ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 171–180
ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 171–180
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* ब्रह्मविज्ञान करने वाला मण्डल साम के कारण ही कहलाता है जो कि एक सहस्र माना गया है ।इस साम में मुर्ति की समानता माम मंत्रा रक्बी गईहै । यह मे भी मण्डल भी के ३६० ग्रंण करके मुर्ति ही बहिःपृष्ठ कहे जाते हैं । कूटस्थ पृष्ठ के अनुसार उन पृष्ठों प्रदेश अधिक समान विभाग किये जाते हैं होने । भीतवाले मण्डल की अपेक्षा बाहर के मण्डल का पर भी ग्रंथों मेंसमता रखता है । इसी साम्य के कारण वह अधिक प्रदेश पूर्व मण्डल के छोटे प्रदेश का साम कहलाताहै । उसके कूटस्थ मूर्ति का छोटे इस प्रकार छोटा प्रदेश महिमाक्षेत्र में आकर अधिक प्रदेश वाला हो जाता है । के फैलाव महिमा के से समान देश के लिये मात्रा कम हो जाती है । जिससे समान मूर्ति न होकर मण्डल में छोटी माशु तक २ मूर्तियां हो जाती हैं । यह प्रसार घनता की शिथिलता होते हुए एक पर-आकर वही अन्तिम घनता को सर्वथा सास है । नष्ट कर देता है ऐसी दशा में एक हो परमाणु की मूर्ति रह जाती है । पूर्वोक्त उत्पन्न के अनुसार होता है समान ऋचाओं के अर्थात् महोक्थ मूर्तियों के मण्डल से जो पृष्ठ नाम का साम नहीं वह साम होता है वहां समाप्त होता है जिसके बाहर फिर कोई ऋचाओं का समान मण्डल उत्पन्न बड़ा । इस होता प्रकार के अन्तिम की मूर्ति के आयतन के अनुसार छोटा है और साम प्रत्येक वस्तु कूटस्थ वस्तु भेद से ग्रनन्त हो सकता हैं किन्तु उनमें से कितनों ही के व्यवहाराय पृथक् २ , नाम दिये गये हैं, जैसेइस सामको ' पृथ्वी के अन्तिम सममण्डल को ' रथन्तर ' पृष्ठ कहते हैं । सूर्य के अन्तिम बृहत् कहते हैं पृष्ट ' कहते हैं और होता है अतः इसको बृहत् साम । रथन्तर की अपेक्षा यह पृष्ठ बड़ा और पृथ्वी का जिनको शाक्वर चरम पृष्ठ रयन्तर से गया है वह तीन प्रकार का है, रथन्तर, निकलते कहते हैं शब्द कहा, में ३ प्रकार के पदार्थ हैं - वाक । इसका कारण यह है कि पृथ्वी में से महिमा के रूप , होते हैं । गो श्रीर द्यौ गो से वैरूप और द्यो से शाक्वर पृष्ठ उत्पन्न । इनमें वाकू से रथन्तर, उत्पन्न इसी प्रकार गौ । इन तीनों से हुए सूर्य से भी तीन के पदार्थ निकलते हैं— ज्योति, और श्रायु पृष्ठ भी प्रकार ३ प्रकार के हैं— ज्योति से गौ से वैराज और आयु से रैवत । वृहत्, की पृथ्वी का वृष्टि अग्नि जहाँ हैं और पर्जन्य देवता जिसके द्वारा जल लोकों होती है तक पर्याप्त है उसको रथन्तर कहते तीनों की वह जहा तक व्याप्त है उसको वैरूप साम कहते हैं और भूः भुवः स्वः इन व्यवस्था जहा पूरी होती है उसको शाक्त्र र साम कहते हैं । गो जिनसे इसी प्रकार ऋतुओं बृहत् साम है सूर्य का सूर्य की ज्योति अर्थात् प्रकाश मण्डल जहां पूर्ण होता है वह है उनसे का सम्बन्ध है आकाशी जिनसे देवताओं के वाहन उत्पन्न होते सम्बन्ध वैराज साम है और पशु रखने वाला छयों सामों का स्वरूप वर्णन साम वेद के रक्त साम है । इस प्रकार इन छान्दोग्य ब्राह्मण में किया गया है। [ १३६ ]
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* ब्रह्मविज्ञान खेतसाम वैराज साम बृहत् साम सू. ) पृ. रथन्तर साम बैरुप साम ाकर साम [ १४० ]
