ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 161–170

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 161–170

पृष्ठ 161

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* ब्रह्मविज्ञान & ले जाये तो उन के अन्दर में आकलना प्रवेश करता जायगा जो अत्यन्त है उसके के दर सुक्ष्म से सूक्ष्म परमाणु भी है । हम देखते हैं उनके प्रत्येक लवण या शर्करा को यदि पानी में घोल दिया जाय तो परमाणु अपने रूप रंग को छोड़ जन्न के परमों कर पानी के रूप में आ जाते हैं । ग्रवश्य ही उनके परमाणु ने घुलकर एक हो जाते हैं । इससे सिद्ध है कि उन में भी ग्राकाश है । जिस वस्तु में ग्राकाश प्रकार प्रत्येक है और आकाश में प्रत्येक उसको कोई भी वस्तु है, ठीक उसी प्रकार ये मन या रस अत्यन्त सुक्ष्म हैं, पदार्थ सपनी घनना से रोक नहीं सकते प्रत्येक प्राण और वाक में रस रस में ही प्राण रहता है और और बाकू रहते हैं इसीलिये ये रस या रस या मन को प्रकाश की तुलना से आकाश कहते हैं और मन अर्थात् श्राकाश के किसी प्रकार का हल चल होना इनका निज का धर्म नहीं है । अनुसार ये सदा इन से परिनि प्रशान्त रूप में रहते हैं और ये रस वा मन ( ६ ) दिक, देश, काल और संख्या है नहीं होते । , किन्तु इस रस से ग्रवं वल जो पूर्व में न था सो पश्चात् उत्पन्न हो जाया करता उस नये व पदार्थ कोई विकार के उत्पन्न होने से उस मन का तनिक भी कोई अंश कम नहीं होने पाता न ही होता है साश्चर्य के उत्पन्न होकर साथ कहना पड़ता है कि अत्यन्त शान्त रस से प्रत्यन्त अशान्त बल उगी रस में फिर विलीयमान अनुभव करने हो जाता है । यह कैसे होता है ये समझ में नहीं प्राता किन्तु से यहसहसा देखने में आता है इसलिये आश्चर्य होते हुए भी शान्त में से प्रशान्त का , व्यक्तहोना मानना पड़ता है। यद्यपि वडा अनेक यह रस ( ) भूमा है अर्थात् असीम है तथापि उसमें जो वल उत्पन्न होता है वह छोटा से प्रकार के खण्ड बड़ा रूपों में ही देखा जाता है । ये बल संख्या में अनन्त हात हुए भी उसका बड़ा खण्ड ग्रसीम बड़ो में नहीं है छोटा हो या बड़ा हो वह कुछ न कुछ अपना आयतन अवश्य रखता है वह इतना श्रग्नि बड़ा है कि जिससे है और छोटे से छोटा इतना है कि वायु एक एक ब्रह्माण्ड का काम चल रहा परमाणुजो दृष्टि में नहीं आते सब उसी के एक एक रूप हैं । इसलिये इन बलों में बड़े बड़ा या छोटे से छोटा कोई बल ऐसा नहीं है जो रस के विना श्राश्रय हो, बल के में भूमा प्रायतन के अनुसार कल्पित हो जाता है इसलिये इस रस के साथ उस रस का भी श्रायतन सर्वथा साथ वल के है ये बल अपने स्वरूप से यद्यपि संबन्ध से ( 2 ) ग्रणिमा भी उत्पन्न हो जाती सत् है दीखता है किन्तु वह सदा सत् रूप इस रस का ग्राश्रय पाकर सत् रूप में आया हुआ, इस जबकि प्रकार रस के से बना भी वल कदापि दीखने में नहीं ग्राता । से इस प्रकार ग्राश्रय सत् हुग्रा उनके श्राघात - प्रत्याघात के वल दो तीन या चार ग्रथवा असंख्य आपस में मिलते हैं । एक नया रूप उनमेंआ जाता अपना वही ( १० ) वाक् कहलाने योग्य होता है, अथवा वही बल इस वाक् पर देखते प्रभाव डालकर उसी नई को हस ( ११ ) अभ्व कहते हैं । हम हैं कि कोई कोई नई वस्तु उत्पन्न करता है वस्तु को न जाय भौतिक परमाणु के जितने में रहता है जब तक उस परमाणु हटाया , प्रकाश आयतन जब तक सकता है किन्तु बल में यह बात नहीं उस आयतन में दूसरा भौतिक परमाणु प्रवेश नहीं कर, मह इनके वल दो चार साथ एक हो बिन्दु में मिलकर रह सकते हैं । संसर्गों क्या प्रत्युत सौ या हजार तक एक तीय के भी अनेक बलों के मिलने पर इन बलों का सजा-विजातीय भेद हैं, जिनके कारण कभी - कभी इन भेद अथवा होकर सब बल मिलकर एक ही अखण्ड तत्व हो जाता वहुत्व की संज्ञा भी नष्ट [ १२६ ]

