इन्हीं तीनों भावों की उपासना [ १२२ ]

पृष्ठ 155

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ब्रह्मविज्ञान विभाग कोक्रमशः ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य वैश्य नियोजक प्रवर्तक क्षत्रिय होता, कहते हैं । जिस प्रकार का या है | श्री क्षत्रियों का नियोजक ब्राह्मण होता है । इसी प्रकार प्राण वाक् का नियोजक है और प्राण का योगक्षेम मन है किन्तु ब्राह्मण और वैश्य दोनों किसी क्षत्रिय का प्राक्षय लेकर अपनी स्थिति रखते हैं या अपना पाते हैं । उसी प्रकार मन और हं । प्राण वाक ये दोनों भी प्राण का ही आश्रय लेकर अपनी स्थिति पाते ही तीनों में विशिष्ट अर्थात सरदार है। चौथा अधिकार मन से गोम की, प्रारण से ग्रग्नि की और वाक से प्राप् की उत्पत्ति है । ये तीनों रस हैं । इनमें साग रंग ने चन्द्रमा की, अग्नि रस से पिण्ड की और श्राप रेस से पृथ्वीपिण्ड की उत्पत्ति है । और सूर्य, चन्द्र और, पृथ्वी से संपूर्ण जगत् के पदार्थ उत्पन्न हुए हैं अतः कहना होगा कि सम्पूर्ण विश्वमण्डल मन, प्राण बाकू से उत्पन्न हुआ है इनमें भी आपोमय पृथ्वी में अग्नि और सोम भरे हैं अग्निमय सूर्य में ग्रग्नि , और सोम हैं और सोममव चन्द्रमा में अग्नि और आप् हैं । पांचवाँ अधिकार जग मजा कुछ जहां उत्पन्न हुआ है उसके तीन विभाग हैं - प्रन्न, प्रन्नाद और श्रावपन | ये तीनों ही मिले रहते हैं । न मन का कभी नाश होता है और न बिना अन्न के कभी अन्नाद रहता है श्रीर ये दोनों जिस सीमा के अन्तर्गत रहकर अन्न का भोजन ग्रन्नाद करें उसी क्षेत्र को आवपन करते हैं । जगत् में जहां जो कुछ पदार्थ है सर्वत्र यही व्यवस्था है कि किसी आवपन अथवा किसी क्षेत्र में रहकर एक दूसरे को शक्षण करते हैं । जैसे हमारी श्रात्मा इस शरीर में रहकर इस जगत् में से सात प्रकार के श्रन्न सदा खाया करती है - पृथ्वी, जल, तेज, वायु, शब्द, बल या क्रिया और ज्ञान उसी प्रकार और - और पदार्थ भी कुछ न कुछ ग्रन्न गाते रहते हैं । प्रत्येक पदार्थ में ये तीनों भाव मन, प्राण और वाक् के कारण रो हैं । इनमें मन यावपन, प्राण अन्नाद और वाक अन्न हैं । यह प्राण मन रूपी क्षेत्र आकाश में बैठा हुआ अपने वाक को अपने अन्दर लेकर सर्वदा दूसरे प्रजापति के वाक् भाग को अपने उदर में करने का गत्न करता हुआ खाता रहता है । प्राण के रहने के प्रकाश को ही मन कहते हैं । मन एक प्रकार का ऐसा ग्राकाश है कि जिसमें प्राण भरा रहता है और वह वाक् को खाया करता है । जिस प्रकार ब्रह्माण्ड रूपी आकाश में फैला हुआ सूर्य का तेज अर्थात् ग्रग्निभाग पानी को खाया करता है उसी प्रकार यहां समझना चाहिये । छठा अधिकार मन की क्रिया को इच्छा कहते हैं और प्राण की क्रिया को तप और वाक् की क्रिया को श्रम कहते हैं । हम देखते हैं कि प्राणी जब कुछ इच्छा करता है तो उस इच्छित वस्तु की प्राप्ति के लिये उसके ग्रन्दर कुछ यत्न होता है यत्न होते ही हाथ पांव ग्रादि की शरीर में कुछ चेष्टा होने लग जाती है । कोई भी चेष्टा बिना यत्न के नहीं होती और यत्न बिना इच्छा के नहीं होता । इच्छा मन का कर्म है, मत्न शरीर के अन्दर प्राण का कर्म है और श्रम शरीर के बाह्य भूतों का कर्म है । जब तक तीनों भाग [ १२३ ]