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ॐॐॐ ब्रह्मविज्ञान अब सूर्यका एक र साम पृथ्वी के प्रत्येक साम को प्रतिमानित करता है अर्थात् अपने पेट में व्याप्त कर लेता है । तात्पर्य यह है कि सूर्य जिस केन्द्र पर ठहरा है उससे कुछ दूर हट कर पृथ्वी का केन्द्र है । पृथ्वी केन्द्र से सूर्य विम्व तक व्यासार्थ मानकर एक वृत्त बनाया जाय वही रथन्तर पृष्ठ होगा 1 रथन्तर पृष्ठ के भीतर सूर्य विम्व सम्पूर्ण आ जाने से सूर्य को भी पृथ्वी पर विद्यमान माना जाता है । इस प्रकार रखन्तर की जहां तक व्याप्ति है वहां तक व्यासार्थ मानकर वृत्त बनाने से वृह पृष्ठ होता है जिसके भीतर संपूर्ण रथन्तर ग्राजाता है । इसी प्रकार यह वृहत् जहां पूर्ण होता है पृथ्वी के केन्द्र से वहां तक व्यासार्धं से जो वृत्त होगा बही पृथ्वी का वैरूप साम है जिसके पेट में सम्पूर्ण वृहत् श्राता है । इसी प्रकार रूप को अपने पेट में रखकर सूर्य का वैराज बनता है और वैराज को पेट में लेकर पृथ्वी का शाक्वर बनता है और पृथ्वी के शाक्वर को पेट में रखकर सूर्य का रैवत साम अपना स्वरूप धारण करता है | इस प्रकार एक के भीतर एक आकर छों साम परस्पर गुथे हुए से रहते हैं । पृथ्वी की जो पाञ्च-भौतिक मूर्ति है वहीं महोक्यरूप में बहिःपृष्ठ तक जाती है वे ही मूर्तियों के पञ्चभूत वाक् कहलाती हैं । पृथ्वी में से चारों ओर रेखा के रूप में जो काली किरणों निकलती हैं, जो चन्द्रमा वा सूर्य के संयोग से सफेद हो जाती हैं और जिनके द्वारा आकाश से वृष्टिया नियमानुसार किसी खास प्रदेश में होती हैं श्रथवा जिन कणों पर वायु के द्वारा जल के कण जम कर बादल के रूप में प्राते हैं वे ही पृथ्वी की गी हैं । पृथ्वी के चारों श्रोर स्वभाव में वायु भरी रहती है उस वायु की ३ जाति मोटे तौर से समझी गई है । पहला वायु जिसमें मिट्टी का भाग अधिक है और घन है भू वायु कहलाती है वह १२ योजन तक है । यह प्रदेश पृथ्वी का भूलोक है । उसके ऊपर अपेक्षाकृत सूक्ष्मवायु जहां तक है उसको पृथ्वी का भूलोक कहते हैं । उसके ऊपर एक प्रकार का अत्यन्त सूक्ष्मवायु है उसी को Oxygen. शक्वरी कहते हैं और उसी के सम्बन्ध से हृदय में नासिका द्वारा जीवन वायु प्रवेश करता है जिससे हमारी वायु बनी रहती है । वह् शक्वरी वायु पृथ्वी में सम्बन्ध रखता हुग्रा पृथ्वी के ऊपर चारों ओर जहां तक रहता है वह प्रदेश पृथ्वी का स्वर्लोक है । इस प्रकार पृथ्वी के बाहर तीन लोक का विभाग जिसके द्वारा किया जाता है वही वायुमय प्राण पृथ्वी का द्यौः कहलाता है । इस प्रकार पृथ्वी से सम्बन्ध रखते हुए ३ प्रकार के पदार्थ हुए । जिनमें वाक् मूर्ति रूप में पृथ्वी से बाहर जाती हुई है, दूसरी गो: सूत्र रूप में पृथ्वी ग़ बाहर चारों ओर फैली हुई है और तीसरी द्यौः सरोवर के सरश पृथ्वी के चारों ओर पृथ्वी को घेर कर दवातेहुए जमी हुई है । इसी प्रकार सूर्य में भी ३ प्रकार के तत्त्व निकलते हैं – सर्वप्रथम ज्योति अर्थात् प्रकाश वह भाग है जो सूर्य का विम्ब मण्डल ही क्रम में छोटा होता हुआ सूर्य के चारों ओर दूर तक फैला हुआ है | दूसरे सूर्य के किरणों के रूप में चारों ओर जो सूत्र निकलते हैं उनको गौः कहते हैं । इन गौनों से ऋषि पितर, देव, असुर और गन्धर्व आदि उत्पन्न होते हैं । ये ही सूर्य गौः अपनी अपनी वत्स रूपी पृथ्वी की गौत्रों के चूसने पर सप्त रस, सप्त उपरस, सप्त धातु, सप्त उपधातु प्रादि बहुत से पृथ्वी के स्वरूप को बनाने वाले पदार्थों को दुग्ध के रूप में देती रहती हैं । यह रस अहर्निश ग्राकाश से बरसते हुए पृथ्वी की गौः के बेट में आते हुए पृथ्वी के स्वरूप को बुष्ट करते रहते हैं । इस सूर्य की गौः अर्थात् किरण रुबी सूत्र के डोरे, एक २ सात २ रंग के सात डोरों से बने हुए होते हैं जिनको तिकोने काच ( Prism ) प्रादि उपायों से पृथक् २ भी कर सकते हैं । [ १४१ ]