पृष्ठ 162

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* ब्रह्मविज्ञान है । इस प्रकार बलों के परस्पर संबन्ध से जो प्रथम कोई तत्व बना है उस को हम अभ्व कहते हैं । जब कभी कहीं हम किसी अर्थ को देखते हैं तो वह अर्थ क्या है केवल रस और उस पर सैकड़ों प्रकार के बलों का वह एक घन मात्र है । वलों की भिन्नता अथवा बलों के परस्पर संसर्ग की न्यूनाधिकता अथवा संसर्ग की विचित्रता के कारण ये सब अर्थ भिन्न - भिन्न प्रकार के भले ही दीखें किन्तु सभी अर्थ रस में बलों का संग्रह रूप है । इसमें सन्देह नहीं इनमें रस के कारण एकत्व की प्रतीति होती है किन्तु बलों की न्यूनाधिकता के कारण एक ही वस्तु में भिन्न - भिन्न अवस्था वा अनेक परिवर्तन दीवा करते हैं, यही इस जगत का रूप है किन्तु इन ग्रर्थों पर सबसे प्रथम उत्पन्न होने वाला ग्रभ्व सर्वत्र नियम से रहता है । अब इस ग्रभ्व का यदि हम विचार करें तो यह तीन प्रकार का प्रतीत होता है — १ – कर्म, २ रूप, ३ – नाम, ये तीनों ही जीव से वा ईश्वर से सम्बन्ध नहीं रखते किन्तु इनका शुद्ध निर्विकार परमेश्वर से सम्बन्ध है ग्रागे इस बात का विस्तार पूर्वक वर्णन होगा कि ईश्वर का शरीर त्रैलोक्यमय है, इसीलिये जीव का भी शरीर तीन लोक से बना हुआ है जीव और ईश्वर इन दोनों के शरीर में जो तीन लोक हैं उसके सव पदार्थ एक दूसरे लोक में जाया करते हैं वे इस लोक से निकलने के पीछे ग्रवश्य ही किसी दूसरे लोक में पाये जाते हैं किन्तु ये रूप रङ्गत या वस्तु शक्ति रूप कर्म जब किसी वस्तु से निकल जाते हैं तो उसकी इन नहीं तीनों लोक में कहीं भी सत्ता नहीं रहती, वे एक वस्तु से दूसरी वस्तु में जाते हुए दीखते, और जब नये रूप रङ्ग वा शक्ति उत्पन्न होती हैं तो वे भी अकस्मात् कहीं से ग्रा जाती हैं | तीनों लोक वाली किसी वस्तु से निकलकर ग्राते हुए प्रतीत नहीं होते । तेल से चराग वा ग्राँ बना ग्रंथवा लकड़ी का कोयला वा राख हुआ इनमें पुरानी रङ्गत वा शक्ति कहां से या गई यह परीक्षा से निश्चित है कि इन जाने आाने वाले या नष्ट उत्पन्न हुए इन रूप कर्मों का त्रैलोक्य भर में किसी दूसरे स्थान में सत्ता नहीं है । इसीलिये यह सिद्धान्त हो चुका है कि यह नाम, रूप, कर्म तीनों लोकत्रय से बाहर की चीज हैं, किन्तु जब कि इन तीनों लोकों में भी परमेश्वर की सत्ता व्यापक होने के कारण अवश्य है तो उसी सत्ता से ये अकस्मात् उत्पन्न हो जाते हैं और उसी परमेश्वर की सत्ता में फिर लीन हो जाते हैं इसीलिये इन तीनों लोकों में इन तीनों का नष्ट होने पर पता नहीं चलता जब कि ये तीनों लोकों में नहीं है तो इसी से यह निश्चित हो चुका कि ये तीनों ईश्वर के शरीर से उत्पन्न नहीं । इसीलिये मानना पड़ता है कि ईश्वर से भी प्राचीन परमेश्वर से इनका सम्बन्ध है, किन्तु ये रूप या शक्ति जगह रोकने वाली है एक रूप दूसरे रूप से एक शक्ति दूसरी शक्ति से विरोध रखती है इसीलिये ये तीनों रस, बल न होकर परमेश्वर के शरीर की वाक् है । यद्यपि वाक् एक और ये तीन हैं तथापि परमेश्वर के वाक् का प्रथम विकास इन तीनों को कह सकते हैं इस प्रकार रस, बल, नाम, रूप, कर्म रूपी ग्रभ्व ये सब परमेश्वर के शरीर से संबन्ध रखते हुए प्रथम उत्पन्न होने वाले तत्व हैं, ऐसा जानना चाहिये । इस प्रकार योगरूढ़ दर्शन समाप्त हुआ । [ १३० ]