पृष्ठ 156

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* ब्रह्मविज्ञान * पूरे न हो लेवें तब तक जगत् में किसी भी कर्म का रूप सिद्ध नहीं होता । यद्यपि यह बात चेतन में ही देखने में श्राती है, जड़ पदार्थों में होते हुए इच्छा और यत्न का हम कुछ भी अनुभव नहीं करते, तथापि मनुष्य चेतन के दृष्टान्त से ही अनुमान करना पड़ता है कि उनमें भी वायु आदि की प्रेरणा के बिना ही अपने आप यदि कुछ क्रिया हुई है तो ग्रवश्य उसने यत्न किया है और उस यत्न के लिये उसने इच्छा भी की है । जैसे किसी वृक्ष के पास उगी हुई वल्लिका उस वृक्ष की तरफ झुकती है और उसको पकड़ कर उसके चारों श्रोर लिपटती हुई ऊपर बढ़ने लगती है । ग्रतः श्रनुमान करते हैं कि उसके निर्बल होने के कारण स्वयं सीधी खड़ी होने के लिये असमर्थ होकर अवश्य एक बलवान् का आश्रय ढूंढने लगती हैं और पास में वृक्ष को पाकर उसका आश्रय लेने का यत्न करके प्रबल इच्छा से अपने शरीर को उधर झुकाती है । इसी क्रिया से हम उस लता में इच्छा और यत्न का भी अनुमान करते हैं । इस प्रकार इच्छा, तप श्रौर श्रम सर्वत्र पाये जाते हैं श्रीर तीनों मन, प्राण और वाक् के सम्बन्ध से हैं । इस प्रकार वैकारिक रूढ़ दर्शन यहाँ समाप्त होता है । ३ - योगरूढ प्रजापति - रूप - निरूपण सत्र सव से प्रथम जिनका प्रादुभावहुआ ऐस तीन सत्य अर्थात् मन प्राण वाला ,, वाक् इनसे तीन धातु जो प्रथम पदार्थ कोई प्रगट हुआ उसी को प्रजापतिकहते हैं-( से बड़ा पदार्थ और उसके अन्दर छोटे से छोटा - इस जगत् में जहाँ जो कुछ दीखता है बड़े पदार्थ सबकोएक - एक प्रजापति समझना चाहिये । इस G प्रकार अनन्तानन्त प्रजापतिएक जगत् के रूप वन गये हैं का समवाय है इसीलिये इनमें प्रत्येक प्रजापति बाक् मात्र प्रत्येक प्रजापति, मन, प्राण, का नाम " ग्रोम ' है का भाग है जो कान से पकड़ा इस ग्रोम् ग्रक्षर में जितना सा ध्वनि जाता है और जिसकेद्वारा एक व दूसरे है वही भाग वाकू है श्रीर जो इसमें स्वर का वर्गों से अपनी भिन्नता रखता भाग है जिसके या कोमलता भी ग्रर्थात् द्वारा चढ़ाव उतार में तीव्रता_ ऊँची आवाज या धीमी वा उच्चारण ग्रावाज ग्रादि जो प्राण-का भाग है और ग्रोम् शब्द को सुनकर ग्रन्तर किया जाता है वही इसमें उसके द्वारा जो किसी अर्थ मनका भाग है । यद्यपि ये तीनों भाग पर मेरी बुद्धि दौड़ जाती है वही इसमें प्रत्येक शब्द में हो सकते शब्द को प्रजापति का नाम भी कह सकते हैं गौर इसी से बिना संकोच हम प्रत्येक हैं तथापि उन शब्दों प्रजापति के नाम से कहा है कि प्रजापति में से विशेषकर ग्रोम् शब्द को इस कारण के बहुत से धर्म उपासना प्रकरण में आगे विस्तार पूर्वक किया जायगा । इस ग्रोम् शब्द में दिखाई देते हैं जिसका वर्णन [ १२४ ]