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* ब्रह्मविज्ञान ॐ तीसरा वायु जो सूर्य से निकलता है एक प्रकार का प्राण है उसका इन्द्र और अमृत के नाम से भी व्यवहार होता है । यह प्रत्येक प्राणी के वा वृक्ष के शरीर को उठाये रखता है । इस के बल से मस्तक वा डालें ऊंची ओोर निकाले जाने से गिर जाते हैं । इस आयु का स्वरूप न मूर्ति है और न सूत्र है किन्तु जमे हुए पानी के सदृश सूर्य के चारों ओर भरा पड़ा है । इन ६ पदार्थों से पृथ्वी का सृष्टिक्रम चलता रहता है । जिस प्रकार सूर्य वा पृथ्वी आदि के पदार्थों में उपक्रम से उठाकर उपसंहार अर्थात् समाप्ति तक पहुचने को साम कहते हैं उसी प्रकार भावमय पदार्थों में भी उपक्रम से उपसंहार तक पहुचने को साम कहेंगे । ऐसे साम भी कई हो सकते हैं जिनमें से उदाहरणार्थ कितनों ही का नाम दिखाया जाता है— जैसे, अग्नि का वृषा अर्थात् पुरुष और सोम को योषा अर्थात् स्त्री भाव से समझ कर उन दोनों का जहां कहीं मिथुन अर्थात् योग हुआ हो उस योग के पूरे होने को ' वामदेव्य ' साम कहत है । किसी प्रकार का एक प्राण जहां अपने स्वरूप से समाप्त होता हो उसको ' गायन ' साम कहते हैं । रथन्तर अथवा बृहत् में जिस पदार्थ को साम कहा है वह अग्नि है और अग्नि को प्राण कहते हैं इसी प्राण के अनुरोध से रथन्तर और बृहत् साम को भी गायत्र साम कह सकते हैं और अग्नि और सोम इन दोनों का योग, भी उन दोनों में होता है श्रुतः योग की दृष्टि से उसे वामदेव्य साम भी कह सकते हैं और किसी अङ्गी के स्वरूप में उसके सब श्रृङ्ग यदि पूरे बैठ जाय तो उसको ' यज्ञायज्ञीय ' साम कहते हैं । किसी देवता का स्वरूप जहां समाप्त होता हो उसको ' राजन् ' साम कहते हैं । यहां पर यह भी स्मरण रहे कि इन सामों के नाम प्रकृति में देवता वा भूतादि पदार्थों के ग्रनुरोध से दिखाये गये हैं । किन्तु प्रकृति के अनुसार मनुष्यों को अपने प्राधीन भी यज्ञों की क्रिया करने का उपदेश किया गया हैं । उस यज्ञ में ऋक्, यजु, साम उच्चारण किये जाते हुए बाक्, प्राण, मन से संबन्ध रखते है | होता ऋक् मन्त्र का उच्चारण करता है, अध्वर्यु यजुः मन्त्र का प्रयोग करता है श्रीर उद्गाता साम मन्त्र का उच्चारण करता है । ये तीनों ऋत्विक् वाक् और प्रारण इन दोनों का प्रयोग करते हैं और चौथा ब्रह्मा मन, प्राण का योग देकर यज्ञ की पूर्ति करता है । इन चारों के योग से मन, प्राण, वाक् | शरीर में निकल कर प्रकृति के मन, प्रारण, वाकू में मिलाये जाते हैं । ग्रव्यात्मिक को " के मन, प्राण, वाक् ग्राधिदैविक के उच्चारणार्थं मन, ऐसे प्राण मन्त्र , वाक् नियत साथ किये मिलाने गये हैं जिन की रीति नियमों को के ही अनुसार यज्ञ की विधि कहते हैं । इनमें उद्गाता से मिलाब हो सके । एस मन्त्रों के भी वे ही नाम रखे गये हैं जिन गान करने पर प्रकृति के उन सामों गये हों उसके अनुसार रथन्तर, बृहन्, बैरूप, वैराज, वामदेव्य, यज्ञायज्ञीय सामों, के राजन् मिलाने श्रादि के लिए मन्त्र बोले के ग्रन्थों सामों के लिए पृथक २ मन्त्र सामवेद में माने गये हैं जिनमी दिखाने की यहां ग्रावश्यकता नहीं है । यहां उन्हीं सामों का दिखाना आवश्यक है जो सूर्य वा पृथ्वी के पदार्थोंमें हैं अथवा भावमय पदार्थों में हैं । कितने ही लोगों का कथन है कि जो तेज सूर्य या तारायों के से चलने विम्ब से निकलता है वह बड़े बेग पर भी कितने ही वर्षों के पश्चात् इस पृथ्वीपर जाता है । परन्तु गणित के अनुसार मन ही सिद्ध होता हो उनका विचार उनकी , परन्तु वैदिक विज्ञान के उसके अपने बृहत् साम तक स्थिर रूप से जमा हुआ अनुसार प्रत्येक भास्वर बिम्ब का तेजोमण्डल रहता है । जब तक तेज अपने साम तक न पहुंचले [ १४२ ]