पृष्ठ 163

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यौगिकरूढ़ ( वेदसूत्र ) प्रजापति के स्वरूप का वर्णन हो चुका । स्वरूप से तात्पर्य धातु का है । अब यदि इस प्रजापति के संबन्ध में कोई प्रश्न करे कि इस प्रजापति की स्वरूप संस्था अर्थात् स्वरूप विन्यास किस प्रकार है श्रीर प्रजापति का जीवन कैसा है और कर्तव्य क्या है? श्रीर तो इन तीनों प्रश्नों का उत्तर है — वैद, यज्ञ ( प्रजापति । प्रजापति के शरीर की बनावट को ही हम वेद कहते हैं, यज्ञ से प्रजापति का जीवन स्थित रहता है और प्रजा की उत्पत्ति करना प्रजापति का मुख्य कार्य है । इन तीनों से प्रजापति का वास्तविक रूप हमारे सामने साक्षत् हो जाता है । पहले प्रजापति के शरीर में जो तीन धातु कहे गये थे उन्हीं तीनों अधिकरणों ( Department ) के सम्बन्ध से इन तीनों की भी स्थिति है । वेद का संबन्ध मन से, यज्ञ का प्राण से और प्रजा का वाक् से मुख्य करके माना जाता है । वेद का निरूपण पहले कहा जा चुका है कि प्रजापति तीन भाग में विभक्त होकर स्वरूप धारण करता है - नाभि मूर्ति श्रीर महिमा । इनमें नाभि को छोड़ कर मूर्ति और महिमा पर दृष्टि रखनी चाहिए । मूर्ति और महिमा के भीतर वेद व्याप्त रहता है । वह वेद तीन प्रकार का है - ऋक्, साम, यजुः । किसी २ ऋषि ने ऐसा भी कहा है कि ऋक ही प्रजापति की मूर्ति है और साम उसका मस्तक है और यजुः उसका पेट । तात्पर्य यह है कि प्रजापति तीनों वेद से पृथक कुछ भी नहीं है । यदि हम प्रजापति को देखना चाहें तो वेद को ही देख कर उसको देखेंगे । यद्यपि इस वेद के ऋक्, यजुः और साम ये ही तीन भेद हैं तथापि ये तीनो भी तीन - तीन प्रकार के देखे जाते हैं- रस, छन्द और वितान । इन तीनों के निरुपण से वेद का निरूपण हो सकता है | १- रस वेद रस वेद के तीन विभाग है- महोक्थ, महाव्रत, अग्नि } । और ये तीनों क्रमशः ऋक्, यजु और साम भी कहलाते हैं । जगत् में जहाँ जो कुछ दृष्टिगोचर है सब अग्नि ही ग्रग्नि है । अग्नि ही किसी न किसी रूप में वस्तु के नाम से कहा जाता हैं । अग्नि के स्वभाव के कारण प्रत्येक वस्तु में से उस अग्नि का भाग अत्यन्त सूक्ष्मरूप में आकर प्रतिक्षण कुछ बाहर निकला करता है । जो अंश किसी वस्तु के मूर्ति भाग से प्राण रूप में बाहर निकल गया, वह निकला हुआ भाग ' महोवथ ' कहलाता है । इस प्रकार निकल जाने से वस्तु शरीर के भीतर जितना श्रंश कम हो जाता है वह साथ ही बाहर से स्वयं आते हुए किसी न किसी प्राण भाग से पूरा भी होता रहता है इसी प्राते हुए प्रारण भाग को ' महाव्रत ' कहते हैं! यद्यपि गया हुआ अंश भी अग्नि का था श्रीर आए हुए अ ंश से भी फिर अग्नि ही बन जाया करता है किन्तु इन दोनों क्रियाओं के अतिरिक्त यदि हम उस भाग की ओर दृष्टि दें कि जिस भाग में अग्नि के तह के तह चुनाव होने से एक वस्तु का स्वरूप [ १३१ ]

पृष्ठ 164

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ॐ ब्रह्मविज्ञान कायम हुआ दीखता है वही भाग ग्रग्नि का है वह अग्नि दो प्रकार का है १ चित्य, २ चिनेनिधेय । चित्य अग्नि तो मूच्छित होकर एक वस्तु का शरीर बनाता है जैसे ईंट व पत्थर का चेजा करके एक दीवार खड़ी की जाती है । उसी प्रकार अग्नि पर ग्रग्नि का चेजा करके वस्तु का शरीर बनता है । इस प्रकार चेंजे में आयेहुए ग्रग्नि को ' चित्याग्नि ' कहते हैं, इस अग्नि को एक प्रकार मूच्छित समझना चाहिए या निद्रित । यही मूर्ति अवस्था है किन्तु इसमे दूसरी एक ग्रग्नि जाग्रत् काम करती है और वस्तुएं बनाया करती है उसको‘चितेनिधेयाग्नि ' कहते है । ये दोनों प्रकार की अग्नि ' यजु ' कहलाती हैं । प्रत्येक वस्तु में न्यूनाधिक अग्नि का इस प्रकार ग्रावागमन तथा वस्तु स्वरूप निमाण और अग्नि की गरमी यादि कितने ही भावां का दीखना प्रत्येक वस्तु का स्वभाविक धर्म है अतः कहा जा सकता कि प्रत्येक वस्तु ऋक् साम और यजु इन तीनों वेदों का समुदाय है । यजुः के विषय में अनेक ऋषियों के मतभेद १ - जो ग्रग्नि तीनों लोकों में ग्रग्नि, वायु और ग्रादित्य नामों से प्रसिद्ध हैं उनमें ग्रादित्यग्रग्नि ही मुख्य है और वही आकाश के अनुरोध से वायु श्रीर पृथ्वी के अनुरोध से ग्रग्नि कहा जाता है । यद्यपि आकाश और पृथ्वी के अनुरोध से ग्रग्नि के स्वरूप में भी कुछ भेद या गया है तथापि वास्तव में वह प्रादित्याग्नि ही मुख्य है और उसी को हम यजुः कहते हैं । २- यह अग्नि जिसको हम यजुः कहते हैं वास्तव में वायु रूप है क्योंकि वास्तव में यजु यज्जूः से बना है अर्थात् यतु --- जुः जिसमें मत् का अर्थ चलने वाला और जूः का अर्थवेग उत्पन्न करने वाला श्राकाश ( पोल ) अर्थात् जिस श्राकाश में वेग से गति हो सके और जो वेग से गति करने वाला तत्त्व है इन दोनों को एक साथ मिले हुए रूप में यज्जू: कहते हैं । इसी का छोटा रूप बनकर यजुः शब्द का प्रयोग होता है । तात्पर्य यह है कि संपूर्ण जगत् मण्डल एक प्रकार का आकाश है जिसमें सर्वत्र एक सूक्ष्म पदार्थ भरा हुआ है जिसको " वायु " कहते हैं । सम्भव है कि इस जगत् में जो कुछ स्थूल वस्तुएं कहीं २ दीसती हैं अर्थात् सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी आदि सब उसी वायु के घन होने पर पृथक् २ पिण्ड बन गये हो । तात्पर्य यह है कि इन सब पदार्थों का मूल कारण वही तत्व समझ में आता है जो इस सम्पूर्ण आकाश मण्डल में सूक्ष्मातिसूक्ष्म वायु रूप में भरा है । इनमें ग्राकाश स्थिर है और वायु चलता हुआ तत्त्व है । ये दोनों मूल तत्त्व एक साथ रहने के कारण मिले हुए शब्द से यजुः कहलाते हैं । इसी यजुः से सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति हुई है और इसी के ' चयन ' प्रथति चुनाव होने से सूक्ष्मवायु स्थूलशरीर में आकर नाना पदार्थ बन गये हैं अतः इसको ग्रग्नि कहते हैं क्योंकि जिसके चुनाव से सृष्टि की उत्पत्ति हो वही ग्रग्नि शब्द से कहा जाता है | यह मत शाकायनी लोगों का तथा श्रीमत्य ऋषि और हालिङ्गव यादि ऋषियों का भी है । उनका विश्वास है कि यजुः के द्वारा यज्ञ करने वाला मनुष्य परिणाम में इस वायु रूप में आकर स्थिति करता है अतः यह वायु ही यजुः है । अपनी शाकटायन ऋषि कहते हैं कि संवत्सर की सृष्टि होती है । जगत् के प्रति को ही यजुः कहना चाहिये क्योंकि इसी में ऋतुयों का विभाग होता है और ऋतुस्रों से ही जगत् के प्रत्येक पदार्थ अपने २ ऋतु पर ही उत्पन्न हुए प्रतीत होते हैं और जिस मूलतत्त्व से संपूर्ण जगत् की उत्पत्ति होती हो वही यजुः [ १३२ ]