पृष्ठ 157

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ब्रह्मविज्ञान और यह प्रजापति जो एक प्रकार का ब्रह्म है उसको प्रथम हम दो भागों दूसरा " निरुक्त " में देखते हैं - एक “ अनिरुक्त ” है । जिसका दिग देश यादि से ,, काल संख्या ग्रहण करे और उसकी " निरुक्त वही किसी वस्तु का निर्वचन " कहते परिच्छेद हैं । किन्तु जिसका इस प्रकार निर्वाचन नहीं होता हो अर्थात् जिसका ( हृदन्वदी ) निरुक्त न हो सकती हो वही ग्रखण्ड निष्कल निर्धार्मिक पदार्थ अनिर्वचनीय ,,, है उसको कहते हैं ग्रनिरुक्त द्वित्व ग्रादि कहते पदार्थ को वस्तु सत्ता से ही कह सकते हैं किन्तु उसमें स्वगत भेद और संख्या नहीं में फरक किया जावे तो वह कह सकते और यदि किसी पदार्थ में कई भेद बताये जावे कुछ धर्म, कुछ धर्मों का भेद और उस वस्तु की " निरुक्ति " होंगे - इस जगत् में जहां जो कुछ देखते हैं उन सभी संख्या पाते से ही उत्पन्न हैं इसलिये ये सब निरुक्त हैं किन्तु यह निरुक्त रूप किसी न किसी निरुक्त रूप नहीं हुए हैं इन सब का कर सकते मूल अवश्य कोई अनिरुक्तरूप है— यद्यपि उसको हम विशेष रूप से ग्रहण शील किन्तु उसके होने है इसलिये का हम दृढ़ विश्वास रखते हैं । क्योंकि यह निरुक्तरूप सर्वदा परिवर्तन-सिलसिला इनका किसीमूलतत्व पर ठहराव अवश्य मानना होगा कि जिस पर यह परिवर्तन का ग्रभङ्गरूप से प्रवर्तमान उन्मुग्ध रूप है ( जारी रहता है ) उस श्रनिरुक्तरूप में मन, प्राण, वाक् ये तीनों से रहते हैं किसी समय अर्थात् जो भेद मन, प्रारण, वाक् में छिपे हुए भेदों से आज हम पाते हैं वे सर्वथा न थे । तीनों यह निरुक्तरूप एक रूप में जब थे उसी रूप को हम " अनिरुक्त " कहते है । उसी अभिरक्त से मैं ग्रनिरुक्त प्रकट हो गया है जिसमें देखते हैं- दोनों भागों , हम मन, प्रारण, वाक् का पृथक् - पृथक् इन का विशेष करते हैं । प्रकार से वर्णन न करके निरुक्त भाग का ही विशेष रूप से वर्णन करना प्रारम्भ सन्निवेश मन, प्रारण, वाक् इन तीनों के जो प्रजापति का त्रिधातु रूप सिद्ध होता है वही फिर क्रम से त्रिपर्वा समुच्चय से मूर्ति वाक् होता है— नाभि, मूर्ति और महिमा- इनमें नभ्य भाग मन प्रधान होता है और प्रधान होती प्रजापति का है और महिमा प्रारण प्रधान होता है यद्यपि इन तीनों पर्वो के मिलने से एक ही रूप सिद्ध होता भी कहे जाते है नभ्य, है तथापि व्यवहार इन तीनों के सम्वन्ध से तीन प्रजापति, व्याकृत और व्याकृत सर्व; केवल नाभि भाव को नभ्य कहेंगे किन्तु नभ्य और मूर्ति दोनों को एक साथ कहते हैं इसीप्रकार नाभि मूर्ति और महिमा तीनों को एक साथ सर्व प्रजापति कहते है । , होता है इन तीनों में प्रधान जो मूर्ति भाग है उसी का कम रूप नाम से व्याकरण और उसी व्याकृत है क्योंकि इनमें व्याकृत को हम अपनी दृष्टि से स्पष्ट देख सकते हैं । जो कुछ वस्तु हम देख रहे हैं यह सब मूर्ति के जो प्रजापति वह भाग नाभि अर्थात केन्द्र है उसमें जो शक्ति रहती है वह अनिरुक्त का अंश है, यथार्थ अपना में अज्ञात और अनिर्वचनीय है की शक्तियां वहीं से निकलकर अपना-कार्य करती किन्तु सर्व प्रजापति हैं और वही के लिये वेद में ऋचा है-वस्तु का भार केन्द्र है उस नभ्य प्रजापतिश्चरति गर्भे विजायते । अन्तरजायमानो बहुधा तस्य योनि परिपश्यन्ति धीरास्तस्मिन्ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा ॥ [ १२५ ] ( यजुः संहिता ३१ / १६ )