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* ब्रह्मविज्ञान कुन तब तक स्नान पर हिपृष्ठ मुनि वाला विस्य भी कापि नहीं बननाभि और पाठ और से तीनों ही एकही क्षण क्षण में बनते हैं । कूटस्थ पृष्ठ पृष्ठ तक जाने के लिए यद्यपि अवश्य लगे होंगे किन्तु कुछ स्वरूप यह निश्चित है कि वह पृष्ठ तक तेज के पहुंचने के साथ २ पृष्ठ का भी संम्पन होता जाने है । जिस प्रकार माना के गर्भ में बनत के लिए हुए शरीर में नाभि ने मस्तक तक रम को समय नही लगता हो किन्तु नाभि भीतर के, मस्तक, पाव और सम्पूर्ण शरीर का चर्म और ग्रस्थि शोणित ,, ग्रादि सभी पदार्थ मूर्ति के एक नाथ सी सम्पन्न होते हैं । उसी प्रकार यहाँ भी कूटस्थ साम और बाद विम्व यज्रः ये तीनों ही एक साथ स्वरूप धारण करते हैं उनमें कम समझना या वर्गों के में तेज कागमन मानना केवल हैं अवैज्ञानिक होने के से भरी हुई हैं भूल ही नहीं किन्तु कारण मुर्खता , सूर्य के मन्त्र के अनुसारऋचा को भी साम कह सकते हैं । कर्म होते श्रीपचारिक दशा में भी इन तीनों वेदों की कल्पना की जा सकती है । प्रत्येक वस्तु में नाम, रूप, हैं उनकी भी को साम वेद रूप में कल्पना कर सकते हैं । इनमें नाम को ऋ रूप को यजुः और कर्म समझना चाहिये समाप्ति । प्रत्येक पदार्थ में जो कुछ कम होता है वह सब साग है और उस कर्म की तक सामका मान अवस्थारूप से विभाग किया जा सकता है । १. हिकार २ प्रस्ताव? आादि ४. उद्गीथ ५. प्रतिहार इ. उपद्रव ७ निधन । विशेष अक्षर उच्चारण करते समय अग्नि की नोदना और वायु का प्रक्रमता और करण का स्थान-में जाकर अक्षर योग करता ही हिकार और आदि हैं । जो मुत्र से उच्चारण करते समय , प्रस्ताव बाहर निकलते प्रतिहार हैं वह उद्गीथ है और बाहर निकला हुआ शब्द जो चारों ओर फैलता है वह है | पश्चात् सर्वथा होकर शब्दों में जो विकार उत्पन्न होता है वह उपद्रव है । ग्रन्त में शब्द शान्त नष्ट हो जाता है वही उसका निधन है । सूर्योदय के समय दशा दिन चढने की दशा, मध्यान्ह मध्यान्ह के उदय से पहले की दशा, सूर्योदय की, पहर पीछे की से सातों विभाग समझना चाहिये 1 दशा, चौथ पहर की दशा और स्यस्ति की दशा क्रम हिंकार इन सप्त विभागों में आदि और उपद्रव को छोडदें तो पाच विभाग भी हो सकते हैं और यदि और प्रतिहार के कहे जा सकते हैं । प्रस्ताव को भी छोड़ देवें तो मुख्य करके तीन ही विभाग साम अर्थात् ओज पर ग्रा जावं वह मध्यम अवस्था वस्तु या काम का प्रारम्भ पहला भाग और वह जब पूरे उद्गीथ लगती है अथवा वह काम ठण्डा पड़कर है, किन्तु पूरे चढ़ाव के पश्चात् जब वह वस्तु गिरने शान्त हो या कर्म ऐसा नहीं है कि जिसमें जाता है तो उसे निधन कहेंगे । जगत् में कोई भी वस्तु, भाव आदि तीनों को के विभाग से कह सकते हैं । , मध्य और उन्हीं साम अन्त ये तीनों ग्रवस्थायें न हो । किसी का प्रस्ताव -भाग है किन्तु उस की होता है वह साम वस्तु का वस्तु मूर्ति में उसके व्यास का जहां अवसान होगी । इनमें भी नाभिबिन्दु साम का निधन भाग है । इन दोनों के बीच की दशा ही उद्गीथ प्रस्ताव के समान है और निधन का भाग भाग पश्चात् का भाग प्रथम होने के कारण ऋक [ १४३ ।