पृष्ठ 165

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* ब्रह्मविज्ञान * शब्द से कहने योग्य प्रग्नितत्व हो सकता है अतः सम्वत्सराग्नि को ही यजुः कहना चाहिये | इसी मत पर याज्ञवल्क्य ऋषि की भी सम्मति है । परन्तु यदि हम सूक्ष्म दृष्टि से विचार करें तो यह श्रादित्याग्नि वा श्राकाशव्यापी वायु वा संवत्स-राग्नि तीनों ही अभिन्न रूप में प्रतीत होते हैं क्योंकि यादित्याग्नि का वा सवत्सराग्नि का भी निज का सूक्ष्म रूप वही है जो इस सर्वाकाशव्यापी बायुतत्व का है ग्रतः उन मतों में कुछ अन्तर नहीं है । महोक्थ, महानन और अग्नि इन तीनों में ग्रग्नि प्रधान है क्योंकि सर्वप्रथम अग्नि के ही चुनाव स वस्तुका स्वरूप बनता हैं फिर उसकी नाभि से महोत्थ का उत्थान होता है । उत्थान से कमी होने पर बाहर के महाव्रत से उसकी पूर्ति होती रहती है । इस प्रकार तीनो क्रिया जो होती ही रहती हैं उनमें मुख्य कारण अग्नि ही है । ग्रतः हम महोदय को शी ग्रग्नि कह सकते हैं क्योंकि मन, प्राण वाक् के समुदाय रूपी प्रजापति की जो मन्निवेश क्रम से मृति उत्पन्न होती है उसमें गन नाशि में रहकर अपने प्राण के द्वारा जो वाकू का परिणाम उत्पन्न करता है वह ग्रग्नि रूप में साकर अपने चुनाव से एक मूर्ति बनाता है अतः वह मूर्ति प्राण से शरी हुई बाक् है । उस मूर्ति की नाभि में जहा मन हैं उसी स्थान से प्राण का उत्क्रमण ( विकास ) चारों ओर होता है । प्राण के निकलने के साथ २ मन और वाक् के भाग भी अवश्य ही निकलते रहते हैं । वह प्राण जो बाबु और मन में सम्मिलित है सृष्टि के समय कहलाता है । वही ग्रग्नि चारों ओर बाहर जाता है उसी को महान् उत्थान कहते हैं इसी से उसका नाम महोत्थ होकर पीछे महोक्थ हो गया है । इस अवस्था में जाते हुए अग्नि रूपी प्राण को जिसमें मन, वाक् भी सम्मिलित हैं ' ऋग्वेद ' कहते हैं । जो श्रग्नि पहिले यजुः के रूप में था बढी उत्थान में ग्राकर ऋक् हो गया है किन्तु इस प्रकार प्रजापति की मूर्ति में जो अग्नि की कमी हुई वह अपने श्राप बाहर से आते हुए प्रारण से भर जाती है । उस प्राण को जो नाभि की ओर आता है उसको सोम कहते हैं वह एक प्रकार से प्रजापति का यन्न होता है । उसने प्रज्ञापति का पेट भरता है अत: उसको महाव्रत कहते हैं । क्योंकि यज्ञ में जो दीक्षित होता है उसके लिए जो दुख यादि का श्राहार दिया जाता है उसकी व्रत राज्ञ! है | यह सोम भी प्रजापति का सर्वत्र आहार होता है यतः वह महाव्रत कहलाता है उसमें भी मन, प्राण, बाक् तीनों सम्मिलित हैं किन्तु वह नाभि की ओर जाने के कारण ग्रह की अपेक्षा भिन्न चाल का होता है श्रुतः उसको भिन्न नाम से ' साम ' कहते है । इस प्रकार प्रत्येक प्रजापति में नित्य निरंतर तीन क्रियाओं के द्वारा ऋक्, यजुः, साम इन तीना वदों के स्वरूप सिद्ध होते हैं । साम साम के विषय में कहीं बेद में ऐसा लिखा है कि उनके प्रस्ताव ( निकास ) नाना हैं और निधन ( अन्त ) एक है अर्थात प्रत्येक वस्तु में भिन्न २ दिशाओंों से सोम रस की भिन्न स्थान बाली धाराएँ एक ही केन्द्र में ग्राकर समाप्त होती हैं यहां सोमकी समाप्ति को निधन और जिस स्थान से सोम की गति केन्द्र में आने के लिए ग्रारम्भ होती है उसको प्रस्ताव कहते हैं । दूसरी जगह साम के विषय में यह कहा गया है कि साम प्राण स्वरूप है और सब देवता इस प्राण को अग्नि में प्रमुत रूप से स्थापना करते हैं जिससे अग्नि वस्तु से निकलने पर भी नष्ट नहीं होने पाती । श्रग्नि ही देवताओं का स्थान है । वास्तव में १३३ ]