पृष्ठ 158

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* ब्रह्मविज्ञान है किन्तु वह बहुत अर्थात् प्रजापति गर्भ में रहता है वह जायमान नहीं है अर्थात् उत्पन्न नहीं हुआ पाते हैं । उसी प्रजापति के आधार तरह पर उत्पन्न करता है उसके निज का स्थान विद्वान् लोग ही देख । ये ऋचा नभ्य प्रजापति जो मूर्ति की पर सब भुवन ( भुवन से तात्पर्य मूर्ति और महिमा है ) ठहरे हैं मिलकर व्याकृत प्रजा-नाभि में रहता है उसके लिये है किन्तु दूसरा भाग जो मूर्ति है वही नभ्य के साथ निकलकर चारों पति कहलाता है उस प्रजापति की मूर्ति से चारों ओर नाना प्रकार के गी अर्थात् किरणें ओर दूर तक फैलती हैं । जिन किरणों के तीन भेद हैं- वेद, यज्ञ, रस । इनके अतिरिक्त सूर्य की किरणें भी इनसे सम्मिलित होकर चारों ओर बाहर फैलती है उन हो के कारण वेद उस मूर्ति का रूप बनाता है । उन ही गौत्रों को चारों ओर फैलाते हुए व्याकृत प्रजापति के लिये यह ऋचा है । II