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ॐ ब्रह्मविज्ञान * में होने के कारण यजुः का भाग है । इम होने के कारण सामका भाग है और मध्य का उद्गीथ मध्य वेद में भी वह किसी न किसी रूप में अवश्य प्रकार इन तीनों वेदों में साम इतना व्यापक है कि प्रत्येक ही व्याप्त रहता है । वेद साधारण सबसे प्रथम तीनों वेदों का सारांश दिखाया जाता है । रसवेद में -: – १ चीयमान रस ( चुनाव में श्राया हुग्रा ) = अग्नि = यजुः ( जमा हुया रस या तत्त्व ) २ विमान रस ( निकला हुआ ) = महोक्थ = ऋक् ( उठकर जाता हुआ रस ) ३. आपूर्यमाण रस ( भराव में श्राता हुआ ) = महात्रत = साम ( ग्राकर बैठता हुआ रस ) वितानवेद में -१. कूटस्थ वा महिम स्थितमूर्ति = ऋक् है । २. कूटस्थ मूर्ति के चारों ओर मूर्तिमण्डल साम है । ३. मूर्तियों के मर्त्य वा श्रमृत दोनों रस = यजु: है । ( मत्यं जिससे मूर्ति बनी और अमृत जो मूर्ति की ग्रात्मा है ) छन्दोवेद में-१. कूटस्थ से बाहर जाता हुआा सूच्यग्र त्रिभुज क्षेत्र = ऋक् है । २. बाह्र से कूटस्थ में श्राता सूचीमुख त्रिभुज क्षेत्र = साम है ३. इन दोनों त्रिभुजों में समान रूप सेसंचारी रस = यजुः है । इस प्रकार तीनों वेदों के पृथक् पृथक् तीन भाव हैं किन्तु बहुतों सभी का यह भी मत है छन्दोवेद ऋचा हैं, वितानबेद सभी साम हैं और रसवेद सभी यजु: हैं । इस करके प्रकार प्रथम तीन वेद निरूपण फिर प्रत्येक वेद में तीन तीन भेद उपर्युक्त कथनानुसार जानना चाहिए । ये तीनों ही वेद परस्पर अविना-भुत हैं अर्थात् एक के बिना एक कदापि नहीं रहते । रसवेद का उपयोग जहा कहीं यज्ञ होते हैं वे रसवेद से ही होते हैं। यज्ञ से अन्न और संबन्ध रहता है । ये तीनों ही प्रत्येक अन्नाद का परस्पर वस्तु में घटाव, बढ़ाव या साम्यभाव हैं और ये तीनों प्रत्येक वस्तु में देखे जाते हैं ग्रतः जगत् भर अन्न भोग से संबन्ध रखते में रस वेद का उपयोग यदि रसवेद न होता तो किसी प्रकार के समझना चाहिये । यज्ञ नहीं होते । यज्ञ के न होने से कोई का भी वस्तु अन्नाद बन कर अन्न ग्रहण नहीं करती और अन्न ग्रहण न करने से वस्तुग्रों में वृद्धि, क्षय या साम्य भाव न होते । [ १४४ ]
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8 ब्रह्मविज्ञान श्रीक प्रत्येक वितान वेद का उपयोग वस्तु पर अधिक देश संकोच विकास का प्रदेश में और रखता है । जिस प्रकार अङ्ग लिया फैलाये हस्त या ( मुट्ठी जाने शरीर के ) बांधने पर संकुचित होकर सभी सभी कम देश में रहती हैं इसी प्रकार वस्तु प्रत्यक्ष कुछ सीमा तक संकुचित जावे कुछ न कुछ वितान और कुछ सीमा तक विकसित रहते हैं अर्थात अवश्य रखती । जिस है । वितान होते होते जिस समय समय अपना विज्ञान उसका वितान बंद हो न कर सके वही उस वस्तु की समाप्ति है । छन्द वेद का उपयोग जितनी जगत् के प्रत्येक देश बड़ी भागती पदार्थ में यह साधारण धर्म देखा है कि समीप से से वह है दूर से देने जाता देखने पर जो वस्तु सर्वथा नहीं पर वही छोटी दीखा करती है यहां तक कि छोटी होते होते किसी दीपती । यह प्रत्येक वस्तु कासाधारण धर्म है सो छन्द वेद के कारण ही है । दृष्टि विचार तक जाती आज कल ज्योतिष नहीं है अर्थात शास्त्र के वेत्ताओं ने किया है कि मनुष्यों की दृष्टि रखती जिस कक्षा सिद्धान्त चन्द्र धरातल भी ग्रतः पर चन्द्रमा घूमता है । उसके आगे मनुष्य की दृष्टि जाने की सामर्थ्य ऊंचे वही धरातल नक्षत्र ग्राकाश वृत्त और किन्तु मार्ग मण्डल से जो बन जाता है । अर्थात् सूर्य या और ग्रह अथवा उनसे श्राकाश में ग्राती किरणें आती हैं वे यद्यपि आगे पीछे या समीप से भले ही ग्राती हों , दूर सीमा का हुई जहां हमारी दृष्टि समधरातल समाप्त होती है वही दृष्टि समाप्ति के अनुरोध से आ है पर ग्रहण बन जाता है और उसी आती हुई ( से ) सब | जिस करती धरातल पर ऊपर उन का एक ही अनुभव धरातल है । वही सीमा अथवा धरातल आकाश