पृष्ठ 166

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ब्रह्मविज्ञान देवताओं के नष्ट तेतीसों देवता अग्नि के रूप में ही रहते हैं अतः किसी वस्तु में अग्नि के नष्ट में होने ग्राकर से देवताओं को नष्ट होने की सम्भावना हो सकती है ग्रमृत सोम के स्थापन से वही सोम ग्रग्नि रूप साम देवताओं नहीं होने देता अतः यह साम देवताओं का प्रिय धाम कहलाता है अथवा यों कहिए कि यह । को बिखरे हुए होने पर पुनः समेट कर बने हुए शरीर का कारण है । - किसी स्थान में यह भी कहा है कि ऋक् और साम इन्द्र के ' हर ' अर्थात् घोड़े हैं तात्पर्य यह है कि इन्हीं ऋक्, साम के द्वारा प्राण जिसको इन्द्र कहते हैं एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है जैसा कि सूर्य में इन्द्र है वह ऋक् के द्वारा ही पृथ्वी तक आता है और अनन्त दिक् देशों में व्याप्त वही इन्द्र सूर्य में साम के द्वारा पहुँचा करता है यह इन्द्र प्रकाश का देवता है अर्थात् जिस प्रकार ताप अग्नि का स्वरूप है उसी प्रकार प्रकाश इन्द्र का स्वरूप है । यह प्रकाश किसी मण्डल उत्पन्न होकर जो दूर तक दीखता है वह ऋक् साम ही का कारण है अतः इन दोनों को प्रकाश का ले जाने वाला यदि वाहन माने तो ग्रनुचित न होगा । कहीं यह भी लिखा है कि यह ऋक् साम इन्द्र के सोम पीने के पात्र हैं । भी यही तात्पर्य है कि सूर्य में जो प्रकाश है वह इन्हीं दोनों क्रियाओं के द्वारा नये २ सोमों को इसका अपने शरीर में लिया करता है क्योंकि ऋक् के द्वारा अग्नि की कमी होने पर बाहर से सोम खाली पेट में प्रवेश करने पाता है अतः इन दोनों को सोम पीने का पात्र कहें तो ग्रनुचित न होगा । यजुः ऋक् नोर साम दोनों गजुः में लय हो जाते हैं और यजुः से के आश्रय से ही ठहरते हैं । जहां नया यजुः उत्पन्न होता हैं साथ ही उसके ऋक्साम ही उत्पन्न भी नये होकर उत्पन्न यजुः हो जाते हैं विषय में ऋग्वेद की एक ऋचा है: - इस अग्निर्जागारतमृचः कामयन्ते, अग्निर्जागार तमयं सोम श्राह, अग्निर्जागर सामानि । तमु तवाहमस्मि सख्ये न्योकाः । झर्थात् अम्ति स्वतन्त्ररूप से जागता है उसी की कामना ऋचाएं ( ऋ ० ४।२।२५ ) यजुः करती हैं अर्थात् सब ही ऋचाएं : की परिस्थिति चाहती हैं इसी प्रकार जो अग्नि जागता है उसके कर ग्राया करते हैं और जो अग्नि प्रति चारों ओर से साम भी दीड़-जाग रहा है उसको के सखाओं यह सोम कहता है कि मैं आपके नीचे दरजे में से हूँ अर्थात् सखा होने पर भी ग्राप एक मुझसे वडे हैं आपके , आश्रय से मेरी स्थितिहै क्योंकि ग्राप ग्रन्नाद ( भोक्ता ) हैं और मैं ग्रापका अन्न( भोग्य ) हूँ । यज्ञ ऋक्, यजुः घोर साम तीनों बेद वाक् रूप हैं इनमें इन्हीं तीनों वाक से तीन लोक प्राण प्रविष्ट ( घुसा हुत्रा ) रहता है । वह प्रातः उत्पन्न करके उन तीनों लोकोंमें एक साथ विक्रम ( है अतः व्याप्त ) होता [ १३४ ]