" प्रजापतिर्मह्यमेता रराणो, विश्वैदेवैः पितृभिः संविदानः ।

शिवाः सतीरूपा नो गोष्ठमाकस्तासां वय प्रजया संसदेम ॥

( ऋ ० १०।१२।१६६ ) अर्थ यह है कि प्रजापति मेरे लिये गाँ देता है सभी देवता और पित्रों से मेल कर के बहुत उत्तम होती हुई उन गौनों से हमारी गौशाला का उपकार करते हैं उन गांथों की प्रजायों से हम संपन्न होते हैं, यह अर्थ सायण भाष्य का है अधिक विचार करने से दूसरा अर्थ इस प्रकार भासता है कि प्रत्येक वस्तु | की ग्रात्मा ही प्रजापति है वह प्रजापति सब ही देवताओं से अर्थात् सूर्य के प्राणों से और पित्रों से अर्थात् चन्द्रमा के प्राणों से मेल करके अपनी किरणों को प्रति फल रूप में हमारी दृष्टि पर भेजता है जिससे गोष्ठ अर्थात् किरण रूपी गौत्रों की टिकने की जगह हमारी चक्षुका उपकार होता है । जो सूर्य चन्द्रमा की रश्मि रूपी गी वस्तुओं पर श्राये थे । उनके प्रतिफल होने पर उन गौओं की प्रजा जो उस वस्तु के रूप में बनी हुई वस्तु है जिनसे हम सम्पन्न होते हैं अर्थात् अपने ज्ञान को बनाते हैं व्याकृत प्रजापति का प्रमाण सिद्ध होता है ॥ इस प्रकार इस व्याकृत प्रजापति के चारों और जो वेद, यज्ञ, उस से एकश्रष्टमण्डल बनता है जिसको व्याकृत प्रजापति की महिमा कहते हैं । उस महिमा समेत यह जो एक धर्मी बना है उसको सर्व प्रजाप कहते हैं प्रजापति का कोई भी भाग अवशिष्ट नहीं बचता । इसीलिये हैं इसके लिये ऋचा है । इसको सर्व प्रजापति कहते, प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो, विश्वा जातानि यत् कामास्ते जुहुमस्तान्नो अस्तु, वयम्, स्याम परि पतयो ता बभूव रयीणाम् ॥। ( यजु ० सं ० २४।६५ ) अर्थ हे प्रजापति! आप से भिन्न कोई भीइन पंदा हुई जगत् की अखिल ओर नहीं है अर्थात् प्रत्येक पैदा हुई वस्तुयों के चारों वस्तुओं के चारों ओर केवल ग्राप ही जिस कामना से कुछ हवन करते हैं वह मेरा आप दीखते हैं इसलिये हम काम होना चाहिये संपदाओंके स्वामी से तात्पर्य इतना ही है कि जो - जो वस्तु हमें दीखती हैं हम होवें । इस ऋचा वे व्याकृतरूप हैं किन्तु हुई । उनके चारों ओर जो महिमा फैली [ १२६ ]