का नीला गोला ऊपर मुझको भासता में हम असंख्य करते हैं उसी तारायों को ग्रहों सहित सूर्य को तथा चन्द्रमा को एक ही उंचाई पर चन्द्र धरातल को३६० अंशों में विभक्त करके सभी ज्योतिर्मय पिण्डों का अन्त तथा दूरी की जाते गणना हैं | की जाती हुआ यह चन्द्रमा है और उनके बिम्बों के अनुमान करके निर्धारित किये कि व्यास भी उसी स्थान यह यहां धरातल अन्दाजन की तो मत ही तक ७५००० लाख कोस की दूरी पर निश्चित गई है सिद्ध समान आज हमारी दृष्टि दिन सर्वत्र पहुंचती है और हमारी दृष्टि ने ही यह धरातल स्थित की है । बस बन्द ऊंचाई प्रचलित है किन्तु है कि धरातल जिसमें सभी ग्रह, नक्षत्र है पर, हमारा कहना यह पदार्थ वही हमें दीख रहे हैं यह चन्द्र नहीं है किन्तु यह मेरी चक्षु के भीतर जो सूक्ष्म हमारी इन सब के देखने धरातल से आते महोक्य सभी ज्योतिष्मान् विम्व चक्षु पर का धरातल है । दूर या समीप की ऊंचाई हुए ग्राकर ही विश्रान्त होते हैं रूपी में उन उन वस्तुओं का अपनी । इसी चक्षु धरातल दूरी के नियमानुसार जितना दृष्टि पर पहुंचता है उतनी ही बड़ी उस बड़ा होकर वस्तु को हमदेखतेहैं । तो वह इतना छोटान पर इसका मुख्य कारण यह है कि चन्द्रमा यदि अपने ही स्थान पर हमको दीखता बहुत विस्तार मण्डल से है देखती तो । यदि हमारी दृष्टि चन्द्रमा के धरातल पर जाकर सब को है होता | विज्ञान हमको है कि अपनी कक्षा ( orbit ) के धरातल समझाता चन्द्रमा [ १४५ ]
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* ब्रह्मविज्ञान ि संभव है कि सूर्य श्रादि ग्रहों को छोटा देखे परन्तु चन्द्रमा को इतना छोटा कदापि नहीं देखती । इससे कहना पड़ता है कि वह चन्द्रमा भी अपनी कक्षा से उतर कर हमारे नेत्र धरातल में जितनी प्रमारण की महोक्थ मूर्ति से उपस्थित हुआ है उतने ही बड़े को हमारे नेत्र ग्रहण करते हैं । तो ऐसी स्थिति में जब चन्द्रमा, सूर्य और तारे एक घरातल में हमें दीख रहे हैं तो हम विना संकोच के यह सिद्धान्त कर सकते हैं कि वे सब भी हमारी दृष्टि के धरातल पर ही दीख रहे हैं । इस नीले ग्राकाश का ऊंवा दिखना ऊंचाई को कुछ ग्रहण करने वाली दृष्टि के ही प्रभाव से मानना चाहिये । अर्थात् जिस प्रकार अपने घरातल में यह दृष्टि ग्रहों को पकड़ती है उसी प्रकार कुछ ऊंचाई को भी ग्रहण कर रही है, किन्तु इनका धरातल चन्द्रमा की कक्षा पर कदापि नहीं । हम देखते हैं कि पास पास की दो वस्तुओं की दूरी और समीपता को हमारी दृष्टि ग्रहण कर लेती है किन्तु जब वस्तुएं बहुत दूर की होती तो उनकी दूरी पकड़ने का सामर्थ्य न रखने से हमारी दृष्टि उनको एक ही घरातल पर देखा करती है अतः इस थोड़ी बहुत ऊंचाई के देखने से चन्द्र कक्षा पर घरातल अनुमान करना भूल है । वेद का मन, प्राण, वाक् से संबन्ध जगत् में साम्य, वैषम्य, घटाव, बढ़ाव जो जहां दीखते हैं वे सब चारों श्रोर वाक् ही वाक् फैली हुई जाननी चाहिये | ये सब वेद हैं किन्तु वेद रूप में ये सब वाक् किसी न किसी नाभि से अवश्यमेव बंधी हुई रहती हैं । कोई भी वेद अपनी नाभि से च्युत नहीं होते । साम और ऋक् का आयतन नियत होता है किन्तु यजुः का प्रायतन कोई भी नियत नहीं होता । वाक् सदा सत्यरूपा है वह कभी प्राण के बिना नहीं रहती और प्राण कभी बिना मन के नहीं रहता । यही कारण है कि यह वेद जिस प्रकार वाक् है उसी प्रकार प्राण और मन भी है । जहां तक मन का फैलाव है यहीं तक प्राण फैला हुआ है । इसी प्राण के फैलाव के साथ साथ वाक् भी नियमानुसार फैलती है । तीनों के एक साथ फैलाव को वेद कहते हैं अतः यजुर्वेद में वाक् को वेद कहा है और