पृष्ठ 167

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ब्रह्मविज्ञान के उम प्राणमय यज्ञ को ' विविक्रमविष्टें प्राप्तहोता है । यह यज्ञ रूपी विष्णु महोवय गं द्यौः अर्थात् स्वर्ग को , महाव्रत से ग्रन्तरिक्ष भाग पृथ्वी का और अग्नि से पृथ्वी को प्राप्त होता है है जो ग्रग्नि । प्रत्येक वस्तु में मूर्ति का द्यौः में व्याप्त मण्डल में रहता है और पृथ्वी से निकल कर महोवथ ग्रन्तरिक्ष को पार करके श्रग्नि पहचना है किन्तु हो जाता महाव्रत अन्तरिक्ष में रहता है क्योंकि मूर्ति में प्रवेश करने के पश्चात् वह है ग्रतः उसकी स्थिति यह पृथ्वी लोक अपने रूप स अन्तरिक्ष तक ही रहती है अतः हम कह सकते हैं कि है अग्नि है अन्तरिक्ष , , अर्थात् महावथ को महाव्रत श्रीर द्यौः महोक्थ है । ऋषि लोग कहते हैं कि ये तीनों समुद्र ये तीनों ऋचाओं का समुद्र को साम का और अग्नि को यजुः का समुद्र समझना चाहिये । , महाव्रत इन्हीं तीनों देवताओंों के लोक हैं मु । ये तीनों ही समुद्र देवतायों से सर्वदा भरे रहते हैं और साथ ही विष्णु भगवान भी निरन्तर वास करते हैं । वेदों का उदाह्रण यद्यपि ये धारण तीनों वेद प्रत्येक नहीं वस्तु में रहते हैं और कोई भी वस्तु बिना वेदों के अपना कोई भी स्वरूप कर सकती बार २ कहा तथापि इन वेदों को उदाहरणार्थ ऋषियों ने सूर्य में दिखाया है । सूर्य के लिए यह है गया है कि वहीं वह ' त्रयीमय ' है अर्थात् ये तीनों विद्या ही तप रही हैं । इनमें जो मण्डल दीखता ऋ हैं और वही यजुः जो मण्डल में कोई से भरा हैं, पुरुष हैं अर्थात् जिस पुरुष ( पदार्थ ) वह मण्डल हुआ है होने के इस यजुः का जो ग्राकार है अर्थात् सीमाबन्धी हैं वही एक प्रकार का छन्द है । छन्दोबद्ध कारण वह ही साम उस मण्डल कोऋ कहते हैं । इस मण्डल से बाहर जहां तक प्रकाशमय अर्ची दीखती है । तक है । अर्ची क्रमशः का स्वरूप मण्डल से भिन्न प्रकार का है । किन्तु जहां तक अची का प्रकाश है वहां पर ही छोटे होते सब ऋचों सर्व साम हुए अनन्तानन्त मण्डल भी क्रमशः जमे हुए रहते हैं वे सब ऋक् हैं उन अर्थात् अर्थात अर्ची ' साम गीयते ' ऋचा का प्रकाश अवलम्बित है अतः कहा जाता है ऋच्यध्यूढं पर सवार मण्डलों के हुआ साम गाया जाता है । तात्पर्य यह है कि यह प्रकाश उन्हीं आधार से फैला हुआ सम्पन्न होता है । सर्वत्र इन वेदों किन्तु यह साम जो चारों ओर व्याप्त में यजुः जो मृत्यु है वह मण्डल में रहने वाला पुरुष है वह मृत्यु स्वभाव अमृतरूप है । इसी अमृत से घिरे हुए रहने के कारण मृत्यु की मृत्यु नहीं होती । होने पर भीअमृतानुसार यजुः भी सर्वदा विद्यमान् प्रतीत होता हैं । है इसी मण्डल के आधारसे वह वे अचियां देखने में आती हैं । पुरुष और इस अर्चीअर्थात् साम का तथा का यह मण्डल जो ऋक् कहलाता है प्रतिष्ठा पुरुष अर्थात् यजुः का रस वेद रस है का सारांश यह है कि ये तीनों वेद रस ( पदार्थ ) के नाम हैं । जिनमें अग्नि एक प्रकार जिसका उसकेसप्त पुरुष के प्रत्येक में अग्निचयन हुआ करता है । पदार्थ वर्णन नाम से सात विभाग करके वस्तु अग्नि कहीं प्र है कि जगत् में मूर्तिमान् सभी का यत्र किया जावेगा । यहां केवल इतना ही कहना श्रग्नि रसकाही चयन है उसमें चिति अग्नि रस उस मूर्ति में भरा रहता हैं उस , किया हुआ जितना ' यजुर्वेद ' है और वढी अग्निरस विभाग मूर्ति से मूर्ति के स्वरूप [ १३५ ]