पृष्ठ 159

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* ब्रहाविज्ञान हैवह्भी एक प्रजापति का रूप है उस महिमा के द्वारा प्रजापति उत्त व्याकृत रहता है इसीलिये जब भाग की चारों ओर घेरे नहीं तक वह महिमा प्राप्त का प्रजापति मेरी दृष्टि पर न आवे तब तक हम कर सकते हम जो उस वस्तु को की किसी वस्तु पर पाकर ही करते प्रभुत्व रखते हैं सो उस महिमा के द्वारा देखने से उस वस्तु किसी हैं इसलिये हम किसी वस्तु के पाने की अभिलापा से अपनी ग्रात्मा को दष्टि वस्तु पर डालते हैं यदि द्वारा यही विज्ञान वह महिमा न होती तो दृष्टि देने पर भी कोई वस्तु हमें इस ऋचा न मिलती केवल में कहा गया है । वेद, यज्ञ गौर होने से प्रजापति रस से बने हुए देवता सर्वप्रजापति के ही ग्रह हैं सम्पूर्ण वेद प्रजापति के सृष्टि है । इसी प्रकार होने यज्ञ और रस में सब देवता भी प्रजापति ही के स्वरूप हैं । किन्तु यह पर प्रजापति 1 किन्तु का जो सन्निवेश है उसके द्वारा विभाग करके प्रजापति वास्तव में प्रजापति का रूप दिखाया गया है, त्रिधातूपन का रूप केवल मन प्राण वाक् इन तीनों धातुओं से त्रिधातु होना ही है जो ,, प्रजापति अविनाशी का सृष्टि से पहले भी था सृष्टि में भी वैसा ही है ये त्रिधातु है, आज दशा रूप उसका है और त्रिपर्वारूप | किसी उसका केवल सृष्टिकाल में ही है त्रिधातु रूप कारण है और त्रिपर्वा रूप कार्य किसी, और का मत है कि ग्राकाश वास्तव में प्रजापति केवल मन रूप में ही है यही रूप उसका अविनाशी है । के सदृश उत्पन्न शान्त है किन्तु उसमें के अधिक अधिकतम हो जाया इच्छा प्रवृति कारण कम या या प्रारण इच्छा करता है जैसा के अनुसार आज भी किसी काम के करते समय कोई मनुष्य किसी वस्तु पर अपनी हुना कम चल या अधिक न था केवल बल लगाया करता है ये वल इच्छा के पहले इस प्रकार निकला संपूर्ण इच्छा से कम है कि जो विशाल या अधिक उसी मन में प्रकट हो जाता है । संभव वह बल का जगत् के रूप था रूप में हमें दीखता किसी समय न था केवल प्रशान्त मन ही प्रजापति फिर उसी में से है उद्भट ये वल याने दोनों प्रजापति का रूप बन गया । प्राण मिलकर प्रारण प्रकट होकर भन और प्रारण प्रजापति घनरूप में ग्राकर मन प्राण वाक् ये तीनों मिलकर के रूप वह प्रारण, वाक वन गया और तब, हुए हैं हो गये अभी से और प्रारण से वाक् उत्पन्न अथवा तक यह निश्चित नहीं हुआ है कि मन प्राण मन प्रारण , वाक् ये , तीनों ही नित्य हैं । आदि प्रजापति सूत्र के सबसे समुच्चय प्रथम जो प्रजापति प्रादुभूत असीम और अनन्त है क्योंकि जिन मन, प्राण, वाक् रहा है से उसका हुआ वह ग्रवशिष्ट नहीं रूप बना हैं उनमें भी प्रजापति के शरीर से कुछ पृथक् , और एक उस के उन मन सिद्ध नहीं हो सकता जगत् , प्राण, अनन्त होने वाकों का परिमाण किसी प्रकार भी प्रमाण यदि के साथ पड़ेगा । इसीलिये उस प्रजापति जगत् के धातु स्वरूप उन तीनों को भी अनन्त ही मानना ही ठहरता को भी जो है अनन्त ग्रसीम ही कहना उचित है । इस विशाल जगत के रूप में अब दीख रहा प्रजापति यह ग्रादि प्रजापति के की उत्पन्न ही ग्रन्य सब प्रजापतियों की योनि अर्थात् उत्पत्ति स्थान है इसी से पीछे सब योनि होता हुए हैं । उत्पन्न में भी एक प्रजापति अन्य ग्रन्य बहत से प्रजापतियों हुए उन प्रजापतियों एक रहता है- तात्पर्य देखते हैं ये सब एक प्रजापति इनमें कितने यह है कि जो जहां कुछ हम [ १२७ ]