ऐतरेयारण्यक में प्राण को और तैत्तिरीय वाले मन को वेद कहते हैं । वेद शब्द की व्युत्पत्ति मन, श्रारण, वाक् इन तीनों का जहां तक फैलाव है उसके भीतर दृष्टि रखने से दृष्टि के देश में जितनी बड़ी ऋक् मूर्ति हो सकती है वही पकड़ में आती है । दृष्टि का उस मूर्ति के पकड़ने को ही जानना कहते हैं । उसी जानने के अनुरोध से जिस मूर्ति को पकड़ कर हमारा ज्ञान होता है उसको वेद कहते हैं । जहाँ हम किसी वस्तु के लिये " है " ऐसा कह कर दावा करते हैं वहाँ केवल उसके तीनों वेदों का हमारी ग्रात्मा से संवन्ध होता है । उसके तीनों वेद हमारी ग्रात्मा में आते हैं उसी को हम " है " कह् कर व्यवहार करते हैं । बिना वस्तु की उपलब्धि के कोई सत्ता नहीं है और बिना वस्तु की सत्ता के कोई उपलब्धि नहीं है | उपलब्धि को ही वेद कहते हैं । वेद का और सत्ता का परस्पर बनिष्ट संबन्ध है । जो नहीं कदापि उपलब्धि नहीं होती और जिसकी उपलब्धि है उसका अस्तित्व अवश्य ही है । इसी कारण है ऋषियों उसकी ने सिद्धान्त किया है कि इस जगत् के समस्त भूत वेद में सन्निविष्ट हैं अर्थात् वेद से बद्ध हैं । इस प्रकार मन, प्राण, वाक् तीनों को मिला कर वेद कहा गया है और इन्हीं तीनों को मिले हुए रूप में प्रजापति [ १४६ ]
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ॐ ब्रह्मविज्ञान कहते हैं । ग्रतः यादि प्रजापति से सब बंदों का उत्पन्न होना माना जा सकता है अथवा उसी मूल प्रजापति का निश्चल स्वरूप बंदों को जानना चाहिये अथवा वेदों को ही प्रजापति कहना चाहिये ये तीनों मत भित्र होने पर भी एक रूप हैं । वेद की पौरुषेयता छन्द, विज्ञान वा रस वेद प्रत्येक वस्तु में सम्मिलित रूप से व्यापक हैं । ये सभी वेद पुरुष के प्रयत्न के प्राधीन न होने से पोपेय कहे जाते है । जगत् में पौरुषेय, अपरूपेय भेद से दो प्रकार के पदार्थ हैं, इन बट, पट आदि जो पुरुषों से निर्मित उनमें भी यह प्रजापति व्यापक होने के कारण वेद और यज्ञों के द्वारा स्वयम् सनिविष्ट होता है । वेद के लिये पुरुष को कुछ प्रयत्न नहीं करना पड़ता अतः वेद सदा अपौरुषेय है । इन्हीं बेदों को अपनी बुद्धि से देख कर इन्हीं वेदों के पदार्थों को समझाने के लिये जो शास्त्र बनाया है वह वेद के जानने के लिये है अतः बंद शास्त्र कहलाता है । प्राण देवताओं के विज्ञान और उसी के सम्बन्ध से देवताओं के इतिहास और प्राण देवताओं की यज्ञ विधि और उनकी स्तुति इन चारों विषयों को मनुष्य लेकर प्राचीन समय ऋषियों ने जिस शास्त्र को निर्माण किया था वही शास्त्र आज दिन वेद शास्त्र के नाम
से प्रसिद्ध है ॥। इति वेद- निर्वचनं समाप्तम् ॥
यज्ञ यज्ञ के पांच रूप ये हैं १ - यहां तक प्रजापति के शरीर, रूप और वेद का वर्णन किया गया है, इन्हीं वेदों से यज्ञ सम्पन्न होता है जिनमें पहले यजुः से, पीछे ऋक् से और फिर साम से यज्ञ का स्वरूप बनाया जाता है । ये तीनों वेद सिलसिलेवार सन्निविष्ट होकर यज्ञ के स्वरूप बनाते हैं । ये तीनों बेद वाक् हैं । यह जहां तक अपना अवकाश लेता है वहीं तक यज्ञ भी संपन्न होता क्योंकि यह यज्ञ प्रारण प्रधान है और प्राण, वाक् दोनों मिलेजुले रहते हैं, एक के बिना एक नही रहता है, इसीलिये ये तीनों वेद ही यज्ञ के लिये योनि प्रत् प्रभव स्थान हैं और ग्राशय अर्थात् कर्म स्थान है ग्रथवा यों भी कह सकते हैं कि यह यज्ञ ही वेदों की योनि वा आशय है यह विवा ( वेद ) त्रिधातु है वह इस यज्ञ रूपी ग्राशय में रहता है । इसलिये यज्ञ भी त्रिधातु होता है । इन्हीं तीनों वेदों में से सभी भूत विद्यमान रहते हैं और इन तीनों विद्याओं को सत्य कहते हैं इसलिये ये सब सत्य में ही वर्तमान हैं, वह सत्य उसी यज्ञ के द्वारा फैलाया जाता है । [ १४७ ]