पृष्ठ 168

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ॐ ब्रह्मविज्ञान हैं और बाहर से आते हुए नीम रम का में ही निकला करता है उसी को महोक्थ या ' ऋग्वेद ' कहते रंगों के किमी २ परिणाम अग्नि और सोम इन्हीं दोनों मामवेद वा महाव्रत कहते हैं । तात्पर्य यह है कि किया है । विशेष को ऋक् यजुः और माम इन तीनों वेदों के नाम से व्यवहृत २ वितान वेद के कारण होता है । उन्हीं तीन संख्याओं के रखने प्रजापति स्वभाव मे ही त्रिवार वा त्रिपर्वा, ३- ३ बहिः प्रजापति में नियम से तीन अन्त अर्थात् तीन सीमा हुआ करती हैं ।? -नाभिबिन्दु, २- मूर्तिपृष्ठकि जिसमें हैं । इनमें नाभविन्दु वह है पृष्ठ | ये तीनों ही सीमाएं परस्पर एक से एक गुथी हुई रहती जहां साम्य चौड़ाई और मोटाई न हो और सम्पूर्ण वस्तु भार का ग्रायाम,, विस्तार, घनता अर्थात् लम्बाई, है किन्तु , हो और जिसके ठहरने से वस्तु में ठहराव रहे वा गति से वस्तु में गति और वही नाभिबिन्दु खावे धक्का जब हम किसी वस्तु को स्पर्श करने की इच्छा से हाथ बढ़ाते हैं तो वह हाथ जहां जाकर से ओर जाने वहां पर उसकी गति एक जाती है और जो उभरा हुआ प्रदेश हमारी ग्रांखों को दूसरी इतनी दूर रोकता है वही मूर्तिपृष्ठ है परन्तु जब किसी वस्तु को देखते हुए बिना रुकावट के खुले मैदान में वस्तु प्रकार टूट जाये कि वस्तु धीरे २ ग्रदृश्य हो जावे वही प्रदेश उस वस्तु की बहिःपृष्ठ सीमा है । इस में तीन सीमाओं का होना स्वाभाविक धर्म है । जाय इनमें नाभिबिन्दु से लेकर बहिःपृष्ठ की धरातल तक ३६० रेखाएं खीचकर विभाग किया होंगे तो मूर्तिपृष्ठ और बहिःपृष्ठ के ग्रायतन के छोटे बड़े होने पर भी दोनों पृष्ठों के ग्रंथ बराबर समान तो उन व इनमें मूर्तिपृष्ठ से बाहर २ चारों ओर बहिःपृष्ठ तक यदि १००० समानान्तर वृत्त किए जायें । हजारों वृत्तों के छोटे बड़े होने पर भी उनमें प्रत्येक पृष्ठ के अंश उसी प्रकार बराबर ३६० होते जायेंगे हम व इनमें बहिःपृष्ठ से भीतर मूर्तिपृष्ठ तक जो एक २ श्रंश छोटे होते हैं उनको हुए दीखते ' ऋ ' कहते हैं किन्तु मूर्तिपृष्ठ से बाहर बहि: पृष्ठ तक होता उन सभी वृत्तों में जो एक २ अंश हमें बड़ा आयतन अपना छोटा हुआ देखिता है वही ' साम ' है । तात्पर्य यह है कि भीतर वाले वृत्त पर जो अश पहले रखता था वही अंश बाह्यवृत्त पर वितान में ग्राकर अपना जिसका बड़ा आयतन कर लेता है । हो छोटा आयतन था उसको यदि हम ऋक् माने तो उसी का ग्रागेचलकर वितान होने से बड़ा आयतन है । जाता है उसको हम उस ऋक् का साम कहेंगे क्योंकिऋक ही के वितान करने पर साम हुआ करता यहां इतना अवश्य जानना है कि मूर्तिपृष्ठ वाले सभी अंश केवल और वहि: पृष्ठ वाले सभी ऋक् ही कहे जा सकते हैं दोनों अंश साम ही कहे जाते हैं किन्तु बीच वाले , प्रत्येक साम वृत्त के सब अंश ऋक और हो सकते हैं । बाहर वाले के अनुरोध से वे भीतर वाले से बाहर--वाले ऋक् हैं और भीतर वाले के अनुरोध -सत्र साम है । इस प्रकार ऋक् ही साम हैं साम " गीयते " ।, इसलिए यह भी कहना यथार्थ है कि ऋच्यध्यढं इस प्रकार ऋक और माम इन दोनों से यजुः भिन्न जो कुछ भाव किसी में दीखे उनको हम कहेंगे | नाभि से बहिःपृष्ठ तक जो ग्रग्निरस वस्तु 1 यद्यपि ऋक साम में भरा रहता है उसे कहते हैं । यजुः [ १३६ ]

पृष्ठ 169

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 169 का मूल पृष्ठ
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* ब्रह्मविज्ञान 8. विन्दु की शक्तियों के प्रदेश बना है किन्तु जिस तनाव प्रकार से मुर्ति मूर्तिपृष्ठ बनी के और मूर्ति के भीतर वाले रसों के तनाव से बहिःपृष्ठ तक तक कोई वस्तु भीतर वस्तु भरी हैं उसी प्रकार मूर्ति से बाहर ग्रथात् मन, प्राण भरी , वाक नहीं रहती तथापि नाभि विन्दु से लेकर वहिःपृष्ठ बहिःपृष्ठ कमणः वितान में तक समान प्रकार के पदार्थ आए हुए हैं ऐसा विश्वासकरना चाहिए । छन्दवेद मन २, प्राण - स्कन्ध, वाक् । यद्यपि इन तीनों से विधात् प्रजापति परमाणु वास्तव इस जगत् में दो रूप से दीखता है । ( Atom में उन तीनों अणु ) धातुओं के मिलाव से प्रथम जो रूप हुआ था वह अणु अर्थात् उसी को रूप में था किन्तु पश्चात् धीरे २ इन परमाणुओं के संयोग ही स्वस्थ कहते से जो वृहत् रूप उत्पन्न है क्योंकि हैं उस जगत् में देखते परमाणुओं प्रायः जहां जो कुछ मूर्ति देखते हैं को उनके वह सब स्कन्ध रूप की हैं वे सब निज के रूप में मे अपनी वास्तव में हम नहीं देख सकते किन्तु जिन स्कन्धों को हम २ महिमा परमाणु पुञ्ज ही हैं । इस प्रकार दो रूप होने दोनों परमाणुओं अवश्य रखते हैं पर भी ही बराबर नियम के पुञ्ज । परमाणु की महिमा यद्यपि अधिक से उस मूर्ति बहुत कम अवकाश में थी किन्तु उन अवकाश इस विशाल ग्रहण का आयतन ज्यों २ बढ़ता गया त्यों २ उसकी महिमा भी फैलकर कर लेती हुई सर्य विस्व है । सूर्य के प्रत्येक परमाणु की प्रत्येक महिमा बहुत ही होगी किन्तु हैं । सूर्य की महिमा सूक्ष्म के पर्व लगभग २५,०,०००,००० पच्चीस करोड़ योजन चारों ओर फैली , पश्चिम , उत्तरदक्षिण ऊपर नीचे ओर घेर कर जो किरणें फैली हुई दीखती ,, सब हैं वही महिमा का स्वरूपहै । परमाणु स्कन्ध की मूर्ति उस से उठी का जितना व्यास है उसमें क्रमशः जितने परमाणु हैं उनमें दोनों छोर के एक २ स्कन्ध हुई दो परमाणुओं कहते हैं का जो की रेखा जहां एक होकर एक परमाणु उत्पन्न करती है वहां तक रूप है उसको । महिमा धारण करती है अथवा उतने प्रदेश वाले पदार्थों को महिमा उसमें मूर्ति से निकलकर आगे यह नियम उसी मूर्तिका रस आगे को जाता है ऐसा पहले प्रकरण में कहा जा चुका है को स्मरण रखना उगी कभी नहीं चाहिये कि पहली मुर्ति के व्यास की नाभि का एक परमाणु अपना रस नाभि जाने देता हुआ वाले वह अपनी पहली मूर्ति की आत्मा होकर उसी के साथ रहता है । ठीक एक परमाणु के पार्श्ववर्ती मूर्ति परमाणु दो परमाणु ग्रागे चल कर एक हो जाते हैं । उन के योग से बना में आगे वाली ह्रास दो परमाणु मूर्ति की नाभि में जा बैठता हैं । इस प्रकार पहली मूर्ति से आगे वाली होते की कमी हो जाती मूर्ति २ किसी है । इसी नियमानुसार कूटस्थ मूर्ति के व्यास वाले परमाणुयों का का अन्तिम मूर्ति में वाले बनकर केवल वन्द हो रूप रह कूटस्थ व्यास के दोनों छोर परमाणु एक वही जाता है जाता । उस परमाणु के पार्श्व में अन्य परमाणुओं के न रहने से रस का आगे बढ़ना वाली मूर्ति में है यतः स्कन्ध की महिमा भी वहीं समाप्त हो जाती है इस प्रकार पहली मूर्ति से आने व्यास बनानेवाले परमाणु दो - दो के नियम मे कम होते जाते हैं । अतः पूर्व २ मूर्ति की [ १३७ ]