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ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 160 का मूल पृष्ठ
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* ब्रह्मविज्ञान दूसरे किसी प्रजापति से उत्पन्न है । ही एक प्रजापति से उत्पन्न हुए हैं और उनके कारण प्रजापति भी ढेर ये विशाल जगत् भी स्वयं एक प्रजापति से प्रजापति उत्पन्न होता हुआ ग्रनन्त प्रजापतियों का, किन्तु उनके उदर में बद्भुत से प्रजापति है | इससे हम कह सकते हैं कि यादि प्रजापति कोई एक है ग्रनन्त प्रजापति हैं । इनमें यदि प्रजापति और उन प्रत्येक प्रजापति के भी उदर में अनेक प्रजापति होकर प्रजापतियों आदि प्रजापति को एक परमेश्वर और बीच वाले कितने हीं प्रजापतियों को ईश्वर तथा क्षुद्र को जीव कहें, तो कह सकते हैं । इनमें आदि प्रजापति के शरीर बनाने वाले तीनों धातु अर्थात् मन, प्राण, वाक् किसी ग्रसाधारण रूप में होकर इस जगत् में दीखते है जिनकों क्रंग से रंग, बल और सभ्य कहते हैं । उनका यादि रूप ही रम है और कारण आदि रूप बल है और वाक् का प्रथम स्वरूप अभ्व है । इनमें रस को ग्राभु, बल को तुच्छ और ग्रभ्व को माया भी कहते हैं । किसी - किसी का मत है कि ये तीनों भी क्रम से उत्पन्न हुए हैं उनमें सबसे प्रथम जो किसी बादि युग में सर्वथा प्रशान्त भाव था जिसमें अभी तक कोई भी क्रिया उत्पन्न नहीं हुई थी उस प्रशान्त रूप को श्रानन्द समझना चाहिए | श्रानन्द के दो लक्षण हैं शांति और समृद्धि जब कि क्षुद्र आत्मा HAR जावे अर्थात् उसमें कुछ ग्रात्मा की वृद्धि हो उस समय श्रानन्द का अनुभव होता है किन्तु वह ग्रानन्द कुछ क्षरण तक रहता है फिर ग्रात्मा बढ़कर अपनी शान्ति में प्राजाता । यदि ग्रात्मा में किसी प्रकार का क्षोभ कोई उपद्रव या हल चल न हो तो उस समय ग्रात्मा शान्ति मय ग्रानन्द रूप रहता है । जैसे गहरी नींद में मोकर उठने के बाद उस समय के ग्रानन्द का स्मरण करता है इन दोनों ग्रानन्दों में वह शान्ति का ग्रानन्द ही मुख्य है । वही ग्रानन्द सृष्टि के ग्रादि में किसी समय था । ग्रर्थात् उस समय मन से किसी प्रकारका प्राण उत्पन्न न हुआ था, उस समय के मन को ग्रानन्द होने के कारण " " हैं । रस रस कहते आनन्द का ही नाम है । अब भी जगत् जब किसी - किसी बात में कुछ रस मिलता है तो ग्रानन्द याता है इसलिये ग्रानन्द ग्रौर रस एक वस्तु है उसी रस से पश्चात् बल अनन्त रूप में उत्पन्न होत है । वल कितने प्रकार के हैं वह ग्राज तक भी निश्चित नहीं हुआ है । ये शक्ति के वल प्रत्येक वस्तु में भिन्न भिन्न | नाम से ग्रनन्त रूप में देखे जाते हैं, इनहीं बलों के परस्पर मिलने नया परस्पर ग्राघात प्रत्याघात से एक भाव उत्पन्न हो जाता है, वहीं ग्रभ्व कहलाता है । से इस मत में ग्रभ्व सभी बलों से और बल सभी रस उत्पन्न हुए माने जाते है, किन्तु वास्तव में शुक्ल यजु का दही में मत है कि ये इनका प्रभव स्थान है जैसे सेवी तिल में से तेल निकला करता है उसी प्रकार पर प्रादुर्भूत होता रहता है ये तीनों नित्य हैं स्वतन्त्र हैं । मन में सर्वदा वर्तमान बल ही समय - समय वह रस जो मन का मुख्य रूप है ( १ ) ग्रप्रवर्ती है वायु ( प्रवर्तित ) दूसरी जगह सरकने वाला जैसे अर्थात् विकृत नहीं होता और ( २ ) ग्रापन है अर्थात् ग्रव प्राण और वाक के लिये कम करने का क्षेत्र है वह मन या रस ( ३ ) भूमा है अर्थात् अपना ग्रसीम स्वरूप रखताहै इसीलिये ग्रनन्त है । ( ४ ) श्राकाश के सदृश ग्रत्यन्त सूक्ष्म है । जिस प्रकार हैं आकाश प्रत्येक वस्तु के भीतर से रहता और कोई भी घन पदार्थ ग्रपनी बाहर समान भाव घनता में ग्राकाश को रोक नहीं कहीं सकता यदि घड़े का मुख बन्द करके [ १२८ ]