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* ब्रह्मविज्ञान सबसे प्रथम कोई एक स्वयंभूयज्ञ है जिसके तीनों वेदों के अन्तर्गत यह चराचर विशाल जगत् विद्यमान् है, यही यज्ञ ग्रपने ही को हवन करता रहता है जिससे नये र ऋक्, साम और यजुः उत्पन्न होते रहते हैं । इन तीनों के नये उत्पन्न होने पर नमा यज्ञ होने लगता हैं, वही नयी वस्तु हो जाती है | जैसे कि सूर्य, पृथ्वी, चन्द्र यादि ग्रन्नतानन्त गोले जो इस विशालग्राकाश में दीखते हैं ये पृथक २ तीन २ वेदों से पृथक् एक एक यज्ञ हो रहे हैं किन्तु इन सब यज्ञों का संबन्ध उसी एक स्वयंभूयज्ञ से है । उसी स्वयंभू-यज्ञ के ग्रन्तर्गत भिन्न २ स्थानों में भिन्न भिन्न छोटे बड़े यज्ञ हो रहे हैं । इन सब यज्ञों का क्रम भी उसी स्वयंभूयज्ञ के अनुसार है किन्तु इनके श्राश्रमाश्रमी भाव की विक्षेषता है । वह स्वयंभूयज्ञ परमेष्ठी पढ़ कहलाता है । इनमें ग्रनन्तानन्त त्रैलोक्यों के अन्तर्गत जो प्रजापति इस परमेष्ठी पद का अधिष्ठाता है वही ईश्वर है, उसके तीनों वेद भी ईश्वर ही हैं और उन तीनों वेदों से होता हुआ यज्ञ भी ईश्वर है उसी वेद से उसी यज्ञ से अथवा उसी प्रजापति से यह विशाल जगत् हुया है वही मेरी ग्रात्मा है । २– ये जहां जो कुछ हम देख रहे हैं इन सबको ही प्राण समझना चाहिये | यह प्राण मन क प्रकाश में विद्यमान् है और इन प्राणों के आधार पर वाक् रहता है जो तेज़ रूप में दीखते हैं, ये तीनों सम्मिलित रूप में एक प्रजापति होता है उसमें मन का प्रारण में जाना और प्राण का वाक् में जाना और वाक् का फिर मन में जाना इसी सिलसिले को यज्ञ कहते हैं ऐतरेय महपि कहते हैं कि “ वाचश्चित्तस्यों-त्तरोत्तरिकमो यज्ञः ” ग्रर्थात् मन प्राण में ग्राकर बाक् बने और फिर बाक् मन में बदले इस ही काम को यज्ञ कहते हैं । इस प्रकार बदलने का कारण बीच का प्राण ही है, वही किया रूप है, इसलिये वास्तव में बही यज्ञ है, उसी के मन और वाक् के दोनों वर्तनी हैं । ३ – सांम को अमृत् कहते हैं सोम वह रस है जो कभी नष्ट नहीं होता और जो सम्पूर्ण जगत् के पदार्थों का उपादान कारण है । सोम सम्पूर्ण श्राकाश में सर्वत्र भरा हुआ व्याप्त रहता है उसकी व्याप्त की दशा में उसमें न रूप है, न रस है, न गन्थ है, किन्तु उसी के संयोग से वे सब पदार्थ बन गये हैं जिनमें रूप, रस, स्पर्श और गन्ध हैं । यही माम दूसरे सोम से जब ग्राघात परस्पर प्रत्याघात पाता है तो के मर्दन और घर्षण से एक प्रकार का बल उत्पन्न होता है उस बल को " सहः " कहते हैं, इसी से स्वभावतः श्रग्ति उत्पन्न हो जाता है । सोम के घर्षण से सहः उत्पन्न होकर उससे अग्नि का उत्पन्न सह होना जिस क्रिया से होता है उस सम्पूर्ण क्रिया को यज्ञ कहते हैं ४- जब कभी सोम का ग्रग्नि में हवन करते हैं तो वह सोम अग्नि में परिणत हो है और जाता अग्नि जल कर जब ज्वाला से ऊपर निकल जाता है तो जहां तक अग्नि, प्रकाश है उसने बाह्र पहुँचकर अपने ग्रग्निपने से मर जाता है और फिर सोम के रूप में ही परिणत सोम हो जाता है इस प्रकार ग्रग्नि में और सोम अग्नि में पर्याय ( बारी बारी ) से बदलते रहते को हैं । इस बदलने की सिलसिलेवार क्रिया यज्ञ कहते हैं । ५- जिस प्रकार ग्रादि प्रजापति का वितान होनायज्ञ है उसी यज्ञ से प्रजा उत्पन्न जगत् की सारी हुई है उसी प्रकार ग्रव इस समय में भी ओर आगे को भी यज्ञ ही के द्वारा प्रजायें उत्पन्न हो रही हैं या [ १४५ ]