पृष्ठ 170

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 170 का मूल पृष्ठ
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* ब्रह्मविज्ञान * अपेक्षा उत्तर २ मूर्ति क्रमशः छोटी होती है, इसीलिए हम वस्तु से जितना दूर हटते हैं क्रमशः वस्तु हमें छोटी दीखती जाती है । यह प्रकार मूर्ति के तिर्यक् व्यास के परमाणु के अनुरोध से समझना चाहिये किन्तु अभिमुख के व्यास समान दिक वाले व्यास की परमाणुओं की रेखा भिन्न २ नहीं होती । एक दिशा में जाने कारण एक होकर एक ही महिमा की रेखा बनती है । इसी कारण मूर्ति की लम्बाई, गोलाई और मोटाई बहुत दूर जाने पर नहीं दीखती केवल वह वस्तु चिपटी कूटस्थ दीखती है । इसका कारण यही है कि नाभि वाले परमाणु के साथ वाले तिर्यक् रेखा में जितने परमाणु हैं वही महिमा की रेखा बनाते हैं । उनके मुख पर मोटाई वाले परमाणुओं की रेखा से मिलकर एक हो जाती है । छन्दवेद का ऋक् साथ कूटस्थ मूर्ति वा महोक्य मूर्तियों के प्रत्येक व्यास के दोनों छोर के दोनों विन्दुयों को एक छन्द के नाम से बोलते हैं क्योंकि वह मूर्ति उन्हीं दोनों विन्दुयों के से घिरी अन्दर उन्हीं दोनों विन्द्रयों वा हुई अपना स्वरूप धारण करती है । जो वाक किसी में पद्य छन्द से वृद्ध हो उसको संस्कृत भाषा

श्लोक कहते हैं किन्तु उसी को वैदिकभाषा में ऋक् कहते हैं छन्दो-यह मूर्ति वास्तव में बाङमय है और

बद्ध है, अतः ऋक कहलाती है । चाहे कूटस्थ मूर्ति हो वाक्

होने के कारण ऋक् संज्ञा है । वा महोक्थ मूर्तियां हों सभी का छन्दोबद्ध कूटस्थ मूर्ति के दोनों व्यासान्त विन्दुयों की ) बिन्दु में जहा एकता होती है उस विन्दु के का रस योग के अनुक्रम से किसी अवसान ( ग्रन्त की साथ दीर्घ त्रिभुज क्षेत्र जिसमें क्कूटस्थ व्यास रेखा छोटा भुज है बाकी दो उत्पन्न होता है, भुज समानरूप से कूटस्थ मूर्ति की महोक्थ मूर्तियां बृहत् होते हैं । इसी त्रिभुजक्षेत्र में उस क्रमबद्ध हासोताररूप से सन्निविष्ट रहती हैं के त्रिभुजक्षेत्र असंख्य होते हैं । अथवा यों कहिए । इस प्रकार हैं उन कि कूटस्थ मूर्ति के । सब से एक २ रेखा खींची पृष्ठ की चरम सीमा पर जितने परमाणु भी जाय तो उसी रेखा के अवश्य होते हैं आधार से उतनी ही संख्या के ये त्रिभुजक्षेत्र । प्रत्येक त्रिभुजक्षेत्र के महोक्थ हुए के मूर्तियों को दृष्टि पर लाने से के भीतर डुवे । रत्न अनुसार कई कोटि महोक्य मूर्तियों के एक समुद्र वे इसी कूटस्थ मूर्ति की सब मूर्तियां महाविशालमण्डल के केन्द्र में मूर्ति दीख़ेगी महिमा स्वरूप हैं । वह कूटस्थ छन्दबेद का साम कूटस्थ मूर्ति के चारों ओरबहिःपृष्ठ तक तो प्रत्येक मण्डलपर समान एक मात्रा की महोक्थ सहस्र मण्डल की कल्पना की जावे की मूर्तिया सन्निविष्ट मूर्तियां सन्निविष्ट होंगी मात्रा होती हैं उनसे छोटी । भीतर के मण्डल पर जिस मण्डलोंपर मूर्तियां बाहर वाले बाहरवाले क्रमशः छोटी २ मूर्तियां सन्निविष्ट मण्डल पर होगी । इस प्रकार समानछन्द की होती हैं होती हैं किन्तु एक ओर सब छोटी बड़ी कदापि नहीं मण्डलपर चारों होती । इसी साम्य का निर्वाह अर्थात् मात्रा की समानता [ १३८ ]